गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

जो बचा है, उसे ही बचा लो

 जो बचा, उसे ही बचा लो

जैसे प्रेम और प्रकृति 

जैसे पेड़, पहाड़ और नदियां 

हम सब मर जाएंगे 

तब भी बचा रहेगा यह सब

इन्हें आज ना बचा पाए तो

कहां विसर्जित होंगी

तुम्हारी अस्थि

जब नहीं होगी नदियां 

कैसे जलेंगे तुम्हारे शव

जब नहीं होंगे जंगल

कैसे आनंदित होगे

जब नहीं होंगे पहाड़

जो बचा है, उसे ही बचा लो

प्रेम और प्रकृति 

प्रो. मनोज कुमार

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

‘ज्ञानपीठ’ का महाप्रयाण हो जाना

 





प्रो. मनोज कुमार

    आखिरकार ‘ज्ञानपीठ’ विनोद कुमार शुक्ल जीवन संघर्ष में पराजित होकर अलविदा कह दिया. उनका जाना नियति की स्वीकृति हो सकती है लेकिन समाज और साहित्य को यह बिलकुल भी गंवारा नहीं था. उनकी एक-एक धडक़न समाज के लिए धरोहर थी. कहते हैं सरल होना कठिन नहीं है लेकिन सरल बने रहना कठिन है. विनोदजी ने सरल बने रहना को सच कर दिखाया था. अविभाजित मध्यप्रदेश के एक कस्बानुमा शहर में पढ़ाते हुए वे रचना किया करते थे. उनके जानने वाले जानते थे कि विनोदजी किस मिट्टी के बने हुए हैं. बेहद सरल और सहज. अपनों से छोटे हों, हमउम्र हों या उम्रदराज, उनके पास जाकर किसी ने खुद को छोटा नहीं पाया. यह बहुत कम होता है कि किसी को श्रेष्ठ सम्मान से नवाजा जाए तो पूरा समाज स्वयं को सम्मानित महसूस करता है. विनोदजी को जब ‘ज्ञानपीठ’ मिलने का ऐलान हुआ तो यह भी उन अपवाद वाले पल-छीन में था. रायपुर से दिल्ली तक स्वागत और उत्साह का माहौल था. 

        ‘वह आदमी नया गरम कोट पहनकर चला गया विचार की तरह’ अपनी इस पहली कविता संगह से वे चर्चा में आ गए. यह प्रयोगधर्मी शीर्षक को पढक़र सुनकर साहित्य प्रेमी चौंक गए थे. तब उस दौर में ऐसा प्रयोग ना के बराबर था. वे इस बात के कभी हामी नहीं रहे कि कविता को नारे की तरह गढ़ा जाए. उनकी रचनाओं में लोक की छाप दिखती है तो आधुनिक समाज में हो रहे परिवर्तन, आकांक्षाओं के साथ उनकी संवेदनशीलता झलकती है. सही मायने में देखा जाए तो उनका लेखन सुपतिेिष्ठत कवि भवानी प्रसाद मिश्र की बातों को आगे बढ़ाते हुआ दिखता है जिसमें भवानी भाई कहते हैं- जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख, और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख. 

विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर के थे लेकिन उनकी कविताएं और कथा संसार सारी भौगोलिक सीमा को लांघ जाती है. ज्ञानपीठ सम्मान का ऐलान हो जाने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि ‘मेरे पास में शब्द नहीं हैं कहने के लिए, क्योंकि बहुत मीठा लगा कहूंगा, तो मैं शुगर का पेशेंट हूं. मैं इसको कैसे कह दूं कि बहुत मीठा लगा. बस अच्छा लग रहा है.’. यह सादगी उन्हें और बड़ा बनाती है. 

