रविवार, 17 जनवरी 2010

सोचो

मैं लोकतंत्र हूं...
मनोज कुमार
मैं लोकतंत्र हूं...किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूं

पंच से लेकर प्रधानमंत्री तक हर कुर्सी बिकाऊ हैबोलो कौन सी कुर्सी खरीदोगे जनाब?

किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूंमहंगाई बढ़ गई है इन दिनों जनाब

अभी अभी साढ़े छह लाख में बिकी है...सरपंच की कुर्सी…।

अभी कुछ और बाकि है मोल तो लगाओ जनाब…

किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूंपंच की कुर्सी की कीमत

पचपन हजार लग चुकी हैदेश दांव में लगाने की

ताकत हो तोप्रधानमंत्री की कुर्सी खरीद सकते हो जनाब…

बोलो कौन सी कुर्सी खरीदोगे जनाब?

किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूंप्रेमचंद का अलगू चौधरी

कहीं खो गया हैऔर बापू का ग्राम स्वराज

यहीं कहीं भटक गया हैकिसी को मिल जाएं तो जरूर बतानातब

तक मैं फिर बोली लगाता हूं जनाब…

मैं लोकतंत्र हूं...

किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूं

(आद। भवानीप्रसाद मिश्र से क्षमायाचना के साथ)






गाफिल है पूरी दुनिया
मनोज कुमार
महात्मा गांधी का सपना था कि गांव की सत्ता ग्रामीणों के हाथों में हो. इसी सपने को आधार बनाकर स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना करते हुए पंचायतीराज व्यवस्था आरंभ की थी. मध्यप्रदेश ने तब सबसे आगे आकर पंचायतीराज व्यवस्था कायम किया. चारों तरफ मध्यप्रदेश की सराहना हुई. समय के साथ पंचायती राज व्यवस्था परवान चढ़ी. पंचायतों में महिलाओं के लिये पचास प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था भी की गई. ऐसा लग रहा था मानो गांधी के ग्राम स्वराज का सपना सच हो गया है किन्तु पिछले दिनों राज्य के इंदौर से मात्र पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव रंगवासा में पंचायती राज व्यवस्था के साथ लोकतंत्र का जो मजाक उड़ाया गया, वह दहला देने वाला है.
जनसत्ता नईदिल्ली और नईदुनिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक गांव के मंदिर के विकास के नाम पर सरपंच का पद छह लाख पचपन हजार में गांव के ही कैलाश चौधरी ने खरीद लिया और पंचों के पद इक्कीस हजार से पचपन हजार तक बेच दिये गये. इन पदों के लिये खुलेआम नीलामी की गई. रकम तय हो जाने के बाद अन्य दावेदारों ने अपने अपने नाम वापस ले लिये और कहना न होगा कि कैलाश चौधरी निर्विरोध निर्वाचित हो गये. इसके बाद उन्होंने वायदे के मुताबिक कैलाश चौधरी ने रकम मंदिर में जमा करा दी. इन खबरों में यह भी लिखा है कि इसके पहले नगर पंचायत के पार्षद पद की नीलामी भी हो चुकी है. अफसोस तो तब होता है जब विधायक जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति कहने लगे कि यह कोई मुद्दा नहीं है कि गांव में लोकतंत्र के किस तरह से विजय हुई है. किसी का नाम वापस लेने के लिये कोई जोर जबर्दस्ती नही की गई। यह टिप्पणी जनसत्ता में इसी विधानसभा क्षेत्र के विधायक सत्यनारायण पटेल का है. इस पूरी नीलामी प्रक्रिया को विकास से जोड़ कर देखा जा रहा है. सवाल यह है कि विकास के लिये नीलामी जरूरी है तो अब हर पद के लिये नीलामी की व्यवस्था कर दी जानी चाहिए. क्यों आम आदमी के खून पसीने की कमाई पर चुनाव कराने की कवायद की जाये. रंगवासा ने न केवल अपने गांव पर बल्कि समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगा दिया है.
यह खबर मामूली खबर नहीं है. इस खबर की संवेदनशीलता को समझना होगा. मुझे हैरानी इस बात पर थी कि जब इस खबर के बारे में करीब पचीस लोगों से बात की गई तो इनमें से एक भी इस खबर से वाकिफ नहीं था. ये वो लोग हैं जो किसी न किसी रूप में मीडिया से जुड़े हुए हैं. इसका अर्थ मैंने अपने स्तर पर यह लगा लिया कि मीडिया गाफिल है. मुझे दुख इस बात का हुआ कि क्या अखबारों में छप रही खबरों को हम इतने हल्के ढंग से लेने लगे हैं या खबरों में अब वह गंभीरता ही नहीं बची? मामला चाहे जो हो लेकिन एक बात तो साफ है कि अब हम चिंतन नहीं करते हैं, इस तरह की खबरें हमें निराश नहीं करती हैं और न ही हमें उद्वेलित. अब सब कुछ बहुत सतही ढंग से लेते हैं और ले रहे हैं. इससे भी ज्यादा गंभीर बात तो यह है कि जिन लोगों के कंधे पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को बचाये रखने की जवाबदारी है, वे भी खामोश हैं. सत्ताधारी दल तो कुछ कह नहीं रहा है, विपक्ष भी मौन साधे हुए है. गाफिल समाज अगर होशमंद हो जाए तो शायद कल की बात और होगी. इसी उम्मीद के साथ.

