बुधवार, 14 अप्रैल 2010

कुछ अलग

मदनलाल को गुस्सा क्यों न आये...
-मनोज कुमार

मदनलाल शरद जोशी की कहानी के किसी एक आम किरदार की तरह हैं। फर्क इतना है कि मदनलाल इस समाज में हैं और मध्यप्रदेश के उन लाखों लोगों में हैं जो किसी की कामयाबी को अपना मानते हैं। उनका यह मानना एक हिन्दुस्तानी होने के नाते है और ऐसे लोग हिन्दुस्तान को एक परिवार मानते हैं। जो लोग एक भारतीय की कामयाबी पर जश्न मनाते हैं, उन्हें पूरा हक है कि ऐसी मोहब्बत को ठुकराने वालों पर गुस्सा किया जाए। उज्जेन के मदनलाल को इस बात का गुस्सा है कि भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा में उन्होंने अपनी लाडली की सूरत देखी। उन्होंने भीतर ही भीतर कहीं सपना पाल लिया कि उनकी लाडली भी सानिया की तरह उनके अपने हिन्दुस्तान का नाम रोशन करेगी। अपने सपने की बुनियाद उन्होंने कोई आठ बरस पहले पैदा हुई अपनी बिटिया का नाम सानिया रख कर डाला था। संभव है कि मदनलाल अपनी लाडली को परियों के किस्से सुनाने के बजाय सानिया की बातें सुनाता होगा। बच्ची को बताता रहा होगा कि सानिया खेलती कैसे है...आदि इत्यादि। सानिया को लेकर इतने संवेदनशील मदनलाल का दिल टूट गया जब उसने खबर पढ़ी कि सानिया ने पाकिस्तानी क्रिकेटर से शादी रचा ली। यह पीड़ा एक भारतीय मन की थी जिसमें उसका देशप्रेम कूट कूट कर भरा है। ऐसे में वह इस तरह के किसी फैसले की उम्मीद नहीं कर सकता था। करना भी नहीं चाहिए था। सानिया के इस फैसले ने एक पल में मदनलाल का मन बदल दिया। उसने जिस उत्साह और उम्मीद के साथ अपनी बिटिया का नाम सानिया रखा था, उसे उसने एक पल में संगीता में बदल दिया। मदनलाल का यह गुस्सा नाजायज नहीं है। उन्हें गुस्सा नहीं आता तो उनका हिन्दुस्तानी मन दुखी रहता किन्तु उनके गुस्से ने हिन्दुस्तान का प्यार पा लिया है। सानिया किससे शादी करती है या नहीं, यह उसका निहायत निजी मामला हो सकता था तब जब वह सिर्फ और सिर्फ सानिया मिर्जा होती जैसा कि हिन्दुस्तान में करोड़ों की तादाद में लाड़ली हैं जिनकी अपनी कोई पहचान नहीं हैं। जो समाज की उपेक्षा के कारण तिल तिल कर जीने के लिये विवश हैं। जिनके नाम पर कोई मदनलाल अपनी लाडली का नाम नहीं रखता है। यहां सानिया मिर्जा का मामला एकदम अलग है। सानिया अब इस देश की नाम है, पहचान है और यह पहचान कहीं गुम हो जाए तो भला कोई हिन्दुस्तानी कैसे इसे मंजूर करे? मेरा मानना है कि मदनलाल जैसा गुस्सा हर किसी को आना चाहिए और जिसे गुस्सा नहीं आता है, उसे आत्मविवेचन करना चाहिए कि आखिर हम कहां खड़े हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं)

सम्पर्क : ३ जूनियर एमआईजी, द्वितीय तल, अंकुर कॉलोनी, शिवाजीनगर, भोपाल-१६ मो। ०९३००४६९९१८

जश्न

मीडिया मासिक पत्रिका समागम प्रकाशन के दसवे साल में

मीडिया पर एकाग्र मासिक हिन्दी पत्रिका समागम ने अपने प्रकाशन का एक और शानदार गौरवशाली वर्ष पूर्ण कर लिया है। इसके साथ ही समागम दसवें वर्ष में प्रवेश कर गया है। समागम अपने सभी साथियों, मीडिया की वेबसाइट्स व परोक्ष, अपरोक्ष रूप से सहयोग करने वालों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए भविष्य में ऐसे ही सहयोग बनाये रखने की कामना करता है। भोपाल से प्रकाशित पत्रिका का समागम एक विशेष अंक फोटो पत्रकारिता पर केन्द्रीत है। इसमें मध्यप्रदेश सहित देश के वरिष्ठ फोटो पत्रकारों के बारे में जानकारी देने के साथ ही फोटो पत्रकारिता का इतिहास, वर्तमान और संभावनाओं की पड़ताल करने की कोशिश की जाएगी। साथ ही इस क्षेत्र में शिक्षा, रोजगार और तकनीकी पक्षों का भी समावेश किया जाएगा।
समागम का मई २०१० का अंक हिन्दी पत्रकारिता : कल और कल पर केन्द्रीत है। मई का माह पत्रकारिता के लिये विशेष महत्व का है। माह की पहली तारीख श्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है और पत्रकार भी श्रमजीवी होते हैं। पहले महत्वपूर्ण तारीख के बाद तीन मई को पत्रकारिता दिवस एवं तीस मई को प्रथम हिन्दी दैनिक उदंत मार्तण्ड के प्रकाशन की तारीख है।
आग्रह है कि जो साथी अपना लेख/संस्मरण या इससे संबंधित कोई सामग्री समागम में प्रकाशन के लिये भेजना चाहें, वे सम्पादक समागम हिन्दी मासिक द्वितीय तल, ३ जू. एमआईजी, अंकुर कॉलोनी, शिवाजीनगर के पते पर अथवा मेल त्त्.थ्र्ठ्ठददृत्र्दड्ढध्र्द्मऋढ़थ्र्ठ्ठत्थ्.ड़दृथ्र् पर भेज सकते हैं।

