गुरुवार, 27 मई 2021

पत्रकारिता दिवस का मान बढ़ाया भोपाल-इंदौर ने

हिन्दी पत्रकारिता दिवस  का गौरव

मनोज कुमार
एक पत्रकार के लिए आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी होती है और जब किसी पत्रकार को अपनी यह पूंजी गंवानी पड़े या गिरवी रखना पड़े तो उसकी मन:स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है. फिर आप किसी भी पत्रकार के लिए कोई दिन-दिवस मनाते रहिए, सब बेमानी है. हर साल हिन्दी पत्रकारिता दिवस 30 मई को मनाते हैं. यह हमारे स्वाभिमान का दिवस है. हिन्दी की श्रेष्ठता का दिवस. अंग्रेजों को देश निकाला देने का हिन्दी पत्रकारिता का गौरव दिवस लेकिन साल-दर-साल हिन्दी पत्रकारिता क्षरित होता रहा, इसमें भी कोई दो राय नहीं है. हालांकि भारत के एक बड़े वर्ग की आवाज आजादी से लेकर अब तक हिन्दी पत्रकारिता रही है और शायद आगे भी हिन्दी पत्रकारिता का ओज बना रहेगा. हिन्दी पत्रकारिता का वैभव अमर रहे, यह हम सबकी कोशिश होती है और होना भी चाहिए लेकिन हिन्दी के पत्रकारों की दशा दयनीय होती जा रही है. इस पर चिंता की जानी चाहिए. यह शायद पहली पहली बार हो रहा होगा जब हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर भोपाल और इंदौर के पत्रकारों ने ऐसी पहल की कि हिन्दी के पत्रकारों का आत्मसम्मान भी कायम रहा और आर्थिक दिक्कतों से भी राहत महसूस हुआ. आजादी के बाद हिन्दी पत्रकारिता दिवस का गौरव कायम रखने में भोपाल और इंदौर के पत्रकारों ने जो कार्य किया, वह वंदनीय है, अभिनंदनीय है.
कोरोना ने सभी सामाजिक और आर्थिक ताना-बाना को छिन्न-भिन्न कर दिया है. एक साल में कोरोना के दो बार हमले ने जैसे जिंदगी को शून्य से शुरू करने के लिए मजबूर कर दिया है. दूसरे प्रोफेशन के लोगों के पास आर्थिक संबल था और वे कम से कम गिरे नहीं. तनाव और परेशानियां उनके हिस्से में भी रही लेकिन पत्रकारों को जिन मुसीबतों का सामना करना पड़ा या पड़ रहा है, वह अकथ कथा है. एक तरफ अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए जान दांव पर लगाना तो दूसरी तरफ परिवार की जरूरत को पूरी करने के लिए या खुद की जिंदगी दांव पर लग जाए तो आर्थिक संबल नहीं मिल पाने का संकट. सरकार और सत्ता के सामने गिड़गिड़ाना या झुकना मंजूर नहीं और जिन संस्थानों के लिए कार्य कर रहे हैं, वे इस तरफ से लगभग आंखें मींचे हुए हैं. आत्मसम्मान कायम रहे और संकट का समाधान भी मिले, यह एक चुनौतीपूर्ण टॉस्क था. विवेकानंद जी ने कहा है कि जीते जी खुद का बोझ खुद को उठाना पड़ेगा और मरने के बाद चार कंधे तो मिल जाएंगे. इसे आप समस्या है तो समाधान है कि नजर से भी देख सकते हैं.
तकरीबन आठ वर्ष पहले पत्रकारों के एक समूह ने इस बात पर विमर्श किया कि पत्रकारों के हेल्थ को लेकर आर्थिक सुरक्षा कैसे दी जाए. इस सोच के साथ ‘भोपाल हेल्थ केयर सोसायटी’ का जन्म हुआ. सदस्य पत्रकारों से एक हजार रुपये वार्षिक सदस्यता का प्रावधान रखा गया था जिसे बाद में घटाकर 5सौ रुपये कर दिया गया. भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार और संस्था के गार्जियन डॉ. सुरेश मेहरोत्रा लगातार बड़ी आर्थिक योगदान करते रहे हैं. सोसायटी के नियमानुसार किसी भी पत्रकार को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए अन्य पत्रकारों की सहमति जरूरी है. संभवत: देश में अपनी तरह की इस इकलौती संस्था ने दिवंगत पत्रकारों को बिना किसी बड़ी औपचारिकता के दो लाख की राशि उपलब्ध करायी है. अन्य स्थितियों पर निर्भर करते हुए 15 हजार से एक लाख तक की राशि का सहयोग सदस्यों को मिलता रहा है. इस कोरोना काल में तो सोसायटी ने आगे बढक़र पत्रकारों को आर्थिक सहायता दी.
भोपाल के पत्रकारों की पहल के बाद इंदौर के पत्रकारों ने कोरोना काल में पत्रकारों को आर्थिक मदद के साथ स्वास्थ्यगत सुविधा दिलाने के लिए प्रयास शुरू किया. आईएमयू (इंदौर मीडिया यूनाइटेड) नाम से संस्था बनाकर जरूरतमंद पत्रकारों को ना केवल आर्थिक सहायता दी गई. बल्कि कोरोना पीडि़त पत्रकारों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने में यथासंभव सहयोग किया गया. आईएमयू वाट्सअप गु्रप पर प्रतिदिन बुलेटिन जारी कर पत्रकारों की स्वास्थ्य की जानकारी प्रदान करता रहा. यह पहल अनोखी थी. आईएमयू की पहल से बड़ी संख्या में पत्रकारों को स्वास्थ्य लाभ ना केवल उन्हें मिला बल्कि उनके परिजनों को भी लाभ मिला. ऐसे संकटकाल में आईएमयू संकटमोचक बनकर पत्रकारों की जीवन रक्षक का दायित्व निभाता रहा.
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने चिंता कर पहले अधिमान्य पत्रकारों को कोरोनापीडि़त होने की दशा में राज्य शासन की ओर से सहूलियत देने का ऐलान किया था. बाद में इसका विस्तार कर गैर-अधिमान्य पत्रकारों को भी इस योजना में शामिल कर लिया गया. कहना ना होगा कि कोरोना काल में पत्रकारों के हितचिंतक के रूप में संचालक जनसम्पर्क श्री आशुतोषप्रतापसिंह उपस्थित रहे. पीडि़त पत्रकारों को अस्पताल में बेड दिलाने, दवा-इंजेक्शन से लेकर ऑक्सीजन और वेंटिलेटर के इंतजाम की भरसक कोशिश करते रहे. सबसे बड़ी बात यह रही कि अपनी व्यस्तता के बाद भी व्यक्तिगत रूप से पीडि़त पत्रकार और उनके परिजनों को फोन कर उनकी खैरियत पता करते रहे. अपने इस दायित्व में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि श्री आशुतोषप्रतापसिंह ने छोटे-बड़े पत्रकारों में भेद ना करते हुए सभी से बात की. जनसम्पर्क की छवि सुधारने और शासन से मीडिया के दोस्ताना रिश्ते को मजबूत करने में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान एवं संचालक जनसम्पर्क की विशेष भूमिका रही. किसी भी राज्य में इस तरह की पहल करने वाला भी शायद मध्यप्रदेश ही इकलौता राज्य है.
कोरोना ने रिश्तों का ताना-बाना तोड़ा तो नए और मजबूत रिश्तों का श्रीगणेश भी किया. हिन्दी पट्टी के पत्रकारों को पहली बार एक नए अनुभव से सामना हुआ. इसका श्रेय मध्यप्रदेश में भोपाल की ‘जर्नलिस्ट हेल्थ केयर सोसायटी’ और इंदौर की आईएमयू (इंदौर मीडिया यूनाइटेड) को जाता है. पत्रकार सामूहिक पहल करें तो सोसायटी उनकी मदद के लिए आगे आती है, यह बात भोपाल-इंदौर ने स्थापित कर दिया है. इस तरह की पहल देश के हर राज्य और शहर में किए जाने की आवश्यकता है ताकि पत्रकारिता पर आंच ना आए और पत्रकारों का आत्मस्वाभिमान कायम रहे. इस बार दिल से हिन्दी पत्रकारिता दिवस की जय बोलिये.(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका "समागं " के सम्पादक हैं )

