सोमवार, 31 मार्च 2025

गाँधी विचार का रास्ता

मनोज कुमार

 रिश्तों में घुलती कड़वाहट और एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू समाज का डरावना चेहरा हम रोज़-ब-रोज़ देख रहे हैं. कहीं अपने गैर-कानूनी रिश्तेे के लिए पति को मारकर ड्रम  में भर देने का मामला हो या पति के फोन पर बात करने से रोकने पर कॉफी में ज़हर देने का. इधर पति भी कम जल्लाद नहीं है और इनके किस्से तो पुराने हो चुके हैं या पत्नी को काट कर गाड़ देना या फिर टुकड़े कर फ्रिज में भर देने की वारदात हम नहीं भूले हैं. तंदूर कांड तो याद में होगा ही और आज भी ऐसी घटनाएँ लगातार जारी है. पति-पत्नी ही क्यों, किसी बेटा माँ की जान ले रहा है तो कहीं माँ बेटे की जान ले रही है. पिता असुरक्षित है तो घर के बच्चे भी डर के साये में जीवन बसर कर रहे हैं. ऐसी ख़बरें ना केवल हमें चौंकाती हैं बल्कि डराती भी हैं. सवाल यह है कि हमारा समाज इतना असहिष्णु कैसे हो गया? हिंसा की इस प्रवृत्ति ने तमाम किस्म के नैतिक मूल्यों को ताक पर रख दिया है. आधुनिक जमाने के साथ चलने की हरसत ने रिश्तों को बेमानी कर दिया है. आखिऱ हम किस समाज का निर्माण कर रहे हैं?   कई बार इस बात पर भरोसा नहीं होता कि हम क्या सचमुच उस गाँधी के देश में हैं जहाँ अहिंसक ढंग से अंग्रेेजी शासन को बेदख़ल कर दिया गया. उस गाँधी के विचारों को हम दरकिनार कर रहे हैं जिसे आदर्श मान कर पूरा विश्व उनके रास्ते पर चलने को तैयार है. गाँधी विचारों को दरकिनार करने का एक सुनियोजित चाल चला जा रहा है। लेकिन इस घटाघोप अँधेरे में रोशनी की एक किरण अभी भी टिमटिमा रही है. आज भी बड़े तादाद मे ऐसे लोग हैं जो अहिंसक ढंग से फैसले लेकर जीवन को कलह से मुक्त कर रहे हैं. वे असहिष्णु भी नहीं हैं और ना ही उनका मन कलुषित है. ऐसे लोग मिसाल कायम करते हैं. पिछले दिनों दो ऐसी ही ख़बर ने इस बिगड़ते दौर में संबल के रूप में सामने आया है. एक $खबर उस मजदूर की कहानी से जुड़ा हुआ है जिसका फैसला गाँधी विचारों से सम्पन्न दिखता है. बिगड़ते और डरे हुए समाज के लिए यह आश्वस्ति भी है. पूरा मामला दिलचस्प ही नहीं, प्रेेरणादायक है.  जिस मजदूर की हम चर्चा कर रहे हैं, उसके फैसले को जानकर लगता है कि उम्मीद की किरण शेष है. मसला यह है कि वह मजदूर अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ आनंद से जीवन बसर कर रहा था. एक तूफान आहिस्ता से उसके परिवार में आ गया. उसकी पत्नी का प्रेेम किसी अन्य व्यक्ति से हो गया. इस बात की $खबर जब उसे लगी तो उसने तैश नहीं खाया. मन में हिंसक विचार लाकर पत्नी या उसके प्रेमी को मारने की कोई साजिश नहीं रची बल्कि उसने दोनों के समक्ष उनकी शादी का प्रस्ताव रखा. प्ऱस्ताव ही नहीं रखा बल्कि स्वेच्छा से उनकी शादी करा दी. उस मजदूर का बड़प्पन देखिये कि उसने इस नवदम्पत्ति को आश्चस्त किया कि वह बच्चों को पाल लेगा. यह फैसला इस बात की तस्दीक करता है कि अपनी गैर-मौजूदगी के बाद भी गाँधी आज भी भारतीय मन में रचे-बसे हैं. इस सिलसिले में एक अन्य ख़बर भी हमारे लिए सुखद है. उस वृद्ध नवदम्पत्ति का उल्लेख करना भी सुखद और लाजिमी लगता है. यह कहानी भी रोचक है. यह वृद्ध दम्पत्ति आज 80 बरस के हैं और 64 साल पहले प्रेेम विवाह कर लिया था. तब परिवार और समाज ने इसे स्वीकार नहीं किया. समय अपनी गति से चलता रहा. परिवार फैलता गया. दोनों वृद्ध दादा-दादी और नाना-नानी बन गए. 64 साल बाद उनके बच्चों ने तय किया और 80 बरस की उम में वृद्ध दम्पत्ति का पूरे रीति-रिवाज से शादी करवा दी. यह खबर हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि जब मामूली बात में परिवार टूट रहे हैं. लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन रहे हैं तब परिवार की यह एकजुटता उम्मीद की लालटेन की तरह हमारे बीच कहीं टंगा हुआ है. यह उन लोगों के लिए भी नज़ीर है जो अपने ही स्वार्थों  में लिप्त होकर परिवार की अहमियत भूल जाते हैं. उस वृद्ध दम्पत्ति का 80 बरस की उम्र में ब्याह होना कोई मायने नहीं रखता है लेकिन इसके पीछे जो ‘मैं’ की जगह ‘हम’ की भावना को ज़ाहिर करता है, वह अर्थपूर्ण है. यह ख़बर भी गाँधी विचारों को विस्तार देता है.  ख्यातलब्ध गाँधीवादी विचारक अरविंद मोहन अपने लेख का जब शीर्षक देते हैं कि ‘गाँधी की चिंता मत करिए’ तब मन में यह सवाल बरबस उठता है कि समय गाँधी की चिंता करने का नहीं है अपितु उन पर चिंतन करने का है. असहिष्णु और हिंसक होते समाज और समय में गाँधी विचारों को एक स्पेस देने का है. इस बात से इंकार किया जाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है कि गाँधी और गाँधी विचार समय की आँधी में ढह जाएँगे. उन्हें आप जितना गिराना, मिटाना चाहेंगे, वे उतनी ही शक्ति के साथ उठ खड़े होंगे और पहले से ज्यादा प्रभावी रूप से. कोई मजदूर और कोई परिवार भी गाँधी के रास्ते पर चलकर लालटेन की तरह संदेश देते दिखेगा और हम स्वागत करेंगे. यह संदेश उन लोगों के लिए भी है जो रिश्तों में खटास घोल रहे हैं. हम उम्मीद से हैं कि यह असहिष्णुता और अहिंसक मन एक दिन निर्मल होकर रहेगा. 