नये दौर की, नये तेवर वाली गांव की लीडर
-मनोज कुमार

घर की चहारदीवारी और घूंघट में कभी अपना जीवन होम करने वाली ग्रामीण औरतें अब नये जमाने के साथ कदमताल कर रही हैं। वे नये तेवर के साथ मध्यप्रदेश के अलग अलग हिस्सों में यह जता दिया है कि वे एक बेहतर लीडर हैं जो न केवल घर सम्हाल सकती हैं बल्कि अवसर मिलने पर वे गांव की तस्वीर बदलने का माद्दा भी रखती हैं। मध्यप्रदेश के लिये यह नये किस्म का अनुभव है जब किसी ग्राम पंचायत की सरपंच अपने भ्रष्टाचारी सचिव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है तो कहीं गांधीगिरी के साथ ऐसे नाकाबिल सचिव के खिलाफ मैदान में उतर आयी हैं। यह वही मध्यप्रदेश है जहां भ्रष्टाचार से लड़ने में नाकाम सरपंच अपने दायित्वों से पलायन कर जाती थीं लेकिन आज वे सक्सेस लीडर के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। पन्द्रह बरस से शायद कुछ अधिक ही हुआ होगा जब मध्यप्रदेश में पंचायतीराज व्यवस्था लागू की गई थी। महात्मा गांधी का सपना था कि सत्ता में ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी हो और इसके लिये वे पंचायतीराज व्यवस्था को लागू करने पर जोर दिया करते थे। उनकी मंशा थी कि इस व्यवस्था में स्त्रियों को बराबर का भागीदार बनाया जाए। महात्मा गांधी की सोच और सपने को सच करने की दृष्टि से मध्यप्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई। अपने आरंभिक दौर में पंचायतीराज व्यवस्था के जो परिणाम मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल सका। खासतौर पर महिलाओं की सक्रियता नहीं के बराबर रही। जहां महिलायें सक्रिय भी हुर्इं तो वहां उनकी छाया बनकर उनके पति या परिवारवाले जिम्मेदारी सम्हाले रहे। हर बात पर उनसे पूछ लें, का जवाब मिलता था। कई पंचायतों में प्रभावशाली लोगों के कारण महिलाओं को अपना पद छोड़ना पड़ा था। भ्रष्टाचार का दानव और इस दानव के रूप में अपने पंजे में सीधी-सादी महिला सरपंचों को लपेटे में लिया जाने लगा था। आहिस्ता आहिस्ता पंचायती राज व्यवस्था में बदलाव दिखने लगा। महिलाओं में सक्रियता आने लगी। कल तक छाया बने पति और परिवार वाले किनारे होने लगे और निर्वाचित महिला सरपंच और पंच अपनी सोच के अनुरूप फैसला लेने लगे। इसका प्रतिशत भी बहुत कम था लेकिन बदलाव का एक कदम भी अर्थवान हुआ करता है। आज हालत यदि पूरी तरह नहीं बदले हैं तो भी बदलाव की बयार चल पड़ी है। हाल ही में हुए पंचायतों के चुनाव में ऐसे कई दृश्य बदलते हुए देखने को मिले। राज्य के कई ग्राम पंचायतों में पूरी की पूरी सत्ता महिलाओं के हाथों में आ गयी। कई पंचायतों में चुनावी प्रक्रिया को सरल बनाकर निर्विरोध निर्वाचन की प्रक्रिया अपनायी गयी और निर्विरोध महिलाओं की पंचायतें बन गयीं। इस समय मिले आंकड़ों को परखें तो दर्जन से भी ज्यादा पंचायतों में निर्विरोध चुनाव हुए हैं जहां सौफीसदी महिला पंच और सरपंचों के हाथों में सत्ता की चाबी है। निर्वाचन प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद महिला सरपंचों का इम्तहान बाकि था। पहले से जमे पंचायत सचिव से काम लेना, पंचायत को प्राप्त बजट और विकास कार्य की रूपरेखा बनाना। अनेक पंचायतों में महिला सरपंचों को सचिव ने सहयोग किया लेकिन कुछेक पंचायतों में वे रोड़ा बन गये। घपले खुल जाने के डर और आगे की काली कमाई बंद हो जाने की चिंता में वे महिला सरपंचों से दो-दो हाथ करने जैसी स्थिति में खड़े थे लेकिन उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि जमाना बदल गया है। अब वे जिससे पंगा लेने की कोशिश कर रहे हैं, वे उनसे सुलह नहीं करेंगी बल्कि बाहर का रास्ता दिखाने से नहीं चूकेंगी। कुछ ऐसा ही उदाहरण आदिवासी बहुल जिला मंडला के ग्राम पंचायत चिरईडोंगरी में देखने को मिला जहां सचिव की मनमानी के खिलाफ सरपंच सुषमा उइके ने विशुद्ध गांधीवादी ढंग से विरोध जाहिर किया। ग्राम पंचायत चिरईडोंगरी जिले नैनपुर विकासखंड में आता है जो