गुरुवार, 6 मई 2021

आपदा में अवसर के खिलाफ संकट में समाधान की जरूरत

मनोज कुमार

    आपदा में अवसर तलाशने वालों के खिलाफ संकट में समाधान तलाशने की जरूरत है. स्वाधीनता के पहले कुछ सालों के बाद हमारे समाज को भ्रष्टाचार, घोटाले ने निगल लिया है. बार बार और हर बार हम सब इस बात को लेकर चिंता जाहिर करते रहे हैं लेकिन यह लाइलाज बना हुआ है. आज हम जिस चौतरफा संकट से घिरे हुए हैं, उस समय यह बीमारी कोरोना से भी घातक साबित हो रही है. खबरों में प्रतिदिन यह पढऩे को मिलता है कि कोरोना से बचाव करने वाले इंजेक्शन, दवा और ऑक्सीजन की कालाबाजारी हो रही है. अस्पताल मनमाना फीस वसूल रहे हैं. जान बचाने के लिए लोग अपने घर और सम्पत्ति बेचकर अस्पतालों का बिल चुका रहे हैं. हालात बद से बदतर हुआ जा रहा है. शिकायतों का अम्बार बढ़ा तो सरकार सक्रिय हुई और टेस्ट से लेकर एम्बुलेंस तक की दरें तय कर दी गई लेकिन अस्पताल प्रबंधन पर इसका कोई खास असर होता हुआ नहीं दिखा. कोरोना से रोगी बच जा भी जा रहा है तो जर्जर आर्थिक हालत उसे जीने नहीं दे रही है. यह आज की वास्तविक स्थिति है लेकिन क्या इसके लिए अकेले सरकार दोषी है या हमारा भी इसमें कोई दोष है? क्यों हम इस स्थिति से उबरने के लिए सरकार के साथ खड़े नहीं होते हैं? यह बात बहुत साफ है कि सरकार कोई और नहीं, हम हैं क्योंकि हमने उन्हें चुनकर सत्ता सौंपी है. हमारे सामने विकल्प है कि वे हमारे चयन पर खरे नहीं उतरते हैं तो अगली बार उन्हें बेदखल कर सकते हैं. खैर, यह बात तब होगी जब हम इस विकट स्थिति से उबर जाएंगे. अभी कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा करना जरूरी है.
    आपदा को अवसर बनाकर जो लोग धन बटोरने में जुटे हुए हैं, उनके खिलाफ खड़े होकर हम संकट में समाधान की पहल कर सकते हैं. इंजेक्शन, दवा और ऑक्सीजन की कालाबाजारी से इंकार करना मुश्किल है.लेकिन असल सवाल यह है कि आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? मेरी बात आपको आहत कर सकती है लेकिन सच यही है कि हम अपनी और अपनों की जान बचाने के लिए इस कालेधंधे को बढ़ावा देते हैं. आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि बाजार की कीमत क्या है और हम उसकी कीमत क्या चुका रहे हैं. फर्क पड़ता है उन बहुसंख्यक आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को जिनका हक मारा जा रहा है. जब हम स्वयं को शिक्षित और जागरूक होने का दावा करते हैं तो हमारा फर्ज बनता है कि हम इन कालाबाजारियों को ट्रेप करें और पुलिस के हाथों सौंप दें. हमारे भीतर तक डर इतना समा चुका है कि अच्छे खासे शिक्षित लोग भी कोरोना से बचाव की दवा और ऑक्सीजन जैसी जरूरी चीजों का बेवजह भंडारण कर रहे हैं. कालाबाजारियों और जमाखोर दोनों ही समाज के लिए नासूर बन चुके हैं. इन दोनों वृत्तियों के मनोरोगियों के खिलाफ हम और आप खड़े हो जाते हैं तो स्थिति स्वयमेव नियंत्रण में आ जाएगी. सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है और मनमाना वसूले गए बिलों की वापसी करायी गई है. यही नहीं सरकार का आग्रह है कि ऐसे अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करायी जाए. अब हमें सरकार के साथ खड़ा होकर उन सभी लोगों को बेनकाब करना है जो समाज के लिए नासूर बनते जा रहे हैं.
