शनिवार, 12 जनवरी 2013

मेरे अपने शब्द



-मनोज कुमार 
शब्दों की अपनी ताकत होती है और यही शब्द कभी फूल की तरह रिश्तों को महकाते हैं तो कभी शूल की तरह चुभते भी हैं. तथाकथित अंग्रेजी शिक्षा के मारे हम लोग अपने देशज बोली-बात को भुलकर उनकी नकल करने पर उतारू हैं. इस नकलीपन से हम नकली अंग्रेजियत को तो ओढ-बिछा रहे हैं लेकिन असली दुनिया से दूर होते जाते हैं. जब कभी मैं अपने आसपास छोटे बच्चों से आप संबोधन से बात करते सुनता हूं तो मितली सी आने लगती है. बच्चों से जब तक तु-रे से बात न करो, मिठास का रिश्ता बनता ही नहीं है. जवान होती बेटी अपनी अम्मां से कभी जब लडिय़ाने पर उतर आती है तो अम्मां तु ऐसा मत कर जैसे वाक्य उसके मुंह से झरने लगते हैं. यहीं पर आकर मां-बेटी का रिश्ता दोस्ती में बदल जाता है. बेटी मां से खुल जाती है और वह दोनों एक अच्छे दोस्त बन जाते हैं. बच्चों के साथ भी यही है. स्वयं को आप का संबोधन पाकर वे खुद होकर दूरी बना लेते हैं. गांव-कस्बों में आज भी बड़ों को तुम कह कर संबोधित किया जाता है तो इसके पीछे उनका मान गंवाना नहीं है बल्कि रिश्ते की मिठास को बढ़ाना है. 

हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि हमारे पास हर रिश्तों के लिये अलग-अलग शब्द बने हुये हैं. अंग्रेजी की तरह कंगाल नहीं. अंग्रेजी में तु, आप और तुम के लिये एक ही शब्द है यू. अब इस यू को हमने बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिये गढ़ लिया आप में. ऐसे ही चाचा-चाची, मौसा-मौसी, मामा-मामी, दादा-दादी, जैसे संबोधन हमारे रिश्तों को महकाते हैं तो इन्हीं के लिये अंग्रेजी में अंकल-आंटी और इससे आगे ग्रेंड पापा और ममा हैं. यकिन कीजिये अंग्रेजी के इन शब्दों को बोलते हुए मुंह में जैसे कुनैन की गोली आ जाती है लेकिन जब चाची कहते हैं तो मन उल्हास से भर जाता है. सिस्टर बोलते समय अस्पताल का नजारा घूम जाता है लेकिन बहन या जीजी बोलते समय अपनेपन का अहसास होता है. ये देशज शब्द ही हैं जो हमारी खूबसूरत दुनिया गढ़ते हैं. शब्दों के विनाश के साथ ही हमारी सतरंगी दुनिया जैसे एक खाने में कैद हो जाएगी. जिस तरह इंटरनेट ने पूरी दुनिया के लिये विश्व ग्राम शब्द खोज निकाला है, वैसा ही हम एकजगह सिमट कर रह जाएंगे.

हम लोग एक दिन या एक त्योहार नहीं मनाते हैं. साल के तीन सौ पैंसठ दिन हमारे लिये उत्सव का होता है. बल्कि दिन के चारों पहर हमारे लिये उत्सव का होता है. भोर होते ही सूर्यदेव की अराधना, दोपहर ढलते ही अन्नपूर्णा की अराधना, सांझ ढलते ही देव आराधना और शाम होते ही चंद्रदेव का स्वागत. जिस समाज में हर पहर उत्सव का हो, जिस समाज में रिश्तों की गर्माहट के लिये शब्दों का संसार बना हो, वहां अंग्रेजी के बहुत मरे-मरे और उत्साहीन शब्दों से रिश्तों की मिठास और गर्माहट कम ही होती है. मैं तो अपने देशीपन में ही मस्त रहना चाहता हूं. अम्मां मेरे लिये सार्थक है, ममा का क्या करूंगा और धर्मपत्नी ही ठीक है वाइफ कहा तो कहीं नाइफ न बन जाये. मेरे देहातीपन को आप मंजूर कर ही लेना क्योंकि मुझे अंगरेजी नहीं आती है..  