जिला मुख्यालय से लगभग पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर बसा है। चिरईडोंगरी ग्राम पंचायत की सरपंच श्रीमती सुषमा उइके का कहना था कि उनका सपना अपने गांव के विकास का था किन्तु ग्राम पंचायत सचिव सुजीतसिंह अपनी मनमानी के आगे काम करने में लगातार बाधा पैदा कर रहा था। यही नहीं वह मनमाने ढंग से चैक से भुगतान कर रहा है। पूछे जाने पर वह कोई जवाब नहीं देता है और जब मैंने चेक पर हस्ताक्षर करना बंद कर दिया तो वह मुझे पद से हटाने की धमकी देता है। सरपंच सुषमा उइके को सीईओ से भी शिकायत है कि कई बार प्रभारी सचिव सुजीत के खिलाफ शिकायत करने के बाद भी कार्यवाही नहीं की गई और उल्टे सीईओ मुझे पद छोड़ देने की बात कहते हैं। अपने अधिकारों का उपयोग न कर पाने से दुखी सुषमा उइके गांधीवादी तरीके से पंचायत सचिव का विरोध करते हुए मजदूरी करने में जुट गयी हैं। उनका मानना है कि एक दिन तो उनकी बात सुनी जाएगी। पंचायत सचिव की हठधर्मिता और सीईओ के रूखे व्यवहार से सरपंच दुखी जरूर है लेकिन निराश नहीं। वह कहती है कि एक दिन वह अपना अधिकार पाकर ही रहेंगी। चिरईडोंगरी की सरपंच सुषमा उइके की तरह गांधीवादी तरीका अपनाने के बजाय देवास जिले के ग्राम बरखेड़ा की सरपंच उर्मिला चौधरी ने जता दिया कि लीडर कैसा होता है। गांव में अनेक वर्षाें से जमे बेजाकब्जे पर बुलडोजर चलवा दिया। उर्मिला के इस साहस की गांव वाले तारीफ करते नहीं थकते हैं। इसके पहले भी पंचायत प्रतिनिधि रहे किन्तु किसी ने इस ओर कार्यवाही करने में रूचि नहीं दिखायी। देवास जिले के जनपद पंचायत टोंकखुर्द के ग्राम पंचायत बरखेड़ा की सरपंच उर्मिला दसवीं कक्षा तक शिक्षित है और उम्र कुलजमा बाईस बरस। गांव वाले उर्मिला को सरपंच बिटिया के नाम से पुकारते हैं। सरपंच उर्मिला बताती है कि यह बेजाकब्जा अनेक लोगों ने कर रखा था जिससे आवागमन के लिये रास्ता नहीं था। पद सम्हालने के बाद सबसे पहले वह इस कब्जे को हटाकर पक्का रास्ता बनवाना चाहती थीं। बेजा कब्जा तो हटा दिया गया है और अब पक्का रास्ता बनाने का काम भी जल्द ही शुरू हो जाएगा। राज्य के पंचायतों में अधिकारों के लिये महिला सरपंच केवल लड़ाई नहीं लड़ रही हैं बल्कि वे कानून में प्राप्त अपने अधिकारों को पाने के लिये सजग और सर्तक हैं। हरदा जिले के ग्राम पंचायत पानतलाई की उम्रदराज पचास बरस की आदिवासी सरपंच ढापूबाई अक्षरज्ञान करने निकल पड़ी हैं। इस उम्र में पढ़ाई करने की जरूरत क्यों पड़ी के सवाल के जवाब में सरपंच ढापूबाई कहती हैं कि गांव के विकास की जिम्मेदारी सम्हालने के लिये साक्षर होना जरूरी है। सरपंच ढापूबाई एक अनुशासित छात्रा की तरह गांव के शासकीय पाठशाला में दाखिला लिया है। यही नहीं, सरपंच ढापूबाई प्रतिदिन नियमित रूप से सुबह ग्यारह बजे कक्षा शुरू होने के पूर्व पहुंच जाती हैं और सायं पांच बजे तक कक्षा छूटने तक वे अध्ययनरत रहती हैं। ढापूबाई की मंशा तो बचपन से ही स्कूल जाने की थी लेकिन कई कारण थे जो उनके मन की नहीं हो पायी। अब वे गांव की जनप्रतिनिधि हैं और इस नाते वे साक्षर होना जरूरी समझती हैं। बदलाव के इस दौर की खास बात यह है कि चिरईडोंगरी की सरपंच सुषमा उइके, ग्राम पंचायत बरखेड़ा की उर्मिला चौधरी हो या ग्राम पंचायत पानतलाई की उम्रदराज पचास बरस की आदिवासी सरपंच ढापूबाई किसी की जिम्मेदारी को पूरा करने में न तो पति हस्तक्षेप करते हैं और न परिवार वाले। जो सरपंच निर्वाचित हुई हैं, वे ही अपनी लड़ाई लड़ रही हैं, जिम्मेदारी पूरी कर रही हैं। राज्य में पंचायतों के लिये शिवराजसिंह सरकार ने पचास फीसदी आरक्षण देकर न केवल महिलाओं का सम्मान किया है बल्कि उनके आत्मविश्वास को और मजबूत किया है। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है। कोई शक नहीं कि राज्य के पंचायतों में बदलाव की यह बयार बताती है कि नये जमाने की ये नयी लीडर विकास की नयी कहानी लिखेंगी।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं)

