शनिवार, 26 जुलाई 2025

नागरिक बोध और नज़ीर बनता इंदौर



प्रो. मनोज कुमार

मध्यप्रदेश हमेशा की तरह स्वच्छता सर्वेक्षण में सबसे आगे रहा. लगातार 8वीं दफा इंदौर सिरमौर बना तो राजधानी भोपाल भी श्रेष्ठता का सिरमौर बना. मध्यप्रदेश के कुछ अन्य शहर भी स्वच्छता सर्वेक्षण में स्वयं को साबित किया। स्वच्छता सर्वेक्षण का यह परिणाम सचमुच मेें सुखदायक है और गर्व से कह सकते हैं कि देश का दिल मध्यप्रदेश अब एक स्वच्छता प्रदेश भी है। अब सवाल यह है कि पुरस्कारों का ऐलान हुआ, उत्सव हुआ, चर्चा हुई और असली मकसद स्वच्छता फिर कहीं तब तक के लिए हाशिए पर जाता दिख रहा है जब तक दुबारा स्वच्छता स्वच्छता सर्वेक्षण का सिलसिला आरंभ ना हो। यक्ष प्रश्र यह है कि क्या हम सिर्फ नम्बरों में आगे रहने के लिए ही स्वच्छ प्रदेश होने का प्रयास करते हैं या नागरिक बोध के साथ स्वच्छता की दिशा में कदम बढ़ाते हैं? पिछले सालों का अनुभव यही बताता है कि हमारी रूचि निरंतर स्वच्छ बने रहने से ज्यादा स्वच्छता सर्वेक्षण में सिरमौर बने रहने की है. स्वच्छता उत्सव चार दिनों का ना होकर पूर्ण नागरिक बोध से हो तो यह स्वच्छता  का नम्बरों का यह खेल एक दिन थम भी जाए तो हम गौरव से स्वयं महसूस कर सकें कि हम स्वच्छ प्रदेश के वासी हैं. लेकिन ऐसा करने वालों में एकमात्र शहर मध्यप्रदेश ही नहीं, देश में रहने वाला इंदौर है. पूर्ण नागरिक बोध के साथ इंदौर के नागरिक अपने दायित्व का निर्वहन करते हैं. इस बात पर कुछ लोग एतराज कर सकते हैं कि ये क्या बात हुई लेकिन सच यही है. 

इंदौर क्यों नागरिक बोध से भरा हुआ शहर है, यह जानना है तो उसकी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को समझना होगा. राजनीति तो राजनीति होती है और सत्ता और शीर्ष पर बने रहने के लिए कुछ भी करेगा की नीति पर चलती है लेकिन आप जब इस पर विश£ेषण करेंगे तो पाएंगे कि इन सबके बावजूद इंदौर  की राजनीति इससे परे है और तब जब अपने शहर इंदौर की बात हो. इंदौर की अस्मिता और प्रतिष्ठा को लेकर सभी निर्दलीय हो जाते हैं. स्वच्छता को लेकर, नागरिक सुविधाओं को लेकर भी इंदौर का यही चरित्र रहा है. कदाचित कभी, कहीं इंदौर की स्थानीय राजनीति फेल हुई तो नागरिक इसका जिम्मा उठा लेते हैं. स्वच्छता सर्वेक्षण का सिलसिला जबसे आरंभ हुआ है, बच्चा-बच्चा स्वच्छता को अपनी जिम्मेदारी समझता है. शहर के वाशिंदें हों या शहर में आए मेहमान, उन्हें भी इंदौर की स्वच्छता की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है. एक कागज़ का टुकड़ा भी गलती से सडक़ पर फेंक दिया तो ना जाने कहां से कोई आएगा और आपसे कहेगा-भिया यहां नहीं. और वो खुुद उस कचरे को उठाकर डस्टबीन में डाल देगा. आमतौर पर निगम के स्वच्छता  साथियों के बारे में राय है कि वे अपने काम के प्रति संजीदा नहीं होते हैं. इस सोच पर इंदौर के निगम के स्वच्छता साथी थप्पड़ मारते हैं. वे स्वच्छता की जिम्मेदारी नौकरी के भाव से नहीं करते हैं बल्कि वे नागरिक बोध से भरकर इस जिम्मेदारी को सम्हालते हैं, पूरा करते हैं। यह बात सबसे सुंदर और सीखने वाली दूसरे शहरों के लिए है. स्वच्छता में सिरमौर बनने के लिए पहले और अभी के अफसरों में होड़ मची होती है कि उनके कार्यकाल के कारण इंदौर को यह कामयाबी मिली लेकिन वे भूल जाते हैं कि जिस शहर में नागरिक बोध ना हो, वहाँ व्यवस्था भी फेल हो जाती है. सिस्टम का काम बजट और सुविधा मुहय्या कराना है और उसकी मॉनिटरिंग करना लेकिन कार्य व्यवहार तो नागरिक बोध से ही आता है. कलश को श्रेय देने के बजाय बुनियाद को प्रणाम किया जाए तो इंदौर हमेशा स्वच्छ शहर बना रहेगा.

