रविवार, 12 फ़रवरी 2012

Aaj-Kal

रंगमंडल की उदासी से मुस्कराया राज्य नाट्य विद्यालय

मनोज कुमार

तीस बरस पहले जब भोपाल में भारत भवन की स्थापना हुयी थी तो यह भारत भवन एक उम्मीद की बुनियाद थी। संस्कृति, कला और साहित्य के लिये। भारत भवन के बूते भोपाल ने पूरे विश्व में एक सांस्कृतिक नगर का गौरव पाया था। बाद के  वर्षाें में अपने अनेक उत्कृष्ट आयोजनों के साथ दुनिया के कला मंच पर भारत भवन की ख्याति बढ़ती गयी और उम्मीदें भी। आहिस्ता आहिस्ता समय गुजरता गया। इस गुजरते समय ने भारत भवन की पहचान को पुख्ता नहीं किया बल्कि ख्याति सीजने लगी। स्वार्थाें की यह सड़न और सीड़न ने भारत भवन को असमय असामयिक बना दिया। तीस बरस के इस सफर में उसकी खूबियां, उसकी कामयाबी और उसकी चमक विवादों में खो गयी। कल का कलागृह अब कलह गृह के रूप में पहचाना जाने लगा और बाद के वर्षाें में यही उसकी स्थायी पहचान बन गयी। इस तीस बरस की समीक्षा करेंगे तो पाएंगे कि जिस तरह संस्कृति और कला के साधकों ने इस पर अपनी धाक जमाने की कोशिश की तो राजनेताओं ने भी इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली तक अपनी आवाज की छाप छोड़ने के लिये जब भी जरूरत पड़ी, भारत भवन का इस्तेमाल किया गया। राजनीतिक गलियारों में भी भारत भवन को लेकर उत्पन्न हुआ रोमांच आहिस्ता आहिस्ता थम सा गया।

भारत भवन के बारे में चर्चा करें तो रंगमंडल एक बड़ा अध्याय होता है। लगभग पन्द्रह बरस पहले हमने भारत भवन के कलाकारों और उनसे जुड़े संस्कृति के लोगों से चर्चा में इस बात पर जोर दिया था कि रंगमंडल भारत भवन के परिसर से बाहर क्यों नहीं जाता है? तब छत्तीसगढ़ अलग नहीं हुआ था। इस बारे में तर्क कम और कुतर्क अधिक था। रंगमंडल की गतिविधियों का विकेन्द्रीकरण नहीं हो सका और जो जहां था, वहीं का रह गया। एन.एस.डी. की जो पहचान थी, उससे इतर भारत भवन के रंगमंडल के पहचान बनाने की कोई कोशिश नहीं हुई। कभी अपने प्रभावशाली प्रदर्शनों के लिये रंगमंडल की एक छाप थी, यह छाप भी धुंधलाता गया। रंगमंडल लगभग नेपथ्य में ही चला गया। आज भारत भवन के आंगन में लगातार नाटकों का प्रदर्शन हो रहा है किन्तु इसकी गुणवत्ता पर कोई चर्चा
नहीं होती है। नाटकों को दर्शकों का अभाव लगातार बना हुआ है। शुक्र इस बात का करना चाहिए कि एक सिलसिला तो कायम है।
कभी इस बात को गौर से न तो सोचा गया और न ही किया गया कि आखिर इस सांस्कृतिक विरासत का संवर्धन और संरक्षण कैसे किया जाए, इसका परिणाम यह हुआ कि भारत भवन को विस्तार देने के बजाय उसके बराबर में दूसरी संस्थाएं खड़ी की गई। विस्तार का यह चेहरा भी बुरा नहीं है लेकिन सुखकारक नहीं कहा जा सकता है। भारत भवन के बराबर में कोई और खड़ा हो तो गुरेज नहीं लेकिन एक विरासत को विस्तार देना ज्यादा सार्थक होता। इस स्थिति के लिये भारत भवन परिवार ही ज्यादा दोषी है। जिन लोगों ने भारत भवन में रहकर सीखा, समझा और कम से कम देश में अपना नाम किया, वे लोग भारत भवन से परे हो गये। अपनी एक नयी दुनिया गढ़ ली। अपने को आबाद कर गये और जहां से सीखा, नाम पाया, उसे अकेला छोड़ गये। भारत भवन एक बिÏल्डग है, बस्ती नहीं। बस्ती होती तो शोर होता। शोर उन लोगों के खिलाफ जिन लोगों ने एक पीढ़ी गढ़ने तक भी इंतजार नहीं किया। बाबा कारंत, स्वामीनाथन के देहांत के बाद भारत भवन की रौनक कम हुई है। यह प्रकृति का नियम है। एक दिन उन्हें हमसे बिछड़ना था तो प्रकृति ने यह नियम भी बनाया है कि परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये कुछ लोग शिक्षित होते हैं और वे उनकी परम्परा को आगे बढ़ाते हैं। भारत भवन इस मामले में दुर्भाग्यशाली रहा। बिलकुल उसी तरह जिस तरह देश के अनेक प्राचीन और ख्यातिनाम संस्कृति और शिक्षा के घर दुर्भाग्यशाली रहे हैं।

