बुधवार, 1 अगस्त 2012

बिटिया अब नहीं जाती है पीहर


मनोज कुमार
अभी अभी मेरी पत्नी अपने मोबाइल फोन से फारिंग हुई है. बीस मिनट से ज्यादा हो गये होंगे बतियाते हुए. पूछने पर पता चला कि अपनी मम्मी से बातें कर रही थी. क्या खाया, क्या पकाया, कौन आया और कौन गया से लेकर वो सारी बातें जो महीनों बाद पीहर पहुंच कर कभी बिटिया अपनी अम्मां से करती थी, अब हर दिन बल्कि हर पहर हो रही है. कोसों का फासला खत्म सा हो गया है. जब मन किया, मोबाइल का बटन दबाया और सेकंड में बातों का सिलसिला शुरू. न आने जाने की परेशानी और न साज समान की. अब बीवियां पीहर जाने का नाम नहीं लेती हैं. उनका पीहर तो मोबाइल हो गया है. कभी पीहर जाने के लिये उतावली रहने वाली बीवियां अब नहीं जाने का बहाना ढूंढ़ती हैं. पतिदेव जिद करें कि कुछ दिनों के लिये पीहर हो आओ तो वे उन पर उलटे अहसान मढ़ते हुए कहेंगी आपके और बच्चों का रूटीन डिस्टर्ब हो जाता है, इसलिये वे नहीं जाना चाहतीं.
मोबाइल ने सुविधा तो दी है लेकिन कई चीजें खत्म भी कर दी है. किसी ब्याहता का पीहर जाना, केवल पीहर जाना नहीं होता था बल्कि इसके पीछे एक सामाजिक ताना-बाना होता था. पति-पत्नी के बीच की एकरसता को खत्म करने का यह एक अवसर होता था. रिश्तों की गर्माहट को महसूस करने का अवसर मिलता था. परिवार में ताजगी का अहसास होता था. इनके जाने और उनके नहीं रहने के बीच का फर्क महसूस होता था, यह फर्क अब नहीं रहा. एक मोबाइल ने जिंदगी की ताजगी को छीन लिया है. जब मोबाइल नहीं था तो बीवी के पास पीहर जाने का उत्साह होता था. उसे यह जान लेने की उत्सुकता होती थी कि उसकी गैरहाजिरी में अम्मां ने क्या क्या खरीदा है? ब्याहने के बाद अम्मां की मोहब्बत कम तो नहीं हुई, यह जांचने की कोशिश भी अनजाने में बिटिया करती थी. कदाचित अम्मां ने अपनी बहू के लिये बिटिया से कुछ अधिक खरीद लिया तो बिटिया तुनक कर कहती- हां, अब तो मैं परायी हो गयी हूं, अपनी बहू के लिये सब करेगी. बिटिया की इस मासूम शिकायत पर अम्मां न्यौछावर हो जाती. उसे मनाती और बताती कि ऐसा नहीं है.
रूठने और मनाने की इस गर्माहट को भी मोबाइल ने छीन लिया है. पीहर जाकर बिटिया अपने बचपन की यादों को टटोलती, संगी-सहेलियों के बारे में पूछती लेकिन अब मोबाइल इनका पता तो नहीं देगा? पीहर से लौटती बिटिया के आंखों में लरजते आंसू अम्मां को भी रूला जाते थे यह आंसू तब तक थमे रहते जब तक कि बिटिया वापस लौट आने की बात नहीं कहती. पीहर से ससुराल के रास्ते भी बहू के लौट जाने की प्रतीक्षा करते रहते. पतिदेव को अपनी पत्नी के लौट आने का बेसब्री से इंतजार रहता. जिस पत्नी से वह तंग आ चुका होता है, उसके नहीं रहने पर उसे तनहाई डसने लगती है. पत्नी के लौट आने पर पति थोड़ा नाराज दिखता है और पत्नी मनुहार करने बैठ जाती है. अपने घर के बिखर जाने का गम भी उसे रहता था. बात बात में पति और बच्चों को ताना कि उसके नहीं रहने पर घर की क्या हालत बना दी है.
रूठने, मनाने, शिकायत और प्रार्थना अब बीती जमाने की बातें रह गयी है क्योंकि बिटिया अब नहीं जाती है पीहर. महीनों बाद पीहर जाकर मां की खरीदी चीजें, बचपन की यादें और आने जाने वाले का ब्यौरा सुनने और सुनाने का काम भी इस मोबाइल ने खत्म कर दिया है. रोज मां से खबर मिल जाती है. क्या लिया और कितने में लिया, कौन आया, कौन गया और इधर से भी मां को रिपोर्ट हो जाती है कि आज सब्जी में क्या बना और कल की क्या प्लानिंग है. ब्याह के शुरूआती दिनों में पीहर छूट जाने का दुख होता है लेकिन समय गुजर जाने के बाद पति का घर प्यारा लगने लगता है. जो थोड़ी कसर इस मोबाइल से रह गयी थी, वह कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी. कैमरे लगाया और पूरा पीहर अपने घर में बैठे घूूम लिया, देख लिया. मां की सूरत भी देख ली और पीहर की दीवारों का रंग भी जान लिया. बिटिया अब नहीं जाती है पीहर.