एक जनवरी, 1937 में विनोद कुमार शुक्ल का जन्म साहित्य से रचे-बसे शहर राजनांदगांव में हुआ. वे अध्यापक रहे और पूरा समय साहित्य को समर्पित कर दिया था.  उम्र के 88वें पड़ाव पर खड़े विनोद कुमार शुक्ल वैसे ही सहज और सरल रहे जैसा कि छत्तीसगढ़ का एक व्यक्ति होता है. वे ज्ञानपीठ सम्मान को केवल सम्मान नहीं मानते हैं बल्कि अपनी जवाबदारी के रूप में देखते थे. बकौल विनोद कुमार शुक्ल ‘मुझे लिखना बहुत था, बहुत कम लिख पाया. मैंने देखा बहुत, सुना भी मैंने बहुत, महसूस भी किया बहुत, लेकिन लिखने में थोड़ा ही लिखा. कितना कुछ लिखना बाकी है, जब सोचता हूं, तो लगता है बहुत बाकी है. इस बचे हुए को मैं लिख लेना चाहता हूं. अपने बचे होने तक मैं अपने बचे लेखक को शायद लिख नहीं पाऊंगा, तो मैं क्या करूं? मैं बड़ी दुविधा में रहता हूं. मैं अपनी जिंदगी का पीछा अपने लेखन से करना चाहता हूं. लेकिन मेरी जिंदगी कम होने के रास्ते पर तेजी से बढ़ती है और मैं लेखन को उतनी तेजी से बढ़ा नहीं पाता, तो कुछ अफसोस भी है’. ऐसे थे विनोद जी.

विनोद जी के उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ पर सुपरिचित फिल्मकार मणि कौल फिल्म भी बना चुके हैं. उनकी कहानियाँ ‘आदमी की औरत’ एवं ‘पेड़ पर कमरा’ पर राष्ट़ीय फिल्म इंस्टीट्यूट, पूना द्वारा अमित दत्ता के निर्देशन में निर्मित फिल्म को वेनिस अंतरराष्टीय फिल्म समारोह 2009 में ‘स्पेशल मेनशन अवार्ड’ मिला. उनके उपन्यास ‘दीवार में एक खिडक़ी रहती थी’ पर प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक मोहन महर्षि सहित अन्य रचनाओं पर निर्देशकों द्वारा नाट्य मंचन भी हो चुका है.

ज्ञानपीठ के पहले उन्हें मध्यपदेश शासन का गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप, मध्यप्रदेश कला परिषद  का रज़ा पुरस्कार, मध्यपदेश शासन का शिखर सम्मान, राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, मोदी फाउंडेशन का  दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान, भारत सरकार का साहित्य अकादमी सम्मान, उत्तरपदेश हिन्दी संस्थान का हिन्दी गौरव सम्मान, अंग्रेजी कहानी संग्रह के लिए मातृभूमि सम्मान के साथ ही साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सर्वोच्च सम्मान ‘महत्तर सदस्य’ मनोनीत किया गया था. 

विशिष्ट भाषिक बनावट, संवेदनात्मक गहराई, उत्कृष्ट सृजनशीलता से उन्होंने भारतीय भाषा साहित्य को समृद्ध किया है. इसलिए कहते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल हो जाना आसां नहीं है. तभी तो 59वें ज्ञानपीठ सम्मान के लिए चयनित हो जाने की सूचना के बाद हिंदी के वरिष्ठ कवि-चिंतक अशोक वाजपेयी का कहते हंै कि ‘यह सम्मान एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया है, जिसने अपनी रचनाधर्मिता को निपट साधारण और नायकत्व से निरपेक्ष व्यक्ति को समर्पित किया है’. वे समाज के नब्ज को जानते हैं और उन पर भी उनका दखल है. 

विनोद कुमार शुक्ल की कविता संगह लगभग जयहिंद वर्ष, 1971, वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह, वर्ष 1981, सब कुछ होना बचा रहेगा, वर्ष, 1992, अतिरिक्त नहीं, वर्ष 2000, कविता से लंबी कविता, वर्ष 2001, आकाश धरती को खटखटाता है, वर्ष 2006, पचास कविताएँ, वर्ष 2011, कभी के बाद अभी, वर्ष 2012, कवि ने कहा -चुनी हुई कविताएँ, वर्ष 2012, प्रतिनिधि कविताएँ, वर्ष 2013 में पकाशित हुई. उपन्यास संग्रह नौकर की कमीज़, वर्ष 1979, खिलेगा तो देखेंगे, वर्ष 1996, दीवार में एक खिडक़ी रहती थी, वर्ष 1997, हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़, वर्ष 2011, यासि रासा त, वर्ष 2017, एक चुप्पी जगह, वर्ष 2018 है. कहानी संग्रह मेें पेड़ पर कमरा, वर्ष 1988, महाविद्यालय, वर्ष 1996, एक कहानी, वर्ष 2021, घोड़ा और अन्य कहानियाँ, वर्ष 2021 के साथ कहानी/कविता पर पुस्तक ‘गोदाम’, वर्ष 2020, ‘गमले में जंगल’, वर्ष 2021 हैं. विनोद कुमार शुक्ल की अनेक कृतियों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है. साहित्य, संस्कृति एवं मनुष्यत्व के ‘ज्ञानपीठ’ विनोद जी के चले जाने से उनके पीछे जो रिक्तता आयी है, उसे भरा पाना लगभग कठिन सा होगा. तस्वीर इंटरनेट से साभार