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

हिन्दी दिवस से विश्व हिन्दी दिवस तक



-मनोज कुमार
हम सबको हिन्दी दिवस के नाम पर याद है सितम्बर माह की चौदह तारीख. एक दिन का हिन्दी दिवस और एक पखवाड़े का हिन्दी सप्ताह. यह दिन और सप्ताह का अर्थ है आगे पाठ और पीछे सपाट. यानि दिन और सप्ताह गुजरा नहीं कि हम भूल गये हिन्दी और हिन्दी को लेकर किये गये विलाप को. देखेंगे, आने दें सितम्बर को. सब मिलकर फिर हिन्दी के लिये रो लेंगे. सरकार को कोसेंगे कि वह हिन्दी के लिये कुछ नहीं कर रही है. ऐसे हिन्दीप्रेमी एक दोस्त से मैंने अपनी जानकारी बढ़ाने की गरज से पूछा- यार, ये तो बता कि हिन्दी दिवस और हिन्दी सप्ताह तो सितम्बर में मनाया जाता है लेकिन ये विश्व हिन्दी दिवस कब आता है? कुछ देर के लिये तो वो मेरा मुंह ताकता रहा और फिर बोला- तेरी आदत ही खराब है, जाने कहां से क्या सुन आता है और बोलता रहता है. उसने आगे जोड़ दिया हिन्दी यानि सितम्बर और हिन्दी यानि राष्ट्र्र, ये विश्व हिन्दी दिवस बकवास है. ऐसा कुछ नहीं होता है. कुछ और ज्ञानियों से जानने की गरज से पूछा तो कुछ को पता था और एक सज्जन तो ऐसे निकले, जिन्होंने न केवल विश्व हिन्दी दिवस के बारे में बताया बल्कि हिन्दी की दुर्दशा पर भी अपना दुख जाहिर किया. मुझे लगा विश्व हिन्दी दिवस के बहाने ही सही, एक बार हिन्दी के बारे में आत्मवलोकन कर ही लेना चाहिये.

भारत में आज से सैंतीस बरस पहले सन् 1975 में नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की पहल पर हुआ था. वे चाहती थीं कि हिन्दी विश्व मंच पर स्थापित हो सके. इसके लिये इस प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में तीन प्रस्ताव पास किये गये थे जिसमें से एक था संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी को अधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करना. नागपुर से लेकर जोहान्सबर्ग सम्मेलन पर सम्मेलन होते रहे और आज तक हिन्दी को अधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता नहीं मिल सकी. शायद हिन्दी से कम बोली जाने वाली अरबी भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता जरूर मिल गयी. अरबी को मान्यता मिल गयी, इसका दुख कम होना चाहिये. दुख तो इस बात का होना चाहिये कि सैंतीस साल में जाने कितनी पीढिय़ां जवान हो गई, केन्द्र में सरकारें आती-जाती रहीं लेकिन हिन्दी को विश्व मंच में स्थापित करने में हम नाकामयाब ही रहे.

यह ध्यान रखा जाना चाहिये कि हिन्दी मजबूरी की नहीं, मजबूती की भाषा है। दुर्भाग्य की बात है कि विश्व में ऐसा कोई राष्ट्र नहीं है जहां उनकी स्वयं की राष्ट्रभाषा न हो पर केवल भारत ही एक ऐेसा राष्ट्र है जहां राष्ट्रभाषा के लिये अभी भी चुनौती और संघर्ष की भाषा बोली जा रही है.  राष्ट्रभाषा का होना महज कोई भावनात्मक पहलू या आवश्यकता नहीं है। आज देश की बिखरती एकता की स्थापना के लिये भी राष्ट्रभाषा को कड़ाई से लागू करना आवश्यक हो गया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मातृभाषा की अवमानना करने वालों की ओर इशारा करते हुये कहा था, ‘‘क्या वे लोग जो अपनी मातृभाषा का अपमान करते हैं, कभी इस देश का भला कर सकते हैं ?

गांधीजी का यह कथन उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो खाते तो हिन्दी का है और गाते गुण अंग्रेजी का. पत्रकारिता हो, सिनेमा हो या शिक्षा, हिन्दी सभी की जरूरत बन चुका है. हाल ही में खेलों की खबरें दिखाने वाले एक चैनल को भी हिन्दी का मुंह करना पड़ा क्योंकि उन्हें पता है कि हिन्दी के बिना गुजारा नहीं. हर साल अरबों का कारोबार करने वाले हमारे भारतीय सिनेमाई कारोबारी जब भी मौका मिलता है हिन्दी की जगह, अंग्रेजी में ही बोलते दिखते हैं. पत्र-पत्रिकाओं का सबसे ज्यादा प्रसार हिन्दी भाषी पाठकों के बीच है किन्तु अंग्रेजी का तडक़ा लगाये बिना उनका जी मचलाता रहता है. शिक्षा के लिये तो ऐसा लगता है कि बिना कान्वेंट स्कूल में पढ़े, बच्चों का उद्धार होना ही नहीं है. इस मामले में व्यवसाय करने वालों ने जरूर अपनी जरूरत के अनुरूप हिन्दी की तरफ खुद को कर लिया है किन्तु मॉल की संस्कृति ने यहां भी हिन्दी को पीछे धकेल दिया है. हिन्दी हमारी धडक़न है, हमारी पहचान है और हिन्दी के बिना हम मृत समान हैं क्योंकि अपनी बोली और भाषा ही आखिरकार जिंदा होने का प्रमाण होती है.