शनिवार, 16 जून 2012


दहशत की दीवार पर कामयाबी का ककहरा
-मनोज कुमार
हिंसा पर अहिंसा की विजय का उदाहरण देखना है तो आपको छत्तीसगढ़ आना होगा। उस छत्तीसगढ़ में जो नक्सली हिंसा की दमक से थर्रा रहा है। उस छत्तीसगढ़ में जिसकी पर्याय बनता जा रहा है नक्सली हिंसा। देशभर में चिंता का विषय बन चुके छत्तीसगढ़ का एक और चेहरा है जो दहशत की दीवार पर कामयाबी का ककहरा लिख रहा है। यही है वह असली छत्तीसगढ़ जिसे किसी का खौफ नहीं। वह चुनौतियों को विकास का रास्ता मानता है और चुनौतियों से जूझते हुए कामयाबी की कहानी लिखता है। इस बात को पहले भी कई बार साबित किया जा चुका है और एक बार फिर बस्तर संभाग के दर्जनों बच्चों ने इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास कर जता दिया है कि उनके हौसले बुलंद हैं। वे एक नये छत्तीसगढ़ रच रहे हैं और आने वाला समय विकसित छत्तीसगढ़ का होगा। जिन बच्चों ने इंजीनियरिंग की परीक्षा में कामयाबी दर्ज की है, वे शहरों में रहने वाले उन परिवारों से नहीं हैं जो नक्सली हिंसा की खबर पढ़कर सहम जाते हैं बल्कि इनमें से अधिकांश वे बच्चे हैं जिनके परिवारों को रोज रोज सहमना पड़ता है। कल की सुबह देख पाएंगे, इसका भरोसा भले ही न हो लेकिन अपने बच्चों पर उनका भरोसा है कि वे एक दिन नई सुबह के साक्षी होंगे। अपने माता-पिता के भरोसे को कायम रखकर कामयाबी की कहानी गढ़ने वालों को पूरा देश सलाम कर रहा है।
नक्सली हिंसा से सर्वाधिक पीड़ित एवं प्रभावित छत्तीसगढ़ राज्य का बस्तर संभाग है। राज्य सरकार माओवादियों से अपने स्तर पर निपट सुलझ रही है किन्तु सरकार की चिंता का विषय था उन बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना जिन पर हिंसक घटनाओं का न केवल बुरा प्रभाव पड़ रहा है बल्कि उनकी शिक्षा भी बाधित हो रही है। अनेक स्तर पर इन विद्यार्थियों के लिये शिक्षा का इंतजाम किया गया। आवासीय विद्यालयों में इन विद्यार्थियों को प्रवेश दिलाकर उन्हें इस बात का भरोसा दिलाया गया कि उनकी शिक्षा अब बाधित नहीं होगी। सरकार ने इन विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिये कुछ और नई योजनाओं का संचालन शुरू किया। इन्हीं में एक योजना था छू लो आसमान। योजना के नाम को इन विद्यार्थियों ने सच कर दिखाया और आसमानी सफलता हासिल कर जता दिया कि हिंसा का जवाब अहिंसा हो सकता है।
वनवासी विद्यार्थियों की यह कामयाबी किसी किस्से कहानी से कम नहीं है लेकिन यह किस्सा कहानी नहीं बल्कि हकीकत है। एक ऐसी हकीकत जहां बेघर, अनाथ और हिंसा के शिकार होने के बाद भी साहस नहीं छोड़ा। अपनी प्रतिभा का लोहा तो मनवाया ही, अपने आत्मवि·ाास का परिचय भी दिया। ये सफल विद्यार्थियों ने अपना भविष्य तो गढ़ा ही, ऐसे हजारों और विद्यार्थियों के लिये वे मिसाल बन गये हैं। कविता मंडावी ने अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में देश में ७८वां रैंक हासिल किया है। कविता उन वनवासी बच्चों में हैं जिनका परिवार माओवादी हिंसा में उजड़ गया। कविता की तरह ही कामयाबी गढ़ने वाली सुखमती, कवासी जोगी, भवानी गहलोत व स्वाती महापात्रा हैं। इन चारों विद्यार्थियों को देशभर के परीक्षा परिणाम में क्रमश: ८१८, १२०५, १०३२ व १६२६वां स्थान मिला है। समूचा परीक्षा परिणाम चौंकाने वाला है। गौर करेंगे तो पाएंगे कि इस परीक्षा में अनुसूचित जाति के १२८ विद्यार्थियों ने सफलता अर्जित की तो जनजातीय समाज के २० विद्यार्थी जबकि सामान्य वर्ग के एक विद्यार्थी को ही कामयाबी मिल सकी। छत्तीसगढ़ में टॉप करने वाले सौ विद्यार्थियों में माओवादी इलाकों से ११ विद्यार्थी हैं। जिलेवार आंकड़ें भी चौंकाने वाले हैं जिसमें बस्तर से ३०, सरगुजा से ३१, राजनांदगांव से ३८, कांकेर से २१, दंतेवाड़ा से १४, नारायणपुर से ७, बीजापुर से ५, जशपुर से २ तथा कोरिया से ०१ विद्यार्थी ने सफलता अर्जित की है।
इसे महज परीक्षा परिणाम की तरह नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे हिंसा पर अहिंसा की जीत की तरह देखा जाना चाहिए। माओवादी हिंसा को लेकर जो दहशत का माहौल है, उस पर यह सफलता के कई अर्थ हैं। यह शिक्षा की तरफ राज्य सरकार के प्रयासों की सफलता का पैमाना है तो उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति की जीत भी है। सरकार ने शिक्षा के प्रति अपनी बुनियादी जवाबदारी को समय पर समझ कर न केवल अनेक पीढ़ियों को दिशा भटकने से बचा लिया बल्कि एक ऐसी दुनिया रचने की सामथ्र्य उन बच्चों में पैदा कर दी जिनके मन में कभी निराशा रही होगी। 
वनवासी विद्यार्थियों में यह साहस और जज्बा सरकार के अथक प्रयासों से आया है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है। मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ग्राम सुराज अभियान के तहत ऐसे इलाकों में गये जहां जाना तो दूर कल्पना करने से भी रोंगटे खड़े हो जाते थे। मुख्यमंत्री के इस साहस ने हजारों परिवारों के मन से डर को निकाल दिया। माओवादियों के हौसले शायद इन्हीं कारणों से आने वाले दिनों में पस्त हों। गांधीजी के बताये अहिंसा के रास्ते पर चलता छत्तीसगढ़ एक नयी सुबह की प्रतीक्षा कर रहा है जब छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में धमाके नहीं, दहशत नहीं, ढोल की थाप पर मोर मदमस्त होकर नाचेगा और कोयल कूकेगी। वनवासी विद्यार्थियों की इस सफलता ने संभावना को विस्तार दिया है, विकल्प दिया है एक नये छत्तीसगढ़ के निर्माण का। 

