रविवार, 19 मई 2019
मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018
रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का विशेषांक महात्मा गांधी के डेढ़ सौ साल पर
महात्मा गांधी कल 2 अक्टूबर को अपने जन्म के डेढ़ सौ वर्ष में प्रवेश कर जाएंगे. इस विशेष अवसर पर भोपाल से प्रकाशित रिसर्च जर्नल ‘समागम’ ने सौ पृष्ठों का ‘गांधी : 150 साल’ शीर्षक से विशेषांक का प्रकाशन किया है. इस विशेषांक में विभिन्न विषयों पर गांधी को केन्द्र में रखकर सुधि लेखकों यथा डॉ. विजयबहादुर सिंह, मनोज कुमार श्रीवास्तव, घनश्याम सक्सेना, रामेश्वर शुक्ल ‘पंकज’ जगदीश उपासने, कुलपति एमसीयू, राकेश कुमार पालीवाल प्रधान आयकार आयुक्त सहित अनेक नामचीन लेखकों के आलेख हैं. स्वाधीनता संग्राम के दौरान मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में गांधी प्रवास का विस्तार से विवेचन किया गया है तो गांधी से प्रेरणा पाकर कैसे लोगों का जीवन बदला, इस पर भी लेख पढऩे को मिल जाएंगे. विशेषांक में सबसे खास लेखों का संग्रह है बा और बापू, बापू के निज सचिव महादेव देसाई, गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर और चम्पारण आंदोलन के लिए महात्मा गांधी को चम्पारण आने के लिए प्रेरित करने वाले राजकुमार शुक्ल को पढऩा अच्छा लगता है. गांधी एक कुशल पत्रकार और कम्युनिकेटर थे, इस पर सुपरिचित पत्रकार अरविंद मोहन और राजेश बादल के लेख एक नई दृष्टि देते हैं. वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया अध्येता मनोज कुमार के सम्पादन में नियमित रूप से 18 वर्षों से प्रकाशित ‘समागम’ ने इसके पूर्व भारतीय सिनेमा के सौ साल तथा भोपाल में सम्पन्न विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर इसी तरह के विशेषांक का प्रकाशन कर चुके हैं.
सोमवार, 14 मई 2018
साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता के एक सूर्य का अस्त होना
मनोज कुमार
मन आज व्याकुल है। ऐसा लग रहा है कि एक बुर्जुग का साया मेरे सिर से उठ गया है। मेरे जीवन में दो लोग हैं। एक दादा बैरागी और एक मेरे घर से जिनका नाम इस वक्त नहीं लेना चाहूंगा। दोनों की विशेषता यह है कि उनसे मेरा संवाद नहीं होता है लेकिन वे मेरे साथ खड़े होते हैं। उनका होना ही मेरी ताकत है। दादा के जाने के बाद यह ताकत आधी हो गई है। दादा तो गाहे-बगाहे सलाह देते थे, डांट देते थे लेकिन अनकही ढंग से मेरी हौसलाअफजाई करते हैं। खैर, दादा के अचानक देवलोकगमन की खबर ने मुझे स्तब्ध कर दिया। मैं अवाक था और लगभग नि:शब्द। अभी महीने भर पहले की तो बात है। ‘समागम’ का अंंक रेडियो पर केन्द्रित किया था। हर आलेख पर वे अपनी टिप्पणी से मुझे अवगत कराते रहे और बधाई देते रहे। कहते थे कि ऐसे समय में जब पत्रिकाओं की शताधिक संख्या है, उसमें श्रम करके जो प्रकाशन कर रहे हो, वह अतुलनीय है। मुझसे वे फोन पर जो बोलते थे, सो तो है। वे अपने अनन्य मित्रों और पत्रकार साथियों को भी ‘समागम’ पढऩे के लिए प्रेरित किया करते थे। मई महीने की बात है, साल याद नहीं। इंदौर के प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. सरोज कुमार का मुझे फोन आया। वे कहने लगे यार ऐसी कौन सी पत्रिका का प्रकाशन कर रहे हो जिसकी तारीफ बैरागीजी कर रहे थे। यही नहीं, उन्होंने मुझसे कहा है कि कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर में व्याख्यान देने जाने के पहले ‘समागम’ के कुछ अंकों का अध्ययन कर लूं। डॉ. सरोज कुमार को मैं नाम से जानता हूं लेकिन परिचय नहीं था। अपनी प्रशंसा सुनकर मन ही मन फूल गया लेकिन ऊपर से कहा कि यह दादा का मुझ पर स्नेह है। मैं आपको कुछ अंक प्रेषित कर रहा हूं, शायद उपयोगी हो। इसके बाद डॉ. सरोज कुमार से संवाद नहीं हुआ। संभव है कि ‘समागम’ को लेकर उनमें उतना उत्साह नहीं रहा होगा जितना कि दादा में था। बहरहाल, एक दिन दादा का फोन आया। तब मैंने साथी राजेश बादल की पत्रकारिता के संदर्भ में एक लम्बा साक्षात्कार प्रकाशित किया था। इसे वे राजस्थान की किसी पत्रिका में पुर्नप्रकाशन के लिए देना चाहते थे और मुझसे अनुमति चाह रहे थे। इन सालों में दादा से मेरा रिश्ता गहरा चुका था। कई बार लडक़पन में मैं उनसे दादागिरी किया करता था। अपनी सीमा लांघकर उनसे बातेें करने लगता था। मैंने जवाब में कहा कि आप भी कमाल करते हैं। आप जिसे चाहें, जो सामग्री चाहें,उपयोग करने के लिए भेज सकते हैं। इसमें मुझसे पूछने की क्या जरूरत? लेकिन दादा तो दादा ठहरे। कहने लगे कि सम्पादक की अनुमति जरूरी होती है। एक बार फिर मैं उनका कायल ही नहीं हुआ बल्कि एक पाठ भी सीखा कि किसी का लिखा प्रकाशन करें लेकिन लेखक की अनुमति जरूर लें।