इंदौर को बार-बार स्वच्छता में श्रेष्ठता क्यों हासिल होता है, इस पर आपत्ति हो सकती है जिसका जवाब ऊपर लिखा जा चुका है. अब बड़ा सवाल यह है कि इंदौर जैसा नागरिक बोध अन्य शहरों में क्यों नहीं है? क्यों वहाँ पर इस बात की चिंता नहीं की जाती है कि इंदौर की तासीर में हम क्यों ना घुलमिल जाएँ. दूसरे शहरों में भी शहर को स्वच्छ रहने के लिए बजट और सुविधा आवंटित होता है लेकिन वह रूटीन में निपटा दिया जाता है. स्वच्छता सर्वेक्षण के समय जरूर दबाव रहता है कि हमें पुरस्कार जीतना है, सबसे आगे रहना है तो जाहिर है कि कागजी कार्यवाही पूरा कर कुछ पुरस्कार और नंबर पा लेते हैं. तमाम विषयों को लेकर शहर-दर-शहर विमर्श, गोष्ठी और संवाद का सिलसिला चलता है लेकिन शायद ही कहीं स्वच्छता पर विमर्श को लेकर संवाद का कोई सिलसिला शुरू हुआ हो. आमतौर पर हमारी मानसिकता है कि यह काम सरकार का है, नगर निगम का है, वो करे. इस मानसिकता के साथ हम कागजी तौर पर स्वच्छ शहर का तमगा तो पहन सकते हैं लेकिन खुद से सच का सामना नहीं कर सकते हैं.

यह हाल देश के सभी शहरों और राजधानी का है. स्वच्छता  मेंं सिरमौर बनने की दौड़ में शामिल शहरों की पोल हर बार बारिश खोल देती है और इस बार भी यही हो रहा है. सडक़ें और नालियाँ बजबजा गई हैं. पॉलिथीन और दूसरे कचरों से पानी निकासी की व्यवस्था चरमरा गई है. कम से कम उन शहरों से यह सवाल किया जा सकता है कि आप तो स्वच्छता सर्वेक्षण में सिरमौर रहे हैं, फिर ये संकट क्यों उत्पन्न हुआ? मामला साफ है कि हम कागज़ीतौर पर तो स्वच्छ हो गए लेकिन नागरिकबोध के अभाव में शहर को जमीनीतौर पर स्वच्छ नहीं रख पाए. इंदौर भी इस आरोप से पूरी तरह बरी नहीं है। अगले वर्ष फिर हम स्वच्छता उत्सव मनाएंगे. जिन शहरों के खाते में नंबर आएंगे, उन्हें शाबासी देेंगे औ जो पिछड़ जाएंगे, उनसे सवाल किए जाएंगे. यह सब प्रशासनिक प्रक्रिया है, चलती रहेगी. आपके घरों का कचरा उठाने के लिए आने वाली गाड़ी में बजने वाला गीत कहां गुम हो गया? स्वच्छता साथियों को  मिलने वाली सुरक्षा में भी ढील है, आखिर इसका दोषी कौन? मूल प्रश्र यह है कि स्वच्छता के लिए देश के हर नागरिक में अपने शहर के प्रति नागरिक बोध का भाव हो. नियमित रूप से स्वच्छता पर चर्चा, संवाद, संगोष्ठी हो. अपने शहर की अस्मिता और प्रतिष्ठा के लिए नागरिक जागरूकता, नागरिक बोध सर्वप्रथम है ताकि स्वच्छता उत्सव चलता रहे.(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

कैंपस कॉरिडोर


कंटेंट राइटर चाहिए 

'एचटी डिजिटल स्ट्रीम्स’ (HT Digital Streams) में कंटेंट राइटर के पद  के लिए योग्य  आवेदकों से आवेदन मांगे गए हैं।सोशल मीडिया पर शेयर विज्ञापन के अनुसार, यह नियुक्ति नोएडा के लिए होनी है । आवेदक के पास एक से डेढ़ साल का अनुभव होना चाहिए।आवेदक को अंग्रेजी (ऑनर्स) में ग्रेजुएट होना चाहिए। लेखन, संपादन और प्रूफ रीडिंग की क्षमता होनी चाहिए। विभिन्न विषयों पर रिसर्च और फैक्ट चेक करना आना चाहिए।

इंदौर फिल्मोत्सव-13वें वर्ष के लिए एंट्री भेजें 

सूत्रधार फ़िल्म सोसायटी, इंदौर द्वारा प्रति वर्ष आयोजित किया जाने वाला-"इंदौर फिल्मोत्स्व"इस वर्ष 28 सितंबर को होगा।इस वर्ष यह फ़िल्मोत्सव अपने 13 वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है।फिल्मकार अपनी शॉर्ट फिल्म, डॉक्युमेंट्री, एनिमेशन फ़िल्म या म्यूजिक वीडियो (अधिकतम अवधि-10 मिनट) 20 सितंबर तक सबमिट कर सकते है।sutradharindore@gmail.com पर ऑनलाइन भी फ़िल्में भेजी जा सकती है।अधिक विवरण के लिए 9827503834 या 9752222813 पर संपर्क किया जा सकता है। 

महाराष्ट्र में आशा रेडियो पुरस्कार

महाराष्ट्र सरकार ने पहली बार ‘महाराष्ट्र रेडियो फेस्ट 2025’ का आयोजन किया। जानी-मानी गायिका और पद्म विभूषण आशा भोसले के नाम पर स्थापित  आशा रेडियो पुरस्कार 2025’ से रेडियो के क्षेत्र में असाधारण योगदान देने वाले प्रस्तोताओं को दिया गया।

विकास संवाद से यूं जुड़ें

विकास संवाद को कर्मठ साथी की तलाश है जिन्हें संचार, और नए संचार माध्यमों में काम करने का पूर्ण कौशल और समझ हो, स्टोरी टेलिंग की फनकारी से संस्था की कहानियों को आकार देकर विभिन्न माध्यमों में प्रभावी मौजूदगी दर्ज कराए। कंटेंट को डिजिटल कंटेंट में तब्दील करे और संस्था की आनलाइन प्रस्तुतियों को प्रभावी रूप देकर उन्हें चहुंओर पहुंचा सके।एआई का उपयोग सामाजिक विकास के विभिन्न आयामों में कर सके।  लंबे समय तक काम करने की प्रतिबद्धता हो।  विस्तृत जानकारी और विस्तृत विवरण (जेडी) के लिए संपर्क कर सकते हैं office@vssmp.org

