शनिवार, 12 मई 2012

एक दिन की मां !


-मनोज कुमार
बहुत सालों से और बहुत बार मां की एक कहानी सुनता आ रहा हूं। मां और उसका एक बेटा था। गरीब और विपन्न। पिता का साया उठ गया था। बेटे की चिंता करती मां को रात रात भर नींद नहीं आती थी। खुद भूखे रहकर बेटे को खाना खिलाती। दिन गुजरते गये। बेटा निकम्मा और आवारा हो गया था। मां को चिंता लगी रहती कि उसके मर जाने के बाद क्या होगा। दिन मां अपने निकम्मे और नाकारा बेटे को दुनियादारी समझाने बैठी तो बेटे को गुस्सा आ गया। गुस्से में फरसे से मां की गर्दन उड़ा दी। कटी गर्दन से आवाज आयी, बेटे तुम्हें चोट तो नहीं लगी? मां की यह सूरत हम भारत के हर गांव और घर में पाते हैं। इस दुलारी मां को बाजार ने प्रोडक्ट बना दिया है मदर्स डे के रूप में। जो मां अपनी कोख में नौ महीने हमें रखे और अंगुली पकड़कर दुनियादारी के लायक बनाये, उस मां के लिये हमारे पास बस एक दिन! सुन कर और सोचकर मन जख्मी हो जाता है। इस निगोड़े बाजार ने न केवल मां के लिये एक दिन तय किया है बल्कि हर रिश्तों के लिये उसके पास एक एक दिन है। बाजार चाहता है कि साल के तीन सौ पैंसठ दिन, दिन न रहकर उत्सव बन जाएं। इन उत्सवी दिनों के बहाने बाजार चल पड़े। करोड़ों का सौदा-सुलह हो। जिसे उपहार मिले उसका मन खिल जाए और जिसे न मिले वह कलह मचा डाले। देने वाले को गरूर हो कि वह कितना महंगा तोहाफा दे सकता है और पाने वाला निहाल कि उसे कितना प्यार किया जाता है। जो उपहार न खरीद पाये, वह खुद को निकम्मा समझे और जिसे तोहफा न मिले, वह अपने आपको दुर्भाग्यशाली। 
सच तो यह है कि उपहार पाने वाला, देने वाला, नहीं पाने वाला और न दे सकने की औकात रखने वाले का रहबर है तो बाजार। बाजार कहता है कि साल के तीन सौ चौंसठ दिन मरती मां को दवा न दो, तीर्थ पर न ले जाओ, उसके पास बैठकर उसकी गोदी में सिर रखकर आराम करने का तुम वक्त न निकाल सको लेकिन मंहगा उपहार देकर यह जरूर जताओ कि बेटा कितना बड़ा सौदागर बन गया है। यही हाल बाकि दिनों के लिये करो। बाजार ने लोगों को ऐसा मोह लिया है कि अब रिश्ता, रिश्ता न होकर वस्तु हो गया है। विनिमय बन गया है। कमाऊ पत्नी अधिक पाने की लालसा में पति को महंगे उपहार देती है तो गृहिणी अपने को प्रूफ करती दिखती है कि उसके उपहार में कितनी चिंता छिपी हुई है। भाई, बहन, मां-बाप अब रिश्ते नहीं, वस्तु हैं और वस्तुओं का विनिमय करना बाजार ने बेहतर ढंग से सिखा दिया है।
बाजार की जकड़ इतनी मजबूत है कि आप छूट नहीं सकते। जहां तक मुझे याद है मेरी मां जीते जी श्राद्ध पक्ष में पंचाग में तिथि देखा करती थी। मेरे पूछने पर बताती थी कि जो हमारा साथ छोड़ गये हैं, उसके लिये श्राद्ध पक्ष में एक एक दिन तय होता है। इस दिन उनके पसंद का खाना बनता है और मंदिरों में दान करने के साथ पक्षियों को भी खिलाया जाता है। विश्वास यह रहता है कि यह खाना मृतात्मा तक पहुंचता है। आज मां नहीं है, भाभी यह रस्म निभा रही है। कल भी मुझे पता नहीं था कि जो खाना मृतक की पसंद के अनुरूप बनता है, वह उसे मिलता है कि नहीं, आज भी मुझे यकिन नहीं है। इतना जरूर है कि यह एक दिन अपनों को याद करने का होता है। बाजार भी कहता है कि अपनों को एक दिन याद करो। दोनों के याद करने में एक फर्क है तो यह कि बाजार कहता है कि जिंदा व्यक्ति को बरस के हर दिन नहीं, एक दिन याद करो और भूल जाओ और हमारी परम्परा कहती है साल में एक दिन याद करो लेकिन दिल से करो। रिश्तों को समझो और उसका मान करना जानो। बाजार कहता है डे के आगे डेथ है और इसके बाद है भूल जाने की परम्परा किन्तु दिवस की परम्परा हमसे कहती है दिवस का अर्थ है रिश्तों को कभी न भूलने की परम्परा। 