रविवार, 11 अप्रैल 2010

अवार्ड

पत्रका‡रता पुरस्कार, २००९
प्र‡वष्टियां प्राप्त होने की अन्तिम ‡त‡थ, २६ अप्रैल २०१०
राज्य „ाासन,पत्रका‡रता के क्षेत्र में उत्कृष्ट और जनोन्मुखी कार्य करने वाले पत्रकारों से राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय और प्रदे„ा के अंचलों के ‡लये स्था‡पत पुरस्कारों के ‡लये ‡दनांक २६ अप्रैल, २०१० तक प्र‡वष्टियाँ आमं‡त्रत करता है।
राष्ट्रीय पुरस्कार - २००९
क्रं. पुरस्कार उद्दे„य १. गणे„ा „ांकर ‡वद्यार्थी पुरस्कर राष्ट्रीय स्तर पर पत्रका‡रता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के ‡लये २. मा‡णकचन्द्र बाजपेयी पुरस्कार ध्येय‡नष्ठ पत्रका‡रता के ‡लए ३. ‡वद्या‡नवास ‡मश्र पुरस्कार प्रदे„ा की ‡नर्माण और ‡वकास ग‡त‡व‡धयों में उल्लेखनीय योगदान के ‡लए
राष्ट्रीय स्तर पर पत्रका‡रता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के ‡लए न्यूनतम ५० वर्षीय, कम से कम २० वर्ष का अनुभव रखने वाले पत्रकारों से प्र‡वष्टियां आमं‡त्रत हैं। चय‡नत पत्रकार को रू. १.०० लाख की सम्मान रा‡„ा भेंट की जाएगी।
राज्य स्तरीय पुरस्कार - २००९
सत्यनारायण श्रीवास्तव पुरस्कार
उत्कृष्ट राजनै‡तक ‡रर्पाेटिंग के ‡लये समाचार पत्रों/इलेक्ट्रॉ‡नक मी‡डया के मध्यप्रदे„ा के पत्रकारों को देय इस पुरस्कार के ‡लये न्यूनतम ५० वर्षीय,पत्रका‡रता का कम से कम २५ वर्ष का अनुभव रखने वाले ऐसे पत्रकारों से,जो १० वर्ष से राजनै‡तक ‡रर्पाेटिंग/राजनै‡तक डेस्क पर स‡क्रय रूप से कार्यरत हों, ‡नर्धा‡रत प्रपत्र में प्र‡वष्टियां भेज सकते हैं। प्रिंट मी‡डया से इलेक्ट्रा‡नक मी‡डया में आए पत्रकार भी प्र‡वष्टियां भेज सकते हैं। चय‡नत एक पत्रकार को रूपये ५१ हजार की सम्मान रा‡„ा भेंट की जायेगी।
महेन्द्र चौधरी पुरस्कार
उत्कृष्ट फोटो पत्रका‡रता को प्रोत्स‡हत करने के ‡लये मध्यप्रदे„ा के फोटोग्राफरों को देय इस पुरस्कार के ‡लये न्यूनतम ३५ वर्षीय , कम से कम ५ वर्ष का अनुभव रखने वाले संचार संस्थान से जुड़े स‡क्रय फोटोग्राफर प्र‡वष्टियां भेज सकते हैं। प्र‡वष्टि के साथ ‡प्रन्ट मी‡डया में नाम से प्रका‡„ात कम से कम २० छाया ‡चत्रों की कतरनें संलग्न की जायें। चय‡नत फोटोग्राफर को रूपये ५० हजार की सम्मान रा‡„ा भेंट की जायेगी
अंचलों के पुरस्कार - २००९
(भोपाल, इन्दौर, ग्वा‡लयर, जबलपुर, उज्जैन, सागर, रीवा, अंचलो के ‡लये)
क्रं. पुरस्कार अंचल १. „ारद जो„ाी पुरस्कार भोपाल (नर्मदा पुरम संभाग स‡हत) २. राहुल बारपुते पुरस्कार इन्दौर ३. रतन लाल जो„ाी पुरस्कार ग्वा‡लयर (मुरैना संभाग स‡हत) ४. जीवन लाल वर्मा ‡वद्रोही पुरस्कार जबलपुर ५. कन्हैया लाल वैद्य पुरस्कार उज्जैन ६. मास्टर बलदेव प्रसाद पुरस्कार सागर ७. बनारसी दास चतुर्वेदी पुरस्कार रीवा („ाहडोल संभाग स‡हत)
प्रदे„ा के समाचार पत्रों,इलेक्ट्रिा‡नक मी‡डया के ४० वर्ष से अ‡धक आयु और पत्रका‡रता का न्यूनतम १५ वर्ष का अनुभव रखने वाले,संबं‡धत अंचल में ‡नवासरत पत्रकार अंचल के पुरस्कर के ‡लये प्र‡वष्टियां ‡नर्धा‡रत प्रपत्र में बंद ‡लफाफे में वर्ष २००९ में स्वयं के नाम से प्रका‡„ात कम से कम २० प्रमा‡णत कतरनों स‡हत भेज सकते हैं।पुरस्कार के ‡लए प्रत्येक अंचल के चय‡नत पत्रकार को रूपये. २१ हजार की सम्मान रा‡„ा भेंट की जाएगी।
वांछनीय
१. सभी पुरस्कारों की प्र‡वष्टि में स्वयं,‡पता/प‡त का नाम,जन्म ‡त‡थ,जन्म स्थान,‡„ाक्षा,कार्यरत संस्थान का नाम,डाक का पूरा पता,कार्यालय,‡नवास,टेलीफोन,मोबाइल नम्बर,पत्रका‡रता के क्षेत्र में अर्जित उपलब्धियां/अनुभव,पूर्व में प्राप्त पुरस्कार,सम्मान आ‡द का ‡ववरण भेंजें इसके साथ पोस्टकार्ड आकार के दो नवीनतम रंगीन फोटो भी सलंग्न करें।
२. प्र‡वष्टि भेजने वाले ‡लफाफे पर वां‡छत पुरस्कार का नाम अव„य अं‡कत करें।
३. सभी पुरस्कारों की प्र‡वष्टियां श्री ‡दने„ा मालवीय,सहायक संचालक,पत्रकार कल्याण प्रभाग जनसम्पर्क संचालनालय बाणगंगा मार्ग भोपाल के पता पर बंद ‡लफाफे में भेजी जाएं।
४. प्रत्येक पुरस्कार के ‡लए चयन की अनु„ांसा „ाासन द्वारा ग‡ठत स‡म‡त द्वारा की जायगी।चयन स‡म‡त प्राप्त प्र‡वष्टियों के अ‡त‡रक्त ‡जन्हें वह उपयुक्त समझें,ऐसे उम्मीदवारों के नाम ‡वचार क्षेत्र की सूची में सम्म‡लत कर सकेगी।स‡म‡त की अनु„ांसा पर राज्य „ाासन द्वारा ‡लया गया ‡नर्णय सर्वमान्य और अं‡तम होगा।
५. पुरस्कार की „ार्तें एवं ‡नर्धा‡रत आवेदन का प्रारूप जनसम्पर्क संचालनालय की बेवसाइट पर भी देखा जा सकता हैंै।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