‘समागम’ के प्रकाशन के इन 18 सालों में वे मेरे लिए गुरु और मार्गदर्शक के रूप में साथ रहे। कभी लगा नहीं कि वे मनासा में हैं और मैं भोपाल में बैठा हूं। हमेशा इस बात का अहसास रहा कि बस, उनका फोन आता ही होगा। इस संदर्भ में मुझे स्मरण में मराठी के एक कथाकार की वह लघुकथा जिसमें वे लिखते हैं कि एक बंद ताले को खोलने के लिए हथोड़े ने भारी-भरकम वार किया। हर तरह की कोशिश के बाद भी वह नाकामयाब रहा। इत्ते में पास पड़ी चाबी ताले के दिल में उतरी और ताला खुल गया। हथोड़ा अवाक और परेशान। उसने चाबी से अपनी ताकत और वजन की दुहाई देते हुए चाबी से पूछा कि तु इत्ती से फिर ताला कैसे खुल गया। मुस्कराती हुई चाबी ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया कि किसी का दिल खोलने के लिए उसके दिल में उतरा जरूरी होता है।
दादा से मेरा रिश्ता भी इसी ताला चाबी का था। मैं कब उनके दिल में उतर गया और कब उन्होंने मेरे सामने अपना दिल खोलकर रख दिया, पता ही नहीं चला। बात दो-तीन साल पुरानी है। भोपाल के होटल अशोका में वे ठहरे थे। उन्हें मध्यप्रदेश शासन की ओर से कवि प्रदीप सम्मान दिया जाना था। मैं उनसे मिलने गया। अपने दर्द को भीतर ही भीतर रखते थे और समाज में आनंद को वे बेपनाह बांटते थे। लेकिन उस दिन वे अपना दिल खोल बैठे। बचपन से अब तक के अनुभवों को उन्होंने मुझसे शेयर किया। बचपन के कष्ट से लेकर आज तक की बातें बताते हुए उनकी पलकें कई बार भींग गई। हमेशा कडक़ आवाज में बात करने वाले दादा बैरागी का गला भर आया था। वे कहने लगे-‘आज ईश्वर का दिया हुआ सबकुछ है। लेकिन मैं आज भी कपड़े मांगकर पहनता हूं। यह इसलिए कि मैं अपने पुराने दिन भूल ना जाऊं।’
जब किसी का दिल खुलता है तो बस खुलता ही चला जाता है, यह मैंने पहली बार महसूस किया। पिता के शारीरिक परेशानियां, मां का दर्द, स्वयं भीख मांगकर गुजारा करने को कष्टप्रद अनुभव था, वह सिलसिले से शेयर करते गए। बात करते करते अचानक बीते दिनों से बाहर आए। चुपके से आंखों के आंसुओं को पोंछा और ठहाके लगा पड़े। कहने लगे-‘कई बार जिस मंच पर मैं उपस्थित होता हूं, उसी मंच से कोई नया या पुराना कवि मेरी ही कविता को अपने नाम से पढ़ता है। मैं मुस्करा कर रह जाता हूं, बल्कि आनंद भी प्राप्त करता हूं।’ वे आगे कहते हैं-‘मनोज, जब तक हम लिखते हैं, तब तक ही वह हमारी प्रापर्टी है। लिखने के बाद छपने के साथ ही वह समाज की हो जाती है। इसमें कोई कॉपीराइट जैसी बात नहीं होती है। तुम ऐसा ही करते रहना।’
बालकवि बैरागी ही उनका प्रचलित नाम हो चला था। वास्तव में उनका नाम नंदरामदास बैरागी था। वे बताते थे कि इस नाम से एक कविता तब की नईदुनिया में प्रकाशित हुई थी। इस कविता को जब एक लडक़ी ने पढ़ा तो वह अपने पिता से जिद कर नंदरामदास बैरागी से ब्याह करने अड़ गई। बाद में वही उनकी जीवनसंगिनी बनीं। शीर्ष पंक्ति के कवि और राजनीति के शीर्ष पर रहने वाले दादा बैरागी पूरा जीवन यूं ही बने रहे। अपने से छोटा किसी को माना नहीं और स्वयं को बड़ा होने दिया नहीं। वे साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता के त्रयी थे लेकिन वर्तमान हालात से वे दुखी भी रहते थे लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन बदलेगा। अंधेरा छंटेगा और समाज में रोशनी आएगी। वे खरे थे और हमेशा खरे रहेंगे क्योंकि वे निर्दोष राजनेता थे और प्रतिबद्ध रचनाकार। हां, दुख इस बात का है कि साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता का एक सूर्य अस्त हो गया है।
शनिवार, 21 अप्रैल 2018
#पीआर बोले तो #सोसायटी की #हार्टबीट है
पीआर बोले तो सोसायटी की हार्टबीट है
मनोज कुमार
अंग्रेजी के पब्लिक रिलेशन को जब आप अलग अलग कर समझने की कोशिश करते हैं तो पब्लिक अर्थात जन और रिलेशन अर्थात सम्पर्क होता है जिसे हिन्दी में जनसम्पर्क कहते हैं. रिलेशन अर्थात संबंधों के बिना समाज का तानाबाना नहीं बुना जा सकता है और इस दृष्टि से पब्लिक रिलेशन का केनवास इतना बड़ा है कि लगभग सभी विधा उसके आसपास या उसमें समाहित होती हैं. पब्लिक रिलेशन को लेकर भारत में आम धारणा है कि यह एक किस्म का सरकारी का काम होता है या सरकारी नौकरी पाने का एक जरिया होता है. कुछ लोग पब्लिक रिलेशन को जर्नलिज्म से अलग कर देखते हैं. वास्तविकता यह है कि वह भारत की सोसायटी हो या दुनिया के किसी देश की सोसायटी, इन्हें जीवंत रखने के लिए जर्नलिज्म जितना जरूरी है, उतना ही पब्लिक रिलेशन. हमारा मानना है कि सोसायटी एक नदी है और पब्लिक रिलेशन तथा जर्नलिज्म इस नदी के दो पाट हैं. दोनों साथ साथ चलते हैं लेकिन आपस में कभी मिल नहीं पाने की सच्चाई जितनी है, उतनी ही सच्चाई यह है कि नदी के अविरल बहने के लिए दो पाटों का होना जरूरी है. ठीक उसी तरह सोसायटी की जीवंतता के लिए पीआर और जर्नलिज्म दोनों का सक्रिय होना जरूरी है.