प्रकृति का एक और नियम है। यह नियम कहता है कि तू नहीं और सही, इसी की तर्ज पर राज्य नाट्य विद्यालय की स्थापना हो गयी। राज्य नाट्य विद्यालय की मुस्कराहट रंगमंडल की इस उदासी का ही परिणाम मानने में किसी को हिचक नहीं होना चाहिए। जो काम रंगमंडल अपने चमकते दिनों में कर सकता था, उसने नहीं किया और आज वही काम राज्य नाट्य विद्यालय कर रहा है। छत्तीसगढ़ अलग हो जाने के बाद मध्यप्रदेश के अंचलों में राज्य नाट्य विद्यालय के विद्यार्थी नये किस्म के प्रयोग कर रहे हैं। वे सीखने के बाद प्रदर्शन के लिये दिल्ली तक अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शन में पहुंच गये हैं। एक कल्पनाशील संस्कृति अधिकारी के बूते राज्य नाट्य विद्यालय की यह कामयाबी चमत्कारिक नहीं है बल्कि योजनाबद्ध तरीके से अपने उद्देश्य को अंजाम तक पहुंचाना है। इसे रंगमंडल की नाकामयाबी तो मान ही लेना चाहिए।

भारत भवन के इस तीस बरस के सफर में पहले दस साल बहुत खुशनुमा रहे। संस्कृति, साहित्य और कला का संगम को देखना अभूतपूर्व था। बाद के दस वर्ष में यह अहसास थोड़ा कम हुआ और बचे दस वर्षाें में भारत भवन लगभग अनदेखा किया गया। आयोजनों की खनक अब वैसी ऊर्जा उत्पन्न नहीं करती जैसा कि खजुराहो का नृत्य उत्सव आज भी करता है। अब भारत भवन के वर्षगांठ की प्रतीक्षा वैसी नहीं रहती जैसा कि मध्यप्रदेश आदिवासी लोककला परिषद के लोकरंग के आयोजन को लेकर आज भी है। भारत भवन के आंगन में होने वाले राज्य के प्रतिष्ठापूर्ण सम्मान समारोह भी अब बेसमय होने लगे हैं। एक सच यह भी है कि दस बीस बरस पहले भोपाल आने वाले लोगों की उत्कंठा भारत भवन देख लेने की होती थी, वह भी आहिस्ता आहिस्ता मरने लगी है। अब उम्मीद कर सकते हैं कि भारत भवन में एक सुबह होगी जो अपने गौरव को लौटाने के संकल्प के साथ होगी। एक आस फिर जागेगी जो कला और संस्कृति के लिये आम आदमी में भारत भवन की तरफ लौटने को विवश करेगी। बस एक उम्मीद ही है भारत भवन का फिर से भारत भवन बन जाने की।


शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

khari khari

कोलावरी डी अब गाना नहीं, लोरी है

मनोज कुमार

मां और बच्चे के बीच स्नेह का रिश्ता प्रगाढ़ करने वाले गीत को हम बचपन से लोरी के नाम पर सुनते आये हैं। रोता बच्चा, भूखा बच्चा, परदेस गये पिता की याद में बिसूरता बच्चा जब अपनी मां से मीठी लोरी सुनता है तो देखते ही देखते उसकी पलके झपकने लगती है और वह सो जाता है। इस मीठी लोरी गाने वाली मां को अपनी आवाज नहीं मांजनी होती है और ना ही उसे कोई रियाज करना होता है। स्नेह के साथ थपकी देती मां के बोल सो जा राजा, सो जा बिटिया रानी…और बस इसी के साथ बच्चे सपनों की दुनिया में डूबने उतरने लगते हैं अपनी मां की बाहें थामे।

