शनिवार, 30 नवंबर 2013

सवाल जिम्मेदारी क


-मनोज कुमार
आज के बच्चे हम लोगों की तरह सवाल नहीं करते हैं. वे अपने सवालों के जवाब ढूंढऩे के लिये मां-बाप से पहले इंटरनेट का सहारा लेते हैं. मेरी 14 साल की बिटिया भी इन बच्चों से अलग नहीं है लेकिन मैंने अपने परिवार का जो ताना-बाना बुन रखा है, उसमें इंटरनेट को ज्यादा स्पेस नहीं मिल पाता है और वह अक्सर मुझसे ही सवाल करती है. यह सवाल थोड़ा मेरे लिये कठिन था लेकिन सोचने के लिये मजबूर कर गया. भारत रत्न सचिन तेंदुलकर को एक व्यवसायिक विज्ञापन करते देख उसने पूछ लिया कि पापा, ऐसे में तो इस प्रोडक्ट की सेल तो अधिक होगी क्योंकि इसका विज्ञापन सचिन कर रहे हैं. मैंने कहा, हां, यह संभव है तो अब उसका दूसरा सवाल था कि भारत रत्न होने के बाद भी सचिन क्या ऐसा विज्ञापन कर सकते हैं? यह सवाल गंभीर था. कुछ देर के लिये मैं भी सोच में पड़ गया. फिर बिटिया से कहा कि ऐसा नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन क्यों? बिटिया के इस पूरक प्रश्र ने मुझे उलझा दिया. मैंने कहा कि सचिन जैसे लोग हमारे आदर्श होते हैं. वे जैसा करते हैं, समाज उसका अनुसरण करता है. यह ठीक है कि सचिन जिस प्रोडक्ट का विज्ञापन कर रहे हैं, वह गुणवत्तापूर्ण हो लेकिन इस बात की गारंटी स्वयं सचिन भी नहीं दे सकते हैं. ऐसे में उन्हें अब इस तरह के व्यवसायिक विज्ञापनों से स्वयं को परे रखना चाहिये. 

     बिटिया को मैं कितना समझा पाया या नहीं, मैं नहीं जानता लेकिन उसका यह सवाल पूरे समाज के लिये है. श्रीराम भगवान इसलिये कहलाये कि वे समाज के सवालों के सामने अपने व्यक्तिगत जीवन की भी परीक्षा ले ली तो महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता इसलिये कहा गया कि उनके कथ्य और कर्म में कोई अंतर नहीं था. वे सार्वजनिक जीवन में लोगों से अपेक्षा करने से पहले स्वयं उस पर अमल किया करते थे. आज सौ-डेढ़ सौ वर्ष बाद भी महात्मा गांधी पूरे संसार के लिये मिसाल बने हुये हैं. हजारों-लाखों साल बाद भी भगवान श्रीराम को हम आदर्श एवं चरित्रवान व्यक्तित्व के रूप में पहचानते हैं. यह ठीक है कि वह समय नहीं रहा लेकिन आदर्श व्यक्तित्व और उसके अनुगामी लोग तो हर काल और स्थिति में होते रहे हैं. सचिन महान क्रिकेटर हैं और उन्होंने अपनी प्रतिभा के बूते भारत को नयी पहचान दी. भारत ने भी उनकी प्रतिभा का सम्मान किया और उन्हें श्रेष्ठ सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया. अब सचिन की जवाबदारी है कि वह व्यवसायिकता से स्वयं को मुक्त करें और व्यवसायिक विज्ञापनों से स्वयं को परे कर लें. उनके इस एक फैसले से उनके प्रति लोगों का जो सम्मान का भाव है, वह और भी बढ़ेगा. ऐसा करना सचिन की मजबूरी नहीं बल्कि देश के प्रति जवाबदारी होगी क्योंकि सचिन के बारे में आज मेरी बिटिया ने सवाल किया है तो जाने कितने घरों में यह सवाल किये जा रहे होंगे.