बुधवार, 19 मार्च 2025

मन बदलती कठपुतली को याद करने का समय

 21 मार्च विश्व कठपुलती दिवस पर विशेष


मन बदलती कठपुतली को याद करने का समय
प्रो. मनोज कुमार
डोर में बंधी कठपुतली इशारों पर कभी नाचती, कभी गुस्सा करती और कभी खिलखिलाकर हमें सम्मोहित करती..यह यादें आज भी अनेक लोगों के जेहन में तरोताजा होंगी. कुछ यादें ऐसी होती है जो बचपन से लेकर उम्रदराज होने तक जिंदा रहती हैं और इसमें कठपुतली को दर्ज कर सकते हैं. कठपुतली उस समय हमारे साथ होती थी जब हमारे पास मनोरंजन का कोई साधन नहीं होता था. जेब में इतने पैसे भी नहीं होते थे कि शहरी बाबूओं की तरह थियेटर में जाकर मजे ले सकें. तब आप और हम मां और बापू के साथ कठपुतली नाच देखने चले जाते थे. समय बदला और कल तक मनोरंजन करती कठपुतली अब जनजागरूकता का अलख जगाने निकल पड़ी. सामाजिक रूढिय़ों के खिलाफ लोगों को चेताती तो समाज को संदेश देती कि अब हमें बदलना है. बदलाव की इस बयार में कठपुतली ने समाज को तो बदला और खुद भी बदल गई. नयी पीढ़ी को कठपुतली कला के बारे में बहुत कुछ नहीं मालूम होगा क्योंकि मोबाइल फोन पर थिरकती अंगुलियां नयी पीढ़ी को कठपुतली से दूर कर दिया है. हालांकि अभी भी कठपुतली का प्रभाव है लेकिन उसकी सिसकी साफ सुनाई देती है. आज 21 मार्च को अन्य दिवसों की तरह कठपुतली दिवस मनाते हैं. हालांकि साल 2003 में कठपुतली दिवस मनाने की शुरूआत हुई लेकिन संचार के सबसे पुरातन माध्यम होने के बाद भी आधुनिक संचार माध्यमों में कठपुतली के लिए कोई खास जगह बनती दिखाई नहीं देती है.
कठपुतली कला का इतिहास रोचक है. कठपुतली कला का इतिहास 3000 साल से भी पुराना है. सबसे पहले कठपुतलियों की शुरुआत संभवत: मिस्र में हुई थी। यूनियन इंटरनेशनेल डे ला मैरिओनेट या इंटरनेशनल पपेट्री एसोसिएशन की स्थापना 1929 में प्राग में हुई थी। यह यूनेस्को से संबद्ध है और अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संस्थान का सदस्य है. आधुनिक कठपुतली एक आभासी वातावरण में डिजिटल रूप से एनिमेटेड 2डी या 3डी आकृतियों और वस्तुओं का हेरफेर और प्रदर्शन है जो कंप्यूटर द्वारा वास्तविक समय में प्रस्तुत किया जाता है. इसका सबसे अधिक उपयोग फिल्म निर्माण और टेलीविजन निर्माण में किया जाता है. इसका उपयोग इंटरैक्टिव थीम पार्क आकर्षण और लाइव थिएटर में भी किया गया है.
आधुनिक कठपुतली क्या है और क्या नहीं, इसकी सटीक परिभाषा कठपुतली कलाकारों और कंप्यूटर ग्राफिक्स डिजाइनरों के बीच बहस का विषय है. हालाँकि, आमतौर पर इस बात पर सहमति है कि डिजिटल कठपुतली पारम्परिक कंप्यूटर एनीमेशन से अलग है क्योंकि इसमें पात्रों को फ्रेम दर फ्रेम एनिमेट करने के बजाय वास्तविक समय में प्रदर्शन करना शामिल है. विश्व कठपुतली दिवस की शुरुआत 2003 में यूनेस्को से संबद्ध एक गैर-सरकारी संगठन हृढ्ढरू्र द्वारा की गई थी. 21 मार्च 2003 को पहला विश्व कठपुतली दिवस मनाया गया। मनोरंजन का सशक्त माध्यम रहीं कठपुतलियां जागरूकता का काम भी कर रही हैं। कठपुतली कला मंच, टेलीविजन और फिल्म पर नाट्य प्रदर्शनों के लिए कठपुतलियों को बनाने और उनका उपयोग करने की कला है। कठपुतली एक मानव, पशु या अमूर्त आकृति है जिसे मानव प्रयास द्वारा चलाया जाता है। ऐतिहासिक उदाहरणों और समकालीन उपयोग के आधार पर, अध्ययन में छाया रंगमंच, मुखौटा रंगमंच, हाथ की कठपुतली, छड़ी कठपुतली और कठपुतलियों को शामिल किया जा सकता है। कठपुतली चलाने वाले हाथों और भुजाओं की हरकतों का उपयोग करके छड़ या डोरियों जैसे उपकरणों को नियंत्रित करते हैं ताकि कठपुतली के शरीर, सिर, अंगों और कुछ मामलों में मुँह और आँखों को हिलाया जा सके। कठपुतली चलाने वाला कभी-कभी कठपुतली के पात्र की आवाज़ में बोलता है, जबकि अन्य समय में वे रिकॉर्ड किए गए साउंडट्रैक पर प्रदर्शन करते हैं.