लोरी एक पुरानी विधा है बच्चों को पालने की, उन्हें सीख देने की और इस विधा को फिल्मों में भी खूबसूरती से फिल्माया गया है। लल्ला लल्ला लोरी…दूध की कटोरी…या फिर मेरे घर आयी एक नन्हीं परी…आदि इत्यादि। अनेक ऐसे गीत लोरी बनकर भारतीय दर्शकों का न केवल मनोरंजन करते रहे हैं बल्कि घरों में काम आते रहे हैं। समय बदला, चीजें बदली, सोच बदली और बदल गयी दुनिया। मां भी आधुनिक हो गयी है। आज की मां ने खुद लोरी सुनकर निंदिया रानी की गोद में गयी होगी लेकिन अब वक्त की कमी है।

यह कह देना पूरी तरह से गलत होगा कि लोरी के दिन लद गये बल्कि यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि लोरी अब नये अवतार में है। कोलावरी डी के रूप में। अपने घर आंगन से लेकर ट्रेन के सफर में रोते बच्चे को मां कहती है बेटा चुप हो जा..तुझे कोलावरी डी सुनाती हूं। बच्चा धधकते और धकड़ते संगीत के शोर में लगभग चिल्लाते हुए, बोल भी अनजान और एक मध्यमवर्गीय परिवार के समझ से बाहर कोलावरी डी को सुन कर, शायद डर कर भी कहें तो गलत नहीं होगा…बच्चा आंखें मींच लेता है और आहिस्ता आहिस्ता नींद के आगोश में चला जाता है। इस लोरी को गाने की जरूरत भी नहीं है…मोबाइल चालू कर दीजिये, आइपॉड से भी सुना सकते हैं…

लोरी कोलावरी डी से बच्चा सो जाता है लेकिन भीतर ही भीतर सहम जाता है। कोलावरी डी उसे साहस नहीं देता है, लल्ला लल्ला लोरी…उसे साहस देता था…चंदा और चिड़िया की बातें बच्चों की दुनिया गढ़ती थीं…कोलावरी डी को सुनकर बच्चों के चेहरे पर सोते समय की मीठी मुस्कान नहीं दिखती है…चंदा और चिड़िया के टूटे-फूटे गीतों को सुनकर बच्चे के चेहरे पर एक शांत चमक आ जाती है। मैं अंग्रेजी कम जानता हूं..इस बात का धन्यवाद कर सकता हूं…वह इसलिये कि मुझे कोलावरी डी का हिन्दी अनुवाद नहीं मालूम लेकिन जिन लोगों को कोलावरी डी का हिन्दी अनुवाद मालूम है, उनसे एक आग्रह है, निवेदन है कि वे उसका अर्थ जान लें….यह किसी भी अर्थ में लोरी हो नहीं सकती..होना भी नहीं चाहिए..बच्चों को चांद और चिड़िया, परी और पंख की लोरी ही सुनने दें…उनके मन में विश्वास पलने दें…

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

khari khari

खबर का मजा या मजे की खबर

मनोज कमार

अखबार में खबर पढ़ते हुए लोगों की अक्सर टिप्पणी होती है खबर में मजा नहीं आया, सवाल यह है कि पाठक को मजे की खबर चाहिए या खबर में मजा? हालांकि इन दोनों के बीच एक बारीक सी लकीर होती है। सच तो यह है कि खबर न तो मजे की होती है और न खबर में मजा होता है। खबर सिर्फ खबर होती है लेकिन दुर्भाग्य से पाठक खबर में मजा तलाशने की जद्दोजहद कर रहा है। खबर में मजा की बात करेंगे तो सहसा यह आरोप भी मीडिया के माथे मढ़ दिया जाएगा क उसने ही खबर में मजा देने की शुरूआत की। बात आधी सच है। खबर को तो खबर की शक्ल में पेश किया गया किन्तु खबर में मजा ढूंढ़ लेने वालों की कमी नहीं दिखी और आहिस्ता आहिस्ता इसने एक बीमारी की सूरत अख्तियार कर ली। मीडिया को भी यह मजेदार लगने लगा और अब हर खबर मजा देने वाली बनने लगी खबर की भाषा को भी मजेदार बनाने की कोशिश की गयी। दो-तीन दशक पहल व्यापार पेज की साप्ताहिक समीक्षा में तेल फिसला और सोना चमका, चांद लुढ़की और मिर्च का रंग सुर्ख हुआ, जैसे शीर्षक लगाये जाते थे लेकिन बीत समय में ऐसे शीर्षक गंभीर खबरों में भी लगाये जाने लगे हैं। खबर तो खबर शीर्षक में भी पाठक को मजा आना चाहिए। राजा का बजा बाजा, मन मोहने मे विफल, प्रणव मुखर्जी वित्त मंत्री से दादा और कभी रेलमंत्री रहीं ममता बेनर्जी रेलमंत्री से दीदी बन जाती हैं। शीर्षकों की गंभीरता खबर की तासीर बताती थी लेकिन अब तुकबंदी वाले शीर्षक हर खबर को मजेदार बना देते हैं। जब शीर्षक मजेदार हो तो खबर क्यों न हो। खबरों में मजा अथवा मजे की खबर तलाश करने की प्रवृत्ति समूची पत्रकारिता के लिये खतरनाक है। खबर मनोरंजन नहीं है बल्कि एक सूचना का विस्तार है जिसमें गंभीरता और शालीनत की उम्मीद की जाती है। शालीन और गंभीर खबरें ही पाठकों को वास्तविक स्थिति से अवगत कराते हैं।