बुधवार, 13 जनवरी 2010

अच्छी खबर

यह विश्वास बना रहे
मनोज कुमार
भारतीय स्त्रियों के चरित्र पर विश्वास जताते हुए अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि भारतीय नारी पर संदेह नहीं किया जा सकता है। वे अपने खिलाफ बलात्कार का मामला यूंह ी दर्ज नहीं कराती हैं। अदालत ने यह टिप्पणी कर भारतीय स्त्री के गौरव को द्विगुणित किया है और कहना न होगा कि इससे भारतीय समाज का सिर गर्व से ऊंचा उठा है। भारतीय संस्कृति में स्त्रियों को सनातन काल से सर्वोपरि माना गया है। दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में तब स ेअब तक पूजा जाता रहा है। यकिनन समय के बदलाव के साथ सोच में परिवर्तन आया है और समाज स्त्रियों को नयी भूमिका में देख रहा है। कल तक घर की चहारदीवारी के भीतर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने वाली स्त्री आज आफिसों में अपने दायित्वों को निभा रही हैं। उनकी नयी जिम्मेदारियों के साथ उनके पहनावे में भी परिवर्तन आया है और महज पहनावा को ही यह मान लिया गया कि स्त्री बदल गयी है। उसके चरित्र पर अकारण लांछन लगाया जाने लगा। एक मामला पत्रकारिता की एक छात्रा के साथ पिछले दिनों सामने आया था। यह सब कुछ कुछ मानसिक रूप से बीमार लोगों की करतूतें हैं। स्त्री आज भी अपनी उसी भूमिका में है और इसका विस्तार ही माना जाना चाहिए।बाजार के नये रूप ने जरूर स्त्री को वस्तु बनाकर प्रदर्शन किया है और इसमें कुछ हद तक स्त्री भी दोषी हैं। उनके लिये पूरा आसमान खुला हुआ है और तब उन्हें किसी किस्म के समझौते की जरूरत नहीं होना चाहिए। हमारा मानना है कि यह सबकुछ अकारण नहीं है बल्कि इसके पीछे भी कोई मामला होगा। स्त्रियों के साथ ज्यादती पहले भी हो रही थी और अब भी हो रही है, इस बात से भला कौन इंकार करेगा। स्त्री को दबाने और कुचलने का सर्वाधिक पीड़ादायक यातना है तो उसके साथ बलात्कार करना। इसमें भी आरोपी बच निकलते थे लेकिन अदालत ने यह कह कर स्त्री का सम्मान बढ़ाया है कि उसने कह दिया, यह ीपर्याप्त है। हम सभी को उम्मीद करना चाहिए कि भारतीय स्त्री भी अपने पक्ष में दिये गये इस सम्मान को कायम रखने में आगे रहेगी और पापी पुरूष अब अपने दानवी रूपप र काबू पा सकेंगे। नये साल में भारतीय स्त्रियों को न केवल अदालत की बल्कि पूरे समाज की ओर से शुभकामनाएं हैं।