 


सोमवार, 22 दिसंबर 2025

#रिसर्च जर्नल ‘समागम’ जनवरी 2026 का अंक ‘गांधी का अर्थशास्त्र’ पर एकाग्र



 25वें वर्ष का अंतिम अंक ‘गांधी का अर्थशास्त्र’ पर एकाग्र 

रिसर्च जर्नल ‘समागम’ जनवरी 2026 में अपने प्रकाशन के 25वें वर्ष पूर्ण कर लेगा. शोध और संदर्भ की इस मासिक प्रकाशन को देशभर के बुद्धिजीवियों, अध्यापकोंं, विद्यार्थियों एवं स्कॉलर का पूरा सहयोग एवं समर्थन मिलता है. आरंभ से प्रयास रहा है कि कुछ अलग करें और इस सोच के साथ हम नवाचार की ओर कदम बढ़ाते हुए रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का प्रत्येक अंक विषय-विशेष का रहा. भारतीय सिनेमा के सौ साल, गांधी की साद्र्धशती, महिला सशक्तिकरण के सौ वर्ष, रेडियो का सफर, खादी पर, विश्व हिन्दी सम्मलेन सहित अनेक विषयों पर अंक का प्रकाशन किया जाता रहा. हाल ही में दिवंगत विज्ञापन गुरु पीयूष पांडे पर रिसर्च जर्नल ‘समागम’ अंक एकाग्र प्रस्तुत किया गया. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का 25वें वर्ष का अंतिम अंक ‘गांधी का अर्थशास्त्र’ पर एकाग्र है. 

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण

 



