    कोरोना का जो भयावह मंजर है, उससे हम थरथरा रहे हैं लेकिन इस भयावह मंजर में एक-एक सांस बचाने के लिए डॉक्टर और उनकी मेेडिकल टीम जुटी हुई है, उसका हमें धन्यवाद कहना चाहिए. निश्चित रूप से जिस दबाव में डॉक्टर और मेडिकल टीम काम कर रही है, उनके व्यवहार में कभी कुछ तल्खी आ सकती है. कभी वे अपनी ड्यूटी पर थोड़ी देर से आते हैं तो पेनिक होने के बजाय उनका सहयोग कीजिए. लेकिन जो मनमाना वसूली हो रही है, वह अस्पताल प्रबंधन की है. लेकिन आम लोगों में यह धारणा बन चुकी है कि डॉक्टर लूट रहे हैं. यह शिकायत भी दूर होना चाहिए. अस्पातल प्रबंधन के निर्देश और दबाव में डॉक्टर जरूरत ना होने के बाद भी ऐसी दवा लेने की सलाह दे रहे हैं, जिसकी जरूरत ही नहीं है. एक मित्र की सीटी रिपोर्ट एकदम क्लीयर और ऑक्सीजन लेवल 100 होने के बाद भी फेवीफ्लू दवा जिसका डोज पहले दिल 3200 एमजी और बाद के पांच दिन प्रतिदिन 1600 एमजी लेने की सलाह दी गई. यही नहीं, इलाज के लिए गए व्यक्ति का पुराना मेडिकल रिकार्ड भी नहीं पूछा जाता है. जिस व्यक्ति का मैं उल्लेख कर रहा हूं, वह पहले से लीवर के रोग से पीडि़त है और डॉक्टर द्वारा निर्देशित दवा लेन पर शर्तिया उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता. अकारण अस्पताल में भर्ती कराने का भी दबाव बनाया जाता है. एक पत्रकार मित्र को भी जब डॉक्टर ने एडमिट करने की बात कही तो उस मित्र ने पूछ लिया कि आपके अस्पताल के मुख्य द्वार पर ‘नो बेड अवेलेबल’ लिखा है तो आप मुझे कहां एडमिट करेंगे. डॉक्टर निरूत्तर. एक वरिष्ठ डॉक्टर ने कहा कि उन पर अस्पताल का दबाव रहता है, इसलिए ऐसी दवा लिखी जाती है. यह अपने आपमें दुर्भाग्यजनक है. मेरे एक मित्र को डॉक्टरों के समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने की शिकायत थी लेकिन उनके पास इस बात का जवाब नहीं था कि डॉक्टरों के लौटने का वक्त क्या है? डॉक्टर की आलोचना कर आप उनके मनोबल को तोडक़र अपना नुकसान कर रहे हैं.  सिक्के के दो पहलु होते हैं और हमें दोनों तरफ देखना होगा. डॉक्टर और मेडिकल स्टॉफ शिद्दत के साथ मानव सेवा में जुटे हुए हैं. इन सब को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए लेकिन जो संकट के समय भी धन संग्रहण में जुटे हैं, उन्हें  सरकार के संज्ञान में लाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है.
    एक-एक सांस के लिए लड़ते मरीजों और उनके परिजनों से लाखों का बिल वसूलने वाले अस्तपाल प्रबंधन के खातों की जांच इनकम टेक्स डिपार्टमेंट द्वारा की जानी चाहिए. नगद लेन-देन पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए तथा इस बात की भी जांच हो कि कोरोना बीमारी के पहले अस्पताल की आय और व्यय कितना था और वर्तमान में कितना है, तो स्थिति साफ हो जाएगी. यह किसी को परेशान करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि आम आदमी को राहत दिलाने की और सरकार के प्रयासों को मजबूती दिलाने में एक कदम हो सकता है. बिलिंग काउंटर के पास सीसीटीवी कैमरा लगाना अनिवार्य होना चाहिए ताकि समस्त किस्म के व्यवहार की रिकार्डिंग हो और उन पर नियंत्रण पाया जा सके. वक्त बहुत नाजुक है. सबको सबका सहयोग चाहिए. यह वक्त दोषारोपण का नहीं है बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम कर आगे बढक़र मुसीबत से निकलने का है. सरकार की कमियां बताने में गुरेज ना हो लेकिन निंदारस से बाहर आना होगा. 

