गुरुवार, 1 सितंबर 2016

तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है



मनोज कुमार

इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो और खुद को बचा ले जाओ। इक्का-दुक्का अखबार और पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में ‘‘टेग लाइन‘‘ होती है- ‘‘यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक की सहमति अनिवार्य नहीं।‘‘इस टेग लाइन से यह बात तो साफ हो जाती है कि जो कुछ भी छप रहा हैवह सम्पादक की सहमति के बिना है। लेकिन छप रहा है तो सहमति किसकी है लेखक अपने लिखे की जवाबदारी से बच नहीं सकता लेकिन प्रकाषन की जवाबदारी किसकी हैसम्पादक ने तो किनारा कर लिया और लेखक पर जवाबदारी डाल दी। ऐसे में यह प्रश्न उलझन भरा है और घूम-फिर कर बात का लब्बोलुआब इस बात पर है कि प्रकाशनों को अब सम्पादक की जरूरत ही नहीं है और जो परिस्थितियां हैं, वह इस बात की हामी भी है। इस ‘‘टेग लाइन‘‘ वाली पत्रकारिता से हम टेलीविजन की पत्रकारिता को सौफीसदी बरी करते हैं क्योंकि यहां सम्पादक नाम की कोई संस्था होती है या जरूरत होगी, इस पर चर्चा अलग से की जा सकेगी। यहां पर हम पत्रकारिता अर्थात मुद्रित माध्यमों के बारे में बात कर रहे हैं। अस्तु। 

भारतीय पत्रकारिता की आज की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। जवबादारी से बचती पत्रकारिता भला किस तरह से अपनी सामाजिक जवाबदारी का निर्वहन कर पाएगी, सवाल यह भी है कि क्या समय अब गैर-जवाबदार पत्रकारिता का आ गया है। यह सवाल गैर-वाजिब नहीं है क्योंकि भारतीय पत्रकारिता ने पत्रकारिता का वह स्वर्णयुग भी देखा है जहां सम्पादक न केवल जवाबदार होता था बल्कि सम्पादक की सहमति के बिना एक पंक्ति का प्रकाशन असंभव सा था। भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि व्यवस्था के खिलाफ लिखने के कारण एक नहीं कई पत्रकारों को जेल तक जाना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी भी जवाबदारी से खुद को मुक्त नहीं किया। उल्टे सम्पादक उपत कर सामने आता और कहता कि हां, इस लेख की मेरी जवाबदारी है और आज के सम्पादक का जवाब ही उल्टा है। मैं कुछ नहीं जानता, मेरा कोई वास्ता नहीं है।

आज की पत्रकारिता में सम्पादक की गौण होती या खत्म हो चुकी भूमिका पर चर्चा करते हैं तो भारतीय पत्रकारिता के उस गौरवशाली कालखंड की सहज ही स्मरण हो आता है जब सम्पादक के इर्द-गिर्द पत्रकारिता की आभा होती थी। हालांकि सम्पादक संस्था के लोप हो जाने को लेकर अर्से से चिंता की जा रही है। यह चिंता वाजिब है। एक समय होता था जब कोई अखबार या पत्रिका, अपने नाम से कम और सम्पादक के नाम पर जानी जाती थी। बेहतर होने पर सम्पादक की प्रतिभा पर चर्चा होती थी और गलतियां होने पर प्रताड़ना का अधिकारी भी सम्पादक ही होता था। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक नहीं अनेक सम्पादक हुए हैं जिन्होंने भारतीय पत्रकारिता को उजाला दिया। समय गुजरता रहा और आहिस्ता आहिस्ता सम्पादक संस्था का लोप होने लगा। प्रकाशन संस्थाओं ने मान लिया कि सम्पादक की जरूरत नहीं है। प्रकाशन संस्था का स्वामी स्वयं सम्पादक हो सकता है और अपने अधीनस्थों से कार्य करा सकता है। उन्हें यह भी लगने लगा था कि सम्पादक करता-वरता तो कुछ है नहीं, बस उसे ढोना होता है। ये लोग उस समय ज्यादा कष्ट महसूस करते थे जब सम्पादक उनके हस्तक्षेप को दरकिनार कर दिया करते थे। एक तरह से यह अहम का मामला था। 
स्वामी या सम्पादक के इस टकराव का परिणाम यह निकला कि सम्पादक किनारे कर दिए गये।

