शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

पेड-न्यूज बनाम बिकी हुई खबर


मनोज कुमार

पत्रकारिता अपने आरंभ से ही आरोपों से घिरी रही है. पत्रकारिता पर यह आरोप उसके कार्यों को लेकर नहीं बल्कि पत्रकारिता की सक्रियता से जख्मी होते लोग आरोप लगाते रहे हैं. पत्रकारिता पर जैसे-जैसे आरोप तेज होता गया, पत्रकारिता उतनी ही धारदार होती गयी. किसी समय में पत्रकारिता पर पीत पत्रकारिता का आरोप लगता था. पीत पत्रकारिता अर्थात पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किसी के खिलाफ अथवा पक्ष में लिखा जाना. अंग्रेजी में इसे यलो जर्नलिज्म कहा गया. समय गुजरने के साथ पीत पत्रकारिता अथवा यलो जर्नलिज्म का अस्तित्व ही समाप्त हो गया लेकिन लगभग दो दशक पहले पत्रकारिता के समक्ष पेडन्यूज नाम एक नया आरोप सामने आया. देहात से दिल्ली तक सबकी जुबान पर पेडन्यूज नामक का एक कथित जुर्म पत्रकारिता के साथ चिपका दिया गया. पेडन्यूज क्या है, जब यह किसी से पूछा जाये तो शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो इसका सही और सटीक जवाब दे सके. पेडन्यूज अंग्रेजी का शब्द है और मैं एक पत्रकार होने के नाते इस शब्द का हिन्दी अर्थ तलाश करने में लग गया. किसी ने कहा कि पेडन्यूज का अर्थ बिकाऊ खबर है तो किसी ने इसे बिकी हुई खबर कहा लेकिन इन दोनों से पेडन्यूज का अर्थ स्पष्ट होता नहीं दिखता है. 

पत्रकारिता में पनप रहे पेडन्यूज नाम की बीमारी का इलाज कराने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर बहस चल रही है. हर कोई पत्रकारिता की इस बीमारी को दूर कर देना चाहता है लेकिन यह बीमारी सबको भा रही है. बहरहाल, पेडन्यूज के बारे में मैंने जितना जाना-समझा, उसके आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि हिन्दी पत्रकारिता के लिये पेडन्यूज बना ही नहीं है. अंग्रेजी का शब्द है और अंग्रेजी जर्नलिज्म के लिये ही यह मुफीद है क्योंकि हिन्दी पत्रकारिता के लिये यह होता तो पहले की तरह हिन्दी में पीत पत्रकारिता जैसा कोई नाम मिल गया होता. खैर, अंग्रेजी का ही जुमला सही लेकिन सच है कि समूची पत्रकारिता इस आरोप से घिरी हुई है. एक और बात साथियों से चर्चा में आयी कि न्यूज से किसी का महिमामंडन या छीछालेदर नहीं किया जा सकता है अत: पेडन्यूज जैसा कोई फ्रेम उचित नहीं है. समाचार ताजा स्थिति की सूचना का प्रारंभिक चरण होता है अत: यहां वह गुंजाईश नहीं होती है कि समाचार को बेचा जा सके.अपितु समाचार विश£ेषण, टिप्पणी, सम्पादकीय अथवा लेख के माध्यम से किसी का महिमामंडन या छीछालेदर करना सहज होता है. 

इस समय जिन पांच राज्यों में चुनाव प्रक्रिया शबाब पर है, वहां पेडन्यूज पर नियंत्रण पाने के लिये चुनाव आयोग ने पहरा बिठा दिया है. कुछ राज्यों में चुनाव आयोग तक शिकायतें पहुंच चुकी हैं और शायद यह क्रम जारी रहेगा. सवाल यह है कि पेडन्यूज की परख कैसे हो? इम्पेक्ट फीचर और एडवाटोरियल को क्या पेडन्यूज की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा? इससे भी एक अहम सवाल यह है कि क्या पेडन्यूज पर नियंत्रण चुनाव की बेला में ही होगा इसके बाद कोई रोक नहीं होगी? पेडन्यूज क्या पत्रकारिता के उद्देश्यों को प्रभावित नहीं करती? सवाल अनेक हैं और पेडन्यूज पर नियंत्रण की कोशिशें एक निश्चित समय-सीमा के लिये नहीं बल्कि हमेशा के लिये होना चाहिये. मीडिया समाज का दर्पण है और दर्पण ही दागदार हो जाये तो चेहरा साफ कैसे दिखेगा. मीडिया की विश्वसनीयता दांव पर है और यह विश्वसनीयता तभी वापस आ सकती है जब पेडन्यूज जैसी बीमारी से मीडिया को मुक्त किया जा सके.