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

जनवरी में शोध पत्रिका समागम का 12 वर्ष



 भोपाल. मीडिया एवं सिनेमा की पूर्णकालिक शोध पत्रिका समागम जनवरी 2013 में बारह वर्ष का सफर तय कर तेरहवें वर्ष में प्रवेश करेगी. मीडिया एवं सिनेमा के साथ ही सामाजिक संदर्भों के क्षेत्र में गंभीर किस्म के शोध को बढ़ावा देने के लिये समागम एक प्रकल्प है जहां समूचे हिन्दुस्तान से गंभीर शोधार्थी एवं मीडिया एवं सिनेमा के विशेषज्ञ निरंतर अपना सहयोग दे रहे हैं. समागम का जनवरी-13 का अंक अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी दिवस पर केन्द्रित होगा जबकि फरवरी-13 का अंक भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष पर होगा. इस आशय की जानकारी समागम के संपादक श्री मनोज कुमार ने दी है। ज्ञात रहे कि फरवरी-2012 में जब भारतीय सिनेमा ने सौ वर्षों में प्रवेश किया था तब से लगातार एक वर्ष तक समागम ने भारतीय सिनेमा पर विभिन्न कोणों से सामग्री का प्रकाशन किया है. मुख्यधारा की सिनेमा के साथ साथ आंचलिक सिनेमा के विषय-वस्तु को लेकर विविध सामग्री का प्रकाशन किया गया है. आंचलिक सिनेमा में जिन अंचलों को शामिल किया गया उनमें बंगला, मराठी, गुजराती, भोजपुरी, उत्तराखंडी, छत्तीसगढ़ी, मध्यप्रदेशीय, सिंधी एवं दक्षिण भारतीय प्रमुख हैं. समागम के विशेषांक में भारतीय सिनेमा के कुछ विशिष्ठ आयामों पर अनछुये पहलुओं को शामिल कर संग्रहणीय अंक बनाने का प्रयास किया जा रहा है. 

समागम अपने सालगिरह के अवसर पर एक किताब का प्रकाशन भी करने जा रहा है. इस किताब में भारतीय सिनेमा के सौ सालों का सफर एवं आंचलिक सिनेमा की चुनौतियां, उपलब्धियों को रेखांकित किया गया है. दो सौ पृष्ठों की यह किताब शोध आलेखों की निधि है. समागम बीते दो वर्ष से इस किताब का प्रकाशन कर रहा है. समागम की योजना है कि आने वाले समय में वह पत्रकारिता पाठ्यक्रम की किताबों का प्रकाशन भी करे. समागम का हर अंक विशेषांक होता है. किसी विषय विशेष का चयन कर समागम पूरा अंक इसी विषय पर केन्द्रि करता है. अब तक प्रकाशित अंकों को सराहा गया है. समागम की इस कामयाबी के लिये उन विशेषज्ञों की भूमिका अहम हैं जिनके मार्गदर्शन एवं सलाह से समागम शोध की गंभीर पत्रिका बन चुकी है. समागम के इस नेचर की तारीफ देश की सबसे बड़ी समाचार पत्रिका इंडिया टुडे, शुक्रवार सहित अनेक साहित्यअनुरागी पत्रिकाओं ने की है.

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

साधूवाद के लिए धन्यवाद


पीपुल्स समाचार ने गलती सुधारी, धन्यवाद 

29 नवम्बर 2012 के अंक मेरा आर्टिकल में मध्यप्रदेश,  शिवराज मेरा बागबान शीर्षक से  प्रकाशित किया था 
किन्तु मेरा नाम नहीं प्रकाशित किया था। आज के अंक में भूल सुधार कर मेरे नाम का उल्लेख किया गया है।
 पीपुल्स समाचार के इस साधूवाद के लिए मेरी ओर से धन्यवाद।

मनोज कुमार 
वरिष्ट पत्रकार एवं मीडिया विश्लेशक, 
भोपाल   

बुधवार, 28 नवंबर 2012

मैं मध्यप्रदेश हूं..


मनोज कुमार 
मैं मध्यप्रदेश हूं...हिन्दुस्तान का ह्दय प्रदेश... मेरी पहचान है ... सतपुड़ा के घने जंगल...कल...कल कर बहती नर्मदा, ताप्ति, चंबल, बेतवा जैसी जीवनदायिनी नदियां...मेरी पहचान है अकूत खनिज सम्पदा...लौह, अयस्क, तांबा, जस्ता और हीरा...मैं एक प्रदेश ही नहीं हूं...एक परम्परा हूं...जीहां सर्वधर्म और समभाव की परम्परा का प्रदेश...आज ही के दिन अर्थात एक नवम्बर को मेरा जन्म हुआ था...साल उन्नीस सौ छप्पन में जब मुझे मध्यप्रदेश का नाम मिला तब मैं भारत के सबसे बड़े भूभाग वाला प्रदेश हुआ करता था...झाबुआ से लेकर बस्तर तक मेरी धडक़न महसूस की जा सकती थी...सन् दो हजार तक मैं भारत देश का इकलौता सबसे बड़ा भूभाग वाला प्रदेश था...इसी दिन मेरे जन्म के साथ मेरा विघटन भी हो गया...मुझसे अलग कर छत्तीसगढ़ को स्वतंत्र राज्य का दर्जा मिल गया...