सोमवार, 3 मई 2021

बेमानी है प्रेस फ्रीडम की बातें

मनोज कुमार


    तीन दशक पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने 3 मई को विश्व प्रेस फ्रीडम डे मनाने का ऐलान किया था. तब से लेकर आज तक हम इसे पत्थर की लकीर मानकर चल रहे हैं. इन तीन दशकों में क्या कुछ हुआ, इसकी मीमांसा हमने नहीं की. पूरी दुनिया में पत्रकार बेहाल हैं और प्रेस बंधक होता चला जा रहा है. खासतौर पर जब भारत की चर्चा करते हैं तो प्रेस फ्रीडम डे बेमानी और बेकार का ढकोसला लगता है. दशकवार जब भारत में पत्रकारिता पर नजर डालें तो स्थिति खराब नहीं बल्कि डरावना लगता है. लेकिन सलाम कीजिए हम पत्रकारों की साहस का कि इतनी बुरी स्थिति के बाद भी हम डटे हुए हैं. हम पत्रकार से मीडिया में नहीं बदल पाये इसलिए हमारे साहस को चुनौती तो मिल रही है लेकिन हमें खत्म करने की साजिश हमेशा से विफल होती रही है. इस एक दिन के उत्सवी आयोजन से केवल हम संतोष कर सकते हैं लेकिन फ्रीडम तो कब का खत्म हो चुका है बस समाज की पीड़ा खत्म करने का जज्बा ही हमें जिंदा रखे हुए है.
    भारत में पत्रकारिता के पतन की शुरूआत और उसकी स्वतंत्रता खत्म करने का सिलसिला साल 1975 में ही शुरू हो गया था. आपातकाल के दरम्यान जो कुछ घटा और जो कुछ हुआ, वह कई बार बताया जा चुका है. उसे दोहराने का अर्थ समय और स्पेस खराब करना है. लेकिन एक सच यह है कि पत्रकारिता इसके बाद से दो हिस्सों में बंटती चली गई. लोगों ने मिशन से बाहर आकर इसे प्रोफेशन मान लिया. अखबारों और पत्रिकाओं की संख्या मे इजाफा होना शुरू हो गया. कल तक जिनके लिए किसी स्कूल में शिक्षक बन जाना आसान था, उन्हें यह भी आसान लगा कि पत्रकार बन जाओ. ना शिक्षा की पूछ-परख और ना ही अनुभव का कोई लेखा-जोखा. मैं कुछ ऐसे पत्रकारों को जानता हंू जो शीर्ष संस्थाओं के प्रमुख हैं लेकिन जमीनी पत्रकारिता से उनका कोई वास्ता नहीं रहा. डिग्री हासिल की और सुविधाजनक ढंग से बड़े पदों पर आसीन हो गए. नयी पीढ़ी उन्हें प्रखर पत्रकार और आचार्य संबोधित करने लगे. मिश्री घुली बातों से वे चहेते बन गए और आज जिस बात का हम रोना रो रहे हैं, वह इन्हीं महानुभावों की वजह से उत्पन्न हुआ है. इसमें तथाकथित प्रखर पत्रकार और आचार्य बन चुके रसमलाई में लिपटे लोगों की गलती तो थोड़ी है. इससे बड़ी गलती उन दिग्गज लोगों की है जो जानते हुए भी उन्हें आगे बढ़ाने में लग रहे.
    बेहिसाब पत्रकारिता के शिक्षण संस्थान शुरू हो रहे हैं. यहां पढऩे वाले विद्यार्थियों को पत्रकारिता को छोडक़र शेष सारी विधायें सिखायी जाती हैं. डिग्री और बेहतर नौकरी के साथ सुविधाजनक जिंदगी की चाहत लिए पत्रकारिता के नौनिहाल सवाल करना भी नहीं जानते हैं. संवाद और अध्ययन से उनकी कोसों दूरी है. कभी किसी पर इनकी खबर का केवल इंट्रों देख लीजिए तो माथा पीट लेंगे. पू्रफ रीडिंग जैसी बुनियादी सबक कभी इन्हें सिखाया नहीं गया. जुम्मा-जुम्मा चार साल की पत्रकारिता और वरिष्ठ पत्रकार का खिताब. इन सालों में एक खबर ऐसी नहीं कि जो छाप छोड़ गई हो. हालांकि निराशाजनक स्थिति के बावजूद मैं कह सकता हूं कि कुछेक विद्यार्थी हैं जो पत्रकारिता करने आये थे और पत्रकारिता कर रहे हैं. पत्रकारिता शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन के दौरान उन्हें इस बात का भी ज्ञान नहीं दिया गया कि पत्रकारिता और मीडिया क्या है? आज पत्रकारिता दिवस है और सोशल मीडिया में निश्चित रूप से मीडिया को शुभकामनाएं दी जा रही होंगी. प्रेस की स्वतंत्रता के मायने यह नहीं है कि आपको लिखने की आजादी है. प्रेस स्वतंत्रता का अर्थ है आप सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता करें. पेजथ्री की पत्रकारिता से बाहर आकर एक बार विद्यार्थी, पराडकर, गांधी और तिलक को पढ़ें. मैं यह भी नहीं कहता कि आधुनिक संचार माध्यमों में वह सबकुछ संभव है जो पराधीन भारत की पत्रकारिता में था लेकिन जैसे सृृष्टि ने मां बनाया तो सदियां बदल जाने के बाद भी मां ही है, वैसे ही माध्यम बदल जाए, विकास हो जाए लेकिन पत्रकारिता की आत्मा जिंदा रहना चाहिए. पत्रकारिता हमारी अस्मिता है.
    जब हम प्रेस स्वतंत्रता की बात करते हैं तो इन दिनों कोरोना काल में जो कुछ घट रहा है, वह हमें आईना दिखाने के लिए बेहतर है. देशभर में पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों को अर्जियां दी जा रही हैं. फिर राजशाही की तरह सरकार हम पर एहसान कर कहती है कि फलां सरकार ने पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मान लिया है. समाज में शुचिता और सकरात्मकता का भाव उत्पन्न करने की जिम्मेदारी पत्रकारिता की. सरकार के प्रयासों को लोगों तक पहुंचाने की अपेक्षा पत्रकारिता से. लेकिन पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों से बात करना होगी. क्या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है कि वह हमारा ध्यान रखे? इस स्थिति के लिए भी हम दोषी हैं. रोहित सरदाना की मृत्यु हो जाती है तो हम खेमें में बंट जाते हैं. हम भूल जाते हैं कि वो भी एक पत्रकार था और हम सब भी. यह भी सच है कि जिस अखबार, पत्रिका या चैनल में काम करेेंगे, उसकी नीति के अनुरूप बोलना होगा. यह बंधन सबके लिए है. हमारी आपस की बैर और खेमेबाजी राजनीतिक दलों के लिए सुविधा पैदा करती है. आज सचमुच में प्रेस स्वतंत्र होता तो सरकारें आगे आकर फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए मजबूर होती लेकिन दुर्भाग्य से हम खेमेबाज पत्रकार हैं. इसलिए सब बातें बेमानी है.
    उम्मीद कीजिए और भरोसा रखिए कि देश के कोने कोने से कोराना के चलते जो पत्रकार जान गंवा रहे हैं, उनसे हम सीख लें. एक साथ खड़े हो जाएं. जिस दिन हम यह साहस कर पाएंगे हर प्रबंधन को आगे आकर वेतन आयोग की शर्ते मानना होगी और सरकारों को भी. लेकिन इसके लिए इंतजार करना होगा कि क्योंकि एक ऐसी अदृश्य शक्ति है जो हमें इसमें या उसमें बांट रही है.   