पब्लिक रिलेशन और जर्नलिज्म के मध्य एक महीन सा विभाजन है. सही मायने में जर्नलिज्म के नए स्टूडेंट को पहले पीआर पढऩा और सीखना चाहिए. बहुतेरे लोग इस बात से असहमत हो सकते हैं कि यहां पर पीआर और जर्नलिज्म का घालमेल किया जा रहा है लेकिन जब आप बारीकी से जांच करेंगे तो पाएंगे कि एक कामयाब जर्नलिस्ट बनने के पहले एक कामयाब पब्लिक रिलेशन ऑफिसर होना जरूरी है. पीआर की बात करें या जर्नलिज्म की, दोनों की बुनियादी जरूरत है सोसायटी से सम्पर्क बनाये रखना और सोसायटी से सम्पर्क कैसे बनाया रखा जा सकता है यह सबक पब्लिक रिलेशन के सेक्टर में जाकर बखूबी सीखा जा सकता है. जर्नलिस्ट के लिए किसी खबर को प्राप्त करने के लिए, उसे डेवलप करने के लिए सोर्स बनाने का सबक पढ़ाया जाता है. सोर्स कैसे डेवलप हो और उनसे हमारा सम्पर्क कैसे हो, इसके लिए पीआर सीखना होता है. एक अच्छा पीआरओ, एक अच्छा जर्नलिस्ट हो सकता है लेकिन एक अच्छा जर्नलिस्ट एक अच्छा पीआरओ हो, यह अपवाद ही होता है.
जनसम्पर्क (पब्लिक रिलेशन्स) का सीधा अर्थ है ‘जनता से संपर्क रखना’। जनसम्पर्क एक प्रक्रिया है जो एक उद्देश्य से व्यक्ति या वस्तु की छवि, महत्व एवं विश्वास को समूह अथवा समाज में स्थापित करने में सहायक होती है। जनसंचार के विभिन्न उपकरणों के माध्यम से समाज या समूह से जीवन्त सम्बन्ध बनाने में यह सेतु का कार्य करती है। जनसंपर्क, संचार और सम्प्रेषण का एक पहलू है, जिसमें किसी व्यक्ति या संगठन तथा इस क्षेत्र से संबंधित लोगों के बीच संपर्क स्थापित किया जाता है। इस प्रकार यह सेवा लेने वालों तथा सेवा देने वालों के बीच एक सेतु का काम करता है। यह एक द्विपक्षीय कार्रवाई है, जिसमें सूचनाओं तथा विचारों का आदान-प्रदान होता है।
एडवर्ड एल.बर्जेल के अनुसार ‘जनसम्पर्क का उद्देश्य व्यक्ति, समुदाय और समाज में परस्पर एकीकरण है। प्रतिस्पर्धापूर्ण जीवन-प्रणाली में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए हमें एक-दूसरे की भावनाओं को समझने और आदर करने की आवश्यकता होती है। जनसम्पर्क व्यक्ति और समाज में समायोजन करने और जन भावनाओं को मुखरित करने का एक साधन है।’
यह बात भी स्पष्ट है कि पब्लिक रिलेशन और जर्नलिज्म की अपनी अपनी सीमा है. पब्लिक रिलेशन में इमेज बिल्डिंग का काम प्राथमिक होता है वहीं जर्नलिज्म में छिपे हुए तथ्यों और घटनाओं को बेनकाब करना प्राथमिक होता है. दोनों की अपनी मर्यादा है. पब्लिक रिलेशन ऑफिसर संबंधित संस्थान, प्रोडक्ट की कमियों को बाहर नहीं आने देता है बल्कि सुविचारित ढंग से वह इन कमियों को इस तरह स्टेबलिस करता है कि वह प्रोडक्ट मानक स्तर से कहीं बेहतर है. पब्लिक रिलेशन ऑफिसर कुटिल ना होकर कुशल होता है. दक्ष होता है और वह अपनी संस्थान के लिए इमेज बिल्डिंग का काम करता है.पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की आवश्यकता शासकीय संस्थानों के साथ साथ निजी क्षेत्रों में बनी हुई है. पब्लिक रिलेशन ऑफिसर का पद बेहद महत्वपूर्ण होता है. शासकीय सेवाओंं, खासकर भारतीय और राज्य सूचना सेवाओं में कार्यरत पब्लिक रिलेशन ऑफिसर को सरकार का पी_ू कहा जाता है. यह इमेज पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की प्रायवेट सेक्टर में भी है लेकिन यहां उसका सीधा वास्ता जर्नलिस्ट के बजाय मीडिया मैनेजमेंट से होता है इसलिए वह कुछ हद तक बचा रहता है. जनसम्पर्क के लिए जनसंचार और जनसंचार के लिए जनसम्पर्क का निर्देशन अत्यधिक आवश्यक है। यदि जनसम्पर्क के मौखिक, मुद्रित, श्रृव्य तथा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का प्रयोग विज्ञान की देन है, तो जनसम्पर्क वह कला है जो इन माध्यमों का उपयोग प्रचार कार्य करने के लिए करती है ओर सदैव लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयास करती है।
पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की भूमिका को विस्तार से समझने के लिए सोसायटी में प्रत्येक दशक के अंतराल में सोसायटी में होने वाले कई बड़े परिवर्तन को देखना और समझना होगा. खासतौर पर जब हम लाईफस्टाइल की बात करें, बिजनेस की बात करें या लोगों से जुडऩे और संवाद की बात करें तो पीआर अर्थात पब्लिक रिलेशन का अहम रोल होता है. इसलिए पीआर को सोसायटी की हार्टबीट कहना अनुचित नहीं होगा. हमारे जीवन में बदलाव में पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है क्योंकि वह अकेला पीआर नहीं देखता है बल्कि सोसायटी का मनोविज्ञान समझता है. वह सोसायटी की जरूरत को समझता है और इस अपनी इस समझ को वह सोसायटी की जरूरत के अनुरूप अनिवार्य बना देता है. ऐड केम्पन में पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की खास भूमिका होती है. पब्लिक रिलेशन ऑफिसर अपनी कम्पनी के प्रोडक्ट के अनुरूप टारगेट आडियन्स चुन लेता है और वह उनकी रूचि और आवश्यकता के अनुरूप ऐड केम्पन तैयार करता है. खबरें बनाता है और अपने प्रोडक्ट और कम्पनी की इमेज बिल्डिंग करता है. अमूल के प्रोडक्ट के ऐड कैम्पन आपको रोज ताजा रखते हैं क्योंकि वह स्थूल ऐड केम्पेन ना होकर प्रतिदिन सोसायटी में होने वाली घटनाओं को केन्द्र में रखकर तैयार करता है तो कई दशक पुराना निरमा वाशिंग पावडर का ऐड आज भी आपको लुभाता है.
