रविवार, 14 जनवरी 2018

भारतीय राजनीति के महामना अटल विहारी वाजपेयी


भारतीय राजनीति के महामना अटल विहारी वाजपेयी
-अनामिका
भारतीय राजनीति में कई महामना हुए जिन्होंने भारत को नई दिशा और दृष्टि प्रदान की। आधुनिक भारत में भी महान राजनेताओं की लम्बी श्रृंखला है जिन्होंने न केवल भारतीय राजनीति को एक अलग पहचान दी बल्कि वे मील के पत्थर साबित हुए। इन महान नेताओं की चर्चा करते समय अपने समय के अटल विहारी वाजपेयी का उल्लेख सबसे पहले आता है। भारत के राजनीतिक इतिहास में उन महान् नेताओं की श्रृंखलाओं में जन्मे हमारे देश के महत्वपूर्ण कर्णधार श्री अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्होंने भारतवर्ष के राजनैतिक इतिहास में एक नए युग का प्रारंभ कर भारत में नव-परिवर्तन की लहर प्रवाहित कर दी। अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म ग्वालियर में 25 दिसम्बर 1924 को हुआ था। भारतीय राजनीति में यह तारीख अमिट है।
सच कहा जाए तो आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी का जो पूरे देश में उजास फैल रहा है, वह अटलजी के प्रयासों और उनकी प्रतिबद्धता के कारण माना जा सकता है। अटल बिहारी वाजपेयी बचपन से ही चंचल और कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा को अपनी जीवनशैली में उतारने वाले अटल बिहारी वाजपेयी मात्र 15 वर्ष की आयु में ही संघ की शाखा में जाने लगे थे। अपने विद्यार्थी काल में भी अटलजी ने छात्र संघ में महामंत्री और उपाध्यक्ष के रूप में अपनी कार्यक्षमता का परिचय दिया था। भारतीय जनसंघ पार्टी के वरिष्ठ सदस्य डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के पश्चात अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी निष्ठा की टीम लेकर राजनीति की पथरीली राहों पर चल पड़े थे। अपनी काव्यात्मक व सरल भाषण कला के जरिये मिली लोकप्रियता के सहारे लखनऊ के अतिप्रिय सांसद अटल बिहारी वाजपेयी जी 1957 में पहली बार बलरामपुर से लोकसभा के लिए चुने गए थे और एक सांसद के रूप में भारतीय राजनीति में उन्होंने अच्छी खासी लोकप्रियता हासिल कर ली थी। लखनऊ ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता उनकी ओजस्वी भाषण शैली से प्रभावित थी।
1968 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के पश्चात भारतीय जनसंघ पार्टी ने अटल जी को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया। उनकी कार्यकुशलता के आगे सभी पार्टी कार्यकर्ताओं ने वैसी ही अभिरुचि दिखाई, जैसी वे पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कार्यकाल में दिखाते थे। अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता के कारण अटलजी तीन बार भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे। यह उन्हीं के अथक परिश्रम, ओजस्वी भाषण, गंभीर लेखन और कार्यकर्ताओं से सम्पर्क आदि का नतीजा था, जो जनसंघ को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला। इसी जनसंघ पार्टी ने 1977 में जनता पार्टी और 1979 में भारतीय जनता पार्टी का रूप लिया। अटल जी तब से लगातार कई वर्ष तक लोकसभा में अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी की देश के प्रति सकारात्मक सोच के कारण देश उनके प्रति नतमस्तक है। अनेक अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भी अटलजी के सकारात्मक विचारों के कारण विश्व उनमें एक अंतर्राष्ट्रीय नेता की छवि देखने लगा था। प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन होते ही उनके सामने संकटों के बादल एक-एक करके आते चले गए। इन सभी संकटों का सामना उन्होंने जिस साहस से किया, यह अटल जी जैसे व्यक्तित्व के लिए ही संभव था। 
पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ निरन्तर बढ़ती कटुता, कश्मीर में बढ़ती आतंकवादी गतिविधियां विशेष रूप से चिन्ताजनक थी। एक ऐतिहासिक क्षण में अमन और दोस्ती का पैगाम लेकर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरहद पार पाकिस्तान गए थे। उन्होंने वहां जाकर राजनेताओं से कहा था कि हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। वाघा सीमा पर भारत और पाकिस्तान के नेताओं का ऐसा ऐतिहासिक मिलन हुआ, जैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ था। इस ऐतिहासिक मिलन के पश्चात् ऐसा सोचा जाने लगा था कि कश्मीर समस्या अब हल हो जाएगी लेकिन दुर्भाग्यवश खुराफाती दिमाग के मुशर्रफ और आतंकवादियों ने ऐसा नहीं होने दिया तथा देश को कारगिल युध्द का सामना करना पड़ा। देश के तमाम सैनिकों में अटल जी ने तब अदम्य उत्साह भर दिया था और सैनिकों ने भी उनके विश्वास को शौर्य और जीवट में बदल कर घुसपैठियों को देश की सीमा से बाहर खदेड़ दिया था। वीर जवानों का मनोबल बढ़ाते हुए अटल जी ने तब कहा था, ‘हम अपने जवानों और अफसरों पर गर्व करते हैं और सारा राष्ट्र उनके पीछे खड़ा है। कारगिल में वे एक नए इतिहास की रचना करें।’
अटल जी ने भारतीय राजनीति में सौम्यता और सद्भावना का की जो परम्परा कायम की, वह अविस्मरणीय है। राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ अटल जी कवि थे, सो उनके मन में सभी के प्रति करूणा का भाव था। वे आत्मसम्मानी राजनेता हैं और उन्होंने राजनीति में ईमानदारी को सबसे ऊपर रखा। उनके सामने कई ऐसे अवसर आए, जब वे कुछ तिकड़म से सत्ता हासिल कर सकते थे लेकिन ऐसा उन्होंने कभी नहीं किया।  वे सह्दयी थे लेकिन उन लोगों के लिए जो देश के प्रति अपनी निष्ठा रखते थे लेकिन उनके लिए वे एकदम कठोर थे जिनमें देशपे्रम का भाव नहीं था। वे अपने विरोधियों को भी समूचा सम्मान देते थे। आज उम्र हो जाने के कारण वे राजनीति में सक्रिय नहीं हैं लेकिन जितने वर्ष उन्होंने विपक्ष के साथ प्रधानमंत्री के रूप में गुजारे हैं, वहां हर दिन राजनीति की एक नई इबारत लिखी है। आज उनके जन्म दिवस पर हम कामना करते हैं कि वे अपनी अस्वस्थ्यता को पराजित कर एक बार फिर सक्रिय हो जाएं और हमारा मार्गदर्शन करें। अपनी कवि वाणी से वे एक बार फिर मन की कविता का पाठ करें और हमें जीवन के सद् गुण सिखाएं।(विकल्प)