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

शिकायत नहीं, शाबासी दें


-मनोज कुमार
आमतौर पर हर पीढ़ी अपनी बाद वाली पीढ़ी से लगभग नाखुश रहती है। उसे लगता है कि उन्होंने जो किया वह श्रेष्ठ है। बाद की पीढ़ी का भविष्य न केवल चौपट है बल्कि इस पीढ़ी ने अपने से बड़ों का सम्मान करना भी भूल गयी है। यह शिकायत और चिंता लगभग बेमानी सी है। कल गुजर चुकी पीढ़ी के बारे में कुछ कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि उनके साथ जीवन का अनुभव जुड़ा हुआ है किन्तु आज की युवा पीढ़ी के बारे में मैं कम से कम यह कह सकता हूं कि उनके बारे में की जा रही चिंता और शिकायत दोनों गैरवाजिब हैं। इस बात का अहसास मुझे किसी क्लास रूम में पढ़ाते वक्त नहीं हुआ और न किसी सेमीनार में बोलते समय। इस बात का अहसास मुझे भोपाल की सड़कों पर चलने वाली खूबसूरत बसों में सफर करते समय हुआ। दूसरे मुसाफिर की तरह मैं बस में चढ़ा। भीड़ बेकाबू थी। बैठने की कल्पना तो दूर, खड़े होने के लिये भी जगह पाना मुहाल हो रहा था। सोचा कि थोड़ी देर में मंजिल तक पहुंच जाएंगे। इतने में एक नौजवान खड़ा होकर पूरी विनम्रता के साथ अपनी सीट पर मुझे बैठने का आमंत्रण देने लगा। मेरे ना कहने के बाद भी वह मुझे अपनी जगह पर बिठाकर ही माना। सोचा कि उसे आसपास उतरना होगा लेकिन उसकी मंजिल बहुत दूर थी। यह मेरा पहला अनुभव था किन्तु आखिरी नहीं। थोड़े दिनों बाद एक बार फिर ऐसा ही वाकया मेरे साथ हुआ। 

मैं हैरान था कि जिस युवा पीढ़ी से हमारी पीढ़ी शिकायत और चिंता से परे देख नहीं पा रही थी, वह युवा पीढ़ी कितनी विनम्र है। न केवल उसे सम्मान देना आता है बल्कि वह स्वयं तकलीफ झेलकर भी सम्मान देनेके भाव से भरा हुआ है। इस वाकये ने मुझे कई तरह से सोचने के लिये विवश कर दिया। मुझे लगने लगा कि मेरी पीढ़ी की शिकायत वाजिब नहीं है। यह ठीक है कि युवाओं का कुछ प्रतिशत उदंड है और अनुशासनहीन। ऐसे मुठ्ठी भर युवाओं के लिये समूचे युवावर्ग को शिकायतों के कटघरे में खड़ा करना उचित तो कतई नहीं है। मैं जो अनुभव आप से साझा कर रहा हूं, उसके पीछे मंशा यही है कि युवाओं की विन्रमता, सहजता और उनके भीतर के आदरभाव को समाज के समक्ष रखा जाए। जो युवा दिग्भ्रिमित हैं, शायद उनसे कुछ सीख लें और इससे भी आगे यह कि हम केवल शिकायतों का पिटारा नहीं खोलें बल्कि उनकी पीठ थपथपाकर उनका हौसला भी बढ़ायें। ऐसा करके हम सकरात्मक माहौल बना सकेंगे ताकि युवाओं में बदलाव देख सकें। सकरात्मक बदलाव।