पत्रकारिता मजे की चीज नहीं है और न ही मजे के लिये पत्रकारिता की जाती है। पाठकों को अनायास या कहें कि सायस जिसे हम साजिश भी कह सकते हैं, के साथ यह बात दिया गया है कि खबरें पैसे लेकर लिखी जाती हैं। इस बात से भी इंकार नहीं है कि यह दौर पेडन्यूज का है। किन्तु क्या कोई बताएगा कि सोलह पन्ने के अखबार अथवा तकरीबन साठ से अधिक पन्नों की पत्रिका में कितना हिस्सा पेडन्यूज का होता है? पेडन्यूज की चर्चा करते समय हम यह भूल जाते हैं कि पेडन्यूज का भी एक पर्व होता है जिससे हमारा साबका ज्यादतर चुनावी उत्सव के दौरान होता है। बाकि के दिन लगभग सूखे ही गुजरते हैं। मुझे नहीं मालूम है कि किसी नेता को जिताने अथवा एक पन्ने पर पांच नेताओं को एक ही क्षेत्र से जिताने की खबर के पैसे कैसे मिल जाते हैं किन्तु मेरा अनुभव है कि सड़क, शिक्षा, पानी, स्वास्थ्य की खबरों के लिये किसी से एक टका नहीं मिले। अखबार या पत्रिकाओं के पन्नों पर इन्हीं खबरों की बहुलता होती है तो फिर किस आधार पर हम कहें कि पत्रकारिता बिकाऊ हो चली है।

पाठक खबरें इसलिये पढ़ता है कि उसे नवीन सूचनाओं के साथ विस्तार से जानकारी चाहिए। उसे समाचार विश्लेषण चाहिए। वह निष्पक्ष खबर चाहता है और जब वह कहता है कि खबर में मजा नहीं आया तो वह मिर्च-मसाले वाली खबर की उम्मीद नहीं करता बल्कि उसके मजे का अर्थ होता है एक अच्छी खबर। पाठक की इस अच्छी खबर की चाहत को हमने खबर में मजा को मान लिया है और उसी तरह की खबरें परोसने लगे हैं। न केवल खबरें परोसने लगे बल्कि उसके मन में पत्रकारिता को लेकर एक गलत धारणा भी बना दी ताकि वह एक अलग दुनिया में जिये। सही और पक्की खबर में भी उसे खोट नजर आये। खबरों को लेकर पाठकों को यह जताने का समय आ गया है कि उन्हें बतायें कि जिस खबर में उसे मजा नहीं आ रहा है, उस खबर को रचने में, गढ़ने में कितना वक्त लगता है, कितनी मेहनत लगती है। मेहनत की रोटी भले ही सूखी हो मन को तृप्त कर जाती है। तब मेहनतसे तैयार की गयी खबर भले ही मजे की न हो, पाठकों को संतोष दे जाएगी इसलिये जरूरी है कि हम पाठक को सिर्फ और सिर्फ खबर दें, मजा देने के लिये सिनेमा और टेलीविजन का पर्दा है ना।

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

जीवन मंत्र-१
हदों से परे होता समाज

मनोज कुमार

मेरे एक बुर्जुग मार्गदर्शक मित्र हैं। वे भोपाल की तेजी से बढ़ रही एक कॉलोनी में रहते हैं। उन्होंने मुझसे शिकायत की कि उनके घर के आसपास एक प्रभावशाली व्यक्ति ने अपने घर का दायरा सड़क तक बढ़ा लिया है। उनका यह बढ़ा हुआ दायरा वैधानिक है या अवैधानिक, किसी को नहीं मालूम। बात आयी और गयी। मेरे मन के भीतर यह बात सालती रही। हालांकि इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि बढ़ा हुआ दायरा वैधानिक है या वैधानिक किन्तु इस बात से फर्क जरूर पड़ता है कि इस सीमा को लांघने से एक व्यवस्था छिन्न-भिन्न होती है। सीमा यानि अपनी हद लांघने से हमारे जीवन में विविध किस्म की समस्याओं का जन्म होता है। अपनी हद में नहीं रहने वाले लोग ही समाज के लिये समस्या हैं। हद लांघने की बात को जरा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे तो पूरी तस्वीर सामने आ जाएगी।