-मनोज कुमार 
 इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण. इस बात में अब कोई दो राय नहीं है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण हो चुका है. आने वाले समय में व्यवसायिकरण का यह चेहरा और विकृत और विकराल देखने को मिले तो समाज को हैरान नहीं होना चाहिये.  माध्यम अर्थात अंग्रेजी का शब्द मीडिया. मीडिया का सामान्य सा अर्थ है मीडियम अर्थात समाज और सरकार के बीच संवाद का सेतु किन्तु संवाद का यह सेतु वह चाहे इलेक्ट्रानिक हो या मुद्रित, दोनों का चेहरा कारोबारी हो गया है. इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने के पूर्व पत्रकारिता एवं माध्यम दोनों के स्वरूप एवं चरित्र पर गौर करना उचित होगा. पत्रकारिता एवं माध्यम अर्थात मीडिया दोनों की विषय-वस्तु अलग अलग है. दोनों की प्रवृति एवं प्रकृति एकदम अलग हैं. व्यवसायिकरण की चर्चा के पूर्व दोनों को समझना होगा. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण की बात करने के पूर्व मीडिया और पत्रकारिता के अन्र्तसंबंध एवं इन दोनों के बीच का अंतर समझना होगा. सबसे पहले मैं पत्रकारिता की प्रवृति एवं प्रकृति पर प्रकाश डालना चाहूंगा. 
सर्वप्रथम हम बात करेंंगे पत्रकारिता की. पत्रकारिता समाज का वटवृक्ष है तो मीडिया नये जमाने का संचार माध्यम. पत्रकारिता निरपेक्ष होकर, लाभ-हानि के गणित से परे रहकर, सामाजिक सरोकार की पैरोकार है. पत्रकारिता का चरित्र और कार्य व्यवहार, मीडिया से एकदम भिन्न है. पत्रकारिता दिल से होती है. समाज में जब अन्याय होता है, अराजकता की स्थिति बनती है और आम आदमी के हितों पर कुठाराघात होता है तो पत्रकारिता स्वयं में आंदोलित हो उठती है. स्मरण कीजिये पराधीन भारत के उस दौर को जब गोरे शासकोंं के नाक में पत्रकारिता ने दम कर रखा था. तिलक, महात्मा गांधी से लेकर गणेशशंकर विद्यार्थी, गोखले, माधवराव सप्रे, माखनलाल चतुर्वेदी जैसे दर्जनों लोगों ने अपनी लेखनी से अंग्रेज शासकों की नींद उड़ा दी थी. समय बदला, काल बदला लेकिन पत्रकारिता के तेवर नहीं बदले. देश के स्वाधीन होने के बाद भारत वर्ष के नवनिर्माण में पत्रकारिता ने अपना योगदान दिया. देश की पहली पंचवर्षीय योजनाओं के लागू होने के साथ ही भ्रष्टाचार का श्रीगणेश हुआ. पत्रकारिता अपनी ही सरकार को आईना दिखाने से नहीं चूकी. परिणाम यह हुआ कि भ्रष्टाचार तो हुआ लेकिन उसका ग्राफ रूक गया. यह मान लेना भी भूल होगी कि पत्रकारिता ने भ्रष्टाचार को, अनाचार को, अत्याचार को खत्म कर दिया है लेकिन पत्रकारिता की ही ताकत थी कि भ्रष्ट को भ्रष्टतम नहीं होने दिया. पत्रकारिता को दमन का शिकार भी होना पड़ा है. पराधीन भारत में अंग्रेज शासकों ने किया और स्वतंत्र भारत में हमारे अपनों ने ही. उन अपनों ने जिन्हें अपनी करतूतों के खुल जाने का भय था. पत्रकारिता की ही ताकत है कि 25 बरस से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी अरूण शौरी द्वारा उद्घाटित किया गया बोफोर्स का मामला आज भी जीवित है. विश्व की भीषणत औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड को भला कौन भूल सकता है. एक अनाम सा साप्ताहिक अखबार ने सचेत किया था. पत्रकारिता का यह चरित्र है. पत्रकारिता के इस चरित्र के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ संबोधित किया गया . 
पत्रकारिता का इतिहास हमें गर्व से भर देता है. पराधीन भारत से लेकर स्वाधीन भारत की पत्रकारिता की विश्वसनीयता इतनी पक्की है कि करीब ढाई सौ सालों के इतिहास में कोई अखबार अथवा पत्रिका गलत खबर छापने के कारण बंद नहीं हुई लेकिन पश्चिमी देशों में पत्रकारिता की जो दशा है, उसके चलते हाल ही में सौ साल से अधिक पुराने अखबार का प्रकाशन बंद कर दिया गया. भारत में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन रूका या बंद हुआ तो सिर्फ इसलिये कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी. वे व्यवसायिक नहीं बन पाये. पत्रकारिता एक चुनौती है. यह चुनौती आपको कस्बाई पत्रकारिता में देखने को मिल जाएगी. जहां एक दरोगा, एक पटवारी या एक मामूली सा धनवान व्यक्ति भी अपने खिलाफ कुछ पढऩा या सुनना नहीं जानता है. ऐसे में सच का साथ देना ही पत्रकारिता है.