प्रकाषन संस्था के स्वामी के भीतर पहले सम्पादक को लेकर सम्मान का भाव होता था, वह आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने लगा। कई घटनाएं हैं जो इस बात का प्रमाण है जो यह बात साबित करती हैं कि सम्पादक के समक्ष स्वामी बौना हुआ करता था। स्वामी इस बात को जानता था कि सम्पादक ज्ञानी है और प्रकाशन एक सामाजिक जवाबदारी। इस नाते वह स्वयं के अहम पर न केवल नियंत्रण रखता था बल्कि अपने प्रकाशन के माध्यम से लोकप्रिय हो जाने का कोई लालच उसने नहीं पाला था। कहने के लिए तो लोग सन् 75 के आपातकाल के उन काले दिनों का स्मरण जरूर कर लेते हैं जब पत्रकारिता अपने कड़क मिजाज को भूल गई थी। सवाल यह है कि 40 साल गुजर जाने के बाद भी हम पत्रकारिता के आपातकालीन दिनों का स्मरण करेंगे या और गिरावट की तरफ जाएंगे. जहां तक मेरा अनुभव है और मेरी स्मरणशक्ति काम कर रही है तो मुझे लगता है कि सम्पादक संस्था को विलोपित करने का काम आपातकाल ने नहीं बल्कि प्रकाषन संस्था के स्वामी के निजी लालच ने किया है। उन्हें लगने लगा कि कागज को कोटा-सोटा तो खत्म हो गया है। सो आर्थिक लाभ तो घटा ही है बल्कि उसके भीतर स्टेटस का सपना पलने लगा। वह अपने सम्पादक से ज्यादा पूछ-परख चाहता है और चाहता है कि शासन-प्रशासन में उसका दखल बना रहे।

स्वामी के इस लालच के चलते सम्पादक संस्था को किनारे कर दिया गया और सम्पादक के स्थान पर प्रबंध सम्पादक ने पूरे प्रकाशन पर कब्जा कर लिया। एक प्रकाशन संस्था से शुरू हुई लालच की यह बीमारी धीरे-धीरे पूरी पत्रकारिता को अपने कब्जे में कर लिया। पत्र स्वामियों के इस लालच के कारण उन्होंने कम होशियार और उनकी हां में हां मिलाने वाले सम्पादक रखे जाने लगे। गंभीर और जवाबदार सम्पादकों ने इस परम्परा का विरोध किया लेकिन संख्याबल उन सम्पादकों की होती गई जो हां में हां मिलाने वालों में आगे रहे। सम्पादक संस्था की गुपचुप मौत के बाद पत्रकारिता का तेवर ही बदल गया। प्रबंध सम्पादक की कुर्सी पर बैठने वाले सम्पादक के सामने लक्ष्य पत्रकारिता नहीं बल्कि अर्थोपार्जन होता है सो वह पत्र स्वामी को बताता है कि फलां स्टोरी के प्रकाशन से कितना लाभ हो सकता है। स्वामी का एक ही लक्ष्य होता है अधिकाधिक लाभ कमाना। सम्पादक संस्था के खत्म होने और प्रबंध सम्पादक के इस नए चलन ने पेडन्यूज जैसी बीमारी को महामारी का रूप दे दिया।

कुछ भी कहिएयह ‘‘टेग लाइन' वाली पत्रकारिता है मजेदार। जिस अखबार में लेख छापा जा रहा हैउसका सम्पादक-स्वामी कहता है कि यह विचार लेखक के निजी हैं। इसका सीधा अर्थ होता है कि बड़ी ही गैर-जवाबादारी के साथ पत्र-पत्रिकाओं ने लेख को प्रकाशित कर दिया है। न तो प्रकाशन के पूर्व और न ही प्रकाशन के बाद लेख को पढ़ा गया। जब सम्पादक इस तरह की भूमिका में है तो सचमुच में उसकी कोई जरूरत नहीं है। जब एक सम्पादक किसी लेख अथवा प्रकाशन सामग्री को बिना पढ़े प्रकाषन की अनुमति दे सकता है और साथ में इसकी जवाबदारी लेखक के मत्थे चढ़ा देता है तो क्यों चाहिए हमें कोई सम्पादक, जब लेखक को अपने लिखे की जवाबदारी स्वयं ही कबूल करनी है तो सम्पादक क्या करेगा, इन सम्पादकों को कानून का ज्ञान नहीं होगा, यह बात उचित नहीं है लेकिन प्रबंध सम्पादक की हैसियत से वह इससे बचने का उपाय ढूंढ़ते हैं और इसी का तरीका ये ‘‘टेग लाइन वाली पत्रकारिता है। गैर-जवाबदारी के इस दौर में भारतीय पत्रकारिता जिम्मेदार सम्पादक की प्रतीक्षा में खड़ी है जो कहेगी कि छपे हुए एक आलेख नहीं अपितु एक-एक शब्द में सम्पादक की सहमति है और वह इसके प्रकाशन के लिए जवाबदार है। 