एक पिता अपने बेटे से इसलिये परेशा है कि वह उनकी अवज्ञा कर रहा है अर्थात हद लांघ रहा है। एक शिक्षक की तकलीफ यही है कि विद्यार्थी उदंड होते जा रहे हैं और गुरूजनों की अवज्ञा कर रहे हैं। यहां भी मामला हद लांघने की है। एक सास अपनी बहू की अवज्ञा से परेशान है। एक अधिकारी अपने कर्मचारी से, एक मंत्री अपने मातहतों से और भी भिन्न भिन्न लोग इस अवज्ञा वाली स्थिति से परेशान हैं। लगभग पूरे समाज में अराजकता की स्थिति बन चली है। सवाल यह है कि यह हद लांघने का साहस कैसे हो रहा है? इस पर चिंतन करने की जरूरत है। मामला बहुत पेचीदा नहीं है लेकिन हम समझना ही नहीं चाहते हैं। अवज्ञा करने की कोई नहीं सोचता है और न ही करना चाहता है किन्तु भौतिक सुख-सुविधाओं ने इसे विस्तार दे दिया है। इसे थोड़ा और विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।

लगभग कई दिनों से मैं भौतिक सुख-सुविधाओं के बारे में चिंतन-मनन कर रहा हूं। सवाल अनेक हैं लेकिन जवाब कोई भी नहीं। एक बड़ी चमचमाती कार पूरे रफ्तार के साथ मेरे बगल से गुजर गयी। सड़कों पर लगभग हर रोज एक नयी कार दौड़ती नजर आएगी। इन कारों को देखकर सहसा मेरे मन में प्रश्न उठा कि कार के स्वामी का जीवन लक्ष्यविहिन होगा। लक्ष्य है भी तो अधिकाधिक सुख की प्राप्ति। यह सुख भी शाश्वत नहीं है, क्षणिक है। कार के स्वामी ने पहले तो अपना सारा श्रम और मस्तिष्क कार की रकम चुकाने में लगायी होगी। कदाचित बैंक लोन से भी खरीद लिया होगा तो अब उसे बैंक का किश्त जमा करने के लिये रोज अधिक मेहनत बल्कि अधिक चालबाजी करनी पड़ती होगी। यह भी सच है कि जिस व्यक्ति के पास ऐसी कार है, उसके आय के स्रोत से उसका परिवार वाकिफ होगा और वह यह भी जानता है कि इतनी महंगी कार उस आय के स्रोत से नहीं खरीदी जा सकती है। बात साफ है कि कार के सुख के पीछे मेहनत कम, मक्कारी ज्यादा है जिसे आज के समय में हम भ्रष्टाचार का नाम दे सकते हैं।

जब परिजन को यह पता है कि उनका घर भ्रष्टाचार से चल रहा है तो अवज्ञा की स्थिति सहज ही बन जाती है। पहले तो अनावश्यक डिमांड की जाती है। चिकचिक से बचने अथवा अपना प्रभाव दिखाने के लिये उन अनावश्यक जरूरतों को पूरा किया जाता है। यदाकदा की मांग बाद के समय में आदत में बदल जाती है और जब आदत बिगड़ जाए तो सिर्फ अवज्ञा की स्थिति बनती है। यह बात पूरे समाज में, हर वर्ग में और हर क्षेत्र में लागू होती है। हद के बाहर होने के कारण ही समाज में अनैतिकता, अनाचार और अव्यवस्था का जन्म हो रहा है। जिस दिन हम अपनी हदों में रहना सीख जाएंगे, उस दिन समस्यायें स्वयमेव समाप्त हो जाएगी। कल्पना कीजिये कि समुद्र अपना स्थान छोड़कर रहवासी इलाकों में चला आता है तो कैसी तबाही मचती है। समुद्र समाज में शुचिता बनी रहे, लोगों में भय न हो इसलिये वह अपनी हद में रहता है। हद से बाहर होते समाज में आप व्यवस्था, शुचिता, सौजन्यता या सम्मान की बात नहीं कर सकते हैं। हद से बाहर होने का एक अर्थ लालसा भी है और यह लालसा अवज्ञा का पर्याय है। अब आपको यह तय करना है कि हम सब हद में रहें, इसके लिये अपने लालच पर नियंत्रण पाने की कोशिश करना होगी।