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

नरेन्द्रनाथ से स्वामी विवेकानंद हो जाना


-मनोज कुमार
दुनियाभर की युवा शक्ति को दिशा देने वाले स्वामी विवेकानंद का सानिध्य अविभाजित मध्यप्रदेश को प्राप्त हुआ था. यह वह कालखंड था जब स्वामी विवेकानंद, स्वामी विवेकानंद ना होकर नरेन्द्रनाथ दत्त थे. इतिहास के पन्ने पर दर्ज कई तथ्य और स्मरण इस बात को पुख्ता करते हैं कि किशोरवय के नरेन्द्रनाथ दत्त से स्वामी विवेकानंद बन जाने का जो सफर शुरू हुआ था, उसमें अविभाजित मध्यप्रदेश की आबोहवा का पूरा पूरा प्रभाव था. स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो में दिए गए विश्व प्रसिद्ध भाषण के सवा सौ साल पूरे हो चुके हैं. इन सवा सालों में लगातार उनको सुना जा रहा है, गुना जा रहा है. अद्वितीय, अप्रतिम भाषण की बुनियाद में कहीं न कहीं उस अविभाजित मध्यप्रदेश की झलक मिलती है जिसमें उनके किशोरवय के लगभग डेढ़ वर्ष गुजारे थे.   
वर्तमान में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ इस बात का गौरव अनुभव करता है कि स्वामी विवेकानंद ने यहां डेढ़ वर्ष से अधिक का समय व्यतीत किया. हालांकि जिस कालखंड में उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय व्यतीत किये तब वे स्वामी विवेकानंद नहीं थे बल्कि किशोरवय के नरेन्द्रनाथ दत्त थे जो अपने परिवार के साथ रायपुर आये थे. यहां रहते हुये उनके भीतर जो संस्कार उत्पन्न हुये और उनके ज्ञान का लोहा माना गया जिसने बाद में उन्हें स्वामी विवेकानंद के रूप में संसार में प्रतिष्ठापित किया. यह हम सबके लिये गौरव की बात है. 1877 ई. में लगभग 14 वर्ष की आयु में कलकत्ता से रायपुर के लिये आना था तब आज की तरह सीधी रेललाईन सेवा उपलब्ध नहीं थी और तब छत्तीसगढ़ स्वतंत्र राज्य भी नहीं था. उस समय रेलगाड़ी कलकत्ता से इलाहाबाद, जबलपुर, भुसावल होते हुए बम्बई जाती थी। उधर नागपुर भुसावल से जुड़ा हुआ था, तब नागपुर से इटारसी होकर दिल्ली जाने वाली रेललाइन भी नहीं बनी थी। नरेन्द्रनाथ जिन्हें बाद में संसार ने एक आलौकिक युवा के रूप में जाना और वे हमेशा के लिये स्वामी विवेकानंद हो गये, कि स्मृति हमारे लिये धरोहर है. ऐसे महान व्यक्तित्व का किशोरावस्था में अविभाजित मध्यप्रदेश में निवास करना महत्वपूर्ण है.  
नरेन्द्रनाथ की यह रायपुर-यात्रा इसलिए भी विशेष महत्वपूर्ण हो जाती है कि इस यात्रा में उन्हें अपने जीवन में पहली भाव-समाधि का अनुभव हुआ था। वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर में उनके गुजारे हुये दिनों का उल्लेख करते हुये जीवनीकारों ने लिखा है कि नरेन्द्र एवं उनके घर के लोग नागपुर से बैलगाड़ी द्वारा रायपुर गये. उनके कथनानुसार, इस यात्रा में उन्हें पन्द्रह दिनों से भी अधिक का समय लगा था। उस समय पथ की शोभा अत्यन्त मनोरम थी। रास्ते के दोनों किनारों पर पत्तों और फूलों से लदे हुए हरे हरे सघन वनवृक्ष होते। भले ही नरेन्द्र नाथ को इस यात्रा में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, तथापि, उनके ही शब्दों में- ‘वनस्थली का अपूर्व सौन्दर्य देखकर वह क्लेश मुझे क्लेश ही नहीं प्रतीत होता था। अयाचित होकर भी जिन्होंने पृथ्वी को इस अनुपम वेशभूषा के द्वारा सजा रखा है, उनकी असीम शक्ति और अनन्त प्रेम का पहले-पहल साक्षात परिचय पाकर मेरा हृदय मुग्ध हो गया था।’ उन्होंने बताया था -‘वन के बीच से जाते हुए उस समय जो कुछ मैंने देखा या अनुभव किया, वह स्मृतिपटल पर सदैव के लिए दृढ़ रूप से अंकित हो गया है। विशेष रूप से एक दिन की बात उल्लेखनीय है। उस दिन हम उन्नत शिखर विन्ध्यपर्वत के निम्न भाग की राह से जा रहे थे। मार्ग के दोनों ओर बीहड़ पहाड़ की चोटियां आकाश को चूमती हुई खड़ी थीं। तरह तरह की वृक्ष-लताएं, फल और फूलों के भार से लदी हुई, पर्वतपृष्ठ को अपूर्व शोभा प्रदान कर रही थीं। अपनी मधुर कलरव से मस्त दिशाओं को गुंजाते हुए रंग-बिरंगे पक्षी कुंज कुंज में घूम रहे थे, या फिर कभी-कभी आहार की खोज में भूमि पर उतर रहे थे। इन दृश्यों को देखते हुए मैं मन में अपूर्व शान्ति का अनुभव कर रहा था। धीर मन्थर गति से चलती हुई बैलगाडिय़ां एक ऐसे स्थान पर आ पहुंची, जहां पहाड़ की दो चोटियां मानों प्रेमवश आकृष्ट हो आपस में स्पर्श कर रही हैं। उस समय उन श्रृंगों का विशेष रूप से निरीक्षण करते हुए मैंने देखा कि पासवाले एक पहाड़ में नीचे से लेकर चोटी तक एक बड़ा भारी सुराख है और उस रिक्त स्थान को पूर्ण कर मधुमक्खियों के युग-युगान्तर के परिश्रम के प्रमाणस्वरूप एक प्रकाण्ड मधुचक्र लटक रहा है। उस समय विस्मय में मग्न होकर उस मक्षिकाराज्य के आदि एवं अन्त की बातें सोचते-सोचते मन तीनों जगत के नियन्ता ईश्वर की अनन्त उपलब्धि में इस प्रकार डूब गया कि थोड़ी देर के लिए मेरा सम्पूर्ण बाह्य ज्ञान लुप्त हो गया। कितनी देर तक इस भाव में मग्न होकर मैं बैलगाड़ी में पड़ा रहा, याद नहीं। जब पुन: होश में आया, तो देखा कि उस स्थान को छोड़ काफी दूर आगे बढ़ गया हूं। बैलगाड़ी में मैं अकेला ही था, इसलिए यह बात और कोई न जान सका।’ इस बात का विस्तार से उल्लेख श्रीरामकृष्णलीलाप्रसंग, तृतीय खण्ड, द्वितीय संस्करण, नागपुर, पृष्ठ67-68 पर हुआ है. कहना ना होगा कि इसी यात्रा में नरेन्द्र को अलौकिक अनुभूति हुई.