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

शोध पत्रिका "समागम" शुक्रवार नईदिल्ली के पन्ने पर

  

"मीडिया चौपाल - 2016" इस बार हरिद्वार में

साथियों "मीडिया चौपाल - 2016" इस बार हरिद्वार में 22-23 अक्टूबर (शनिवार-रविवार) को होगा. आप सभी को आमंत्रण है. इस बार पहले दिन मीडिया पर और दूसरे दिन मीडिया और विकास मॉडल पर चर्चा होगी. आयोजन शुद्धरूप से गैर राजनीतिक है. आयोजन के सम्बन्ध में श्री अनिल पाण्डेय, श्री केसर सिंह, श्री उमेश चतुर्वेदी, श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी, श्री अनिल सौमित्र, श्री स्वदेश सिंह, श्री प्रभाष झा, श्री रितेश पाठक, श्री ऋषभ कृष्ण, श्री भुवन भास्कर, श्री शिवानंद द्विवेदी , श्री प्रणव सिरोही भी जानकारी दे सकते हैं. आपका सुझाव और सहयोग अपेक्षित है. सादर . अनिल सौमित्र के फेसबुक वाल से 

सोमवार, 29 अगस्त 2016

जवाबदारी से दरकिनार करती तस्वीरें


मनोज कुमार
सुबह सवेरे आदत के मुताबिक फेसबुक ऑन किया और सर्च करने लगा तो देखा कि किसी सज्जन ने एक तस्वीर पोस्ट की है जिसमें मां और उसके बच्चे एक लाश को गोदी में उठाये चले जा रहे हैं. सुबह सुबह मन अवसाद से भर गया. सवाल तो मन में अनेक उठे थे और सवालों के जद में खड़ी उड़ीसा के दो गरीब परिवारों की तस्वीरें भी एक बार फिर ताजा हो गई. निश्चित रूप से ये तस्वीरें समाज की संवेदनाओं को खंगाल रही हैं. व्यवस्था पर सवाल उठाती इन तस्वीरों को देखने के बाद सवालों का जंगल की तरह उग आना संभव है. निश्चित रूप से समाज में जो कुछ घट रहा है, अच्छा या बुरा, वह लोगों तक पहुंचना चाहिए. सोशल मीडिया का यह दायित्व भी है कि वह सूचनाओं से समाज को अवगत कराये लेकिन सवाल यह है कि क्या एक जिम्मेदारी के साथ हमारी दूसरी जिम्मेदारी यह नहीं है कि हमारे आंखों के सामने घटती ऐसी भयावह घटनाओं को कैमरे में कैद करने के स्थान पर उसे मदद पहुंचायें? व्यवस्था को आवाज दें और एक गरीब पीडि़त की मदद के लिए आगे आयें? दरअसल, हमने लोकप्रियता पाने के लिए वो सारे उपाय कर लिये हैं जिससे हम लाभ पाते हैं. पहले दो तस्वीरें और हाल ही एक तस्वीर इस बात का प्रमाण है कि हमारे भीतर की संवेदनाएं लुप्त होती जा रही हैं. व्यवस्था दोषी है, इस बात से कौन इंकार करेगा लेकिन इस घटना के हिस्सेदार दोषी नहीं है, यह कहना हमारी गलती होगी.
इस समय हम एक भयावह दौर से गुजर रहे हैं. समय डरावना हो चुका है. सवाल तो हम खूब कर रहे हैं लेकिन जवाब तलाशने की हमने कोशिशें छोड़ दी हैं. हम दूसरे पर दायित्व का बोझ डाल रहे हैं और अपने दायित्व को पीछे छोड़ आये हैं. हम जर्नलिस्ट हैं, एक्टिविस्ट हैं तो क्या हमारा दायित्व व्यवस्था से अलग है? घटना को कव्हर करना हमारा प्रोफेशल ड्यूटी है तो एक गरीब की मदद करना हमारी मॉरल ड्यूटी. हम अपने मॉरल ड्यूटी को क्यों भूल जाते हैं. एक सवाल यह भी है कि देश-दुनिया में गरीब परिवारों की तस्वीरें वॉयरल हो गई लेकिन कितनों ने उस गरीब परिवारों की खैरियत पूछने की जिम्मेदारी ली? शायद इसमें भी मुठ्ठी भर लोग गिने जा सकेंगे क्योंकि अधिकांश लोग तो व्यवस्था, तंत्र, सरकार को कोसने और कटघरे में खड़े करने की कोशिश में लगे हैं और व्यवस्था, तंत्र और सरकार अपने बचाव में तर्क और बहुत हद तक कुतर्क का सहारा ले रही है. यह भी संभव है कि सरकार की तरफ से लाख-पचास हजार देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए और फिर एक नई घटना के साथ बहस शुरू हो. हम जानते हैं कि हमारा समाज और हम-सब