रविवार, 5 मई 2013

ना डरना लाडो इस देस मे



-मनोज कुमार

मेरे घर की दो नन्हीं परी स्कूल में गर्मी की छुट्टी लगने के बाद से बहुत ज्यादा व्यस्त हो गई हैं. आने वाली 13 तारीख को अक्षय तृतीया है और इन दोनों को अपनी बेटियों के ब्याह की चिंता लगी हुई. उनके कपड़े कैसे सिये जाएंगे, गहने कौन से पहनाया जाये, खाने में क्या बनेगा और मेहमानों में किस किस को बुलाया जाय आदि-आदि की चिंता में दुबली होती जा रही हैं. इन दोनों की चिंता देखकर बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं. अम्मां और अम्मां के बाद बड़ी भाभी पूरे उत्साह के साथ घर पर पूजन की व्यवस्था करतीं. मिट्टी से तैयार किये गये गुड्डे और गुडिय़ा का ब्याह किया जाता. इसी में मंगल कामना की जाती कि घर में जवान होती बिटिया का ब्याह अगले बरस इसी मंडप में कर दिया जाये. बड़ा मजा आता था. सत्तू खाने को मिलता और शायद थोड़ा-बहुत नजराना भी.  आज अपनी परियों को चिंता में रहकर तैयारी करते देख मन खुश हो रहा है. कुछ चिंता भी है तो इस दिन की उस रूढि़वादी परम्परा का जो हमें हर बरस शर्मसार करती हैं. 

अक्षय तृतीया का यह पर्व शहरी इलाकों के लिये तो शायद एक पर्व होता है किन्तु देहाती इलाकों में बसे मासूमों के लिये किसी दुर्भायजनक दिन. अनजाने में, अनजाने रिश्तों से गांठ बांधने की रस्म इस विश्वास के साथ की जाती है कि इससे रिश्ते मजबूत होते हैं. जिनका देह कच्चा हो और मन समझने लायक भी न हो, उस रिश्ते के पक्केपन की बात एक दिमागी बीमारी ही हो सकती है. भारतीय समाज कई जगहों पर पिछड़ा है तो अनेक स्थानों पर समाज सुधारकों ने गलतियों को सुधारने के लिये पूरा इंतजाम कर रखा है. शारदा एक्ट इसी का उदाहरण मात्र है. यह ठीक है कि कानून का पालन हमें ही कराना है लेकिन मुश्किल तब खड़ी हो जाती है जब कानून पालन करने वाले ही इस पाप के भागीदार बनने के लिये आगे आ जाते हैं. पहले का अनुभव रहा है कि वोटपकाऊ नेता बालविवाह में शरीर होते रहे हैं और शायद इस बार भी वे मोह न छोड़ पायें. 

अक्षय तृतीया भारतीय समाज और संस्कृति का एक पावनपर्व है और इसकी मीमांसा अलग से समझी जा सकती है लेकिन इसकी आड़ में नादान बच्चों के ब्याह का जो खेल खेला जाता है, उसे समझने और सुधारने की दरकार हम सभी को है. बीते समय में भारतीय समाज जिस दंश से गुजर रहा है, वह पीड़ादायक है. प्रति दिन अनाचार की दिल दहला देने वाली खबरें आ रही हैं. सभी सहम गये हैं. डर सता रहा है. लगता है कि जाने अब क्या घट जाये. डर लगना अस्वाभाविक नहीं है लेकिन डर अकेला इस बीमारी का इलाज नहीं है. जरूरत इस बात की है कि हम बच्चों, खासकर बेटियों को जितना ज्यादा शिक्षित करेंगे, उनके भीतर आत्मविश्वास भरेंगे, उतनी ही तेजी से हम अनाचारियों से निपट सकेंंगे. ना आना लाडो इस देस में लिखने, बोलने और बताने के बजाय ना डरना लाडो इस देस में प्रचारित करेंगे तभी हमारा कल महफूज रह पायेगा. नकरात्मक विचार हमेशा डर को बढ़ाता है और डरना हम भारतीयों को नहीं आता है. रानी लक्ष्मीबाई इस बात का हमारे सामने उदाहरण है कि कैसे वो अपने दुश्मनों से अकेले निपट सकती है. जिस देश में लक्ष्मीबाई की विरदावली गायी जाती हो, उस देश में लाडो को आने से कौन रोक सकता है..? बस, इस बार अक्षय तृतीया पर किसी लाडो को न भेजना पराया घर रे..