पेड़ news


रसीद कटा लो...रसीद
मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया अध्येता
इन दिनों पेड न्यूज को लेकर हर मंच पर विलाप किया जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि पेड न्यूज के इस मसले के चलते पूरी मीडिया के अस्तित्व पर सवालिया निशान लग गया है। पेड न्यूज का मामला कांग्रेस के अशोक चव्हाण के उस चुनावी केम्पन का हिस्सा है जिसमें उनकी इमेज बिÏल्डग करती हुए एक जैसी खबरें अनेक अखबारों में सम्पादकों और संवाददाताओं के नाम से प्रकाशित हुई है। नेता, सरकार और कम्पनियों की इमेज बिÏल्डग करने वाला मीडिया केम्पन आजादी के बाद इस देश में एक बार नहीं, बार बार हुआ है और हो रहा है और शायद भविष्य में यह केम्पन और विस्तार पायेगा। पेड न्यूज के बारे में एक सवाल मेरे जेहन में बार बार कौंध रहा है वह यह कि आखिर आप किसे पेड न्यूज बता रहे हैं? पेड यानि भुगतान अर्थात जिस खबर/रिपोर्ट को लेकर हंगामा मचा है, विलाप किया जा रहा है, वह खबर कितने में बिकी, इस सवाल का जवाब न तो किसी ने मांगा और न कहीं दिया गया है। अंग्रेजी के शब्द पेड का जो सामान्य सा अर्थ मुझे समझ आता है, उसका मतलब तो यही है कि भुगतान किया जाना और जिस वस्तु का क्रय किया जाता है और इस क्रय के बदले भुगतान की रसीद प्राप्त की जाती है। यह व्यापार का सामान्य सा नियम है। मध्यप्रदेश शासन उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने के लिये अभियान चलाये हुए है कि आप जो भी खरीदें, उसकी रसीद जरूर प्राप्त करें। क्या पेड न्यूज के इस मामले में व्यापार के इस नियम का पालन किया गया है अथवा अनदेखी की गई है। यदि नियम का पालन किया गया है तो पेड न्यूज का मामला बनता है और नहीं किया गया है तो यह एक तरह से बेबुनियाद बातें हैं। अब यह कहा जाएगा कि ऐसी बातों का क्या मतलब? मेरा मानना है कि जब हम कोई खबर लिखते हैं तो पूरी जवाबदारी से लिखते हैं और उसकी पूरी पड़ताल करते हैं और जब हम अपने ही प्रोफेशन पर सवालिया निशान लगा रहे हैं तो उसके तथ्यों की जांच करना हमारा पहला दायित्व है। जहां तक पत्रकारिता का मेरा अपना अनुभव है उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि इम्पेक्ट फीचर, किसी सरकार के सौ दिन, एक साल अथवा ऐसे ही किसी मौके पर विज्ञापन की शक्ल में जारी किया जाने वाला समाचार भी पेड न्यूज की श्रेणी में आता है किन्तु कभी इस पर कोई हंगामा नहीं हुआ। इसे मान लिया जाता है कि किसी अखबार अथवा टेलीविजन को चलाने के लिये विज्ञापन की जरूरत होती है और इस रूप में मीडिया संस्थान को आय होती है। इसके साथ ही ऐसे पेड न्यूज की चर्चा पर विराम लगा दिया जाता है।
पेड न्यूज को लेकर एक दूसरा सवाल यह कि यह हंगामा इसलिये मच रहा है कि मीडिया को समाज की चिंता है और चिंता इस बात को लेकर है कि पेडन्यूज में सही-गलत की परख किये बिना जो तथ्य दिये जाते हैं, वह पाठकों-दर्शकों को गुमराह करते हैं। ऐसा है तो इम्पेक्ट फीचर और सरकार की इमेज बिÏल्डग करने वाली खबरों से परहेज क्यों नहीं किया जाता है? क्यों हम सरकार की ओर से दिये गये तथ्यों को जांचे बिना पाठकों-दर्शकों तक पहुंचा देते हैं? तब हम पेड न्यूज का हल्ला क्यों नहीं मचाते? मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि पूरा मामला दर्शकों-पाठकों की चिंता का नहीं बल्कि