आगे पाठ, पीछे सपाट के रास्ते पर चलते हैं. मीडिया तो इस मामले में सर्वोपरि है. यह बात केवल कहने के लिए नहीं है बल्कि उसका पूरा चरित्र ही वैसा है. ध्यान करें कि कुछ साल पहले प्रिंस नाम का बच्चा गड्डे में गिर गया था. पूरा मीडिया प्रिंस को लेकर इतना संवेदनशील हो उठा था कि सारी खबरों के स्थान पर केवल प्रिंस की खैरियत की खबरें दी जा रही थी. इस पूरी घटना को कव्हर करने वाले एंकर का विश्व रिकार्ड बन गया. इसके बाद कितने बच्चे, कब और कहां गड्ढे में गिरे, मीडिया ने जगह तक नहीं दी. हाल ही में मध्यप्रदेश के शिवपुरी में एक बच्चा गड्ढे में गिर गया तो नेशनल मीडिया बेखबर रहा किन्तु रीजिनल चैनल ने उसे कव्हर किया. क्या यूपी और दिल्ली का बच्चा गड्ढे में गिरेगा तो खबर बनेगी? ऐसा ही निर्भया केस के बारे में मीडिया का रवैया रहा. क्या समाज यह मान ले कि निर्भया के बाद बच्चियों पर ज्यादतियां खत्म हो गई हैं? या मीडिया ने अब ऐसी घटनाओं को रूटीन का मान लिया है? 
सोशल मीडिया में गरीब परिवारों की इस हालत के बाद क्या मीडिया ने उस राज्य में इस बात का कोई जमीनी रिपोर्ट की कि वास्तव में इसके पहले भी ऐसे हादसे हुए हैं और आने वाले दिनों में गरीबों के साथ तंत्र ऐसा ही निष्ठुर बना रहेगा? क्या उड़ीसा सरकार की संवेदनशीलता समाप्त हो चुकी है और क्या गरीबों की सेवा का दंभ भरने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं का काम समाप्त हो चुका है? और अकेले उड़ीसा ही क्यों? देश के अनेक राज्य हैं जहां ऐसी हालत है और इन पर मीडिया का कैमरा क्यों नहीं घूमता है. बेटियों के रोज नई योजना बनाने वाले मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की बेटियां रस्सी के सहारे नदी-नाले पार कर स्कूल जाती हैं. क्या यह दृश्य मनोरम है या एक डर पैदा करती है? मीडिया की नजर में क्या दुर्घटना घट जाने के बाद ही इस पर चर्चा होगी. रोज-ब-रोज बेबुनियाद मुद्दों को लेकर चीखते-चिल्लाते लोगों के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है?
यह पूरा मंजर बहुत ही भयानक है. सोचा था कि संचार के साधनों के विकास और विस्तार हो जाने से दुनिया में बदलाव आएगा. अंतिम छोर पर बैठे लोगों को जीने का साधन मुहय्या होगा. समाजवाद की कल्पना सच होगी और समाज में समानता का भाव होगा लेकिन हो उल्टा रहा है. संचार के माध्यमों का विस्तार और विकास तो हुआ है लेकिन जिंदगी सच से दूर भागती नजर आ रही है. इन माध्यमों के संचालन में खर्चों की कोई सीमा नहीं है और इस बेहिसाब खर्चे का हिसाब-किताब पेडन्यूज जैसी बीमारी से किया जा रहा है. यह साबित करना मुश्किल होगा कि कौन सी खबर पेडन्यूज है और कौन सी नहीं लेकिन जो खबरें सामाजिक सरोकार से परे हों, उसे इसका हिस्सा माना जाना चाहिए. फिर वह उड़ीसा की वह दर्दनाक तस्वीर ही क्यों ना हो. कांधे पर लाश ढोती खबरें हम सिहरा देती हैं लेकिन पेज थ्री की पत्रकारिता करने वाली हमारी नयी पीढ़ी एक सच से वाकिफ नहीं होगी कि इसी तथाकथित सभ्य समाज में दलित की लाश के साथ कैसा सुलूक किया जाता है. सच जानना हो तो एक बार महान फिल्मकार सत्यजीत रे की फिल्म ‘सद्गति’ जरूर देख लें. पत्रकारिता का सच जानना हो तो शशि कपूर अभिनीत फिल्म ‘न्यू देहली टाइम्स’ जरूर देखें. इस तरह की फिल्में समाज और पत्रकारिता का आईना है जिसे देख और समझ कर हम अपनी समझ बढ़ा सकते हैं. जिस तरह उड़ीसा की तस्वीरें सच हैं, उसी तरह सच यह है कि हम अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं.  

