सोमवार, 24 जनवरी 2011

hamare log

जन्मदिन पर विशेष

लक्ष्मीकांतजी को जन्मदिन मुबारक

मनोज कुमार

बात लगभग डेढ़ साल पुरानी होगी। भोपाल में पत्रकारिता की कुछ किताबों
का विमोचन था। इन किताबों में मेरी भी एक किताब थी। मुख्यअतिथि के
रूप में वर्तमान में जनसम्पर्क, संस्कृति और उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा मौजूद थे। आमतौर पर जैसा होता है वही हुआ। इस मंच से भी पत्रकारिता के अवमूल्यन की बातें हो रही थी। कार्यक्रम में मौजूद अतिथिगण पत्रकारिता के अवमूल्यन को लेकर चिंता जाहिर करने के साथ ही पत्रकारों को सदाशयता की सीख देना नहीं भूले।

इन अतिथियों के बीच मुख्यअतिथि के रूप में जब लक्ष्मीकांतजी बोलने को उठे तो एकबारगी लगा कि वे भी कुछ ऐसा ही बोलेंगे। आरंभ में मेरी कोई रूचि उनको सुनने में नहीं थी किन्तु जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो उनका संबोधन चैंकाने वाला था। उन्होंने इस बात को खारिज नहीं
किया कि पत्रकारिता का अवमूल्यन हुआ है किन्तु वे इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं दिखे। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि किस तरह देहात के पत्रकार अलग अलग किस्म की समस्याओं से जूझते हुए दायित्व की पूर्ति करते हैं।
स्थानीय होने के नाते इन पत्रकारों को कभी थानेदार से तो कभी पटवारी
से तो कभी पंचायत अध्यक्ष से स्वयं को बचाना होता है। उनकी बातें सुनकर
मैं दंग था। मेरे साथ बैठे कुछ पत्रकार साथी भी इस बात से सहमत थे कि
वास्तविकता यही है।
कुछ इस तरह अपरोक्ष रूप से लक्ष्मीकांतजी को एक मंत्री के रूप में मैंने
पहिचाना। वे पत्रकारिता के लिये जितना सजग और सर्तक हैं उतना ही संस्कृति और शिक्षा के लिये भी। संस्कृति विभाग के आयोजनों में शामिल होना और गंभीरता से कार्यक्रमों को लेना उनकी प्रवृत्ति में है। उच्च शिक्षा की बेहतरी के लिये उनके प्रयास साफ दिखते हैं। शिक्षा माफिया को खत्म करने की दिशा में पिछले दिनों उठाये गये कदम उनकी सख्ती की एक मिसाल है। उनका मानना है कि शिक्षा मात्र एक साधन नहीं बल्कि साध्य है पीढ़ियों को
शिक्षित और संस्कारित करने का और वे इसमें कोई घालमेल पसंद नहीं
करते हैं।
राजनीति में आना अकस्मात नहीं है तो राजनीति में रम जाना भी अकस्मात
नहीं है। वे सीधी बात करते हैं। वे कभी यह कहने से संकोच नहीं करते
हैं कि पंडिताई उनका संस्कार और रिवाज है। उनकी दिलीइच्छा भी है कि
अवसर मिलने पर वे संस्कारपूर्ण आयोजन करेंगे। यजमान कौन मिलता है, यह समय बताएगा। वे जाबांज भी हैं। सड़क दुघर्टना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी हताश नहीं हुए बल्कि दुघर्टना को उन्होंने पराजित कर दिया। थोड़े विश्राम के बाद बिस्तर पर लेटे लेटे मंत्रालय के काम निपटाने लगे। मिलने वालों से उसी आत्मीयता से मिलते थे जैसा कि उनका रूटीन पहले था। आहिस्ता आहिस्ता सहारा लेकर चलने लगे। कार्यक्रमों में उपस्थित होने लगे। अब तो उनकी सक्रियता को देखकर कोई कह नहीं सकता कि उनके साथ कभी कोई ऐसा विकट हादसा हुआ होगा।