हमारी पीढ़ी अपनी बाद की पीढ़ी के लिये चिंतित भी है। मुझे ऐसा लगता है कि यह चिंता भी फिजूल की है। मुझे याद है अस्सी के दशक में बोर्ड एग्जाम पास करने के बाद कॉलेज में दाखिला लेते हुए मेरे पास वाणिज्य या कला संकाय में जाने का विकल्प था। ऐसा नहीं है उन दिनों मेडिकल या इंजीनियरिंग की पढ़ाई नहीं होती थी। पढ़ाई तो इन दोनों की भी होती थी किन्तु मैं और मुझ जैसे मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों की प्रतिभा इतनी नहीं थी कि हम मेडिकल या इंजीनियरिंग की परीक्षा पास कर सकें। कोई संकोच नहीं शिक्षा के स्तर पर हम लगभग औसत ही थे। आज समय बदल गया है। वाणिज्य या कला की पढ़ाई अब कोई नहीं करता है। हर नौजवान इंजीनियर या डाक्टर बनने की प्रतिभा रखता है। हम अपने समय में साठ प्रतिशत पा लेने पर गर्व करते थे, आज का युवा ९८ प्रतिशत पा जाने के बाद भी संतुष्ट नहीं है। हमारी पीढ़ी अपनी नाकामयाबी को छिपाने के लिये रास्ता ढूंढ़ सकती है कि उन दिनों हमारे पास विकल्प नहीं था, आज तो अनेक किस्म के ऑप्शन हैं। बात कुछ हद तक ठीक हो सकती है, पूरी तरह से ठीक नहीं। हमारी पीढ़ी अपनी पूर्व की पीढ़ी से होशियार थी। वे स्कूली शिक्षा के बाद रूक जाते थे और हम ग्रेज्युेट होते थे और आज की पीढ़ी हमसे कहीं आगे है। जो बेअदबी की शिकायत है, वह कहीं न कहीं युवा पीढ़ी से नहीं है बल्कि स्वयं से है क्योंकि बदलते समय के साथ हम स्वयं को बदलने में पिछड़ गये हैं। लब्बोलुआब यह कि हर पीढ़ी अपनी पुरानी पीढ़ी से ज्यादा योग्य हुई है। शिक्षा में भी और सभ्यता में। उनके पास दृष्टि है और आत्मविश्वास भी। जरूरत है युवा वर्ग हौसला देने की। 

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

अपने अपने आग्रह और सत्याग्रह



मनोज कुमार

इसे गुदगुदाने वाला अनुभव ही कहा जा सकता है। महात्मा गांधी अचानक से अपने विरोधियों के लिये भी आदर्श बन गये हैं। हर कोई स्वयं को महात्मा का अनुगामी बता रहा है। गांधीजी को लेकर विलाप का दौर जारी है। उनके स्मृति चिन्हों की नीलामी को लेकर चिंता तो खूब जतायी जा रही है किन्तु विश्व के अनेक हिस्सों में सुरक्षित महात्मा गांधी के स्मृति चिन्हों को सहेजने की चिंता किसी ने नहीं की। जिन लोगों को गांधीजी के आग्रह और सत्याग्रह पर कभी यकिन नहीं था, वे सभी आग्रही और सत्याग्रही बन पड़े हैं। राजनीति से परे रहने वाले गांधीजी के नाम पर यह राजनीति एक अलग किस्म की है। सात्विक दिखकर, अहिंसा के मार्ग पर चलकर सत्ता तक पहुंचने का यह अभिनव अभिनय की एक मिसाल पेश की जा रही है। समाजसेवियों से लेकर राजनेताओं तक को अब गांधीजी का सहारा चाहिए। यह सुखद भी है कि आजादी के छह दशक से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद जब हम गांधीजी की जरूरत महसूस करते हैं तो लगता है कि गांधीजी सर्वकालिक रहे हैं और रहेंगे लेकिन उनके सामयिक हो जाने का अर्थ अलग अलग है।

मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस. फिल्म में गांधीजी को जिस रूप में दिखाया गया और नकलची छात्रों को उस रूप में देखना दुर्भाग्यजनक है। बिलकुल वैसा ही कि राजनीतिज्ञ अपनी मांगों को मनवाने के लिये राजनीति का सहारा लेने के बजाय गांधीजी के आग्रह और सत्याग्रह को लाठी बनाकर उसका सहारा ले रहे हैं। गांधीजी का आग्रह और सत्याग्रह कभी स्वार्थसिद्धि के लिये नहीं रहा। अंग्रेजों को अपने आग्रह और सत्याग्रह से झुकाने वाले गांधीजी ने जो कुछ उपक्रम किया, वह भारतवासियों के लिये किया। आज के ये नकली गांधी अनुगामी नेता जो कुछ कर रहे हैं, वे सिर्फ और सिर्फ अपने लिये। सत्ता में बने रहें या सत्ता की राह सुगम हो सके, इसके लिये वे गांधी का स्मरण कर रहे हैं। उनके आग्रह और सत्याग्रह के मार्ग पर चलने का स्वांग रच रहे हैं। गांधीजी के इन अनुगामियों को कभी इस बात का इल्म नहीं हुआ कि वे हिंसा के खिलाफ कोई गांधीवादी सोच को जमीं पर उतारें। हिंसा को हिंसा के रास्ते निपटाने की कोशिश हो रही है और जब इस कोशिश के बारे में बात की जाती है तो लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है। लॉ एंड ऑर्डर की बात कही जाती है। व्यवस्था में गांधीवादी विचार एकदम से विलुप्त हो जाता है। यह दुर्भाग्यजनक है। 

सौ बरस पहले लिखा गया हिन्द स्वराज इस दौर का सबसे पठनीय किताब बन चुकी है। हिन्द स्वराज जिन लोगों ने पढ़ी है, उन्हें मालूम है कि यह किताब क्या संदेश देती है। हिन्द स्वराज का मैं पॉकेट संस्करण को पढ़ रहा था। इस किताब में पाठक और सम्पादक के बीच संवाद है। मेरी जिज्ञासा इस बात को लेकर थी कि ये पाठक कौन है और सम्पादक कौन? गांधीजी की इसमें क्या भूमिका है। हिन्द स्वराज का गीत गाने वाले लगभग एक दर्जन सुधिजनों से इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश किन्तु अधिकांश टाल गये अथवा आधा-अधूरा जवाब देकर खुद को बरी कर लिया। इन्हीं में से एक ने जरूर मुझे मुकम्मल जवाब दिया। तब मुझे पता चला कि गांधीजी ने स्वयं को पाठक बनकर सवाल किया और स्वयं सम्पादक बन का पाठक की जिज्ञासा को शांत करते रहे। गांधीजी अनेक किस्म के सवाल स्वयं से करते थे और जवाब भी तलाशते थे। उनके मन में कहीं यह था कि आम पाठकों के मन में भी इस तरह के सवाल आते होंगे। जब वे जहाज में लम्बी यात्रा पर होते थे तो ऐसे सवाल स्वयं गढ़ते और जवाब देने की कोशिश करते। उनकी यही कोशिश बाद में हिन्द स्वराज के नाम से आयी। इस तरह मुझे हिन्द स्वराज के बारे में जानकारी मिली। जो लोग हिन्द स्वराज को केन्द्र में रखकर चर्चा-परिचर्चा कर रहे हैं, उन्हें हिन्द स्वराज की रचना की पृष्ठभूमि से पाठकों को अवगत कराना चाहिए ताकि आयोजकों का प्रयास प्रभावी हो सके।

गांधीजी के आग्रह-सत्याग्रह से लेकर हिन्द स्वराज की चर्चा और परिचर्चा में गांधीजी होकर भी नहीं हैं। वे संकेत मात्र हैं। उनकी जनस्वीकार्यता है अत: सत्ता के करीब पहुंचने का माध्यम बनाकर गांधीजी का स्मरण करने की कोशिशें जारी हैं। जिस देश में एम.जी रोड लिखा जाता हो, जहां महात्मा गांधी मार्ग बोलने में संकोच और शर्म हो, जिस देश में महात्मा गांधी २ अक्टूबर और ३० जनवरी तक सीमित रह गये हों, उस देश में सत्ता मार्ग के लिये एमजी रोड सुविधाजनक होता है। आग्रह, सत्याग्रह, चर्चा और परिचर्चा सिर्फ विलाप करने का जरिया है। दुख को तो इस बात का भी होता है कि एक और गांधी जैसे विशेषण से उन लोगों को महिमामंडित किया जाता है जिनकी निगाहें जनकल्याण के लिये नहीं बल्कि स्व-कल्याण के लिये लगी होती हैं। सच में महात्मा के प्रति इतना ही आग्रह है तो हिंसा को अहिंसा में बदलने की कोशिश हो, राजस्व बढ़ाने के लिये शराब की दुकानें खोलने की सहमति असहमति में बदल जाये तभी कुछ उम्मीद बंधेगी।  