रविवार, 27 मई 2012

भवानी भाई, पत्रकारिता और बाजार


30 मई पत्रकारिता दिवस पर विशेष

मनोज कुमार
भवानी भाई, पत्रकारिता और बाजार शीर्षक शायद आपको अटपटा लगे लेकिन तीनों के बीच का अन्तर्सबंध आगे चलकर हम समझने की कोशिश करेंगे। मैं गीत बेचता हूं किसम किसम के गीत बेचता हूं..दशकोंं पहले भवानी प्रसाद मिश्र ने जब यह गीत लिखा होगा तो उन्हें इस बात का अहसास रहा होगा कि आने वाले दिनों में पत्रकारिता भी किसम किसम के खबरें बेचेगी। जिसे जो पसंद होगा और जिसके जेब में दाम देने की गुरबत होगी, वह अपनी पसंद की खबर बनवायेगा और छपवायेगा। आज की पत्रकारिता का यही सच है। 
यह भी सच है कि 30 मई 1826 को उदंत मार्तण्ड का प्रकाशन आरंभ करते समय पंडित जुगलकिशो शर्मा को इस बात का कतई अहसास नहीं रहा होगा कि पत्रकारिता के ऐसे दिन भी आएंगे। वे तो पत्रकारिता को समाज सुधार का एक माध्यम मानते थे और इसी बूते पर उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से अंग्रेजी शासकों से लोहा लेने की जुर्रत दिखायी। वे कामयाब भी हुए किन्तु जिस पत्रकारिता की तब उन्होंने कल्पना की होगी और जिसे समाज सुधार का माध्यम माना होगा, वह पत्रकारिता सन् 2012 आते आते तक मीडिया में तब्दील हो गया। मीडिया का सामान्य सा अर्थ है माध्यम और इस माध्यम को बाजार ने अपना औजार बना लिया है। 
पंडित जुगलकिशोर से लेकर उनके समकालीन व्यक्तित्व के लिये पत्रकारिता के मायने और अर्थ सकरात्मक थे किन्तु इनसे आगे जाकर पंडित भवानी प्रसाद मिश्र ने भविष्य को भांपा और गीत बेचने की बात कही। भवानी भाई पत्रकारिता के आने वाले दिनों के बारे में भले ही अनजान रहे हों लेकिन पत्रकारिता की दशा को शायद उन्होंने पहचान लिया था। उन्हें इस बात का भी अहसास था कि आने वाले समय में समाज पर बाजार का कब्जा होगा। तब अकेले पत्रकारिता या साहित्य बाजार के इशारे पर लिखी, रची नहीं जाएगी बल्कि समूचा समाज बाजार के इशारे पर होगा। यह ठीक है कि आज की तारीख में पत्रकारिता जिसे हम मीडिया कह रहे हैं, ने पत्रकारिता का समूचा स्वरूप ही बदल दिया है। पत्रकारिता हाशिये पर है और मीडिया का वर्चस्व है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है। 
पत्रकारिता हाशिये पर है किन्तु मीडिया पत्रकारिता की बुनियाद पर अपने अस्तित्व को बनाये हुए है क्योंकि पत्रकारिता और मीडिया का फकत फर्क इतना ही है कि पत्रकारिता सामाजिक सरोकार की बात करती है और मीडिया स्वस्वरोकार की। एक ऐसे मुद्दे की जहां उसे अधिकाधिक लाभ मिल सके किन्तु पत्रकारिता अपने जन्मकाल से जैसा था, वैसा ही है। वह सामाजिक सरोकार के मुद्दे पर बात करती है। पत्रकारिता के लिये जरूरी नहीं है कि वह समाज के बदलते जीवनशैली को विषय बनाये बल्कि उसके लिये जरूरी है कि वह बार बार लौटकर उन गांवों की तरफ जाए जहां आजादी के साठ दशक बाद भी पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी है। ठीक इसके उलट मीडिया के लिये जरूरी है कि समाज की जीवन शैली ऽैसे बदल रही है, वह क्या खाना पसंद करता है और किस कम्पनी के कपड़े उसके बदन को फबते हैं। वह किस कीमत का टेबलेट मोबाइल इस्तेमाल करता है, किस कीमत की कार में घूमता है। मीडिया की यह विषय-वस्तु उसकी जरूरत है क्योंकि इन्हीं विषयों से उसका धनोपार्जन होता है।
भवानी भाई का गीत जी हां, हुजूर मैं गीत बेचता हूं और मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी कफन आज की पत्रकारिता की सच्चाई है। भवानी भाई ने इस गीत की रचना भावावेश में नहीं की होगी और संभव है कि उन दिनों पत्रकारिता की ऐसी बाजारू अवस्था भी नहीं रही होगी, ठीक वैसे ही जब मुंशी प्रेमचंद ने कफन लिखा होगा। दोनों रचनाकारों को आने वाले दिनों का अहसास रहा होगा। गीत बेचने और कहानी कफन वर्तमान समय की सच्चाई है। यह पूरे समाज का सच है किन्तु इसे पत्रकारिता को केन्द्र में रखकर समझने की कोशिश करना होगी। वह इसलिये भी कि जिस पत्रकारिता के दम पर हमने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये, आज वही पत्रकारिता सवालों के कटघरे में है। पेडन्यूज आज पत्रकारिता का तखल्लुस बनता चला जा रहा है। सामाजिक सरोकार और पेडन्यूज में तुलना करेंगे तो पाएंगे कि सामाजिक सरोकार की खबरों के दम पर ही पत्रकारिता की सांसें टिकी हुई है किन्तु पेडन्यूज की बात करते हैं तो वह पत्रकारिता पर एक दाग की तरह ही है क्योंकि ऽुछ खास अवसरों पर पेडन्यूज का मामला उठता है। 
30 मई को जब हम गर्व के साथ हिन्दी पत्रकारिता का दिवस मनाने की बात करते हैं तब यह दिन केवल उत्सव का दिन नहीं होता है बल्कि यह दिन होता है आत्ममंथन का, स्वयं के विवेचन का। स्वयं को परखने का कि आखिर आज तक के सफर में हमने क्या पाया और क्या खोया। भवानी भाई के बहाने पत्रकारिता और बाजार की पड़ताल की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। मीडिया खबरें ढूंढ़ती नहीं बल्कि गढ़ती है बिलऽुल उसी तरह जिस तरह एक कारखाना किसी वस्तु का उत्पादन करता है। शायद यही कारण है कि बार बार मीडिया को उद्योग का दर्जा दिये जाने की मांग और बात की जाती रही है। मेरे जेहन में एक सवाल यह उठता है कि जो मीडिया समाज का चैथा स्तंभ है, वह उद्योग कैसे बन सकता है अथवा बनाया जा सकता है। यदि मीडिया को उद्योग का दर्जा दिया जाना संभव है और इससे संबद्ध लोग सहमत हैं तो हमें मीडिया को चैथा खंभा कहने से स्वयं को बरी कर लेना चाहिए। किसी खंभे का अर्थ होता है जवाबदारी और एक उद्योग जबावदार हो सकता है किन्तु उसकी प्राथमिकता उसके लाभ से संबद्ध होती है। मुझे नहीं लगता है कि पत्रकारिता को उद्योग बनाया जाना चाहिए और यदि ऐसा है तो एक बार फिर भवानी भाई का गीत अपने होने की सार्थकता प्रमाणित करता है। 