उम्मीद और उमंग से भरे इस राजनेता को प्रदेश के लोग लक्ष्मीकांत शर्मा
के नाम से जानते हैं। आज इस जननेता का जन्मदिन है। जन्मदिन तो इसके पहले भी उन्होंने मनाये होंगे किन्तु यह जन्मदिन उनके लिये विशेष है। हादसे को परास्त कर एक नये जीवन के आरंभ का उनका यह दिन मुबारक दिन है। ऐसे मिलनसार और मृदुभाषी राजनेता को उनके जन्मदिन पर प्रदेश की एक मुस्कान के साथ जन्मदिन की बधाई।

शनिवार, 22 जनवरी 2011

Mera Bhopal

ग्रीन नहीं, गरीब सिटी बोलिये....


मनोज कुमार
ये मेरे शहर को क्या हो गया है? विकास के नाम पर सरेआम मेरे शहर को उजाड़ा जा रहा है। जिन हजारों लोगों की रोजी प्रदूषण से शहर को बचाने के नाम पर छीन ली गयी उन भटसुअर के चालक मालिक भोपाल के पहचान थे बिलकुल वैसे ही जैसे आज काटे जा रहे हरे-भरे पेड़। हम सब खामोश हैं। मिटती हरियाली में हमें विकास दिख रहा है। किसी न किसी रूप में हम सब उन राजनेताओं और नौकरशाहों के साथ खड़े दिख रहे हैं जिनके लिये कल की मुसीबत आज विकास की बुनियाद है। कल्पना कीजिये कि शरीर को जला देने वाली गर्मी में भी भोपाल की सड़कों में ठंडक का अहसास होता था। बारिश में बचने के लिये किसी पेड़ की छांह तले आप खड़े हो जाते थे। जब ये पेड़ ही नहीं बचेंगे तो कौन आपके मन को शीतल करेगा और कौन बरसते पानी से भीगने से आपको बचाएगा। बड़ी खूबसूरत बसें शहर का सीना चीरकर बेदम गति से भाग रही हैं। भला लगता है इन बसों को देखना। इनमे सवारी करना लेकिन जब प्रदूषित हवाएं हम पर सवार हो जाएंगी। बीमारियां जब हमारे गले पड़ जाएंगी तब शायद भोपाल की याद आए। उस भोपाल की जिसे आज दुनिया ग्रीन सिटी के नाम से जानती है। संभव है कि प्रकृति की अकूत सम्पदा सहेजे इस शहर को गरीब सिटी के नाम से जाना जाएगा। कल तक लोग भोपाल में बसने के लिये बेताब थे किन्तु आने वाले कल में लोग भोपाल से भागने लगे।

मुझे तो यह समझ नहीं आ रहा है कि अपनी विरासत बड़ी झील को बचाने के लिये श्रमदान करने वाले भोपाली कहां गुम हो गये हैं। अपना वजूद खो बैठी बड़ी झील एक बार फिर इतराती हुई दिख रही है तो उन हजारों लोगों की मेहनत के बदौलत जिन्हें बड़ी झील बचाने का जुनुन था। वो सारे लोग एक बार फिर सड़क पर निकल आएं तो विनाश का यह खेल बंद हो जाएगा। शहर को बचाना हमारी जवाबदारी है। हम कैसे पीछे रह सकते हैं। पेड़ होंगे तो पानी होगा और पानी होगा तो जीवन। पेड़ों के जीने का अर्थ हमारा जीवन का बचना है। इससे जुड़ा एक संकट है पेड़ काटने के बाद कांक्रीट की सड़कों का बनना। कच्ची मुरूमी, डामर की सड़कों से बहने वाला पीने धरती छाती में समा जाती थी लेकिन इन कांक्रीट की सड़कों का क्या करें जो पानी को अपनी ओर रिसने भी नहीं देती हैं। नर्म मुलायम मिट्टी गुस्से से लाल होते सूरज की तपिश को अपने में समा लेती थी। अब इसकी कोई सूरत बचती नहीं दिख हरी है।