 पूजा  डीडी के साथ बनी रहेंगी 

मनीष गौतम अब पीआईबी भोपाल के नए डायरेक्टर होंगे। पूजा वर्धन डीडी भोपाल में AIR के साथ बनी रहेंगी। उनका पीआईबी जाना कैंसिल हो गया है। मनीष के पास CG का एडिशनल चार्ज रहेगा। वर्तमान में AIR दिल्ली में पदस्थ संजय तिवारी अब AIR लखनऊ में पदस्थ होंगे। भोपाल PIB के ADG का अहमदाबाद के लिए रवाना तय हो गया है।

मीडिया एजुकेशन से होता मोहभंग

राजस्थान के एक निजी विश्वविद्यालय और मध्य प्रदेश के निजी विश्वविद्यालय में मीडिया पाठ्यक्रम बंद किए जाने की ख़बर है। बताया जा रहा है कि पूरी संख्या में एडमिशन ना मिल पाने के कारण यह फैसला लिया जा रहा है। इन विवि में पीएचडी कर रहे स्टूडेंट्स की पीएचडी पूरी होते ही मीडिया विभाग बंद करने की तैयारी है। 

दिग्विजय सिंह की चिट्ठी ने छीनी वाजपेई की कुर्सी 

कुलसचिव डॉ अविनाश वाजपेई को हटाकर, डीन प्रोफेसर पी. शशिकला को प्रभारी कुलसचिव बनाया गया है। डॉ वाजपेई को हटाने की बातें लंबे समय से चल रही थी। एमसीयू स्टूडेंट एवं nsui से जुड़े तनय शर्मा के  fb पोस्ट की माने तो उन्होंने लिखा है कि प्रभारी कुलसचिव को हटाने के लिए  दिग्विजय सिंह ने वीसी को चिट्ठी लिखी थी। 

बातें हैं बातों का क्या

Mcu में कुलगुरु जल्द ही रोटेशन सिस्टम को एक्टिव कर सालों से जमे HOD के प्रभार में परिवर्तन करने वाले हैं। इसमें चार विभाग प्रभावित हो सकते हैं। फिलहाल बातें हैं, बातों का क्या।

शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

भाषाई राजदूत है मध्यप्रदेश


 प्रो. मनोज कुमार

मध्यप्रदेश के भौगोलिक गठन को लेकर निराश होता था. लगता था कि देश का ह्दयप्रदेश कहलाने वाले मध्यप्रदेश की कोई एक भाषा, एक संस्कृति नहीं है. यहाँ तक कि दो दशक पहले मध्यप्रदेश से अलग हुए छत्तीसगढ़ की भाषा छत्तीसगढ़ी है. लेकिन आज लग रहा है कि मेरा मध्यप्रदेश सचमुच में अनुपम है. अलग है और एक धडक़ते दिल की तरह वह भारत का प्रतिनिधि प्रदेश है. यहाँ भाषा और संस्कृति को लेकर कोई विवाद नहीं है. वह बाँहें पसारे खुले मन से सबका स्वागत कर रहा है. यह प्रदेश भावभूमि है. यहाँ देश के सभी प्रदेशों के भाषा-भाषी निवास करते हैं. उनकी संस्कृति और संस्कार को मध्यप्रदेश के रहने वाले स्वागत करते हैं. सच कहा जाए तो देश दिल मध्यप्रदेश भाषा और संस्कृति का राजदूत है. आज जब भाषा विवाद चरम पर है तब मध्यप्रदेश मुस्करा रहा है. शायद वह कह रहा है कि आओ, मुझसे सीखो कि भारत की बहुभाषी और संस्कृति को कैसे सम्मान दिया जाता है. पंडित नेहरू ने कभी मध्यप्रदेश को बेडौल प्रदेश कहा था लेकिन इसी बेडौल भू-भाग वाला मध्यप्रदेश भारत का आदर्श प्रदेश के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है. 

मध्यप्रदेश का मुआयना करें तो आपको कई रीजन मिलेंगे. इनमें मालवा, महाकोशल, विंध्य, बुुंदेलखंड, चंबल और कभी छत्तीसगढ़ भी इसका हिस्सा हुआ करता था. अपनी स्थापना के सात दशक बाद भी कभी यहाँ भाषा विवाद सुलगा नहीं और ना ही संस्कृति को लेकर कोई विवाद हुआ. बहुभाषी साहित्य को जितना बड़ा मंच मध्यप्रदेश में मिला, वह कहीं और नहीं. भारत के इस प्रतिनिधि प्रदेश में हर प्रदेश का स्वागत है. भरोसा ना हो तो एक बार भारत भवन के आयोजन का कैलेंडर उठा कर देख लीजिए. प्रतिवर्ष देश के सभी राज्यों की कलाओं का प्रदर्शन होता है, भागीदारी होती है. विविध भाषाओं के साहित्य पर चर्चा होती है. यही नहीं, मध्यप्रदेश की साहित्यिक सांस्कृतिक संगठन में हर भाषा को स्थान दिया गया है. मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद में मराठी, सिंधी, पंजाबी, भोजपुरी अकादमी है तो मध्यप्रदेश ने माँग की कि हम सिंधी की शिक्षा देंगे तो हाल ही में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में इस पाठ्यक्रम की अनुमति मिल गई और जल्द ही औपचारिक शिक्षा भी शुरू हो जाएगी. देश के ह्दयप्रदेश का ह्दय हर प्रदेश के लिए धडक़ता है और यही कारण है कि मध्यप्रदेश राजभवन में एक-एक कर विभिन्न राज्यों का स्थापना दिवस उत्सव मनाया जाता है.