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

श्रमिक आंदोलन की धुंधली होती चमक



-मनोज कुमार
हम मेहनतकश जब भी अपना हिस्सा मांगेंगे, एक खेत नहीं, एक गांव नहीं, पूरी की पूरी दुनिया मांगेंगे... जैसे गीत अब नेपथ्य में चले गये हैं. हममें से बहुतों को तो याद भी नहीं होगा कि 1 मई का महत्व क्या है? हमें तो यह भी स्मरण करना पड़ेगा कि आखिरी श्रमिक आंदोलन कहां और कौन सा था? समय परिवर्तन के साथ जैसे पूरा समाज कॉर्पोरेट के चंगुल में फंसता चला गया वैसे ही श्रमिक आंदोलन की चमक भी धुंधली पड़ती जा रही है. एक समय था जब उद्योगपतियों को कद्दावर श्रमिक नेताओं के नाम से ही पसीना छूट जाता था लेकिन अब सरकारें जिस गति से उद्योग लगाने पर जुटी हुई हैं तो इसका एक कारण श्रमिक आंदोलन की चमक का खो जाना भी है. एक समय था जब छत्तीसगढ़ के श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी की आवाज की गूंज पूरे देश में सुनायी देती थी और तब उद्योगपति एवं श्रमिकों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी. नियोगी की मौत के बाद तो जैसे श्रमिक आंदोलन को सांप सूंघ गया हो. ऐसा भी नहीं है कि श्रमिक अपने हक के लिये लड़ नहीं रहे हैं लेकिन उनकी आवाज को बुलंद करने वाला कोई नायक अब दिखाई नहीं देता है. यह हकीकत है और इसे मंजूर करना चाहिये.  जो संगठन या राजनीतिक दल श्रमिक आंदोलन की आवाज उठाने का दम भरते हैं, उनकी सचाई भी किसी से छिपी नहीं है. मुझे याद पड़ता है कि लगभग दो दशक पहले मेरी मुलाकात ताराचंद वियोगी जी से हुई थी. श्रमिकों को लेकर उनसे अनेक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई थी. अब वियोगीजी भी सक्रिय नहीं जान पड़ते हैं. 

श्रमिक आंदोलन को मीडिया भी समर्थन देता रहा है लेकिन अब मीडिया का रूख भी श्रमिक आंदोलन को लेकर बहुत सक्रिय नहीं है. ऐसा नहीं है कि मीडिया में श्रमिक आंदोलन खबर नहीं बनती है. सच तो यह है कि मीडिया में श्रमिक आंदोलन केवल खबरों तक है. इसके बाद की भूमिका से मीडिया नदारद है. श्रमिक आंदोलन की सफलता और विस्तार में मीडिया की भूमिका हमेशा से रही है किन्तु वही कॉर्पोरेट सेक्टर ने मीडिया को भी श्रमिक आंदोलन से परे कर दिया है. अब मीडिया का फोकस श्रमिक आंदोलन पर नहीं रहा क्योंकि मैनजमेंट को लगता है कि इससे उनके व्यवयास पर आंच आयेगी. आज की स्थिति में हर मीडिया ग्रुप विभिन्न व्यवसाय कर रहा है और श्रमिक आंदोलन में मीडिया का समर्थन का सीधा अर्थ होगा अपने ही गु्रप के बिजनेस को नुकसान पहुंचाना. ऐसी स्थिति में कोई भी मीडिया गु्रप नहीं चाहेगा कि उसके हित जख्मी हों.
श्रमिक आंदोलन की मरणासन्न स्थिति से सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होता है. श्रमिक आंदोलन के कारण ही उद्योगपतियों को मजबूरी में ही सही, सामाजिक कल्याण के कार्यों में सहयोग करना पड़ता था. मजदूरों को उनका वाजिब हक मिलता था और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर बढ़ते थे. पूरे देश की राज्य सरकारें अधिकाधिक औद्योगिकरण पर जोर दे रही हैं. उद्योगों के लिये पलक-पांवड़े बिछा दिये गये हैं. रियायतों को पिटारा खोल दिया गया है. एक तरह से राज्य सरकारें उद्योगपतियों के समक्ष शरणम गच्छामी की स्थिति में हैं तो दूसरी तरफ स्थानीय लोगों को रोजगार देने की तरफ कोई पक्का रास्ता नहीं तलाशा जा रहा है. श्रमिक आंदोलनों की कमजोर होती स्थिति ने बेरोजगारी को बढ़ाया है और उद्योगपति अपनी सुविधा से लोगों को काम दे रहे हैं. कम मजदूरी पर ज्यादा काम लेेने की दृष्टि से दूसरे प्रदेशों के बेरोजगारों को काम मिल रहा है और स्थानीय मजदूर आज भी खाली हाथ बैठा है.