पेडन्यूज को एक बड़े विस्तार के रूप में ओपिनियन पोल को देखा जा सकता है. एक राय है कि यह चुनावी सर्वे किसी शोध का नहीं बल्कि शो का नतीजा होता है. लगभग 90 के दशक के आसपास से श्ुारू हुआ चुनावी सर्वे पहले पहल तो लोगों को लुभाने लगा लेकिन इस सर्वे की विश्वसनीयता कभी नहीं रही. लाखों मतदाताओं के बीच से सौ-पचास लोगों की राय पर परिणाम किसी भी हालत में विश्वसनीय तो हो ही नहीं सकता. बाद के सालों में सर्वे करने वालों की तादात बढ़ती गयी और पेड-सर्वे की गंध आने लगी. पेडन्यूज की तरह पेड सर्वे भी मीडिया में महामारी की तरह पनप रही है और इस पर रोक लगाना चाहिये ताकि कल कोई ना कहे बिकाऊ मीडिया या बिकी हुई...

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

मीडिया में आत्महत्य


मनोज कुमार

भोपाल में हाल ही में पत्रकार राजेन्द्र राजपूत ने तंत्र से तंग आकर आत्महत्या कर ली। ऐसा करने वाले राजपूत अकेले नहीं हैं। मीडिया वाले अनेक वेबसाइट पर जांचा तो देखा कि हर प्रदेश में एक राजेन्द्र राजपूत हैं। कुछेक राजेन्द्र के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं तो कुछेक अभी मुसीबत से घिरे हुये हैं। यह आश्चर्यजनक ही नहीं, दुखद है कि जिन लोगांे ने समाज को जगाने और न्याय दिलाने की शपथ लेकर फकीरी का रास्ता चुना है, आज उन्हें मरने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। सरकार गला फाड़-फाड़ कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई दे रही है और पत्रकार एक के बाद एक जान देने के लिये मजबूर हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का यही सिला है तो पराधीन भारत ही ठीक था जहां गोरे जुल्म करते थे लेकिन शिकायत तो यह नहीं थी कि अपने लोग ऐसा कर रहे हैं। स्वाधीन भारत में पत्रकारों का यह हाल देखकर यह सोचना लाजिमी हो गया है कि आने वाले दिनों में पत्रकार नहीं, प्रोफेशनल्स ही मिलंेगे। और ऐसी स्थिति में पत्रकार मिले भी क्यों? क्यों वह समाजसेवा भी करे और बदले में जान भी गंवाये। एक प्रोफेशनल्स के सामने कोई जवाबदारी नहीं होती है। वह टका लेता है और टके के भाव काम कर खुद को अलग कर लेता है। तंत्र को उससे कोई शिकायत नहीं होती है और वह तंत्र से पूरा लाभ लेता है।

पत्रकारों की इस ताजा स्थिति की जानकारी प्रखर वक्ता और केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारीजी को भी होगी। उनकी तरफ से या मंत्रालय की तरफ से अब तक पत्रकारों की सुरक्षा के लिये अथवा दोषियों पर कार्यवाही के लिये कोई संदेश नहीं आया है। इस सवाल पर शायद जवाब होगा कि यह मामला राज्यों का है और राज्य शासन के मामले में हस्तक्षेप करने का हक केन्द्र को नहीं है। इन स्थितियों में ऐसे ही जवाब की उम्मीद की जा सकती है। खैर, सरकारें तो अपनी तरह से ही काम करती हैं। शिकायत तो उस समाज से है जिसके लिये पत्रकार जूझते और मरते हैं। हाल ही में प्राकृतिक आपदा फैलिन के समय जब लोग टेलीविजन को निहार रहे थे, सूचना पाने के लिये आतुर थे तब पत्रकार ही ऐसा शख्स था जो अपनी जान की परवाह किये बिना जन-जन तक सूचना दे रहा था। उनकी कुशलता के लिये आगाह और सजग कर रहा था। आज उसी पत्रकार की मौत पर समाज खामोश है। उसे इस बात की चिंता नहीं है कि सीमा पर सेना और समाज में पत्रकार ही उसके रक्षक हैं और रक्षक जब हताशा के पायदान पर पहुंच जाये तो आगे की स्थिति समझ लेना चाहिये।

पत्रकार जब अपना दायित्व करते हुये मौत के मुंह में समा जाते हैं तो वह शहीद होने के बराबर होता है। जिस तरह सीमा पर दुश्मनों से दो-दो हाथ करते हुये सैनिक शहीद हो जाते हैं तो हमारा सीना गर्व से फूल जाता है और जब पत्रकार शहीद हो जाता है तो कम से कम पत्रकार बिरादरी का सीना गर्व से फूल जाता है। दुख इस बात का है कि पत्रकार शहीद नहीं हो रहे हैं बल्कि उन्हें मरने के लिये मजबूर किया जा रहा है। यह एक जागरूक समाज के लिये मामूली सवाल नहीं है बल्कि तंत्र को सजग बनाये रखने वाले समाज के प्रहरी जब खतरे में हो तो आवाज हर तरफ से उठना चाहिये कि आखिर ऐसा क्यों। मुझे विश्वास है कि पत्रकारांे को मरने के लिये समाज यूं ही नहीं छोड़ेगा बल्कि उनकी भी खैर-खबर लेगा जो इसके लिये दोषी हैं। समाज का चैथास्तंभ इस समय खतरे में है और चैथास्तंभ ही ढहने लगा तो समूचा लोकतांत्रिक ताना-बाना ध्वस्त हो जाएगा। खतरे की शुरूआत में ही रोक लिया जाये तो बेहतर।