उन लोगों का विलाप है जो इस लाभ से वंचित रह गये। इस मामले में जिसके पक्ष में खबर छपी है और जिसे पेड न्यूज कहा जा रहा है और जिसने अपने चुनावी खर्च को कम बताया है, उसके खिलाफ खर्च कम दिखाये जाने का मामला चलना चाहिए। मामला उनके खिलाफ भी चलना चाहिए जिन्होंने इन खबरों को प्रकाशित किया। यदि यह माना जाता है कि खबर विज्ञापन की सूरत में प्रकाशित किया गया है तो पेड न्यूज जैसा कोई मामला ही नहीं बनता है। यह विलाप पाठक एवं दर्शकों को भरमाने का एक ड्रामा माना जाना चाहिए।
यह मानने में किसी को हिचक नहीं होना चाहिए कि अन्य प्रोफेशन की तरह पत्रकारिता में भी गिरावट आयी है किन्तु इस बात पर पत्रकारिता गर्व कर सकती है कि वह औरों की तरह अपने ऊपर लगे लांछन को कुतर्क से ढंकने के बजाय आत्म विवेचना करती है। उसका आत्मविवेचन बंद कमरे में न होकर समाज के मंचों पर जाकर होता है। यह अपने आप में सुखद और बेहतरी की ओर संकेत देती है कि आने वाले वक्त में भी मीडिया वि·ासनीय बना रहेगा। पेड न्यूज को जिस तरह हाइप किया जा रहा है, वह ठीक उसी तरह है जैसा कि बताया जा रहा है पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन बन गया है। यह बात भी मेरी समझ से परे है। परतंत्र भारत में पत्रकारिता के महानायकों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला था तो स्वतंत्र भारत में हम भ्रष्टाचारियों, अनैतिकता के साथ ही आम आदमी की सुविधा के लिये तंत्र के खिलाफ मोर्चाे खोले खड़े हैं। पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधाओं का विस्तार हो सके, इसके लिये पत्रकारिता ने आजादी इन वर्षाें में सतत रूप से लड़ाई लड़ी है और लड़ रहे हैं। ऐसे में मिशन गुम नहीं हुआ है बल्कि मिशन के चलते ही तंत्र को सजग और सर्तक रहना पड़ रहा है। Ïस्टग ऑपरेशन को भले ही आप कोसें लेकिन कैमरे का डर आज भी गैरकानूनी काम करने वालों के मन में घर कर गया है किन्तु आम आदमी के लिये मीडिया अपनी बात रखने का सबसे सशक्त माध्यम बना हुआ है।
पत्रकारिता की वि·ासनीयता पर ऐसा ही हंगामा किया गया किन्तु उसके विस्तार ने बता दिया कि यह बकवास है। मीडिया की वि·ासनीयता न केवल कायम है बल्कि उसमें विस्तार भी हुआ है। आज पेड न्यूज को लेकर जो लोग हंगामा मचा रहे हैं, उन्हें खबर की कीमत तय होने का इंतजार करना चाहिए क्योंकि जब तक खबर की कीमत तय नहीं होगी, पेड न्यूज की पत्रकारिता नहीं हो पायेगी। विज्ञापन के लिये भुगतान मिलता है, रसीदें कटती हैं। फिलहाल खबर के मामले में ऐसा नहीं हो पाया है। मुझे उस दिन का इंतजार होगा जब आवाज लगेगी रसीद कटवा लो...रसीद...। आखिरी में एक बात और। जिन लोगों ने अभिषेक बच्चन अभिनीत फिल्म देखी हो उन्हें यह याद होगा कि स्वतंत्र मत के स्वामी संपादक की भूमिका का निर्वाह कर रहे मिथुन चक्रवर्ती इसी तरह के पेड न्यूज को लेकर अपने संपादक और स्टाफ पर नाराज होते हैं और साथ ही यह निर्देश देते हैं कि अगले दिन उनका अखबार क्षमायाचना प्रकाशित करेगा। क्या किसी संपादक में अभी इतनी हिम्मत बची है कि वह ऐसे पेड न्यूज के बारे में हल्ला मचाने के बजाय अखबार में इसके लिये माफीनामा छाप सके। जिस दिन किसी संपादक के भीतर इतनी आत्मशक्ति आ जाएगी, उस दिन पेड न्यूज के बारे में बात करना न केवल नैतिक होगा बल्कि व्यवहारिक भी। मुझे उस दिन का इंतजार रहेगा।