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

दिव्यांगों की जिंदगी ने पकड़ी रफ्तार


-अनामिका
दिव्यांग विजय के लिए यह सब कुछ एक सपना सच होने की तरह है. उसे कभी यकीन भी नहीं था कि उसकी जिंदगी कभी रफ्तार भर सकेगी लेकिन आज लोग उसे देखकर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं. यही नहीं, वह समाज में और के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है जब लोग कहते हैं कि विजय जब नि:शक्ता को ठोकर मारकर जिंदगी में कामयाबी हासिल कर सकता है तो हम सशक्त क्यों नहीं. विजय की कहानी रोमांचक नहीं है. एक मध्यम आय वर्गीय परिवार का यह चिराग पोलियो के कारण अपने पैरों की ताकत खो चुका था. पैरों में भले ही वह ताकत न हो लेकिन मन में हौसला कहीं ज्यादा था. जिंदगी को उसने बोझ नहीं माना और खुद पर भरोसा कर बिजली मैकेनिक के रूप में ख्याति अर्जित कर ली. कुछ इसी तरह की कहानी उस मासूम करन की भी है जो 5वीं कक्षा का विद्यार्थी है लेकिन विजय की तरह पोलियो का शिकार है. स्कूल तो जाता है लेकिन कई तरह की मुसीबतें उसका पीछा किया करती थी लेकिन आज सारी मुसीबतों का अंत हो गया है. विजय की तरह वह भी मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह के प्रयासों से बैटरी चलित ट्रायसायकिल पाकर कामयाबी की तरफ तेजी से कदम बढ़ा रहा है.
विजय राजनांदगांव जिले का रहने वाला है तो करन मुंगेली जिले का. ये दो उदाहरण हैं हमारे सामने जिनके लिए सरकार हर कदम पर सहायता के लिए खड़ी है दिव्यंगता को पराजित करने के लिए. उल्लेखनीय है कि राज्य शासन द्वारा दिव्यांग के कल्याण हेतु कई योजनाएं संचालित की जा रही है। योजनाओं का लाभ लेकर आत्म निर्भर बन रहे हैं। राज्य समाज कल्याण विभाग में संचालित कृत्रिम अंग उपकरण प्रदाय योजना के तहत ट्रायसिकल, बैशाखी एवं अन्य सामग्री दिव्यांगों को उपलब्ध कराये जाते हंै जिससे उनका जीवन सहज और सुगम बन सके. मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह द्वारा कई बार औचक निरीक्षण करने के कारण दिव्यांगों को मिलने वाले लाभ में देरी या कोई गड़बड़ी की आशंका लगभग नहीं के बराबर है. राज्य सरकार की मंशा है कि समूचे छत्तीसगढ़ प्रदेश का हर दिव्यांग सशक्त हो और इसके लिए नित प्रयास किए जा रहे हैं. विजय और करन तो इस योजना का उदाहरण मात्र है. जो दिव्यांग अपने पैरों पर खड़े होकर कामयाबी की तरफ बढ़ रहे हैं, वह यह संदेश भी दे रहे हैं कि पोलियो का टीका समय पर लगवायें ताकि कोई और दिव्यांग न बनें. 