प्रायवेट सेक्टर के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर इस बात के लिए सर्तक और सजग रहता है कि लोगों के दिलों में उसे कैसे उतरना है. इस संदर्भ में एक लघु कथा का उल्लेख करना समीचीन होगा. एक बंद ताले पर भारी-भरकम हथौड़ा अपनी पूरी ताकत से वार करता है लेकिन ताला नहीं खुलता है. वहीं पर एक छोटी सी चाबी ताले के ह्दयस्थल में बनी सुराख में प्रवेश करती है और ताला खुल जाता है. हथौड़ा हैरान रह जाता है और चाबी से कहता है कि तु छोटी सी और मैं तुझसे बड़ा और बलवान लेकिन मैं ताले को खोल नहीं पाया और तुने ताले को खोल दिया. हथौड़े की बात को सुनकर चाबी हौले से मुस्कराई और कहा कि किसी के दिल को खोलने के लिए उसके दिल में उतरना पड़ता है. लब्बोलुआब ये कि पब्लिक रिलेशन ऑफिसर यह जानता है कि कैसे लोगों के दिल में उतरना है. पब्लिक रिलेशन ऑफिसर के लिए जरूरी होता है कि वह भारी-भरकम शब्दों के बजाय छोटे और सरल शब्दों का अपनी खबरों में और अपने ऐड केम्पन में उपयोग करे. इसका सबसे बेहतरी उदाहरण के तौर पर हेलमेट पहनने के लिए प्रोत्साहित करने वाले एड के इस वाक्य को देख सकते हैं-‘सिर है आपका, मर्जी है आपकी’.
पब्लिक रिलेशन ऑफिसर का कार्य व्यापक होता है. अब हम सरकार के विभागों के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की चर्चा करते हैं तो उनका दायित्व एक अलग किस्म का होता है और बंधन तथा मर्यादा में बंधा होता है. इसके पहले प्रायवेट सेक्टर के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की बात कर रहे थे, वे अपेक्षाकृत स्वतंत्र होते हैं. किसी भी शासन के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की जवाबदारी शासन और सरकार के प्रति प्राथमिक रूप से होती है. सोसायटी और सरकार के मध्य वह एक पुल की तरह काम करता है. लोकतंत्र में कल्याणकारी सरकार की अवधारणा बनी हुई है और चुनी गई सरकारें जनता के प्रति जवाबदार होती हैं. जनता और राज्य तथा देश के कल्याण के लिए अनेक योजनाओं का निर्माण किया जाता है. ये योजनाएं आम आदमी तक पहुंचे और उनका लाभ ले सकें, यह जवाबदारी पब्लिक रिलेशन ऑफिसर के जिम्मे होती है. साथ में सरकार की इमेज बिल्डिंग का काम भी उन्हें करना होता है. चूंकि वे एक शासकीय सेवा में होते हैं तो उन्हें कई किस्म की वैधानिक मर्यादाओं का पालन करना होता है. शासकीय सेवा के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर के साथ जर्नलिस्ट का लगभग प्रतिदिन का सम्पर्क होता है. जर्नलिस्ट के लिए अपरोक्ष रूप से अनेक बार सोर्स का काम भी यही पीआरओ करते हैं. वे क्लू देते हैं लेकिन खबरों से बचते हैं लेकिन जर्नलिस्ट उन क्लू या सूचना को खबर का आधार बना लेता है. पीआरओ द्वारा जारी की गई खबरों और उसमें दिए गए आंकड़ों का मिलान कर जर्नलिस्ट प्रामाणिक खबरें तैयार करते हैं. यह सब संभव होता है कि आपका पीआरओ के साथ रिलेशन कैसा है? अर्थात एक जर्नलिस्ट के लिए जरूरी है कि वह पहले दक्ष पीआरओ बने. प्रायवेट सेक्टर और गर्वमेंट सेक्टर में काम करने वाले पीआरओ की भूमिका में बुनियादी अंतर बहुत कुछ नहीं होता है लेकिन प्रायमरी काम उनका इमेज बिल्डिंग करना होता है.