शनिवार, 12 मई 2012

एक दिन की मां !


-मनोज कुमार
बहुत सालों से और बहुत बार मां की एक कहानी सुनता आ रहा हूं। मां और उसका एक बेटा था। गरीब और विपन्न। पिता का साया उठ गया था। बेटे की चिंता करती मां को रात रात भर नींद नहीं आती थी। खुद भूखे रहकर बेटे को खाना खिलाती। दिन गुजरते गये। बेटा निकम्मा और आवारा हो गया था। मां को चिंता लगी रहती कि उसके मर जाने के बाद क्या होगा। दिन मां अपने निकम्मे और नाकारा बेटे को दुनियादारी समझाने बैठी तो बेटे को गुस्सा आ गया। गुस्से में फरसे से मां की गर्दन उड़ा दी। कटी गर्दन से आवाज आयी, बेटे तुम्हें चोट तो नहीं लगी? मां की यह सूरत हम भारत के हर गांव और घर में पाते हैं। इस दुलारी मां को बाजार ने प्रोडक्ट बना दिया है मदर्स डे के रूप में। जो मां अपनी कोख में नौ महीने हमें रखे और अंगुली पकड़कर दुनियादारी के लायक बनाये, उस मां के लिये हमारे पास बस एक दिन! सुन कर और सोचकर मन जख्मी हो जाता है। इस निगोड़े बाजार ने न केवल मां के लिये एक दिन तय किया है बल्कि हर रिश्तों के लिये उसके पास एक एक दिन है। बाजार चाहता है कि साल के तीन सौ पैंसठ दिन, दिन न रहकर उत्सव बन जाएं। इन उत्सवी दिनों के बहाने बाजार चल पड़े। करोड़ों का सौदा-सुलह हो। जिसे उपहार मिले उसका मन खिल जाए और जिसे न मिले वह कलह मचा डाले। देने वाले को गरूर हो कि वह कितना महंगा तोहाफा दे सकता है और पाने वाला निहाल कि उसे कितना प्यार किया जाता है। जो उपहार न खरीद पाये, वह खुद को निकम्मा समझे और जिसे तोहफा न मिले, वह अपने आपको दुर्भाग्यशाली। 
सच तो यह है कि उपहार पाने वाला, देने वाला, नहीं पाने वाला और न दे सकने की औकात रखने वाले का रहबर है तो बाजार। बाजार कहता है कि साल के तीन सौ चौंसठ दिन मरती मां को दवा न दो, तीर्थ पर न ले जाओ, उसके पास बैठकर उसकी गोदी में सिर रखकर आराम करने का तुम वक्त न निकाल सको लेकिन मंहगा उपहार देकर यह जरूर जताओ कि बेटा कितना बड़ा सौदागर बन गया है। यही हाल बाकि दिनों के लिये करो। बाजार ने लोगों को ऐसा मोह लिया है कि अब रिश्ता, रिश्ता न होकर वस्तु हो गया है। विनिमय बन गया है। कमाऊ पत्नी अधिक पाने की लालसा में पति को महंगे उपहार देती है तो गृहिणी अपने को प्रूफ करती दिखती है कि उसके उपहार में कितनी चिंता छिपी हुई है। भाई, बहन, मां-बाप अब रिश्ते नहीं, वस्तु हैं और वस्तुओं का विनिमय करना बाजार ने बेहतर ढंग से सिखा दिया है।
बाजार की जकड़ इतनी मजबूत है कि आप छूट नहीं सकते। जहां तक मुझे याद है मेरी मां जीते जी श्राद्ध पक्ष में पंचाग में तिथि देखा करती थी। मेरे पूछने पर बताती थी कि जो हमारा साथ छोड़ गये हैं, उसके लिये श्राद्ध पक्ष में एक एक दिन तय होता है। इस दिन उनके पसंद का खाना बनता है और मंदिरों में दान करने के साथ पक्षियों को भी खिलाया जाता है। विश्वास यह रहता है कि यह खाना मृतात्मा तक पहुंचता है। आज मां नहीं है, भाभी यह रस्म निभा रही है। कल भी मुझे पता नहीं था कि जो खाना मृतक की पसंद के अनुरूप बनता है, वह उसे मिलता है कि नहीं, आज भी मुझे यकिन नहीं है। इतना जरूर है कि यह एक दिन अपनों को याद करने का होता है। बाजार भी कहता है कि अपनों को एक दिन याद करो। दोनों के याद करने में एक फर्क है तो यह कि बाजार कहता है कि जिंदा व्यक्ति को बरस के हर दिन नहीं, एक दिन याद करो और भूल जाओ और हमारी परम्परा कहती है साल में एक दिन याद करो लेकिन दिल से करो। रिश्तों को समझो और उसका मान करना जानो। बाजार कहता है डे के आगे डेथ है और इसके बाद है भूल जाने की परम्परा किन्तु दिवस की परम्परा हमसे कहती है दिवस का अर्थ है रिश्तों को कभी न भूलने की परम्परा। 

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

शिकायत नहीं, शाबासी दें


-मनोज कुमार
आमतौर पर हर पीढ़ी अपनी बाद वाली पीढ़ी से लगभग नाखुश रहती है। उसे लगता है कि उन्होंने जो किया वह श्रेष्ठ है। बाद की पीढ़ी का भविष्य न केवल चौपट है बल्कि इस पीढ़ी ने अपने से बड़ों का सम्मान करना भी भूल गयी है। यह शिकायत और चिंता लगभग बेमानी सी है। कल गुजर चुकी पीढ़ी के बारे में कुछ कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि उनके साथ जीवन का अनुभव जुड़ा हुआ है किन्तु आज की युवा पीढ़ी के बारे में मैं कम से कम यह कह सकता हूं कि उनके बारे में की जा रही चिंता और शिकायत दोनों गैरवाजिब हैं। इस बात का अहसास मुझे किसी क्लास रूम में पढ़ाते वक्त नहीं हुआ और न किसी सेमीनार में बोलते समय। इस बात का अहसास मुझे भोपाल की सड़कों पर चलने वाली खूबसूरत बसों में सफर करते समय हुआ। दूसरे मुसाफिर की तरह मैं बस में चढ़ा। भीड़ बेकाबू थी। बैठने की कल्पना तो दूर, खड़े होने के लिये भी जगह पाना मुहाल हो रहा था। सोचा कि थोड़ी देर में मंजिल तक पहुंच जाएंगे। इतने में एक नौजवान खड़ा होकर पूरी विनम्रता के साथ अपनी सीट पर मुझे बैठने का आमंत्रण देने लगा। मेरे ना कहने के बाद भी वह मुझे अपनी जगह पर बिठाकर ही माना। सोचा कि उसे आसपास उतरना होगा लेकिन उसकी मंजिल बहुत दूर थी। यह मेरा पहला अनुभव था किन्तु आखिरी नहीं। थोड़े दिनों बाद एक बार फिर ऐसा ही वाकया मेरे साथ हुआ। 