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

Bal Vivah

मिसाल बन गया गांव बड़ी जाम
-मनोज कुमार
मध्यप्रदेश का व्यवसायिक जिला है इंदौर। इंदौर जिले का एक छोटा सा गांव है बड़ी जाम। लगभग गुमनाम सा गांव बड़ी जाम ने आदर्श कायम किया है जिसकी गूंज इंदौर से भोपाल तक और शायद कल पूरे देश में होगी। इस गांव में बाल विवाह का आयोजन था। पुलिस को इत्तला मिली और वह कार्यवाही करने पहुंच गयी। पहले तो थोड़ा बहुत हील-हुज्जत हुई और इसके बाद जो हुआ तो गांव बड़ी जाम समाज के लिये मिसाल बन गया। इस गांव के लोगों ने एक बाल विवाह नहीं रोका बल्कि संकल्प लिया कि अब गांव में कोई बालविवाह नहीं होगा। बड़ी जाम इंदौर जिले के महू तहसील के पास बसा एक छोटा सा गांव है। यह वही महू है जिसे डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जन्मस्थली के रूप में याद किया जाता है। लगभग एक सप्ताह के भीतर अक्षय तृतीया है। भारतीय सांस्कृतिक परम्परा का एक महत्वपूर्ण दिन। इस दिन को कुछ रूढ़िवादी मानसिकता के लोगों ने नाबालिग बच्चों का ब्याह करने की परम्परा डाल दी है जिससे यह महत्वपूर्ण दिन बच्चों के लिये डरावना दिन सा हो गया है। जिन दुधमुंहे बच्चों की शादी रचायी जाती है, उन्हें तो इसका मतलब भी मालूम नहीं होता है। आज के इस वैश्विक समाज में न तो बाल विवाह कोई अर्थ रखता है और कन्यादान जैसी योजनाएं।
इस दिन देश के कोने-कोने में कथित सामाजिक रस्म के नाम पर हजारों बच्चों को विवाह के बंधन में बांधने की कोशिश होगी। समाज के ठेकेदार इसे पुण्य मानकर पूरा करने की कोशिश करेंगे और सरकार कानून के डंडे के बल पर रोकने की। कुछ जगह समाज के ठेकेदार कामयाब होंगे तो कुछ जगह पर कानूनी डंडा लेकिन सदियों से चली आ रही यह सामाजिक कोढ़ पर अभी तक नियंत्रण नहीं पाया जा सका है। यह ठीक है कि शासन और प्रशासन कानून के डंडे के बूते पर बाल विवाह रोके किन्तु इससे इतर समाज को आगे आना होगा। इस कोढ़ को खत्म करने के लिये डर नहीं, जागरूकता की जरूरत है। शिक्षा इस कोढ़ को खत्म करने का एक बड़ा औजार है, खासकर स्त्री शिक्षा को बढ़ाकर। दुर्भाग्य से स्त्री सशक्तिकरण की बातें तो हम खूब करते हैं किन्तु इस दिशा में कोई ठोस पहल होती नहीं दिखती है। खबरों का जायजा लें तो प्रतिदिन सौ-पचास स्त्रियां अलग अलग कारणों से प्रताड़ना की शिकार होती हैं। विकास की ठाठें मारते भारतीय समाज के लिये इस तरह की खबरें दाग है। बालविवाह रोकने के लिये हमारे पास कानून हैं और प्रशासन इस कानून को अमल में लाने की भरपूर प्रयास करता है। भय जरूरी है किन्तु इससे ज्यादा जरूरी है जागरूकता की। 
लिंगानुपात बिगड़ने की चिंता करती देश भर की राज्य सरकारें बिटिया को बचाने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। यह सकरात्मक कदम हैं और इसका स्वागत किया जाना चाहिए। एक तरफ तो बिटिया बचाने के लिये जतन किया जा रहा है तो दूसरी तरफ कन्यादान जैसी नकरात्मक सोच की योजना भी चल रही है। असलियत तो यह है कि कन्यादान योजना सरकार की उन गरीब परिवारों के लिये राहत की योजना है जो सयानी बेटी का ब्याह आर्थिक दिक्कतों से नहीं कर पा रहे हैं किन्तु योजनाकारों ने जो इस योजना का नामकरण किया है, उससे नकरात्मक संदेश जाता है। सरकार आर्थिक सहायता देकर एक तरफ तो अनेक गरीब परिवारों को ब्याह के खर्च से तनावमुक्त कर रही है तो दूसरी तरफ बाल विवाह को रोकने में भी अपनी भूमिका निभा रही है। इन तमाम शासकीय योजनाओं को समाज चुनावी लाभ पाने वाली योजनायें मानता है और योजनाएं अपने मकसद से भटक जाती हैं। 
बाल विवाह रोकने में मीडिया की भूमिका अहम हो सकती है किन्तु बहुत ज्यादा सक्रियता मीडिया की नहीं दिखती है। टीआरपी बटोरने अथवा अधिक प्रतियां बिकने वाली खबरें ही मीडिया के लिये महत्व की रखती हैं। अक्षय तृतीया के करीब आते ही मीडिया सनसनी फैलाने वाली खबरों से मीडिया स्वयं को दूर रखता है बल्कि मन को छू लेने वाली खबरों पर उसका फोकस ज्यादा रहता है। बाजार का यह भी गुण है कि वह सनसनी से ज्यादा भावनाओं को कैश कर ले। यह ठीक है कि बाजार की मांग के अनुरूप मीडिया खबरें तलाश करता है किन्तु इससे परे मीडिया की अपनी सामाजिक जवाबदारी है। उसे इस बात की पड़ताल करनी चाहिए कि बीते साल किस गांव में अधिक बाल विवाह हुये और इस बार किन गांवों में इस कुरीति को दोहराया जाएगा। शासन-प्रशासन से हमेशा छत्तीस बने रहना मीडिया का स्वभाव है और इसके अभाव में मीडिया मृतप्राय हो जाएगा किन्तु सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में शासन-प्रशासन का सहयोगी बन कर मीडिया अपनी छवि निखार सकेगा, विश्वसनीय बन सकेगा। ऐसा कर मीडिया वैसा ही उदाहरण पेश करेगा जैसा कि बड़ी जाम गांव के लोगों ने बाल विवाह न करने की शपथ लेकर किया है।      

