शनिवार, 11 जुलाई 2026

 

क्या मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती हूँ?

चीखती, दम तोड़ती बच्ची का सवाल....

प्रो. मनोज कुमार

स्त्री शक्ति की दुहाई देते देवियों को पूजने वाले हमारे समाज की हकीकत है। राजस्थान की वह मासूम जिसने अभी चलना ही शुरू किया था। जिंदगी में वह रंग भरती, इसके पहले उसे बदरंग कर दिया गया। दरिदंगों की शिकार बच्ची मर गई। उसे मरना तो था ही। पहले ही उसकी आत्मा मर गई थी। बदन पर खुरचे गए जख्म उसे पल प्रति पल मार रहे थे। ये उसका ही साहस था कि वह दरिदों को बेनकाब करने खुद को बचा कर सडक़ पर आ गई थी। यह बच्ची दरिदंगी की शिकार का वह चेहरा है जहाँ हजारों-हजार बच्चियाँ शिकार हो रही हैं। बेमौत मर रही हैं और अपराधी बेखौफ हैं। कुछ समय पहले देश के सबसे शिक्षित राज्य कहे जाने वाले केरल से ऐसी ही खबर आयी और हाल में मध्यप्रदेश के भोपाल से खबर मिल रही है। ऐसे अपराध का सिलसिला थमा नहीं है। निर्भया को लेकर समाज ने जो सजगता दिखायी थी, तब लगा था कि समाज ऐसी दरिदंगी के खिलाफ सजग और सचेत रहेगा और शायद ऐसे लोगों में डर पैदा होगा लेकिन हालात ऐसी कोई चिंह अपने पीछे नहीं छोड़ रहा है। हालत बद से बदतर होती जा रही है। 

राजस्थान में जो कुछ हुआ, उसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। 32 दानवों में से कुछ को पुलिस ने धर लिया है। सडक़ों पर उनकी पिटाई हो रही है। चिंहित लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाने की खबर भी है। यह एक तरीका हो सकता है लेकिन इसके खिलाफ डर पैदा करना इस समय की बड़ी जरूरत है। अपराध के आंकड़ों को देखें तो कोई राज्य कम या कोई ज्यादा होता है और इन आंकड़ों से बहुत ज्यादा फर्क पडऩे वाला नहीं है। मूल बात है उस दरिदें सोच की। समाज के प्रतिकूल व्यवहार करने के लिए कभी फिल्मों को दोष दिया जाता था और अब सोशल मीडिया को। लेकिन क्या दोष देने से मामला समाप्त हो जाता है। मान भी लें कि फिल्मों के चलते अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं तो फिल्मों को देखकर हम सीखते क्यों नहीं? हिंदी फिल्म मदर इंडिया तो आपके हमारे जेहन में है। अपराध के लिए अपने ही बेटे को मार डालने वाली माँ क्यों हमारे लिए सबक नहीं बनती है। मुझे स्मरण हो रहा है कि छतरपुर या टीकमगढ़ में एकाध दशक पहले गाँव की पंच या सरपंच रही एक स्त्री ने अपने बेटे को इसलिए गाँव निकाला कर दिया कि उसने पंचायत का नियम तोडक़र शराब पीने की जुर्रत की थी। एक उदाहरण यह भी है। एक दृष्टांत लोकमाता अहिल्या का भी मिलता है जिन्होंने अनैतिक आचरण पर बेटे को सजा दी थी। 

हमारे समाज का दुर्भाग्य यह भी है कि हमारे विमर्श में इस समय दूसरे हजारों विषय हैं लेकिन नैतिक रूप से पतित होते इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है। शिक्षा से जुड़ी अमिता नीरव जैसी कुछेक लोग चिंता जाहिर कर रहे हैं। बहुसंख्य वीडियो इधर से उधर करने में लगे हैं। एक किस्म का इसे भी सायबर अपराध मान सकते हैं। ये दरिदें केवल हैवान नहीं हैं बल्कि इससे आगे निकल कर ये नरभक्षी हो गए हैं। डराने वाली बात यह है कि इस अपराध में बालिक के साथ नाबालिग भी शरीक हैं। थू करते हैं, घिन आती है ऐसे लोगों पर लिखते, बोलते और सोचते हुए। निरपराध मासूम दुनिया से चली गई और हमने आज नहीं बोला तो वह दूर बैठी हमसे सवाल कर रही होगी, क्यों मेरा दर्द महसूस नहीं कर पाये? क्या मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती हूँ। मन थर्रा उठता है और तब जब हम अपने आसपास की बच्चियों को चेहरा देखते हैं। कल्पना करके सिहरन हो उठती है और मन पहले से ज्यादा डरा हुआ महसूस करते हैं।