    बहरहाल, भारत रत्न हो या पद्यविभूषण, पद्यश्री या अन्य कोई अलंकरण, यह सब सम्मान व्यक्ति की श्रेष्ठता के लिये दिये जाते हैं किन्तु यह सम्मान प्राप्त कर लेने के बाद सम्मानित व्यक्ति समाज के लिये रोल मॉडल बन जाता है. उसके कर्म और कथ्य से ऐेसी अपेक्षा की जाती है कि समाज उसका अनुसरण कर स्वयं को आदर्श बनाये. एक उदाहरण हमारे सामने सदी के नायक अमिताभ बच्चन का है. अमिताभ नायकत्व से बाहर निकल कर देश के अनेक परिवारों में बतौर बुर्जुग प्रवेश कर गये हैं. इन दिनों वे विनम्रता का जो एक नयी मिसाल समाज के सामने पेश कर रहे हैं, उससे उनके सम्मान में वृद्धि हो रही है. उन्हें भी इस बात का खयाल रखना चाहिये कि वे जिस तरफ चल पड़ेंगे, लाखों की संख्या में लोग उनके साथ हो लेंगे. संभव है कि किसी विज्ञापन से उन्हें लाखों का लाभ हो जाए लेकिन समाज का विश्वास दरकेगा तो उन्हें जो नुकसान होगा, उसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है. भरोसा समाज की सम्पत्ति है और इसी भरोसे को हम समाज का रोल मॉडल अर्थात आदर्श कहते हैं. स्मरण हो आता है कि अंग्रेजों से लड़ते समय महात्मा गांधी ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का अभियान चलाया तो देशभक्तों ने अपने अपने घरों से कपड़े निकाल कर आग के हवाले कर दिया. यह महात्मा गांधी के प्रति विश्वास था कि लोगों ने ऐसा किया. आज भी अपने आदर्श व्यक्तित्व के प्रति यह विश्वास बना हुआ है. जरूरी है कि सचिन हों या अमिताभ और भी वे सारे लोग जिन्हें समाज अपना आदर्श मानता है ये सब अपनी जवाबदारी समझें और समाज के भरोसे पर खरा उतरें ताकि सौ साल बाद भी लोग इनके कर्म और कथ्य का अनुसरण कर सकें. 