भारत देश बहुभाषी संस्कृति और साहित्य का देश है. भाषा और बोली की यह खूबसूरती है कि हम सब मिलकर सतरंगी दुनिया गढ़ते हैं. गर्व के साथ मैं कह सकता हूँ कि मध्यप्रदेश भारत की इस छवि का प्रतिनिधि प्रदेश है. राजदूत है जो शांति, समन्वय और सद्भाव के संदेश को भेजता है. राज्य सरकार के अथक कोशिश से मध्यप्रदेश में लगातार फिल्मों, टीवी सीरियल्स और ओटीटी प्लेटफार्म के लिए निर्माण हो रहा है. इमदाद और मदद दोनों फिल्ममेकर्स को मिल रहा है लेकिन परदे पर कहीं एक पंक्ति नहीं दिखता ‘धन्यवाद मध्यप्रदेश’, बावजूद इसके हम उनका हमेशा से स्वागत करने तिलक रोरी लिए खड़े होते हैं. वर्तमान सरकार तो पीले चावल लेकर प्रदेश-दर-प्रदेश जा रही है कि आइए, हमारे प्रदेश में उद्योग लगाइए. मध्यप्रदेश इतना कर रहा है लेकिन सवाल है कि क्या मध्यप्रदेश जैसी सुंदर, सुखद पहल कोई और कर रहा है? क्या हम सब भारत माता के लाल नहीं हैं? इस पर विचार करना जरूरी हो जाता है.   

देश में छिड़ा भाषा विवाद नया नहीं है. समय-समय पर यह विवाद होता रहा है. इसमें सबसे अहम बात यह है कि भाषा का विरोध अर्थात हिन्दी का विरोध. हर प्रदेश की एक भाषा है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है. इसी बहुभाषी संस्कृति से भारत की विश्व में अलग पहचान है. भाषा विवाद के संकट बड़े हैं. वह ना केवल राष्ट्रीय एकता और संप्रुभता को संकट में डालता है बल्कि रोजी-रोजगार पर भी असर होता है. इस विवाद में एक उपाय यह भी हो सकता है कि आक्रामक होने के बजाय भाषा प्रशिक्षण केन्द्र हर राज्य में आरंभ कर दे. जिन्हें यह भाषा नहीं आती, उन्हें सीखने और समझने का अवसर दे. इससे शायद कोई रास्ता सुंदर निकल आए. रास्ता ना सही, एक पगडंडी तो मिल ही जाएगी. वैसे भी हिन्दी की खूबसूरती देखिए जिसका आप विरोध कर रहे हैं, वही आपको एक कर रही है

सोमवार, 30 जून 2025

विद्या ददाति विनयम्


प्रो. मनोज कुमार

भारतीय समाज के लिए जुलाई का महीना विशेष महत्व का होता है. इस महीने ज्ञान के द्वार खुलते हैं और हँसते-मुस्कराते नन्हें शिशु मन मोह लेते हैं. इस ज्ञान के द्वार को हम पाठशाला कहते हैं. हालाँकि नए दौर में पाठशाला शब्द वि
लुप्त होकर पब्लिक स्कूल जैसा हो गया है. साथ में नेशनल और इंटरनेशनल शब्द जुड़ गया है. कभी हमें शिक्षा-दीक्षा दी जाती थी कि ‘विद्या ददाति विनयम्’ और अब यह गुरु मंत्र किताबों में बंद हो गया है. सुप्रभात के स्थान पर गुडमार्निंग सुहाने लगा है. शासकीय पाठशालाओं में प्रवेशोत्सव हो रहा है तो प्रायवेट स्कूलों में मोटी फीस और एप्रोच के साथ एडमिशन हो रहा है. भारतीय शिक्षण व्यवस्था की वर्तमान की सच्चाई है. कुछ तर्कहीन लोग कहते हैं कि यह बदलाव समय के साथ जरूरी है लेकिन मुझे यह तर्क कम कुतर्क ज्यादा लगता है. जब प्रायवेट स्कूल नहीं थे तब क्या होनहार प्रतिभावान विद्यार्थी नहीं आते थे? छड़ी लिए मास्साब से खौफ खाते बच्चे अपने माता-पिता से शिकायत नहीं कर पाते थे क्योंकि शिकायत का मतलब था एक बार और कुटाई. आज के बच्चे अपने मदर-फादर से शिकायत ही नहीं करते बल्कि सजा के लिए भी टीचर को कटघरे में खड़ा करने से नहीं हिचकते. यह बदलाव कैसा है? किस समाज का हम निर्माण कर रहे हैं? कौन सा भविष्य बच्चों को दे रहे हैं?

शिक्षा में यह बदलाव एकाएक नहीं हुआ. हमारे पास कोसने के लिए अंग्रेजों के जमाने के मैकाले है. उसे हम गरियाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. सच से मुँह चुराते हमारे समाज का सच यही है कि हम बच्चों को मात्र अक्षर ज्ञान दे रहे हैं. उन्हें ना तो शिक्षित कर रहे हैं और ना दीक्षित कर रहे हैं. संस्कार और संस्कृति तो नेपथ्य में खड़ी बिसूर रही है. महँगी फीस और चमक-धमक वाले स्कूलों में सिर्फ डिग्री हासिल हो रही है. आज भी बहुत हद तक शासकीय पाठशाला की गरिमा और दिव्यता शेष है. कवि कुमार विश्वास अपने व्याख्यान में कहते हैं कि जब राज्य फेल होता है तब निजी संस्थाएँ इसकी जिम्मेदारी लेती हैं. शायद सच हो सकता है लेकिन क्या वे बताएँगे कि राज्य फेल क्यों हुआ? क्या हम सब राज्य के जिम्मेदार नागरिक नहीं हैं? वास्तव में इस भेड़चाल में हम सब शामिल हैं. यह भी सच है कि शिक्षक और पत्रकार की कोई नौकरी नहीं होती है. वह समाज को गढऩे का कार्य करता है लेकिन दुर्भाग्य से अब इन दोनों पुण्य कार्य को नौकरी का हिस्सा बना दिया गया है. जब शिक्षकों का इम्तहान लिया जाता है तो अधिकांश सिफर साबित होते हैं. कोई इम्तहान पत्रकारों के लिए भी हो तो वह भी शायद इसी पैमाने पर उतरें. एक चलन चल पड़ा है कि देखों शिक्षा गर्त में जा रही है, देखो पत्रकारिता पर लोगों का भरोसा उठ गया है. बात सच भी है लेकिन इस बात का जवाब कौन देगा कि यह गिरावट जब आपके समय में, आपकी उपस्थिति में हो रही थी, तब आपने क्या किया?