1 मई को एक बार फिर मजदूर दिवस की औपचारिकता पूरी कर दी जाएगी. कुछ श्रमिक संगठन और कुछ राजनीतिक दल मगरमच्छी आंसू बहाकर श्रमिकों की दशा सुधारने की बात कहेंगे. इस दिन के गुजरने के साथ ही साथ वे भूल जाएंगे कि मजदूरों के हक के लिये उन्हें लडऩा है. मजदूर की नियती है कि वह लड़ते लड़ते अपना जीवन त्याग देगा लेकिन दो जून की रोटी उसे नसीब नहीं होगी. वह गीत गाता रहेगा जब भी मांगेंगे.. एक खेत नहीं.. एक गांव नहीं.. पूरी की पूरी दुनिया मांगेंगे.. मजदूर को यह सच भी पता है कि न तो उसे मांगने का अवसर मिलेगा और न ही दुनिया.. दो जून की रोटी और तन ढक़ने के लिये कपड़ा ही मिल जाये तो मजदूर दिवस सार्थक हो जाएगा. फिलहाल श्रमिक आंदोलन की गुम होती रोशनी में मजदूर के लिये कोई सुबह नजर नहीं आती है.

रविवार, 14 अप्रैल 2013

यशस्वी सम्पादक राजेन्द्र माथुर पर शोध पत्रिका समागम का नया अंक





भोपाल.  हिन्दी पत्रकारिता के यशस्वी सम्पादक राजेन्द्र माथुर का स्मरण करते हुये शोध पत्रिका समागम का नया अंक जारी कर दिया गया है. 9 अप्रेल को राजेन्द्र माथुर की पुण्यतिथि पर शोध पत्रिका समागम का यह अंक  मुकम्मल अंक जारी किया गया. राजेन्द्र माथुर मध्यप्रदेश के हैं और उन्होंने अपनी लेखनी से हिन्दी पत्रकारिता को नया मुकाम दिया था. राजेन्द्र माथुर के उल्लेख के बिना हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास अधूरा ही रह जाता है. इन दिनों जब हिन्दी पत्रकारिता सवालों से घिरी है तब राजेन्द्र माथुर का स्मरण करना स्वाभाविक सा है. राजेन्द्र माथुर की हिन्दी पत्रकारिता को यशस्वी बनाने के लिये किये गये  प्रयासों में वर्तमान समय में उठ रहे सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश शोध पत्रिका समागम ने की है. 


शोध पत्रिका समागम के इस नये अंक में राजेन्द्र माथुर के साथ लम्बे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने अपना अनुभव साझा किया है. श्री बादल ने विस्तार से राजेन्द्र माथुर की कार्यशैली एवं उनकी दूरदृष्टि पर चर्चा की है. एक अन्य आलेख में वरिष्ठ पत्रकार पुण्यप्रसून वाजपेयी ने वर्तमान हालात पर चिंता करते हुये लिखा है कि आज के समय में राजेन्द्र माथुर के लिये गुंजाईश ही कहां शेष है. कुछ अन्य आलेखों के साथ राजेन्द्र माथुर की राजनीतिक दृष्टि पर एक शोध पत्र भी है.  एक अन्य आलेख में आधुनिक टेक्रॉलाजी का जिक्र करते हुये लिखा है कि राजेन्द्र माथुर सरीखे पत्रकार की मुश्किल से एक तस्वीर हाथ लगेगी लेकिन उनका लिखा पढऩे के लिये एक उम्र की जरूरत होगी. राजेन्द्र माथुर पर केन्द्रित यह अंक पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिये विशेष उपयोग का है. 

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

ननिहाल की यादे


मनोज कुमार
          यदि आपकी उम्र चालीस के पार है तो आपके पास अपने ननिहाल की मीठी यादें आपके जेहन में इठला रही होगी लेकिन आपकी उम्र 30 के पहले की है तो आपके पास ननिहाल के मौज की कोई खुश्नुमा यादें साथ नहीं होगी क्योंकि आपकी डायरी में 30 अप्रेल दर्ज होगा नहीं होगा. 30 अप्रेल का दिन हमारे लिये तब खास दिन हुआ करता था. महीना और डेढ़ महीना इंतजार करने के बाद इस तारीख पर परीक्षा परिणाम आना तय होता था. चिंता और इंतजार परीक्षा परिणाम का नहीं होता था बल्कि चिंता थी कि जैसे ही छुट्टियों का ऐलान हो और हम भाग लें ननिहाल की तरफ. ननिहाल मतलब बेखौफ मस्ती के दिन. अमराइ जाकर गदर करने का दिन. रात में सब भाई-बहन मिलकर कभी लडऩे और रूठने मनाने का दिन. अब ये बातें बस किताबों में उसी तरह रह गई हैं जैसे कभी कोई शायर अपनी मोहब्बत बयां करता था. 