मेरी पत्नी चिंतक नहीं है, पत्रकार भी नहीं है। उसकी दुनिया उसके चौके-चूल्हे में है। वह शौकिया चित्रकार है किन्तु उसके भीतर की स्त्री को इस बात अहसास है कि पेड़ों का कटना खुशियों का खो जाना है। घर से बाजार और मेले की तरफ जाती इस गृहणी घर से खुशी खुशी निकलती है और सड़क पर आते आते उसका चेहरा किसी कटे पेड़ की तरह हो जाता है। यह चिंता उस अकेले स्त्री की नहीं है बल्कि शायद हम सबकी है। वो मुझसे अपना दुख बांट लेती है क्योंकि वह एनजीओ नहीं चलाती है जो हल्ला बोल की स्थिति में खड़ी रह सके। वह मुझे कई बार कोसने भी लगती है। कभी कभी तो वह संतों की तरह मेरी चुप्पी पर प्रवचन देने से भी नहीं चूकती है। मेरा धर्म लिखना है और मैं अपने धर्म का पालन कर रहा हूं। मैं जगाने की कोशिश कर रहा हूं। अब देखना है कि ग्रीन सिटी भोपाल को हम लोग गरीब सिटी बन जाने से कब बचा पाते हैं।

बुधवार, 12 जनवरी 2011

media

समागम अब मीडिया की शोध पत्रिका

मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का प्रकाशन अब शोध पत्रिका के

रूप में किया जाएगा। यह शोध पत्रिका द्विभाषी होगी।  मीडिया का विस्तार हो

रहा हैऔर मीडिया शोध का कैनवास भी बड़ा हुआ है किन्तु शोध पत्रिकाओं का

प्रकाशन अभी भी नगण्य है। इस कमी को पूरा करने की दृष्टि से एक विनम्र

प्रयास विगत दस वर्षाें से प्रकाशित हो रही मीडिया पर एकाग्र मासिक

पत्रिका समागम करने जा रहा है। पत्रिका का जनवरी २०११ का अंक महात्मा

गांधी की पत्रकारिता पर केन्द्रित है।

भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का सफर जनवरी

२०११ में दस वर्ष पूरे कर फरवरी दो हजार ग्यारह में पत्रिका ग्यारहवें

वर्ष में प्रवेश करेगी। अपने सफर के दस वर्ष के अनुभव को विस्तार देने

तथा मीडिया में शोध प्रकाशन की जरूरत की पूर्ति करने की दृष्टि से समागम

का प्रकाशन मीडिया की शोध पत्रिका के रूप में होगा। उन्होंने मीडिया में

शोध कर रहे साथियों से प्रकाशन सामग्री भेजने का आग्रह किया है।

विज्ञप्ति में जानकारी दी गई है कि समागम के फरवरी अंक से कुछ पन्ने

सिनेमा पर भी होंगे। सिनेमा में गंभीर लेखन को बढ़ावा दिया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश फिल्म विकास निगम ने पटककथा नामक पत्रिका का