मैं हैरान था कि जिस युवा पीढ़ी से हमारी पीढ़ी शिकायत और चिंता से परे देख नहीं पा रही थी, वह युवा पीढ़ी कितनी विनम्र है। न केवल उसे सम्मान देना आता है बल्कि वह स्वयं तकलीफ झेलकर भी सम्मान देनेके भाव से भरा हुआ है। इस वाकये ने मुझे कई तरह से सोचने के लिये विवश कर दिया। मुझे लगने लगा कि मेरी पीढ़ी की शिकायत वाजिब नहीं है। यह ठीक है कि युवाओं का कुछ प्रतिशत उदंड है और अनुशासनहीन। ऐसे मुठ्ठी भर युवाओं के लिये समूचे युवावर्ग को शिकायतों के कटघरे में खड़ा करना उचित तो कतई नहीं है। मैं जो अनुभव आप से साझा कर रहा हूं, उसके पीछे मंशा यही है कि युवाओं की विन्रमता, सहजता और उनके भीतर के आदरभाव को समाज के समक्ष रखा जाए। जो युवा दिग्भ्रिमित हैं, शायद उनसे कुछ सीख लें और इससे भी आगे यह कि हम केवल शिकायतों का पिटारा नहीं खोलें बल्कि उनकी पीठ थपथपाकर उनका हौसला भी बढ़ायें। ऐसा करके हम सकरात्मक माहौल बना सकेंगे ताकि युवाओं में बदलाव देख सकें। सकरात्मक बदलाव।

हमारी पीढ़ी अपनी बाद की पीढ़ी के लिये चिंतित भी है। मुझे ऐसा लगता है कि यह चिंता भी फिजूल की है। मुझे याद है अस्सी के दशक में बोर्ड एग्जाम पास करने के बाद कॉलेज में दाखिला लेते हुए मेरे पास वाणिज्य या कला संकाय में जाने का विकल्प था। ऐसा नहीं है उन दिनों मेडिकल या इंजीनियरिंग की पढ़ाई नहीं होती थी। पढ़ाई तो इन दोनों की भी होती थी किन्तु मैं और मुझ जैसे मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों की प्रतिभा इतनी नहीं थी कि हम मेडिकल या इंजीनियरिंग की परीक्षा पास कर सकें। कोई संकोच नहीं शिक्षा के स्तर पर हम लगभग औसत ही थे। आज समय बदल गया है। वाणिज्य या कला की पढ़ाई अब कोई नहीं करता है। हर नौजवान इंजीनियर या डाक्टर बनने की प्रतिभा रखता है। हम अपने समय में साठ प्रतिशत पा लेने पर गर्व करते थे, आज का युवा ९८ प्रतिशत पा जाने के बाद भी संतुष्ट नहीं है। हमारी पीढ़ी अपनी नाकामयाबी को छिपाने के लिये रास्ता ढूंढ़ सकती है कि उन दिनों हमारे पास विकल्प नहीं था, आज तो अनेक किस्म के ऑप्शन हैं। बात कुछ हद तक ठीक हो सकती है, पूरी तरह से ठीक नहीं। हमारी पीढ़ी अपनी पूर्व की पीढ़ी से होशियार थी। वे स्कूली शिक्षा के बाद रूक जाते थे और हम ग्रेज्युेट होते थे और आज की पीढ़ी हमसे कहीं आगे है। जो बेअदबी की शिकायत है, वह कहीं न कहीं युवा पीढ़ी से नहीं है बल्कि स्वयं से है क्योंकि बदलते समय के साथ हम स्वयं को बदलने में पिछड़ गये हैं। लब्बोलुआब यह कि हर पीढ़ी अपनी पुरानी पीढ़ी से ज्यादा योग्य हुई है। शिक्षा में भी और सभ्यता में। उनके पास दृष्टि है और आत्मविश्वास भी। जरूरत है युवा वर्ग हौसला देने की। 

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

अपने अपने आग्रह और सत्याग्रह



मनोज कुमार

इसे गुदगुदाने वाला अनुभव ही कहा जा सकता है। महात्मा गांधी अचानक से अपने विरोधियों के लिये भी आदर्श बन गये हैं। हर कोई स्वयं को महात्मा का अनुगामी बता रहा है। गांधीजी को लेकर विलाप का दौर जारी है। उनके स्मृति चिन्हों की नीलामी को लेकर चिंता तो खूब जतायी जा रही है किन्तु विश्व के अनेक हिस्सों में सुरक्षित महात्मा गांधी के स्मृति चिन्हों को सहेजने की चिंता किसी ने नहीं की। जिन लोगों को गांधीजी के आग्रह और सत्याग्रह पर कभी यकिन नहीं था, वे सभी आग्रही और सत्याग्रही बन पड़े हैं। राजनीति से परे रहने वाले गांधीजी के नाम पर यह राजनीति एक अलग किस्म की है। सात्विक दिखकर, अहिंसा के मार्ग पर चलकर सत्ता तक पहुंचने का यह अभिनव अभिनय की एक मिसाल पेश की जा रही है। समाजसेवियों से लेकर राजनेताओं तक को अब गांधीजी का सहारा चाहिए। यह सुखद भी है कि आजादी के छह दशक से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद जब हम गांधीजी की जरूरत महसूस करते हैं तो लगता है कि गांधीजी सर्वकालिक रहे हैं और रहेंगे लेकिन उनके सामयिक हो जाने का अर्थ अलग अलग है।

मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस. फिल्म में गांधीजी को जिस रूप में दिखाया गया और नकलची छात्रों को उस रूप में देखना दुर्भाग्यजनक है। बिलकुल वैसा ही कि राजनीतिज्ञ अपनी मांगों को मनवाने के लिये राजनीति का सहारा लेने के बजाय गांधीजी के आग्रह और सत्याग्रह को लाठी बनाकर उसका सहारा ले रहे हैं। गांधीजी का आग्रह और सत्याग्रह कभी स्वार्थसिद्धि के लिये नहीं रहा। अंग्रेजों को अपने आग्रह और सत्याग्रह से झुकाने वाले गांधीजी ने जो कुछ उपक्रम किया, वह भारतवासियों के लिये किया। आज के ये नकली गांधी अनुगामी नेता जो कुछ कर रहे हैं, वे सिर्फ और सिर्फ अपने लिये। सत्ता में बने रहें या सत्ता की राह सुगम हो सके, इसके लिये वे गांधी का स्मरण कर रहे हैं। उनके आग्रह और सत्याग्रह के मार्ग पर चलने का स्वांग रच रहे हैं। गांधीजी के इन अनुगामियों को कभी इस बात का इल्म नहीं हुआ कि वे हिंसा के खिलाफ कोई गांधीवादी सोच को जमीं पर उतारें। हिंसा को हिंसा के रास्ते निपटाने की कोशिश हो रही है और जब इस कोशिश के बारे में बात की जाती है तो लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है। लॉ एंड ऑर्डर की बात कही जाती है। व्यवस्था में गांधीवादी विचार एकदम से विलुप्त हो जाता है। यह दुर्भाग्यजनक है। 

सौ बरस पहले लिखा गया हिन्द स्वराज इस दौर का सबसे पठनीय किताब बन चुकी है। हिन्द स्वराज जिन लोगों ने पढ़ी है, उन्हें मालूम है कि यह किताब क्या संदेश देती है। हिन्द स्वराज का मैं पॉकेट संस्करण को पढ़ रहा था। इस किताब में पाठक और सम्पादक के बीच संवाद है। मेरी जिज्ञासा इस बात को लेकर थी कि ये पाठक कौन है और सम्पादक कौन? गांधीजी की इसमें क्या भूमिका है। हिन्द स्वराज का गीत गाने वाले लगभग एक दर्जन सुधिजनों से इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश किन्तु अधिकांश टाल गये अथवा आधा-अधूरा जवाब देकर खुद को बरी कर लिया। इन्हीं में से एक ने जरूर मुझे मुकम्मल जवाब दिया। तब मुझे पता चला कि गांधीजी ने स्वयं को पाठक बनकर सवाल किया और स्वयं सम्पादक बन का पाठक की जिज्ञासा को शांत करते रहे। गांधीजी अनेक किस्म के सवाल स्वयं से करते थे और जवाब भी तलाशते थे। उनके मन में कहीं यह था कि आम पाठकों के मन में भी इस तरह के सवाल आते होंगे। जब वे जहाज में लम्बी यात्रा पर होते थे तो ऐसे सवाल स्वयं गढ़ते और जवाब देने की कोशिश करते। उनकी यही कोशिश बाद में हिन्द स्वराज के नाम से आयी। इस तरह मुझे हिन्द स्वराज के बारे में जानकारी मिली। जो लोग हिन्द स्वराज को केन्द्र में रखकर चर्चा-परिचर्चा कर रहे हैं, उन्हें हिन्द स्वराज की रचना की पृष्ठभूमि से पाठकों को अवगत कराना चाहिए ताकि आयोजकों का प्रयास प्रभावी हो सके।

गांधीजी के आग्रह-सत्याग्रह से लेकर हिन्द स्वराज की चर्चा और परिचर्चा में गांधीजी होकर भी नहीं हैं। वे संकेत मात्र हैं। उनकी जनस्वीकार्यता है अत: सत्ता के करीब पहुंचने का माध्यम बनाकर गांधीजी का स्मरण करने की कोशिशें जारी हैं। जिस देश में एम.जी रोड लिखा जाता हो, जहां महात्मा गांधी मार्ग बोलने में संकोच और शर्म हो, जिस देश में महात्मा गांधी २ अक्टूबर और ३० जनवरी तक सीमित रह गये हों, उस देश में सत्ता मार्ग के लिये एमजी रोड सुविधाजनक होता है। आग्रह, सत्याग्रह, चर्चा और परिचर्चा सिर्फ विलाप करने का जरिया है। दुख को तो इस बात का भी होता है कि एक और गांधी जैसे विशेषण से उन लोगों को महिमामंडित किया जाता है जिनकी निगाहें जनकल्याण के लिये नहीं बल्कि स्व-कल्याण के लिये लगी होती हैं। सच में महात्मा के प्रति इतना ही आग्रह है तो हिंसा को अहिंसा में बदलने की कोशिश हो, राजस्व बढ़ाने के लिये शराब की दुकानें खोलने की सहमति असहमति में बदल जाये तभी कुछ उम्मीद बंधेगी।  

