मंगलवार, 19 मई 2020

मटके के आंसू



मनोज कुमार
        जो मटका हमारे सूखे गले को अपने भीतर समाये ठंडे जल से तर करता रहा है। आज वही मटका आंसूओं में डूबा हुआ है। कोरोना ने मनुष्य को तो मुसीबत में डाला ही है। मटका भी इसका षिकार हो चुका है। बात कुछ अलग किसम की है। आपने कभी मटके से बात की हो तो आप समझ सकते हैं। आपने मटके का पानी तो बार बार पिया होगा लेकिन जिस स्नेह के साथ वह आपको अपने भीतर रखे जल से आपको राहत देता है, उसे कभी महसूस किया हो तो आपको मटके का दर्द पता चलेगा। मटका चिल्लाकर अपना दुख नहीं बता सकता है। वह अपने भीतर का दर्द भी नहीं दिखा सकता है। उसे आप निर्जीव मानकर चलते हैं। लेकिन सही मायने में वह भी आपको महसूस करता है। कोरोना के इस दबे आक्रमण के कारण मटका दरकिनार कर दिया गया है। मटका कह रहा है-भाई इस समय मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है। मैं किसी के पेट की आग नहीं बुझा सकता हूं, यह सच है। लेकिन यह भी सच है कि मैं मनुष्य के प्यास को बुझा सकता हूं। मेरी शक्ति को पहचानो। आज तक मैंने इसके सिवा किया क्या है? तपती सड़कों पर चलते मनुष्य को एक गिलास ठंडा पानी ही तो दिया है। कुछ लोग मुझे संवार कोई सौ-पांच सौ मीटर की दूरी पर रख देते थे। मेरे ऊपर लिपटा लाल रंग का कपड़ा मेरी वर्दी हुआ करता है। किसी भी राहगीर को मैं इसी कपड़े से पहचान कर अपने पास बुला लेता था। आज मैं बेबस हूं। हाषिये पर पड़ा हूं। यकिन मानिए चाहे बोतलबंद पानी जितना बांट लीजिए, वह पीने का काम आएगा लेकिन मेरे भीतर सहेज कर रखा गया जल तृप्ति देता है। मन को सुकून देता है। आज राहगीर प्यासा है और मैं बैचेन।
         मटके के आंसू आप देख नहीं सकते हैं। मटके के आंसू को आपको महसूस करना होगा। जिस तरह आप हवा को पकड़ नहीं सकते। सूरज की किरणों को बांध नहीं सकते। चंद्रमा की शीतलता का अहसास मात्र कर सकते हैं, वैसे ही मटके की पीड़ा को आप महसूस कर सकते हैं। मई माह की तपन अपनी जवानी पर है। इस बार फकत अंतर इत्ता सा है कि लॉेकडाउन के कारण पर्यावरण साफ है। धूप चुभ नहीं रही है। थोड़ी सी राहत शाम को होने वाली तूफानी हवा से मिल जाती है लेकिन मटके के ठंडे पानी का विकल्प तो अभी भी नहीं है। घड़े को इस बात की भी षिकायत नहीं है कि वह घरों में कैद होकर रह जाए। वह तपती दोपहरी में बैठकर लोगों को अपनी छांह देना चाहता है। वह उस श्रमिक की भांति अपना कर्तव्य पूरा करना चाहता है जो ऊंची इमारत तो बना देता है लेकिन उसे अपना घरौंदा कभी नहीं मानता है।
          मटका महज पानी भरने की माटी का एक बर्तन नहीं है। मटका भारतीय समाज की परम्परा है। भारतीय संस्कृति का वाहक है मटका। मटका मायने धड़कन है समाज की। शोक हो या सुख, मंगल हो या अमंगल। हर वक्त मटका आपके हमारे साथ होता है। भारतीय समाज की परम्परा से नयी पीढ़ी वाकिफ नहीं है। बहुतेरे नए बच्चों को तो इस बात की खबर भी नहीं है कि गर्मी के दिनों में नए मटके में जल भरने का वक्त कौन सा होता है? उन्हेंं तो हमने यह भी नहीं सिखाया कि मटके में जल भरने के पहले उसका नेग किया जाता है। यह नेग मटके का मान है। संस्कृति और परम्परा के बीच धड़कन की तरह मटका हमारे जीवन में हर वक्त मौजूद रहता है। हमारे घर में अम्मां थीं, फिर भाभी आयीं। इन लोगों को उनके बुर्जुगों ने सिखाया था कि गर्मी के दिनों में मटके में कब जल भरना चाहिए? यही नहीं, जल भरने के साथ उपयोग करने के पहले मटके का नेग भी करना जरूरी होता है। यह नेग दरअसल एक तरह का उऋण होना है। अम्मां कहती थी कि मई माह में जब आखातीज हो जाए, उसके दूसरे दिन मटके में स्वच्छ जल भरा जाए। इस जल भरे मटके की पूजा कर सिक्का जल के भीतर डाला जाए। जल से भरा पहला मटका मंदिर में दिए जाने की रिवाज को भी अम्मां बताती थीं। फिर हैसियत के अनुरूप तीन, पांच, सात यानि विषम संख्या में मटके सार्वजनिक स्थानों में रखे जाते थे। इसके बाद घर के उपयोग के लिए मटका रखा जाता था। प्रत्येक मटके पर सुंदर सा लाल रंग का कपड़ा लपेटा जाता था। कहने के लिए यह लाल कपड़ा जल को ठंडा रखने का काम आता है। लेकिन अम्मां कहती थीं जो मटका हमें शीतलता प्रदान करता है, क्या उसे कपड़ा नहीं पहनाओगे? इस तरह एक मटके का पूरे विधि-विधान के साथ स्थापना होती थी। अब ना अम्मां रही और ना बताने वाला कि मटका कब भरा जाए।  
       यह परम्परा अभी पूरी तरह तिरोहित नहीं हुई है लेकिन परम्परा को घात तो बहुत पहले से लगने लगा था। मटके की उपयोगिता नए जमाने में खत्म होती चली गई। फास्टफूड वाले बच्चों के गले में शुद्ध जल की जगह केमिकल से भरा कोलड्रिंक उतरने लगा था। पीने के लिए मटके की घर से विदाई हो चुकी थी। रेफ्रिजेटर में रखा पानी का बोतल उनकी प्यास बुझा रहा था। एक तरह से जैसे बूढ़े मां-बाप की घर से विदाई हो रही है या सिलसिला शुरू हो चुका है, वैसी ही विदाई मटके की घरों से होने लगी। आपाधापी और दौड़भाग के इस दौर में हर कोई जल्दी में है। शॉर्टकट से कुछ मिला या नहीं मिला, यह तो समय बताएगा लेकिन बीमारी और तनाव ने जैसे जीवन को छोटा कर दिया है। ऐसे में मटके की किसे और क्यों जरूरत है। आज मटका जरूर इस बात के लिए आंसू बहा रहा है कि इस संकट में उसे दरकिनार कर दिया गया है लेकिन सच तो यह है मटका हमारे जीवन से बहुत पहले दूर जा चुका है। शहरों से परे कस्बों बल्कि गांव में कहीं कहीं मटके दिख जाते हैं। मटका जो हमारी परम्परा और संस्कृति का वाहक था, वह आज फैषन की वस्तु बन गया है। मटका अब हमारी संस्कृति नहीं बल्कि फैषन है।
          मटके के साथ सुराही तो शायद चलन से बाहर ही हो गया है। कभी फिल्मों में तो कथा-साहित्य में जब नायिका के गर्दन का उल्लेख होता है तब सुराही का जिक्र आता है। वो सुराहीदार वाली गर्दन। हालांकि लिखने-बोलने में भी सुराहीदार गर्दन का अब बहुत उपयोग नहीं होता है। कुछ पुराने परिवारों में या मध्यमवर्गीय परिवारों में सुराही देखने को मिल जाएगी। वहां भी सुराही फैषन के लिए है। उपयोग के लिए नहीं। बाजार ने मटका और सुराही के साथ परम्परा को निगल लिया है। बोतल और पाउच के आदत ने हमारा जीवन ही खराब नहीं किया है बल्कि पर्यावरण को भी सत्यानाष किया है। कोरोना को मैं आपके साथ कोस रहा हूं। दबे पांव उसने हमारे जीवन में तूफान खड़ा कर दिया है लेकिन इसी कोरोना ने भागती जिंदगी को कुछ दिनों के लिए ही सही, अपनी जगह पर रोक दिया है। इस रूकी जिंदगी के चलते पर्यावरण का साफ हो जाना, जीवन के नए मायने सिखा रहा है। तो क्या लॉकडाउन में बंद घरों में अपनी नई पीढ़ी को हम मटका और सुराही की कहानी नहीं सुनाएंगे? (तस्वीर गूगल से साभार )