जनसम्पर्क वह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें सत्ता, संस्थान एवं व्यक्ति को जनता की मानसिक कृत्तियों, व्यवहार, अभिरूचियों परिवेश तथा प्रचलित परम्पराओं को दृष्टिगत करते हुए निर्णय लेने चाहिए। उत्तम छवि-निर्माण, सह-अभिव्यक्ति, समर्थन एवं जनअनुकूलता की प्राप्ति ही प्रतिष्ठित जनसम्पर्क की अभिव्यक्ति है। जनसंपर्क का स्वरूप केवल दफ्तर खोलकर बैठे रहना ही नहीं है, बल्कि कई तरह से इस काम को अंजाम देना पड़ता है। इसके अंतर्गत मीडिया रिलेशन, क्राइसिस मैनेजमेंट, मार्केटिंग कम्युनिकेशन, फाइनेंशियल, पब्लिक रिलेशंस, सरकारी संबंध, औद्योगिक संबंध शामिल हैं। आज सभी छोटे-बड़े संस्थानों में जनसंपर्क क्रय तथा पब्लिक रिलेशन ऑफिसर सूचना संप्रेषण तथा विचारों की अभिव्यक्ति का दायित्व निभा रहे हैं और कैरियर निर्माण की दृष्टि से यह एक सम्मानजनक क्षेत्र माना जाता है।
निष्र्कत: माना जा सकता है कि सोसायटी में होने वाले सकरात्मक परिवर्तन में पब्लिक रिलेशन की भूमिका अहम होती है. पत्रकारिता के तीन सूत्र सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का प्रतिपादन पब्लिक रिलेशन में भी बखूबी किया जाता है.जनसंपर्क की प्रक्रिया में वांछित जानकारी को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बल्कि उसके वास्तविक रूप में लेकिन प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। एक तरह से पब्लिक रिलेशन सोसायटी की हार्टबीट है.
मंगलवार, 17 अप्रैल 2018
अक्षय तृतीया : जीवन की सीख देेते पर्व
अनामिका
भारतीय समाज की संस्कृति एवं सभ्यता हजारों सालों से अक्षय रही है. पर्व एवं उत्सव भारतीय समाज की आवश्यकताओं और उनमें ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बनाये गए हैं. लोगों में अपनी संस्कृति एवं साहित्य के प्रति अनुराग बना रहे, इस दृष्टि से भी कोशिश हुई है। इन्हीं में से एक है अक्षय तृतीया. अक्षय तृतीया का अनेक महत्व है. अपने नाम के अनुरूप कभी क्षय अर्थात नष्ट ना होने वाली संस्कृति. भारतीय समाज में माना गया है कि अक्षय तृतीया के दिन कोई भी शुभ कार्य बिना मुहूर्त किया जा सकता है. अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं। नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है।
जब यह माना गया है कि इस दिन किया गया कार्य उत्तम परिणामों के साथ आता है. तब बदलते समय में अक्षय तृतीया को उसके उच्चतर परिणामों के साथ देखा जाना चाहिए. आज इस दिवस का विशेष महत्व है क्योंकि समाज के विभिन्न वर्गों में जब नैतिक रूप से पतन हो रहा है तब इस दिन का स्मरण किया जाना चाहिए. एक पौराणिक कथा के अनुरूप महाभारत के अनुसार जिस दिन दु:शासन ने द्रौपदी का चीर हरण किया था, उस दिन अक्षय तृतीया तिथि थी। तब भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को कभी न खत्म होने वाली साड़ी वरदान स्वरूप दी थी। आज फिर एक बार वक्त आ गया है कि हमारे बीच भगवान श्रीकृष्ण अवतार लें और हर समाज को नैतिक साहस प्रदान करें ताकि हम अपने याज्ञिक पर्व अक्षय तृतीया को अक्षय बनाकर युगांतर तक मनाते रहें.
अक्षय तृतीया कई संदेशों के साथ हम में इस बात का ही संदेश नहीं देता है कि हम उत्सव मनायें बल्कि हर पर्व का संदेश होता है कि जो सीख इन पर्व और उत्सव के माध्यम से हमें दी गई है, उसे अपने जीवन में उतारें. अपने जीवन को उत्सव के लिए नहीं बल्कि उत्सव पूर्ण बनाने की कोशिश करें. माना जाता है कि अक्षय तृतीया पर ही युधिष्ठिर को अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी. इस पात्र की खूबी यह थी कि इसका भोजन कभी समाप्त नहीं होता था. इसी पात्र की सहायता से युधिष्ठिर अपने राज्य के भूखे और गरीब लोगों को भोजन उपलब्ध कराते थे. यह सच है कि आज युधिष्ठिर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसी है जिसमें सभी की थाली में भोजन की व्यवस्था करने की जवाबदारी सरकारों को दी गई है. सस्ते दरों पर अनाज आम आदमी को उपलब्ध कराया जाना इसी उपक्रम का एक हिस्सा है.
अक्षय तृतीया के पर्व पर विवाह की श्रेष्ठ परम्परा है किन्तु कतिपय रूढिग़त विचारों के लोग नाबालिगों को विवाह बंधन में बांधने के लिए आतुर रहते हैं. बाल विवाह एक तरह से समाज के लिए कोढ़ बन चुका है किन्तु यहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस कोढ़ से मुक्ति दिलाने की पूर्ण व्यवस्था की गई है. शिक्षा एवं शक्ति प्रदान करने की विविध योजनाओं के माध्यम से बेटियों को इतना सशक्त किया जा चुका है कि अब वे स्वयं होकर बाल विवाह के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है. दहेज जैसे मामलों से तो अब लगभग नकरात्मक रवैया हो चला है. सशक्त समाज की दिशा में हम बढ़ रहे हैं और अक्षय तृतीया जैसे पर्व के संदेशों की सार्थकता को हम पुष्ट कर रहे हैं.