रायपुर में नरेन्द्रनाथ पिता से ही पढ़ा करते थे। यह शिक्षा केवल किताबी नहीं थी। पुत्र की बुद्धि के विकास के लिए पिता अनेक विषयों की चर्चा करते। यहां तक कि पुत्र के साथ तर्क में भी प्रवृत्त हो जाते और क्षेत्र विशेष में अपनी हार स्वीकार करने में कुण्ठित न होते। उन दिनों विश्वनाथ बाबू के घर में अनेक विद्वानों और बुद्धिमानों का समागम हुआ करता तथा विविध सांस्कृतिक विषयों पर चर्चाएं चला करतीं। नरेन्द्र नाथ बड़े ध्यान से सब कुछ सुना करते और अवसर पाकर किसी विषय पर अपना मन्तव्य भी प्रकाशित कर देते। उनकी बुद्धिमता तथा ज्ञान को देखकर बड़े-बूढ़े चमत्कृत हो उठते, इसलिए कोई भी उन्हें छोटा समझ उनकी अवहेलना नहीं करता था। एक दिन ऐसी ही चर्चा के दौरान नरेन्द्र ने बंगला के एक ख्यातनामा लेखक के गद्य-पद्य से अनेक उद्धरण देकर अपने पिता के एक सुपरिचित मित्र को इतना आश्चर्यचकित कर दिया कि वे प्रशंसा करते हुए बोल पड़े- ‘बेटा, किसी न किसी दिन तुम्हारा नाम हम अवश्य सुनेंगे।’ कहना न होगा कि यह मात्र स्नेहसिक्त अत्युक्ति नहीं थी- वह सत्य भविष्यवाणी थी।
‘युगनायक विवेकानंद’(बंगला), प्रथम खण्ड, कलकत्ता, पृ. 55-57  में उल्लेख मिलता है कि नरेन्द्र में पहले से ही पाकविद्या के प्रति स्वाभाविक रूचि थी। रायपुर में हमेशा अपने परिवार में ही रहने के कारण तथा इस विषय में अपने पिता से सहायता प्राप्त करने तथा उनका अनुकरण करने से वे इस विद्या में और भी पटु हो गये। रायपुर में उन्होंने शतरंज खेलना भी सीख लिया तथा अच्छे खिलाडिय़ों के साथ वे होड़ भी लगा सकते थे। दि लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानन्द, अद्वैत आश्रम, मायावती, भाग 1, पांचवें संस्करण के पृष्ठ  42-43 में यह भी उल्लेख मिलता है कि रायपुर में ही विश्वनाथ बाबू ने नरेन्द्र को संगीत की पहली शिक्षा दी। विश्वनाथ स्वयं इस विद्या में पारंगत थे और उन्होंने इस विषय में नरेन्द्र की अभिरूचि ताड़ ली थी। नरेन्द्र का कण्ठ-स्वर बड़ा ही सुरीला था। वे आगे चलकर एक सिद्धहस्त गायक बने थे. उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष भी रायपुर में ही विकसित हुआ। 
डेढ़ वर्ष रायपुर में रहकर विश्वनाथ सपरिवार कलकत्ता लौट आये। तब नरेन्द्र का शरीर स्वस्थ, सबल और हृष्ट-पुष्ट हो गया और मन उन्नत। उनमें आत्मविश्वास भी जाग उठा था और वे ज्ञान में भी अपने समवयस्कों की तुलना में बहुत आगे बढ़ गये थे। किन्तु बहुत समय तक नियमित रूप से विद्यालय में न पढऩे के कारण शिक्षकगण उन्हें ऊपर की (प्रवेशिका) कक्षा में भरती नहीं करना चाहते थे। बाद में विशेष अनुमति प्राप्त कर वे विद्यालय की इसी कक्षा में भरती हुए तथा अच्छी तरह से पढ़ाई कर सभी विषयों को थोड़े ही समय में तैयार करके उन्होंने 1879 में परीक्षा दी। यथासमय परीक्षा का परिणाम निकलने पर देखा गया कि वे केवल उत्तीर्ण ही नहीं हुए हैं, प्रत्युत उस वर्ष विद्यालय से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले वे एकमात्र विद्यार्थी हैं। यह सफलता अर्जित कर उन्होंने अपने पिता से उपहार स्वरूप चांदी की एक सुन्दर घड़ी प्राप्त की थी।
प्राप्त संदर्भ में दो उल्लेखनीय घटनाओं का उल्लेख नरेन्द्रनाथ के जीवन का मिलता है. विश्वनाथ ने पुत्र को संगीत के साथ-साथ पौरुष की भी शिक्षा दी थी। एक समय नरेन्द्र नाथ पिता के पास गये और उनसे पूछ बैठे-‘आपने मेरे लिए क्या किया है?’ तुरन्त उत्तर मिला-‘जाओ दर्पण में अपना चेहरा देखो!’ पुत्र ने तुरन्त पिता के कथन का मर्म समझ लिया, वह जान गया कि उसके पिता मनुष्यों में राजा हैं। एक दूसरे समय नरेन्द्र ने अपने पिता से पूछा था कि परिवार में किस प्रकार रहना चाहिए, अच्छी वर्तनी का माप-दण्ड क्या है? इस पर पिता ने उत्तर दिया था-‘कभी आश्चर्य व्यक्त मत करना!’ क्या यह वही सूत्र था, जिसने नरेन्द्र नाथ को विवेकानन्द के रूप में समदर्शी बनाकर, राजाओं के राजप्रासाद और निर्धनों की कुटिया में समान गरिमा के साथ जाने में समर्थ बनाया था।रायपुर में घटी और दो घटनाएं नरेन्द्र नाथ के व्यक्तित्व के विकास की दृष्टि से बड़ी महत्वपूर्ण हैं। साथ ही उपर्युक्त विवरण प्रदर्शित करते हैं कि नरेन्द्र के व्यक्तित्व के सर्वतोमुखी विकास में रायपुर का कितना बड़ा योगदान रहा है।  इस तरह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है कि स्वामी विवेकानंद जैसी विभूति ने मध्यप्रदेश की सरजमीं पर अपने जीवन के वो दिन गुजारे जब वे साधारण मनुष्य थे लेकिन उनके भविष्य की रचना में मध्यप्रदेश की मिट्टी का भी योगदान रहा है.  