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

विजय का दशहरा


मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश£ेषक
भारत वर्ष में बस्तर और कुल्लू का दशहरा पर्व संसार भर में ख्यात है. दोनों स्थानों में मनाये जाने वाले दशहरा पर्व की अपनी अपनी विशेषतायें हैं. इस बार बस्तर का दशहरा पर्व कुछ अलग ही मायने रखता है. बस्तर का इस वर्ष का दशहरा पर्व सही अर्थों में विजय का दशहरा पर्व कहा जा सकता है. कुछ महीने पहले ही बस्तर की हरी-भरी भूमि पर जो रक्तपात हुआ और इसके पहले जो रक्तपात होता रहा है, वह दिल दहला देने के लिये कम नहीं है. पूरा देश इस रक्तपात की घटनाओं से जख्मी है और हतप्रभ भी. ऐसी विषम स्थितियों में भी आदिवासियों द्वारा अपने परम्परागत दशहरा पर्व को उसी उत्साह से मनाये जाने को विजय का दशहरा ही कहा जा सकता है. एक मामूली बम फटने के बाद जब लोग दुबक जाते हैं, बम फटने की आवाज देर तक डराती रहती है तब बस्तर की धरती और उसके जन बार बार के रक्तपात से न सहमते हंै, न सिहरते हैं बल्कि दुगुने उत्साह के साथ स्वयं को खड़ा कर लेते हंै. बस्तर के आदिवासियों का यह उत्साह केवल उत्सव का उत्साह नहीं है बल्कि जीवन का उत्साह है जो समूचे संसार को एक नया पाठ पढ़ाता है. 

बस्तर में पिछले दशकों में निरंतर आतंक के साये में रहा है. नक्सलियों और तंत्र के साथ मुठभेड़ के बीच जो रक्तपात होता रहा है, वह जनपदीय समाज को भयभीत किये हुये है. जंगलों के बीच जी रहे आदिवासियों के मन में भी भय न हो, यह कहना मुश्किल है. सरकारें बदलती रहीं और हर सरकार ने बस्तर के आदिवासियों का लेखा भी बदलने की कोशिश की. इन कोशिशों से बस्तरिया आदिवासियों का जीवन कितना बदला या नहीं बदला, यह तो कहना मुश्किल है लेकिन उनका उल्लास से भरे आदिम मन को कोई तंत्र, कोई सरकार नहीं बदल पायी, यह दावे के साथ कहा जा सकता है. बरसों पुराने परम्परागत बस्तर दशहरे के उत्साह को देखकर कोई अंदाज नहीं लगा सकता कि इस जमीन पर कुछ महीने पहले आतंक ऐसे पसरा था, मानो समय थम गया हो. समय को उसी गति से जीने और चलने देने की जीजिविषा आदिम समाज में अपनी उत्पत्ति के समय रही होगी, वह ताप आज 21वीं सदी में भी देखने को मिल रहा है.

बस्तर दशहरा दो-एक दिन का उत्सव नहीं होता है और न ही प्रतीकात्मक रूप से रावण का पुतला जलाने की रस्मअदायगी होती  है. बस्तर दशहरा का उत्सव पूरे पचहत्तर दिन का होता है. पूरे विधान के साथ जिसमें आम आदमी से लेकर राज परिवार तक शामिल होता है. बस्तर दशहरे के लिये बनाये जाने वाले रथ के लिये आदिम समाज जुट जाता है. इस विशालकाय बस्तर रथ के निर्माण में जुटे आदिवासीजनों का उत्साह देखने योग्य होता है. बस्तर दशहरे का रथ भोपाल में बने मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय  एवं राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में भी देखने को मिल जायेगा. 75 दिनों के इस उत्सव का उल्लास और भी पहले से शुरू हो जाता है. इस उल्लास में कोई खलल डाले, यह आदिम समाज को मंजूर नहीं है. जो रक्तपात हो रहा है, बस्तर के घने जंगलों में आतंक की जो सरसराहट है और जो इस उत्सव में बाधा पैदा कर सके, वह स्थितियां भी हैं लेकिन आदिम समाज इस सबसे बेफिकर हंै. उनके लिये हर सांझ दुख बिसराने के लिये होता है और हर सुबह वह प्रकृति का स्वागत करता है, मुस्करता है. उसके पास पीछे देखने के लिये कुछ भी नहीं होता है. इस बार के दशहरे को लेकर जनपदीय समाज में भले ही आशंका रही हो लेकिन आदिम समाज हमेशा से आशा में जीता रहा है. बस्तर दशहरे की गमक और खनक इस बार भी वैसा ही है, जैसा कि परम्परागत रूप से बीते अनेक दशकों से रहा है. बस्तर का यह दशहरा सचमुच में विजय का दशहरा है जो सिखाता है कि तम से कैसे लड़ें, कैसे आतंक को आशंका से नहीं आशा से निपट लें. बस्तर का यह दशहरा पर्व समूचे संसार को आतंक के खिलाफ एक संदेश देता है आओ, हम सब मिलकर रोज पैदा हो रहे दशानन का वध करें, तम को दूर कर उजाले का दीपक जलायें.