चवालीस साल पहले जब मेरा जन्म हुआ था... तब मैं आज की तरह सुडौल नहीं था...न ही मेरी विकास की कोई कहानी थी...मैं बिखरा बिखरा सा था...मेरा निर्माण विंध्य, मध्यभारत, भोपाल रियासत एवं महाकोशल को मिलाकर हुआ...स्वप्रदृष्टा पंडित रविशंकर शुक्ल के हाथों मेरा पहले-पहल लालन-पालन हुआ...पंडित शुक्ल ने मेरे लिये सपने बुने थे... नियति को यह मंजूर नहीं था...बहुत थोड़े समय अपना स्नेह देकर वे हमेशा हमेशा के लिये मेरा साथ छोड़ गये...मेरी सल्तन के पहले मुख्यमंत्री होने का गौरव पंडित रविशंकर शुक्ल के खाते में है...दिन पर दिन गुजरते गये...एक के बाद दूसरे और दूसरे के बाद तीसरे हाथों ने मुझे तराशा... मुझे संवारा...मैं आकार लेने लगा...उन्नीस सौ छप्पन से दो हजार बारह तक मेरी विकास की गति थमी नहीं है...
इन चवालीस सालों के सफर की कहानी रोचक है...रोमांचक है...कई कई मोड़ आये...मैंने कई शासकों को देखा है और परखा है...सबने अपनी अपनी दृष्टि और समझ से मेरे विकास की रूपरेखा तय की...राज किसी भी दल ने किया... मुख्यमंत्री कोई भी रहा...हर बार सत्ता सम्हालने वालों ने मेरे विकास के लिये रास्ता ढूंढ़ा...कहते हैं पानी अपना रास्ता स्वयं बना लेता है...बस मैं भी पानी की तरह बहता रहा...जब जहां अवसर मिला...अपने विकास का रास्ता बना लिया...मेरी सल्तनत जिन हाथों ने सम्हाली उनमें सबसे कम दिन पन्द्रह दिनों के लिये मुख्यमंत्री के रूप राजा नरेशचन्द्र रहे...सर्वाधिक लम्बे समय तक मेरी सल्तनत सम्हालने वालों में मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह रहे...दिगिवजयसिंह ने दस वर्षों तक लगातार मुख्यमंत्री के रूप में बने रहे...

मेरी पहचान शांति के टापू के रूप में है...मेरी जनता बेहद संयमित है...उसका संयम गजब का है...नर्मदा का जल उसके रगो में है...लेकिन रंज आ जाये तो रंजिश भी निकाल लेती है...दो हजार तीन के राज्य विधानसभा चुनाव में उसने अपनी तकलीफों का बदला ले लिया...सत्ताधारी दल को बाहर का रास्ता दिखा दिया... इसी के साथ मेरा समय बदलता है...सत्ता बदली तो शासक भी बदले...दो हजार पांच में मेरा समय एकाएक बदल जाता है...यह वह समय है जब मेरे तारणहार शिवराजसिंह चौहान मेरे नये मुखिया होते हैं...किसान का यह बेटा मेरी तकदीर लिखने चला है...जब मैं शिवराजसिंह की चर्चा करता हूं...रोमांचित हो जाता हूं...ऐसा अनुभव तो मैंने अपने जन्म के बाद कभी नहीं किया...बेहद सरल...शांत और सौम्य शिवराजसिंह चौहान के एक के बाद एक फैसले ने मेरे ऊपर लगे बीमार और पिछड़े होने के दाग को धो दिया...मैं विकास की कुलांचे भरता एक आदर्श प्रदेश बन गया था...स्वर्णिम मध्यप्रदेश...