शनिवार, 2 जनवरी 2010

मुद्दा

तो फिरोजाबाद की चूड़ियां ढूंढ़ते रह जाओगे
मनोज कुमार

आज से कोई 30-35 बरस पहले मेरी बड़ी भाभी पायल को महिलाओं के लिये बेड़ियां कहती थी। तब मुझे इस बात का अंदाज नहीं था कि उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच कर उनकी उस बात का अहसास अब होगा। आज जब महिलाओं को चूड़ियों से परे होते हुए, माथे से बिंदिया लगाने से बचते हुए और मांग में सिंदूर भरने से परहेज करते हुए देखता हुआ तो मेरी भाभी मुझे याद आ जाती हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो कल तक नारी के श्रृंगार की वस्तुएं थी, जिसमें स्त्रियां अपना सौभाग्य देखती थीं, आज उनके लिये बंधन हो गया है। उनके लुक को खराब करने लगा है। इस मुद्दे को विस्तार के साथ देखना होगा। यहां मैं जिस चूड़ी, बिंदी और सिंदूर की बात कर रहा हूं, उसका सीधा वास्ता तो स्त्रियों से है किन्तु इससे भी बड़ा वास्ता बाजार से है। फिरोजाबाद का नाम भारत के कोने कोने में जाना जाता है तो इसलिये कि वहां किसम किसम की चूड़ियां बनती हैं। षायद बिंदी और सिंदूर बनाने का काम भी होता होगा। इस बारे में मेरी जानकारी थोड़ी कम है। जब स्त्रियां श्रृंगार की इन महत्वपूर्ण वस्तुओं का त्याग करना आरंभ कर देंगी तो फिरोजाबाद के कारखाने मर जाएंगे। एक दो नहींे सैकड़ों परिवारों के समक्ष भूखों मरने की नौबत आ जाएगी। भारत में जिस तरह कई प्राचीन लघु और गृह उद्योग खत्म होते रहे हैं, वैसे ही एक और लघु और गृह उद्योग खामोषी से मर जाएगा। बिलकुल उसी तरह जिस तरह पावरलूम खत्म होते जा रहे हैं, जिस तरह भोपाल का जरी उद्योग सांसें गिन रहा है। आधुनिक मषीनें कपड़े बुन रही हैं और महंगे लेदर के पर्स।क्या चूड़ी, बिंदी और सिंदूर त्यागने से स्त्री आजाद हो जाएगी? क्या वह श्रृंगार की इन वस्तुओं का उपयोग नहीं करेगी तो उसकी षान पर कोई फर्क पड़ जाएगा, षायद नहीं। इसे और विस्तार से देखना होगा कि किस तरह हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था को चैपट करने के लिये खेल खेला जा रहा है। भारतीय स्त्रियों के साथ ही भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं को भी भेंट चढ़ाया जा रहा है। बदलते समय के साथ स्त्री की दुनिया को विस्तार मिला है। कल तक चैके चूल्हे में सिमटी स्त्रियां आज हमकदम बन कर चल रही हैं। हालांकि मेरी मान्यता यह है कि स्त्री कभी पराधीन थी ही नहीं। भारतीय षास्त्रों का अध्ययन करेें तो सहज ही पता चल जाता है कि कोई भी घर स्त्री के बिना अधूरा है। समय की जरूरत के अनुरूप भारतीय स्त्री ने अपना चेहरा प्रस्तुत किया