कह सकते हैं कि सरकार को चाहिए कि वह अपराध को रोके और यह सच भी है। लेकिन हमारी जवाबदारी कौन तय करेगा? पहले हमें जिम्मेदारी उठानी होगी। कानून अपना काम करेगा और पुलिस अपना लेकिन इससे पहले सुरक्षा की जवाबदारी हमें लेना होगी। जमाने भर के नए एप आ गए हैं। तकनीक बाँह पसारे हर कुछ कर रही है तब स्कूल, कॉलेज जाती बच्चियाँ, ऑफिस जाती बहन बेटियों को सुरक्षा दी जाए। उनके भीतर कांफिडेंस क्रियेट किया जाए कि डरना नहीं है। हालाँकि निजी तौर पर मानना है कि जब स्थिति भयानक हो जाती है तब ये सारी सीख कागजी साबित हो जाती है। फिर भी कुछ तो उम्मीद रखना होगी, कुछ तो कोशिश करना होगा। कानून को भी ऐसे अपराधों के लिए नए ढंग से परिभाषित करने की जरूरत है। मकान गिरा दिए गए, यह उचित है। इससे आगे बढक़र उनकी संपत्ति और कैश को राजसात कर उन्हें अपंग बना दिया जाए ताकि रास्ते ढूंढ कर बच ना सकें। हमारे एडव्होकेट समाज ने कई बार मिसाल पेश की है कि ऐसे मामलों की पैरवी ना कर। इस बार भी उनसे ऐसी ही अपेक्षा होगी। एक बड़ा सवाल यह है कि एक रिक्शे वाले से लेकर होटल-दर-होटल बच्ची का सौदा होता रहा और किसी को खबर नहीं हुई? इसकी पड़ताल करना भी जरूरी है। इन दरिंदों के अलावा और कौन है जिनके चेहरे अभी ढके-छिपे हैं। एक और इल्तजा है कि इसे राजनीतिक चश्मे से परे देखा जाए तो मासूम को शायद शांति मिल पाए।

रविवार, 5 जुलाई 2026

तीजन, भाऊ साहब और वो समय

 

















तीजन, भाऊ साहब और वो समय

प्रो. मनोज कुमार

तीजन बाई नहीं रहीं। ख़बर दुखदायक है लेकिन होनी है। अभी वे 70 वर्ष की थीं। कुछ समय से बीमार भी थीं और इससे भी बड़ी बात यह कि वे इन दिनों लगभग गुमनाम सी भी थीं। 

मेरी पहली मुलाकात मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद के ऑफिस में हुई थी। तब यह ऑफिस मालवीय नगर में आज के मुकाबले विपन्न सा था लेकिन इसकी गामक भाऊ साहब से थी। भाऊ साहब बोले तो खिरवरडकर साहब। कहने को तो वो अफसर थे लेकिन सचाई यह थी कि वे चलते फिरते स्कूल थे। कम से कम मुझ जैसे के लिए। या वही समय था। तीजन बाई, तब तीजन बाई नहीं बनी थी, बावजूद इसके इनकी प्रतिभा चमकने लगी थी। कला उनकी थी और कलाकार बनाने में भाऊ साहब की भूमिका बड़ी थी। वो गुरु थे और वो तराशना जानते थे। तीजन को मंच दिया। गनियारी गांव से निकली लड़की भोपाल से दिल्ली और लोगों के दिलों में उतरती सात समंदर पार पंडवानी की नायिका बन गई।

इस पहली मुलाकात करते समय मैं और दोस्त सुनील मिश्र साथ थे। मैं उनसे एक पत्रकार बनकर सवाल कर रहा था तो सुनील एक कला समीक्षक के नाते। जब मैने तीजन से सवाल किया कि वो देहाती कपड़ों को छोड़ कर ये शहरी फैशन वाले कपड़े पहनने लगी तो उन्होंने हँस कर टाल दिया। सुनील को तब ये सवाल और ऐसे ही कुछ सवाल तल्ख लगे। हालांकि बाद में हम दोनों एक साथ तब की प्रमुख सांस्कृतिक पत्रिका सारंगा स्वर में छपे। इसके पहले धर्मयुग और बाद में सहारा, लोकमत समाचार सहित अनेक जगह तीजन पर फीचर आर्टिकल छपा।