बुधवार, 3 मार्च 2010

खेल और मध्यप्रदेश

शिवेन्द्र के लिये हम क्यों नहीं बोलते?

-मनोज कुमार

भारतीय हॉकी टीम की कामयाबी से बौखलाये पाकिस्तान के दबाव में एक होनहार हॉकी खिलाड़ी को पहले तीन मैचों से और बाद में संशोधन कर दो मैचों के लिये निलंबित कर दिया गया। यह बेहद अफसोसजनक बात है। शिवेन्द्र का मनोबल तो गिरा ही है, साथ ही समूची भारतीय हॉकी टीम का मनोबल टूटा है। शिवेन्द्र की बात करें तो वे मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हैं और मध्यप्रदेश ने पिछले दिनों हॉकी को बदहाली से उबारने की सकरात्मक पहल की है, उसके बाद मध्यप्रदेश के खिलाड़ी के साथ ऐसा गैरवाजिब बर्ताव करना अफसोसजनक ही नहीं बल्कि निंदा के लायक है। बहरहाल, एक बात यह भी अफसोस करने लायक है वह यह कि मध्यप्रदेश के एक खिलाड़ी के साथ अनुचित कार्यवाही की गई लेकिन किसी ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठायी। पूर्व ओलिम्पियन असलम शेरखां ने जरूर इस मामले में आवाज बुलंद की लेकिन कोई और उनका साथ देने सामने नहीं आया। यह पहला या अकेला मामला नहीं है जब मध्यप्रदेश ने खामोशी ओढ़ ली है। इसके पहले भी मध्यप्रदेश अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ खामोश खड़ा रहा है। मध्यप्रदेश का विभाजन हुआ और छत्तीसगढ़ को स्वतंत्र राज्य का दर्जा दे दिया गया, मध्यप्रदेश ने खामोशी के साथ इसे मंजूर कर लिया। अब बात बुंदेलखंड राज्य बनाने की है और इस बार भी मध्यप्रदेश का विभाजन होगा तो लगता नहीं कि विरोध के लिये आवाज उठेगी। आखिरकार हम इतने सहनशील क्यों हैं? क्यों हम अपने और अपने लोगों के लिये आवाज उठाने में भावनात्मक एकता का परिचय नहीं देते हैं? शिवेन्द्र के साथ हुए अन्याय के खिलाफ पुरजोर विरोध होना चाहिए ताकि हॉकी के खिलाड़ियों को इस बात का अहसास बना रहे कि उनके साथ पूरा देश है। मामला अकेले शिवेन्द्र का नहीं है बल्कि समूचे हॉकी के भविष्य का है। जैसे तैसे हॉकी टीम में जान आयी और आते ही उसे खत्म किये जाने की साजिश शुरू हो गयी। अभी विरोध नहीं किया गया तो शायद ही हॉकी अपने पुराने सुनहरे दिनों की ओर लौट सके। क्रिकेट के लिये मामूली बातों पर हल्ला मचाने, विरोध करने और अपनी नाराजगी जताने वालों से आग्रह है कि एक बार वे अपना विरोध इस फैसले के खिलाफ भी जता दें ताकि सबको लग सके कि अभी हॉकी की चिंता करने वाले हैं। उल्लेखनीय है कि वल्र्ड कप हॉकी में जब भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ चार गोल ठोंका तो पूरा देश तालियां बजा उठा। यह खुशी स्वाभाविक थी क्योंकि जिस तरह हम हॉकी की दुर्दशा देख रहे थे, उसमें ऐसी कामयाबी से हर भारतीय खुश होगा और होना चाहिए। भारतीयों, खासकर मध्यप्रदेश के लोगों के लिये यह खुशी थोड़ी ही देर की रही क्योंकि मध्यप्रदेश के प्रतिभावान खिलाड़ी शिवेन्द्र को पहले तीन मैच के लिये और बाद में दो मैच के लिये निलंबित कर दिया गया। शिवेन्द्र का निलंबन पूरी तरह से गैरवाजिब था क्योंकि फौरीतौर पर उनके निलंबन के लिये जो कारण गिनाये गये जो किसी भी हालत में जायज नहीं थे बल्कि यह कहा जाण् कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था तो ज्यादा वाजिब होगा। शिवेन्द्र के निलंबन से पूरी टीम का मनोबल ऐसा गिरा कि दूसरे दिन उसे करारी हार का सामना करना पड़ा। आस्ट्रेलिया से भारत की हार खेल के कारण नहीं बल्कि तनाव के कारण माना जाना चाहिए। अगला मैच स्पेन से है और इसमें भी शिवेन्द्र बाहर रहेगा लेकिन वि·ाास किया जाना चाहिए कि अबकी भारत ऐसी गैरवाजिब कार्यवाही का जवाब देने के लिये अपनी जीत को बरकरार रखेगा। किसी समय हॉकी की नर्सरी कहे जाने वाले भोपाल में आज भले ही हॉकी खत्म हो रही है किन्तु मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान की चिंता ने हॉकी में जान फूंकने का काम किया है। हम यह नहीं कहते कि वल्र्ड कप हॉकी में भारत की जीत के पीछे मध्यप्रदेश के प्रयास रहे हैं लेकिन भारतीय हॉकी टीम का मनोबल बढ़ाने में मध्यप्रदेश की कोशिश रही है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है। जब भारतीय हॉकी टीम के खिलाड़ियों ने पैसों के अभाव में मैदान छोड़ने का ऐलान कर दिया था तब मध्यप्रदेश ने आगे बढ़कर मदद के लिये हाथ बढ़ाया था। हॉकी खिलाड़ियों की हौसलाअफजाई करना मध्यप्रदेश की नैतिक जवाबदारी थी क्योंकि यही एक प्रदेश है जिसकी पहचान हॉकी से थी और आज भी बनी हुई है।