सोमवार, 8 जनवरी 2018

रिसर्च जर्नल ‘समागम’ 18वें वर्ष में


भोपाल। रिसर्च जर्नल ‘समागम’ ने अपने निरंतर प्रकाशन के 17 वर्ष पूर्ण कर लिया है. 17वें साल का आखिरी अंक जनवरी-2018 का महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज एवं विवेकानंदजी के शिकागो भाषण के सवा सौ साल पूर्ण होने पर केन्द्रित है. फरवरी 2018 में ‘समागम’ रेडियो पर केन्द्रित होगा और यह अंक 18वें वर्ष का प्रथम अंक होगा. इस आशय की जानकारी सम्पादक मनोज कुमार ने दी है. समाज, मीडिया एवं सिनेमा के अंतर्संबंध पर केन्द्रित मासिक रिसर्च जर्नल ‘समागम’ को यूजीसी ने अपनी स्वीकृति प्रदान की है. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ को यूजीसी ने मीडिया केेटेगिरी में शामिल किया है. ‘समागम’ का हर अंक विषय विशेष पर केन्द्रित होता है. ‘समागम’ के परामर्श मंडल में विद्वतजनों का सहयोग है तथा शोधार्थियों एवं शिक्षकों का निरंतर सहयोग मिलता रहा है. देश की प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका इंडिया टुडे, हंस एवं अन्य प्रमुख प्रकाशनों ने ‘समागम’ को सराहा है. हिन्दी सिनेमा के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर ‘समागम’ ने लगातार दो अंक का प्रकाशन किया जिसमें भाषायी सिनेमा पर शोध पत्रों का प्रकाशन किया गया. ‘समागम’ 18वें वर्ष में संचार के प्रमुख माध्यम रेडियो पर अपना पहला अंक केन्द्रित कर रहा है. ‘समागम’ की व्यक्तिगत आजीवन सदस्यता 1500/- रुपये में दी जा रही है. साथ ही मानक को पूर्ण करने वाले शोध पत्रों का प्रकाशन किया जाएगा.    