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

मनुष्यता के देवदूत हैं श्रमिक साथी


मनोज कुमार

मेहतनकश की दुनिया को सलाम करता एक मई. वह एक मई जिसे हम श्रमिक दिवस के रूप में जानते हैं. वही श्रमिक साथी जिनके पास जीवन जीने लायक मजदूरी से मिला मेहताना होता है. घर पर कोई पक्की छत नहीं. धरती को बिछा लेते हैं और आसमां को ओढ़ लेते हैं. इनकी उम्मीदें भी कभी हिल्लोरे नहीं मारती है. मोटरकार से लेकर जहाज तक खड़ा कर देते हैं लेकिन इसमें सवार होने की इच्छा कभी नहीं होती है. ये श्रमिक रचनाकार हैं और इनसे समाज की धडक़न है. इन्हें अपना अधिकार भी पता है और दायित्व भी. अधिकार के लिए कभी अड़े नहीं लेकिन दायित्व से पीछे हटे नहीं. आज की तारीख से पहले अखबार में खबर छपी कि देश के प्लांट मे ऑक्सीजन निर्माण में जुटे श्रमिकों ने अपने खाना इसलिए छोड़ दिया कि उन्हें पहले काम पूरा करना है. यह जज्बा श्रमिकों में ही हो सकता है. श्रमिक श्रेष्ठ हैं तो इसलिए नहीं कि वे श्रमिक हैं बल्कि एक तरह से वे रचियता हैं. मांगना इनकी आदत में नहीं है. देना इनकी फितरत में शामिल है. आत्मस्वाभिमान से जीने वाले श्रमिक साथी अपना भोजन छोडक़र एक संदेश दिया है कि आओ, पहले जान बचायें. एक-एक जान की कीमत श्रमिक साथियों को पता है.
    इस हाहाकार समय में सब डरे हुए हैं. सहमे हुए हैं. अपना जीवन कैसे बचा लें, यह हर व्यक्ति की चिंता है. धडक़न बचाने के लिए तिजोरियों के ताले खोल दिए गए हैं. जमीन-जायदाद बेचकर जीवन बचाने की जद्दोजहद चल रही है. यह हालात किसी एक घर, एक परिवार, एक शहर या देश की नहीं बल्कि हर जगह है. जीवन बचाना इस समय सबसे बड़ी जरूरत है. इस बैरी बीमारी ने रिश्तों के मायने सिखा दिया है. लोभ-लालच से परे भी कोई जिंदगी होती है, यह भी हम सीखने लगे हैं. लेकिन एक बड़ी सच्चाई यह है कि इस कोरोना बीमारी के पहले भी और वर्तमान समय में और शायद दुनिया के रहने तक एक ऐसा वर्ग है जिसके जेहन में सिर्फ एक बात है कि मनुष्य बने रहना. वह है हमारे श्रमिक. ऐसा नहीं है कि कोरोना श्रमिकों से कोई दोस्ती निभा रहा है या उनकी जान बख्श रहा है. सरकारी आंकड़ों में उनकी गिनती नहीं के बराबर है. उनके पास तिजोरी नहीं है. बैंकों में खाते नहीं है और अस्पताल में इलाज के लिए कोई सोर्स और रसूख नहीं है. लेकिन उनके पास है उनका आत्मविश्वास. वे खोकर भी दुखी होना जाहिर नहीं करते हैं. उल्टे दुखी लोगों के आंसू पोंछने में वे सबसे आगे होते हैं. भोजन छोडक़र ऑक्सीजन बनाने में जुटे श्रमिकों की खबर इसकी बानगी है. ऐसी अनगिनत खबरें होंगी जो आपके आसपास से गुजर रही होगी लेकिन अखबारों की सुर्खियों में जगह नहीं पा रही हैं. एक ऑटो चालक इन्हीं में से एक है जो अपना नफा-नुकसान छोडक़र लोगों की सेवा में जुटा हुआ है. उन्होंने कभी कोई मांग नहीं की कि उन्हें कोरोना वारियर ऐलान किया जाए. अपने लिए ना जतन मांगा और न मांगा कुछ.  
    मनुष्यता के देवदूत हैं श्रमिक. खामोशी के साथ वे जीते हैं उन्हें अपनी ताकत भी पता है. लेकिन वे अपनी ताकत का उपयोग नहीं करते हैं. वे सहिष्णु हैं. उपकार करना उनकी ताकत है. अपने नेक कार्यों को लेकर इतराना उन्हें आता नहीं. उनकी जिंदगी में रंग नहीं है तो बदरंग भी नहीं है. सेवा का भीतर से जो सतरंगी दुनिया उन्हें हमेशा ऊर्जावान रखती है, वही उनकी दुनिया है. श्रमिक साथियों का हक देने की बात हमेशा होती रही लेकिन कागज से कभी बाहर नहीं आ पाया. वायदों और बातों में लिपटी चिकनी-चुपड़ी राजनीतिक ऐलान को वो बेहतर जानते हैं. वो जो कसी हुई मुठ्ठी चित्रों में जो आपको दिखती है, वही उनकी ताकत है. वो रच सकते हैं तो बिगाड़ भी सकते हैं. जब एक साथ खड़े हो जाएं तो सरकारें हिल जाती हैं. परिवर्तन की ऐसी बयार चलती है कि सत्ताधीशों के सामने कुचलने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता है. इतिहास इस बात का गवाह है. ऐसे अनगिनत किस्से आप पढ़ सकते हैं जब श्रमिक आंदोलन को कुचला गया.
    