पत्रकारिता की अपनी भाषा होती है. उसकी अपनी शैली है. पत्रकारिता की भाषा बेलौस नहीं होती है. वह संयमित होती है और सम्मानजनक भी. पत्रकारिता किसी को बेपर्दा भी करती है तो पूरे तथ्य और प्रमाण के साथ. वह सनसनी नहीं फैलाती है. पत्रकारिता का गुण यह भी है कि वह खबर का पीछा करती है. जिसे अंग्रेजी में फालोअप कहते हैं. वह आखिरी सिरे तक पहुंच कर सच को सामने लाने की कोशिश करती है ताकि समाज में शुचिता कायम रहे. पत्रकारिता का यह गुण उसकी विश्वसनीयता को बनाये रखता है. आगे पाठ, पीछे सपाट पत्रकारिता की शैली नहीं है. 
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की बात के बरक्स मैं वापस दोहराना चाहूंगा कि इसे एक ही नाम मिला है मीडिया. मीडिया में पत्रकारिता को भी शामिल किया गया है, बावजूद इसके मीडिया और पत्रकारिता का फर्क वैसा ही दिखता है जैसा कि इलहाबाद में गंगा और जमुना के संगम का.  मीडिया का कार्य-व्यवहार दिमाग से होता है. वह पहले लाभ-हानि का गणित लगा लेता है. वह अपने लाभ को पहले रखता है, फिर वह एक निश्चित सोच के साथ अपने कार्य को पूर्ण करता है. मीडिया अर्थात टेलीविजन के पर्दे पर वही दिखाया जाता है, जो मीडिया के पक्ष में लाभकारी होता है. संचार के इस विधा में दिल का नहीं, सौफीसद दिमाग का कब्जा होता है. पत्रकारिता और मीडिया के बीच यह बुनियाद अंतर दोनों को कई अर्थों में अलग करता है. मीडिया का बहुत सीधा वास्ता सामाजिक सरोकार से नहीं होता है. वह अपने लाभ के लिये लोगों की इमेज बिल्डिंग का काम करता है. जिन खबरों या घटनाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम स्थान देता है तो इसलिये कि उसकी टीआरपी बढ़ सके. 
मीडिया की उत्पत्ति लगभग तीन दशक के आसपास की है. मीडिया शब्द आया कहां से, यह अनसुलझा सा है.  इस बारे में विद्वानों की राय भी स्पष्ट नहीं है. कुछ लोगों का मत है कि जिस तरह पत्रकारिता से सम्पादक संस्था का लोप कर दिया गया, उसी समय मीडिया शब्द को चलन में लाया गया. सम्पादक संस्था की कमान प्रबंधकों के हाथों में आ गयी और मीडिया में सम्पादक संस्था के लिये कोई स्थान रखा ही नहीं गया था. इस तरह अर्मूत रूप से मीडिया शब्द की रचना की गयी और बेहद चालाकी के साथ इसे स्थापित कर दिया गया. मीडिया तो माध्यम है ही, पत्रकारिता को भी माध्यम बना दिया गया.
उपरोक्त संदर्भ के रूप में अब यह बात हमारे सामने स्पष्ट हो जाती है कि पत्रकारिता क्या है, उसकी प्रवृति और प्रकृति क्या है तथा मीडिया की प्रवृत्ति और प्रकृति क्या है. इन दोनों के बीच का अन्र्तसंबंध भी लगभग स्पष्ट हो गया है. सवाल यह है कि क्या दोनों माध्यम व्यवसायिक हो गये हैं, तो इस सवाल का सीधा-सादा जवाब हां में है. मुद्रित माध्यम से आशय पत्रकारिता से हो सकता है और आज की तारीख में पत्रकारिता को लेकर जो संशय और सवाल उठाये जा रहे हैं, सवाल उठ रहे हैं, वह पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की ओर संकेत करता है. कुछ आगे बढक़र कहें कि पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की बात को स्थापित करता है तो भी गलत नहीं होगा. पत्रकारिता के हिस्से में पेडन्यूज का जो धब्बा बार बार लगता रहा है, वह पत्रकारिता के व्यवसायिकरण का ही उदाहरण है. पेडन्यूज को लेकर चिंता चारों तरफ है तो इसलिये कि पत्रकारिता का मूल स्वरूप सामाजिक दायित्व, निरपेक्ष व्यवहार और सच का साथ देने की ताकत खत्म न हो जाये. यह बात हमें सुकून देती है कि पेडन्यूज का दाग तो लगा है लेकिन अभी रोशनी के कुछ सुराख ही बंद हुये हैं. पूरा केनवास अभी काला नहीं हुआ है. हालांकि जिस तेजी से पत्रकारिता का व्यवसायिकरण हो रहा है, वह भयावह है. पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं जहां पत्रकारिता के दिग्गज भ्रष्टाचारियों को बचाने में शामिल पाये गये. यह और बात है कि प्रमाण के अभाव में या प्रभाव के बूूते पर वे अपने