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

एक अपराजित योद्धा : शिवराजसिंह चौहान

12 साल का कीर्तिमान बनाने वाले मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री 
-मनोज कुमार 

     कैलेण्डर के पन्नों पर 29 नवम्बर की तारीख हर साल आती है लेकिन 2017 में यह तारीख मध्यप्रदेश के इतिहास की तारीख के रूप में दर्ज हो गई है. यह तारीख उस अपरोजय योद्धा के नाम दर्ज हो गई है जिसे हम शिवराजसिंह चौहान के नाम से जानते हैं. 61 साल के मध्यप्रदेश में लगातार 12 वर्षों तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने कीर्तिमान कायम किया है. यह सच है कि इन 61 सालों में ज्यादतर समय कांग्रेस सत्ता में रही लेकिन सिवाय दिग्विजयसिंह के कोई दूसरा कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं हुआ जिसने लगातार 10 साल तक मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हाली हो. दिग्विजयसिंह के रिकार्ड को ध्वस्त कर शिवराजसिंह ने मध्यप्रदेश के इतिहास में अपना नाम लिख दिया है. इसमें सबसे अहम बात यह है कि 12 सालों में शिवराजसिंह चौहान, शिवराजसिंह बने रहे, मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान बहुत कम रही. यही कारण है कि वे प्रदेश के बच्चों के मामा कहलाए और देशभर में मध्यप्रदेश का नाम रोशन हुआ. 
    शिवराजसिंह चौहान की पहचान एक मुख्यमंत्री के रूप में है और इतिहास के पन्नों में भी उन्हें इसी पहचान के साथ दर्ज किया जाएगा लेकिन सच तो यह है कि अपना सा लगने वाला यह मुख्यमंत्री हमारे बीच का, आज भी अपना सा ही है. शिवराजसिंह के चेहरे पर तेज है तो कामयाबी का लेकिन मुख्यमंत्री होने का गरूर नहीं, चेहरे पर राजनेता की छाप नहीं. सत्ता के शीर्ष पर बैठने की उनकी कभी शर्त नहीं रही बल्कि उनका संकल्प था प्रदेश की बेहतरी का. वे राजनीति में आने से पहले भी आम आदमी की आवाज उठाने में कभी पीछे नहीं रहे. वे किसी विचारधारा के प्रवर्तक हो सकते हैं लेकिन वे संवेदनशील इंसान है. एक ऐसा इंसान जो अन्याय को लेकर तड़प उठता है और यह सोचे बिना कि परिणाम क्या होगा, अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने निकल पड़ता है. बहुतेरों को यह ज्ञात नहीं होगा कि शिवराजसिंह चौहान मजदूरों को कम मजदूरी मिलने के मुद्दे पर अपने ही परिवार के खिलाफ खड़े हो गए थे. शिवराजसिंह चौहान का यह तेवर परिवार को अंचभा में डालने वाला था. मामूली सजा भी मिली लेकिन उन्होंने आगाज कर दिया था कि वे आम आदमी के हक के लिए आवाज उठाते रहेंगे.
     शिवराजसिंह चौहान उन बिरले मुख्यमंत्रियों में से एक होंगे जिनके कांधे पर हाथ रखकर सैकड़ों लोग मिल जाएंगे यह कहते हुए कि शिवराज हमारे साथ पढ़े हैं. च्शिवराज हमारे साथ पढ़े हैं, इसमें अपनापन तो है लेकिन एक भाव यह भी कि देखो हमारे साथ पढ़ा विद्यार्थी, हमारा दोस्त शिवराजसिंह आज मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री है. थोड़े से लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि च्हम शिवराजसिंह के साथ पढ़े हैंं और थोड़े से लोग होंगे जो कहते मिल जाएंगे-शिवराजसिंह और हम साथ पढ़े हैं. शिवराजसिंह के साथ सहपाठी होने की यह गर्वानुभूति सालों गुजर जाने के बाद हो रही है तो इसलिए कि शिवराजसिंह चौहान जब भोपाल के अपने स्कूल च्मॉडल स्कूलज् में जाते हैं तो मुख्यमंत्री बनकर नहीं, स्कूल के एक पुराने विद्यार्थी की तरह. शिक्षकों का चरण स्पर्श करना नहीं भूले. सहपाठियों को नाम से याद रखना और उन्हें संबोधित करना उनकी सादगी की एक झलक है.
       1956 में जब नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ और समय-समय पर मुख्यमंत्री बदलते रहे. हर मुख्यमंत्री की अपनी शैली थी. काम करने से लेकर जीवन जीने तक. लगभग सभी मुख्यमंत्री कुछ अलग दिखना चाहते थे या लोगों ने उन्हें वैसा प्रस्तुत करने की कोशिश की लेकिन 2005 में मुख्यमंत्री के इस परम्परागत चेहरे के विपरीत सादगी भरा एक चेहरा नुमाया हुआ शिवराजसिंह चौहान का. संसद से विधानसभा और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद भी उन्होंने अपने लिए कोई बनावट नहीं की. उनकी बुनावट इतनी मोहक थी कि कभी पांव पांव वाले भइया के नाम से मशहूर शिवराजसिंह मामा के नाम से मशहूर हो गए. ऐसा नहीं है कि शिवराजसिंह चौहान पहले मुख्यमंत्री हों जिन्हें विशेषण दिया गया बल्कि लगभग हर मुख्यमंत्री को उनकी कार्यशैली और उनके तेवर के अनुरूप विशेषण मिलता रहा है. कोई राजा-महाराजा कहलाए तो किसी को संवेदनशील होने का विशेषण दिया गया. संत और साध्वी के रूप में मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हालने वाले भी थे लेकिन लगातार 12 वर्षांे से सत्ता के शिखर पर बैठे शिवराजसिंह चौहान की सादगी चर्चा में रही.
शिवराजसिंह चौहान की सादगी भारतीय राजनीति में उन्हें अलग तरह से रखती है. आमतौर पर मुख्यमंत्री बनते ही सलाहकारों की भीड़ उमड़-घुमड़ पड़ती है. ये सलाहकार उन्हें आम से खास बनाने में जुट जाते हैं और उनके इर्द-गिर्द एक ऐसा घेरा बना दिया जाता है कि आम आदमी के लिए वे सत्ता पुरुष बनकर रह जाते हैं. शिवराजसिंह चौहान ने ऐसे सलाहकारों से खुद को दूर रखा.  आम से खास बनने में उनकी कोई रूचि नहीं रही सो वे जैसा थे, वैसा ही बना रहना चाहते हैं. लगभग हर जगह वे अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ पायजामा-कुरता में मिलेंगे. तामझाम और शोशेबाजी के इस आधुनिक दौर में शिवराजसिंह की यह सादगी उन्हें औरों से अलग, बिलकुल अलग बनाती है.
     शिवराजसिंह की सादगी का आलम यह है कि वे गांव-देहात के दौरे के समय धूल भरी सडक़ में अपने लोगों के साथ बैठने में कोई हिचक नहीं करते हैं. आलम तो यह है कि जब वे सडक़ निर्माण का औचक निरीक्षण के लिए पहुंचते हैं और बताते हैं कि वे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान हैं तो मजदूर उन्हें पहचानने से इंकार कर देते हैंं. इस वाकये से शिवराजसिंह के चेहरे पर गुस्से का भाव नहीं आता है बल्कि वे हंसी में लेते हैं. साथ चल रहे अफसरों को कहते हैं चलो, भई यहां शिवराज को कोई पहचानता नहीं. क्या यह संभव है कि एक मुख्यमंत्री को उसकी जनता पहचानने से इंकार करे और वह निर्विकार भाव से लौट आए? यह सादगी शिवराजसिंह में मिल सकती है. उनके इन्हीं अनुभवों ने उन्हें आम आदमी से जोडऩे के लिए कई तरह के जतन करने का उपाय भी बताया. इन्हीं में से एक मुख्यमंत्री आवास पर होने वाली विभिन्न वर्गों की पंचायत रही है. कभी मुख्यमंत्री आवास आम आदमी के लिए तिलस्म सा था. बाहर से लोग अंदाज लगाया करते थे कि अंदर क्या क्या होगा लेकिन जब आम आदमी को मुख्यमंत्री आवास से बुलावा आया तो यह तिलस्म टूट गया. मध्यप्रदेश की राजनीति में यह शायद पहला अवसर होगा जब कोई मुख्यमंत्री अपने आवास में हर पर्व और हर उत्सव सेलिब्रेट कर रहा है. 
      शिवराजसिंह की सादगी के यह उद्धरण वह हैं जिसकी गवाही पूरा मध्यप्रदेश दे रहा है. हां, यह बात भी तय है कि जब आप शिवराजसिंह चौहान को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जांचते हैं, परखते हैं तो एक राजनेता के रूप में कुछ कमियां आप को दिख सकती हैं. कुछ फैसले सबके मन के नहीं होते हैं और इस बिना पर आप उन्हें घेरे में ले सकते हैं लेकिन एक आदमी से जब आप सवाल करेंगे तो उनका जवाब होगा कि अपना अपना सा लगने वाला यह शिवराज हमारा मुख्यमंत्री है और हमें ऐसा ही मुख्यमंत्री चाहिए. एक मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने 12 वर्षों का इतिहास बना दिया है लेकिन शिवराजसिंह चौहान ने जो जगह लोगों के दिलों में अपनेपन से बनायी है, वह तो मिसाल है. यह मिसाल शायद स्वयं शिवराजसिंह चौहान भी नहीं तोड़ पाएंगे. 