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

ये तेरा घर…ये मेरा घर…

मनोज कुमारहम बचपन में एक खेल खेला करते थे। कोई हमसे आगे न निकल जाये, इसके लिये हम कहते थे कि तु जितना बलवान है, मैं उससे दस गुना ज्यादा बलवान हूं। साथी संगी कहते कि हम तेरे से दस गुना ज्यादा बलवान हैं तो मैं कहता कि पहले ही कह दिया कि तुमसे दस गुना ज्यादा यानि जितना कहोगे उससे हमेशा यह ज्यादा ही रहेगा। बचपन के इस खेल को आज भोपाल में दुहराते हुए देखने का मौका मिला है। हमारा खेल बचपन का था जिसमें कोई स्वार्थ नहीं था लेकिन भोपाल में इन दिनों जो खेल खेला जा रहा है, वह अपने अपने स्वार्थाें के लिये है। दामुल वाले प्रकाश झा भोपाल में पहली दफा राजनीति की शूटिंग करने आये थे और इसके बाद आरक्षण बना डाला। राजनीति से आरक्षण बनाते समय तक न तो उन्हें भोपाल अपना लगा था और न ही उन्होंने कभी भोपाल को अपना घर कहने की बात की थी। इस बार जब अपनी वो एक नयी फिल्म की शूटिंग के लिये आये हैं और कुछ विवाद सामने आया तो उन्होंने कह दिया कि अब से भोपाल मेरा पहला घर। झा की तर्ज पर साथी कलाकारों ने भी भोपाल को अपना कह दिया। एकाध ने तो भोपाल से पुराना रिश्ता ही ढूंढ़ निकाला।