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

एक नयी सुबह की आस मे

-अनामिका
छत्तीसगढ़ माओवादी हिंसा का शिकार रहा है. कुछ महीने पहले हुये भीषण हादसे के बाद छत्तीसगढ़ समेत पूरा देश सिहर उठा था. यह एक भयानक हादसा था. अब जबकि राज्य में 2013 के विधानसभा चुनाव होना था तब लोगों में सहज आशंका थी कि यह चुनाव भी रक्तरंजित होगा और माओवादी चुनाव को निर्विघ्र सम्पन्न नहीं होने  देंगे. यह आशंका शासन-प्रशासन के साथ राजनीतिक और सामाजिक हल्कों में व्याप्त थी. इसी के मद्देनजर कड़े सुरक्षा के प्रबंध किये गये थे लेकिन इन सुरक्षा प्रबंधों को पहले भी माओवादी भेद चुके हैं सो इस बार भी आशंका थी कि कुछ बड़ा हादसा हो सकता है. सारी आशंकाओं और पूर्वानुमानों को धता बताते हुये राज्य में 2013 के विधानसभा चुनाव के लिये मतदान शांतिपूर्ण सम्पन्न हो गया तो यह एक चौंकाने वाली बात थी. यह माओवादियों के पस्त हौसले का सबब दिख रहा था तो छत्तीसगढ़ की जनता का हिंसा के खिलाफ लोकतंत्र पर विश्वास जताकर अहिंसक तरीके से विरोध किये जाने का संदेश भी मिला. यह सब कुछ इतना राहत देने वाला था कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि तूफान के आने के पहले की शांति के बीच तूफान का आना तो दूर सरकने की भी आवाज सुनाई नहीं दी.
छत्तीसगढ़ में माओवादियों का आतंक लगातार बढ़ता चला जा रहा है. यह बात भी अब किसी से छिपी नहीं है कि माओवादियों पर वर्तमान व्यवस्था पर भरोसा नहीं है. यही कारण है कि राज्य की कानून व्यवस्था को जब-तब भंग करने की मंशा से हिंसक वारदात करते रहे हैं. कुछ माह पहले जब कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को मौत के घाट उतारा तो यह आशंका और मजबूत हो चली थी कि आने वाले चुनाव में माओवादी कहर बरपा सकते हैं. इन सूचनाओं से माओवादियों का हौसला बढ़ा या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन यह तय है कि माओवादियों की हिंसक वारदातों से छत्तीसगढ़ की शांतिप्रिय जनता ऊब चुकी थी. वह नहीं चाहती थी कि उनका राज्य हिंसक गतिविधियों का केन्द्र बने और उनकी जिंदगी में रोज तूफान आये. इसी के चलतेे लोगोंने लोकतंत्र पर विश्वास जाहिर किया और हिंसा का जवाब अहिंसक ढंग से देते हुये भारी मतदान किया. छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में 75 प्रतिशत मतदान का होना इस बात का संकेत है कि राज्य की जनता पर माओवादियों का कोई प्रभाव नहीं हैं. हर आदमी का विश्वास लोकतंत्र पर है और वह एक निर्वाचित सरकार पर ही भरोसा करती है.
छत्तीसगढ़ में मतदाताओं ने जो साहस दिखाया और जो संदेश माओवादियों को दिया, उससे माओवादियों के हौसले पस्त जरूर होंगे. पिछले दो दशकों से लगातार बढ़ती हिंसक गतिविधियों ने कानून व्यवस्था को तार तार कर दिया था. लोग अब डरने और घबराने के बजाय इन हिंसक गतिविधियों से उबने लगे थे और उनके पास इससे छुटकारा पाने का एक ही रास्ता था कि कैसे भी हो, लोकतंत्र को विजयी बनाना है. इस चुनाव में सबसे दिलचस्प और अहम बात यह रही कि माओवादियों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी आदिवासी मतदाताओं ने भारी संख्या में मतदान कर यह बात स्थापित कर दी कि उन्हें अतिवादी नहीं बल्कि एक उनकी चुनी हुई सरकार चाहिये.
विधानसभा चुनाव 2013 के शांतिपूर्ण एवं कामयाबी के लिये राज्य एवं केन्द्र दोनों का सहयोग रहा. राज्य सरकार जमीनी हकीकत से वाकिफ थी तो केन्द्र सरकार ने पूरे साधन मुहैया कराकर माओवादियों के खिलाफ राज्य सरकार को हौसला दिया. माओवादियों के आतंक के बाद भी भारी मतदान ने यह बात भी साफ हो गई कि राज्य सरकार के कार्यों से मतदाताओं को कोई बड़ी शिकायत नहीं है. अब यह चुनाव परिणाम ही बतायेगा कि किसकी जय होगी और कौन पराजित लेकिन फिलहाल तो छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र की जय जय हो रही है. मतदाताओं की सक्रियता एवं निर्भयता से यह बात भी साफ हो जाती है कि आने वाला समय छत्तीसगढ़ का होगा, विकास का होगा और आज जो छत्तीसगढ़ का स्वरूप है, वह और चमकीला तथा दूसरों के लिये नजीर साबित होगा.