भारतीय संस्कृति में कठपुतली कला का दार्शनिक महत्व है. भगवद् गीता में, भगवान को एक कठपुतली के रूप में दर्शाया गया है, जो ब्रह्मांड को तीन तारों से नियंत्रित करता है : सत्व, रज और तम. भारतीय रंगमंच में कहानीकार को सूत्रधार कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘तार धारण करने वाला.’ ेेभारत में कठपुतली परम्पराओं का एक विविध स्पेक्ट्रम उभरा है, प्रत्येक कठपुतली की अपनी विशिष्ट शैली के साथ. प्रेरणा पौराणिक कथाओं, लोककथाओं और स्थानीय किंवदंतियों से ली गई थी. कठपुतली को चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य और रंगमंच के साथ जोड़ा गया है, जिसके परिणामस्वरूप एक अद्वितीय कलात्मक अभिव्यक्ति हुई है हालाँकि समर्पित प्रशंसकों की आवश्यकता और वित्तीय अनिश्चितताओं के कारण हाल के वर्षों में यह रचनात्मक रूप लगातार कम हो गया है.
भारत के विभिन्न राज्यों में कठपुतली कला अलग-अलग नाम से प्रचलन में है. राजस्थान में इन्हें कठपुतली के नाम से जाना जाता है। इसे लकड़ी के एक ही टुकड़े से बनाया गया है और ये कठपुतलियाँ बड़ी गुडिय़ा की तरह हैं जिन्हें राजस्थानी शैली में रंग-बिरंगे कपड़े पहनाए गए हैं। कठपुतली कलाकार उन्हें दो से पाँच तारों से संचालित करते हैं जो आम तौर पर उनकी अँगुलियों से बंधे होते हैं। ओडिशा में इन्हें कुंधेई के नाम से जाना जाता है। यह हल्की लकड़ी से बना है जिसमें पैर नहीं हैं लेकिन लंबी बहने वाली स्कर्ट पहनते हैं । यह कभी-कभी ओडिसी नृत्य के संगीत से प्रभावित भी देखा जाता है। कर्नाटक में इन्हें गोम्बेयट्टा कहा जाता है। इन्हें क्षेत्र के पारम्परिक थिएटर रूप यक्षगान के पात्रों की तरह स्टाइल और डिज़ाइन किया गया है। गोम्बेयट्टा में अभिनीत एपिसोड आमतौर पर यक्षगान नाटकों के प्रसंगों पर आधारित होते हैं। तमिलनाडु में इन्हें बोम्मालट्टम के नाम से जाना जाता है। यह छड़ी और डोरी दोनों कठपुतलियों की तकनीकों को जोड़ती है। वे लकड़ी के बने होते हैं और हेरफेर के लिए तार एक लोहे की अंगूठी से बँधे होते हैं जिसे कठपुतली अपने सिर पर मुकुट की तरह पहनता है। कुछ कठपुतलियों के हाथ और जोड़ जुड़े हुए होते हैं, जिन्हें छड़ों से संचालित किया जाता है।
पश्चिम बंगाल में इसे पुतुल नाच के नाम से जाना जाता है। वे लकड़ी से बनाए गए हैं और एक विशेष क्षेत्र की विभिन्न कलात्मक शैलियों का पालन करते हैं। पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में छड़ी-कठपुतलियाँ जापान की बूनराकू कठपुतलियों की तरह मानव आकार की हुआ करती थीं।
ओडिशा में पारम्परिक छड़ी कठपुतली दूसरों से कुछ अलग है। यहाँ रॉड कठपुतलियाँ आकार में बहुत छोटी होती हैं, आमतौर पर लगभग बारह से अठारह इंच। इनमें भी अधिकतर तीन जोड़ होते हैं लेकिन हाथ छड़ों के बजाय तारों से बंधे होते हैं। इस प्रकार कठपुतली के इस रूप में छड़ और डोरी कठपुतलियों के तत्वों को संयोजित किया जाता है। बिहार में पारम्परिक छड़ी कठपुतली को यमपुरी के नाम से जाना जाता है। इसमें अनूठी विशेषताएं हैं जो इसे एक दिलचस्प घड़ी बनाती हैं। ये कठपुतलियाँ लकड़ी की बनी होती हैं।
कठपुतली कला महज़ मनोरंजन का साधन नहीं है बल्कि सूचना और शिक्षा का बुनियादी तत्व भी समाहित हैं. कठपुतलियों के साथ जुडक़र, बच्चे विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने और दूसरों के प्रति सहानुभूति विकसित करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं. कठपुतलियाँ बच्चों को अपने विचारों, भावनाओं और कथाओं को अधिक स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने में मदद करती हैं. कठपुतलियाँ सामाजिक संपर्क और सहयोग को प्रोत्साहित करती हैं. आइए एक बार फिर हम सब अपनी प्यारी कठपुतलियों पर चर्चा करें क्योंकि कठपुतली समाज का मन बदलती है.  तस्वीर गुगल से साभार