        अब 30 अप्रेल की तारीख  कैलेण्डर में तो जरूर मौजूद है लेकिन जीवन से गायब हो गया है. अब 30 अप्रेल की जगह 30 मार्च आती है. एक डरावनी तारीख की तरह. इस दिन भी परीक्षा परिणाम की घोषणा होती है लेकिन भय पैदा करने वाली. नम्बरों की दौड़ इस दिन हर स्कूल में आप साफ साफ देख सकते हैं. दो-पांच नम्बरों से पीछे रह जाने का गम भी आज के बच्चों के लिये इतना बड़ा होता है कि वे अपना जीवन गंवाने से भी पीछे नहीं हटते हैं. नम्बरों की दौड़ में जीवन की हार का यह सिलसिला बढ़ चला है. 30 मार्च से ही शुरू हो जाता है बच्चों के मन में तनाव और इनसे कहीं ज्यादा शिकार होते हैं मां-बाप. दुकानों में लगी लम्बी कतारों में खड़े होकर घंटों बाद मिलने वाली कापी-किताबें और फीस की मोटी सी किताब. सब कुछ निचुड़ सा जाता है. इसके बाद बच्चों की पेशानी पर होती है चिंता की लकीरें. एक अप्रेल से फिर स्कूल जाने का तनाव. अप्रेल में सूरज की तपन बढ़ती जाती है और इसी के साथ बच्चों की परेशानी. जैसे तैसे महीना गुजरता है और सवा-डेढ़ महीने के लिये स्कूलों में छुट्टी हो जाती है. छुट्टी के पहले ही प्रोजेक्ट के नाम पर इतना काम दे दिया जाता है कि छुट्टी की खबर पाकर वे खुश होने के पहले ही उदास हो जाते हैं. बच्चों के साथ यह हालत मां-बाप की भी होती है क्योंकि प्रोजेक्ट बच्चों के लिये होता है किन्तु वर्क मां-बाप को करना पड़ता है. 

       आज बच्चों की हालत को देखकर समझ में नहीं आता है कि इनका बचपन कहां गुम हो गया है? हम तो बच्चे से होकर बड़े हुये हैं और ये बच्चे सीधे बड़े हो रहे हैं. इनके पास न तो दादा-दादी और नाना-नानी की मीठी यादें हैं और न साथ में बचपन की वो शरारतें जो इन्हें क्रियेटिव बनाये. कम्प्यूटर के सहारे, वीडियो गेम केे सहारे बड़े होते इन बच्चों के पास अपनी पीढ़ी को देने के लिये कुछ नहीं है. यदि है तो यह बताने के लिये कि कभी किसी से पिछडऩा नहीं है, रेस लगी है दौड़ जाओ और जितनी तेजी से भाग सकते हो, भाग लो. बचपन को मत जियो और शायद किशोरवय भी नहीं. किसी लडक़ी को बसा कर, किताबों को दिल से लगाकर याद करने का समय नहीं है. दिल ही तो है और यह दिल किसी पर आ गया तो ई-मेल कर दो या एसएमएस ठोंक दो. जवाब मिला तो ठीक नहीं तो दूसरी गाड़ी पकड़ लो. दुनिया मुठ्ठी में कर लो तो बच्चों ने सीख लिया है लेकिन 30 मार्च के बच्चों के पास 30 अप्रेल की खुशी मिनट भर के लिये नहीं है. मन करता है कि काश! मैं अपने बच्चों को 30 अप्रेल की अपनी खुशी दे सकता लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है क्योंकि हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं, कैसे लौटें पीछे और पीछे...


सोमवार, 8 अप्रैल 2013

पत्रकारों की शिक्षा नहीं, शिक्षित होना ज्यादा जरूरी


मनोज कुमार
डाक्टर और इंजीनियर की तरह औपचारिक डिग्री अनिवार्य करने के लिये प्रेस कौंसिंल की ओर से एक समिति का गठन कर दिया गया है. समिति तय करेगी कि पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता क्या हो. सवाल यह है कि पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने के बजाय उन्हें शिक्षित किया जाये क्योंकि प्रशिक्षण के अभाव में ही पत्रकारिता में नकारात्मकता का प्रभाव बढ़ा है. मुझे स्मरण है कि मैं 11वीं कक्षा की परीक्षा देने के बाद ही पत्रकारिता में आ गया था. तब जो मेरी ट्रेनिंग हुई थी, आज उसी का परिणाम है कि कुछ लिखने और कहने का साहस कर पा रहा हूं. साल 81-82 में पत्रकारिता का ऐसा विस्तार नहीं था, जैसा कि आज हम देख रहे हैं. संचार सुविधाओं के विस्तार का वह नया नया दौर था और समय गुजरने के बाद इन तीस सालों में सबकुछ बदल सा गया है. विस्तार का जो स्वरूप आज हम देख रहे हैं, वह कितना जरूरी है और कितना गैर-जरूरी, इस पर चर्चा अलग से की जा सकती है. फिलवक्त तो मुद्दा यह है कि पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने की जो कवायद शुरू हुई है वह कितना उचित है.