सिर्फ दोषारोपण से कुछ नहीं होने वाला. शिक्षा की जो हमारी गुरुकुल परम्परा है, जो ‘विद्या ददाति विनयम्’ की बुनियादी अवधारणा है, उसे पुर्नजीवित करना होगा. इस दिशा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कुछ कारगर प्रयास किया गया है. कौशल उन्नयन को प्राथमिकता दी गई है. मातृभाषा को भी आगे रखा गया है. एक नजर में इस नवीन शिक्षा नीति की प्रशंसा की जा सकती है लेकिन इसके क्रियान्वयन में अपार बाधा है. सबसे बड़ी बाधा है बजट का और इसके बाद आधारभूत ढाँचा को सुदृढ़ बनाने की. इसके बाद अध्ययन-अध्ययापन के लिए प्रशिक्षित से ज्यादा समर्पित शिक्षकों की जरूरत होगी. जो लोग नौकरी मान कर आ रहे हैं, उनसे यह अपेक्षा बेमानी होगी कि वे विद्यार्थियों को ‘विद्या ददाति विनयम्’ का पाठ पढ़ा सकें. शिक्षक के लिए वचनबद्धता की जरूरत होगी. हम यह नहीं कहते कि उनके कार्य के लिए मानदेय ना मिले. सम्मानजनक और परिवार चलाने लायक मिले लेकिन इसमें वे सुविधाभोगी ना हो जाएँ. इस बात का विशेष खयाल रखना होगा. हम उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में शासकीय पाठशालाओं का गौरव बढ़ेगा. गुरुकुल की व्यवस्था संभव ना हो तो ना हो लेकिन शिक्षण व्यवस्था में उसका भाव दिखना चाहिए.

बुधवार, 25 जून 2025

हिंदी विश्वविद्यालय को मिला कुलगुरु

डॉक्टर देव आनंद हिंडोलिया अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय के नए कुलगुरु नियुक्त किए गए हैं। एक सप्ताह बाद वर्तमान कुलगुरु डहेरिया का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। डॉ. हिंडोलिया प्रवेश एवं शुल्क विनियामक समिति के सचिव हैं।

डॉ. अजीत पाठक फिर नेशनल चेयरमेन

पब्लिक रिलेशन सोसायटी ऑफ इंडिया के लिए वर्तमान अध्यक्ष डॉ. अजीत पाठक को पुन: निर्विरोध चुन लिया गया है. डॉ. पाठक लगातार 21 वर्षों तक पीआरएसआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने का एशिया क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किया है। राष्ट्रीय पदाधिकारियों में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एस.पी.सिंह (पश्चिम),  यू.एस.शर्मा (दक्षिण), नरेन्द्र मेहता (उत्तर), सुश्री अनु मजूमदार (पूर्व) , राष्ट्रीय महासचिव डॉ पी.एल.के.मूर्ति तथा राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष श्री दिलीप चौहान चुने गए हैं। अगले नेशनल कांफ्रेंस देहरादून में किए जाने की घोषणा भी की गई। 

रामनाथ गोयनका अवार्ड के लिए आवेदन 30 तक

देश के प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका अवार्ड के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख 30 जून है. किसी भी भारतीय समाचार पत्र/पत्रिका/ऑनलाइन/टीवी चैनल (देश में प्रकाशित/प्रसारित) के लिए काम करने वाले पत्रकार आवेदन करने के पात्र हैं। भारतीय भाषा के अखबारों को अपनी कहानियों को अंग्रेजी में अनुवाद के साथ भेजना चाहिए। विदेशी संवाददाता भी आवेदन कर सकते हैं। अगर कहानी अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य भाषा में है तो कहानियों के साथ अनुवाद भी भेजना चाहिए। विजेताओं को समर्पित रामनाथ गोयनका पत्रकारिता उत्कृष्टता पुरस्कार ट्रॉफी का डिज़ाइन. निब और लौ, साहस और ईमानदारी की पत्रकारिता का प्रतीक है.

जुलाई में सब अपनी-अपनी जगह पर होंगे

आकाशवाणी, दूरदर्शन और पीआईबी में जो फेरबदल हुआ है उसमें जुलाई के पहले सप्ताह में सब अपना काम सम्हाल लेंगे. सुश्री पूजा वर्धन आकाशवाणी के साथ पीआईबी का दायित्व सम्हालेंगी. उनके स्थान पर दूरदर्शन में कौन आएगा, तय नहीं है. पीआईबी के प्रशांत पाठराबे अहमदाबाद भेजे गए हैं जबकि वहीं प्रेम बाबू गोरखपुर आकाशवाणी स्थानांतरित किए गए हैं. आकाशवाणी भोपाल के समाचार संपादक संजीव शर्मा हिमाचल पीआईबी का कार्य देखेंगे. 