वो जब कहते हैं कि मेहनतकश जब भी अपना हिस्सा मांगेगे/इक गांव नहीं/ इक खेत नहीं/ पूरी की पूरी दुनिया मांगेगे. श्रमिक साथी हमेशा इस बात से मुतमइन हैं कि ‘हम होंगे कामयाब’. उनकी कामयाबी कभी छीनने में नहीं रही. वे एक टुकड़ा जमीन और एक टुकड़ा आसमा से खुश हैं. आज इस कोरोना काल में श्रमिक साथी अपनी किसम की अपने फितरत से मानवता की मिसाल कायम कर रहे हैं. दुख और अफसोस इस बात का है कि हम उनकी इस नेक-नीयती को सम्मान नहीं दे पाते हैं. खैर, उन्हें इस बात का रंज भी नहीं है. वे बुनियाद के पत्थर बने रहना चाहते हैं और उन्हें इसी का संतोष है. इस विकट समय में हर धडक़न को बचाने वाले योद्धा श्रमिक साथियों को सलाम.  
Taswir youtub se

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

‘सु’ अपने साथ ले गए और ‘नील’ हम हो गए

मनोज कुमार
रात हो रही थी और लगभग थक सा गया था लेकिन मन बार बार सोशल मीडिया पर अटका हुआ था. एक बार फिर हिम्मत कर फेसबुक ओपन किया तो पहली खबर सुनील के नहीं रहने की मिली. दयाशंकर मिश्र ने यह सूचना पोस्ट की थी. सहसा यकिन नहीं हुआ लेकिन दयाशंकर के पोस्ट पर अविश्वास करने का भी कोई कारण नहीं था. वे एक जिम्मेदार लेखक-पत्रकार हैं अत: मन मारकर खबर पर यकीन करना पड़ा. इसके बाद तो कई लोगों ने यह सूचना शेयर किया. इस खबर को पढक़र कर सुनील पर गुस्सा आया. कुछ पलों में उसने पराया कर दिया. हम लोगों के बीच में कोई व्यवसायिक रिश्ता नहीं था. लेकिन जो था, वह हम दोनों ही जानते थे. पांचेक साल पहले जब मेरे दिल की चीर-फाड़ की नौबत आयी थी तो सबसे पहले चिंता करने वालों में सुनील था. इसके बाद पिछले लॉकडाउन से लेकर अब तक अपनी बीमारी से दो-चार हो रहा हूं. इस बीच एक बार सुनील से मुलाकात हुई. वही चाय पीकर जाना लेकिन कश्मीर से कन्याकुमारी तक जो चाय का हाल है, सो चाय समय पर नहीं आयी. अगली बार साथ चाय पियेंगे के वायदे के साथ मैं चला आया. शारीरिक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर होने के बाद बहुत देर तक बैठा नहीं जा रहा था. हां, इस बीच इंस्टाग्राम में जो संवाद का सिलसिला शुरू किया था, उसे किताब की शक्ल में लाना फायनल हुआ था. सुनील मेरे उन चंद दोस्तों में है जिनसे लगातार बातचीत नहीं होती थी. मुझे कोई दिक्कत, खासतौर पर हेल्थ को लेकर तो उसे एक पंक्ति का फोन करना होता था और उसकी तरफ से भी यही था. कुछेक दोस्तों के साथ मेरा यह एक वायदा है. इतनी यारी के बाद सुनील बेवफा निकला. अरे, भले मानुष कम से कम एक फोन तो कर देता. उसकी तबियत खराब होने से लेकर बिछुडऩे तक की कोई खबर नहीं मिल पाना जीवन भर सालता रहेगा.
कोई 30 साल पुरानी बात होगी. मैं रायपुर से देशबन्धु में नौकरी करने भोपाल आया था. यहां जिन चंद लोगों से पहले पहल मुलाकात हुई, उसमें सुनील एक था. सुनील से पटरी बैठने का कारण भी था कि हम लोग सिनेमा और संस्कृति पर लिखते थे. हम लोग की प्राथमिक शाला भाऊ साहब खिरवडक़र होते थे. हम लोग मालवीय नगर स्थित आदिवासी लोक कला परिषद के कार्यालय में जाते थे. कभी डांट, कभी प्यार, कभी टिप्स और भाऊ साहब का मन हो गया तो गरम समोसे के साथ चाय. यहीं पर हम दोनों ने तीजन बाई पर लिखना शुरू किया. सुनील ने उन पर लेख लिखा तो मैं उनसे बातचीत को कागज पर उतारा. तब दिल्ली से प्रकाशित प्रमुख सांस्कृतिक पत्रिका ‘सारंगा स्वर’ में हम साथ साथ छपे. और भी ऐसे कई मौके आए. इस बीच सुनील सरकार के मुलाजिम हो गए. हाऊसिंग बोर्ड के तब के अध्यक्ष कनक तिवारी के साथ उनकी पटरी बैठी और गांधी 125वीं जयंती के लिए वे गंभीरता से कार्य करने लगे. तब मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री थे.
जिंदगी खरामा-खरामा चल रही थी. सुनील को थोड़ा स्थायित्व मिल गया था लेकिन मेरी नाव अब तक हिचकोले खा रही है. खैर, इस बीच सुनील संस्कृति विभाग में आ गए. यहां मेरा पुराना रिश्ता श्रीराम तिवारी से है. यह रिश्ता जब वे फिल्म विकास निगम के महाप्रबंधक होते थे, तब से बना. सुनील और मैं उनके करीब थे. एक तरह से गुरु के भाव के साथ औपचारिक ना सही, लेकिन गंडा बांध दिया था. भाऊ साहब के बाद औपचारिक गुरु के रूप में उनकी संगत में आ गए. सुनील संस्कृति में रहे और मुझे संविदा के तौर पर वन्या में लिया गया. पहले बच्चों की पत्रिका ‘समझ झरोखा’ का सम्पादक बनाया गया और साथ में फीचर सेवा ‘वन्या संदर्भ’ का जिम्मा मिला. अब तकरीबन रोज ही मिलना होता था. सुनील चाहते थे कि मुझे वहां स्थायित्व मिल जाए लेकिन ‘भाग ना बांचे कोई’ कहावत चरितार्थ हो गई. राजनीतिक रसूख के चलते एक अन्य को सम्पादक बना दिया गया. सुनील दुखी थे. लेकिन उसके हाथ में कुछ नहीं था. एक बार फिर मेरी वन्या में सामुदायिक रेडियो समन्वयक के रूप में हुई. सुनील ने कहा कि अब तो जम जाओगे. लेकिन फिर वही ‘भाग ना बांचे कोई’. तिवारी जी के रिटायरमेंट के साथ नए एमडी ने बिना किसी कारण बताये बाहर का रास्ता दिखा दिया.
इस सब उतार-चढ़ाव में सुनील लोगों से मेरी तारीफ किया करते थे. वे मेरे काम को लेकर हमेशा अनुरागी बने रहे. जब मेरी तबीयत डांवाडोल हो रही थी तब उन्होंने अपने ड्रायवर अनिल को हिदायत दे रखी थी कि जब इन्हें जाना हो, छोड़ देना और ले आना. सुनील को पता था कि मेरा पूरा जीवन पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर चलता है. वो हमेशा मुझे भैया का संबोधन देते रहे और मैं सीधे सुनील कहता था. हल्के से मुस्कराना और कहना सब ठीक होगा. सुनील को पता था कि समोसा मेरा प्रिय है तो जब कभी डायरेक्टरेट पहुंचा, मेरे लिए समोसा आ जाता था. एकाधिक बार से ज्यादा मिठाई भी होती थी. बिना किसी अवसर के. कल कंचन ने लिखा कि सुनील उसे गुडिय़ा कहते थे. सच लिखा है. हम दोनों के लिए कंचन हमेशा गुडिय़ा ही रही. आज सुनील चले गए हैं. लोग याद कर रहे हैं. भला-भला लिख रहे हैं लेकिन पंचतत्व में विलीन हो चुके सुनील को क्या पता कि हम उन्हें कितना याद कर रहे हैं. ‘सु’ अपने साथ ले गए और ‘नील’ हमें छोड़ गए. औरों के लिए सुनील लेखक, फिल्म के जानकार और जाने क्या क्या होंगे लेकिन हम दोनों उन दिनों के साथी हैं जब हम तय किया करते थे कि एक कूलर घर वालों के लिए होगा और हमारा काम तो पंखे से चल जाता है. फिर से कहूंगा सुनील भला कोई ऐसे जाता है? ‘सु’ अपने साथ ले गए और ‘नील’ हमें छोड़ गए.  