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

‘भारतीय ज्ञान परम्परा एवं अनुसंधान की दृष्टि’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

 शोध पत्रिका ‘समागम’ रजत जयंती वर्ष  में


‘भारतीय ज्ञान परम्परा एवं अनुसंधान की दृष्टि’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
 

भोपाल. शोध एवं संदर्भ की मासिक पत्रिका ‘समागम’ का प्रकाशन के 25वें वर्ष में प्रवेश कर जाना एक सुखद अनुभूति है. वर्ष 2000 में ‘समागम’ का प्रकाशन आरंभ हुआ था और आहिस्ता-आहिस्ता अपने सीमित संसाधनों में यह सफर तय किया.मीडिया, हिन्दी साहित्य एवं सामाजिक सरोकार पर केन्द्रित ‘समागम’ ने उन विषयों को चुना जिन्हें आमतौर पर स्थान नहीं मिलता है. ‘समागम’ के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार प्रोफेसर मनोज कुमार ने कहा कि यह हमारे लिए खास बात यह है कि देशभर के शिक्षाविद्, शोधार्थी एवं मीडिया के ख्यातनाम लोग जुड़े हुए हैं. सुपरिचित साहित्यकार बालकवि बैरागी, डॉ. विकास दवे, डॉ. विजय बहादुर सिंह, डॉ. सोनाली नरगुंदे, एवं डॉ. कमलकिशोर गोयनका का समय-समय पर मार्गदर्शन मिलता रहा है. ‘समागम’ की शक्ति इस बात में है कि सुधिजन समय-समय पर गलतियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते रहे हैं.   

‘समागम’ केवल प्रकाशन तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की. सिकलसेल पर केन्द्रित अंक का विमोचन मध्यप्रदेश के गर्वनर श्री मंगूभाई पटेल ने किया वहीं खादी पर केन्द्रित अंक एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी में सुप्रसिद्ध समाजवादी विचारक श्री रघु ठाकुर एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री गिरिजाशंकर की सहभागिता रही.

‘समागम’  ने विविध विषयों यथा सिनेमा के सौ वर्ष, महिला सशक्तिकरण के सौ वर्ष, चम्पारण आंदोलन के सौ वर्ष, महात्मा गांधी के ड़ेढ सौ वर्ष पूर्ण होने के साथ लोकमाता देवी अहिल्या के 300 वर्ष पर विशेष अंक का प्रकाशन किया गया. मीडिया के विविध विषयों के साथ पत्रकारिता के पुरखा यथा राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, राहुल बारपुते सहित अनेक पर अंक का प्रकाशन किया गया. सामाजिक सरोकार से जुड़े विषयों पर भी ‘समागम’  के अंक का प्रकाशन किया गया.

संपादक प्रोफेसर मनोज कुमार का कहना था कि 25वें वर्ष का सफर टीम समागम के लिए आल्हादित करने का अवसर है. उन्होंने बताया कि जल्द ही ‘भारतीय ज्ञान परम्परा एवं अनुसंधान की दृष्टि’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन ‘समागम’ के बैनर तले किया जाएगा. 

      

सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

न्यायप्रिय और शौर्य की प्रतिमूर्ति महाराज विक्रमादित्य

विक्रमोत्सव-2025 के अवसर पर विशेष लेख

न्यायप्रिय और शौर्य की प्रतिमूर्ति महाराज विक्रमादित्य
मनोज कुमार
भारतवर्ष का इतिहास अनेक न्यायप्रिय और अदम्य साहस दिखाने वाले शासकों से पुष्पित-पल्लवित है। दुर्भाग्य से ऐसे शासकों के प्रति हमारी नवागत पीढ़ी अनजान सी है या उन्हें आधी-अधूरी जानकारी दी गई। मालवा के महाराज विक्रमादित्य से भला कौन परिचित नहीं है? लेकिन नवागत पीढ़ी को यह नहीं मालूम कि विक्रमादित्य के शौर्य भारत के अलावा आसपास के देशों में भी रहा है। विक्रमादित्य पर विपुल साहित्य लिखा गया। महाराज विक्रमादित्य ने किस तरह विक्रम संवत की स्थापना की। विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन विक्रमादित्य द्वारा उज्जैन से किया गया। उज्जैन परम्परा से ही काल गणना का एक प्रमुख केंद्र माना जाता रहा और इसीलिए अरब देशों में भी उज्जैन को अजिन कहा जाता रहा। सभी ज्योतिष सिद्धांत ग्रंथों में उज्जैन को मानक माना गया है। आज जो वैश्विक समय के लिए ग्रीनविच की स्थिति है, वह ज्योतिष के सिद्धांत काल में और उसके बाद सैंकड़ों वर्षों तक उज्जैन की रही। यह भी निर्विवाद है कि ज्योतिर्विज्ञान उज्जैन से यूनान और एलेक्जेंड्रिया पहुँचा। काल गणना केंद्र होने से उज्जैन को विश्व के नाभि स्थल की मान्यता भी रही है- ‘स्वाधिष्ठानं स्मृता कांची मणिपूरमवंतिका। नाभि देशे महाकालस्यन्नाम्ना तत्र वै हर:।’ साथ ही महाकालेश्वर की उज्जैन में अवस्थिति काल के विशेष संदर्भ की द्योतक है। इस प्रकार विक्रम सम्वत् ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार भी एक विशेष महत्व रखता है।
भारतवर्ष में विक्रमादित्य युग परिर्वतन और नवजागरण की एक महत्वपूर्ण धुरी रहे हैं। और उनके द्वारा प्रवर्तित विक्रम सम्वत् हमारी एक अत्यंत मूल्यवान धरोहर है। यह भारतीयजन के लिए एक शक्ति और आत्माभिमान का स्रोत भी है। यह भी एक बड़ा कारण है कि विदेशी आक्रांताओं ने भारत गौरव तथा ज्ञान संपदा के प्रमाणों, साक्ष्यों, पुस्तकों, स्थापत्यों के सुनियोजित विनाश का अभियान चलाया। हमारी संपदा को विध्वंस किये जाने के प्रमाण लगातार मिलते रहे हैं। इस अभियान को उपनिवेशवादी इतिहासकारों ने भी अपना भरपूर समर्थन दिया। इन सभी की दुरभिसंधि यही थी कि भारत ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, आर्थिकी का नहीं बल्कि अंधेरे का क्षेत्र भर था, जिसके उद्धार के लिए गोरांगप्रभु जन ने देश को लूटा, मिटाया और फिर आधुनिक युग में प्रवेश का टिकट दिया, कृपा पूर्वक। उन्होंने दुनिया की तमाम सभ्यताओं के साथ यही कुछ किया. पश्चिम अभिमुख मानस के इतिहासकारों ने इसी क्रम में विक्रमादित्य को भी ध्वस्त करने की सचेत कोशिश की। ऐसे ही एक इतिहासकार डी. सी. सरकार ने विक्रमादित्य की परंपरा को अनैतिहासिक सिद्ध करने का सघन प्रयास किया। उन्होंने एन्शिएंट मालवा एंड दि विक्रमादित्य ट्रेडिशन की भूमिका में दो टूक कहा कि ईस्वी पूर्व प्रथम शती में पारंपरिक विक्रमादित्य के लिए कोई जगह नहीं है. अलबत्ता उन्होंने माना कि विक्रम सम्वत् की स्थापना विक्रमादित्य ने ही की। लेकिन वह उज्जैन के विक्रमादित्य नहीं हैं. लेकिन विक्रम सम्वत् का अस्तित्व उन्होंने या उन जैसे इतिहासकारों ने स्वीकार किया।
मालव गणों ने शकों को पराजित ही नहीं किया बल्कि उन्हें भारत भूमि छोड़ेने को विवश किया। मालव गणों ने शकों को परास्त कर अवंति क्षेत्र को मालवभूमि बनाया। इसी तिथि से अवंति मालवा कहलाने लगी और विजय तिथि के स्मारक स्वरूप विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन हुआ, जिसे कभी-कभी कृत और मालव सम्वत् के रूप में भी संबोधित किया जाता रहा। सम्वत् प्रवर्तन के साथ साथ नये सिक्के भी चलाये गये।
सिक्कों पर अंकित किया गया- ‘मालवान (नां) जय(य:)’. इसी विजय और गण के अवंति में प्रतिष्ठित होने के समय से आगे की काल गणना के लिए मालव सम्वत् या कहें कि विक्रम सम्वत् प्रशस्त हुआ।