राज्य शासन द्वारा मिली बैटरी चलित ट्रायसायकिल से विजय की जिंदगी को नई रफ्तार मिल गई है। विजय अब  इस बैटरी चलित ट्राईसायकिल से अपने हुनर को आसानी से अपने और अपने परिवार  की सुख-सुविधा और समृद्धि के लिए भरपूर उपयोग कर पा रहे हैं। विकासखंड खैरागढ़ के ग्राम आल्हा नवांगांव से 7 से 8 किलोमीटर दूर बिजली से चलने वाले उपकरणों की मरम्मत करने की दुकान में जाना हो या आस-पास के गांव में किसी का पंखा, किसी का कुलर सुधारना हो, ये सब काम दिव्यांग विजय कुमार साहू अब आसानी से पहले से आधे समय में पूरा कर पा रहे हैं। दिव्यांगता को अपनी ताकत बनाकर इलेक्ट्रिशियन के हुनर से सफलता और खुशहाली की मंजिल पाने में राज्य शासन द्वारा दी गई बैटरी चलित ट्रायसायकिल महत्वपूर्ण सीढ़ी की भूमिका निभा रही है। ट्रायसायकिल पाकर जिंदगी को सरल और आसान बनाने के लिए विजय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की संवेदनशीलता के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करता है. 
पोलियो के कारण पैरों में आई दिव्यांगता को अपनी ताकत बनाकर स्वयं के पैरों पर खड़े होने के उनके संकल्प ने उन्हें आत्मनिर्भर बनकर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण सम्मानजनक तरीके से करने के लिए प्रेरित किया। शुरू में उनके पास जो ट्रायसायकिल थी, उसे हाथों से काफी परिश्रम कर चलाना पड़ता था। विजय को अपने घर से दुकान तक जाने में उन्हें काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता था। आल्हा नवांगांव निवासी दिव्यांग विजय साहू बताते हंै कि वे अपने गांव से सात-साढ़े सात किलो मीटर दूर सहसपुर दल्ली के बाजार स्थित एक इलेक्ट्रीक दुकान में बिजली से चलने वाले खराब पंखे, कूलर आदि सुधारने का काम करते हैं। वे इस क्षेत्र में अच्छे मोटर बाइंडिंग करने वाले इलेक्ट्रिशियन के रूप में जाने जाते हैं।  सायकिल चलाने के लिए हाथों से अत्यधिक बल लगाने से शारीरिक श्रम के कारण थकान होती थी जिससे स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था। इस कारण से वे सप्ताह में दो-तीन दिन ही दुकान जाकर काम कर पाते थे। जिससे उन्हें उस हिसाब से पारिश्रमिक भी बहुत कम मिलता था और उतने रुपयों में अपनी पत्नी और वृद्ध मां के साथ जीवनयापन करना बहुत कठिन हो गया था। कभी-कभी आस-पास के गांवों से पंखा, कुलर सुधारने के ऑर्डर मिलने पर भी वे चाहकर भी उस गांव तक नहीं पहुंच पाते थे। 