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

मजबूरी के गांधी

 
-मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक 

महात्मा गांधी की जनस्वीकार्यता पर कभी कोई सवालिया निशान नहीं लगा. महात्मा द्वारा बताये गए  सादा जीवन, उच्च विचार लोगों को हमेशा से शालीन जीवन के लिये प्रेरित करते रहे हैं. मांस-मदिरा के सेवन से दूर रहने की शिक्षा एवं अङ्क्षहसा के बल पर जीने के जो रास्ते महात्मा ने अपने जीवनकाल में बताये थे, वह हर भारतीय के लिये आजीवन आदर्श रहे हैं. भारतीय ही नहीं, दुनिया के लोगों को भी महात्मा का बताया रास्ता जीने का सबसे सहज एवं सुंदर रास्ता लगा है. इससे परे एक-डेढ़ दशक में महात्मा गांधी के प्रति राजनीतिक दलों की स्वीकार्यता अचरज में डालने वाली है.
आज 2 अक्टूबर को हर वर्ष की तरह जब हम  महात्मा गांधी की जयंती का उल्लास मना रहे हैं और इस उल्लास में कैलेंडरी उत्सव से अलग होकर विभिन्न राजनीतिक दल भी महात्मा का स्मरण करेंगे. राजनीतिक दलों में महात्मा के प्रति यह  जो  चेतना जागृत हुई  है, उसे सकरात्मक भाव से देखें तो अच्छा लगेगा कि जिस महात्मा को अपने ही देश में पचास साल से ज्यादा समय में राजनीतिक स्वीकार्यता नहीं मिली, आज उस देश की राजनीतिक पार्टियां महात्मा के सहारे के बिना नहीं चल पा रही हैं. महात्मा की यह स्वीकार्यता सहज नहीं है. इसे अनेक दृष्टिकोण से देखना और समझना होगा. यह बात सच है कि वोट की राजनीति में रंगे राजनीतिक दलों के लिये महात्मा गांधी अचानक आदर्श बनने के पीछे  गांधी के आदर्शों की दुहाई देकर वोटबैंक को खींचने की मानसिकता ही है. भारतीय जनमानस की महात्मा में आज भी वैसी ही आस्था है, जैसा कि उनका अपने देवलोक पर. जनमानस की भावनाओं को केश कराने की जुगत  राजनीतिक दलों में महात्मा के प्रति  पहले से कही ज्यादा अनुराग बढ़ा है. 
बहुत ज्यादा छानबीन न करें तो भी 15-20 बरस से पहले सभी राजनीतिक दलों के अपने अपने आदर्श राजनेता रहे हैं. समाजवादी पार्टी लोहिया के बताये मार्ग पर चल रही है तो बहुजन समाज पार्टी के लिये डॉ. भीमराव आम्बेडकर प्रेरणास्रोत रहे हैं. कभी जनसंघ किन्तु अब भारतीय जनता पार्टी के पास डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, गोलवलकरजी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं वीर सांवरकर जैसे अनेक नेता हैं जिनके बताये रास्ते का अनुसरण ये दल करते रहे हैं. माक्र्सवादियों के भी अपने आदर्श रहे हैं. इसे आप सहज रूप में यह कह सकते हैं कि सभी दलों के पास अपने अपने ये नेता ब्रांडएम्बेसडर के रूप में मौजूद हैं जिन्हें जरूरत के अनुरूप उपयोग किया जाता रहा है. कांग्रेस के पास महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल सरीखे नेता रहे हैं. हालांकि ये नेता कांग्रेस पार्टी के नहीं बल्कि भारत वर्ष की विरासत हैं किन्तु अन्य राजनीतिक दलों ने इनसे परहेज किया है और वे अपने ही नेताओं को आदर्श मानकर राजनीति करते रहे हैं. यहां उल्लेखनीय है कि स्वाधीनता के पूर्व महात्मा गांधी से अनेक नेताओं के विचार मेल नहीं खाते थे. जिन नेताओं से गांधीजी के वैचारिक मतभेद थे, वे जगजाहिर हैं और इतिहास के पन्नों पर दर्ज हैं. गांधीजी के विचारों से सहमत नहीं होने वाले नेताओं में डॉ. अम्बेडकर, डॉ. मुखर्जी, लोहिया और यहां तक कि कांग्रेस के प्रथम पंक्ति में गिने जाने वाले अनेक नेता भी उनके विचारों से सहमत नहीं थे. 
      अस्तु, स्वाधीन भारत में लोकतंत्र स्थापित हो गया. 1975 में देश में आपातकाल लग जाने के बाद राजनीति स्थितियां तेजी से बदली और जनता दल का उदय हुआ. सत्ता संघर्ष में जनता दल के अनेक टुकड़े हुये और सबने अपने अपने रास्ते तय कर लिये. ज्यों-ज्यों समय गुजरता गया. विस्तार होता गया और नये-नये राजनीति दलों का जन्म होने लगा. बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी इन्हीं में से हैं. प्रादेशिक दलों की बातें तो इनसे बिलकुल अलग है. इन सबके तब भी आदर्श अलग-अलग नेता थे लेकिन महात्मा गांधी की स्वीकार्यता वैसी नहीं थी, जैसा कि आज हम देख और समझ रहे हैं. आज हर दल के लिये महात्मा गांधी सर्वोपरि है. 
     नोट से लेकर वोट तक महात्मा गांधी की छाप अलग से देखी जा सकती है. यह बात तो तय है कि राजनीतिक दलों के लिये गांधीजी की स्वीकार्यता जरूरी नहीं बल्कि मजबूरी हैं क्योंकि एकमात्र गांधी ही ऐसे हैं जिनका ढि़ंढ़ोरा पीट कर भारतीय जनता को बहलाया जा सकता है. राजनीति दलों का गांधीजी को मानना बिलकुल वैसा ही है जैसा कि हम ईश्वर को तो खूब मानते हैं किन्तु ईश्वर का कहा नहीं मानते. राजनीतिक दल गांधीजी को तो खूब मान रहे हैं किन्तु उनका कहा कोई मानने को तैयार नहीं है. गांधीजी की राजनीतिक दलों की स्वीकार्यता तब जरूरी समझी जाती जब दागी नेताओं को चुनाव लडऩे के अयोग्य किये जाने फैसले के खिलाफ कोई पहल नहीं की जाती. हमारे लिये महात्मा जरूरी नहीं, मजबूरी हैं और इसलिये शायद आम चलन में कहा भी जाता है मजबूरी का नाम महात्मा गांधी.