शनिवार, 9 मई 2020

इस बार बाजार को ‘अम्मां’ याद आएगी


मनोज कुमार
ज्यादतर लोग भूल गए हैं कि 10 मई है। 10 मई मतलब वैश्विक तौर पर मनाया जाने वाला ‘मदर्स डे’। ‘मदर्स डे’ मतलब बाजार का डे। इस बार यह डे, ड्राय डे जैसा होगा। बाजार बंद हैं। मॉल बंद है। लोग घरों में कैद हैं तो भला किसका और कौन सा ‘मदर्स डे’। अरे वही वाला मदर्स डे जब चहकती-फुदकती बिटिया अम्मां से नहीं, मम्मी से गले लगकर कहती थी वो, लव यू ममा... ममा तो देखों मैं आपके लिए क्या गिफ्ट लायी हूं... इस बार ये सब कुछ नहीं हो पाएगा। इस बार मम्मी, मम्मा नहीं बल्कि मां और अम्मां ही याद आएगी। ‘मदर्स डे’ सेलिब्रेट करने वाले बच्चों को इस बार अम्मां के हाथों की बनी खीर पूड़ी से ही संतोष करना पड़ेगा। मम्मा के लिए गिफ्ट लाने वाले बच्चे अब अम्मां कहकर उसके आगे पीछे रसोई घर में घूूमेंगे। बच्चों से ज्यादा इस बार बाजार को अम्मां याद दिलाएगी। मां के लाड़ को, उसके दुलार को वस्तु बना दिया था बाजार ने। यह घर वापसी का दौर है। रिशतों को जानने और समझने का दौर है। कोरोना के चलते संकट बड़ा है लेकिन उसने घर वापसी के रास्ते बना दिए हैं। ‘मदर्स डे’ तो मॉल में बंद रह गया लेकिन किचन से अपनी साड़ी के पल्लू से जवान होती बिटिया के माथे से पसीना पोंछते और उसे दुलारने का मां का खालीपन इस ‘मदर्स डे’ पर भरने लगा है।

साल 2020 के शुरूआत में ही कोरोना ने दस्तक देना शुरू कर दिया था। दबे पांव मौत के इस साये से हम बेखौफ थे लेकिन दिन गुजरने के साथ हमारी घर वापसी होने लगी। मार्च के दूसरे पखवाड़े में तो लोग लॉकडाउन हो चुके थे। कुछ दुस्साही लोगों को परे कर दे ंतो अधिसंख्य अपने घरों में थे। भारतीय परिवारों में मार्च के बाद से छोटे छोटे पर्व की शुरूआत हो जाती है। अक्षय तृतीया के साथ ही शादी-ब्याह का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। लेकिन कोरोना ने सब पर पाबंदी लगा दी। कह दिया घर में रहो। अपनों को जानो और अपनों को समझने की कोशिश करो। इसी दरम्यान वैश्विक रूप से मनाया जाने वाला ‘मदर्स डे’ भी आकर निकलने वाला है। बाजार ठंडे हैं। शॉपिंग मॉल के दरवाजों पर ताले जड़े हैं। ऑनलाईन भी ममा को प्यार करने वाला तोहफा नहीं मिल रहा है। सही मायने में इस बार ‘मदर्स डे’  की जगह मातृ दिवस होगा। बच्चे मां के हाथों का बना खाना खाकर तृप्त हो रहे हैं। मां स्वयं को धन्य मान रही है कि ममा से वह एक बार फिर अम्मां बन गई है। कोई नकलीपन उन्हें छू तक नहीं पा रहा है। ना महंगे तोहफे हैं और ना बड़े होटल में ‘मदर्स डे’ की कोई पार्टी। सच में इस बार अम्मां का दिन है। डे की जगह उत्सव का दिन।

‘मदर्स डे’ तो नहीं मना पा रहे हैं। लेकिन एक सवाल मन में है कि क्या जो लोग बड़े उत्साह से ‘मदर्स डे’ पर महंगे तोहफे अपनी ममा को दिया करते थे, आज वे अपनी अम्मां के पैर छूकर आशीर्वाद ले रहे हैं? शायद नहीं क्योंकि ‘मदर्स डे’ बाजार का दिया दिन है। जिनके जेब में दम है, उनके लिए ‘मदर्स डे’ है और जो कंगाल हैं, उनके लिए बाजार में कोई जगह नहीं है। ‘मदर्स डे’ मनाने वाले हमारे बच्चे अपनी संस्कृति और परम्परा से कब के बेगाने हो चुके हैं। माता-पिता के चरण स्पर्श करना  उन्हें गंवारा नहीं है। वे हर बार, हर बात पर उपहार देकर अपना प्यार जताते हैं। इस बहाने ही सही, अपने बड़े और कमाऊ बन जाने का एहसास भी माता-पिता को कराते हैं। यह प्यार नहीं है बल्कि अर्थ और शक्तिवान बन जाने का प्यार है। अम्मां प्यार नहीं करती है। वह स्नेह करती है। बाजार इस बार हार गया है। कोरोना ने उसे भी परास्त कर दिया है। अम्मां जीत गई है। हालांकि बच्चों के लिए बार बार और हर बार अम्मां को हारना ही पसंद है।