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा बैटरी से चलने वाली मोटराईड ट्रायसायकिल मिलने से उनका कहीं भी आने-जाने का सफर अब बिना थके आसानी से पूरा हो जाता है। अब वे अपने घर से सहसपुर दल्ली की इलेक्ट्रिक दुकान तक रोज नियमित रूप से यादा से यादा 15 मिनट में बिना किसी श्रम और ताकत खर्च किये आसानी से पहुंच जाते हैं। विजय अब पहले से ज्यादा काम इस इलेक्ट्रिक दुकान में कर पाते हैं। जिससे उनकी आमदनी भी पहले की अपेक्षा प्रतिदिन 100-150 रूपए तक बढ़ गई है। इसके साथ ही अब वे आस-पास के गांवों में भी पंखा, कूलर सुधारने और मोटर बाइंडिंग का काम करने के लिए आसानी से पहुंचते हैं।  
सरकार की योजनाएं दिव्यांगों के लिए वरदान साबित होकर उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रही है। उन्होंने बताया कि राजनांदगांव जिले में चलाया गया दिव्यांगों का स्वास्थ्य परीक्षण कर उन्हें मेडिकल सर्टिफिकेट देने का अभियान जिले के सभी दिव्यांगों को शासकीय योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ दिलाने का रास्ता खोल रहा है। अपनी दिव्यांगता के आधार पर पेंशन योजना हो या कृत्रिम अंग लेना हो, स्वरोजगार के लिए लोन लेना हो ऐसी कई योजनाएं अब दिव्यांग जानने लगे हैं और दिव्यांगता को कमजोरी न बनाकर सफलता की प्रेरक सीढ़ी के रूप में स्वीकार कर रहे हैं। मासूम करन की जिंदगी में भी मोटराईड ट्रायसायकिलो ने विश्वास भर दिया है. लोरमी के सुदूर वनक्षेत्र ग्राम अतरिया के चंदलाल का बेटा करन बचपन से विकलांग था. इस कारण उसे स्कूल आने-जाने से परेशानी हो रही थी। करन प्राथमिक शाला अतरिया में कक्षा 5वीं में पढ़ता है। बेटे की दिव्यांगता से पिता परेशान था लेकिन खस्ताहाल आर्थिक मजबूरी उसे बेबस बनाये रखी थी. वह समझ नहीं पा रहा था कि अपने बच्चे को कैसे सुखी करे तभी उसे दिव्यांगों के लिए सरकार की योजना की जानकारी मिली.
चंदलाल के मन में शंका तो थी लेकिन एक विश्वास भी कि डॉ. रमनसिंह सरकार समाज की भलाई के लिए बहुत कुछ कर रही है. बस, फिर क्या था विश्वास की जीत हुई और बेटे करन को बहुत मामूली औपचारिकता के बाद मोटराईड ट्रायसायकिलो मिल गई. जनसमस्या निवारण शिविर में समाज कल्याण विभाग अधिकारी द्वारा फार्म भराकर जमा कराया गया। जब ट्रायसिकल मिलने की जानकारी दी गई तो बहुत खुशी हुई। करन को ट्रायसिकल मिल जाने से स्कूल आने-जाने से सहुलियत हो गया। अब वे ट्रायसिकल से स्कूल जायेगा। माता-पिता को स्कूल पहुंचाने की चिंता दूर हो गई है। इस तरह सरकार के प्रयासों से दिव्यांगों को न केवल सुविधा मिल रही है बल्कि उनके भीतर का खोया आत्मविश्वास जाग रहा है जो कामयबी का सबब बन रहा है. 