शनिवार, 18 नवंबर 2017

कवि मुक्तिबोध की जन्मशती


-मनोज कुमार
साहित्य समाज में किसी कवि की जन्मशती मनाया जाना अपने आपमें महत्वपूर्ण है और जब बात मुक्तिबोध की हो तो वह और भी जरूरी हो जाता है। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनीतिक चेतना से समृद्ध स्वातंत्रोत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व के रूप में स्थापित मुक्तिबोध अपने समय के एक ऐसे कवि हुए हैं जिनकी उम्र बहुत छोटी रही लेकिन उनकी कविता सदियों के लिए अमर हो गई। मध्यप्रदेश में जन्मे और छत्तीसगढ़ के होकर रह जाने वाले मुक्तिबोध की पहचान राजनांदगांव से है। हालांकि मुक्तिबोध किसी एक शहर या प्रदेश के नहीं बल्कि समूची दुनिया के कवि हैं और उनकी समय से बात करती कविताओं का यह शताब्दि वर्ष है।
गजानन माधव ‘‘मुक्तिबोध’’ (13 नवंबर 1917 -11 सितंबर 1964) हिन्दी साहित्य की स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व थे।  वर्ष 2017 हिन्दी के अपने समय के जुझारू कवि मुक्तिबोध का जन्मषती वर्ष है। हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है। मुक्तिबोध का सम्पूर्ण जीवन संघर्षॉं तथा विरोधो से भरा रहा। उन्होंने माक्र्सवादी विचारधारा का अध्ययन किया, जिसका असर उनकी कवितायों में दिखाई देती है। पहली बार उनकी कवियाएँ सन् 1943 में अज्ञेय द्वारा सम्पादित ‘तारसपक्त’ में छपी। कविता के अलावा उन्होंने कहानी, उपन्यास, आलोचना आदि पर भी लिखा है। मुक्तिबोध एक समर्थ पत्रकार भी थे। उनकी विशेषताएँ अगली पढ़ी को रचनात्मक देती रही है। मुक्तिबोध नई कविता के मुख्या कवि हैं। उनकी संवेदना तथा ज्ञान का दायरा व्यापक है। गहन विचारशीलता और विशिष्ट भाषा-शिल्प की वजह से उनकी सहित्य की एक अलग पहचान है। स्वतंत्र भारत के मध्यवर्ती की जिंदगी की विडंबनाओ तथा विद्रूपताओ का चित्रण उनके सहित्य में है और साथ ही एक बेहतर मानवीय समाज-व्यवस्था के निर्माण की आकांक्षा भी। मुक्तिबोध के सहित्य की एक बड़ी विशेषता आत्मालोचन की प्रवृत्ति है।
मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि थे। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनैतिक चेतना से समृद्ध उनकी कविता पहली बार ‘‘तार सप्तक’’ के माध्यम से सामने आई, लेकिन उनका कोई स्वतंत्र काव्य-संग्रह उनके जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हो पाया। मृत्यु के पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी केवल ‘‘एक साहित्यिक की डायरी’’ प्रकाशित की थी, जिसका दूसरा संस्करण भारतीय ज्ञानपीठ से उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ। ज्ञानपीठ ने ही ‘‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’’ प्रकाशित किया था। इसी वर्ष नवंबर 1964 में नागपुर के विश्वभारती प्रकाशन ने मुक्तिबोध द्वारा 1963 में ही तैयार कर दिये गये निबंधों के संकलन नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध को प्रकाशित किया था। परवर्ती वर्षो में भारतीय ज्ञानपीठ से मुक्तिबोध के अन्य संकलन काठ का सपना, तथा विपात्र (लघु उपन्यास) प्रकाशित हुए। पहले कविता संकलन के 15 वर्ष बाद, 1980 में उनकी कविताओं का दूसरा संकलन भूरी भूर खाक धूल प्रकाशित हुआ और 1985 में राजकमल से पेपरबैक में छह खंडों में ‘मुक्तिबोध रचनावली’ प्रकाशित हुई, वह हिंदी के इधर के लेखकों की सबसे तेजी से बिकने वाली रचनावली मानी जाती है। इसके बाद मुक्तिबोध पर शोध और किताबों की भी झड़ी लग गयी। 1975 में प्रकाशित अशोक चक्रधर का शोध ग्रंथ ‘मुक्तिबोध की काव्यप्रक्रिया’ इन पुस्तकों में प्रमुख था। कविता के साथ-साथ, कविता विषयक चिंतन और आलोचना पद्धति को विकसित और समृद्ध करने में भी मुक्तिबोध का योगदान अन्यतम है। 
वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी बताते हैं कि वह सत्रह साल की उम्र में मुक्तिबोध से मिले थे। जब वह 24 वर्ष के हुए, तब मुक्तिबोध की मृत्यु हो गई। परिचय के ये सात साल न पर्याप्त हैं और न उल्लेखनीय। मुक्तिबोध ने गढ़े गए लालित्य के स्थापत्य को ध्वस्त किया। जब व्यवस्थाएं नृशंसता पर उतर आई थीं, तब उन्होंने अंत:करण का प्रश्न उठाया। पिछले 50 वर्ष की कविता ने मुक्तिबोध से बहुत कम सीखा है। कवि लालित्य में ही उलझे रहे हैं। मुक्तिबोध के बीज शब्द हैं, आत्मसंघर्ष, अंत:करण और आत्माभियोग। मुक्तिबोध अपनी जिम्मेदारी को केंद्रीय मानते हैं। वे सबसे बड़े आत्माभियोगी कवि हैं। उन्होंने 1964 में जिस फैंटेसी को प्रस्तुत किया था, वह 2014-15 में साकार हो गई। ऐसा दुनिया के साहित्य में बहुत कम हुआ है कि फैंटेसी साकार हो जाए। ‘अंधेरे में’ कुल चार चरित्र हैं- टालस्टाय, तिलक, गांधी और अनाम पागल। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण गांधी का चरित्र है। उनमें गांधी वाला तत्व कभी समाप्त न हुआ। अभी हमने युवाओं का एक सम्मेलन किया था। 56 युवा आए थे। किसी ने न मुक्तिबोध का जिक्र किया और न राजनीतिक परिस्थिति का। मुक्तिबोध की इतिहास वाली किताब के विरोध में जो मार्च निकला था, उसने मुक्तिबोध को तोड़ दिया। वह कभी उस आघात से उबर न सके।
वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव का मानना है कि जिस खतरनाक आगत से मुक्तिबोध रूबरू थे, वह आज हमारे सामने है। इतिहास पर मुक्तिबोध की पुस्तक प्रतिबंधित की गई। नेहरू और नेहरूवियन मॉडल की कई चीजों की आलोचना करने वाले मुक्तिबोध ने नेहरू की मृत्यु पर कहा था कि अब खतरा बढ़ गया है। मुक्तिबोध ने वर्ग की बात करते-करते जाति-वर्ण के प्रश्नों को पीछे कर देने की पद्धति की आलोचना की। उनके भक्तिकाल पर लिखे निबंध को याद किया जा सकता है, जहां कबीर और तुलसी आमने-सामने हैं। मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन पर उनकी टिप्पणी को याद कीजिए और आज स्वच्छता, पर्यावरण आदि पर कार्यक्रम कराने वाली साहित्य अकादमी से उसकी तुलना कीजिए, मुक्तिबोध की दूरदर्शिता स्पष्ट हो जाएगी। मुक्तिबोध के वैचारिक पक्ष को नजरअंदाज करके हम उनके साथ अन्याय करेंगे।