आसान पर जमे हुये हैं. अब पत्रकारिता की भाषा भी बेलौस होती जा रही है क्योंकि वह बाजार की भाषा बोलने लगी है. मुद्रित माध्यम का व्यवासायिक होने के पीछे उसका आधुनिक भी हो जाना है. महंगी मशीनें, महंगी छपाई, कागज और उत्पादन खर्च इतना है कि वह दो-पांच रूपये की कीमत से वसूला नहीं जा सकता है. इस तरह मुद्रित माध्यम पूर्णरूप से व्यवसायिकरण की ओर कदम बढ़ चुका है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम अपने जन्मकाल से व्ययवसायिक रहा है. पत्रकारिता अथवा मुद्रित माध्यम के विपरीत इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का चरित्र है. दूरदर्शन का जब जन्म हुआ था, तब इसे बुद्धु बक्सा कह कर इसे समाज ने तव्वजो नहीं दी थी किन्तु आकाशीय चैनलों के आगमन के साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का एकछत्र राज्य कायम हो गया. इस माध्यम ने एक वाक्य गढ़ा जो दिखता है, वो बिकता है और इसी सूत्रवाक्य के सहारे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पूरी तरह बाजार के कब्जे में आ गया. व्यवसायिकरण कुछ इस माध्यम की बुनियादी जरूरतें थी तो कुछ उसने स्वयं उत्पन्न कर लिया. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने मान लिया कि बाजार के मन के मुताबिक उसे चलना है और वह चलता गया. एक प्रिंस के गड्ढे में गिर जाने को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने इतना हाइप दिया कि लगा कि संसार में पहली दफा कोई बच्चा गड्ढे में गिरा है. इसके बाद ऐसी घटनाओं को दिखाने में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की रूचि कम होने लगी. उसे पता था कि दर्शक बहुत ज्यादा नहीं झेल पायेंगे. तथ्यपरक घटनाओं को दिखाने की कोशिश तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में होती है लेकिन अवसर पाकर इस माध्यम ने सनसनी फैलायी है. ऐसा एक बार नहीं, कई कई बार हुआ है. दिल्ली की एक शिक्षिका के मामले में तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को अदालत का सामना भी करना पड़ा है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की प्रवृति हमेशा से आगे पाठ, पीछे सपाट की रही है. वह खबरों के पीछे भागना नहीं जानता है अथवा नहीं चाहता है. वह हर घड़ी नयी खबर की तलाश में जुटा रहता है. खबरों को अथवा घटनाओं को बीच में छोड़ देना भी इस माध्यम की प्रवृति रही है. इस बात का एक बड़ा उदाहरण है ऑपरेशन चक्रव्यूह. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने उन सांसदों को बेनकाब करने का अभियान चलाया था जो कथित रूप से गैरकानूनी ढंग से धन प्राप्त करते हैं. इस ऑपरेशन में 11 सांसदों को घेरे में लिया गया था और अचानक से यह अभियान बंद कर दिया गया. इसके पीछे क्या कारण समझा या माना जाये, दर्शकों के पास जो संदेश गया, वह क्या यह नहीं था कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का व्यवसायिकरण हो चुका है और शायद इन्हीं कारणों से यह अभियान बीच में बंद कर दिया गया. करप्सन अंगेस्ट इंडिया आंदोलन में भी मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया गया था. जी-जिंदल विवाद किस बात की तरफ संकेत करते हैं?  इस तरह यह बात साफ है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का व्यवसायिकरण हो चुका है.
निष्र्कषत: हम यह मान लेना चाहिये कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम एवं मुद्रित माध्यम व्यवसायिकरण की तरफ अपना कदम बढ़ा चुके हैं. कुछ व्यवसायिक जरूरतों के कारण और कुछ कथित रूप से उत्पन्न जरूरतों के कारण. मुद्रित माध्यम को पेडन्यूज जैसे कलंक से स्वयं को बचाना होगा. यह राहत की बात है कि व्यवसायिकरण के इस दौर में मुद्रित माध्यम ने अपनी साख बचाकर रखी है. मुद्रित माध्यम पर लोगों का विश्वास अभी भी कायम है और बार बार टेलीविजन के पर्दे पर खबरें देखने और सुनने के बाद भी वह अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पलटने के बाद ही राहत पाता है. (औरगाबाद में हुए एक  दिवसीय सेमिनार में दिया गया भाषण) 