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

१५ अगस्त को परतंत्रता की छांह में कैद था भोपाल


मनोज कुमार
१५ अगस्त १९४७ को जब भारत वर्ष का गांव-गांव जश्ने आजादी में डूबा था, तब भोपाल की परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाया था. तत्कालीन नवाब हमीदुल्ला खां के उस फैसले से हुआ था जिसमें उन्होंने अपनी रियासत का विलय से इंकार कर दिया था। यह वह समय है जब भोपाल रियासत की सरहद में वर्तमान सीहोर व रायसेन जिला भी शामिल था। लम्बे जद्दोजहद के दो साल बाद ३० अप्रेल १९४९ को भोपाल रियासत का विलय होने के साथ ही वह स्वतंत्र भारत का अभिन्न अंग बन गया। १ मई १९४९ को भोपाल में पहली दफा तिरंगा लहराया था। इस दिन भाई रतनकुमार गुप्ता ने पहली दफा झंडावदन किया। 
उल्लेखनीय है कि १५ अगस्त १९४७ को भोपाल सहित जूनागढ़, कश्मीर, हैदराबाद और पटिलाया रियासत ने भी विलय से इंकार कर दिया था। भोपाल नवाब चेम्बर ऑफ प्रिंसेस के अध्यक्ष थे। उस समय जब पूरा देश स्वतंत्र होने का जश्न मना रहा था तब भोपाल रियासत में खामोशी छायी हुई थी। आजादी नहीं मिल पाने के कारण अगले वर्ष १९४८ को भी भोपाल में खामोशी छायी हुई थी। नवम्बर १९४८ में विलनीकरण आंदोलन का आरंभ हुआ और जिसकी कमान भाई रतनकुमार ने सम्हाली थी। उनके साथ जिन लोगों ने विलनीकरण के समर्थन में आगे आये उनमें डॉ. शंकरदयाल शर्मा, खान शाकिर अली खान, मास्टरलाल सिंह, उद्धवदास मेहता, प्रोफसर अक्षय कुमार जैन, विचित्रकुमार सिन्हा, शांति देवी, मोहिनी देवी, रामचरण राय, तर्जी मशरिकी, गोविंद बाबू एवं भोगचंद कसेरा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। भोपाल में चतुरनारायण मालवीय एवं मास्टर लालसिंह ने हिन्दू महासभा की स्थापना की थी। खान शाकिर अली खान ने अंजुमने खुद्दामे वतन का गठन किया था। विलनीकरण आंदोलन की कमान सम्हालने वाली उस समय की संस्थाओं में हिन्दू महासभा, आर्य समाज और प्रजा मंडल ने अपनी महती भूमिका निभायी। नवम्बर में आरंभ हुआ विलनीकरण आंदोलन अगले साल सन् १९४९ के फरवरी माह में एकदम भड़क उठा। लगभग चालीस दिनों तक भोपाल बंद रहा। जुलूस, धरना, प्रदर्शन और गिरफ्तारियां होती रहीं। 
विलनीकरण आंदोलन में महिलाओं की भूमिका भी उल्लेखनीय रही। पुरूषों की गिरफ्तारी के बाद महिलाओं ने मोर्चा सम्हाल लिया। महिलाओं के सामने आने के बाद तो विलनीकरण आंदोलन एक नये स्वरूप में दिखने लगा। उस समय सिर पर बांधे कफनवा हो शहीदों की टोली निकली लोगों में जोश जगा रहा था। भोपाल विलनीकरण आंदोलन में समाचार पत्रों की भी अहम भूमिका रही। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी कर्मवीर छाप कर नि:शुल्क वितरण के लिये भिजवाते थे तो भाई रतनकुमार का समाचार पत्र नईराह ने विलनीकरण आंदोलन को नईदिशा, जोश और उत्साह से भर दिया था। विलनीकरण आंदोलन अहिंसक नहीं रहा। आंदोलन को दबाने के लिये कई स्तरों पर कोशिशें हुर्इं। अत्याचार किये गये और आखिरकार खून-खराबा भी हुआ। 
बरेली के बोरास गांव में हुए गोलीचालन में तीन आंदोलनकारी शहीद हो गये। इस गोलीबारी से भोपाल की जनता बेहद आहत हुई। नवाब हमीदुल्ला शायद विलनीकरण समझौते के लिये कभी राजी नहीं होते लेकिन हैदराबाद में हुई सैनिक कार्यवाही ने उनके हौसले पस्त कर दिये। वे भीतर ही भीतर डर गये थे। विलनीकरण आंदोलन भी अपने पूरे शबाब पर था। इसी बीच प्रजा मंडल के अध्यक्ष बालकृष्ण गुप्ता दिल्ली जाकर तत्कालीन गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल से मुलाकात की और आग्रह किया कि वे नवाब हमीदुल्ला की अनुचित मांगों को न मांगा जाए। चौतरफा दबाव के सामने आखिरकार नवाब हमीदुल्ला ने विलनीकरण करार पर दस्तखत करने के लिये राजी हुए। केन्द्र सरकार के राज्य सेल के सचिव पी. मेनन और नवाब हमीदुल्ला खान ने समझौते पर दस्तखत किया। इस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के दो वर्ष बाद भोपाल को भी स्वतंत्रता मिल पायी थी।

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...