बुधवार, 1 नवंबर 2017

सालगिरह का उल्लास

1 नवम्बर मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस विशेष 

मनोज कुमार
एक और साल जश्र का, उत्साह का, विकास का और सद्भाव का. यह बहुत कम दफे ही होता है कि एक ही तारीख पर दो लोग सेलिब्रेशन कर रहे हों लेकिन ऐसा होता आ रहा है और एक-दो नहीं बल्कि 17 सालों से जो अनवरत चलता रहेगा. 17 साल पहले एक नवम्बर को मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना हुई थी. 61 साल पहले यह वही तारीख है जिस दिन नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ था. छत्तीसगढ़ अलग हो जाने से मध्यप्रदेश एक बार फिर से नए मध्यप्रदेश बन चुका है क्योंकि भौगोलिक रूप से मध्यप्रदेश का पुर्नसंयोजन किया गया. जो प्रदेश कभी एक हुआ करते थे, आज भौगोलिक रूप से अलग होकर भी एक हैं दिल से. 17 सालों में दोनों राज्यों के मध्य सौहाद्र्रता बनी हुई है और आपस में कभी कोई गर्माहट की नौबत नहीं आयी. शायद यही कारण है कि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में डॉ. रमनसिंह की सरकार डेढ़ दशक के स्थायित्व वाली सरकार बन गई है. सीमित संसाधन, चुनौतियां अपार और संभावनाओं का द्वार खोलते मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़.
मध्यप्रदेश देश का ह्दयप्रदेश कहलाता है. अपने निर्माण के साथ ही समूचे भारत वर्ष के भाषा-भाषायी, संस्कृति और विभिन्न धर्मों के लोग यहां रहने आए. लघु भारत के रूप में मध्यप्रदेश ने सद्भाव के रूप में अपनी अलग छाप छोड़ी. कई बार विपरीत स्थितियां निर्मित हुई लेकिन मध्यप्रदेश ने संयम नहीं खोया और हर मुश्किल की घड़ी में अपने आपको साबित कर दिखाया. 2003 में मध्यप्रदेश में सबसे बड़ा राजनीतिक फेरबदल होता है. इस बार भारतीय जनता पार्टी बहुमत के साथ सत्ता में आती है. हालांकि इसके पहले भी गैर-कांग्रेसी दल सत्ता में आते रहे हैं लेकिन उनका कार्यकाल यादगार नहीं रहा. भाजपा की सरकार पूर्ण बहुमत से आयी तो एक बार फिर आशंका थी कि यह सरकार प्रदेश को स्थायित्व नहीं दे पाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. शुरू के दो साल में दो मुख्यमंत्री क्रमश: उमा भारती और बाबूलाल गौर बनें लेकिन तीसरे साल मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने सत्ता की कमान सम्हाल तो वे इतिहास लिख गए. एक दो नहीं बल्कि लगातार 12 वर्षों से मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश में भाजपा की सरकार को स्थायी बनाया है बल्कि मध्यप्रदेश को विकास की ऊंचाईयों तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं.
इन 17 सालों में छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. रमनसिंह भाजपा के भीतर सबसे लम्बे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित हुए हैं तो छत्तीसगढ़ ने विकास की जो इबारत लिखी है, वह बार बार कहने के लिए विवश करता है सबले बढिय़ा, छत्तीसगढिय़ा. सन् 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण होता है और तीन साल बाद पहला विधानसभा चुनाव छत्तीसगढ़ में होता है. इस चुनाव में मध्यप्रदेश के साथ ही छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाता है. छत्तीसगढ़ में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आती है और सरल, सहज और ठेठ छत्तीसगढिय़ा डॉ. रमनसिंह को राज्य की बागडोर दी जाती है. दूरदृष्टि, पक्का इरादा लेकर राज्य को संवारने में डॉ. रमनसिंह जुट जाते हैं. वे राजनीति में आने के पहले आयुर्वेद के डॉक्टर थे और तब के कवर्धा (आज का कबीरधाम) के लोगों का मुफ्त में इलाज किया करते थे. उनके मन में लोगों के प्रति सहानुभूति एवं दया का भाव आरंभ से था. सो इसी भाव से वे राज्य की तकदीर संवारने में जुट गए और आज छत्तीसगढ़ देश ही नहीं, विदेशों में अलग से चिंहित है. डॉ. रमनसिंह और शिवराजसिंह चौहान के नेतृत्व में दोनों राज्यों में 2003, 2008 और 2013 का चुनाव पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा जीत लेती है. 2018 में भी दोनों के नेतृत्व में चुनाव लड़े जाने की पूर्ण संभावना है और इस बात के आसार बड़े हैं कि एक बार फिर सत्ता में भाजपा की वापसी हो सकती है. भाजपा की वापसी एक राजनीतिक दल के रूप में तो होगी ही, अपितु उनके मुख्यमंत्रियों के अथक परिश्रम से प्रदेश की बदलती तस्वीर इस जीत का एक बड़ा कारण होगी.
आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ राज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती यहां की नक्सल समस्या है. इसके साथ ही अशिक्षा और आर्थिक पिछड़ापन छत्तीसगढ़ को आगे बढऩे नहीं दे रहा था. अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा रहते हुए सबसे ज्यादा राजस्व देने वाले छत्तीसगढ़ के विकास के लिए कोई ऐसा रोडमेप तैयार नहीं किया गया था जिससे यहां का विकास हो सके. राज्य का दर्जा मिलने के बाद सत्तासीन पहली कांग्रेस सरकार का फोकस भी शहरों की तरफ था और इस एजेंडे से आम आदमी निराश हो चला था. इस निराशा का ही परिणाम था जनमत ने भाजपा को अपने नेतृत्व के लिए चुना. और भाजपा ने डाक्टर साहब कहे जाने वाले सादगी पसंद, दूरदृष्टा डॉ. रमनसिंह को राज्य की बागडोर सौंप दी. आरंभिक दिन कुछ उथल-पुथल के थे लेकिन जिस तरह जहाज उडऩे से पहले कुछ दूर तक रेंगता है और फिर आसमान छूने लगता है, ठीक वैसा ही रमनसिंह ने अपने कार्यक्रमों को, एजेंडे को आगे बढ़ाया. आज छत्तीसगढ़ राज्य के चारों तरफ खुशियां हैं, विकास है और उम्मीदें ठाठें मार रही हैं. छत्तीसगढ़ का यह विकास किसी और के लिए तकलीफ का कारण हो सकता है कि तमाम किस्म की चुनौतियों से निपटते हुए विकास के रास्ते पर सबसे आगे और सबसे अलग छत्तीसगढ़ दिख रहा है.
छत्तीसगढ़ के विकास को मापना हो तो उन तथ्यों और आंकड़ों का मिलान करना होगा जो सच की तस्वीर पेश करते हैं जैसे कि 2003 में राज्य का बजट लगभग 7 हजार करोड़ था जो अब 78 हजार करोड़ से अधिक है तो राज्य में प्रति व्यक्ति आय 10 हजार से बढक़र 82 हजार हो गई है. बिजली उत्पादन में छत्तीसगढ़ कभी पीछे नहीं रहा लेकिन सुनियोजित प्रयासों ने राज्य की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 4,732 मेगावॉट से बढ़ाकर 22,764 मेगावाट करने में सफलता पायी है। रमनसिंह सरकार राज्य के लोगों के सेहत के लिए भी फ्रिकमंद है. यही कारण है कि शिशु मृत्युदर 63 से घटकर 46 प्रति एक हजार दर्ज की गई है तो मातृ मृत्यु दर प्रति लाख 365 से घटकर 221 पर ठहर गई है. कुपोषण 52 प्रतिशत से घटकर 30 प्रतिशत हो गई है जिसमें और कमी के प्रयास निरंतर जारी है. महिलाओं और बच्चों के लिए अनेक किस्म की विशेष योजनाएं बनायी गई है जिसमें प्रधानमंत्री उज्जवला योजना का सक्रियता से पालन किया जा रहा है. कल तक धुंये वाले चूल्हे में रसोई का काम करने वाली महिलाओं में कुछ बीमारियां होती थी, आज उन्हें गैस चूल्हा मिल जाने से राहत मिली है. इसी तरह बाल ह्दयरोग से बच्चों को मुक्ति दिलाने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। राज्य के पीडीएस सिस्टम की देश भर में प्रशंसा हुई है और लोगों को सहज रूप से खाद्यान्न मिलना संभव हुआ है. एक रुपये किलो चावल और दूसरी रोजमर्रा जरूरतों की चीजें मिल जाने से छत्तीसगढ़ राज्य पलायन से मुक्त हुआ है. 
छत्तीसगढ़ के विकास मेें सबसे अहम योगदान रमन सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किया गया कार्य है. शहरों से लेकर अंतिम पंक्ति पर बैठे परिवार का बच्चा-बच्चा स्कूल जाए, इसके लिए अथक प्रयास किए जा रहे हैं. खासतौर पर बालिका शिक्षा के लिए जो कार्य छत्तीसगढ़ में हुए हैं, वह दूसरे राज्यों के लिए आदर्श के रूप में उपस्थित हैं. गणवेश, किताबें, फीस और स्कूल आने-जाने के लिए नि:शुल्क सायकल आदि ने बच्चों को स्कूल जाने के लिए आकर्षित किया है क्योंकि असुविधाओं और आर्थिक परेशानियों के चलते प्राथमिक स्कूल से आगे पढ़ नहीं पाते थे. सबसे बड़ा काम नक्सली क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के बच्चों के लिए सरकार ने किया है. छू लो आसमां जैसी योजनाओं के तहत उनके लिए पृथक से स्कूल आश्रम शालाएं, कोचिंग और अन्य व्यवस्था की गई जिसका परिणाम यह निकला कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बच्चे साल-दर-साल हैरत में डाल देने वाली कामयाबी प्राप्त कर रहे हैं. पीईटी, पीएमटी, ट्रीपल टीआई के अलावा स्वरोजगार में भी इनकी कामयाबी छत्तीसगढ़ को उपलब्धियों से भर देती है. प्रतिभाओं को निखारने और उन्हें मंच देने का काम सरकार ने किया और सरकार के प्रयासों को छत्तीसगढ़ की प्रतिभाओं ने किया. 
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने मध्यप्रदेश के हितार्थ ऐसी योजनाएं आरंभ की जिससे न केवल आम आदमी का भला हुआ बल्कि पूरे देश में मध्यप्रदेश का डंका बजा. मध्यप्रदेश की अनेक योजनाओं को देश के भाजपा और गैर-भाजपाशासित प्रदेशों ने लागू किया. यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह की चिंता आरंभ से बेटियों के प्रति रही है. उनके जन्म से लेकर ब्याह तक की व्यवस्था उन्होंने सरकार के जिम्मे ले ली. लाडली लक्ष्मी योजना से लेकर कन्यादान योजना ने जैसे महिला सशक्तिकरण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है. राजनीति में भी महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का प्रावधान करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला प्रदेश है. रोजगार के लिए भी उनके लिए व्यापक इंतजाम किया गया है. जो कसर रह गई थी उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आरंभ की गई योजना यथा उज्जवला योजना को लागू कर महिलाओं को धुंआ-धुंआ होती जिंदगी से निजात दिलाने का सार्थक प्रयास हुआ है. शिवराजसिंह की योजनाओं से स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रभावित हैं. इसलिए बेटी बचाओ योजना में, बेटी पढ़ाओ जोडक़र उसे देशव्यापी बना कर शिवराजसिंह का समर्थन करते हैं. किसानों को लेकर मुख्यमंत्री चौहान की चिंता सबसे आगे रही है. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का शुभारंभ करने स्वयं नरेन्द्र मोदी मध्यप्रदेश के शेरपुर पहुंचते हैं. यह शिवराजसिंह की चिंता का ही सबब है कि मध्यप्रदेश लगातार पांच वर्षों तक कृषि कर्मण अवार्ड प्राप्त करता रहा है. बुर्जुर्गों के लिए मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना तो पूरे भारतीय समाज के लिए आदर्श योजना साबित हुई है. सरकार की योजना और कार्यक्रम समयबद्ध परिणाममूलक बने, इसके लिए दुनिया में पहली बार लोक सेवा गारंटी कानून लाया गया. यह पहली बार हो रहा है कि आम आदमी को समयबद्ध सेवा नहीं मिलने पर लोकसेवकों को दंड देने का प्रावधान किया गया है. 
इस तरह 17 सालों में मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ ने विकास के नित नए आयाम छुए हैं. मुख्यमंत्री रमनसिंह को चाउर वाले बाबा कहा गया तो शिवराजसिंह चौहान बच्चों के मामा कहलाए. दोनों ही कामयाब मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहचान रखते हैं. ऐसा भी नहीं है कि सबकुछ बेहतर हुआ, कुछ कमियां भी रह गई. इसके भी कई कारण हैं. छत्तीसगढ़ राज्य के समक्ष नक्सलियों की चुनौती है तो मध्यप्रदेश में सिमी का खौफ. चुनौतियों और संभावनाओं के बीच इन 17 सालों ने दोनों राज्यों को बेहतर से बेहतर बनते देखा है. उम्मीद की जाना चाहिए कि सालगिरह के यह उल्लास सालों-साल बना रहे.