इन चवालीस बरस में मैं युवा हो गया...संभावनाओं का प्रदेश बन गया हूं...मेरा विकास एकाएक नहीं हुआ...एक सुनियोजित रणनीति बनायी गयी...विकास की संभावनाओं को तलाशा गया...विकास के बिन्दु तय किये गये...इस बात का खास खयाल रखा गया...कौन पात्र है...कौन अपात्र है...रेवडिय़ां नहीं बांटी गयी...चिन्ह...चिन्ह कर अपनों को नहीं दिया गया विकास योजनाओं का लाभ...योजनायें बनी आखिरी छोर पर बैठे आखिरी आदमी के लिये...सरकार उन तक चल कर गयी...उन्हें देखाभाला...उन्हें जानकारी देने के हर वो इंतजाम किया गया...कोशिश थी कि लाभ अधिकाधिक मिल सके...कहना ना होगा...आज मेरी जनता खुशहाल है...खुशहाली कागजों पर नहीं...वादों पर नहीं...भाषणों और बातों में नहीं...खुशी है मेरे हर नागरिक के घर ऑंगन में...

शिवराजसिंह सरकार के आठ वर्ष हो गये हैं...हर दिन, हर माह और हर बार...बार...बार...मुझे रोमांचित कर जाता है...इस आठ बरस का हर दिन मेरे लिये यादगार बन गया...एक उजास झाबुआ से मंडला तक छा गयी...नाउम्मीद चेहरे खिल उठे... विकास की गंूज को मेरे लोगों ने ही नहीं सुना...इसकी गूंज आस-पड़ोस के प्रदेशों में भी हुई...दलगत भाव शून्य हो गये और शिवराजसिंह की योजनायें उनके लिये आदर्श बन गयी...मैं तो अपने मुकाम की तरफ अपने तारणहार शिवराजजी की अगुवाई में आगे बढ़ ही रहा था...देश के दूसरे प्रदेशों के लोग भी मेरे राज्य की योजनाओं को पाकर निहाल हो उठे थे...मुझे सुख का अहसास कई बार हुआ जब देश के विविध मंचों पर मेरी सराहना हुई...मेरी योजनाओं को लागू करने की दूसरे राज्यों को नसीहत मिली... ...मेरे अपने प्रदेश की योजना पूरे देश के लिये नजीर बन गयी...मैं देश के लिये ऐसा नजीर बन जाऊंगा...इसकी कल्पना भी नहीं की थी...

बरसों इंतजार करने के बाद...कोई आया है जो आम आदमी का मुख्यमंत्री है... जिसमें मुख्यमंत्री होने का रत्तीभर दंभ नहीं है...कल वह जैसा था...आज भी वैसा ही है...उसकी बोली बात में नकलीपन नहीं है...वह नेता है...राजनीति नहीं जानता...वह मुख्यमंत्री है...प्रदेश का विकास चाहता है...वह अपने लोगों को मुस्कराता हुआ देख...स्वयं मुस्करा जाता है...दूसरों की आंखों में आंसू देखकर...उसके आंखें भी भीग जाती है...उसकी चिंता के केन्द्र में है छोटे अबोध बच्चे...वह मां और बहनें...जिन्होंने कभी दुनिया नहीं देखी...जिन्हें हर बार सब्जबाग दिखाया जाता रहा...आज उनके लिये आधा नहीं...पूरा आसमां है... मेरे लोग कैसे खुशहाल हो गये है...यह बताने चला तो शायद समय थम सा जाय...एक के बाद एक योजनायें...हर वर्ग के लिये...गरीब किसान, आदिवासी, महिला, युवावर्ग...ऐसे कौन लोग नहीं हैं जिनके हित में सरकार ने पहल न की हो...खुशहाली की कुछ बानगी देखे बिना न आप यकीन करेंगे...न मुझे चैन आएगा...

एक समय था जब मुझ तक पहुंचने वाली सडक़ें बदहाल थी...किस्से कहानी भी इन सडक़ों को लेकर कहे जाते थे...आज मेरी सूरत बदल रही है...सडक़ों पर गाडिय़ां फिसल रही है...इन फिसलती सडक़ों ने भी मेरे विकास को पंख दिया है...विदेशी पंूजी निवेशकों की क्या कहें...मेरे अपने लोग उद्योग-धंधे लगाने में डरते थे...आज सडक़ों के जरिये विकास की नयी इबारत लिखी जा रही है...विदेशी निवेशकों के लिये मध्यप्रदेश पहली पसंद हो रही है...शिवराजसिंह सरकार की कार्यशैली से अभिभूत निवेशक साथ चलने को तैयार हैं...बीते वर्षों में जो करार हुए, जो इकरार हुए...वह एक इतिहास है...व्यापार और उद्योग जगत में...सडक़ें अब विकास में बाधा नहीं हैं...