दो दशक से ज्यादा समय से बाजार ने समाज को निगल लिया है। समाज अब अपनी नजर से नहीं चलता है। समाज की चलती भी नहीं है। समाज की मान्य परम्परा और स्वभाव तिरोहित होते जा रहे हैं। बाजार समाज को निर्देशित कर रहा है। एक हद तक नियंत्रित भी। बाजार कहता है वह सर्वोपरि हो चुका है। हमारी समूची जीवनशेली को बाजार ने बदल दिया है। हम और आप वही सोचते हैं। वही करते हैं। वही देखते और सुनते हैं। जो बाजार हमें देखने सुनने को कहता है। कौन सा कपड़ा हमारे देह को फबेगा, यह हम तय नहीं करते हैं। बाजार तय करता है कि हमें क्या पहनना है। भले ही उस पहनावे में हम भोंडे और बदशक्ल दिखें। बदशक्ली और बदजुबानी हमारी जीवनशेली बन चुकी है। इसे हम फैशन कहते हैं। बाजार कहता है कि ऐसा नहीं करोगे तो पिछड़ जाओगे। हम आगे बढ़ने के फेर में कितने पीछे चले जा रहे हैं, इस पर हम बेखबर हैं।

नए जमाने की ममा अपने बच्चों को स्तनपान कराने से बचती है क्योंकि उसकी ब्यूटी खराब हो जाएगी। वह अपने नन्हें बच्चे को नैफी पहनाना पसंद करती है। वह इस बात से भी बेखबर है कि बच्चे को मालिश की जरूरत है। खान-पान के लिए उसके पास वक्त नहीं है। बाजार कहता है कि जैसे नैफी खरीदो वैसे ही उसके लिए महंगे ब्रांड के तेल ले आओ। आया रखो क्योंकि तुम आफिस में काम करती थक जाती हो। तुम्हारे लिए यही बच्चा ‘मदर्स डे’ का आगे गिफ्ट लेकर आएगा। दोनों खुश और बाजार आनंद में।  बाजार अम्मां को अपनी गिरफ्त में नहीं ले पाता है तो कहता है ये पुराने जमाने की हैं। अब जमाना बदल गया है। इन्हें कुछ भी नहीं मालूम। लेकिन एक अम्मां है जो टकटकी लगाए देख रही है। उसे ममा कहलाना पसंद नहीं है। उसका दुलार अम्मां सुन लेने में है। वह जानती है कि दादी-नानी के हाथों की मॉलिश से बच्चा खिलखिला उठता है। आया तो एक टूल है। उसके पास हुनूर है। दुलार नहीं। उसके पास मां का प्यार भी नहीं है। वह नौकरी करती है। अम्मां हौले से नए जमाने की बेटी-बहू को समझाती है मां का दूध बच्चे के लिए अमृत होता है। इससे मां की सुंदरता निखरती है। कम नहीं होती है। उसके पास अनुभव का खजाना है। वह अपने आपमें किताब है। एक चलती फिरती जीवन की पाठशाला है।

कोरोना तुझे ममा से अम्मां के पास ले आने के लिए शुक्रिया तो बोलना चाहता हूं लेकिन बोल नहीं पाऊंगा। तूने अम्मां को उसके बच्चे लौटाए। ‘मदर्स डे’ के नए मायने समझाए। प्रकृत्ति को उसका वैभव वापस किया। लोगों को जिंदगी का अर्थ भी समझाने में तूने अपना रोल अदा किया। लेकिन फिर भी हम तुझे नाशुक्र कहेंगे क्योंकि तूने किसी का पिता, किसी का बेटा और किसी की मां तो किसी से उसकी बहन छीन लिया। तूने काम कुछेक अच्छे किए लेकिन तेरा अपराध इससे कम नहीं हो जाता है। हम तुझे याद करेंगे लेकिन उस तरह से जिसने दिया बहुत कुछ तो उससे ज्यादा छीन भी लिया। खैर, बाजार को इस बार अम्मां याद आ रही है क्योंकि बाजार से मदर गायब है। इस बार ‘मदर्स डे’ नहीं लेकिन किचन की मां का उत्सव हमें याद रहेगा। आंगन में तुलसी के पौधे को पानी देते। राधा-श्याम के लिए भजन गाती अम्मां जब आंखें तरेर कर कहती है चुप हो जाओ तो लगता है हर घर में, सही मायने में ‘मदर्स डे’ का उत्सव हो गया है।

शुक्रवार, 1 मई 2020

लाल सलाम नहीं, यश बॉस


मनोज कुमार

फादर्स डे और मदर्स डे मनाने वाली साल 2000 के बाद की पीढ़ी को तो पता ही नहीं होगा कि हम लोग 1 मई को मजदूर दिवस भी मनाते हैं। इसमें उनकी गलती कम है क्योंकि लगभग लगभग इस दौर में मजदूर आंदोलन हाषिये पर चला गया है। लाल सलाम की गूंज सुनाई नहीं देती है। यश बॉस अब एकमात्र नारा बन गया है। यश बॉस शब्द लालकारपेट के लोगों को सुहाता है। लाल सलाम तो उनके लिए हमेशा से पीड़ादायक रहा है। आज जब हम एक बार फिर मजदूर दिवस की औपचारिक स्मृतियों को याद करते हैं तो यह भी याद नहीं आता कि मजदूर -मालिक संघर्ष पर इन दो दषकों में कोई प्रभावी फिल्म बनी हो। यह भी याद नहीं आता कि लेखकों की बड़ी फौज आ जाने के बाद किसी लेखक की मजदूर-मालिक संघर्ष को लेकर कोई कालजयी रचना लिखी गई हो। सिनेमा के पर्दे पर मालिक-मजदूर को लेकर फिल्म का नदारद हो जाना या कथा-साहित्य में इस विषय पर लेखन का ना होना भी इस बात का पुख्ता सबूत है कि मजदूर आंदोलन लगभग समाप्ति पर है। क्योंकि समाज में जो घटता है, वही सिनेमा और साहित्य का विषय बनता है लेकिन जब समाज में ही इस विषय पर शून्यता है तो भला कैसे और कौन सी फिल्म बने या कथा-साहित्य रचा जाए।

मजदूर आंदोलन लगभग दम तोड़ता नजर आ रहा है। श्रमिकों नेताओं परम्परागत ढर्रे पर चलते रहे और साथ में यह सोच भी बनी कि मजदूर के कारण औद्योगिक विकास प्रभावित हो रहा है। मजदूरों का भी आंदोलनों से मोहभंग होना एक बड़ा कारण माना जा सकता है। यह और बात है कि संगठित क्षेत्र के श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा में इजाफा होने से फायदा हुआ है असंगठित क्षेत्र के कामगार आज भी परेशान है। असंगठित क्षेत्र में भी खास तौर से दुकानों, ठेलों, खोमचों, चाय की स्टॉलों, होटलों−ढाबों पर काम करने वालों की तकलीफें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। कल कारखानों में भी ठेके पर श्रमिक रखने की परंपरा बनती जा रही है और तो और अब तो सरकार भी अनुबंध पर रखकर एक नया वर्ग तैयार कर रही है। शहरीकरण, गांवों में खेती में आधुनिक साधनों के उपयोग व परंपरागत व्यवसाय में समयानुकूल बदलाव नहीं होने से भी गांवों से पलायन होता जा रहा है। हालांकि सरकार असंगठित क्षेत्र के कामगारों को भी सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए कदम उठा रही है पर अभी इसे नाकाफी ही माना जाएगा। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में केवल 10 प्रतिशत श्रमिक ही संगठित क्षेत्र में हैं। 90 फीसदी कामगार असंगठित क्षेत्र में हैं। जानकारों के अनुसार असंगठित क्षेत्र के कामगारों में भी 60 प्रतिशत कामगारों की स्थिति बेहद चिंताजनक मानी जाती है। करीब 50 फीसदी श्रमिक केजुअल वेज पर काम कर रहे हैं वहीं केवल 16 प्रतिशत मजदूर ही नियमित रोजगार से जुड़े हुए हैं।
मुझे याद आता है कि साल 87 के आसपास मैंने तब के प्रखर मजदूर नेता ताराचंद वियोगी से मुलाकात में मजदूरों के संबंध में विस्तार से बातचीत की थी। इसके बाद कोई मजदूर नेता जेहन में नहीं आता कि जिनका स्मरण किया जाए। हां, इंदौर हो, राजनांदगांव हो, नागदा हो, ग्वालियर हो या जबलपुर के साथ ही और भी जगह है जो मजदूर-मालिक संघर्ष की कहानी सुनाते हैं। छत्तीसगढ़ के दल्लीराजहरा की खदानें हो या नंदिनी की माईंस जहां एक आवाज पर मजदूरों के हाथ थम जाते थे। राजनांदगांव का बीएनसी कपड़ा मिल हो, एक आवाज पर काम करते हाथ रूक जाते थे। आज की पीढ़ी को यकीन नहीं होगा कि सैकड़ों किलोमीटर में फैले खदानों में काम करने वाले मजदूरों तक उनके लीडर की आवाज पलक झपकते ही लग जाती थी। यह वह समय था जब संचार के साधन शून्य थे। लीडर एक टोली को आदेश देता और एक टोली से दूसरी टोली और आखिरी टोली तक संदेश पहुंचते ही काम थम जाता था। इस दौर के लीडर का नाम था शंकर गुहा नियोगी। नियोगी छोटी उम्र में ही सरकार और कारपोरेट की आंखों में शूल की तरह चुभने लगे थे लेकिन हजारों हजार मजदूरों की ताकत उनके साथ थी। उन दिनों आज की तरह मीडिया का ना तो इतना विस्तार था और ना ही संसाधन लेकिन कोई चार पन्ने का अखबार तो कोई आठ पन्ने के अखबारों में श्रमिक आंदोलन को इतनी जगह मिलती थी कि उनकी ताकत चौगुनी हो जाती थी। ऐसा भी नहीं था कि सारे अखबार एक ही विचारधारा के होते थे लेकिन खबर को सब समान स्थान देते थे। आज की हालात में सब बदला बदला सा नजर आता है।  
छत्तीसगढ़ के प्रमुख मजदूर नेताओं में कॉमरेड सुधीर मुखर्जी, राजेन्द्र सान्याल, शंकर गुहा नियोगी, जनकलाल ठाकुर जैसे दर्जनों प्रखर नेता 80 के दशक में हुए तो इसी दौर और इसके पहले मध्यप्रदेश में जिन प्रमुख श्रमिक नेताओं का नाम आता है उनमें होमीदाजी, बाबूलाल गौर, मोतीलाल शर्मा, माणकचंद्र चौबे, दादा भौमिक, मांगीलालजी, भेल के त्रिपाठी, तारासिंह वियोगी, शैलेन्द्र शैली, बादल सरोज जैसे बड़े नामों के साथ महाकोशल, विंध्य और मालवाअंचल में अनेक नाम हैं। जिन क्षेत्रों में औद्योगिकरण बढ़ा, वहां श्रमिक नेताओं का दखल रहा लेकिन आहिस्ता आहिस्ता उनके नाम भी नेपथ्य में चले गए। श्रमिक संगठनों की सक्रियता भी अब उस तेवर की देखने को नहीं मिलती है जो कभी सरकार और मिल मालिकों की नींद उड़ा दिया करती थी। इंदौर के श्रमिक नेता होमी दाजी लोकसभा के लिए चुने जाते हैं तो मजदूरों की आवाज बन जाते हैं और मजदूर से विधायक बनने वाले बालोद छत्तीसगढ़ के जनकलाल ठाकुर के बाद कोई ऐसा नाम नहीं दिखता है। कंकर मुंजारे जरूर सक्रिय रहे तो समाजवादी नेता रघु ठाकुर मजदूरों की आवाज बने हुए हैं। अब श्रमिक नेताओं की रिक्तता के चलते श्रमिक संगठनों की आवाज भोथरी हो चली है। यूं तो अनेक स्थानों पर श्रमिकों के हक के लिए संगठन और नेता काम कर रहे हैं लेकिन दबाव वैसा नहीं बन पा रहा है और मजदूर बदस्तूर शोषण के षिकार बने हुए हैं। इधर आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में प्रबंधन की जो पढ़ाई हो रही है, वह बच्चे कॉपोरेट कल्चर के हिमायती हैं। जैसे एक किसान का बच्चा शिक्षा पाने के बाद खेत में काम नहीं कर पाता है, वैसे ही ये प्रबंधन के गुर सीखने के बाद उद्योगों के हित में खड़े होते हैं। जमीनी तौर पर काम करने वाले श्रमिक नेताओं की फौज लगभग खत्म हो रही है। देश  में उदारीकरण के बाद तो मालिक-मजदूर का संघर्ष दिखता नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि कामगारों का शोषण नहीं हो रहा है लेकिन आवाज उठाने वालों को दुगुनी ताकत से दबाया भी जा रहा है।
कोरोना वायरस के कारण अन्य प्रदेषों में काम करने गए मजदूरों की जो दयनीय हालत है, वह किसी से छिपी नहीं है लेकिन लीडर के अभाव में उन्हें खुद की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। कहा यह जा सकता है कि ये असंगठित मजदूर हैं लेकिन गुजरात में जो सीन सामने आ रहा है, वह कम दर्द देने वाला नहीं है। सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर आ रहे मजदूरों की खैर-ख्वाह पूछने वाला कोई नहीं है और है तो सिर्फ औपचारिकता है। आज उस दौर के मजदूर नेता होते तो श्रमिकों की परेशानी कम तो होती। यह सुखद है कि मध्यप्रदेश  ना केवल मजदूरों की चिंता कर रहा है बल्कि उनके खातों में पैसा भेजकर उन्हें साहस दे रहा है। यह इसलिए भी है क्योंकि मध्यप्रदेश  के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जब कुछ भी नहीं थे तब मजदूरों के हक में अपने परिवार के खिलाफ चले गए थे। उन्हें इस बात का दर्द पता है कि मजदूरों को किस किस मुसीबत का सामना करना पड़ता है। दिवंगत बाबूलाल गौर तो श्रमिक आंदोलनों से ही नेता बने।
श्रमिक दिवस की सार्थकता इस बात में नहीं है कि कुछेक संगठन एक दिन के लिए लाल सलाम ठोंक कर अधिकारों की मांग करते सड़क पर आ जाएं। सार्थकता इसमें है कि हम नई पीढ़ी को श्रमिक संगठन, श्रमिकों के अवदान एवं श्रमिक नेताओं के संघर्ष का पाठ पढ़ाएं। उनके भीतर हौसला भरें कि हम होंगे कामयाब गीत तभी सार्थक होगा जब हम एक होंगे। गले में टाई बांधे और हाथ में सूटकेस थामे युवा यश = बॉस कहते रहेंगे।