संभवतः तीजन उन चुनिंदा कलाकारों में हैं जिन्हें तीन पद्म सम्मान मिले। उन्होंने एक तरफ पांडवानी को दुनिया के समक्ष प्रतिष्ठित किया तो वे छत्तीसगढ़ की अघोषित सांस्कृतिक राजदूत की तरह काम करती रहीं। निजी जीवन उनका सरल नहीं रहा। महाभारत का गायन वो करती रहीं और निजी जीवन में उनके लड़ाइयाँ लड़ीं। उनकी मंशा थी कि वे तीजन विद्यापीठ बन जाए। भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रबंधन ने अपने स्कूल में पंडवानी पढ़ाने के लिए नियुक्त किया था लेकिन वह भी औपचारिक ही रहा। तीजन की परंपरा से रितु वर्मा और शांति बाई चेलक आईं लेकिन तीजन के पासंग खड़ी नहीं हो पाई। शांति का पता नहीं, शायद रितु को भी भाऊ साहब का सानिध्य मिला। सही भी है, हर कोई तीजन नहीं हो सकता।

छत्तीसगढ़ क्या, मध्यप्रदेश क्या, वो पूरी लोक कला की राजदूत थीं। उनका जाना एक परंपरा का थम जाना है। तीजन को याद करते समय बार बार भाऊ साहब की याद भी आ जा जाती है। और एक सच यह भी है कि उनके जाने बाद संस्कृति विभाग में अफसर आए, गुरु नहीं। वैसे ही जैसे स्वामीनाथन ने ईट गारा उठाने वाली भूरी बाई के भीतर की कलाकार तलाश कर लिया था।

तीजन बाई कैसे कहें कि तुम हमारे बीच से चली गई हो।

सादर नमन


सोमवार, 29 जून 2026

जल संवर्धन अभियान से आगे अब हमारी जवाबदारी का समय
















जल संवर्धन अभियान से आगे अब हमारी जवाबदारी का समय

प्रो. मनोज कुमार

मानसून आँख-मिचौली कर रहा है। लगता है कि बादल अब बरस पड़ेंगे की तब बरस पड़ेंगे लेकिन खेतों से लेकर शहरों तक की आँखें पथराई जा रही है। बादल बिना बरसे चले जा रहे हैं। यह समस्या साल-दर-साल बढ़ती चली जा रही है। अंधाधुँध विकास के कारण हमने ही यह स्थिति उत्पन्न की है। बीते सालों के मुकाबले इस साल गर्मी का ताप अधिक रहा और आने वाले सालों की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में जरूरी है कि बीते दिनों को हम लौटा नहीं सकते लेकिन आने वाले दिनों को सुधार जरूर सकते हैं। राज्य में डॉ. मोहन सरकार ने जल गंगा संवर्धन अभियान का आरंभ प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) से शुरू किया था जो माह जून के आखिरी दिन थम गया। यह अभियान समाज को जागृत करने तथा नदियों, तालाबों, कुँओं और बावडिय़ों जैसे जल स्रोतों का पुनरुद्धार और संरक्षण करना प्रमुख था। स्वाभाविक है कि सरकार अपना काम कर रही है लेकिन समाज की हिस्सेदारी भी जरूरी है। सरकारी आंकड़ों को मानें तो यह अभियान ने सार्थकता प्रदान की है और मान लेना चाहिए कि आंकड़े हवा में जारी नहीं किए जाते हैं। लेकिन इससे आगे की बात यह है कि सरकार के इस अभियान में जिन जलस्रोतों को पुर्नजीवन दिया गया, उसे बचाने और संवारने का समय अब आ चुका है। 

जल प्रकृति का अमूल्य उपहार है और पृथ्वी पर जीवन का आधार भी। मानव, पशु-पक्षी, वनस्पति तथा समस्त जीव-जगत का अस्तित्व जल पर निर्भर है। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में जल को जीवन, पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। किंतु बढ़ती जनसंख्या, अनियोजित शहरीकरण, औद्योगीकरण, जल स्रोतों का अंधाधुंध दोहन तथा जल प्रदूषण के कारण आज विश्व गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और नदियाँ, तालाब तथा झीलें सूखती जा रही हैं। यदि समय रहते जल संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं अपनाए गए, तो भविष्य में पीने योग्य जल की भारी कमी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का नैतिक और सामाजिक दायित्व है।