शनिवार, 7 जनवरी 2012

समागम

समागम के ११ वर्ष
भोपाल से प्रकाशित मीडिया एवं सिनेमा की द्विभाषी मासिक शोध पत्रिका समागम ने अपने प्रकाशन के ११ वर्ष पूर्ण कर लिया है। एक छोटी सी कोशिश के साथ शुरू हुई इस पत्रिका को मीडिया ने गंभीरता से लिया और हरसंभव मदद की। गंभीर पत्रकारिता में समागम ने अपनी जगह बनाने में कामयाबी हासिल की है।
फरवरी-२०१२ में समागम का नया सफर नये साल के साथ आरंभ होगा। परम्परा ऐसे मौकों पर उत्सव मनाने की होती है किन्तु समागम किसी मंचीय उत्सव के पक्ष में नहीं है। जितना धन इन समारोह में होगा, उतने में पत्रिका के पन्नों में बढ़ोत्तरी कर कंटेंट को और सम्पन्न बनाया जा सकेगा। इस इरादे के साथ समागम के बारहवें वर्ष का पहला अंक सिनेमा के सौ साल पर केन्द्रित होगा।
       उल्लेखनीय है कि फरवरी का बासंती महीने में सिनेमा अपनी उम्र के सौ बरस पूरे कर रही है और संयोग से समागम का भी एक नया पड़ाव शुरू होगा। इस संयोग को यादगार बनाने की दृष्टि से समागम का नया अंक सिनेमा के सौ साल पर होगा। करीब सौ पन्नों के इस अंक में सिनेमा का इतिहास, क्षेत्रीय सिनेमा एवं सिनेमा से जुड़े शोधपत्रों का प्रकाशन किया जा रहा है। सम्पादक मनोज कुमार ने इस अंक के लिये सिनेमा में रूचि रखने वालों से लिखने का आग्रह किया है।
       अपने ग्यारह वर्षाें के सफर में समागम को मीडिया ने गंभीरता से लिया है। देश की बहुप्रतिष्ठित समाचार पत्रिका इंडिया टुडे ने १६ नवम्बर ११ के अंक में लिखा है - लगातार दस वर्षाें से मीडिया एवं सिनेमा पर द्विभाषी मासिक पत्रिका का बिन रूके प्रकाशित करना और वह भी हर अंक में विशेषज्ञों के पठनीय आलेखों के साथ प्रकाशित करना कोई हंसी-खेल नहीं है लेकिन मनोज कुमार ने अपने सुलझे हुए सम्पादन में यह कर दिखाया है। कुछ इसी भाव के साथ साहित्यकार महीपसिंह की पत्रिका संचेतना एवं मप्र शासन की मासिक पत्रिका पंचायिका में भी समागम का उल्लेख किया गया है। भोपाल से प्रकाशित रंग-संवाद पत्रिका ने लिखा है कि समागम के जरिये मौजूदा दौर के अनेक ज्वलंत मुद्दों पर मीडिया की दृष्टि और उससे जुड़े शोध को एक जरूरी मंच प्रदान किया है।
       समागम का जनवरी अंक मीडिया और जनआंदोलन पर केन्द्रित है। यह अंक विशेष रूप से महात्मा गांधी को समर्पित है। ३० जनवरी उनकी पुण्यतिथि है और समागम मीडिया और जनआंदोलन के बहाने बापू को अपनी श्रद्वांजलि समर्पित कर रहा है। समागम के इसके पूर्व अनेक विशेष अंकों का प्रकाशन किया है जिसमें महात्मा गांधी की पत्रकारिता, आदिवासी पत्रकारिता, महिला, पर्यावरण, दलित, लता मंगेश्कर, मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता आदि पर है।

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

Rajniti

राजनीति का नाटक या नाटक की राजनीति

मनोज कुमार

हर राजनेता के मन में एक ऊंचे पद पाने की हसरत रहती है। प्रदेश का नेता है तो मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब बुनता है और देश का नेता है तो सहज स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर उसकी नजर होती है। ख्वाब बुनने में कोई बुराई नहीं है लेकिन जब जब राजनेताओं से यह सवाल किया जाता है अधिकांश नेता मुकर जाते हैं और वर्तमान मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री को ही अपना नेता बताते थकते नहीं हैं।