सोमवार, 9 सितंबर 2013

एक जननायक बन जाने की कथा

मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक 

राजनेताओं को समय-समय पर उपाधियां मिलती रही हैं. यह उपाधियां किसी संविधान के तहत नहीं बल्कि समाज की सहमति से तय होती हैं और आहिस्ता आहिस्ता चलन में आ जाती हैं. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को समाज ने कभी किसान का बेटा कहकर पुकारा तो कभी पांव पांव वाले भैया कह और इन दिनों उनके लिये नया तखल्लुस इस्तेमाल हो रहा है जननायक. किसान का बेटा होने के कारण इस तखल्लुस में आकर्षण नहीं था लेकिन पांव-पांव वाले भइया में कुछ आकर्षण दिखा. मुख्यमंत्री बनने के पहले और बाद में भी वे जनता से मिलने मोटर-कार के बजाय पैदल ही चला जाया करते थे. आम आदमी के लिये यह अलग किस्म का अनुभव था सो यह तखल्लुस लोकप्रिय हो गया. इसके बाद अचानक से उन्हें जननायक पुकारा जाने लगा. यह तखल्लुस सुनने में भला लगता था लेकिन इसके कारणों की पड़ताल किये बिना इसे समझ पाना मेरे लिये मुश्किल सा था. 

खैर, जिंदगी रफ्ता-रफ्ता गुजर रही थी. रोज की तरह किसी एक मैजिक में मैं धंसा घर वापस आ रहा था. एक पत्रकार होने के नाते आसपास क्या हो रहा है, इस पर तो नजर रहती ही है बल्कि आसपास क्या संवाद हो रहा है, यह भी जांच लेता हूं. जिस जननायक का सवाल मेेरे मन में कौंध रहा था, उसका जवाब इतनी आसानी से मिल जायेगा, यह सोचा भी नहीं था. हुआ यों कि जिस मैजिक में मैं सवार था, उस मैजिक के चालक का गलत चालान काट दिया गया था. मैजिक चालक ने न केवल पहले अपने साथ हुये गलत चालान की जांच की और तत्काल में उस चालान बनाने वाले अफसर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराकर मानहानि का मुकदमा भी ठोंक दिया.
अब मेरे चौंकने की बारी थी. एक मैजिक चालक की इतनी हिम्मत की वह पुलिस वाले से पंगा ले. मैं कुछ सोच और पूछ पाता कि उसने साथ चल रहे अपने साथी को आगे की घटना का ब्यौरा दिया. बकौल मैजिक चालक- हमारे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जब गलत आरोप लगाने पर अजयसिंह पर मानहानि का मुकदमा कर सकते हंै तो हम अपने अधिकारों के लिये क्यों नहीं...? 
मैजिक चालक की इन बातों के बाद से पता चला गया कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को किसी व्यक्ति, संस्था या दल ने नहीं बल्कि समाज ने जननायक पुकारा है. जिनके कार्यों से समाज प्रेरित हो, उनकी अनुगामी बने, वह तो जननायक होगा ही. किसान का बेटा और पांव-पांव वाले भइया से ऊपर और शायद सौफीसदी सही है मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के लिये जननायक का तखल्लुस. इन्हें ही समाज कहता है मील का पत्थर. यह तो एक मामला है और न जाने कहां कहां और कितने लोगों ने मुख्यमंत्री से प्रेरणा पाकर अपनी जिंदगी को बदली होगी. समाज में बदलाव लाने वाले व्यक्ति ही सही अर्थों में जननायक होते हैं. 
लिये यह अलग किस्म का अनुभव था सो यह तखल्लुस लोकप्रिय हो गया. इसके बाद अचानक से उन्हें जननायक पुकारा जाने लगा. यह तखल्लुस सुनने में भला लगता था लेकिन इसके कारणों की पड़ताल किये बिना इसे समझ पाना मेरे लिये मुश्किल सा था. 