भारतीय संस्कृति पर अभिमान करने वालों के लिए यह निश्चय ही गौरव करने योग्य है कि आज भारत वर्ष में प्रवर्तित विक्रम सम्वत्सर बुद्धनिर्वाणकाल गणना को छोड़ कर संसार के प्राय: सभी ऐतिहासिक सम्वतों में प्राचीन है। यह भारत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण परिघटना है। विक्रम सम्वत् के उद्भव तक विशुद्ध वैदिक संस्कृति का काल, रामायण और महाभारत का युग, महावीर गौतम बुद्ध का समय, चंद्रगुप्त मौर्य एवं प्रियदर्शी अशोक, पुष्यमित्र शुंग की साहसगाथा, वेद, पुराण, सूत्रग्रंथ एवं स्मृतियों की रचना भारतवर्ष में हो चुकी थी, वैयाकरण पाणिनी और पतंजलि और चाणक्य के पांडित्य तथा राजनीतिक बुद्धिमत्ता चतुर्दिक फैल चुकी थी। विक्रमादित्य का समय भारशिवनागों, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त, यशोवर्मन, विष्णुवद्र्धन के बल और प्रताप की चमक से विश्व को चमत्कृत करने का समय था, यह ही वह समय था जब दुनिया कई भागों में भारत की संस्कृति व भारत के धर्म की सुगंधि विस्तारित थी। कालिदास, भवभूति, भारवि, भतृहरि, वराहमिहिर, माघ, दंडी, बाणभट्ट, धन्वन्तरि, कुमारिल भट्ट, आद्य शंकराचार्य, नागार्जुन, आदि की रचनाप्रतिभा चतुर्दिक व्याप्त थी।
विक्रमादित्य के अस्तित्व की गुत्थी भी विक्रम सम्वत् की वजह से अधिक उलझी लगती है क्योंकि विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन विदेशी आक्रांता शकों की पराजय और उन्हें देश से बाहर भगाने से आबद्ध हैं। और उपनिवेशवादी मानस इस बात को स्वीकारने के लिए तत्पर ही नहीं है कि भारतवर्ष में विदेशियों को मार भगाने का साहस कभी रहा भी था। विक्रमादित्य उन चुनिंदा शासकों में से थे जिन्होंने देश को विदेशी हमलावरों से मुक्ति दिलाई और इस महती उपलब्धि के उपलक्ष्य में विक्रमादित्य ने विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन किया। मान्यता यह भी है कि जनता के ऋण मुक्त होने के अवसर पर उज्जैन में ऋण मुक्तेश्वर महादेव मंदिर तत्समय ही स्थापित हुआ होगा। कथा सरित्सागर में उल्लिखित है ही कि -‘‘न मे राष्ट्रे पराभूतो न दरिद्रो न दुखित:।’ विक्रमादित्य सब लोगों के हितों की रक्षा करता था। उसके राज्य में न कोई दुखी था,न दरिद्र था और न कोई पराभूत। शकों पर अप्रतिम विजय के कारण विक्रमादित्य शकारि भी कहलाये और अप्रतिम साहस प्रदर्शन के कारण साहसांक भी।
मध्यप्रदेश सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रदेश है और इस श्रृंखला में विक्रमोत्सव का आयोजन प्रदेश को एक नई पहचान देगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि नेपाल जैसे राष्ट्र में विक्रम संवत से कैलेंडर प्रचलन में है. सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन और अन्य महत्वपूर्ण पक्षों की जानकारी पाठ्यक्रम में भी सम्मिलित की जाए। विक्रमोत्सव की सम्पूर्ण परिकल्पना मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की है।  विक्रमोत्सव महाशिवरात्रि से आरंभ होकर सृष्टिकर्ता महादेव के महोत्सव से सृष्टि के आरंभ दिवस वर्ष प्रतिपदा 30 मार्च तक चलेगा। इस विराट आयोजन में सम्राट विक्रमादित्य के युग, भारत उत्कर्ष, नवजागरण और भारत विद्या पर केंद्रित रहेगा. इसके तहत साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ ही ज्योतिर्विज्ञान, विचार गोष्ठियां, इतिहास और विज्ञान समागम, विक्रम व्यापार मेला, लोक एवं जनजातीय संस्कृति पर आधारित गतिविधियां संचालित होंगी। विक्रमोत्सव में 27 फरवरी से आर्ष भारतीय ऋषि वैज्ञानिक परंपरा, विक्रमकालीन मुद्रा एवं मुद्रांक, श्रीकृष्ण की 64 कलाएँ (मालवा की चितरावन शैली में), श्रीकृष्ण होली पर्व, चौरासी महादेव, जनजातीय प्रतिरूप, सम्राट विक्रमादित्य और अयोध्या, प्राचीन भारतीय वाद्य यंत्र, देवी 108 स्वरूप और देवी अहित्या पर निर्मित स्थापत्य पर प्रदर्शनियां लगाई जाएंगी. साथ ही शैव परंपरा एवं वास्तु-विज्ञान, भारत में संवत परंपरा-वैशिष्ट्य एवं प्रमाण पर शोध संगोष्ठी होगी. वायलिन वादक अनुप्रिया देवेताले अपनी प्रस्तुति देंगी. एक से 3 मार्च 2025 तक वैचारिक समागम के अंतर्गत सम्राट विक्रमादित्य का न्याय विषय पर मंथन होगा. आठ मार्च को लोक रंजन में बोलियों का अखिल भारतीय कवि सम्मेलन होगा. विक्रमोत्सव में दस से 12 मार्च तक अंतर्राष्ट्रीय इतिहास समागम होगा. पन्द्रह से 16 मार्च तक संहिता ज्योतिष एवं वैशिष्ट्य एवं आचार्य वराह मिहिर पर संगोष्ठी, 21 मार्च से महादेव शिल्पकला कार्यशाला तथा प्रतिदिन मांडना शिविर लगाए जाएंगे. इसी क्रम में 21 से 25 मार्च तक पौराणिक फिल्मों का अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव, आदि बिम्ब के अंतर्गत जनजातीय संस्कृतिक पर केंद्रित फिल्मों का प्रदर्शन होगा. साथ ही 21 से 29 मार्च तक विक्रम नाट्य समारोह, वेद अंताक्षरी, 22 मार्च को अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, 26-28 मार्च को राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन और विज्ञान उत्सव होगा. 

सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

देसी रंग में रंगा होगा ग्लोबल इनवेस्टर्स समि

 मनोज कुमार

ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट इस बार देसी रंग में रंगा होगा. दुनिया भर से आए उद्योगपतियों के लिए भी एक नया अनुभव होगा. विदेशी मेहमानों को मध्यप्रदेश की संस्कृति, कला एवं खान-पान से परिचय कराया जाएगा. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के अथक प्रयासों के चलते और बार बार आयोजन की समीक्षा कर जीआइएस को अविस्मरणीय बनाने की कोशिश रंग दिखाने लगी है. इसके पहले भी अनेक जीआइएस हुए लेकिन सबका डेस्टिनेशन इंदौर हुआ करता था. यह माना जाता है कि इंदौर मध्यप्रदेश का मिनी बाम्बे होने के साथ उद्योग-व्यापारकी नगरी है लेकिन इस बार मोहन सरकार ने इंदौर के बजाय जीआइएस के लिए राजधानी भोपाल को नया डेस्टिनेशन बनाया है. अतिथियों के ठहरने और आवागमन की विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं. कोलार क्षेत्र में अतिथियों के रूकने के लिए विशेष इंतजाम किया गया है और इस बात का ध्यान रखा गया है कि वे प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले सकें. प्रदेश के लोक कलाकारों की प्रतिभा से अवगत कराने के लिए उनसे लोक चित्र बनवाये गए हैं जो बरबस ही मोह लेते हैं. एक जिला, एक उत्पाद से भी जहां अतिथियों को अवगत कराया जाएगा वहीं खान-पान में मध्यप्रदेश की खास डिश उनके लिए तैयार की जा रही है. मध्यप्रदेश की ब्रांडिंग के लिए मोहन सरकार की यह विशेष पहल है.  
उल्लेखनीय है कि फरवरी के दूसरे पखवाड़े में होने जा रहे जीआइएस के पहले मोहन सरकार ने प्रदेश के अनेक प्रमुख शहरों यथा पुणे, कोलकाता, बैंगलोर, कोयमबटूर एवं मुंबई के साथ ही प्रदेश के शहडोल, नर्मदापुरम, रीवा, ग्वालियर, जबलपुर एवं उज्जैन में उद्योगपतियों से चर्चा कर उन्हें प्रदेश में निवेश करने के लिए पे्ररित किया है. इसके अतिरिक्त जापान, जर्मनी और यूके जाकर उद्योगपतियों से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मध्यप्रदेश से परिचय कराया और उद्योग स्थापित करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया है। में इंवेस्टर्स समिट का आयोजन किया और उद्योगपतियों को भरोसा दिलाया कि मध्यप्रदेश में निवेश की अपार संभावनाएं हैं और उद्योपतियों को सरकार उनके साथ कदमताल करते हुए सुविधा उपलब्ध कराएगी. मोहन सरकार की आश्वस्ति के बाद निवेश की संभावनाओं के द्वार खुलने लगे हैं. आंकड़ों पर ना भी जाएं तो मोहन सरकार के प्रयासों को अच्छा प्रतिसाद मिलता दिख रहा है. इसी तरह जीआइएस के बाद मध्यप्रदेश उद्योग में ना केवल सिरमौर बनेगा बल्कि प्रदेश आर्थिक रूप से मजबूत होगा. प्रदेश के लाखों लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे. जीआइएस का कार्यक्रम मानव संग्रहालय में आयोजित होगा. पीएम नरेंद्र मोदी भी इस कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर आएंगे.
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि ‘मध्यप्रदेश भारत की विकास गाथा में सबसे आगे खड़ा है, जिसने विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है और प्रगति का प्रतीक बन गया है. व्यापार करने में आसानी, निवेशक-अनुकूल नीतियों और सतत विकास पर अपने ज़ोरदार जोर के साथ, राज्य ने एक ऐसा अनुकूल वातावरण बनाया है जहाँ नवाचार, उद्योग और बुनियादी ढाँचा पनपता है. जैसे-जैसे मध्य प्रदेश अपनी परिवर्तनकारी यात्रा पर आगे बढ़ रहा है, यह भारत के आर्थिक भविष्य को आकार देने वाली एक महत्वपूर्ण शक्ति और वैश्विक निवेशकों के लिए एक अग्रणी गंतव्य के रूप में उभरने के लिए तैयार है.
ग्लोबल इन्वेस्टर समिट के इस मेगा इवेंट में सरकार किसी भी प्रकार की कमी नहीं छोड़ रही है. सुरक्षा से लेकर सुविधाओं तक सारे इंतजाम किए जा रहे हैं. ताकि देश के दिल में आने वाले मेहमानों के खातेदारी में कहीं कोई कमी न हो. इस मेगा इवेंट में मध्यप्रदेश की सरकार ने देश-विदेश के दिग्गज कारोबारियों को न्योता दिया है. खास बात ये है कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में राज्य के प्रमुख 6 सेक्टर्स पर केंद्रित समिट के आयोजन की महत्वपूर्ण पहल की जा रही है.  इस आयोजन में देश के कई दिग्गज उद्योगपति शामिल होंगे. उन नामों में से कुछ खास नाम हैं, वो है गौतम अदाणी, टाटा ग्रुप के चेयरमैन केएन चंद्रशेखरन, विप्रो के अजीम प्रेमजी, महिंद्रा के आनंद महिंद्रा, एयरटेल के सुनील भारती मित्तल, अनिल अंबानी, एयरटेल के सुनील भारती मित्तल समेत अन्य नाम भी शामिल हैं.
ग्लोबल इन्वेस्टर समिट में यह शायद पहली मर्तबा ही होगा कि जब एक ही मंच पर देश के दिल कहे जाने वाले प्रदेश में नीति, निवेश और नियोजन पर चर्चा होगी. हर सेक्टर के विशेषज्ञ, नीति-निर्माता और निवेशक मौजूद होंगे. दिग्गजों के एक मंच पर मंथन और संवाद प्रक्रिया से नए अवसर सृजित होंगे. प्रदेश आर्थिक रूप से सशक्त बनेगा. ऐसा अनुमान जानकार लगा रहे हैं.  ग्लोबल इन्वेस्टर समिट पर जिन छह सेक्टर्स पर बड़े निवेश की संभावना है, उस पर सबकी नजरे हैं. इन सेक्टर्स से जुड़े लोगों का सकारात्मक रूख है. वो छह सेक्टर्स हैं शहरी विकास, पर्यटन, माइनिंग, रिन्यूएबल एनर्जी, आईटी और एमएसएमई.  इसके अलावा एमपी कई क्षेत्रों में वैश्विक दुनिया के लिए तेजी से उभरता हुआ प्रदेश है. डायमंड प्रोड्यूसिंग स्टेट के साथ कई खूबियां एमपी को अलग बनाती हैं.  वहीं बीजेपी सरकार की पहल पर प्रदेश ग्रीन एनर्जी हब, विश्वस्तरीय पर्यटन केंद्र और उभरते हुए टेक्नोलॉजी हब के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है.