जन्मदिन

लोक को तंत्र से जोड़ते शिवराजसिंह चौहान-

मनोज कुमार

शिवराजसिंह चौहान लगातार अपने दूसरे कार्यकाल में भी मुख्यमंत्री के रूप में अपने आपको प्रस्तुत नहीं कर पाये। वे एक आम आदमी के प्रतिनिधि के रूप में अपनी राजनीति आरंभ की और और आज भी आम आदमी के प्रतिनिधि के रूप में अपनी पहचान बनाये रखे हुए हैं। उनकी कोशिश जनता को सत्ता में भागीदार बनाने की रही है और वे अपनी इस कोशिश में कामयाब होते भी दिख रहे हैं। अपने पहले कार्यकाल में मुख्यमंत्री की चौपाल बिठाकर आमआदमी को सत्ता के करीब लाने का प्रयास किया तो जनदर्शन के माध्यम से सत्ता को आम आदमी के बीच ले जाने की कोशिश की। दूसरे कार्यकाल में मध्यप्रदेश बनाओ अभियान के माध्यम से जहां एक तरफ वे स्वर्णिम मध्यप्रदेश का सपना देख रहे हैं तो दूसरी तरफ वे आम आदमी से इस बात का आह्वान कर रहे हैं कि वे सत्ता के आश्रित रहने के बजाय सत्ता में भागीदार बनकर प्रदेश की तस्वीर और तकदीर बदल डालें। शिवराजसिंह चौहान मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हालने वाले २८वें मुख्यमंत्री हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के एकमात्र नेता हैं जिन्होंने मध्यप्रदेश में दूसरी दफा और राज्य के इतिहास में दूसरे नेता जिन्होंने सत्ता की कमान सम्हाली। लगातार दो बार तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसान होना सरल नहीं है तो बहुत कठिन भी नहीं लेकिन अपने कार्यकाल को अविस्मरणीय बनाना जरूर मुश्किल भरा है। यूं तो मध्यप्रदेश के हर मुख्यमंत्री ने अपनी कार्यशैली से अलग पहचान बनायी लेकिन इनमें शिवराजसिंह चौहान की पहचान इतिहास में अलग तरह से होगी। उन्होंने अपने पहले और वर्तमान कार्यकाल में लगातार लोक को तंत्र से जोड़ने की पहल की है। उनकी इस पहल का ही परिणाम रहा कि भारतीय जनता पार्टी की छवि आम आदमी की पार्टी के रूप में बनी। आजादी के बाद और नये मध्यप्रदेश के निर्माण के बाद संभवत: मध्यप्रदेश एकमात्र राज्य होगा जहां आम आदमी के लिये मुख्यमंत्री निवास के दरवाजे खुल गये। प्रदेश के आदिवासी जिनके नाम पर विकास की वाहवाही तो लूट ली गयी लेकिन विकास कोसो दूर रहा था, आज वह मुख्यमंत्री के साथ बैठकर न केवल अपने दुख-सुख की बातें कर रहा है बल्कि उनके साथ भोजन भी करने का सुख पा रहा है। आदिवासी ही क्यों, हर वर्ग के लोग मुख्यमंत्री की चौपाल के बहाने मुख्यमंत्री के करीब आ गये। एक के बाद एक हर वर्ग के लिये उनके द्वारा किया मुख्यमंत्री निवास पर आयोजित हो रहे मुख्यमंत्री की चौपाल लोगों के लिये यादगार बन गयी। चौपाल के जरिये मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का कई जमीनी हकीकतों से सामना हुआ। उनकी समझ में आ गया कि जनकल्याण की योजनाओं को अफसरशाही ने कागज में लपेट कर रख दिया है। अब उनका अगला पड़ाव था आम आदमी के बीच सत्ता को ले जाने का और वे इस कोशिश में भी कामयाब हुए। अफसरशाही बीते पचास सालों से जिस कार्यशैली की अभ्यस्त थी, उसे लगा कि यह भी मुख्यमंत्री की लोकलुभावन घोषणा होगी। सूरज के ढलते और अगली सुबह के होते होते बात खत्म हो जाएगी लेकिन उन्हें इस बात का कतई अहसास नहीं था कि बात निकलेगी तो दूरतलक जाएगी...। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान निकल पड़े गांव गांव, कस्बे-कस्बे। आनन-फानन में योजनाओं की समीक्षा कर डाली और कहीं गरजे-बरसे तो कहीं पीठ भी थपथपायी। अलसायी अफसरशाही दुरूस्त हो गयी और जिनको इसके बाद भी समझ नहीं आया, वे कार्यवाही के शिकार हो गये। इन कवायदों के बाद मुख्यमंत्री शिवराजसिंह अपने बुने सपने स्वर्णिम मध्यप्रदेश को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया और आओ बनाये अपना मध्यप्रदेश की यात्रा पर निकल पड़े। अमरकंटक से आरंभ हुई यह यात्रा पूरे मध्यप्रदेश में चल पड़ी। मुख्यमंत्री स्वयं कहीं झाडू लगा कर तो कहीं योग की कक्षा लेकर अपने मध्यप्रदेश की भावना को बढ़ाने की कोशिश की। वे बार बार और हर बार यही बोलते रहे कि मध्यप्रदेश हमारा अपना प्रदेश है। जनता को सरकार पर आश्रित रहने के बजाय सरकार में भागीदार होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि शिवराजसिंह जो बात कह रहे हैं, उनके पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने नहीं कही हो लेकिन वे जिस असरदार ढ़ंग से कह रहे हैं, वह उल्लेखनीय है। स्मरण रहे कि मध्यप्रदेश विभिन्न अंचलों को लेकर बनाया गया प्रदेश है। कदाचित इस बात से विमत नहीं होना चाहिए कि मध्यप्रदेश में भावनात्मक एकता का अभाव है। मालवा, विंध्य, महाकोशल, बुंदेलखंड और भोपाल की एक आवाज अब तक नहीं बन पायी है। संस्कृति और संस्कार हैं तो आंचलिक और स्वाभाविक है कि इसी संस्कृति और संस्कार को एकजाई आवाज बनाने के लिये मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान अपना मध्यप्रदेश की यात्रा पर निकल पड़े हैं। उनकी यह यात्रा का परिणाम तत्काल भले ही न मिले लेकिन आने वाले समय में यह असर दिखायेगी, इस बात का अहसास किया जाना चाहिए। लोकप्रियता के शिखर पर बैठे शिवराजसिंह को कभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दिखाने का यत्न किया जाता है तो कहीं भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी उन्हें बताने से उनके समर्थक चूके नहीं लेकिन शिवराजसिंह इन सबसे परे रहकर खुद को एक किसान के बेटे के रूप में देखते रहे। उनकी कल्पना और चिंता गांव, ग्रामीण और किसान रहे हैं। वे उन्हें मुस्कराता हुआ देख स्वयं मुस्करा देते हैं। इस जन्मदिन के साथ उनके अगले अनेकानेक जन्मदिवस पर उनकी यह मुस्कान कायम रहे, यही मध्यप्रदेश की कामना है। उनके लिये शुभकामना है।

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