खैर, जिंदगी रफ्ता-रफ्ता गुजर रही थी. रोज की तरह किसी एक मैजिक में मैं धंसा घर वापस आ रहा था. एक पत्रकार होने के नाते आसपास क्या हो रहा है, इस पर तो नजर रहती ही है बल्कि आसपास क्या संवाद हो रहा है, यह भी जांच लेता हूं. जिस जननायक का सवाल मेेरे मन में कौंध रहा था, उसका जवाब इतनी आसानी से मिल जायेगा, यह सोचा भी नहीं था. हुआ यों कि जिस मैजिक में मैं सवार था, उस मैजिक के चालक का गलत चालान काट दिया गया था. मैजिक चालक ने न केवल पहले अपने साथ हुये गलत चालान की जांच की और तत्काल में उस चालान बनाने वाले अफसर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराकर मानहानि का मुकदमा भी ठोंक दिया.

अब मेरे चौंकने की बारी थी. एक मैजिक चालक की इतनी हिम्मत की वह पुलिस वाले से पंगा ले. मैं कुछ सोच और पूछ पाता कि उसने साथ चल रहे अपने साथी को आगे की घटना का ब्यौरा दिया. बकौल मैजिक चालक- हमारे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जब गलत आरोप लगाने पर अजयसिंह पर मानहानि का मुकदमा कर सकते हंै तो हम अपने अधिकारों के लिये क्यों नहीं...? 

मैजिक चालक की इन बातों के बाद से पता चला गया कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को किसी व्यक्ति, संस्था या दल ने नहीं बल्कि समाज ने जननायक पुकारा है. जिनके कार्यों से समाज प्रेरित हो, उनकी अनुगामी बने, वह तो जननायक होगा ही. किसान का बेटा और पांव-पांव वाले भइया से ऊपर और शायद सौफीसदी सही है मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के लिये जननायक का तखल्लुस. इन्हें ही समाज कहता है मील का पत्थर. यह तो एक मामला है और न जाने कहां कहां और कितने लोगों ने मुख्यमंत्री से प्रेरणा पाकर अपनी जिंदगी को बदली होगी. समाज में बदलाव लाने वाले व्यक्ति ही सही अर्थों में जननायक होते हैं. 

सोमवार, 2 सितंबर 2013

लायसेंसी पत्रकार


-मनोज कुमार

पत्रकारों को अब ट्रक ड्रायवर की तरह लायसेंस रखकर चलना होगा, यदि सरकार ने तय कर दिया कि पत्रकारों को भी डाक्टर और वकील की तरह लायसेंस लेना होगा. इस लायसेंस के लिये बकायदा परीक्षा भी पास करनी होगी. केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कह दिया है कि पत्रकारों को भी लायसेंस दिया जाना चाहिये और इसके लिये डाक्टर-इंजीनियर की तरह परीक्षा भी आयोजित होना चाहिये. इसके पहले प्रेस कांऊसिल के अध्यक्ष ने तो पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने के लिये एक कमेटी का गठन तक कर दिया है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई हर दल और हर नेता देता रहा है लेकिन जब जब उनके हितों पर चोट पहुंची है तो सबसे पहले नकेल डालने की कोशिश की गई. पश्चिम बंगाल में ममता बेनर्जी ने जो कुछ किया या कश्मीर और असम में जो कुछ हुआ, वह सब अभिव्यक्ति की आजादी में खलल डालने का उपक्रम है.

पराधीन भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की बात समझ में आती थी. अंग्रेजों को अपने हितों को बचाने के लिये ऐसा करना जरूरी हो सकता था किन्तु स्वाधीन भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण करने का अर्थ समझ से परे है. पिछले तीन दशकों से एक शब्द मीडिया इजाद किया गया है और इस मीडिया ने पत्रकारिता को हाशिये पर डाल दिया है. समाज में जो समस्या उत्पन्न हो रही है, वह पत्रकारिता के कारण नहीं बल्कि मीडिया के कारण हो रही है. पत्रकारिता एक मिशन है और मीडिया पूरी तरह व्यवसाय. इस शब्द की उत्पत्ति के कारणों की तलाश में कुछ भी हाथ नहीं लगा. बस, जवाब मिला कि जिस तरह सम्पादक की कुर्सी पर प्रबंधक विराजमान है, उसी तरह पत्रकारिता पर मीडिया चिपक गया है. पत्रकारिता का रिश्ता दिल से है जबकि मीडिया का रिश्ता दिमाग से. दिल भावनाओं को समझता और जानता है तथा वह अपने से ऊपर उठकर जनहित और समाजहित में काम करता है जबकि दिमाग सबसे पहले नफा-नुकसान को देखता है और अपने हित के बारे में सोचता है. इस तरह मीडिया और पत्रकारिता के दायित्व, समझ और इन दोनों के बीच के अंतर को समझा जा सकता है.