उल्लेखनीय है कि धार में विकसित हो रहा टेक्साइटल रीजन एंड अपैरल पार्क मध्यप्रदेश टेक्सटाइल और परिधान उद्योग के क्षेत्र में अपार संभावनाओं वाला राज्य बन चुका है. राज्य की समृद्ध कृषि पृष्ठभूमि, पारंपरिक बुनकर समुदायों की उत्कृष्ट कला, आधुनिक औद्योगिक आधार और निवेशक-अनुकूल नीतियां प्रदेश को इस क्षेत्र में अग्रणी बना रही हैं. सरकार के सुविचारित प्रयासों से मध्य प्रदेश तेजी से भारत के प्रमुख टेक्सटाइल और गारमेंट हब के रूप में उभर रहा है. धार जिले में विकसित किया जा रहा पीएम मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल पार्क प्रदेश के कपड़ा उद्योग को नया आयाम देगा. 2,100 एकड़ में फैले इस पार्क में टेक्सटाइल और गारमेंट उद्योगों के लिए विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा उपलब्ध होगा. यह पार्क न केवल निवेश आकर्षित करेगा, बल्कि प्रदेश को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भी बनाएगा.
ज्ञात हो कि मध्यप्रदेश में 60 से अधिक बड़ी कपड़ा मिलें, 4,000 से अधिक हथकरघे और 25 लाख स्पिंडल्स कार्यरत हैं. इंदौर, भोपाल, उज्जैन, धार, देवास, ग्वालियर, छिंदवाड़ा और जबलपुर प्रमुख टेक्सटाइल हब के रूप में विकसित हो रहे हैं. इंदौर का रेडीमेड गारमेंट क्लस्टर 1,200 से अधिक इकाइयों के साथ प्रदेश में रेडीमेड वस्त्र निर्माण की प्रमुख इकाई बन चुका है. यहां स्थित अपैरल डिजाइनिंग सेंटर और स्पेशल इकोनॉमिक जोन उद्योगों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त प्रदान कर रहे हैं.
मेहमानों के लिए भोजन की खास व्यवस्था : यहां तीन अलग-अलग कैटेगरी में भोजन की व्यवस्था रहेगी. इसमें वीवीआईपी (मंत्री, विदेश और देश के बड़े बिजनेसमैन), वीआईपी-मीडिया और अन्य डेलीगेट्स के लिए खाने के डोम अलग-अलग होंगे. यहां पर खाने का मेनू मेटरिक्स एक जैसा रहेगा. इन तीनों कैटेगरी के मेनू में भारतीय और विदेशी व्यंजन दोनों होंगे, जिनमें कॉन्टिनेंटल और ओरिएंटल फूड्स के साथ-साथ मध्य प्रदेश के पारंपरिक व्यंजन भी शामिल होंगे.
राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में तीन कैटेगिरी में खाने की व्यवस्था की गई है. इसमें तीन अलग-अलग डोम बनाए जा रहे है. यह तीनों डोम एक दूसरे से इंटरकनेक्ट रहेंगे. पर्यटन विकास निगम भोजन की पूरी व्यवस्था कर रहा है. 125 लोगों की टीम दो दिन मेहमानों के लिए लंच तैयार करेगी. वीवीआईपी डोम में खाना खाने की व्यवस्था बैठ कर रहेगी. वहीं, बाकी दो कैटेगिरी में बुफे होगा. खाना सर्वे करने और व्यवस्था के लिए 200 लोग रहेंगे. विदेश से आने वाले मेहमानों को प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्र की स्पेशल व्यंजन का स्वाद चखाया जाएगा. दाल बाफला-दाल बाटी के साथ ही नर्मदापुरम की स्पेशल डेजर्ट मावा बाटी विशेष रूप से सर्व की जाएगी. इसे 100 प्रतिशत मावा से बनाया जाता है. इसके अलावा बघेलखंड की खास इंद्रहार की कढ़ी की परोसी जाएगी. इसे पांच तरीके दाल को मिक्स करके बनाया जाता है. जिसे उबालकर उसे बर्फी के शेफ में काट कर कड़ी में डाला जाता है. वहीं, मालवा की स्पेशल लाल भाजी भी स्पेशल डिस में रखी जाएगी. साथ ही मिलेट्स के भी दो आईटम रखे जाएंगे.
रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव के बाद सीएम डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार ग्लोबल इन्वेस्टर समिट का आयोजन करने जा रही है. प्रदेश में जहां रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव के माध्यम से क्षेत्रीय निवेश को बढ़ावा देने के लिए संभाग स्तर पर रोजगार के अवसर निर्मित करने के लिए निवेशकों के साथ वन टू वन किया. वहीं, अब ग्लोबल स्तर पर प्रदेश में बड़े निवेश और रोजगार के लिए सरकार ग्लोबल इन्वेस्टर समिट का मेगा इवेंट करने वाली है. ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट (जीआईएस) एक महत्वपूर्ण मंच साबित होगी, जिसमें निवेश के क्षेत्र में अहम निर्णय लिए जाएंगे. इस समिट के दूसरे दिन पहली बार ‘मध्यप्रदेश प्रवासी शिखर सम्मेलन’ का आयोजन किया जा रहा है, इसमें दूसरे देशों में उद्योग, कारोबार कर रहे प्रदेश के करीब 250 से ज्यादा प्रवासी शामिल हो सकते हैं. जानकारी के अनुसार अब तक अमेरिका, यू   नाइटेड किंगडम, यूके, यूएई, जापान समेत कई देशों में रह रहे प्रदेश के अनिवासियों ने जीआईएस में आने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है. इनकी संख्या करीब 150 के आसपास है. अधिकारियों के अनुसार मध्य प्रदेश प्रवासी शिखर सम्मेलन में 250 से ज्यादा एनआरआई के आने की संभावना है.

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