बचपन की यादें ताजा हो गर्इं। प्रकाश झा ने भोपाल को अपना घर क्या कह दिया, बयानों की बरसात लग गयी। अच्छा लगता है जब मेरे भोपाल को ये लोग अपना भोपाल कहते हैं। मुझे इस बात से ऐतराज नहीं है कि प्रकाश झा हों या कोई और जो भोपाल को अपना कहे। मुझे दर्द इस बात का है कि तीन-चार बरस पहले यहां फिल्म की शूटिंग करने आये तो उन्हें अपने भोपाली होने का अहसास हो गया। इसके पहले इतने बरसों तक वे कहां थे, भोपाल तो तब भी था। उसी शान और ठाठ के साथ। प्रकाश झा के आ जाने से भोपाल के तेवर और तासीर में बदलाव नहीं आया है और न किसी एक प्रकाश झा के आने से बदलेगा। प्रकाश झा के लिये आज भोपाल उनका पहला घर है, पूरा प्रदेश उनका नहीं है, यह बात भी उन्होंने साफ कर दी है। मेरे प्रदेश के भोले-भाले कलाकारों को शूटिंग के लिये बुलाना और उन्हें बैरंग लौटा देना हमारे प्रदेश की रवायत नहीं है। वो तो भला हो सह्दयी मुख्यमंत्री शिवराजसिंह का जिन्होंने कलाकारों का दर्द सुना और उन्हें सम्मान भोजन कराया। प्रकाश झा अपना मानते हो तो अपनों की तरह बर्ताव करना भी सीखो। सिर्फ यह कह देना ही पर्याप्त नहीं होगा कि अब भोपाल मेरा पहला घर है। भोपाल में फिल्म बनाओ, भोपालियों को रोजगार दो और खुद भी मालामाल हो जाओ, कोई ऐतराज नहीं करेगा लेकिन सिर्फ काम के लिये किसी को अपना बना लेने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। इससे उबर जाएंगे तो फिल्म से बड़ा केनवास जिंदगी का है। इसमें रंग भरने की जरूरत है। खुशी की, प्यार की और अपनेपन की।

विभाजन का दर्द और उसकी पीड़ा प्रकाश झा नहीं समझते होंगे लेकिन मैं महसूस करता हूं। कभी मेरा मध्यप्रदेश विशाल हिन्दी प्रदेश हुआ करता था। राजनीति बिसात में मात खाने के बाद मेरे प्रदेश के दो खाने हो गये। एक राज्य रह गया मध्यप्रदेश और दूसरे को नाम मिला छत्तीसगढ़। मैं छत्तीसगढ़ में पैदा हुआ हूं और लोगों की सलाह थी कि राज्य के विभाजन के बाद मुझे छत्तीसगढ़ चले जाना चाहिए। ये सलाहकार उन्हीं प्रकाश झा जैसे लोगों में से हैं जो अवसर की तलाश में रहते हैं। खैर, इन सलाहकारों को मेरा धन्यवाद लेकिन मैं भौगोलिक विभाजन को विभाजन नहीं मानता। मेरी जन्म भूमि छत्तीसगढ़ है। मैं उन्हें बारंबार प्रणाम करता हूं किन्तु विभाजन के पहले से मैं मध्यप्रदेश में हूं और कर्मभूमि मेरी मध्यप्रदेश है। मैं दोनों प्रदेश का बेटा हूं। दोनों ने मुझे नाम दिया, सम्मान दिया और समाज में स्थान। मेरे लिये छत्तीसगढ़ भी उतना ही अर्थवान है जितना कि मध्यप्रदेश। विभाजन के बाद मैं यह नहीं कहता कि मध्यप्रदेश अब मेरा पहला घर है बल्कि कहता हूं कि दोनों राज्य मेरे अपने हैं। मेरा तो मानना है कि मैं भारतीय हूं और भारत जन्मभूमि का हर स्थान मेरे लिये वही मायने रखता है जो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़। कहीं मुझ कर्म करने का अवसर मिले तो उसे अपना पहला घर कहने की भूल नहीं करता। प्रकाश झा बड़े फिल्मकार हैं। बड़ी सोच के साथ फिल्म बनाते हैं तो उन्हें कहना चाहिए कि मध्यप्रदेश उनके पसंदीदा राज्यों में एक है। पूरा हिन्दुस्तान उनका घर है। विशाल भारतभूमि पर किसी एक व्यक्ति का हक नहीं, बल्कि सभी भारतीयों का है। अलग अलग स्वार्थाें से पहले ही भारत के राज्यों में विभाजन रेखा खींच रही है और इस रेखा को बढ़ाने के बजाय समेटे जाने की जरूरत है। ये मेरा घर, ये तेरा घर कहने की मानसिकता से उबरना होगा तब ही हम विभाजन की दरार को पाट सकते हैं।