इस स्थिति में हमें जल गंगा संवर्धन अभियान के आगे अब चलने की जरूरत है। यह अभियान गर्मी के मौसम में शुरू हुआ और जल स्रोतों को स्वच्छ और साफ किया गया। अब इन जल स्रोतों को लबालब करने का समय आ गया है। मानूसन अभी भले ही हमसे आँख-मिचौली कर रहा है लेकिन जब बरसेगा तो हमें लबालब कर देगा, यह उम्मीद बेमानी नहीं है। ऐसे में हम सबका दायित्व बन जाता है कि बारिश की इन बूँदों को सहेज और संवार कर रखें। जल संरक्षण के अनेक उपाय बताये जाते हैं और आप हम में से अनेक लोग करते हैं और यही जल गंगा संवर्धन अभियान को सार्थकता प्रदान करेगा। 

जल संरक्षण के लिए सरकार तो जो करती है और करेगी, हम व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्तर पर क्या कर सकते हैं, इस पर विचार और पहल करने की जरूरत है।  सबसे पहले वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना चाहिए। घरों, विद्यालयों, कार्यालयों तथा सार्वजनिक भवनों में वर्षा के जल को एकत्र कर भूजल पुनर्भरण किया जा सकता है। इससे भूजल स्तर में सुधार होता है और भविष्य के लिए जल उपलब्ध रहता है। इसी तरह वृक्षारोपण भी जल संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम है। पेड़ वर्षा को आकर्षित करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं तथा भूजल पुनर्भरण में सहायता करते हैं। इसलिए अधिक से अधिक पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना आवश्यक है। कुछ साथी इस दिशा में सक्रियता के साथ प्रयास कर रहे हैं और बारिश के पहले ही लोगों को अपने घरों और मोहल्ले में पौधे लगाने की सलाह दे रहे हैं। वर्षाकाल में पौध रोपण करने से इसका परिणाम सुखदायक होता है और थोड़े समय में यह पौध वृक्ष का स्वरूप ग्रहण कर लेता है।

खेती किसानी करने वाले किसान भाईयों को भी कृषि क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों, जैसे ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिंचाई का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे कम जल में अधिक सिंचाई संभव होती है और जल की बचत होती है। किसानों को कम पानी वाली फसलों को अपनाने तथा वैज्ञानिक खेती के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। खेती के लिए पानी की जरूरत सबसे अधिक होती है और खेती ना हो पायी तो अनेक प्रकार के संकटों से समाज को जूझना पड़ सकता है।

यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि  जल का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए। आवश्यक है कि नल को अनावश्यक खुला न छोडऩा, रिसाव की तुरंत मरम्मत कराना, आवश्यकता के अनुसार ही जल का उपयोग करना तथा पानी की बर्बादी रोकना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। छोटी-छोटी सावधानियाँ प्रतिदिन हजारों लीटर जल बचा सकती हैं। हमें इस मानसिकता से बाहर आना होगा कि हर कार्य सरकार को करना चाहिए। यह ठीक है कि संसाधन जुटाने और समाज को जागरूक करने का कार्य सरकार करती है लेकिन इसे परिणाममूलक बनाने की जवाबदारी अंतत: समाज की होती है। गंगा जल संवर्धन अभियान के माध्यम से जलस्रोतों को पुर्नजीवित करने का कार्य सरकार ने कर दिया है लेकिन इनके लंबे और सुदीर्घ जीवन के लिए जल संरक्षण का कार्य हमें करना होगा। जल संरक्षण एक सामूहिक अभियान है, जिसमें समाज की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। प्रत्येक व्यक्ति को जल का महत्व समझना चाहिए और दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करना चाहिए। परिवार में बच्चों को बचपन से ही जल बचाने की आदत सिखानी चाहिए। तस्वीर गूगल से साभार



टूटता भरोसा, दरकते रिश्ते

 