इस तरह से भारतीय पर्व और उत्सव केवल जश्र मनाने का संदेश नहीं देते हैं बल्कि हमें वह सीख देते हैं कि इन पर्व के पीछे जो उद्देश्य से है, उसे हम अपने जीवन में उतारें और लोककल्याण के लिए काम करें. अक्षय तृतीया भी यही संदेश देती है कि हम, हमारा समाज और हमारा राष्ट्र लोक कल्याण के मार्ग से ना भटके। निहित उद्देश्यों की पूर्ति करे और जीवन को सुखमय बनाये, अक्षय रखे।
मंगलवार, 10 अप्रैल 2018
मैं ककहरा सीख रहा था, वो प्रिंसीपल थे..
समय अपनी रफ्त्तार से गुजरता चला जाता है... एक पुरानी यादें शेयर कर रहा हूँ
मैं ककहरा सीख रहा था, वो प्रिंसीपल थे..
मनोज कुमार
मैं उन दिनों पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था. और कहना ना होगा कि रमेशजी इस स्कूल के प्रिंसीपल हो चले थे. यह बात आजकल की नहीं बल्कि 30 बरस पुरानी है. बात है साल 87 की. मई के आखिरी हफ्ते के दिन थे. मैं रायपुर से भोपाल पीटीआई एवं देशबन्धु के संयुक्त तत्वावधान में हो रहे हिन्दी पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यशाला में हिस्सेदारी करने के लिए भोपाल आया था. यह वह समय था जब भोपाल कहने भर से यहां आने की ललक जाग उठती थी. भोपाल तब मध्यप्रदेश के साथ साथ छत्तीसगढ़ की भी राजधानी थी. आज जो भौगोलिक बंटवारा दोनों राज्यों के बीच हुआ है, तब दोनों में एका था. ऐसे में रायपुर एक कस्बे की तरह था और राजधानी हमारे लिए सपने की नगरी. खैर, रमेशजी आरंभ से मेहमाननवाज थे. सो इस पत्रकारिता प्रशिक्षण में हिस्सेदारी करने आए मुझ जैसे नये-नवेले के साथ वरिष्ठों को उन्होंने रात में भोजन पर आमंत्रित किया. रमेशजी से मेरी यह पहली मुलाकात थी. कुछ बातें हुई लेकिन ऐसी आत्मीयता नहीं बनी कि मैं उनका मुरीद हो जाऊं. मेरी पृष्ठभूमि ऐसी थी कि मालिक और मजदूर (भले ही हम स्वयं को पत्रकार या सम्पादक कहते हों) के बीच एक महीन सी रेखा खींची रहती थी. हालांकि उनके आत्मीय ना होने के बावजूद मन में कहीं उनके प्रति वैसा ही सम्मान अनजाने में उपजा था जो देशबन्धु के सम्पादक बड़े भैया ललित सुरजन के लिए या बाबूजी अर्थात मायाराम सुरजन के लिए था. कोई दो घंटे में भोज की औपचारिकता पूरी हुई. कुछ नए लोगों से मिलना-जुलना हुआ और हम सब वापस लौट चलें.
आज 30 वर्ष बाद पीछे पलट कर देखता हूं तो हैरान हूं कि भास्कर क्या तब भी वैसा था, जैसा कि आज है? यह सवाल बेकार का नहीं है क्योंकि जिन दिनों मैंने भास्कर को देखा था तब जलवा अखबारों में नईदुनिया इंदौर और नवभारत गु्रप का मध्यप्रदेश में और देशबन्धु का छत्तीसगढ़ में हुआ करता था. भास्कर नया नहीं था लेकिन पाठकों में भास्कर का नशा नहीं चढ़ा था. इन तीस सालोंं में भास्कर ने सबको पीछे छोड़ते हुए देश का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार बन गया. यह कामयाबी यंू नहीं मिली. इसके पीछे मेहनत, लगन और आत्मबल का त्रिकोणीय संयोग था और यह त्रिकोणीय संयोग के धनी रमेशजी अग्रवाल थे. लगातार मेहनत और लोगों को परख लेने की उनकी क्षमता ने भास्कर को आज जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, वह सदियों तक एक मिसाल बना रहेगा. रमेशजी उन चुनिंदा लोगों में नहीं थे जो नौकरी करते हुए अखबार का संसार खड़ा किया बल्कि वे मालिक के रूप में ही भास्कर की कमान सम्हाली. अपने पिता स्वर्गीय द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल से कड़ा अनुशासन सीखा और जीवन में उतारा. थकान तो जैसे रमेशजी की दुश्मन थी. दोनों मेें कभी बनी नहीं और इसलिए थकान ने अपना दूसरा बसेरा ढूंढ़ लिया था क्योंकि रमेशजी की मेहनत के सामने उसका टिका रहना मुश्किल सा था. यह बात रमेशजी ने अपने जीवन के आखिर वक्त तक बनाये रखा जब वे भोपाल से दिल्ली और दिल्ली से अहमदाबाद बिना आराम किए प्रवास पर हमेशा की तरह रहे.
अनुशासन के पक्के रमेशजी ने यही मंत्र अपने बेटों को दिए. इनमें सुधीरजी ने भास्कर की कमान सम्हाली. अपने दादाजी और पिताजी से सीखा अनुशासन का पाठ और नए जमाने की तकरीर को जीवन में उतारा. वे लीक से हटकर चलने लगे. भास्कर को अखबार से अखबारी दुनिया का ब्रांड बना दिया. पिता-पुत्र की समझ और काबिलियत को पूरी दुनिया ने देखा और भास्कर अपने नाम की तरह अपनी रोशनी पूरी दुनिया में बिखेरने में कामयाब हो गया. आज किसी भी परिवार की सुबह घर में भास्कर की किरण और कागज पर उतरे शब्दों के रूप में भास्कर के साथ होती है, इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. समय की नब्ज को टटोलना ही नहीं, बल्कि अपने अनुरूप कर लेने में रमेशजी की महारथ थी. वे कोई अवसर नहीं गंवाते थे. यही कारण है कि अपने समय के पुराने सहयोगियों को वे इतना मान देते थे कि आज भी लोग उनके मुरीद हैं. सूचनाओं का संसार उनका इतना व्यापक था कि वे रहें कहीं भी लेकिन उन्हें हर बात की खबर थी कि उनके पीछे क्या हो रहा है. ऐसा नहीं है कि भास्कर की इस कामयाबी में सेंध लगाने की कोशिश नहीं हुई हो लेकिन सेंधमार हमेशा नाकामयाब रहे तो रमेशजी के चौकन्नेपन की वजह से.