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

पुलिस इतनी बुरी भी नहीं है दोस्त



मनोज कुमार

महीने-डेढ़ महीने पहले तक आप और हमको लगता था कि पुलिस बहुत बुरी है। पुलिस यानि डर और भय का दूसरानाम। लेकिन इन दिनों में पुलिस की परिभाषा बदल गई है। पुलिस यानि डर और भय नहीं बल्कि सहयोग और सुरक्षा का दूसरा नाम पुलिस है। कोरोना वायरस से जब पूरी दुनिया के साथ हिन्दुस्तान का जर्रा-जर्रा जूझ रहा है तब पुलिस  लोगों की जान बचाने में जुट गई।   कभी यही पुलिस वजह-बेवजह दूसरों की जान लेने के लिए बदनाम थी, वही पुलिस आज अपनी जान हथेली पर लेकर हमारी जान बचाने के लिए महीनों से सड़क पर तैनात है बल्कि अपनी जान देने में भी पीछे नहीं हट रही है।  पुलिस का कोई बहादुर जवान या अफसर अपनी छोटी सी मुनिया को घर पर छोड़कर आया है तो किसी की बूढ़ी मां अपने बेटे के घर लौटने के इंतजार में है। ना खाने का कोई वक्त है और ना चैन से सोेने का समय। धरती इनका बिछौना बन गई है और आसमां छत। सड़क के किनारे दो  रोटी चबाकर वापस लोगों की जान बचाने में जुट जाने का जज्बा बताता है कि पुलिस इतनी बुरी भी नहीं है दोस्त। इतना ही नहीं किसी गरीब भूखे को देखकर अपना निवाला उनके हवाले करने के कई किस्से आपको देखने-सुनने को मिल जाएगा। किसी  पुलिस जवान या अफसर के घर किलकारी गूंजी है तो कर्तव्य के चलते वह अपनी खुशी के इस मुबारक मौके को भी सेलिब्रेट  नहीं करना चाहता है। अपनों को नहीं दूसरों को कांधा देकर पुलिस ने जता दिया कि पुलिस इतनी बुरी भी नहीं है दोस्त।  

कोरोना वायरस के चलते सोशल मीडिया से लेकर संचार के दूसरे माध्यमों में जिस तरह की खबरें दिन-प्रतिदिन आ रही हैं, वह पुलिस को नए ढंग से परिभाषित करती दिखती है। मध्यप्रदेश में ही कुछ पुलिस के जवान और अफसर लोगों की जान बचाते बचातेखुद कोरोना के शिकार हो गए और अपनी जान गंवा बैठे। वे भी हमारी तरह ही हैं। उनका भी परिवार है। लाड़ करने वाली मुनिया है और शैतानी करने वाला बबलू भी है। महीनों गुजर गए उन्हें अपने परिवार से मिले हुए। सोशल मीडिया पर पुलिस की वह तस्वीरेंभी वायरल हो रही है जिसमें वह लाॅकडाउन तोड़ने वालों को कूट रही है। यह कुटाई पहली बार लोगों की जान बचाने के लिए की जा रही है। बार-बार इस संदेश के बाद भी लोग बेखौफ हैं और सड़कों पर बेवजह निकल आते हैं। ऐसा भी नहीं है कि पुलिस हर जगह ऐसे उद्दंड लोगों की कुटाई ही कर रही है। कई जगह गांधीवादी व्यवहार के साथ उन्हें तिलक लगाकर कर समझाइश दी जा  रही है। गीत-गजल गाकर लोगों को कोरोना के भयावहता से अवगत कराया जा रहा है। 

पुलिस का साथ देने के लिए हम सबको साथ आना होगा। राज्य सरकार ने अपने स्तर पर हरसंभव वह मदद करने की  कोशिश की है जिसे पुलिस का मनोबल बढ़े। सुरक्षा राशि के साथ सम्मान से कर्तव्य के पथ पर जान होम करने वालों को राज्य सरकार ने आगे बढ़कर मदद की है। और करने की कोशिश में है। हम जो अपने घरों में सुरक्षित हैं, वह भी पुलिस का हौसला बढ़ाने आगे आएं। पुलिस को चाहिए आपका साथ। आपके हौसले से वे आपके लिए हर स्तर पर जूझने को तैयार हैं। इन सब अनुभव बताता है कि पुलिस  इतनी बुरी भी नहीं है दोस्त।