काटजू साहब अनुभवी हैं और उन्हें लगता होगा कि पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने के बाद पत्रकारिता के स्तर में जो गिरावट आ रही है, उसे रोका जा सकेगा और इसी सोच के साथ उन्होंने डाक्टर और इंजीनियर से इसकी तुलना भी की होगी. याद रखा जाना चाहिये कि एक पत्रकार का कार्य एवं दायित्व डाक्टर, इंजीनियर अथवा वकील के कार्य एवं दायित्व से एकदम अलग होता है. पत्रकारिता के लिये शैक्षिक योग्यता जरूरी नहीं है, यह हम नहीं कहते लेकिन केवल तयशुदा शैक्षिक डिग्री के बंधन से ही पत्रकार योग्य हो जाएंगे, इस पर सहमत नहीं हुआ जा सकता है. पिछले बीस वर्षाे में देशभर में मीडिया स्कूलों की संख्या कई गुना बढ़ गयी है. इन मीडिया स्कूलों की शिक्षा और यहां से शिक्षित होकर निकलने वाले विद्यार्थियों से जब बात की जाती है तो सिवाय निराशा कुछ भी हाथ नहीं लगता है. अधिकतम 25 प्रतिशत विद्यार्थी ही योग्यता को प्राप्त करते हैं और शेष के हाथों में डिग्री होती है अच्छे नम्बरों की. शायद यही कारण है कि पत्रकारिता की उच्च शिक्षा के बावजूद उनके पास नौकरियां नहीं होती है. कुछ दूसरे प्रोफेशन में चले जाते हैं तो कुछ फ्रटेंशन में. यह बात मैं अपने निजी अनुभव से कह रहा हूं क्योंकि मीडिया के विद्यार्थियों से परोक्ष-अपरोक्ष मेरा रिश्ता लगातार बना हुआ है. सवाल यह है कि जब पत्रकारिता की उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी योग्यता का अभाव है तो कौन सी ऐसी डिग्री तय की जाएगी जिससे पत्रकारिता में सुयोग्य आकर पत्रकारिता में नकरात्मकता को दूर कर सकें? 


वर्तमान समय की जरूरत डिग्री की नहीं बल्कि व्यवहारिक प्रशिक्षण की है. देशभर में एक जैसा हाल है. वरिष्ठ पत्रकार भी विलाप कर रहे हैं कि पत्रकारिता का स्तर गिर रहा है किन्तु कभी किसी ने अपनी बाद की पीढिय़ों को सिखाने का कोई उपक्रम आरंभ नहीं किया. एक समय मध्यप्रदेश के दो बड़े अखबार नईदुनिया और देशबन्धु पत्रकारिता के स्कूल कहलाते थे. आज ये स्कूल भी लगभग बंद हो चुके हैं क्योंकि नईदुनिया का अधिग्रहण जागरण ने कर लिया है और देशबन्धु में भी वह माहौल नहीं दिखता है. जो अखबार योग्य पत्रकार का निर्माण करते थे, वही नहीं बच रहे हैं अथवा कमजोर हो गये हैं तो किस बात का हम रोना रो रहे हैं? हमारी पहली जरूरत होना चाहिये कि ऐसे संस्थानों को हमेशा सक्रिय बनाये रखने की ताकि पत्रकारिता में योग्यता पर कोई सवाल ही न उठे.
पत्रकारों की योग्यता का सवाल इसलिये भी बेकार है क्योंकि पत्रकारिता हमेशा से जमीनी अनुभव से होता है. किसी भी किस्म का सर्जक माटी से ही पैदा होता है. मुफलिसी में जीने वाला व्यक्ति ही समाज के दर्द को समझ सकता है और बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करता है. एक रिपोर्टर अपने अनुभव से किसी भी मुद्दे की तह तक जाता है और साफ कर देता है कि वास्तविक स्थिति क्या है. पत्रकारों की जिंदगी और सेना की जिंदगी में एक बारीक सी रेखा होती है. दोनों ही समाज के लिये लड़ते और जीते हैं. सैनिक सीमा की सरहद पर देश के लिये तैनात रहता है तो पत्रकार सरहद की सीमा के भीतर समाज को बचाने और जगाने में लगा रहता है. किसी दंगे या दुघर्टना के समय एक डाक्टर और इंजीनियर को मैदान में नहीं जाना होता है लेकिन एक पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर समाज तक सूचना पहुंचाने का काम करता है. मेरा यकिन है कि तब शैक्षिक योग्यता कोई मायने नहीं रखती बल्कि समाज के लिये जीने का जज्बा ही पत्रकार को अपने कार्य एवं दायित्व के लिये प्रेरित करता है. एक इंजीनियर के काले कारनामे या एक डाक्टर की लापरवाही और लालच से पर्दा उठाने का काम पत्रकार ही कर सकता है. पत्रकार को इन सब के बदले में मिलता है तो बस समाज का भरोसा. आप स्वयं इस बात को महसूस कर सकते हैं कि समाज का भरोसा इस संसार में यदि किसी पर अधिक है तो वह पत्रकारिता पर ही. वह दौड़ कर, लपक कर अपनी तकलीफ सुनाने चला आता है. पत्रकार उससे यह भी जिरह नहीं करता बल्कि उसकी तकलीफ सुनकर उसे जांचने और परखने के काम में जुट जाता है और जहां तक बन सके, वह पीडि़त को उसका न्याय दिलाने की कोशिश करता है. यही पीडि़त बीमार हो तो डाक्टर से समय लेने, समय लेने के पहले फीस चुकाने में ही उसका समय खराब हो जाता है. क्या इसके बाद भी किसी पत्रकार की शैक्षिक योग्यता तय की जा सकती है.