सोमवार, 25 सितंबर 2017

बुद्ध चुनें या युद्ध?


-मनोज कुमार
     एक बार फिर हम अधर्म पर धर्म की जीत का उत्सव मनाने की तैयारियों में जुट गए हैं. बुराईयों पर अच्छाई की जीत का पर्व सदियों से मनाते चले आए हैं लेकिन ऐसा क्या है कि ये बुराई कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है? मैं सोचता था कि कभी कोई साल ऐसा भी आएगा जब हम अच्छाईयों का पर्व मनाएंगे. विजय का पर्व होगा. किसी की पराजय की चर्चा तक नहीं करेंगे, पराजित करना तो दूर रहा लेकिन आखिर वह साल अब तक मेरे जीवन में नहीं आया है. इसके बावजूद मैं निराश नहीं हूं. हताश भी नहीं हूंं क्योंकि मुझे लगता है कि एक दिन वह साल भी आएगा जब हम अच्छाई का पर्व मना रहे होंगे. इस अवसर का दीप जला रहे होंगे. सवाल यह है कि सदियां गुजर जाने के बाद भी जब यह संभव नहीं हो पाया तो यह होगा कैसे? मुझे लगता है कि इसमें मुश्किल कुछ भी नहीं है. बस, थोड़ा सा दृष्टि और थोड़ी सी सोच बदलने की जरूरत है. अब तक हम जय बोलते आए हैं और बुराई को पराजित कर उत्सव में मगन हो गए हैं. क्यों ना हम किसी को पराजित करने के बजाय हम उस बुराई की जड़ को ढूंढऩे की कोशिश करें जिसकी वजह से हर बार वह पराजित तो होता है लेकिन अपनी बेलें कहीं छोड़ जाता है जो साल बीतते बीतते फिर एक बड़े आकार में हमारे सामने खड़ी हो जाती है. सवाल यह है कि हमें बार बार युद्व को चुनना है या बुद्ध को? हां, यह जरूर है कि बुद्ध को चुनने से पहले युद्ध के कारणों को तलाश करना पड़ेगा. 
महात्मा कहते थे कि पाप से नफरत करो, पापी से नहीं लेकिन हमारी नजर में पाप दूजे स्थान पर है और पापी पहले. यही एक गलती बार बार हमें बुद्ध से दूर और युद्ध के करीब ले आती है. बुराई क्या है? क्या रावण बुराई है या बुराई का प्रतीक है? हम हर वर्ष प्रतीकों को मारते हैं. भारतीय उत्सवी समाज है. वह हर अवसर को उत्सव के अनुरूप बना लेता है. दशहरा का पर्व भी इसी बात का द्योतक है. वर्तमान समाज में हमें रावण जैसा ज्ञानी तो नहीं मिल रहा है लेकिन बुराई का प्रतीक रावण हरेक कदम पर बिठा दिया गया है. एक चपरासी के घर से अवैध कमाई का लाखों रुपया, जमीन-जायदाद और जाने क्या-क्या मिलता है तो हम उसकी कमाई की ओर देखते हैं. विधिसम्मत उसे सजा दिलाने की कार्यवाही करते हैं लेकिन कभी हमने इस बात की कोशिश नहीं की कि आखिर उसने इस बुराई के रास्ते पर चलने को क्यों मजबूर हुआ? आर्थिक कमजोरी उसके भीतर के बुद्ध को हरा देती है और वह युद्ध के भाव से गलत रास्ते पर चल पड़ता है. जब हम इस बुराई की जड़ की तरफ जाने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि पहले पहल जब उसने 10 या 5 हजार रुपये गलत ढंग से हासिल किए होंगे तो उसके हाथ भले ही ना कांपें हों, मन जरूर कांपा होगा. भयभीत हुआ होगा. उसे एक बार तो लगा होगा कि वह गलत कर रहा है. लेकिन जब यह प्रक्रिया एक से अधिक बार होने लगी तो वह निश्चित हो गया कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. चंचल लक्ष्मी उस बिगड़ते व्यक्ति के चेहरे पर चमक ला देता है. उसके ऊपर के अफसरान को भी इस बात की खबर होगी लेकिन उन्होंने भी रोकने और टोकने की हिम्मत नहीं की. करते भी कैसे? उन्हीं को देखकर उसके भीतर लोभ जागा. उसके भीतर का बुद्ध विलुप्त होता गया और वह युद्ध के भाव से जीवन को जीने लगा. यह वही जगह है जहां से हम बुराई की जड़ को ढूंढ सकते हैं. उस बिगड़ते गरीब आदमी को समझने की कोशिश कर सकते हैं कि आखिर उसने गांधी का रास्ता क्यों छोड़ा? वह रावणरूपी बुराई का प्रतीक क्यों बन गया? वह लंकेश की तरह ज्ञानी तो हो नहीं सकता था. 
    जिस दिन हम इस बुराई की जड़ पर चोट करेंगे, यकीन रखिए कि हमें हर साल रावण के वध के लिए हथियार नहीं उठाना पड़ेगा. और वह दिन भी दूर नहीं होगा जब हम अच्छाई का पर्व मनाएंगे. एक ऐसा पर्व जिसमें किसी की पराजय नहीं होगी बल्कि चौतरफा जय और जय होगी. इसे करने के लिए अपने भीतर गांधी और बुद्ध को जिंदा करना होगा. कबीर और तुलसी को समझ कर अपने जीवन में उतारना होगा. भौतिक सुविधाओं के फेर में अ से लेकर ज्ञ तक सभी बौरा गए हैं. कनक और कनक में भेद करना भूल गए हैं. एक कनक जो देह की सुंदरता को बढ़ाता है तो दूसरा कनक जीवन की सांस को रोक देता है. सही मायने में दोनों कनक एक से हो गए हैं जिसमें शारीरिक तौर पर व्यक्ति भले ही जीवित हो लेकिन उसकी आत्मा को यह कनक मार देता है. हमें इस बार तय करना होगा कि हम युद्ध के रास्ते पर चलेंगे या बुद्ध के रास्ते पर? हमें रावण बनना है या ज्ञानी लंकेश से कुछ सीखना चाहेंगे? हम गांधी और कबीर बनकर एक नए समाज का निर्माण करेंगे या जीवन भर युद्ध के रास्ते पर चलते रहेंगे? 

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...