एमसीयू को चाहिए गेस्ट लेक्चर 

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने अतिथि शिक्षकों के लिए भर्ती निकाली है. सभी पाठ्यक्रमों के लिए शिक्षकों की जरूरत है. यूजीसी की निर्धारित योग्यता रखने वालों के साथ दस वर्ष या अधिक का अनुभव रखने वालों से भी आवेदन आमंत्रित किया गया है. चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही शिक्षण का अवसर मिलेगा. कार्य व्यवहार कुशल रहा तो एक और अकादमिक वर्ष के लिए कार्यकाल भी बढ़ाया जा सकता है, इस बात का आश्वासन भी एमसीयू ने दिया है. 8 से 10 जुलाई को बिशनखेड़ी कैम्पस में इच्छुक उम्मीदवारों का साक्षात्कार होगा. अन्य जानकारी एमसीयू की वेबसाइट पर देखी जा सकती है.

http//samagam.co.in

शनिवार, 21 जून 2025

#आम का स्वाद और बचपन

डिजिटल जमाने में बच्चे ननिहाल से दूर हो गए हैं। अब उन्हें नानी मामा के घर जाना नहीं सुहाता है। मोबाइल उनकी दुनिया है। घर पर भी सबके बीच रहते हुए वे अकेले हैं। ऐसे में ननिहाल, मामा, बाई बहन और आम का स्वाद कैसे मिलेगा। आज आम का स्वाद नहीं है तो आने वाले कल में अपने बच्चों को बताने के लिए कुछ खट्टी मीठी यादें भी नहीं। खुद में डूबे बच्चों को देख कर पीड़ा होती है लेकिन वहीं शाश्वत सत्य क्या किया जा सकता है? 

आम का दिन ढलने लगा है। अब वह आम जिसे सफेदा, टपका या चूसनी कहा जाता है, आने लगा है। इसी आम का स्वाद लेते समय एक ऐसा आम का स्वाद मुंह में आया कि झटके में बचपन में पहुंच गया। स्वाद ऐसा कि ननिहाल की याद आ गई। वहीं स्वाद जो कभी बचपन में मामा के घर आम खाते हुए आता था। उम्र के छठे पड़ाव पर हूं और कहते हैं कि इस उम्र में स्वाद जाता रहता है। यानी कल तक खाने के लिए जीते थे और अब जीने के लिए खाना है। 

खैर, याद आया कि हमारे बड़े भैया मुन्ना भइया गर्मियों की छुट्टी में हम भाई बहिनों और मां मौसी को लेने आते थे। कुल मिलाकर हम सब 20 लोगों के आसपास होते थे। रायपुर रेलवे स्टेशन पर हम सब डेरा डाल देते थे। तब रायपुर से अकलतरा जाने के लिए जेडी ट्रेन हुआ करती थी। लगभग वह अपने नियत समय से देर से ही चला करती थी। कोई शाम 4 बजे अकलतरा पहुंचने वाली ट्रेन दो घंटे देरी से पहुंचती। फिर अकलतरा से ट्रकनुमा वाहन से बलौदा अपने ननिहाल का सफर शुरू होता। एकाध घंटे बाद बुचीहल्दी और फिर वहां से पैदल हंगामा करते घर पहुंचते। दिन भर सफर के बाद भी थकान का नामोनिशान नहीं। बड़ी मामी हम सबके लिए भोजन बनाने में जुट जाती। मौसी और मां उनकी मदद करती। हम बच्चों की पंगत लग जाती। एक परांठे के चार टुकड़े कर चार लोगों की थाली में दिया जाता। ऐसे ही दूसरी चार और तीसरी चार थाली में। यह दौर लंबा चलता।

रात होते ही छत पर बिस्तर लग जाता। बिस्तर क्या कुछ दरी, चटाई और गद्दे। गद्दे पर मां और मौसी का कब्जा हुआ करता था। हम में से कुछ टीन की चादर पर ही पसर जाते थे। अगले दिन हम सबको शाम होने की प्रतीक्षा होती थी। मामाजी हम सब के लिए एक एक बाल्टी में आम लाते थे। यह सिलसिला भी दो तीन घंटे चलता और जबतक वापसी नहीं हो जाती, चलता ही रहता।

मामा के घर गए हैं तो नए कपड़े भी सिलेंगे और यह होता भी था। यह वह खूबसूरत समय था जब पूरा गांव हमारा मामा, मौसी, बुआ और ऐसे ही रिश्तों में गुथा हुआ करता था। दर्जी मास्बाब अपनी मर्जी से कपड़ा सिलते थे। हमारी कोई सुनवाई या पसंद नहीं चलता था। जो सिल दिया, वही फायनल। अब वो दिन भी बिसर गए। अब तो घर पर काम करने वालों को पिद्दी से बच्चे नाम से पुकारते हैं। यह डोर टूटने के साथ ही रिश्तों की मिठास भी खत्म हो चली है।

मुझे याद आता है कि मामा के घर के सामने संतोष मामा रहते थे। सरदार संतोष, यह नाम तो आज भी याद नहीं। मामा और मामी याद है। उनके घर भी हमारे आने से उत्सव का माहौल हो जाता। मामी बड़े चाव से हमारे लिए खाना बनाती, लाड़ करती। कभी ख्याल भी नहीं आया कि वो हमसे अलग हैं। किशोर भैया बलौदा छोड़ कर बिलासपुर आ गए हैं। सालों से उनसे मुलाकात नहीं है। लेकिन जब भी मिलेंगे, लगेगा कि कल ही तो मिले थे। 

एक आम के स्वाद ने पांच दशक पहले बचपन की याद दिला दी। डर यह है कि डिजिटल बच्चों को कौन सा स्वाद इस उम्र में याद रहेगा