उनमें एक और खासियत थी. वे दूसरे अखबार मालिकों की तरह लिखने में कभी रूचि नहीं दिखायी और जहां तक मुझे याद पड़ता है रमेशजी के नाम पर लिखा हुआ कभी कुछ भी नहीं छपा. वे स्वयं इस बात के हामी थे कि वे कुशल प्रबंधक हैं और लिखने के लिए कुशल लेखक हैं. वे इस बात को भी कभी मंजूर नहीं किया करते थे कि लिखे कोई और तथा छपे उनके नाम से. यह उन्हें कदापि मंजूर नहीं था. पत्रकार जगत उनकी इस साफगोई से हमेशा इत्तेफाक रखता रहा. उनकी इस परम्परा का निर्वाह उनके बेटे भी कर रहे हैं. परिवार के किसी भी सदस्य में इस बात की ललक कभी नहीं रही कि किसी का लिखा उनके नाम से छपे. यह गुण रमेश जी और भास्कर की कामयाबी का एक बड़ा सूत्र है. रमेशजी की हमेशा कोशिश होती थी कि गुणी लेखक पत्रकार भास्कर के साथ जुड़े. भौतिक सुख-सुविधाओं का भरपूर सहयोग देते थे. इस बात में वे खरे थे कि भास्कर में निकम्मे और काम से जी चुराने वालों के लिए कभी कोई जगह नहीं बनी. लेकिन कोई गुणी और कामयाब व्यक्ति भास्कर के साथ ना जुड़े तो उन्हें मलाल होता था. ऐसा यदा-कदा हुआ होगा.
रमेशजी के रहते और शायद आगे भी. भास्कर में आपके लिखे पर छपने में कोई दुराभाव नहीं हुआ. मेरा अपना अनुभव है. भास्कर तेजी से बढ़ रहा था. भास्कर में छपना प्रतिष्ठा की बात थी. मैं देशबन्धु से अलग होकर स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहा था. लोगों से सुन रखा था कि भास्कर में छपना मुश्किल है और इसके लिए आपको जुगाड़ लगाना होता है. आरंभ से जुगाड़ शब्द से मेरा बैर रहा है. मैंने कहा देखेंगे. ठीक लगेगा तो छप जाएगा वरना रद्दी की टोकरी तो है ही. यह तब की बात है जब भास्कर में स्थानीय लेखकों को स्थान दिया जाता था. मेरा यकीन तब और पक्का हो गया जब एक बार नहीं, लगातार तीन बार मेरा लिखा भास्कर में ज्यों का त्यों छपा. मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि उस समय के संपादक और स्वयं रमेशजी मुझे व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते थे क्योंकि तब भी मैं पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था, जैसे की आज भी सीखने की प्रक्रिया में हूं. लेकिन इस पूरे दौर में रमेशजी एक अखबार मालिक से उठकर कामयाबी के सिम्बाल बन चुके थे. मैं भास्कर के दरवाजे पर लटके लेटरबाक्स में अपने लेख का लिफाफा छोड़ आता था और अधिकतम तीन दिनों के अंतराल में प्रकाशन होता था.
जिस तरह रमेशजी हमेशा प्रयासरत रहते थे कि अच्छे लेखक पत्रकार भास्कर से जुड़ें, वैसी कामना मेरी भी थी कि भास्कर के साथ जुडक़र मेरा लिखा देश और दुनिया के पाठकों को पढऩे का अवसर मिले. खैर, रमेश जी के साथ कभी काम करने का अवसर नहीं मिला. भास्कर में भी मेरी एंट्री नहीं हो पायी. दोस्तों की मोहब्बत कई बार भारी पड़ जाती है. मेरे साथ भी ऐसा हुआ. एक अवसर आया जब अपरोक्ष रूप से मेरे एक अनुज के प्रयासों से सीनियर एडीटर के रूप में मेरा नाम स्वीकृत कर लिया गया. भोपाल के बाहर से भास्कर में आए एक साथी के साथ मैंने इस बात का जिक्र कर लिया था. इधर मैंने अपनी खुशी उन्हें बयां कि और उधर मैं आज तक भास्कर के फोनकॉल का इंतजार ही करता रह गया. भास्कर के साथ नहीं जुड़ पाने का अफसोस तो रहेगा और इस रंज का जिक्र करने में कोई उज्र नहीं. मैं भास्कर से जुड़ता तो मुझे भास्कर से बहुत कुछ सीखने को मिलता. रमेशजी से अनुशासन और प्रबंधन का गुण सीखता क्योंकि मेरा मानना है कि वही तैराक कामयाबी के शिखर पर पहुंचता है जिसके पास तैर कर निकल जाने के लिए मीटर नहीं, किलोमीटर का फासला तय करना होता है. सच यह भी है कि रमेशजी, भास्कर और भास्कर की नयी पीढ़ी से एकलव्य की तरह सीख रहा हूं कि कामयाबी के लिए एक ही चीज की जरूरत होती है और वह है जिद, जिद और जिद. जिद करो, दुनिया बदलो.