शनिवार, 16 नवंबर 2013

चुनाव में प्रेस और मीडिया का हस्तक्षेप


मनोज कुमार

भारत के स्वाधीन होने के बाद 1952 में पहला आम चुनाव हुआ। इसके बाद संविधान के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में प्रत्येक पांच वर्ष बाद निर्धारित समय में चुनाव कराये जाने की व्यवस्था की गई। लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने के लिये जिन संस्थाओं को संविधानवेत्ताओं ने अपनी स्वीकृति सहमति दी उनमें संसद एवं विधानसभाओं के साथ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में प्रेस को स्थान दिया गया। लोकतंत्र तथा समाज के प्रति प्रेस को जवाबदेह बनाया गया था जिसके पीछे दृष्टि पारदर्शिता की थी क्योंकि प्रेस ही एकमात्र ऐसी संस्था है जो राग-द्वेष से परे रह निरपेक्ष भाव से अपनी भूमिका का निर्वहन करती है। स्वाधीनता पूर्व के संघर्ष में भारतीय समाज ने प्रेस की भूमिका को देखा और समझा था अत: प्रेस पर विश्वास सहज हो जाता है। 
भारत वर्ष में चुनाव प्रक्रिया आरंभ होने के साथ ही प्रेस का संजीदा हस्तक्षेप रहा है। चुनाव प्रक्रिया निर्बाध रूप से पूर्ण हो, मतदाताओं को सही और उचित जानकारी मिल सके, एक स्वच्छ सरकार का निर्माण हो तथा समय-समय पर प्रेस सरकार को उत्तरादायी बनाने के लिये उसे सजग करता रहे। प्रेस की इस भूमिका को समाज ने स्वीकार किया और प्रेस के माध्यम से मिलने वाली सूचना पर उसका ऐतबार रहा। 1952 के चुनाव के बाद से निरंतर प्रेस का हस्तक्षेप लगातार बढ़ता गया। प्रेस कई भागों में विभक्त हो गया और एक खास विचारधारा के साथ उसकी भूमिका भी बंट गयी। प्रेस अपने अपने निहित विचारधाराओं के साथ चुनाव में उतरने वाले प्रत्याशियों एवं दलों को चिन्हित करने लगे तथा झुकाव भी उनकी ओर दिखने लगा। इन सबके बावजूद चुनाव में प्रेस राष्ट्रीय एकता, भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता के खिलाफ खड़ा दिखाई देता रहा।
यह वह समय था जब देश में विकास के लिये पंचवर्षीय योजनाओं की शुरूआत हो रही थी। विकास के साथ आर्थिक अनियमितताओं की खबरें भी आने लगी थी। यह वही समय था जब प्रेस आधुनिक सुविधाओं से लबरेज नहीं था। यह वही समय था जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विस्तार नहीं हो पाया था और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नाम पर रेडियो था। इस पर भी सरकारी ठप्पा लगा हुआ था और यह अविश्वसनीय भले ही नहीं था किन्तु विश्वास भी नहीं था। इसका उपयोग समाज केवल सूचना पाने के लिये करता था। यह वही समय था जब समाचार पत्रों का व्यापक प्रभाव एवं प्रसार था। कोई चार पन्ने तो अधिकतम आठ पन्ने के श्वेत-श्याम समाचार पत्रों का प्रकाशन होता था। प्रेस की एक सीमा था और उसका अपना आत्मनियमन। दुख और दुर्घटना की खबरें संजीदा होकर प्रकाशित की जाती थी। स्वाभाविक है कि जब प्रेस के पास आत्मनियमन होगा तो वह चुनाव में भी अपनी ही लक्ष्मण रेखा को लांघने का दुस्साहस नहीं करेगी। 
आत्मनियमन से बंधे पे्रस की यह भूमिका समाज के लिये आदर्श उदाहरण हुआ करती थी। आत्मनियमन और प्रेस की स्वयं की खींची लक्ष्मणरेखा 70 के दशक के आते-आते दरकती हुई दिखायी देने लगी। सन् 75 के आपातकाल के बाद तो जैसे प्रेस का चेहरा एकाएक बदल गया। आत्मनियमन का बंधन खत्म हो गया और लक्ष्मणरेखा को लांघने में प्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ समाचार पत्र सरकार की चाटुकारिता में ऐसे लग गये कि प्रेस पर समाज का विश्वास अविश्वास में बदलने लगा। आपातकाल में सरकार के नियंत्रण एवं हमले ने प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला किया। जो प्रेस डरा नहीं, वह खत्म होने के कगार पर आ गये और जिसने प्रलोभन स्वीकार कर लिया, वे चमक गये। इसके अनेक उदाहरण इतिहास के पन्नों पर दर्ज हंै जिन्हें पढ़ा और समझा जा सकता है।
सन् 75 के आपातकाल के बाद प्रेस का चाल, चरित्र और चेहरा बदलता हुआ दिखाई देता है। आपातकाल के बाद होने वाले चुनाव में सत्ताधीश पार्टी कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ लहर चलती है। गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन का रास्ता साफ हो जाता है और देश में पहली दफा गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हो जाता है। इस गैर-कांग्रेसी सरकार की उम्र बहुत छोटी होती है। आपसी मतभेद और मनभेद में जल्द ही कांग्रेस सरकार की वापसी होती है। इस पूरी प्रक्रिया में प्रेस भी पक्षकार बन जाता है। यह वही प्रेस है जो सन् 75 के आपातकाल के पहले तक निरपेक्ष था।