टूटता भरोसा, दरकते रिश्ते

प्रो. मनोज कुमार

सोनम और सिया के मामले को लेकर जवान लडक़ी का पिता जो मेरा दोस्त है, चिंता में डूबा हुआ है। उसे लगता है कि उसकी बेटी के हाथ पीले करने में अब सौ अड़चनें आएगी। टूटता भरोसा और दरकते रिश्ते का यह जीवंत उदाहरण है। दोस्त की बेटी उच्च शिक्षित है, संस्कारी है और आत्मनिर्भर है लेकिन जो सोनम-सिया कांड है, वह उसके भावी जिंदगी का रोड़ा बन रही है। यह एक कड़ुआ सच है और इस सच से इंकार किया जाना मुश्किल ही नहीं,नामुमकीन है। जिन स्थितियों, परिस्थतियों मेंं सोनम के बाद सिया प्रकरण हुआ, जो हुआ, सो वो हुआ लेकिन रिश्तों के मध्य भरोसे की एक महीन लकीर टूट गई। इन दोनों के कारण पूरे समाज में निराशा फैल गई है। लोगों को भरोसा रिश्ते से उठने लगा, जबकि सच यह है कि ये दोनों मामले एक अपराधिक मामले हैं। अदालत इसका फैसला करेंगी। साफतौर पर इसका बहुसंख्य समाज से बहुत कुछ लेना-देना नही है। समाज में बहुत किस्म के अपराध होते हैं और इसमें एक यह भी है। लेकिन एक अपराध से इतर समाज का मनोविज्ञान कुछ और ही कहता है। मीडिया रिपोटर््स की मानें तो रिश्ता करने से पहले परिवार अब जासूसों की मदद लेने लगे हैं। वे तहकीकात कर इत्मीनान कर लेना चाहते हैं। यह भारतीय संस्कारों के प्रतिकूल है लेकिन स्थितियाँ ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही है।

लौटते हैं मेरे उस दोस्त की चिंता पर। मैं उसकी बातों से इत्तेफाकर रखता हूँ लेकिन निराशावादी नहीं हूँ और उसे समझाता हूँ कि मध्यप्रदेश में आठ करोड़ से अधिक की आबादी है और कोई डेढ़ करोड़ परिवार होंगे। ऐसे में एक परिवार में होने वाली दुघर्टना को नजीर मान लेना उचित नहीं है। वह इस बात से सहमत है लेकिन उसका अगला सवाल होता है कि मान लो, इसी एक परिवार और हो जाए तब? कहने को तो यह कपोल-कल्पित बातें हैं लेकिन कोई मुक्कमल जवाब मेरे पास नहीं है। इसलिए भी नहीं कि विकास की तमाम संभावनाओं के बाद भी हम रूढि़वादी संस्कृति से मुक्ति नहीं पा सके हैं। भारतीय समाज का विवाह का ताना-बाना ऐसा है जो आमतौर पर हमें उत्साह से भर देता है। लेकिन बदलती-बिगड़ती व्यवस्था के कारण विवाह संस्था पर आँच आने लगी है। इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि ऐसा क्यों? थोड़े समय पहले सुपरिचित अभिनेत्री जया बच्चन ने अपनी नीतिन शादी नहीं करने की बात कही थी। और ऐसे ही गाहे-बगाहे शोध-सर्वेक्षणों में आ रहा है कि भविष्य में विवाह संस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। हो सकता है कि ऐसा हो जाए लेकिन इसके पहले जया के बयान पर गौर करना जरूरी है। यह उनकी सोच नहीं, अनुभव हो सकता है। बरसों वैवाहिक जीवन गुजारने के बाद वे अपनी ही बच्ची को ऐसा सुझाव दें तो कहीं ना कहीं उनका अपना अनुभव सामने आता है। ईश्वर करे ऐसी सारी बातें खारिज हो जाएं लेकिन सोनम-सिया प्रकरण के चलते सोचना जरूरी हो जाता है। 