गुरुवार, 22 मार्च 2018
हर परिवार में वॉटर बजट बने
हर परिवार में वॉटर बजट बने
अनामिका
हर वर्ष की तरह एक बार फिर हम जल दिवस मनाने जा रहे हैं. निश्चित रूप से ऐसे दिवस हमारे लिए प्रेरणा का काम करते हैं. जल का हमारे जीवन में बहुत महत्व है. जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है और जिस तरह का संकट अब पूरी दुनिया के सामने उपस्थित हो रहा है, वह भयानक है. जल संरक्षण की दिशा में व्यापक जनजागरूकता के प्रयास किए जा रहे हैं. जल है तो कल है कि इस सोच को केवल कागज तक रखने के बजाय जीवन में उतारने का समय आ गया है. यह अच्छी बात है कि प्रतिवर्ष हम जलदिवस मनाकर जल संरक्षण की दिशा में सक्रिय हो जाते हैं लेकिन क्या एक दिन का यह उत्सव हमारे लिए प्रेरणा का काम करता है या आगे पाठ पीछे सपाट की कहावत को सच करता है? निश्चित रूप से 22 मार्च को मनाया जाने वाला विश्व जल दिवस अर्थपूर्ण है लेकिन यह दिवस ना होकर पूरे 365 दिनों की जागरूकता का हो तो इसके सुपरिणाम हमारे सामने होंगे.
जल संरक्षण की दिशा में समाज के प्रत्येक सदस्य को जागरूक होना जरूरी है. सबसे अहम बात यह है कि हर परिवार में वॉटर बजट का प्रावधान हो. जिस तरह हम घर के खर्च को समायोजित करने के लिए बजट बनाते हैं, वैसा ही पानी के खर्च के लिए बजट का प्रावधान किया जाए. सुबह से लेकर रात तक विभिन्न क्रियाओं में खर्च होने वाले जल का हिसाब रखा जाए. इससे हम स्वयं इस बात का अंदाज लगा लेंगे कि सचमुच में हम पानी का कितना सदुपयोग कर रहे हैं और कितना दुरूपयोग कर रहे हैं. परिवार में बनने वाले जल के बजट की समीक्षा की जाए और लोगों को जागरूक करने के लिए अपने द्वारा बनाये गए जल बजट को सोशल मीडिया में शेयर किया जाए. यह लोगों के लिए नया अनुभव होगा लेकिन यह बात भी निश्चित है कि अनेक लोग आपके इस नए प्रयोग को भली-भांति समझ कर जल के दुरूपयोग को रोकने के लिए आगे आएंगे. जल संरक्षण की दिशा में जनजागृति के लिए यह एक बड़ा अभिव उपाय होगा
विश्व जल दिवस क्यों मनाया जाता है और कब से आरंभ हुआ, यह जानना नई पीढ़ी के लिए अनिवार्य है. विश्व जल दिवस का उद्देश्य विश्व के सभी विकसित देशों में स्वच्छ एवं सुरक्षित जल की उपलब्धता सुनिश्चित करवाना है साथ ही यह जल संरक्षण के महत्व पर भी ध्यान केंद्रित करता है। ब्राजील में रियो डी जेनेरियो में वर्ष 1992 में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में विश्व जल दिवस मनाने की पहल की गई तथा वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र ने अपने सामान्य सभा के द्वारा निर्णय लेकर इस दिन को वार्षिक कार्यक्रम के रूप में मनाने का निर्णय लिया इस कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों के बीच में जल संरक्षण का महत्व साफ पीने योग्य जल का महत्व आदि बताना था।
यूएन सदस्य राज्य और एजेंसी सहित, जल के सभी जटिल मुद्दों के पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिये स्वच्छ जल संरक्षण के प्रोत्साहन में विभिन्न एनजीओ और गैर-सरकारी संगठन भी शामिल होते हैं। इस कार्यक्रम को मनाने के दौरान, जल से संबंधित सभी मुद्दों को जनता के सामने उजागर किया जाता है जैसे किस तरह से साफ पानी लोगों की पहुँच से दूर हो रहा है आदि। यह अभियान यूएन अनुशंसा को लागू करने के साथ ही वैश्विक जल संरक्षण के वास्तविक क्रियाकलापों को प्रोत्साहन देने के लिये सदस्य राष्ट्र सहित संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जाता हैं। इस अभियान को प्रति वर्ष यूएन एजेंसी की एक इकाई के द्वारा विशेष तौर से बढ़ावा दिया जाता है जिसमें लोगों को जल मुद्दों के बारे में सुनने व समझाने के लिये प्रोत्साहित करने के साथ ही विश्व जल दिवस के लिये अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का समायोजन शामिल है। इस कार्यक्रम की शुरुआत से ही विश्व जल दिवस पर वैश्विक संदेश फैलाने के लिये थीम (विषय) का चुनाव करने के साथ ही विश्व जल दिवस को मनाने के लिये यूएन जल उत्तरदायी होता है।
पर्यावरण, स्वास्थ्य, कृषि और व्यापार सहित जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जल के महत्व की ओर लोगों की जागरुकता बढ़ाने के लिये पूरे विश्व भर में विश्व जल दिवस मनाया जाता है. इसे विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम और क्रियाकलापों के आयोजनों के द्वारा मनाया जाता है जैसे दृश्य कला, जल के मंचीय और संगीतात्मक उत्सव, स्थानीय तालाब, झील, नदी और जलाशय की सैर, जल प्रबंधन और सुरक्षा के ऊपर स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परिचर्चा, टीवी और रेडियो चैनल या इंटरनेट के माध्यम से संदेश फैलाना, स्वच्छ जल और संरक्षण उपाय के महत्व पर आधारित शिक्षण कार्यक्रम, प्रतियोगिता तथा ढ़ेर सारी गतिविधियाँ आयोजित की जाती है. विश्व जल दिवस उत्सव के मुख्य चिन्ह नीले रंग की जल की बूँद की आकृति को हम बचा सकें. उसे सुरक्षित कर सकें और लोगों को बता सकें कि नीला रंग आपके जीवन में क्या मायने रखता है.
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