है। कभी वह अपने दुष्मनों का संहार करने के लिये दुर्गा बन जाती है तो कभी ममता लुटाने के लिये वह गंगा बनकर निस्वार्थ बहती रहती है। अपने घर और परिवार की उन्नति के लिये स्त्री ही लक्ष्मी का रूप् है। इसके बावजूद यह मानने में कोई गुरेज नहीं कि स्त्रियों का दमन हुआ है। उन्हें हाषिये पर रखने की कोषिष की गई है। ऐसे में स्त्री को स्वतंत्रता मिली है, मिल रही है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन क्या किसी संस्कृति और परम्परा की बलि चढ़ाकर? किसी बाजार की षर्त को मानकर? इसका जवाब षायद नहीं में होगा लेकिन यहां मौन रह कर बाजार की हर षर्त को मंजूर किया जा रहा है।कथित विकास ने हमारे सोचने की ताकत को कम कर दिया है और भीड़ में हम खोने के लिये मजबूर हो गये हैं। हम यह भी नहीं सोच पा रहे हैं कि जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं वह रास्ता हमारे लिये ही बंद हो रहा है। चूड़ी, बिंदी और सिंदूर त्यागकर हम अपने आपको आधुनिक बन जाने का सुख तो पा रहे हैं लेकिन इन छोटी छोटी चीजों को छोड़ कर जाने कितने पेट को भूखे सोने के लिये मजबूर कर रहे हैं, इसका आपको अंदाज है? षायद नहीं। दिनोंदिन बढ़ती महंगाई के लिये क्या हमारा चरित्र जिम्मेदार नहीं है? देष की अर्थव्यवस्था को चैपट करने में हमारा योगदान नहीं है? फौरीतौर पर बात भले ही समझ न आये क्योंकि इस समय हम आधुनिकता की आंधी की गिरफ्त में हैं लेकिन इसे समझने की जरूरत होगी।मानव श्रम को हम कैसे बेकार और बेबस बना रहे हैं, इस संदर्भ में स्टेषन पर खड़े कुलियों को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है। कल तक ये कुली हमारा बोझ उठाकर अपने कंधों पर रखे बोझ को कम कर लेते थे आज वे अपने ही बोझ तले दब रहे हैं। बड़ी नामी कंपनियों ने आधुनिक किस्म के सूटकेस तैयार कर दिये। अब खुद ही कुली बन जाओं और अपना सामान खुद खींचते हुए मंजिल तय कर लो। जिस स्टेषन पर कुलियों की संख्या कभी दस और बीस हुआ करती थी, वहां अब गिने चुने ही मिलेंगे क्योंकि यात्रियों की सूरत में कुलियों की तादात इतनी बढ़ गयी है कि अब वास्तविक कुलियों की जरूरत नहीं रही। कल्पना कीजिये कि आपके बोझ को कंधे पर ढोते इन कुलियों के घरों के चैके-चूल्हे जलते थे और अब इनके दिल। वक्त अभी भी है। बस समझने की जरूरत है कि चूड़ी, बिंदी और सिंदूर त्यागने से आधुनिकता नहीं आयेगी और न खुद के सूटकेस खींचने से अमीरी। सोच बदलने की जरूरत है और यह बदली हुई सोच कई परिवारों को दो वक्त का खाना दे पायेगी। संस्कृति और परम्परा की रक्षा भी हम कर पाएंगे लेकिन तभी जब हमारी सोच बदल जाए।