मेरे विकास की बानगी देखना है... तो चलो... मेरी भगिनी के आंगन से बात शुरू करते हैं...स्त्री को शक्तिवान और सामथ्र्यवान बनाने की बात नहीं...बरक्कत की कहानी गढ़ी गयी है...स्त्री आर्थिक रूप से सक्षम होगी... तभी सशक्त होगी...आर्थिक आजादी के लिये जरूरी है सत्ता में भागीदारी...पहली दफा मेरे सल्तनत में महिलाओं के लिये तैंतीस फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया...स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गयी...मेरे सरकार के इस पहल ने जैसे क्रांति की लौ जला दी...कहीं दबी...कहीं हताश स्त्री...मन में विश्वास का संचार हुआ...वह पूरी ताकत के साथ खड़ी हो गयी...यह स्त्री हमारे समय की लक्ष्मीबाई, अवंतिबाई और देवी अहिल्या हैं...शहर से लेकर गांव गांव में रहने वाली हर भगिनी अब स्वयं में ताकत है...स्वयं फैसला कर सकती हैं...

ताकत तो उस पिता को भी मिली है...जिसकी कमर झुक जाती थी समय से पहले...जिसके पेशानी पर होता था सयानी बिटिया की चिंता...ब्याह कैसे करे...कहां से लाये दाम...पढऩे-पढ़ाने की बात तो दूर की कौड़ी थी...अब मेरे प्रदेश के पिता नहीं हो रहे हैं असमय बूढ़े...मिट गयी है उनकी पेशानी से चिंता की लकीरें...बिटिया जा रही है स्कूल...जा रही है कॉलेज...सरकार ने चिंता अपने पास रख ली है...पिता को कर दिया है मुक्त...ब्याह भी कराती है सरकार...बिटिया को नाम दिया लाडली लक्ष्मी...अब बिटिया जिस चौखट जाएगी...उस घर की लक्ष्मी कहलायेगी...पढ़ी-लिखी समझदार बहू...साथ में है सरकार की मदद से जुटाये हजारों रूपये...पिता भला क्यों करे चिंता...सरकार ने दी है बिटिया को मुस्कान...अब हर घर आंगन में खिलखिला उठी है लाडली की मुस्कान... 

मेरे अन्नदाता जैसे निराशा के सागर में डूब उतर रहे थे...उनके सामने घनघोर अंधेरा था...रोशनी की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी...उनकी निराशा...आशा में बदल गयी...उनका खोया विश्वास लौट आया...यह विश्वास...यह आस दिलायी सरकार ने...उनके हाथों को थाम लिया...उनके आंखों के आंसू पोंछ लिये...कर्जे से मुक्त कर दिया...नये कर्जे में ब्याज की रकम मामूली कर दी गयी...जब सरकार ने हाथ थामा...तब प्रकृति दयावान बन गयी...घनघोर बारिश में किसान के सारे दुख बह गये...ट्रेक्टर-ट्रॉली में लदी फसलों को देख...रोता किसान मुस्करा उठा...समर्थन मूल्य ने किसान की संदूक को भरा दिया...आने वाले मौसम की चिंता तो दूर हुई...अब वह एक बार फिर अन्नदाता कहलाने में गर्व करने लगा...शिवराजसिंह सरकार का वादा था...खेती को लाभ का धंधा बनायेंगे...किसानी बन गयी लाभ का धंधा...

मेरे अन्नदाता जब मुस्काने लगे...अब बारी थी मेरे धरतीपुत्रों की...जंगलों, कंदरओं में जीवन बसर करने वालों के नाम पर लोग बदल गये...नहीं बदली तो धरतीपुत्रों की जिंदगानी...इस बार न कोई वायदा...न कोई बात...उनके नाम पर बनती गयी योजनायें...पहुंच गयी एक बार सरकार उनके द्वार...खुल गये बंद किस्मत के ताले...जिन्होंने कभी नहीं देखा था रेल...और न कभी देखा था बस...आज उनके बच्चे उडऩखटोले में बैठ...जा रहे हैं सात समंदर पार...पढ़ रहे हैं दुनिया की किताब...बनकर लौट रहे हैं लाट साहब...इंजीनियरिंग...मैनेजमेंट की पढ़ाई कर जी रहे हैं नईदुनिया की जिंदगी...जो रह गये घरों में...उनके घर हो गये रोशन...पानी और बिजली हो गया इंतजाम...सुविधाओं का मिल गया अंबार...एक नयी सुबह ने उनके जिंदगी में भर दी है रौशनी...
मेरे प्रदेश में बिटिया मुस्कायी...किसान खिलखिला उठा...झूम रहा है आदिवासीजन...ऐसे में मेरे बुर्जुग क्यों रहे अप्रसन्न...इनके लिये भी सरकार ने कर दिया बेहतरीन इंतजाम...अब वो जाएंगे तीर्थधाम...समय के पार...अनुभवों से लबरेज माता-पिता को दरकार थी श्रवण कुमार की...जिंदगी की आपाधापी में जूझते बेटे नहीं बन पाये श्रवण कुमार...ऐसे में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान खुद निकल पड़े बनकर श्रवणकुमार...बुर्जुगों को कराने चले तीर्थधाम...किसी ने दिया श्रवणरूपी शिवराजसिंह को आशीष...कोई माथा चूमकर हुआ निहाल...जीवन की आखिरी सांझ में यह उपहार...सभी के मुख से निकला शिव हमारे तारणहार...