प्रकाशन किया था। निगम के बंद हो जाने के साथ ही फिल्म मीडिया की गंभीर

पत्रिका पटकथा का प्रकाशन भी बंद हो गया। पटकथा की तर्ज पर समागम में

सिनेमा पर सामग्री दी जाएगी। समागम को शोध पत्रिका के रूप में विकसित

करने के साथ ही पत्रिका के पृष्ठों में वृद्धि करने की भी योजना है।

शोध आलेख भेजने के लिये डाक का पता है सम्पादक समागम, ३, जूनियर एमआयजी,

अंकुर कॉलोनी, शिवाजीनगर, भोपाल-१६ अथवा मेल कर सकते हैं -

k.manojnews@gmail.com

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

Sarokar

मत रखियों अपनी बिटिया का नाम नीरा


-मनोज कुमार
शीर्षक पढ़ कर आपको शायद अच्छा न लगे किन्तु सच यही है। जो लोग जिम्मेदार हैं और जिन लोगों से प्रेरणा पाकर समाज उनका अनुसरण करता है वही लोग इस तरह के कर्म करेंगे तो कहना ही होगा कि मत रखियों अपनी बिटिया का नाम नीरा। आइए इस बहाने ही सही एक बार नामकरण पर थोड़ी चर्चा हो ही जाए। भारतीय मानस हमेशा से चर्चित और प्रेरणा देने वालों के नाम पर अपने बच्चों का नामकरण करता आया है। भारतीय समाज में साक्षरता का प्रतिशत भले ही कम हो किन्तु समाज हमेशा से विवेकवान रहा है। जिस समय हर मंच पर नीरा राडिया और नीरा यादव की चर्चा हो रही है। अखबार के पन्नों और टेलीविजन के पर्दे पर उनकी बात कही और सुनी जा रही है तब संभव है कि कुछ माता-पिता इन नामों पर फिदा हो जाएं और जैसे होता आया है हर चर्चित नाम अपने बच्चों के कर दिये जाएं।
राम एक सर्वकालिक चरित्र हैं। चरित्रवान बच्चे की तमन्ना के साथ राम का नाम सदियों से लोग रखते आये हैं और लक्ष्मण को आज्ञाकारी भाई के रूप में देख कर उसका नाम भी स्नेहपूर्वक रखा गया है। भरत को भी समाज ने अनदेखा नहीं किया और अनेक परिवारों में ऐसे नाम रखे गये। समय समय पर इतिहास में नाम दर्ज कराने वाले व्यक्तियों के नाम भी अनेक परिवारों में दर्ज हो गये। भारतीय समाज विवेकवान है इसलिये उसे राम, लक्ष्मण, भरत, सीता, पार्वती, राधा, कृष्ण नाम रखने में कभी संकोच नहीं हुआ किन्तु उसने कभी अपने बच्चे का नाम विभीषण नहीं रखा। ऐतिहासिक तथ्य है कि अपने भाई से विद्रोह कर राम की मदद करने वाले विभीषण को लोग याद करते हैं किन्तु यह नहीं भूलते कि जो अपने परिवार का नहीं हुआ, अपने भाई का नहीं हुआ वह भला हमारा कैसे हो सकता है? ऐसे में उनका नाम किसी ने अपने बच्चे का नाम नहीं बनाया। आधुनिक समाज में भी गांधी और नेहरू के नाम पर हजारों बच्चे मिल जाएंगे, इंदिरा नाम की बच्चियों की तादात भी कम नहीं होगी लेकिन कानून की परिधि से बाहर जाकर काम करने वाले फूलनदेवी, मलखानसिंह और दाउद के नाम वाले शायद ढूंढ़ने से भी न मिले। खिलाड़ियों और फिल्मस्टार के नाम पर तो लगभग हर परिवार में एक चिराग मिल जाए।
इस सिलसिले में मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के एक परिवार की घटना का उल्लेख करना सामयिक होगा। यहां एक पिता ने सानिया मिर्जा के नाम पर अपनी लाडली का नाम रख दिया। सोचा सानिया ने जैसे देश का नाम किया है वैसा ही उसकी बेटी भविष्य में करेगी लेकिन उसे निराशा अपनी बेटी से नहीं सानिया से हुई। सानिया ने पाकिस्तानी से ब्याह का ऐलान किया। सानिया के इस फैसले से दुखी पिता ने तत्काल अपनी बेटी का नाम बदल कर सोनिया कर दिया। पिता को इस बात का भय रहा होगा कि उसकी बेटी एक दिन अपने देश का नाम खराब न कर दें। इसे सहज और स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानी जानी चाहिए और उस व्यक्ति के देशप्रेम को सलाम किया जाना चाहिए।
हमारे देश में इन दिनों नीरा नाम पर ग्रहण लगा हुआ है। नीरा राडिया का नाम खबर की सुर्खियों से धुंधला पड़ा ही नहीं था कि एक और नीरा के कारनामे सुर्खियों में आ गये। ये दूसरी हैं नीरा यादव। नीरा यादव उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यसचिव हैं और उन्हें जमीन घोटाले के मामले में चार साल की कैद सुनायी गयी है। समाज का मूलभूत नियम तो यह कहता है कि एक शक्तिशाली एक निरीह और जरूरतमंद को अपनी तरह शक्तिशाली बनाये किन्तु अनुभव ठीक इसके विपरीत है। नीरा राडिया और नीरा यादव सशक्त स्त्रियों के रूप में सामने आयी हैं किन्तु इन दोनों महिलाओं ने स्त्रियों की दशा सुधारने में कोई प्रयास नहीं किया। समय बतायेगा कि नीरा राडिया और नीरा यादव कितनी सही और गलत थीं लेकिन आज तो यह बात साफ है कि इनकी कमाई के एजेंडे में, लाभ देने वाले लोगों की सूची में पांच गरीब और असहाय महिलाएं भी होती तो समय न सही, समाज का एक वर्ग तो इन्हें माफ कर देता। इस मामले में सच तो यही है कि सशक्त और बलशाली लोगों की कौम एक अलग होती है और निशक्त: और निर्बल लोगों की एक अलग कौम। हम उम्मीद कर सकते हैं कि बार बार नीरा का नाम आ रहा है किन्तु जिस तरह समाज ने विभीषण जैसे नामों से परहेज किया वैसा ही कुछ भाव भी इन नामों के साथ होगा।