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

यह समय परखने का नहीं, साथ चलने का है

मनोज कुमार

        कोरोना महामारी को लेकर आज जो भयावह स्थिति बनी हुई है, वह किसी के भी अनुमान को झुठला रही है. एक साल पहले कोरोना ने जो तांडव किया था, उससे हम सहम गए थे लेकिन बीच के कुछ समय कोरोना का प्रकोप कम रहने के बाद हम सब लगभग बेफिक्र हो गए. इसके बाद ‘मंगल टीका’ आने के बाद तो जैसे हम लापरवाह हो गए. हमने मान लिया कि टीका लग जाने के बाद हमें संजीवनी मिल गई है और अब कोरोना हम पर बेअसर होगा. पहले टीका लगवाने में आना-कानी और बाद में  टीका लग जाने के बाद मनमानी. यह इस समय का कड़ुवा सच है. सच तो यह भी है कि यह समय किसी को परखने का नहीं है बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम कर साथ चलने का है. लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं. हम व्याकुल हैं, परेशान हैं और हम उस पूरी व्यवस्था को परखने में लगे हुए हैं जिसके हम भी हिस्सेदार हैं. यह मान लेना चाहिए. सोशल मीडिया में व्यवस्था को कोसने का जो स्वांग हम रच रहे हैं, हकीकत में हम खुद को धोखा दे रहे हैं. हम यह जानते हैं कि जिस आक्रामक ढंग से कोरोना का आक्रमण हुआ है, उससे निपटने में सारी मशीनरी फेल हो जाती है. फिर हमें भी इसकी कमान दे दी जाए तो हम भी उसी फेलुअर की कतार में खड़े नजर आएंगे. एक वर्ष पहले जब कोरोना ने हमें निगलना शुरू किया था, तब हमारे भीतर का आध्यात्म जाग गया था. हम र्नििर्वकार हो चले थे. हमें लगने लगा था कि एक-दूसरे की मदद में ही जीवन का सार है लेकिन जैसे-जैसे कोरोना उतार पर आया, वही आपाधापी की जिंदगी शुरू हो गई. एक-दूसरे को पीछे छोडक़र आगे बढऩे की जद्दोजहद शुरू हो गई.
        आज जब हालात एक बार फिर बेकाबू हो चला है तब हमारे निशाने पर सरकार और सरकारी तंत्र है. यह स्वाभाविक भी है. दवा, ऑक्सीजन, बिस्तर की कमी बड़े संकट के रूप में हमारे सामने हैं. इसके अभाव में लोग मरने को मजबूर है तो सरकार पर गुस्सा आना गलत नहीं है. सरकार से समाज की अपेक्षा गलत नहीं है लेकिन क्या आलोचना से स्थिति बेहतर हो सकेगी? शायद नहीं. समय-समय पर तर्क और तथ्यों के साथ तंत्र की कमजोरी उजागर करना हमारी जवाबदारी है. ऐसा जब हम करते हैं तो सरकार की आलोचना नहीं होती बल्कि हम सरकार के साथ चलतेे हुए सचेत करते हैं. बिगडैल और बेकाबू तंत्र की कमजोरी सामने आते ही सरकार चौकस हो जाती है. शायद ऐसा करने से समाज में एक तरफ सकरात्मकता का भाव उत्पन्न होता है तो दूसरी तरफ हम एक जिम्मेदार समाज का निर्माण करते हैं. चुनाव में बेधडक़ जमा होती भीड़ के लिए हम सयापा करते रहे लेकिन अपने-अपने घरों से निकल कर कितने लोगों ने भीड़ को वहां जाने से रोका? भीड़ राजनीतिक दलों की ताकत होती है लेकिन इस भीड़ को नियंत्रण करने के लिए हमारी कोशिश क्या रही? कोरोना के आने से लेकर अब तक के बीच में जिस तरह सभा-संगत, प्रदर्शनी और मेले-ठेले सजते रहे, उनका कितनों ने विरोध किया? तब हम सबको लग रहा था कि कोरोना खत्म हो गया है. जीवन अब पटरी पर है और जीवन है तो जीवन में उत्सव भी होना चाहिए. आज हमारे सामने यक्ष प्रश्र यह है कि सरकार ने बीते साल भर में कोई इंतजाम क्यों नहीं किया? बात में दम तो है लेकिन हमने सरकार इस इंताजम को पुख्ता करने के लिए कभी याद दिलाया? आज कोरोना का यह भयावह चेहरा नहीं आता तो सबकुछ ठीक था लेकिन आज सब खराब है. बात खरी है लेकिन चुभेगी.
        लगातार ड्यूटी करते पुलिस वाले, नगर निगम के कर्मचारी, डॉक्टर, नर्स और इनके साथ जुड़े लोग पस्त हो चुके हैं लेकिन वे अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद हैं. इसके बाद भी छोटी सी चूक पर हम उनके साथ दो-दो हाथ करने के लिए खड़े हो जाते हैं. निश्चित रूप से काम करते करते कुछेक गलतियां हो सकती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि हम उनके इतने लम्बे समय से किए जा रहे सेवा कार्य को भुला दें. एक डॉक्टर आहत होकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर हो जाता है, यह बात जोर-शोर से उठती है और उठनी भी चाहिए लेकिन इसके बाद इन डॉक्टरों को और मेडिकल स्टॉफ को सुरक्षा मिले, इस पर हम कोई बातचीत नहीं करते हैं? पूरे प्रदेश में दो या तीन पुलिस की ज्यादती की आधा-अधूरा वीडियो वॉयरल होता है और हम मान लेते हैं कि पुलिस अत्याचार कर रही है. कभी इस बात की चिंता की कि पुलिस वाले कितने तकलीफों के बीच अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं. खासतौर पर छोटे पुलिस कर्मचारी. कोरोना के शुरूआती दौर में पुलिस के सहयोग और सेवा कार्य की अनेक खबरें आती रही लेकिन इस बार ये खबरें क्यों गायब है? क्या पुलिस ने सेवा कार्य बंद कर दिया है या जानबूझकर उन्हें अनदेखा किया जा रहा है. कोरोना किसी भी तरह से, कहीं से फैल सकता है लेकिन इस बात की परवाह किए बिना आपकी और हमारी चिंता में नगर निगम के कर्मचारी सेवा कार्य में जुटे हुए हैं. क्या इन सबकी सेवा भावना को आप अनदेखा कर सकते हैं. शायद नहीं.
        यह समय हमेशा नहीं रहने वाला है. लेकिन हमने समय रहते अपनी जिम्मेदारी नहीं समझा तो यह दुख हमेशा हमें सालता रहेगा. आप सिर्फ इतना करें कि आप और आपके नातेदार, दोस्तों और परिचय मेें आने वालों को अपने अपने घर पर रोक लें. सडक़ों पर भीड़ कम होगी तो तंत्र पर दबाब कम होगा और दबाव कम होगा तो परिणाम का प्रतिशत बड़ा होगा. क्यों ना हम सोशल मीडिया की ताकत का उपयोग कर लोगों को जागरूक बनाने में करें क्योंकि आलोचना से आपके मन को तसल्ली मिल सकती है लेकिन संकट मुंहबाये खड़ा रहेगा. यह संकट कब और किसके हिस्से में आएगा, कोई नहीं कह सकता. इससे अच्छा है कि संकट को हरने के लिए सोशल मीडिया संकटमोचक बने. कोरोना से बचने के छोटे उपाय मास्क पहनों, हाथ धोएं और आपस में दूरी बनाकर रखें. नमस्ते तो हमारी संस्कृति है. समय को आपकी हमारी जरूरत है. साथ चलिए क्योंकि कमियां गिनाने के लिए खूब वक्त  मिलेगा, पहले हम दुश्मन से दो-दो हाथ कर लें.     

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

                                                                         शोध पत्रिका ‘समागम’ का नया अंक राष्ट्र-कवि पंडित                                                                                  माखनलाल  चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ के                                                                              शताब्दी वर्ष पर


लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...