मेरे लिये यह रोमांचकारी था...मेरे जीवन में यह पहली बार हो रहा था...जब कोई मुख्यमंत्री अपने घर अपने प्रदेश के लोगों को बुला रहा था...बातें कर रहा था...उनकी सुन रहा था...समझ रहा था...एक योजना इस बातचीत में बन रही थी...आम आदमी और मुख्यमंत्री निवास की दूरियां मिट गयी थी...हर आने वाले का मुख्यमंत्री के साथ अपनापन था...इस अपनेपन को नाम दिया गया पंचायत...सन् दो हजार सात में पहली दफा आदिवासी पंचायत का आयोजन हुआ...इसे लेकर उत्सुकता भी थी...अकुलाहट भी...किसी को खबर नहीं हो पायी...मुख्यमंत्री की यह पंचायत पूरे देश के लिये एक मिसाल बन गयी...इसके बाद तो सिलसिला चल पड़ा...कोटवार, कामगार, कामकाजी महिलायें, कुली, रेहटी वाले, शिल्पियों की, मछुवारों की... और यह सिलसिला जारी है...ये वो लोग हैं जिन्हें मुख्यमंत्री निवास तो दूर...कभी भोपाल आना भी नसीब नहीं हो पाता...आज उनके हिस्से में सुख आया है...वे मुख्यमंत्री के साथ खाना खा रहे हैं...साथ बैठकर सुख-दुख की बातें कर रहे हैं...अपने लोगों के साथ अपनेपन की इस शैली ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंंह का सभी को मुरीद बना दिया...

बात पंचायत और सुनने-सुनाने तक ही नहीं थी...लगातार कई पंचायतों के बाद मुख्यमंत्री के पास मेरे जख्म, मेरी सूरत साफ साफ थी...उन्हें इस बात का इल्म तो था कि आम आदमी के काम समय पर नहीं होते हैं...नल कनेकशन लेना हो...राशनकार्ड बनवाना हो...जाति प्रमाण पत्र लेना हो...जैसे कोई भी काम समय पर नहीं होता था...घंटों के काम दिनों में...और...दिनों के काम महीनों में भी कभी हो पाते थे और कभी नहीं भी...ऐसे में दुनिया में पहली दफा शिवराजसिंह सरकार ने लोकसेवा गारंटी अधिनियम अमल में लाने में कामयाब हो गये...काम तो तय था...काम करने का समय और दिन तय कर दिया गया...तंत्र को जवाबदेह बनाने का पुख्ता और मुकम्मल इंतजाम...यह एक कानून ही नहीं है बल्कि आम आदमी को राहत देने का मखमली रास्ता है...तंत्र को जवाबदेह बनना पड़ा...समय पर काम नहीं...तो दंड के भागीदार...लोकसेवा गारंटी अधिनियम मेरे राज्य का लोकप्रहरी बन गया...मेरे राज्य की लोकसेवा गारंटी अधिनियम की गूंज देशभर में हुई...अनेक राज्यों ने मेरे अधिनियम को जांचा-परखा...तत्काल से अपने अपने राज्यों में लागू कर दिया...जैसे मेेरे नागरिक सुखी हुए...वैसे उनके भी...मेरे राज्य में लागू हुए लोकसेवा गारंटी अधिनियम की सराहना संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर हुई...बकायदा सम्मान भी मिला...सुशासन मेरी पहचान है...क्योंकि मैं हूं स्वर्णिम मध्यप्रदेश... 
यह तो महज बानगी है मेरे विकास यात्रा की...विकास तो अभी शुरू ही हुआ है... खुशियां, हंसी, मुस्कान और आत्मसम्मान से भरा हर नागरिक मेरा गर्व है... मैं आज अपने जन्मदिन पर इठला सकता हूं... इतरा भी सकता हूं... इतने लम्बे समय की प्रतीक्षा के बाद... मैं चल पड़ा हूं स्वर्णिम मध्यप्रदेश की डगर पर...  
यह आलेख भोपाल से प्रकाशित अख़बार पीपुल्स समाचार में 29.11.2012 प्रकाशित हुआ है किन्तु मेरे नाम का उल्लेख नहीं किया गया  है।