यह मौका है कि हम सब मिलकर कोरोना संकट को परास्त करंे। यह मौका है कि हमारी जान बचाने वाले लोगों का हौसला बढ़ाये और उन्हें सहयोग करें। यह मौका है कि जो पुलिस, डाॅक्टर और अन्य लोग हमारी चिंता कर रहे हैं, उनकी चिंता हम करंें। यह  एकला चलो का समय नहीं है। यह समय है सामूहिक प्रयासों का। सब मिलकर ही कोरोना को परास्त कर सकते हैं। हम आम  आदमी हैं तो घर पर रहें और वे ड्यूटी पर। यह वक्त है कि हम पुलिस के प्रति अपनी राय बदल लें। यह वक्त इस बात का भी है  कि हम जान लें कि पुलिस क्या है? पुलिस किन हालातों में काम करती है? हमारी सुरक्षा के लिए तैनात रहने वाली पुलिस के  परिजनों पर क्या गुजरती है? जैसा हमने पिछले दशकों में पुलिस को देखा है और उसके बारे में राय बनायी है, दरअसल पुलिस  वैसी नहीं है। हमें ना तो पुलिस को समझाया गया और ना ही पढ़ाया गया। हमें पुलिस के नाम पर सिर्फ और सिर्फ डराया गया।     

पुलिस के बारे में  हमने जानने की कोशिश भी कभी नहीं की। पुलिस बन जाने को हम गौरव मानते हैं लेकिन वक्त पड़ने पर    पुलिस का डर दिखाने से हम नहीं चूकते हैं। हम लोग जाने कब से बच्चोंसे सवाल करते हैं कि पढ़-लिखकर क्या बनोगे तो उनका जबाव होता है मैं पुलिस बनूंगा। यह सुनकर हमारी बांछें खिल उठती है लेकिन जैसे ही बच्चा शैतानी करता है तो हम उसे  पुलिस के पकड़ ले जाने का भय उसके मन में बिठा देते हैं। इस भय के साथ बच्चा जवान होता है और उसे लगता है कि पुलिस वास्तव में खराब होती है। एक बार पुलिस को हम जान लेंगे तो हम सब कहेंगे कि पुलिस इतनी बुरी भी नहीं है दोस्त।

रविवार, 5 अप्रैल 2020

जिंदगी की एक ही दवा ‘उम्मीद’


मनोज कुमार
डॉक्टर शिफा एम. मोहम्मद के लिए अपनी निकाह से ज्यादा जरूरी है कोरोना से जूझ रहे मरीजों की जिंदगी बचाना तो बैतूल के लक्ष्मी नारायण मंदिर में असंख्य लोग चुपके से अनाज रख जाते हैं. कहीं छोटे बच्चे अपने गुल्लक में रखे बचत के पैसे संकट से निपटने के लिए खुले दिल से दे रहे हैं तो कहीं लगातार ड्यूटी करने के बाद भी थकान को झाड़ कर कोरोना से बचाव के लिए सिलाई मशीन पर महिला आरक्षक सृष्टि श्रोतिया मास्क बना रही हैं. होशंगाबाद में अपने हाथ गंवा चुके उस जाबांज व्यक्ति की कहानी भी कुछ ऐसी है जो शारीरिक मुश्किल को ठेंगा दिखाते हुए रोज 200 सौ मास्क बनाकर मुफ्त में बांट रहे हैं. इंदौर की वह घटना तो आप भूल नहीं सकते हैं जिन डॉक्टरों पर पत्थर बरसाये गए थे, वही अगले दिन उन्हीं के इलाज करने पहुंच गए. ये थोड़ी सी बानगी है. हजारों मिसालें और भी हैं. दरअसल इसे ही जिंदगी की दवा कहते हैं. इसे आप और हम उम्मीद का नाम देते हैं यानि जिंदगी की दवा उम्मीद है. 
उम्मीद जिंदगी की इतनी बड़ी दवा है कि उसके सामने दवा फेल हो जाती है. एक पुरानी कहावत है कि जब दवा काम ना करे तो दुआ कारगर होती है और आज हम जिस संकट से जूझ रहे हैं, वहां दवा, दुआ के साथ उम्मीद हमारा हौसला बढ़ाती है. नोएडा की रहने वाली एकता बजाज की कहानी इस उम्मीद से उपजे हौसले की कहानी है. एकता के मुताबिक वायरस ने उसे घेर लिया था लेकिन उम्मीद के चलते उसका हौसला बना रहा. मध्यप्रदेश के जबलपुर में अग्रवाल परिवार की भी ऐसी ही कहानी है. पिता समेत पत्नी और बच्ची कोरोना के शिकार हो गए थे. पिता की हालत तो ज्यादा खराब थी लेकिन तीनों आज सुरक्षित घर पर हैं. भोपाल के सक्सेना परिवार में पिता और पुत्री सही-सलामत अपने घरों पर हैं. ऐसी ही खुशखबर ग्वालियर से, इंदौर से और ना जाने कहां कहां से आ रही हैं. सलाम तो मौत के मुंह में जाती उस विदेशी महिला को भी करना होगा जिसने अपनी परवाह किए बिना डॉक्टरों से कहा कि जवानों को बचाओ, मैंने तो अपनी जिंदगी जी ली है. थोड़े समय बाद वह उम्रदराज महिला दम तोड़ देती है. उम्मीद ना हो तो जिंदगी खत्म होने में वक्त नहीं लगता है लेकिन उम्मीद हो तो दुनिया की हर जंग जीती जा सकती है. 
यह कठिन समय है. यह सामूहिकता का परिचय देने का समय है. एक-दूसरे को हौसला देने और सर्तकता, सावधानी बरतने का समय है. हम में से हजारों लोग ऐसे हैं जिनके लिए अपने जीवन से आगे दूसरों की सांसों को बचाना है. डॉक्टर्स की टीम दिन-रात देखे बिना मरीजों की सेवा में जुटी हुई हैं. पुलिस का दल छोटे से सिपाही से लेकर आला अफसर मैदान सम्हाले हुए हैं. मीडिया के साथी दिन-रात एक करके अपनी जान की बाजी लगाकर लोगों तक सूचना पहुंचाने में जुटे हुए हैं. डॉक्टर, पुलिस और मीडिया के साथियों का परिवार है. उनके घर वालों को भी चिंता है लेकिन जिस तरह सीमा पर जाने से जवान को कोई मां, पत्नी या बहन नहीं रोकती है. लगभग वही मंजर देखने का आज मिल रहा है. यह विभीषिका एक दिन टल जाना है. पल्लू में आंखों की कोर को पोंछती मां, दिल को कड़ा कर पति को अपनी जिम्मेदारी के लिए भेजती पत्नी का दुख वही जान सकती हैं. ऐेस में किसी डॉक्टर, पुलिस या मीडिया साथी की छोटी बच्ची टुकूर टुकूर निहारती है तो जैसे कलेजा मुंह पर आ जाता है.
समय गुजर जाता है, यह भी गुजर जाएगा लेकिन यह समय अनुभव का होगा. उस पीड़ा का भी होगा जिनका साथ ना मिले तो ठीक था लेकिन जिन्होंने जो उपत किया और कर रहे हैं, समय उन्हें माफ नहीं करेगा. इस कठिन दौर में संयम का इम्तहान था लेेकिन हम इस इम्तहान में तीसरे दर्जे में पास हुए हैं. उम्मीद थी कि हम संयमित रहेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. प्रधानमंत्री सेवा में जुटे लोगों के लिए ताली-थाली बजाकर आभार जताने की अपील करते हैं तो हम उसे उत्सव में बदल देते हैं. मोमबत्ती और दीया जलाकर एकजुटता का परिचय देने की उनकी दूसरी अपील को खारिज करते हुए फिर जश्र मनाने सडक़ पर उतर आते हैं. सोशल डिस्टेंसिग की सारी मर्यादा भंग हो जाती है. संयम को तोडक़र बाधा पैदा करने वाले लोग ना केवल अपने लिए बल्कि बड़ी मेहनत से बीमारों की सेवा में लगे लोगों का हौसला तोड़ते हैं. पुलिस की पिटाई का जिक्र करते हैं, आलोचना होती है. लेकिन कभी देखा है कि ये लोग हमारे लिए कहीं फुटपाथ पर सिर्फ पेट भरने का उपक्रम करते हैं. इनका भी घर है. मजे से खा सकते हैं लेकिन हम सुरक्षित रहें, इसके लिए वे घर से बाहर हैं. क्या हम इतना भी संयम बरत कर उन्हें सहयोग नहीं कर सकते हैं. ये जो सूचनाएं आप और हम तक पहुंच रही है, उन मीडिया के साथियों का परिश्रम है. उनकी कोशिश है कि आप बरगालये ना जाएं. आप तक सही सूचना पहुंचे. आपके भीतर डर नहीं, हौसला उपजे लेकिन एक वर्ग ने फैला दिया कि अखबारों से संक्रमण होता है. इन सेवाभावी लोगों की हम और किसी तरह से मदद ना कर पाएं लेकिन दिशा-निर्देशों का पालन कर हम उनका सहयोग तो कर सकते हैं ना? उम्मीद से लबरेज इस जिंदगी की एक और खूबसूरत सुबह होगी, इसमें कोई शक नहीं. वो सुबह हम सबके हौसले की होगी. इस उम्मीद को, हौसले को ही हम हलो, जिंदगी कहते हैं.