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

rajniti

जो जीता वहीं सिकंदर यानि अब नीतिश और सिर्फ नीतिश

मनोज कुमार

यह माना हुआ सच है कि जो जीता वही सिकंदर और इस अर्थ में इस समय नीतिश कुमार सिकंदर बन गये हैं। बिहार में उन्होंने जो तूफानी जीत हासिल की है उसने उन्हें भारतीय राजनीति का सिरमौर बना दिया है। भारतीय राजनीति, खासतौर पर क्षेत्रीय दलों के लिये वे नये रोल मॉडल के रूप में उभरे हैं। बिहार चुनाव जीतने में उन्होंने किस तरह की रणनीति अपनायी और वे उसमें सफल रहे, इस बात की मीमांसा की जा रही है। यह तो तय है कि ऐसी जीत बिहार में नीतिश कुमार को नहीं मिली होती तो आज उनका कोई नामलेवा नहीं होता और लालूप्रसाद यादव सिरमौर होते। कभी यही हाल लालू प्रसाद का हुआ करता था और उनकी लोकलुभावन शैली प्रादेशिक राजनीति की दिशा बदल दिया करती थी।

भारतीय राजनीति में, खासतौर पर प्रादेशिक राजनीति में पिछले दो दशकों में काफी परिवर्तन देखने को मिला है। एक समय था जब समूचे दलों के लिये प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से गुजरात के नरेन्द्र मोदी रोल मॉडल बन गये थे। उनके हिन्दुत्व का एजेंडा सबको लुभा रहा था। सत्ता के लिये हिन्दुत्व का कार्ड सहज और सरल रास्ता था। गुजरात के बाद उत्तरप्रदेश और बिहार में जाति का कार्ड खेला गया। नीतिश कुमार इसी रास्ते से सत्ता में आये थे और मायावती इसी रास्ते से सत्तासीन हैं।