आज ही एक न्यूजचैनल पर छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल से प्रेस ने पूछ लिया कि क्या वे राज्य के भावी मुख्यमंत्री हैं, सवाल को दरकिनार कर गये और कांग्रेस पर भावी शब्द गढ़ने का आरोप लगा दिया लेकिन वे चेहरे की चमक को छिपा नहीं पाये। यह सच है कि भावी भविष्य के गर्त का सवाल है और अमर अग्रवाल को जरूर पता होगा कि आडवाणीजी भावी से वर्तमान नहीं बन पाये। कांग्रेस में भी कई भावी प्रधानमंत्री हुए लेकिन वे वर्तमान नहीं बन पाये। शायद इसलिये भी उन्हें यह भावी शब्द डराता होगा। पुराने अनुभवों से सीख लेना भी कोई कम बात नहीं होती है।

शब्दों से खेलना भले ही राजनेताओं का शगल न हो लेकिन वे खेलते जरूर हैं। सुबह सुबह पत्रकार दीपक चौरसिया ने उप्र चुनाव मैदान में डटे डीपी यादव से एक कसम की बात कर ली कि वे अब किसी पार्टी की तरफ मुंह नहीं करेंगे। दीपक के सवाल का जवाब तो नहीं दिया और उल्टे उनसे कसम लेने लगे कि वे आज जिस न्यूज चैनल में हैं, वे उसी में बने रहेंगे। राजनेताओं को बात समेटना भी आता है। इसी किस्से को विस्तार देने के बजाय डीपी यादव ने पांव पीछे खींचे और कह दिया कि समय सब कुछ तय करता है।

शब्दों के इस जाल से राजनीति का नाटक शुरू होता है और नाटक में राजनीति होती है, यह बात कई बार साबित हो चुका है। लालू यादव की बतियाना मीडिया को भी उतना ही भाता है जितना कि आम आदमी को। अर्जुनसिंह मीडिया फ्रेंडली रहे हैं लेकिन हमेशा संयत, सर्तक और गंभीर। इन दिनों दिग्विजयसिंह अपनी बातों से लोगों को मोह रहे हैं। आखिर में कहना होगा, बातें हैं बातों का क्या कहना।

रविवार, 1 जनवरी 2012

media

किसने कह दिया कि समाज का विष्वास नहीं रहा मीडिया पर!

-मनोज कुमार

अरूण षौरी पत्रकार हैं या राजनेता, अब इसकी पहचान कर पाना बेहद कठिन सा होता जा रहा है। वे पत्रकार की जुबान बोल रहे हैं या राजनेता की, यह कह पाना भी संभव नहीं है। पिछले दिनों भोपाल में एक मीडिया सेमीनार में उन्होंने जो कुछ कहा, उसमें एक पत्रकार तो कहीं था ही, नहीं बल्कि एक राजनेता की भड़ास दिख रही थी। पता नहीं उन्हें क्या हो गया था, वे भी औरों की तरह मीडिया को कटघरे में खड़ा कर गये। वे अपनी रौ में कह गये कि मीडिया पर समाज विष्वास नहीं करता है। अरूण षौरी को कौन बताये कि जिस मीडिया पर आप सवाल उठा रहे हैं, वह मीडिया भी आपसे ही षुरू होता है। अरूण षौरी षायद यह भूल रहे हैं कि वे उसी समाज का हिस्सा हैं जहां उनकी बोफोर्स रिपोर्ट की गूंज दो दषक से ज्यादा समय से हो रही है। वे एक राजनेता के रूप में मीडिया की विष्वसनीयता पर सवाल उठा सकते हैं किन्तु एक पत्रकार के रूप् में उन्हें यह कहना षोभा नहीं देता है। मीडिया को अविष्वसनीय कहने का मतलब है स्वयं को अविष्वनीय बताना और हमारा मानना है कि अरूण षौरी अविष्वनीय नहीं हो सकते। पत्रकार अरूण षौरी कतई अविष्वसनीय नहीं हो सकते हैं, राजनेता अरूण षौरी के बारे में कुछ कहना अनुचित होगा।