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

Bal Vivah

मिसाल बन गया गांव बड़ी जाम
-मनोज कुमार
मध्यप्रदेश का व्यवसायिक जिला है इंदौर। इंदौर जिले का एक छोटा सा गांव है बड़ी जाम। लगभग गुमनाम सा गांव बड़ी जाम ने आदर्श कायम किया है जिसकी गूंज इंदौर से भोपाल तक और शायद कल पूरे देश में होगी। इस गांव में बाल विवाह का आयोजन था। पुलिस को इत्तला मिली और वह कार्यवाही करने पहुंच गयी। पहले तो थोड़ा बहुत हील-हुज्जत हुई और इसके बाद जो हुआ तो गांव बड़ी जाम समाज के लिये मिसाल बन गया। इस गांव के लोगों ने एक बाल विवाह नहीं रोका बल्कि संकल्प लिया कि अब गांव में कोई बालविवाह नहीं होगा। बड़ी जाम इंदौर जिले के महू तहसील के पास बसा एक छोटा सा गांव है। यह वही महू है जिसे डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जन्मस्थली के रूप में याद किया जाता है। लगभग एक सप्ताह के भीतर अक्षय तृतीया है। भारतीय सांस्कृतिक परम्परा का एक महत्वपूर्ण दिन। इस दिन को कुछ रूढ़िवादी मानसिकता के लोगों ने नाबालिग बच्चों का ब्याह करने की परम्परा डाल दी है जिससे यह महत्वपूर्ण दिन बच्चों के लिये डरावना दिन सा हो गया है। जिन दुधमुंहे बच्चों की शादी रचायी जाती है, उन्हें तो इसका मतलब भी मालूम नहीं होता है। आज के इस वैश्विक समाज में न तो बाल विवाह कोई अर्थ रखता है और कन्यादान जैसी योजनाएं।
इस दिन देश के कोने-कोने में कथित सामाजिक रस्म के नाम पर हजारों बच्चों को विवाह के बंधन में बांधने की कोशिश होगी। समाज के ठेकेदार इसे पुण्य मानकर पूरा करने की कोशिश करेंगे और सरकार कानून के डंडे के बल पर रोकने की। कुछ जगह समाज के ठेकेदार कामयाब होंगे तो कुछ जगह पर कानूनी डंडा लेकिन सदियों से चली आ रही यह सामाजिक कोढ़ पर अभी तक नियंत्रण नहीं पाया जा सका है। यह ठीक है कि शासन और प्रशासन कानून के डंडे के बूते पर बाल विवाह रोके किन्तु इससे इतर समाज को आगे आना होगा। इस कोढ़ को खत्म करने के लिये डर नहीं, जागरूकता की जरूरत है। शिक्षा इस कोढ़ को खत्म करने का एक बड़ा औजार है, खासकर स्त्री शिक्षा को बढ़ाकर। दुर्भाग्य से स्त्री सशक्तिकरण की बातें तो हम खूब करते हैं किन्तु इस दिशा में कोई ठोस पहल होती नहीं दिखती है। खबरों का जायजा लें तो प्रतिदिन सौ-पचास स्त्रियां अलग अलग कारणों से प्रताड़ना की शिकार होती हैं। विकास की ठाठें मारते भारतीय समाज के लिये इस तरह की खबरें दाग है। बालविवाह रोकने के लिये हमारे पास कानून हैं और प्रशासन इस कानून को अमल में लाने की भरपूर प्रयास करता है। भय जरूरी है किन्तु इससे ज्यादा जरूरी है जागरूकता की। 
लिंगानुपात बिगड़ने की चिंता करती देश भर की राज्य सरकारें बिटिया को बचाने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। यह सकरात्मक कदम हैं और इसका स्वागत किया जाना चाहिए। एक तरफ तो बिटिया बचाने के लिये जतन किया जा रहा है तो दूसरी तरफ कन्यादान जैसी नकरात्मक सोच की योजना भी चल रही है। असलियत तो यह है कि कन्यादान योजना सरकार की उन गरीब परिवारों के लिये राहत की योजना है जो सयानी बेटी का ब्याह आर्थिक दिक्कतों से नहीं कर पा रहे हैं किन्तु योजनाकारों ने जो इस योजना का नामकरण किया है, उससे नकरात्मक संदेश जाता है। सरकार आर्थिक सहायता देकर एक तरफ तो अनेक गरीब परिवारों को ब्याह के खर्च से तनावमुक्त कर रही है तो दूसरी तरफ बाल विवाह को रोकने में भी अपनी भूमिका निभा रही है। इन तमाम शासकीय योजनाओं को समाज चुनावी लाभ पाने वाली योजनायें मानता है और योजनाएं अपने मकसद से भटक जाती हैं। 
बाल विवाह रोकने में मीडिया की भूमिका अहम हो सकती है किन्तु बहुत ज्यादा सक्रियता मीडिया की नहीं दिखती है। टीआरपी बटोरने अथवा अधिक प्रतियां बिकने वाली खबरें ही मीडिया के लिये महत्व की रखती हैं। अक्षय तृतीया के करीब आते ही मीडिया सनसनी फैलाने वाली खबरों से मीडिया स्वयं को दूर रखता है बल्कि मन को छू लेने वाली खबरों पर उसका फोकस ज्यादा रहता है। बाजार का यह भी गुण है कि वह सनसनी से ज्यादा भावनाओं को कैश कर ले। यह ठीक है कि बाजार की मांग के अनुरूप मीडिया खबरें तलाश करता है किन्तु इससे परे मीडिया की अपनी सामाजिक जवाबदारी है। उसे इस बात की पड़ताल करनी चाहिए कि बीते साल किस गांव में अधिक बाल विवाह हुये और इस बार किन गांवों में इस कुरीति को दोहराया जाएगा। शासन-प्रशासन से हमेशा छत्तीस बने रहना मीडिया का स्वभाव है और इसके अभाव में मीडिया मृतप्राय हो जाएगा किन्तु सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में शासन-प्रशासन का सहयोगी बन कर मीडिया अपनी छवि निखार सकेगा, विश्वसनीय बन सकेगा। ऐसा कर मीडिया वैसा ही उदाहरण पेश करेगा जैसा कि बड़ी जाम गांव के लोगों ने बाल विवाह न करने की शपथ लेकर किया है।      

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