मोदी जिस हालात में लगातार गुजरात की सत्ता में बने रहे तो राजनीति में उनकी अलग पहचान बन गयी किन्तु मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जब भारतीय जनता पार्टी ने दुबारा सत्ता सम्हाली तो हिन्दुत्व और जातिवाद से परे होकर विकास का मुद्दा सामने आया। इस बार छत्तीसगढ़ के डाक्टर रमनसिंह और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान विकास के रोल मॉडल बन गये। प्रादेशिक राजनीति के ये नये ब्रांड एम्बेसडर बन गये। छत्तीसगढ़ नया राज्य है और इस लिहाज से यह माना गया कि कांग्रेस के विकास के प्रति उपेक्षा ने उन्हें सत्ता में आने नहीं दिया किन्तु मध्यप्रदेश में भाजपा के लिये ऐसा कोई कारण नहीं था। दस बरस के कांग्रेस के कार्यकाल में दिग्विजयसिंह के राज में विकास को पीछे धकलने का आरोप लगा और वे सत्ता से बाहर हो गये किन्तु भाजपा बहुमत के साथ सत्ता में लौटी और आरंभ के दो बरस में दो मुख्यमंत्री बदल दिये गये। विकास का मुद्दा तब भी हाशिये पर था और शिवराजसिंह तीसरे मुख्यमंत्री बने। पहली बार भाजपा और मध्यप्रदेश में गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह को लगातार तीन वर्ष काम करने का अवसर मिला। इस तीन वर्ष में शिवराजसिंह ने महिलाओं, आदिवासियों और किसानों के लिये कुछ काम करने की कोशिश की। राज्य में पूर्व की तरह बिजली, पानी, सड़क आदि की समस्या का कोई बड़ा हल नहीं निकला था किन्तु शिवराजसिंह ने अपनी जीत दर्ज करा दी। लगभग यही स्थिति छत्तीसगढ़ में थी। बावजूद के दोनों राज्यों में भाजपा को मिली जीत को विकास की जीत कहा गया।

बिहार में जो जीत नीतिश कुमार को मिली है वह मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का दुहराव है। कल तक विश्लेषक बिहार की स्थिति को बहुत संतोषजनक नहीं बता रहे थे और नीतिश की वापसी पर भी एकराय नहीं थे किन्तु स्थितियां बदली और नीतिश कुमार के पक्ष में हवा बहने लगी। लालू यादव किनारे कर दिये गये। बिहार में नीतिश कुमार की सरकार लौट आयी और एक बार फिर विश्लेषकों ने इसे विकास की जीत कहा। वैसा ही जैसा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की वापसी पर कहा गया था।

यह हो सकता है कि यह जीत विकास की हो किन्तु मेरा मानना है कि यह जीत विकास की न होकर बल्कि विकास को परखने की जीत है। एक नजर से देखें तो अब मतदाता इस बात के लिये तैयार नहीं हैं कि पांच बरस में सरकार बदल दें और आने वाली नयी सरकार फिर से प्रदेश को प्रयोगशाला बना दें। पूर्ववर्ती सरकारों की योजनाओं को तो थोड़ा बदला जाता है किन्तु उन योजनाओं के नाम बदलने पर करोड़ों रुपये और वक्त जाया करते हैं। शायद इस दृष्टि से अब मतदाता ने मन बना लिया है कि कम से कम दो कार्यकाल तो एक सरकार को मिले ताकि उनके द्वारा पहले पांच वर्ष में आरंभ किये गये कार्याें को एक मुकाम तो मिल सके। इन योजनाओं का परिणाम आमजनता देख सके और वह फिर तय करें कि इस सरकार को तीसरा मौका दिया जाना चाहिए या नहीं।

इस बात को इस तर्क के साथ देखा जा सकता है कि दिल्ली की कांग्रेस सरकार को क्यों मौका मिला? अनेक किस्म की शिकायतें और गुस्सा होने के बावजूद कांग्रेस की जीत का यही एक कारण हो सकता है। पश्चिम बंगाल में तीन तीन बार सरकार का चुना जाना आम आदमी के मन में सरकार के प्रति वि·ाास का होना ही है। आगामी दो हजार तेरह में जब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और इनके साथ जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है वहां सरकार की परीक्षा होगी। विकास कार्याें को आम आदमी जांचेगा और तय है कि खरा नहीं उतरने पर सरकारें बदल दी जाएंगी। मीडिया ने आम आदमी को शिक्षित कर दिया है। कंबल और नोट बांटकर सरकारें बनाने के दिन अब लदते दिख रहे हैं। बदलाव की यह सूरत एकाएक नहीं है। चौंसठ वर्ष की आजादी के बाद यह सूरत देखने को मिली है। सूरत तो बदल रही है किन्तु एकाएक किसी राज्य में सरकार की जीत को रोल मॉडल मान कर उसे दोहराने की कोशिश राजनीति दलों को भारी पड़ सकती है। स्थितियों और परिस्थितियों पर राजनीति दलों की हार-जीत तय होती है न कि एक राज्य की जीत पर दूसरे राज्य की जीत। बहरहाल, अभी तो जयकारा हो रही है बिहार की और मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की।