जहां तक पत्रकारिता में नकरात्मकता का सवाल है तो यह नकारात्मकता कहां नहीं है? समाज का हर सेक्टर दूषित हो चुका है, भले ही प्रतिशत कम हो या ज्यादा. इसलिये अकेले पत्रकारिता पर दोष मढऩा अनुचित होगा. पत्रकारिता में जो नकरात्मकता का भाव आया है, उसे पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता के सहारे दूर करने का अर्थ एक सपना देखने जैसा है क्योंकि यह नकारात्मकता पत्रकारों की नहीं बल्कि संस्थानों की है. संस्थानों को यह सुहाने लगा है कि उनके दूसरे धंधों को बचाने के लिये कोई अखबार, पत्रिका का प्रकाशन आरंभ कर दिया जाये अथवा एकाध टेलीविजन चैनल शुरू कर लिया जाये. यह उनके लिये बड़ा ही सुविधाजनक है. एक तो उनके धंधों की हिफाजत होगी और जो नुकसान मीडिया में दिखेगा, उससे उनकी ब्लेक कमाई को व्हाईट किया जा सकेगा. इसी के साथ वे नौसीखिये अथवा अयोग्य पत्रकारों को नौकरी पर रख लेते हैं. पत्रकारों के नाम पर ऐसे लोगों को रख लिया जाता है जिन्हें अपनी जिम्मेदारी का कोई भान भी नहीं होता है. तिस पर नेता-मंत्री और अधिकारियों द्वारा कुछ पूछ-परख हो जाने के बाद उन्हें लगता है कि इससे अच्छा माध्यम तो कुछ हो ही नहीं सकता. कहने का अर्थ यह है कि इन मीडिया हाऊसों पर प्रतिबंध लगाने अथवा योग्यता के आधार पर पत्रकारों के चयन का कोई आधार तय होना चाहिये, कोई नियम और नीति बनाया जाना चाहिये.


इसी से जुड़ा एक सवाल और मेरे जेहन में आता है. महानगरों का तो मुझे पता नहीं लेकिन ठीक-ठाक शहरों के अखबारों में शैक्षिक एवं बैंकिंग संस्थाओं में अच्छी-खासी तनख्वाह पर काम करने वाले लोग अखबार के दफ्तरों में अंशकालिक पत्रकार के रूप में सेवायें देने लगते हैं. कई बार नाम के लिये तो कई बार नाम के साथ साथ अतिरिक्त कमाई के लिये भी. ऐसे में पूर्णकालिक पत्रकारों को उनका हक मिल नहीं पाता है और कई बार तो नौकरी के अवसर भी उनसे छीन लिया जाता है. प्रबंधन को लगता है कि मामूली खर्च पर जब काम चल रहा है तो अधिक खर्च क्यों किया जाये. इस प्रवृत्ति पर भी रोक लगाया जाना जरूरी लगता है. 


समिति उपरोक्त बातों पर तो गौर करें ही. यह भी जांच लें कि सरकार द्वारा समय समय पर बनाये गये वेजबोर्ड का पालन कितने मीडिया हाऊसों ने किया. हर मीडिया हाऊस कुल स्टाफ के पांच या दस प्रतिशत लोगों को ही पूर्णकालिक बता कर लाभ देता है, शेष को गैर-पत्रकार की श्रेणी में रखकर अतिरिक्त खर्च से बचा लेता है. समिति योग्यता के साथ साथ मीडिया हाऊस के शोषण से पत्रकारों की बचाने की कुछ पहल करे तो प्रयास सार्थक होगा. मीडिया हाऊसों के लिये पत्रकारों का प्रशिक्षण अनिवार्य बनाये तथा इस प्रशिक्षण के लिये प्रेस कौंसिल उनकी मदद करे. हो सके तो राज्यस्तर पर प्रेस कौंसिल प्रशिक्षण समिति गठित कर पत्रकारों के प्रशिक्षण की व्यवस्था करे. पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने वाली समिति से एक पत्रकार होने के नाते मैंने आग्रहपूर्वक उक्त बातें लिखी हैं. कुछ बिन्दु पर समिति सहमत होकर कार्यवाही करेगी तो मुझे प्रसन्नता होगी.