अरूण षौरी जिस कद के पत्रकार हैं, उन्हें बहाव का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। उन्हें ऐसा कुछ नहीं बोलना चाहिए जिससे अपनों को ठेस लगे लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने ऐसा ही सब कहा। वे जिस केन्द्र के आयोजन में बोल रहे थे, जो इस समय अनेक कारणों से चर्चा में है। इस मंच से ऐसे ही अमृत वचन की अपेक्षा थी, सो वे उनके मानस को षांत कर गये। लगभग एक दषक से मीडिया घोर आलोचना के केन्द्र में है। कुछ अपने कर्मों से तो कुछ दूसरों के रहम पर। मीडिया पर, पत्रकारों पर सवाल उठाने के बजाय उन मीडिया घरानों पर क्यों पत्थर नहीं उछाले जाते जो लोग अपने कारोबार को बचाने के लिये मीडिया को कारोबार बना दिया है। जिन लोगों का पत्रकारिता का क,ख,ग नहीं आता, वे लोग मीडिया हाउस बनाते हैं तो अरूण षौरी उन लोगों का विरोध क्यों नहीं करते। पुरानों की बात छोड़ दें, नयी पीढ़ी को अरूण षौरी पत्रकारिता की षुचिता का पाठ क्यों नहीं पढ़ाते। अरूण षौरी अब महज एक पत्रकार नहीं हैं बल्कि अनुभव की एक पाठषाला हैं और पाठषाला ही जब सार्वजनिक मंच से अपनी ही आलोचना करेगा तो समाज का विष्वास उठना आवष्यक है।

यह कम दुर्भाग्य की बात नहीं है कि अकेला पत्रकारिता एक ऐसा प्रोफेषन है जहां उनके गुरू सार्वजनिक रूप से स्वयं की आलोचना करते हैं। इसे भी सकरात्मक नजर से देखना चाहिए लेकिन बात केवल आलोचना तक ही रह जाती है। सुधार की कोई कोषिष किसी भी स्तर पर नहीं हो रही है, यह इससे भी बड़ा दुर्भाग्यजनक बात कहीं जानी चाहिए। मीडिया एवं मीडिया षिक्षण में आ रहे लोगों के पास प्रषिक्षण की कमी है। जिस तरह मीडिया में काम करने वालों को इस बात की समझ पैदा नहीं की जा रही है कि उनकी समाज के प्रति किस गंभीर किस्म की जवाबदारी है, उसी तरह मीडिया षिक्षकों के पास भी प्रषिक्षण की कमी है। मीडिया षिक्षकों के लिये अरूण षौरी सरीखे पत्रकार षिक्षण के काम आ सकते हैं। सेमिनारों की संख्या में बढ़ोत्तरी करने के बजाय षिक्षण-प्रषिक्षण में समय और साध्य लगाना उचित होगा। अच्छा होता कि मंच से मीडिया की आलोचना करने के बजाय वे इसकी सुधार की बात करते। स्वयं कोई पहल करने का संदेष दे जाते।

हम उम्मीद और केवल उम्मीद कर सकते हैं कि अरूण षौरी एवं उनके समकालीन पत्रकार पत्रकारिता की नवीन पीढ़ी को यह पाठ बार बार नहीं पढ़ाएगी कि मीडिया पर समाज का विष्वास उठ गया है बल्कि वह यह बताने की कोषिष करेगी कि समय के साथ मीडिया का विस्तार हुआ है और यह विस्तार दिषाहीन है। विस्तार को दिषा देने की जरूरत है। मंच पर खड़े होकर विलाप करने से मीडिया का भला नहीं होने वाला है और न ही समाज का। मेरा अपना मानना तो है कि समाज का विष्वास मीडिया पर और बढ़ा है और कदाचित इसी विष्वास के कारण मीडिया की छोटी सी छोटी भूल को भी समाज चिन्हित करता है ताकि मीडिया सजग और सबल बने। इस बात को सभी को समझना होगा। स्वयं अरूण षौरी जी को भी। और उन लोगों को भी जिन्हें मंच और माईक मिलते ही मीडिया की आलोचना करने पर टूट पड़ते हैं। मैं उन सब लोगों से आग्रह करूंगा कि वे लोगों के बीच जाएं और बतायें कि एक सिंगल कॉलम की खबर लिखने में एक पत्रकार को कितनी मेहनत करनी होती है। एक पत्रकार सुविधाभोगी नहीं है और नहीं हो सकता है यदि वह ताउम्र मीडिया में है तो। इस बहाने राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोषी को याद कर लीजिये। और पहले जाएं तो पराड़करजी का भी स्मरण करना उचित होगा। मायाराम सुरजन भी इसी कड़ी में एक नाम हैं। नीरा राडिया प्रकरण में उछलने वाले नाम पर आरोप तो दागे गये लेकिन वे आज किसी न किसी माध्यम में बैठे हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि समाज ने उन्हें अस्वीकार नहीं किया है। ऐसे में समाज का मीडिया पर से विष्वास उठ जाने की बात निराधार है। अरूण षौरीजी एक राजनेता के रूप् में मीडिया अविष्वसीनयता की बात करते हैं तो ठीक है लेकिन पत्रकार अरूण षौरी ऐसा कहते हैं तो उन्हें एक बार फिर सोचना होगा कि सच क्या है।



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