सोमवार, 23 मार्च 2020

#चुनौतियों को संभावना में बदलने का नाम है #शिवराज

-मनोज कुमार 
कुलजमा 15 महीने के अंतराल में शिवराजसिंह चौहान की मुख्यमंत्री के रूप वापसी मध्यप्रदेश की राजनीति में ऐतिहासिक घटना के रूप में देखा जाना चाहिए. नए मध्यप्रदेश के गठन के बाद से अब तक मुख्यमंत्री के रूप में जिन नाम को हम जानते हैं, उनमें से कोई ऐसा नहीं है कि लगातार 13 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे होंं और बहुत छोटे अंतराल में वापस मुख्यमंत्री बनकर सत्ता में वापसी हुई हो. अपनों और परायों को मुरीद बना लेना शिवराज सिंह चौहान के व्यक्तित्व की खासियत है तो राजनीतिक कौशल का लोहा भी वे मनवाते रहे हैं. एक बार फिर मध्यप्रदेश की राजनीति में वे चाणक्य बनकर नहीं बल्कि एक सौम्य राजनेता के रूप में अपनी वापसी की है. एक जननेता और जननायक के रूप में उनकी छवि बेमिसाल है क्योंकि वे सहज हैं, सरल हैं और आम और खास दोनों के लिए सर्वदा उपलब्ध रहने वाले राजनेताओं में हैं. 13 वर्षों के अपने लम्बे कार्यकाल में ऐसे कई अवसर आए जब वे मुख्यमंत्री के रूप में नहीं बल्कि कभी घर-परिवार के मुखिया बनकर तो कभी भाई और मामा बनकर. मामा शिवराजसिंह की जब एक बार फिर वापसी हुई है तो प्रदेश की जनता की उम्मीदें और बढ़ गई है. यह उम्मीदें शिवराज सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है लेकिन सच यही है कि चुनौतियों को संभावना में बदलने का नाम ही शिवराजसिंह चौहान है. 
शिवराजसिंह चौहान को आप किस रूप में देखते हैं? यह सवाल आपसे पूछा जाए तो स्वाभाविक रूप से जवाब होगा कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में लेकिन इससे आगे आपसे पूछा जाए कि एक आम आदमी के रूप में क्यों नहीं तो जवाब देने में थोड़ा वक्त लग सकता है. इस सवाल का जवाब देने में वक्त लगना स्वाभाविक है क्योंकि जिस कालखंड में हम जी रहे हैं अथवा पिछला समय हमने जो गुजारा है, उसमें व्यक्ति को उसके गुणों से नहीं बल्कि उसके पद और पद की हैसियत से पहचाना है. स्वाभाविक है कि शिवराजसिंह चौहान की पहचान एक मुख्यमंत्री के रूप में है और इतिहास के पन्नों में भी उन्हें इसी पहचान के साथ दर्ज किया जाएगा लेकिन सच तो यह है कि अपना सा लगने वाला यह मुख्यमंत्री हमारे बीच का, आज भी अपना सा ही है. शिवराजसिंह के चेहरे पर तेज है तो कामयाबी का लेकिन मुख्यमंत्री होने का गरूर पहले भी नहीं रहा और आज भी नहीं होगा. चेहरे पर राजनेता की छाप नहीं. सत्ता के शीर्ष पर बैठने की उनकी कभी शर्त नहीं रही बल्कि उनका संकल्प रहा है प्रदेश की बेहतरी का. वे राजनीति में आने से पहले भी आम आदमी की आवाज उठाने में कभी पीछे नहीं रहे. वे किसी विचारधारा के प्रवर्तक हो सकते हैं लेकिन वे संवेदनशील इंसान है. एक ऐसा इंसान जो अन्याय को लेकर तड़प उठता है और यह सोचे बिना कि परिणाम क्या होगा, अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने निकल पड़ता है. बहुतेरों को यह ज्ञात नहीं होगा कि शिवराजसिंह चौहान किसी समय मजदूरों को कम मजदूरी मिलने के मुद्दे पर अपने ही परिवार के खिलाफ खड़े हो गए थे. शिवराजसिंह चौहान का यह तेवर परिवार को अंचभा में डालने वाला था. मामूली सजा भी मिली लेकिन उन्होंने आगाज कर दिया था कि वे आम आदमी के हक के लिए आवाज उठाते रहेंगे. ऐसा भी नहीं है कि शिवराजसिंह चौहान में कुछ कमियां ना हो लेकिन जो खूबियां उनके व्यक्तित्व में है, वह उन कमियों को बौना कर देती है.  
कुछ पुराने दिनों को याद कर लेना भी इस अवसर पर सामयिक हो जाता है. ज्ञात रहे कि बीते 13 सालों में शिवराजसिंह चौहान के कांधे पर हाथ रखकर सैकड़ों लोग यह कहते मिल जाते थे कि शिवराज हमारे साथ पढ़े हैं. ‘शिवराज हमारे साथ पढ़े हैं’, इसमें अपनापन तो था ही लेकिन एक भाव यह भी कि देखो हमारे साथ पढ़ा विद्यार्थी, हमारा दोस्त शिवराजसिंह आज मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री है. थोड़े से लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि ‘हम शिवराजसिंह के साथ पढ़े हैं’ं और थोड़े से लोग होंगे जो कहते मिल जाएंगे-‘शिवराजसिंह और हम साथ पढ़े हैं.’ शिवराजसिंह के साथ सहपाठी होने की यह गर्वानुभूति सालों गुजर जाने के बाद हो रही है तो इसलिए कि शिवराजसिंह चौहान जब भोपाल के अपने स्कूल ‘मॉडल स्कूल’ में जाते हैं तो मुख्यमंत्री बनकर नहीं, स्कूल के एक पुराने विद्यार्थी की तरह. शिक्षकों का चरण स्पर्श करना नहीं भूले. सहपाठियों को नाम से याद रखना और उन्हें संबोधित करना उनकी सादगी की एक झलक है.