भारतीय विवाह संस्था का ताना-बाना कितना बिखरेगा, यह तो भविष्य बताएगा लेकिन खरोंच अभी से आने लगी है और दिखने लगा है। लिव-इन-रिलेशनशिप जैसी प्रथा इसके मूल में है। कथित आजादी की आवाज के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप भारतीय समाज के ताना-बाना को छिन्न-भिन्न कर रही है। अनादिकाल से भारतीय समाज में विवाह संस्था का अस्तित्व है और हर सनातनी के लिए यह एक धर्म है, नैतिक दायित्व है। ऐसे अनेक परिवार मिल जाएँगे जिनके परिजनों में पच्चीस, पचास और पचहतरवीं शादी की सालगिरह मनायी जाती है। विवाह एक सामाजिक बंधन नहीं बल्कि यह सामाजिक रिश्तों को विस्तार देने की परंपरा है। सनातन में एक ही गोत्र में शादी करना वर्जित माना गया है तो इसके पीछे भी वैज्ञानिक सोच काम करती है। जब दो अलग परिवार मिलते हैं तो समाज में एक नए समूह का उदय होता है लेकिन निकट के रिश्तों में शादी होने से संबंधों का दायरा छोटा हो जाता है। इस पर भी विचार करने की जरूरत है। एक पिता के नाते मेरे दोस्त की चिंता जायज हो सकती है लेकिन तर्क की कसौटी पर देखें तो इतनी चिंता की बात नहीं है। सोनम-सिया के प्रकरण को महज एक अपराधिक कृत्य ही मानें और इसका फैसला कानून समय के साथ करेगा। जो दोषी होगा, उसे सजा मिलेगी लेकिन एक ही तराजू पर रखकर तौलने से सामाजिक ताना-बाना भरभरा कर गिर जाएगा। विवाह भारतीय समाज का संस्कार है, विधान है और एक जरूरी परंपरा। इसे ऐसी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है समाज के भरोसे को टूटने से बचाना और रिश्तों को मजबूती से जोडक़र रखना। भारतीय समाज में, सनातन प्रकृति में बहुत सारी चीजें दरक रही हैं लेकिन दरकते रिश्तों को बचाना भी हमारा दायित्व है। और इन सबके लिए जरूरी है स्वयं के ऊपर विश्वास बनाये रखना।

सोमवार, 15 जून 2026

चाँदनी को आशीष और समाज को संदेश

 










प्रो. मनोज कुमार

सरकार अंतिमजन के घर तभी जाती है, जब चुनाव हो, यह समाज की आमधारणा बन चुकी है और बहुत हद तक यही सत्य भी है लेकिन बिना चुनाव या किसी राजनीतिक लाभ के जब सरकार अंतिमजन के घर पहुँचती है तो खबर बन जाना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का एक प्रतिभावान बिटिया को आशीर्वाद देने के लिए उसके घर जाना एक अलहदा मामला बन जाता है। बहुतेरे होंंगे जो इसे राजनीतिक चश्मे से देख रहे होंगे लेकिन थोड़ी देर के लिए राजनीतिक चश्मा उतार लीजिए क्योंकि ऐसे अवसर बिरले ही जीवन में देखने को मिलते हैं। मुख्मंत्री डॉ. मोहन यादव विशाल अट्टालिका जिसे हम मंत्रालय अथवा वल्लभभवन संबोधित करते हैं, के सामने बसी भीमनगर (इसे झुग्गी बस्ती कहने में मुझे परहेज है) की संकरी गलियों से गुजर कर उस बच्ची के पास जा पहुँचते हैं जिसने हाल ही में कार्मस विषय की 12वीं कक्षा में टॉप किया है। अपनी प्रतिभा से उजाला फैलाने वाले इस प्रतिभावान बच्ची का नाम है चाँदनी। अपने नाम के अनुरूप अपनी प्रतिभा की रोशनी फैलायी कि सरकार अंतिमजन के द्वार पहुँच गई।