सन् 75 के बाद के सालों में टेक्रालॉजी के विकास का क्रम शुरू होता है और इस विकास का लाभ प्रेस को मिलता है। आयतित कागजों पर प्रतिबंध समाप्त नहीं होने के कारण कुछ वजनदार प्रेस ही अच्छे कागज का उपयोग करते हैं तथा अखबारों के पन्नों की संख्या भी बढ़ जाती है। अधिसंख्य अखबार देशी कागज पर ही निर्भर रहते हैं और कागज की कोटा पद्वति के कारण उन्हें सीमित मात्रा में ही कागज उपलब्ध हो पाता है। ऐसे में समाचार पत्र के पन्नों की संख्या बढ़ नहीं पाती है। 
प्रेस के लिये यह स्थिति 80 के दशक तक जारी रहती है लेकिन इसके बाद से स्थिति में एकदम से परिवर्तन होता है। 1982 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजे सहानुभूति लहर से कांग्रेस की सत्ता में जोरदार वापसी होती है और इसी के साथ प्रेस स्पष्ट रूप से सत्ता समर्थक एवं सत्ता विरोधी के रूप में पहिचाने जाते हैं। स्वाभाविक है कि प्रेस की यह भूमिका और हस्तक्षेप चुनाव में भी होता है। बाद के वर्षों के चुनाव में प्रेस का यह रोल और अधिक प्रभावी हो जाता है।
चुनाव के समय प्रेस को विज्ञापनों के रूप में आर्थिक सहायता देकर उन्हें अपने पक्ष में करने का प्रयास ही प्राथमिक उद्देश्य होता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अचानक से राजनीति में आने वाले राजीव गांधी ने चुनाव में विज्ञापनों के स्वरूप में क्रांतिकारी परिवर्तन कर दिया। उनके पहले चुनाव प्रचार सामग्री में सामाजिक मुद्दे, विपक्ष या सत्तापक्ष की विफलता आदि-इत्यादि होती थी जिसे बदलकर सांप-बिच्छू जैसे विज्ञापन बनाये गये। भारतीय समाज के पाठकों की मानसिकता एकदम भिन्न होती थी सो उनसे इन विज्ञापनों को लेकर कांग्रेस को कोई बड़ा लाभ नहीं मिला।
1952 से लेकर 1975 तथा 75 लेकर 90 तक की स्थितियां, चुनाव और प्रेस की भूमिका की समीक्षा करें तो पहले दौर में प्रेस निरपेक्ष होकर राजनीतिक दलों की देश के प्रति प्रतिबद्धता, आम आदमी के हक में किये गये कार्यों एवं दलगत प्रत्याशी की खूबी-खामियों को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते थे ताकि मतदाता सक्रिय एवं बेदाग जनप्रतिनिधि को चुन सके। दूसरे दौर में प्रेस की समाज के प्रति यह प्रतिबद्धता कम होती नजर आती है और चुनाव में वह निरपेक्ष नहीं रह पाता है। वह दलगत राजनीति के पक्ष या विपक्ष में खड़ा दिखता है।
90 के दशक में प्रेस मीडिया में परिवर्तित हो जाता है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अवतरित होता है। समाचार पत्रों के कलेवर एवं पृष्ठ संख्या में एकाएक वृद्धि होने लगती है। लगभग पूरा का पूरा समाचार पत्र रंगीन हो जाता है। समाचार पत्रों की इस रंगीनियत में प्रेस की लक्ष्मणरेखा स्वयंमेव टूटने लगती है और आत्मनियमन काफूर हो जाता है। दुर्घटना कितनी बड़ी क्यों न हो, अब वह भी रंगीन होती है जैसा कि कोई उत्सव हो। मरने वालों की संख्या को अतिरंजित कर सज्जा कर प्रस्तुत किया जाता है। दरअसल, यह परिवर्तन उसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से होड़ लेने के लिये बाध्य करने के कारण होता है। इधर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का नया अनुभव पाठकों से दर्शकों में बदल रहे मतदाताओं को रोमांचित करता है। 
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने आरंभिक दिनों में बेहद संतुलित होता है लेकिन चैनलों के विस्तार और स्वयं को सबसे ज्यादा कामयाब दिखाने की होड़ में संतुलन आहिस्ता आहिस्ता नदारद होने लगता है। कुछ ऐसी खबरों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जगह दे दी जाती है जिससे फौरीतौर पर तो खबर दिखाने वाले चैनल की जयकारा होती है लेकिन जब हकीकत सामने आता है तो चैनल की भद पिटती है। ऐसे भद पिटने से चैनलों के चरित्र में कोई सुधार नहीं होता है अपितु उन्हें यह भाने लगता है और यह उनका स्थायी चरित्र बन जाता है। समाज को आईना दिखाने की जवाबदारी जिनकी होती है, वे खुद को आईना दिखा रहे होते हैं।