गुरुवार, 14 मार्च 2013

पानी की दोस्ती और दुश्मनी



मनोज कुमार
मुंबई से हमारे दोस्त राजेश चेटवाल आये थे. राजेश फिल्में बनाते हैं लिहाजा हमारा संंबंध और हमारी दोस्ती इसी वजह से हुई. कुछ काम की बातों के बीच उन्होंने अचानक अपनी कीमती मोबाइल का स्क्रीन दिखाते हुये हैरानी जाहिर की कि देखा, इस बार मुंबई को क्या हो गया है.. अभी इतनी गर्मी.. बात यहीं पर खत्म हो गई लेकिन मेरे लिये तो यह बात का एक सिरा था. अचानक से मुझे लगने लगा कि भोपाल भी एकदम से गर्म हो उठा है और इस गर्म होती धरती से पानी का स्तर एकाएक पाताल में पहुंच गया है. पाताल का अर्थ आम आदमी की पहुंच से दूर और बहुत दूर. दरअसल, स्थिति ऐसी ही है, इससे भी ज्यादा भयावह है या कि मेरी कल्पना से परे एकदम सुखद, अभी कुछ कह पाना मेरे लिये संभव नहीं है. स्थिति सुखद होगी तो मैं यह चाहूंगा कि मेरी कल्पना भरभरा कर गिर पड़े. इससे मुझे दिल से राहत मिलेगी. पिछले सालों के अनुभव मन को भयाक्रांत कर देते हैं. 

झीलों की नगरी कहे जाने वाले भोपाल में पानी के लिये लोगों का पानी उतरता हुआ देखा जा सकता है. पानी के लिये खून बहाने की घटना से अखबार रंगे होते हैं. मामूली सिर-फुटौव्वल और झूमा-झटकी तो पनघट की परम्परा रही है. इसी आपसी तकरार से रिश्तों में मजबूती आती रही है लेकिन अब जरूरतों ने इस तकरार को टकराहट में बदल दिया है. नतीजा खून-खराबा और एक-दूसरे की जान लेने तक की बात. यह पूरा मामला अब किसी एक प्रदेश या एक शहर का किस्सा नहीं रह गया है बल्कि यह कस्बे और गांव तक पानी की दुश्मनी पहुंचने लगी है. पनघट पर अब औरतें घर का दुखड़ा नहीं सुनाती हैं और न सुनने का वक्त बच गया है. उनके हाथ में रखी मटकी कितनी जल्दी भर जाये, इसकी चिंता में ही वे पनघट पर खड़ी दुबली होती रहती हैं. सास और ननद की शिकायतों को लेकर जिन औरतों के पास बतियाने के लिये बहुत वक्त होता था, अब उनकी दुनिया सिमट गयी है. शहर से गांव तक एक हाल हो गया है. इसे हाल न कह कर बेहाल कहें तो ज्यादा बेहतर होगा.

पानी के लिये बेहाल होते समाज में अब बेशर्मी आ गई है. पराये तो छोडिय़े, लोग अपनों को भी नहीं बख्श रहे हैं. पानी के लिये रिश्ते तार तार होते दिख रहे हैं. कोई कहता है कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिये होगा तो अचंभा सा लगता था किन्तु अब हर घाट और बाट में जो कुछ हो रहा है, वह गृह युद्ध जैसा तो है ही. फिर किसे इंकार होगा कि शहर, प्रदेश और देश के पार सरहदों पर पानी की जंग छिड़ जाये. पनघट से परे देखें तो हमारे हिन्दुस्तान के भीतर ही राज्यों में पानी को लेकर बवाल छिड़ा हुआ है. ये तेरा पानी, ये मेरा पानी की रट लगाने वाले राज्यों को यह नहीं मालूम कि अनवरत बहने वाली निर्झर नदी यह नहीं जानती कि वह किस राज्य को कितना जल देकर जा रही है. वह तो निर्मल ममता लुटाती हुई आगे बढ़ जाती है. मेरे मध्यप्रदेश से नर्मदाजी का उद्गम होता है और वह कई राज्यों की प्यास बुझाती हुई निकल जाती है. कुछ और नदियां होंगी जो अपने राज्यों से निकलती हैं और मेरे मध्यप्रदेश को भी अपना कुछ हिस्सा दे जाती होंगी.