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

#नवाचार का 70वाँ ‘विधान’



















प्रो. मनोज कुमार

मध्यप्रदेश की पहचान एक उत्सवी प्रदेश की रही है लेकिन वह नवाचार का प्रदेश भी रहा है. अनेक ऐसे मौके और प्रसंग आए हैं, जब मध्यप्रदेश का नवाचार देश के लिए आदर्श बना हुआ है. मध्यप्रदेश विधानसभा ने अपना 69वाँ स्थापना दिवस मनाकर अगले वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर आयोजित विशेष सत्र में यह देखने को मिला. मध्य प्रदेश विधानसभा में लगभग एक दशक बाद विशेष सत्र बुलाया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में विशेष सत्र आयोजित किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के गठन के समय और 1997 में आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर भी विशेष सत्र बुलाया गया था। विधानसभा अध्यक्ष के नवाचार पहल के अंतर्गत यह आयोजन किया गया. हालाँकि इसके पूर्व हर वर्ष प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण करने की परम्परा का श्रीगणेश भी किया गया।

इस अवसर पर मध्यप्रदेश की स्थापना के साथ ही पंडित रविशंकर शुक्ल से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व की समीक्षा की गई. इस उत्सवी बैठक मेें खुले मन से सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों के कार्यों की प्रशंसा करते हुए इस बात से परहेज करने के बजाय सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की चर्चा की गई. इसे आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सूत्र वाक्य ‘सबका साथ, सबका विकास’ की दृष्टि से भी निरपेक्ष होकर देख सकते हैं. मध्यप्रदेेश की यही विशेषता मध्यप्रदेश को अलग और उसे देश का ह्दयप्रदेश कहा जाता है. सामान्य दिनों में विधानसभा में जिस तरह सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष आमने-सामने होते हैं तो लगता है कि ये प्रतिद्वंदी हैं लेकिन वास्तविकता है कि दोनों ही सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष प्रदेश और जनता के हित में चर्चा करते हैं. एक सशक्त विपक्ष लालटेन की भाँति सरकार का पथ प्रदर्शक होता है लेकिन राजनीतिक सौम्यता हमारे अपने मध्यप्रदेश की धरोहर है और जो  विधानसभा में देखने को मिला.

सत्तर साल पहले मध्यप्रदेश विधानसभा का जब गठन हुआ था, तब प्रथम विधानसभा अध्यक्ष पंडित कुंजीलाल दुबे थे, जिन्होंने 1 नवंबर 1956 से 7 मार्च 1967 तक इस पद पर कार्य किया और मध्य प्रदेश के गठन के समय से लेकर शुरुआती तीन विधानसभाओं (1956-1957, 1957-1962, 1962-1967) के अध्यक्ष रहे। इनके पश्चात श्री काशीप्रसाद पाण्डे, श्री तेजलाल टेंभरे, श्री गुलशेर अहमद, श्री मुकुन्द सखाराम नेवालकर, श्री यज्ञदत्त शर्मा, श्री रामकिशोर शुक्ला, श्री राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, श्री बृजमोहन मिश्रा, श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी, श्री ईश्वरदास रोहाणी, डॉ. सीतासरन शर्मा, श्री नर्मदा प्रसाद प्रजापति (एन. पी.), श्री गिरीश गौतम विधानसभा अध्यक्ष की आसंदी पर बने रहे. सभी ने अपने गुरुत्तर दायित्व का निर्वहन कर विधानसभा की मान्य परम्पराओं का पालन किया. 

वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर अपने सौम्य स्वभाव के लिए परिचित हैं. अनेक बार राज्य में मंत्री एवं अन्य उच्च पदों पर रहने वाले श्री तोमर के स्वभाव में नवाचार है. विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनके नवाचार की स्वाभाविक अपेक्षा होती है और उन्होंने प्रदेश की अपेक्षा को पूर्ण करने की पहल की. विधानसभा अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने के तुरंत बाद श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि ‘मेरी कोशिश होगी कि मेरी निगाह और नजर हर सदस्य पर रहे। उसका जो हक है उसे मिल सके। इसके साथ ही उन्होंने नए सदस्यों को सीखने और अध्ययन करने की सलाह दी, वहीं पुराने सदस्यों को नसीहत देते हुए कहा कि वे ये न सोचें की वे सब कुछ सीख गए हैं। वे विद्यार्थी का भाव हमेशा रखें। उन्होंने कहा कि मेरे से पूर्व सभी अध्यक्षों ने अनेक मानदंड स्थापित किए हैं। परंपरा स्थापित की है। अपने-अपने कार्यकाल में अपने-अपने ढंग से सदन का गौरव बढ़े, इस बात का प्रयत्न किया गया है। अध्यक्ष के रूप में आप सब की निश्चित रूप से मुझसे भी ऐसी अपेक्षा है। मेरी ईमानदार कोशिश होगी कि मैं आपकी अपेक्षा के अनुसार अपने दायित्व का निर्वहन कर सकूं।’

विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की पहल पर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल की जयंती पर मध्यप्रदेश विधानसभा के सेंट्रल हॉल में पुष्पाजंलि का आयोजन के साथ विधानसभा में दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई। विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि अब हर वर्ष प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण किया जाएगा। पं. शुक्ल का जीवन हमें सेवा, समर्पण और विकास की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि 1 नवंबर 1956 को मध्यप्रदेश राज्य का गठन हुआ। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल जी के जीवन और संघर्ष से हम सभी प्रेरणा लेते हैं। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि हम सभी को उनके बताए मार्ग पर चलने की शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर यह नवाचार किया है।

करीब सात दशक के सफर में मध्यप्रदेश विधानसभा का लंबा अनुभव है. कई बार ऐतिहासिक अनुभवों से गुजरा तो कई बार खट्टे अनुभव भी हुए लेकिन मान्य परम्परा का हमेशा निर्वाह किया गया. 1956 में नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ तो छत्तीसगढ़ अविभाज्य अंग था तो इसी विधानसभा में साल 2000 में मध्यप्रदेश का विभाजन हुआ और छत्तीसगढ़ राज्य बनाने की सहमति प्रदान की. तत्कालीन उप-नेता प्रतिपक्ष राकेश चतुर्वेदी 13वीं विधानसभा सत्र के दरम्यान ही कांग्रेस छोडक़र भाजपा के साथ हो लिए थे. उस समय उन्हें कांग्रेस की ओर से सत्तापक्ष को घेरने की जवाबदारी थी क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव की ओर से चर्चा होनी थी. ऐसे कई प्रसंग है जिन्हें स्मरण किया जा सकता है.

विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर अपने कार्यकाल में नवाचार के लिए जाने जाएंगे. अभी तो विधानसभा में नवाचार का श्रीगणेश हुआ है. आगे भी अनेक प्रसंग पर चर्चा का अवसर मिलेगा. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एवं विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर की दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनकी कार्यशैली केवल मध्यप्रदेश के लिए नहीं अपितु समूचे देश के लिए नजीर बनेगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) फाइल फोटो




मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

समागम राष्ट्रीय संगोष्ठी, सम्मान, एवं पुस्तक विमोचन 2026

 समागम राष्ट्रीय संगोष्ठी  2026,  

सम्मान, एवं पुस्तक विमोचन

रिसर्च जर्नल समागम के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर जनवरी, 2026 को एक दिवसीय प्रतिष्ठापूर्ण आयोजन प्रस्तावित है। इस अवसर पर डिजीटल ऐरा में कम्युनिकेशन की चुनौती विषय पर संगोष्ठी के साथ समागम सम्मान भी प्रदान किया जाएगा।  

25 वर्षों से निरंतर प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय स्तर की रिसर्च जर्नल समागम को क्वांगटोंग विश्वविद्यालय, चीन द्वारा हिंदी जर्नल के लिए मान्यता प्रदान किया गया है।


संगोष्ठी का विषय

* डिजीटल ऐरा में कम्युनिकेशन की चुनौती

* भारतीय ज्ञान परंपरा में संवाद की महत्ता

* हिंदी, संवाद एवं संपर्क की भाषा

* डिजिटल मीडिया में हिंदी

* डिजिटल मीडिया और जनसंपर्क

* डिजिटल मीडिया और वाचिक परंपरा

* मुख्य विषय से संबंधित अन्य विषय


संगोष्ठी के रजिस्ट्रेशन हेतु लिंक का उपयोग करे । 

https://samagam.co.in/national-seminar-on-challenges-of-communication/


संगोष्ठी समूह में जुड़े :

https://chat.whatsapp.com/GiGeWZCzdlU20F6ZppL0v4

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