प्रेस और मीडिया की इसी आपाधापी में शुरू होता है पेडन्यूज का खेल। 90 के दशक के बाद से आहिस्ता आहिस्ता पेडन्यूज के मामले उघडऩे लगते हैं। ऐसा नहीं है कि पेडन्यूज इसी दशक से आरंभ हुआ बल्कि हर चुनाव में पेडन्यूज होता रहा है लेकिन कुछ नैतिकता के साथ। पूर्व में जैसा कि उल्लेख किया गया कि आपातकाल के बाद सरकारी नियंत्रण ने प्रेस की कमर तोडऩे का उपक्रम किया तो पेडन्यूज की परम्परा वहीं से डल गयी थी। फर्क इतना था कि तब समाचार पत्रों का प्रकाशन पेडन्यूज के लिये ही नहीं होता था, कुछ प्रतिशत सामाजिक जवाबदारी भी होती थी और ऐसे समाचारों को कतई प्रकाशित नहीं किया जाता था जो समाज के हित के विपरीत हों।
बहरहाल, इसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने चुनाव सर्वे का सिलसिला आरंभ किया। इसे ओपिनियन पोल, एक्जिट पोल आदि-इत्यादि कहा गया। भारतीय समाज के लिये यह नया अनुभव था। यह जान लेना कि इस बार के चुनाव में मतदाता किसे चुन रहे हैं अथवा अपने खराब प्रदर्शन के बाद भी अमुक सत्ताधारी दल सत्ता में वापसी कर रही है। इन सर्वे का सच ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सका। एक के बाद एक चैनल सर्वे करने लगे। एक-दूसरे के सर्वे को चुनौती देने लगे। सत्ताधीशों को यह उपक्रम भाने लगा तो अपने पक्ष में मतदाताओं को करने के लिये मनपसंद सर्वे कराने लगे। मतदाताओं का इन सर्वे से मोहभंग होने लगा क्योंकि ज्यादतर सर्वे अपने बताये परिणामों पर खरे नहीं उतर सके। वास्तव में पेडन्यूज का यह एक और दूसरा बड़ा रूप है।
सन् 2000 से लेकर 2013 तक के चुनावों में प्रेस की भूमिका की पड़ताल करें तो सहसा यकिन नहीं होता कि यह वही प्रेस है जिसने सीमित साधनों में अंग्रेज शासन को भारत छोडऩे के लिये मजबूर कर दिया था। खैर, देश का चुनाव आयोग चुनाव में निष्पक्षता कायम रखने और प्रेस पर नियंत्रण पाने के लिये अनेक स्तर पर प्रयास कर रहा है। पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने जो प्रयास किये थे आज वह प्रयास और सख्ती के साथ किये जा रहे हैं।
प्रेस और मीडिया के बाद समाज में एक नये संचार माध्यम का उदय होता है जिसे न्यू मीडिया या सोशल मीडिया के नाम से पुकारा गया। अपनी आरंभिक अवस्था में होने के बावजूद इस नये संचार माध्यम का वजूद दिखने लगा। युवा वर्ग में इस माध्यम को लेकर जिज्ञासा थी तो राजनीतिक दलों को कम खर्च, कम समय और प्रभावशाली ढंग से युवाओं के बीच पहुंचने का सशक्त माध्यम मिल गया। प्रेस और मीडिया के दुरूपयोग के बाद राजनीतिक दलों ने इस नये संचार माध्यम को भी अपने राजनीतिक लाभ का हथियार बनाना आरंभ किया। इस नये संचार माध्यम के स्वरूप को बिगाडऩे की कोशिश भी हुई। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि कम अनुभव और कम समझ रखने वाले भी राजनीतिक दलों में बंटते चले गये और प्रेस तथा मीडिया में जो शालीनता की एक मर्यादा थी, वह इस नये संचार माध्यम में तार-तार होती गयी। कहना न होगा कि यह माध्यम समाज के लिये आने वाले समय में जितना फायदेमंद होगा, उससे कहीं ज्यादा नुकसानदेह भी। जरूरी होगा कि इस पर भी नियंत्रण लगे।
चुनाव आयोग की सख्ती से अनाप-शनाप होने वाले चुनावी खर्चों पर लगाम लगती दिखाई दे रही है। प्रेस और मीडिया को विज्ञापनों के जरिये लुभाने की कोशिश करने वाले राजनीतिक दलों को तब और झटका लगा जब आयोग ने रेडियो एवं सोशल मीडिया पर भी नियंत्रण का फरमान जारी कर दिया। यही नहीं, तमाम विरोधों के बावजूद पहली दफा चुनाव आयोग ने 2013 के पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में 11 नवम्बर से चुनाव परिणाम आते तक 8 दिसम्बर 2013 तक किसी भी तरह के चुनावी सर्वे पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह कदम अनुचित नहीं कहा जा सकता है। आयोग के इस प्रतिबंध पर चर्चा करने से ज्यादा जरूरी है प्रेस और मीडिया का स्वयं का आत्मलोचन। जिस प्रेस और मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है, जिस प्रेस और मीडिया के कंधे पर शासन और सरकार को सजग रखने की जवाबदारी है, जो स्वयं समाज का आईना है, आज उस पर ही नियंत्रण हो रहा है तो क्यों?