सोमवार, 16 जून 2025

##विश्व सिकलसेल दिवस 19 जून







सिकलसेल के खिलाफ महामहिम का सामाजिक सरोकार

प्रो. मनोज कुमार

महामहिम अर्थात राज्यपाल के बारे में आमतौर पर धारणा यह है कि उनका सरोकार राज्य की सत्ता पर निगरानी रखना होता है और यह कि वे सामाजिक सरोकार से दूर रहते हैं। मध्यप्रदेश के महामहिम मंगूभाई पटेल ने इस धारणा को ध्वस्त करते हुए जता दिया है कि राज्यपाल राजभवन की चहारदीवारी में रहने के लिए नहीं बल्कि उनका भी समाज में हस्तक्षेप जरूरी है। सिकल सेल बीमारी को नेस्तनाबूद करने के लिए मध्यप्रदेश के गर्वनर मंगूभाई पटेल ने सर्वाधिक सक्रियता के साथ इस अभियान में जुटे हुए हैं। मध्यप्रदेश में गर्वनर श्री पटेल लगातार लोगों के बीच जाकर जागरूकता फैला रहे हैं। गर्वनर के इन प्रयासों का समाज में असर देखने को मिल रहा है। मध्यप्रदेश के शहडोल जिले से सिकल सेल एनीमिया के खात्मे के संकल्प के साथ एक जनअभियान की शुरूआत हो चुकी है। 

यह जान लेना जरूरी है कि सिकल सेल एनीमिया किस तरह आदिवासी समाज का काल का ग्रास बना रही है, यह जानने से पहले जरूरी है कि यह जान लें कि अकेले मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि देश के करीब 17 राज्यों 7 करोड़ से अधिक आदिवासीजन इस बीमारी की चपेट में हैं। आबादी के मान से मध्यप्रदेश एक बड़ा आदिवासी प्रदेश है लिहाजा मध्यप्रदेश सर्वाधिक प्रभावित राज्य माना जा सकता है. वैसे इस समय देश के 17 जिलों में इस बीमारी का प्रकोप है जिनमें मुख्य रूप से ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल में यह बीमारी जड़े जमाए हुए है। आए दिन जनजातीय समुदाय की मौतें एनीमिया सिकल सेल में कारण हो रही है। मध्यप्रदेश में एनीमिया सिकलसेल आदिवासी बाहुल्य इलाकों में ज्यादा फैला हुआ है उनमें शहडोल, उमरिया, अनुपपुर, बालाघाट, डिंडोरी, मंडला, सिवनी, छिंदवाड़ा, बड़वानी, अलीराजपुर, बुरहानपुर, बैतूल, धार, शिवपुरी, होशंगाबाद, जबलपुर, खंडवा, खरगोन, रतलाम, सिंगरौली और सीधी के नाम शामिल हैं. सिकल सेल रोग (एससीडी) एक क्रोनिक एकल जीन विकार है जो क्रोनिक एनीमिया, तीव्र दर्दनाक एपिसोड, अंग रोधगलन और क्रोनिक अंग क्षति और जीवन प्रत्याशा में महत्वपूर्ण कमी की विशेषता वाले दुर्बल प्रणालीगत सिंड्रोम का कारण बनता है।

एक रिपोर्ट के अनुसार आदिवासी जिलों में सरकारी स्वास्थ सेवाओं के हाल में पहले की तुलना में सुधार तो हुआ है लेकिन सिकल सेल एनीमिया को उतनी गंभीर बीमारी नहीं माना जा रहा है जितनी यह गंभीर है। हालाँकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत, भारत सरकार अपने वार्षिक पीआईपी प्रस्तावों के अनुसार सिकल सेल रोग की रोकथाम और प्रबंधन के लिए राज्यों का समर्थन करती है।  वित्त वर्ष 2023-24 के केंद्रीय बजट में, 2047 तक सिकल सेल एनीमिया को खत्म करने के लिए एक मिशन शुरू करने की घोषणा की गई है। इस मिशन में जागरूकता सृजन, प्रभावित क्षेत्र में 0-40 वर्ष आयु वर्ग के लगभग सात करोड़ लोगों की सार्वभौमिक जांच पर ध्यान केंद्रित किया गया है। केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों के सहयोगात्मक प्रयासों के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों और परामर्श. सिकल सेल रोग की जांच और प्रबंधन में चुनौतियों से निपटने के लिए मध्यप्रदेश में राज्य हीमोग्लोबिनोपैथी मिशन की स्थापना की गई है। प्रधानमंत्री द्वारा बीते 15 नवंबर 2021 को मध्यप्रदेश के झाबुआ और अलीराजपुर जिले और परियोजना के दूसरे चरण में शामिल 89 आदिवासी ब्लॉकों में स्क्रीनिंग के लिए एक पायलट परियोजना शुरू की गई। राज्य द्वारा दी गई रिपोर्ट के अनुसार कुल 993114 व्यक्तियों की जांच की गई है जिनमें से 18866 में एचबीएएस (सिकल ट्रेट) और 1506 (एचबीएसएस सिकल रोगग्रस्त) पाए गए हैं। इसके अलावा, राज्य सरकार ने रोगियों के उपचार और निदान के लिए 22 जनजातीय जिलों में हीमोफिलिया और हीग्लोबिनोपैथी के लिए एकीकृत केंद्र की स्थापना की है।

सिकल सेल एनीमिया खून की कमी से जुड़ी एक बीमारी है। इस आनुवांशिक डिसऑर्डर में ब्लड सेल्स या तो टूट जाती हैं या उनका साइज और शेप बदलने लगती है जो खून की नसों में ब्लॉकेज कर देती हैं। सिकल सेल एनीमिया में रेड ब्लड सेल्स मर भी जाती हैं और शरीर में खून की कमी हो जाती है। जेनेटिक बीमारी होने के चलते शरीर में खून भी बनना बंद हो जाता है। वहीं शरीर में खून की कमी हो जाने के कारण यह रोग कई जरूरी अंगों के डेमेज होने का भी कारण बनता है। इनमें किडनी, स्प्लीन यानि तिल्ली और लिवर शामिल हैं। 