रविवार, 28 नवंबर 2010

samaj

लोकतंत्र में राजशाही का दबदबा बता गया किचन शेफ

मनोज कुमार
भारत में लोकतांत्रिक सरकार के चौंसठ बरस होने जा रहे हैं। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजा का बाजा बहुत पहले श्रीमती इंदिरा गांधी ने बजा दिया था। प्रीविपर्स की समाप्ति के साथ राजा-रजवाड़े के दिन लद गये थे। वे अपनी सम्पत्ति के साथ अपने महलों में राज कर रहे थे। उन्हें राजा कहना या उन्हें सलामी देने की बाध्यता समाप्त हो गयी थी। अपनी भावी पीढ़ी को भी मैं यही बताता रहा हूं कि भारत में लोकतंत्र का उदय हो चुका है और राजशाही के दिन लद गये हैं। किन्तु तीन दिन पहले अक्षय कुमार के रियलिटी शो किचन शेफ देखते समय अंदाज हुआ कि भारत में लोकतंत्र और राजशाही दोनों साथ साथ चल रहे हैं। समानांतर सत्ता की तरह। थोड़ा विस्तार में बता दें।
किचन शेफ उन लोगों के लिये है जो विभिन्न किस्म के खाना बनाना जानते हैं और जो इनमें सबसे ज्यादा हुनरमंद होगा, उन्हें किचन शेफ ऐलान किया जाएगा। विभिन्न पड़ावों से होता हुआ यह प्रोग्राम जब ढाबे पर प्रतियोगियों को जांचने पहुंचा तो भला लगा कि फाईव स्टार होटल ही नहीं, ढाबे के खाने का सलीका भी होना चाहिए। मेरी यह खुशी थोड़े समय तक ही रही क्योंकि प्रोग्राम अब राजस्थान एक राजदरबार में पहुंच गया था। कभी रहे होंगे राजा किन्तु अक्षय उन्हें श्रीजी कह कर पुकार रहे थे। गुलामी की भाषा हिज हाइनेस कह रहे थे। स्वाभाविक है कि प्रतियोगियों को भी यही सब कहना था।
अक्षय अपने राजा साहब के लिये बार बार जोर देकर कह रहे थे कि श्रीजी को इंतजार की आदत नहीं है। वे दो बजे खाना खाते हैं। यह कहते हुए अक्षय भूल गए थे कि उनके श्रीजी इस वक्त खाने के लिये नहीं, एक जज के तौर पर थे और उन्हें प्रोग्राम के मुताबिक चलना था न कि उनके मुताबिक प्रोग्राम। अब जब राजा कह कर संबोधन दिया जा रहा है तो गुलाम जनता की क्या मजाल कि वे अपने मुताबिक चल सकें। जिस तरह श्रीजी को सलामी ठोंक अनुमति ली गयी और भोजन परोसा गया, उसने सचमुच की राजशाही के दिनों की याद दिला दी। बच्चे बड़े जिज्ञासा से पूछते हैं कि राजा ऐसे होते थे? उन्हें इस तरह सलामी दी जाती थी।
इस पूरी कहानी का मकसद श्रीजी की भव्यता सुनाना नहीं है बल्कि यह बताना है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के कोने कोने में राजशाही व्यवस्था लागू है। ये राजशाह लोकतंत्र का माखौल उड़ा रहे हैं। यह शानो-शौकत उनका निजी मामला हो सकता है किन्तु करोड़ों दर्शकों के लिये बनाये जा रहे प्रोग्राम के जरिये किसी राजा को महिमामंडित करने का अर्थ देश की करोड़ों जनता का अपमान करना है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजा और प्रजा एक हैं। यहां चुनी हुई सरकारें काम करती हैं। संविधान एक है। ऐसे में इस तरह के प्रोग्राम से आयोजकों को आर्थिक लाभ हो सकता है किन्तु देश की भावना पर जो जख्म लगते हैं, उसकी भरपायी कैसे होगी?

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...