यूँ तो ऐसी किसी प्रतिभा का खिल जाना कोई असामान्य घटना नहीं है लेकिन चाँदनी का मामला अब थोड़ा अलग है। उसकी प्रतिभा की गूँज ऐसी थी कि मोहन सरकार उनके द्वार पर पहुँच कर उसकी पीठ थपथपा कर उसे हौसला दिया और कहा कि- ‘तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं।’ यहाँ हम से मतलब डॉ. मोहन यादव नहीं, मध्यप्रदेश सरकार है। इसे राजनीतिक चश्मे से देखिए तो भी आपको एक अपनापन सा लगेगा। प्रतिभावान चाँदनी के सिर पर हाथ फेरते डॉ. मोहन यादव गए तो मुख्यमंत्री बनकर उसके घर लेकिन भाव एक पालक का दिख रहा था। परिवार के साथ बैठने वाले तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लेकिन उसके परिवार ने उन्हें अपना कोई भाई, मामा या चाचा के रूप में देखा। ऐसे अवसर बिरले होते हैं। स्वाभाविक है कि डॉ. मोहन यादव और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बीच एक महीन सी रेखा है जो उन्हें औरों से अलग बनाती है। अपना शुभाषीश दिया, प्रतिभावान चाँदनी से उसके भविष्य के सपने सुने और आश्वस्त किया कि वो सब कुछ किया जाएगा, जिसका उसका मन है। परिजनों से उनके बारे में पूछा और बातचीत की। हम महसूस कर सकते हैं कि उस परिवार की उस समय क्या मनोदशा रही होगी जब स्वयं सरकार उनके पास बैठी है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 12 वर्ष के सफल कार्यकाल और उनके कार्यों को जन-जन तक पहुँचाने और जोडऩे का एक सिलसिला जारी है। और ऐसा पहले भी होता रहा है। यहाँ भी यह हुआ तो कोई हैरानी नहीं लेकिन हैरानी है कि पूरे लाव-लश्कर के साथ सरकार उन्हें अपने दरबार में बुलाकर भी सम्मानित कर सकती थी, पीठ ठोंक सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया, और सरकार स्वयं चाँदनी के घर पहुँच गई। तंग गलियों में सरकार का लाव-लश्कर नहीं जा सकता है इसलिए अधिकतर सरकारों ने वहाँ जाने से परहेज किया। डॉ. मोहन यादव भी ऐसा कर सकते थे लेकिन किया नहीं। सरकार को पीछे छोडक़र ई-स्कूटर खुद चलाते हुए विधायक सबनानी को पीछे बिठाकर पहुँच गए। अपने अंदाज में बात-बात पर ठहाका लगाने वाले मोहन ने पूरे परिवार को मोह लिया। सेल्फी ली और उनके हाल जानें। इसे एक राजनीतिज्ञ से जोडक़र देखने के बजाय एक सोच के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके इस नवाचार से समाज में संदेश जाता है कि एक सरकार ऐसी भी होती है, एक मुख्यमंत्री स्कूटर में बैठकर तंग गलियों में जा पहुँचता है तो उन हजारों-हजार बच्चों को तसल्ली होती है कि इस बार ना सही, अगली बार उनका मूल्यांकन करने सरकार ना सही, मुख्यमंत्री ना सही, मोहन भिया जरूर आएंगे।

स्मरण आ रहा है कि इसके पहले भी कुछ मंत्रियों ने प्रतिभावान बच्चों को और उनके परिवार को फोन लगाकर बातचीत कर उनका हौसला बढ़ाया था। शायद यह उसका विस्तार है जिसे स्वयं मुख्यमंत्री ने दिया है। यह केवल चाँदनी का हौसला बढ़ाने का मसला नहीं है बल्कि एक खामोश संदेश यह है कि जो जहाँ है, वह वहाँ जाकर ऐसी प्रतिभाओं का, उनके परिवार का हौसला बढ़ाये। यह समझना मुश्किल नहीं है कि वो परिवार, वो बच्चे अपनी मेहनत और प्रतिभा से आगे बढ़ रहे हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे लेकिन इस तरह की गैर-राजनीतिक नवाचार समाज में सकरात्मक भाव उत्पन्न करता है। मुख्यमंत्री के चाँदनी के घर जाने से उसके परिवार की गरीबी दूर नहीं होगी और ना ही चाँदनी के दैनंदिनी जीवन में कोई बड़ा बदलाव आएगा लेकिन जो बदलाव आएगा, वह नेपथ्य में होगा। वह बदलाव दिखेगा नहीं लेकिन मोहन भिया के आशीष से उसका मन पर्वत बन जाएगा और वह अपने मन के पर्वत की विजेता। उसके सपने को चार चाँद लग गए हैं और स्वयं का भरोसा बढ़ गया है। ध्यान आता है लेकिन पक्का-पक्का नहीं, रींवा की बेटी भी ऐसे ही अपने सपने पूरे कर जहाज उड़ाने लगी और एक दिन हमारे सामने आज की टॉपर चाँदनी कर अपने सपने को सच करती हुई आर्मी में लेफ्टिनेंट बनकर खड़ी होगी। उसके सपने, उसके हौसले से पूरे होंगे लेकिन थोड़ा-थोड़ा सा असर मोहन भिया के सिर पर हाथ रखने का होगा। सीख यही है कि हम सरकार नहीं हैं, मुख्यमंत्री नहीं हैं लेकिन समाज का वो हिस्सा हैं जो ऐसी चाँदनी की चमक को बढ़ा सकते हैं। शायद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव यही संदेश देना चाहते होंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

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