सोमवार, 26 नवंबर 2012

मौत का सामान



मनोज कुमार
अभी अभी एक बुरी खबर मुझ तक पहुंची। मेरे दोस्त के पिताजी का देहांत हो गया। जितना दुख मेेरे दोस्त को था, उतना ही मुझे भी। सूचना पाते ही मैं घर पहुंचा तो खबर पाकर जितना दुखी था, उससे कहीं ज्यादा अब दुखी था। मैं और दो एक दोस्त ही वहां पहुंच पाये थे। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के लिये हम लोग कुछ इंतजाम करते कि इसके पहले ही दोस्त ने खबर दे दी कि मोहल्ले के एक व्यक्ति अंतिम संस्कार के क्रियाकलाप के साथ ही सामनों की व्यवस्था भी कर देते हैं। सो उन्हें कह दिया गया है। थोड़े समय में ही वे सब इंतजाम कर देंगे। मैं चुप रहा और उसकी हां में हां मिलाता रहा। थोड़ी देर में पंडितजी के वहां पहुंचने के पहले वह व्यक्ति सब सामान लेकर भी आ गया जिसकी जरूरत होती है। कुछ समय बाद विधि विधान से क्रिया सम्पन्न होने की प्रक्रिया षुरू भी हो गयी। दोपहर तक अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी हो गया। सब अपने अपने घरों की तरफ चल पड़े। मैं भी उनमें भी एक था। 

घर लौटते समय मन बोझिल था। दोस्त के पिता की मौत का दुख तो था ही, इससे कहीं ज्यादा दुख था रिष्तों के सिमटने का। मुझे याद है कि कभी मेेरे पिता और बाद में मां का देहांत हुआ। बात कोई दस साल पुरानी है। हमारे घर में किसी को खबर भी नहीं थी और दोस्त-परिचितांें ने मिलकर सारा प्रबंध कर दिया था। यहां रिष्तेदारों की कोई भूमिका नहीं थी क्योंकि हम अपनों से दूर रह रहे थे। एक वो समय था और एक यह समय है जब खुद को होकर जिम्मेदारी पूरी करनी पड़ रही है। ऐसा क्यों हुआ, यह सोचने की जरूरत है। षायद यही कारण है कि जो काम दोस्त, परिचित और रिष्तेदार किया करते थे, आज वह काम व्यवसाय के रूप में हो रहा है। यह सब दुखद है। रिष्तों का सिमटने का वक्त आ गया है। अब हम लोगों के बीच जीवंत संवाद का समय खत्म हो रहा है। विस्तार के साथ बाजार ने घेर लिया है। जीवन और मृत्यु भी बाजार की वस्तु बन गयी है। दुख अब कातर नहीं रह गया है बल्कि रस्मी बन चुका है। इतना रस्मी की कि दुख पर मुद्रा की छाप पड़ गयी है। पैसे दो और रस्म पूरी करो। पहले यह चलन सुख के समय था, अब दुख पर भी इसकी छाया पड़ गयी है। 

कभी सुना करते थे कि मृत्यु के समय किराये पर रोने वाले बुलाये जाते थे। सुनकर अचरज होता था। आज यह हाल हर घर की हो रही है। यह ठीक है कि रोने के लिये किराये पर लोग नहीं लिये जा रहे हैं लेकिन रस्म की षुरूआत होती दिख रही है। बाजार तो अपने लिये जगह बना ही लेता है और बना रहा है। सवाल यह है कि संवेदनाओं को बाजार के किस तराजू पर तौलें? संवेदनाओं का क्या कीमत हो सकती है? यहां अपने को बचाने के लिये बाजार पर आरोप मढ़ सकते हैं किन्तु सच यह है कि हम दूसरों के साथ दुख बांटने में पीछे रहते हैं तो कोई क्यों हमारा दुख बांटे। समय की कमी का एक बहाना है लेकिन जब हम दूसरों के लिये यह बहाना तैयार रखते हैं तो हमें भी इसके लिये तैयार रहना चाहिये। यह समय बेहद कठिन हो चला है। संवेदनायें मर रही हैं, जीवन स्नेह के लिये तरस रहा है। पैसा हर मर्ज की दवा बन गयी है। अब तो मौत का सामान भी बाजार उपलब्ध करा रहा है। रिष्तों की यह मौत हमारे समय की मौत है। रोज ब रोज अपराधिक वारदातों को इससे अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह समय के बदलाव का रिफ्लेषक्षन है जिसे हम अपना ही आइना भी कह सकते हैं। समय अभी बहुत बुरा नहीं हुआ है और ना ही बदला है। थोड़ा सम्हल जायें और रिष्तों को सम्हाल लें तो किराये के लोगों को हमारी मौत का सामान न सजाना पड़े।  

सोमवार, 19 नवंबर 2012

समागम का यह नया अंक
 मध्यप्रदेश एवं छग के सालगिरह पर केन्द्रित है। 
साथ में बेटी बचाओ अभियान पर मीडिया की भूमिका पर शोध पत्र  शामिल है।
अंक पर आपकी राय की प्रतिक्षा रहेगी 

अहा! सच में अहा

  अहा! सच में अहा देश की सुपरिचित पत्रिका ",अहा! ज़िंदगी" में छपना हमेशा से उत्साहित करता रहा है। कोई चालीस साल पहले "धर्मयु...