रविवार, 15 अप्रैल 2012

काटजू, निर्मल बाबा और मीडिया

मनोज कुमार
हम भारतीय कितने अंधविश्वासी हैं अथवा मूर्ख, इस पर फैसला करना थोड़ा मुश्किल काम है लेकिन असंभव नहीं। निर्मल बाबा की जो हकीकत बेपर्दा हुयी है, उसने यह बात तो प्रमाणित कर दी कि हम कितने अंधविश्वासी हैं लेकिन प्रेस कौंसिल के चेयरमेन काटजू के इस बयान की पुष्टि नहीं हो पाती है कि नब्बे फीसदी भारतीय मूर्ख हैं। अंधविश्वासी और मूर्ख के बीच फकत एक बारीक सी रेखा है। शायद इसलिये इस बात पर बहस हो सकती है कि जो लोग बाबाओं के चक्कर में रहते हैं उन्हें अंधविश्वासी कहें अथवा मूर्ख माना जाए। निर्मल बाबा का जो सच सामने आ रहा है, वह चौंकाने वाला नहीं बल्कि डराने वाला है। एक तरफ देश में लोग महंगाई के नीचे दबकर मरे जा रहे हैं। पाई पाई बचाने की जुगत लगा रहे हैं और दूसरी तरफ निर्मल बाबा जैसे लोगों को करोड़ों रुपये भी कम पड़ रहे हैं। यह अंधविश्वास हम भारतीयों की कमजोरी है और समय समय पर उग आने वाले ऐसे कथित बाबाओं के कारण काटजू जैसे विद्वान यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि नब्बे फीसदी भारतीय मूर्ख हैं। काटजू का बयान हमें जख्मी कर देता है। हमारी बुद्धिमता और हमारी पहचान का संकट खड़ा करता है। उनकी बातों को सौफीसदी सच न मानें तो भी इस बात से इंकार करना मुश्किल है कि हमारी भावनाओं से खिलवाड़ कर हमें मूर्ख बनाया जाता है। काटजू किन संदर्भाें में हम भारतीयों की तुलना करते हैं, यह तो वे ही जानें लेकिन हमारी भावनाओं के साथ जो खिलवाड़ किया जाता है, वह दुर्भाग्यजनक है। इस बात का हम पूरी ताकत के साथ इंकार करते हैं कि भारतीय मूर्ख हैं किन्तु इस बात से इंकार भी नहीं करते कि हम बेहद सरल और सीधे स्वभाव के हैं जिसे अपने अपने हितों में कभी बाबानुमा लोग तो कभी कोई और हमारा इस्तेमाल कर लेता है। शायद इन्हीं स्थितियों को भांप कर काटजू ने भारतीयों को मूर्ख की संज्ञा दी जो उनके ओहदे और ज्ञान के अनुकूल नहीं है।

जस्टिज काटजू आम आदमी नहीं हैं बल्कि वे नीति-नियंताओं में से एक हैं। भारतीयों को मूर्ख कहने का साहस उन्होंने कुछ सोच ही किया होगा लेकिन यही साहस वे रोज-ब-रोज टेलीविजन के पर्दे पर उगते बाबाओं को रोकने के लिये दिखाया होता तो कम से कम मूर्ख भारतीय उनके आभारी होते। मीडिया ने ऐसे बाबाओं के संवर्धन और संरक्षण का दरवाजा खोला है तो मीडिया ने ही ऐसे बाबाओं को बेनकाब करने की जवाबदारी उठाने की पहल भी की है। निर्मल बाब का जो रहस्योद्घाटन हुआ है, वह मीडिया के प्रयासों से ही हुआ है। हम इस बात के लिये मीडिया को बधाई दे सकते हैं लेकिन इस बात के लिये हम मीडिया को भी कटघरे में खड़ा करने की बात कहेंगे कि बिना जाने समझे, ऐसे बाबाओं को प्रमोट करने की उनकी मंशा क्या है। पेडन्यूज पर बवाल तो मच रहा है किन्तु इन प्रायोजित बाबाओं पर मीडिया, प्रेस कौंसिल और जागरूक संस्थायें कब संज्ञान लेंगी और एक कायदा कब बनेगा जब बाबाओं का प्रचार अनावश्यक और अकारण न हो सके। जिस दिन यह पहल हो जाएगी उस दिन भारतीय न तो अंधविश्वासी रहेंगे और मूर्ख।

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...