लक्ष्य है कि साल 2047 तक इस रोग को भारत से जड़ से खत्म कर दिया जाए। इसी कड़ी में पीएम मोदी ने शहडोल में सिकल सेल कार्ड वितरण कर बीमारी की स्क्रीनिंग के लिए लोगों को जागरूक करने का संदेश दिया था। गर्वनर की देखरेख में राज्य सरकार भी सक्रिय हुई और पहले की तुलना में काफी कुछ सुधार देखने को मिल रहा है। सिकलसेल के खिलाफ इलाज और परीक्षण से ज्यादा जरूरी आदिवासी समाज को जागरूक करना है। इस बीमारी में सबसे अहम सिकल सेल बीमारी को रोकने का एक प्रभावी तरीका इस रोग से ग्रस्त स्त्री-पुरुषों में विवाह को रोकना है। लेकिन यह तभी संभव है, जब सिकल सेल रोगग्रस्त लोगों की पहचान हो और उनके बीच विवाह संबंधों पर रोक लगे। यह काम लोगों में इस रोग के प्रति जागृति फैलाने से ही हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार सिकल सेल एनीमिया 3 प्रकार का होता है। पहला प्रकार सिकल वाहक है, सिकल वाहक में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते और ऐसे व्यक्ति को उपचार की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन ऐसे व्यक्ति को यह पता होना चाहिये कि वह सिकल वाहक है। यदि अनजाने में सिकल वाहक दूसरे सिकल रोगी से विवाह करता है, तो सिकल पीडि़त संतान पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है। दूसरे प्रकार के सिकल रोगी में सिकल सेल बीमारी के लक्षण दिखाई देते हैं। इन्हें उपचार की आवश्यकता होती है। सिकल बीटा थेलेसिमिया तीसरे प्रकार का सिकल सेल रोग है। बीटा थैलेसिमिया बीटा ग्लोबिन जीन में दोष के कारण होता है। सिकल सेल बीमारी अनुवांशिक बीमारी है. सिकल सेल रोगी के साथ खाना खाने, साथ रहने, हाथ मिलाने अथवा गले मिलने से यह रोग नहीं होता। यह बीमारी केवल माता-पिता से ही बच्चों में आ सकती है। सिकल सेल में रोगी की लाल रक्त कोशिकाएं हंसिए के आकार में परिवर्तित हो जाती हैं। हंसिए के आकार के ये कण शरीर के विभिन्न अंगों में पहुंच कर रुकावट पैदा करते हैं। इस जन्मजात रोग से ग्रसित बच्चा शिशु अवस्था से बुखार, सर्दी, पेट दर्द, जोड़ों एवं घुटनों में दर्द, सूजन और कभी रक्त की कमी से परेशान रहता है। सिकलसेल-एनीमिया ऐसा रक्त विकार है, जिसमें लाल रक्त कोशिकाएं जल्दी टूट जाती है। इसके कारण एनीमिया और अन्य जटिलताएं जैसे कि वेसो-ओक्लुसिव क्राइसिस, फेफड़ों में संक्रमण, एनीमिया, गुर्दे और यकृत की विफलता, स्ट्रोक आदि की बीमारी और यहां तक की पीडि़त के मौत तक की आशंका रहती है। 

सिकल सेल एनीमिया रोग दुनिया में है तो काफी पहले से, लेकिन वैज्ञानिकों को इसका पता पहली बार 1910 में कैरेबियाई देश ग्रेनाडा में चला। वहां इसे एक मेडिकल छात्र लिनस पॉलिंग और उसके सहयोगियों ने खोजा। उन्होंने बताया कि इस रोग से ग्रस्त रोगियो में सिकल हीमोग्लोबिन में एक असामान्य परिवर्तित इलेक्ट्रोफोरेटिक (विद्युत कण संचलन) गतिविधि देखने में आई है। 1949 में पहली बार इसे आण्विक रोग के रूप में पारिभाषित किया गया। 1957 में वेर्नन इनग्राम ने बताया कि सिकल सेल हीमोग्लोबिन रोग का मूल कारण हीमोग्लोबिक अणुओं में एकल अमीनो एसिड का प्रतिस्थापन है। इस रोग के कारणो का तो कुछ पता लग गया है, लेकिन इसका स्थायी इलाज अभी तक नहीं खोजा जा सका है। लिहाजा देश में सिकल एनीमिया को लेकर शुरू किया गया देशव्यापी अभियान इसी अनिवार्यता का हिस्सा है। 

मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री मंगूभाई पटेल इस बीमारी के खिलाफ जन-जागृति के लिए प्रयासरत हैं. अपने हर कार्यक्रम में वे लोगों को इस बीमारी के बारे में बताते हैं और इस बीमारी के खिलाफ खड़े होने का आग्रह करते हैं. सिकल सेल एनीमिया के खिलाफ इस जंग में सरकारों को राजनीतिक लाभ ना मिले लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता मौत के मुंह में समा रहे लोगों को नया जीवन जरूर मिल सकेगा. सिकल सेल एनीमिया के खिलाफ सरकार ने जो अभियान शुरू किया है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि इसका सुपरिणाम देखने को मिलेगा. इसमें सबसे प्रबल पक्ष यह है कि लोगों तक शासकीय अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी पहुंचे. यही नहीं, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का दस्ता घर-घर जाकर सरकारी दवाखाना में आने के लिए प्रेरित करे. स्कूलों, पंचायतों और आंगनवाड़ी में कैम्पेन चलाया जाए. सरकार ने अभियान शुरू किया है, यह तो एक पक्ष है लेकिन समाज का साथ में सक्रिय होना भी जरूरी है. राज्य की मोहन सरकार ने भी इस दिशा में सकरात्मक प्रयास कर रही है जिसका असर दिख रहा है. हालाँकि बीमारी का निदान किया जाना कठिन है लेकिन जनजागरूकता से इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है। एक संभावना का उदय हो चुका है. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 

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