रविवार, 29 नवंबर 2009

गैस त्रासदी

बरसी पर ही याद किये जाएंगेे गैस पीड़ित?
मनोज कुमार
पच्चीस साल पहले भोपाल को मिक गैस ने लील लिया था और इसी के साथ ही भोपाल में छिपी संवेदना का ज्वार उभर कर आया था। मदद करने के लिये हजारों हाथ आगे आये थे। तब किसी ने किसी का मजहब नहीं पूछा। तब सबके सामने एक ही सवाल था कि जिंदगी कैसे बचायें? समय गुजरता गया और संवेदनाओं का ज्वार उतरता गया। संवेदनाआंे का स्वर कहीं दब गया और उस पर राजनीति करने वाले भारी पड़ने लगे। गैस पीड़ितों की सेवा के नाम पर राजनीति होने लगी। थोड़ी निर्दयता के साथ ही सही, लेकिन पिछले पन्ने पलटें तो पाएंगे कि एक समय तो गैस पीड़ितों को देखने के लिये, उन्हें सहारा देने के लिये राजनीतिक दल भी आगे थे। समय गुजरने के साथ साथ सबने हाथ पीछे कर लिये। इस बरस अचानक गैस पीड़ितों का मामला गर्मा रहा है। दर्द का दरिया फिर बहने लगा है। यह अचानक इतनी चिंता क्यों? मीडिया भी एकाएक सक्रिय हो गया है। कहने वाले कह सकते हैं कि त्रासदी की उम्र पच्चीस साल होने के कारण एक बार फिर मामले को खंगाला जा रहा है लेकिन भोपाल के बरक्श देखें तो इस बार साथ साथ नगरीय निकायों के चुनाव होने हैं और कदाचित ये लोग ही अपने पार्षद और महापौर का फैसला करेंगे। चिंता की इस वजह को सिरे से नकारा नहीं जा सकता है।अच्छा होता कि गैस पीड़ितों की चिंता 2-3 दिसम्बर को न होकर उस समय तक चले जब तक कि उनके साथ न्याय न हो जाये। उन्हें इलाज मिले और जीने का हक। केवल बातों में ही चिंता उनकी तकलीफों को कम नहीं कर पायेगी।

रविवार, 8 नवंबर 2009

media

अपनों को याद करें
हिन्दी पत्रकारिता में मध्यप्रदेश का योगदान शायद सबसे ज्यादा है। राजेन्द्र माथुर मील के पत्थर साबित हुए हैं। हाल ही में दिवंगत प्रभाष जोशी के साथ ही वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक, इंडिया टुडे के सम्पादक जगदीश उपासने, विष्णु खरे एवं अनेक नाम हैं जिन्हें मध्यप्रदेश ने कभी याद नहीं किया। राज्य शासन ने पिछले दिनों सक्रिय पहल कर इस दिशा में कुछ काम किया है किन्तु वह भी सम्मान और पुरस्कार बांटने तक। हम युवा पत्रकार साथियों ने राजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान की स्थापना की है और इसी के बैनर तले प्रयास आरंभ किया गया है कि देश भर में फैले मध्यप्रदेश के पत्रकारों की जीवनी एकत्र कर उसका दस्तावेजीकरण किया जा सके। मध्यप्रदेश से जुड़े पत्रकारों से अनुरोध है िकवे जिन्हें जानते हैं और जिनके उनसे सम्पर्क हैं, उनकी अधिकतम जानकारी हमें भिजवाने का कष्ट करें। साथ में उनकी तस्वीर भी। आपके इस सहयोग से हमारे प्रयासों को सार्थकता मिल सकेगी।htpp://mpreporete।blogspot.com मनोज कुमारसंयोजकराजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान, भोपाल