1956 में जब नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ और समय-समय पर मुख्यमंत्री बदलते रहे. हर मुख्यमंत्री की अपनी शैली थी. काम करने से लेकर जीवन जीने तक. लगभग सभी मुख्यमंत्री कुछ अलग दिखना चाहते थे या लोगों ने उन्हें वैसा प्रस्तुत करने की कोशिश की लेकिन 2005 में मुख्यमंत्री के इस परम्परागत चेहरे के विपरीत सादगी भरा एक चेहरा नुमाया हुआ था शिवराजसिंह चौहान का. संसद से विधानसभा और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद भी उन्होंने अपने लिए कोई बनावट नहीं की. उनकी बुनावट इतनी मोहक थी कि कभी पांव पांव वाले भइया के नाम से मशहूर शिवराजसिंह मामा के नाम से मशहूर हो गए. ऐसा नहीं है कि शिवराजसिंह चौहान पहले मुख्यमंत्री हों जिन्हें विशेषण दिया गया बल्कि लगभग हर मुख्यमंत्री को उनकी कार्यशैली और उनके तेवर के अनुरूप विशेषण मिलता रहा है. कोई राजा-महाराजा कहलाए तो किसी को संवेदनशील होने का विशेषण दिया गया. संत और साध्वी के रूप में मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हालने वाले भी थे लेकिन लगातार सत्ता के शिखर पर बैठे शिवराजसिंह चौहान की सादगी चर्चा में रही. एक बार जब वे सत्ता के शीर्ष पर बैठ रहे हैं तो इस बार भी उनकी सादगी, स्पष्टवादिता और अपनों के लिए जुझारूपन एक कारण होगा. 
शिवराजसिंह चौहान की सादगी भारतीय राजनीति में उन्हें अलग तरह से रखती है. ‘आम’ से ‘खास’ बनने में उनकी कोई रूचि नहीं रही सो वे जैसा थे, वैसा ही बना रहना चाहते हैं. लगभग हर जगह वे अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ पायजामा-कुरता में मिलेंगे. जब वे अवकाश पर होते हैं तो निहायत एक आदमी की तरह टीशर्ट और फुलपेंट में दिख जाते हैं. यह उनका प्रिय लिबास है. तामझाम और शोशेबाजी के इस आधुनिक दौर में शिवराजसिंह की यह सादगी उन्हें औरों से अलग, बिलकुल अलग बनाती है. शिवराजसिंह की सादगी का आलम यह है कि वे गांव-देहात के दौरे के समय धूल भरी सडक़ में अपने लोगों के साथ बैठने में कोई हिचक नहीं करते हैं. 
इस अवसर पर एक घटना का उल्लेख करना लाजिमी हो जाता है. विदिशा में जब वे सडक़ निर्माण का औचक निरीक्षण के लिए पहुंचते हैं और बताते हैं कि वे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान हैं तो मजदूर उन्हें पहचानने से इंकार कर देते हैंं. इस वाकये से शिवराजसिंह के चेहरे पर गुस्से का भाव नहीं आता है बल्कि वे हंसी में लेते हैं. साथ चल रहे अफसरों को कहते हैं चलो, भई यहां शिवराज को कोई पहचानता नहीं. क्या यह संभव है कि एक मुख्यमंत्री को उसकी जनता पहचानने से इंकार करे और वह निर्विकार भाव से लौट आए? यह सादगी शिवराजसिंह में मिल सकती है. उनके इन्हीं अनुभवों ने उन्हें आम आदमी से जोडऩे के लिए कई तरह के जतन करने का उपाय भी बताया. इन्हीं में से एक मुख्यमंत्री आवास पर होने वाली विभिन्न वर्गों की पंचायत रही है. कभी मुख्यमंत्री आवास आम आदमी के लिए तिलस्म सा था. बाहर से लोग अंदाज लगाया करते थे कि अंदर क्या क्या होगा लेकिन जब आम आदमी को मुख्यमंत्री आवास से बुलावा आया तो यह तिलस्म टूट गया था. 
शिवराजसिंह की सादगी के यह उद्धरण वह हैं जिसकी गवाही पूरा मध्यप्रदेश दे रहा है. हां, यह बात भी तय है कि जब आप शिवराजसिंह चौहान को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जांचते हैं, परखते हैं तो एक राजनेता के रूप में कुछ कमियां आप को दिख सकती हैं. कुछ फैसले सबके मन के नहीं होते हैं और इस बिना पर आप उन्हें घेरे में ले सकते हैं लेकिन एक आदमी से जब आप सवाल करेंगे तो उनका जवाब होगा कि अपना अपना सा लगने वाला यह शिवराज हमारा मुख्यमंत्री है और हमें ऐसा ही मुख्यमंत्री चाहिए. शिवराजसिंह चौहान चौथी दफा मध्यप्रदेश के सिंहासन पर विराजमान हो रहे हैं तो वह सारे मिथक टूट जाते हैं कि भाजपा हाइकमान उनकेे नाम पर सहमत नहीं है. या ऐसे ही तमाम तरह के तर्क-कुर्तक धराशायी हो जाते हैं. उन पर यह आरोप भी सहजता से कई तरह के आरोप लगाया जा सकता है लेकिन सारे आरोप बेमानी हो जाते हैं क्योंकि जो जनता से दूर है, वह सिंहासन से दूर है. 

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