प्रकृति ने कभी बांटना नहीं सीखा और शायद कभी सिखाया भी नहीं. बांटने और बेचने का खेल तो हमने खुद ही शुरू किया. कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक होने की बात अब शायद किताबों में दर्ज है. यदि ऐसा नहीं होता तो क्यों कर एक राज्य दूसरे राज्य को पानी देने पर एतराज जताता?  हां, हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि समस्या के निदान के लिये भले ही हमने कुछ नहीं किया हो लेकिन समस्या के लिये चिंता करने का दिन जरूर तय कर लिया है. फकत एक हफ्ते बाद हम ही क्या, पूरा संसार विश्व जल दिवस मनायेगा. कई सालों से मनाया जाता रहा है तो इस साल क्यों छूटे? सवाल यह है कि विलाप के लिये यह एक दिन क्यों, पूरे ग्रीष्म ऋतु में हम विलाप करते हैं. पहले पानी के लिये और बाद में इसी पानी के लिये अपनों का पानी उतारने के लिये. कुछ विलाप करते हैं अपनों के खो जाने का तो कुछ को रंज रह जाता है कि मैंने ऐसा क्यों किया. ईश्वर से प्रार्थना है कि पानी की यह दुश्मनी इस बरस देखने को न मिले. पनघट पर पानी की वही पुरानी दोस्ती देखने और सुनने को मिले जहां शिकवा-शिकायतें होती हैं, तकरार होती है और तकरार के पीछे छिपा प्यार होता है. ऐसा इस बरस हो जाये तो सुकून मिलेगा लेकिन कहते हैं ना पानी रे पानी तेरा रंग कैसा...? अब देखना है कि इस बार पानी का कौन सा रंग देखने को मिलता है.

शनिवार, 9 मार्च 2013

कातिल सावन और मार्च



मनोज कुमार
सावन और मार्च का महीना दोनों ही कातिल होता है. सावन नायिका के तन और मन को जलाता है तो मार्च का महीना लोगों की जेब को जला डालता है. सावन जाते जाते नायिका निढाल हो जाती है तो मार्च गुजरते ही नायक भी लगभग ठंडा सा पड़ जाता है...  इस गर्माते मार्च के महीने में जब यह गीत याद आ जाये तो ऐसा लगता है कि किसी ने जले पर नमक छिडक़ दिया है. तेरी दो टकियों की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाये... यह गाना तो उन लोगों को जरूर याद होगा जो मेरी उम्र के होंगे... उनकी बात नहीं करता जिसमें नायिका मिस कॉल से पट जाने की बात कहती हो... खैर, यह बड़ा उलझाव वाला मामला है... अभी तो हम सावन की बात कर लें...अब आपके दिमाग में यह बात आयेगी कि ये आदमी बौरा गया है... अच्छा खासा बासंती मौसम है... होली आने को है... रंगों का गीत गुनगुनाने के बजाय सावन की बातें कर रहा है... आप लोग ठीक सोच रहे हैं... मेरा सावन तो कब का बीत गया... सही मायने में तो होली के लायक भी नहीं बचा... अब जो बचा है वह मार्च महीने का हिसाब किताब... इससे कोई नहीं बच पाया है... नायिका के लिये सावन लाखों का है तो नायक हों या न हो... हर आदमी के लिये मार्च का महीना लाखों का है... ओहदेदार पदों पर बैठने वाले लोग इस जुगत में लगे हैं कि बजट लेप्स न हो जाये... नौकरीपेशा इस बात से परेशान हैं कि इनकम टेक्स किस तरह बचाया जाये... जिन लोगों की छुट्टियां बच गयी हैं, वे अपनी छुट्टी बचाने की जुगत में लगे हैं... 
अलग अलग तरह से देखो तो मार्च का महीना लाखों का ही नहीं, करोड़ों का है...जब बारिश में भीगी-भीगी सी मस्त नायिका सावन को लाखों का बता रही होगी तब भी मार्च करोड़ों का ही होगा... पता नहीं तब क्यों किसी फिल्मकार को यह क्यों नहीं सूझा कि वह मार्च महीने को करोड़ों का बता कर किसी नायक को नचवा दे... चलो, कोई हीरो नहीं नाचा तो न सही... कुछ कल्पना करते हैं कि यह सावन अगस्त के महीने में आने के बजाय मार्च में आता... तब क्या होता...? यह कल्पना उसी साठ और सत्तर दशक की है... दो हजार दस के बाद की कल्पना करेंगे तो मजा किरकिरा हो जाएगा क्योंकि अब कि नायिकाओं को लाखों के सावन से मतलब नहीं, वह तो एक मिस कॉल से पटने को तैयार है... इसलिये हमें फ्लैशबैक में ही जाना होगा... नायिका गरजते-बरसते मौसम में इठलाती हुई नायक से मनुहार करती हुई गा रही है... तेरी दो टकियो की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाये... इत्ते में परेशान नायक शायद ऐसा ही गायेगा... भाड़ में गया तेरा सावन और तु...इधर लाखों का भ_ा बैठा जाये... चलो, हंसी ठ्ठा खूब हुआ. होली आने में अभी एक पखवाड़ा है.. मैं तो इस लिखे के साथ एडवांस में ही होली बोल देता हूं.. हेप्पी होली इसलिये नहीं कि अभी तो इतना दुखड़ा रोया हूं.. इसके बाद तो आप हेप्पी होंगे और मैं.. हालांकि आप बोलो ना बोलो लेकिन आप भी...

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