media

पत्रकारिता के स्कूल थे प्रभाषजी
एक पत्रकार का पहला और अंतिम धर्म होता है लिखना लेकिन जब उसकी कलम थम जाए तो मान लीजिये कि उस पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा है। प्रभाषजी के जाने के बाद शायद मेरे साथ ऐसा हुआ है। पहली दफा मुझमें कुछ लिखने की हिम्मत नहीं हो रही है। आज मन उदासी से उबर पाया है तो कुछेक यादें आपके साथ शेयर करने के लिये लिख रहा हूं। प्रभाषजी के साथ मेरा काम करने का कोई अनुभव नहीं रहा है। लगभग दो वर्ष पहले भोपाल में एक आयोजन में उनका आना हुआ। पहले तो उनका कहा सुना और बाद में उनसे मुलाकात हुई। लगभग 73वर्ष के पत्रकारिता के महामना जोशीजी के सामने मैं बौना सा पत्रकार किन्तु उनके सहज स्वभाव ने जैसे मेरा मन जीत लिया। कदाचित मैं यह भी उनसे सीखा कि अपने से जूनियर साथियों के साथ भी हमें भी वैसा ही बर्ताव करना चाहिए।
प्रभाषजी को लोग बार बार मालवा का गिन रहे हैं किन्तु मुझे लगता है कि यह ऐतिहासिक भूल है। जिस तरह पत्रकारिता की कोई सीमा नहीं होती वैसे ही प्रभाषजी किसी एक गांव या शहर अथवा प्रदेश के नहीं थे। वे समूची पत्रकारिता के थे और वे अपने आप में पत्रकारिता की पाठशाला थे। उनसे सीखा जा सकता है कि पत्रकार एक विषय ही नहीं अनेक विषयों का ज्ञाता होता है और उसे अपनी रूचि के अनुरूप् लिखना चाहिए। वे खेल और खासतौर पर क्रिकेट पर लिखने के लिये प्रतिबद्व थे तो समसामयिक विषयों पर भी वे लिखते रहे हैं। राजनीति और राजनेता भले ही चुप्पी साधे रहें लेकिन सच तो यह है कि उनके लिखे को पढ़कर वे तिलमिला जाते रहे हैं। आज प्रभाषजी हमारे बीच नहीं है लेकिन पत्रकारिता में उन्हांेने जो दृष्टि गढ़ी, जो रास्ता दिखाया, वह हम सबके लिये हमेशा पथ प्रदर्शक का काम करेगा।
मनोज कुमारसंयोजकराजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान, भोपाल

सोमवार, 2 नवंबर 2009

मीडिया और गर्ल

मैं नहीं जानता कि बहस किस बात पर चल रही है किन्तु जिन मुद्दों पर बात चल रही है वह एतराज करने वाली है। मैं एक बेहद पारम्परिक परिवार से हूं जहां छोटी छोटी बातों पर गौर किया जाता है किन्तु मैं और मेरा परिवार लड़कियों के भविष्य के खिलाफ कतई नहीं रहा है। मेरा आग्रह हमेशा रहा है कि मर्यादित व्यवहार कर लड़की हो या लड़का, अपने काम की तरफ पहले ध्यान दे। बहरहाल, पहली बात तो यह कि लड़कियों के काम करने पर जो लोग आपत्ति दर्ज करा रहे हैं, वे डरे हुए लोग हैं। मैं एक बेटी का पिता हूं और उसकी उम्र अभी महज दस वर्ष है लेकिन उसके भविष्य के लिये मेरे पास अगले दस साल की प्लानिंग है। वह भी पायल और पायल जैसी लड़कियों की कतार में लगेगी और अपना कैरियर बनाने की कोशिश करेगी। मेरे लिये आज की पायल और कल की अपूर्वा में कोई फर्क नहीं दिखता।दूसरा एक मुद्दा कपड़े पहने जाने को लेकर है। यह भी समझ से परे है कि एक लड़की के जींस पहने जाने पर हंगामा क्यों? मेरा तो मानना है कि शरीर के बनावट और काम की जरूरत के हिसाब से कपड़े पहने जाने चाहिए। रिपोर्टिेग करते जाते समय किसी भी लड़की से अपेक्षा की जाये िकवह लहंगा-चुन्नी पहन कर काम करे तो यह बेवकूफी से कम की बात नहीं है।मैं विगत तीस वषों से प्त्रकारिता कर रहा हूं। मीडिया के स्टूडेंट को पढ़ाने जाता हूं। यंग व स्मार्ट बच्चियां जब मौजूदा स्थितियों पर सवाल करती हैं तो मन को संतोष होता है कि चलो भावी पीढ़ी कुछ नया कर दिखायेगी। ऐसे में मेरा कहना है कि जो लोग भी इस तरह की बात कर रहे हैं उन सभी, खासतौर से मीडिया में जुड़े लोगों से मेरा आग्रह है कि मानसिकता ऐसी है तो कृप्या मीडिया से दूर हो जाएं। लड़कियों को भी एक सलाह है कि वे अपने शिक्षक अथवा सीनियर्स के पैर न छुए बल्कि नमस्कार से काम चला लें। मीडिया खुलेपन के लिये है न कि मानसिक रूप् से बीमार लोगों के लिये।मनोज कुमारk.manojnews@gmail.com

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...