जो लोग बार बार पत्रकारों की योग्यता की बात कर रहे हैं, उन्हें पता ही नहीं है कि वे मीडिया के लोगों के बारे में कह रहे हैं या पत्रकारों के बारे में. तीन दशकों में कुछ इसी तरह का भ्रम फैलाकर सम्पादक की सत्ता को समाप्त कर दिया गया. प्रबंधकों को सम्पादक होना गैरजरूरी लगा और वे कुर्सी पर काबिज हो गये. अब पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता और लायसेंस दिये जाने की बात की जा रही है और आने वाले दिनों में पत्रकार भी विलुप्त हो जाएंगे. इसी के साथ पत्रकारिता भी समाप्त हो जाएगी और रह जाएगा मीडिया. मीडिया में पत्रकार नहीं होते हैं बल्कि मीडियाकर होते हैं जो संस्था और प्रबंधकों के साथ स्वयं का लाभ देखते हैं. सन् 75 में जिस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला गया था और इसी का परिणाम है कि मीडिया का प्रार्दुभाव हुआ. इसके बाद सिलसिला शुरू हुआ अखबारों को राजस्व कमाने का अधिकाधिक अवसर देने का और रातोंरात बहुख्यक नामी-बेनामी प्रकाशन आरंभ हो गये. बाद के सालों में तो अखबार और पत्रिकाओं का ऐसा अंबार खड़ा हुआ कि हर परिवार से कथित रूप से एक पत्रकार गिना जाने लगा. इस गिरावट को रोकने के लिये तब कोई प्रयास न तो संस्थागत हुये और न ही शासकीय नियंत्रण की कोई कोशिश ही हुई परिणामस्वरूप समाज के दूसरे क्षेत्रों की तरह पत्रकारिता में भी लगातार गिरावट आती गयी. प्रतिबद्ध लोगों के स्थान पर लाभ कमाने वालों की संख्या बढ़ती गयी.

सवाल यह है कि आखिरकार सरकार पत्रकारिता के लिये शिक्षा और लायसेंस का दायरा क्यों बांध रही है? क्या सरकार को इस बात का इल्म नहीं है कि पत्रकारिता विशुद्ध रूप से अनुभव का मामला है और अनुभव डिग्री या डिप्लोमा लेने से नहीं आता और न ही लायसेंस लेकर पत्रकारिता की जा सकती है. जिन डाक्टरों और इंजीनियर से पत्रकारों की तुलना की जा रही है, वहां यह भी याद रखना चाहिये कि पत्रकार कोई पेशेवर नहीं हैं. उसके पास कभी न तो स्थायी पूंजी रही है और न वह कोई व्यापार कर सकता है. वह तो मिशनरी भाव से जीता है और दूसरों को खुश देखकर स्वयं खुश हो जाता है. उसका पहला और आखिरी लक्ष्य समाज में शुचिता कायम करना होता है लेकिन पेशेवर लायसेंसशुदा लोगों से यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है. आजादी के पहले और बाद में भी खबर पर मर-मिटने वाला पत्रकार ही होता है.



यह सोच कर अच्छा लगता है कि आजादी के 66 बरसों में हमने कितनी तरक्की कर ली है. आजादी के पहले वे हमें कुचलने के लिये बर्नाकुलर प्रेसएक्ट लाते हैं तो स्वाधीन भारत में लायसेंसी बना दिया जाता है. लायसेंसी का अर्थ तो आप बेहतर समझते होंगे. संभव है कि सरकार अपने मकसद में कामयाब हो जाए और पत्रकारों को जरूरी शैक्षिक योग्यता हासिल करना पड़े. इसके बाद उसे लायसेंस हासिल करने के लिये फिर से परीक्षा देना हो और उसमें पास हो जाये और लायसेंसी पत्रकार के रूप में विख्यात हो जाएगा. इसके बाद की स्थिति की कल्पना कीजिये कि एक पत्रकार जो लायसेंसी है, वह भला इतनी हिम्मत कहां से लायेगा कि वह सरकार के काले कारनामों से परतें उखाड़ सके. वह कर सकता है लेकिन करेगा नहीं क्योंकि तब उसे अपने लायसेंस रद्द हो जाने की चिंता होगी और नहीं तो कम से कम लायसेंस के रिनीवल की चिंता सतायेगी. लायसेंसी पत्रकार के राज में आम आदमी की आवाज पत्रकारिता के कान बंद हो चुके होंगे. उसे सरकार के द्वारा दिखायी जा रही, सुनाई जा रही चीजें ही समझ में आएंगी क्योंकि वह पत्रकार नहीं, लायसेंसी होगा. 

रविवार, 11 अगस्त 2013

स्वाधीनता संघर्ष की महक छत्तीसगढ़ की मिट्टी में


-मनोज कुमार
हिन्दुस्तान के स्वाधीनता संग्राम में छत्तीसगढ़ के अतुलनीय योगदान की महक छत्तीसगढ़ की मिट्टी में आज भी रची-बसी है. 66 बरस हो गये हिन्दुस्तान को आजाद हुये और इन बरसों में छत्तीसगढ़ विकास के पथ पर दौड़ पड़ा है. इस दौड़ में वह अपने सुनहरे अतीत को हमेशा साथ लेकर चला है. यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के वीर सपूतों का स्मरण समय समय पर किया जाता रहा है. यह छत्तीसगढ़ की मिट्टी का ही प्रताप है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पुण्य कदम इस धरती पर पड़े और उन्हें यहां एक और गांधी मिला जिसे दुनिया ने पंडित सुंदरलाल शर्मा के नाम से जाना. गांधीजी के अछूतोद्धार अभियान में साथ निकल पड़े पंडित सुंदरलाल शर्मा के कार्यों ने गांधीजी को मोहित कर दिया था. स्वाधीनता संग्राम के सुनहरे पन्नों पर यादों की ऐसी श्रृंखला है जिसके स्मरण मात्र से ही शरीर रोमांच से भर जाता है. शहीद वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिये थे. जिस साहस का परिचय वीर नारायण सिंह ने दिया, वह इतिहास के सुनहरे पन्नों पर दर्ज हो गया. नाकाम अंग्रेजों को वीर नारायणसिंह से दो दो हाथ करने का साहस नहीं था इसलिये उन्हें वीर नारायण को धोखे से गिरफ्त में लेकर फांसी पर लटकाया जाना ही एकमात्र श्रेयस्कर रास्ता सूझा. अंग्रेजों की यह कायराना हरकतें पूरे देश में देखने को मिल रही थी. अंग्रेजों ने झूठे मामले गढ़ कर वीर नारायणसिंह को फांसी के तख्ते पर लटका दिया। वीर नारायणसिंह शहीद होकर छत्तीसगढ़ की भूमि को गौरवांवित कर गये।

छत्तीसगढ़ की मिट्टी के जनपदीय इलाकों में ही वीरों की गाथा नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ अंचल के जंगलों से भी अंग्रेजों के खिलाफ आग जल उठी थी. घनघोर बस्तर के जंगलों से अदम्य साहसी गुंडाधूर ने वीरता का परिचय देकर अंग्रेजों के खिलाफ हल्ला बोल दिया था. गुंडाधूर अकेले नहीं था बल्कि जंगलों में रहने वाले भूमिपुत्रों की बड़ी फौज थी जिसकी अगुवाई गुंडाधूर ने की थी. गुंडाधूर उन्हीं आदिवासी नायकों में एक था जैसे देश के अन्य हिस्सों में ट्ंटया भील, खाज्या नायक आदि-इत्यादि. अंग्रेजों को चुनौती देते और घने जंगलों में गुम हो जाते इन वीरों को ढूंढना अंग्रेजों के लिये टेढ़ी खीर था. यह कम हैरतअंगेज बात नहीं है कि शिक्षा से कोसों दूर इन वीरों को भी अपने वतन की उतनी ही चिंता थी जितना कि अंग्रेज जुल्म से बाखबर जनपदीय वीरों को.  जन और जंगल अंग्रेजों के खिलाफ खड़े थे और अंग्रेज अपने आपको बेबस और मजबूर महसूस कर रहे थे. आजादी के लिये घर-घर और गांव गांव मशाल जल उठी थी. क्या पुरूष, क्या स्त्री और क्या बच्चे, सब देश के लिये कुर्बान होने घर से निकल पड़े थे. 

छत्तीसगढ़ में आजादी का अलख जगाने वालों की सूची बड़ी है। छत्तीसगढ़ में अखबारों ने भी स्वाधीनता आंदोलन को अपनी आवाज दी है। अंचल का प्रमुख समाचार पत्र अग्रदूत की पहचान ही स्वाधीनता संग्राम से रही है। अंग्रेजों को हमेशा भयाक्रांत करने वाले इस अखबार को अनेक दफा अंग्रेजी शासकों के दमन का शिकार होना पड़ा। अखबार का प्रकाशन कई बार बाधित हुआ। आर्थिक रूप से नुकसान भी समाचार पत्र को उठाना पड़ा। यहां तक कि पत्र के सम्पादकों को जेल तक जाना पड़ा लेकिन इन सबके बावजूद अभिव्यक्ति का गला घोंटने में अंग्रेजी शासन नाकाम रही। लोगों को जागृत करने, आंदोलन की सूचना पहुंचाने और देश को पराधीनता की बेडियों से मुक्त करने में इस अखबार ने अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में कदम पीछे नहीं खींचे। इस प्रकार स्वाधीनता संग्राम में छत्तीसगढ़ का योगदान अमूल्य है। स्वाधीनता संग्राम में अलख जगाने और आंदोलन को तेज करने में समूचा छत्तीसगढ़ आगे था। स्वाधीनता संग्राम में छत्तीसगढ़ का योगदान अमूल्य है, अविस्मरणीय है।

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