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

पेड-न्यूज बनाम बिकी हुई खबर


मनोज कुमार

पत्रकारिता अपने आरंभ से ही आरोपों से घिरी रही है. पत्रकारिता पर यह आरोप उसके कार्यों को लेकर नहीं बल्कि पत्रकारिता की सक्रियता से जख्मी होते लोग आरोप लगाते रहे हैं. पत्रकारिता पर जैसे-जैसे आरोप तेज होता गया, पत्रकारिता उतनी ही धारदार होती गयी. किसी समय में पत्रकारिता पर पीत पत्रकारिता का आरोप लगता था. पीत पत्रकारिता अर्थात पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किसी के खिलाफ अथवा पक्ष में लिखा जाना. अंग्रेजी में इसे यलो जर्नलिज्म कहा गया. समय गुजरने के साथ पीत पत्रकारिता अथवा यलो जर्नलिज्म का अस्तित्व ही समाप्त हो गया लेकिन लगभग दो दशक पहले पत्रकारिता के समक्ष पेडन्यूज नाम एक नया आरोप सामने आया. देहात से दिल्ली तक सबकी जुबान पर पेडन्यूज नामक का एक कथित जुर्म पत्रकारिता के साथ चिपका दिया गया. पेडन्यूज क्या है, जब यह किसी से पूछा जाये तो शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो इसका सही और सटीक जवाब दे सके. पेडन्यूज अंग्रेजी का शब्द है और मैं एक पत्रकार होने के नाते इस शब्द का हिन्दी अर्थ तलाश करने में लग गया. किसी ने कहा कि पेडन्यूज का अर्थ बिकाऊ खबर है तो किसी ने इसे बिकी हुई खबर कहा लेकिन इन दोनों से पेडन्यूज का अर्थ स्पष्ट होता नहीं दिखता है. 

पत्रकारिता में पनप रहे पेडन्यूज नाम की बीमारी का इलाज कराने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर बहस चल रही है. हर कोई पत्रकारिता की इस बीमारी को दूर कर देना चाहता है लेकिन यह बीमारी सबको भा रही है. बहरहाल, पेडन्यूज के बारे में मैंने जितना जाना-समझा, उसके आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि हिन्दी पत्रकारिता के लिये पेडन्यूज बना ही नहीं है. अंग्रेजी का शब्द है और अंग्रेजी जर्नलिज्म के लिये ही यह मुफीद है क्योंकि हिन्दी पत्रकारिता के लिये यह होता तो पहले की तरह हिन्दी में पीत पत्रकारिता जैसा कोई नाम मिल गया होता. खैर, अंग्रेजी का ही जुमला सही लेकिन सच है कि समूची पत्रकारिता इस आरोप से घिरी हुई है. एक और बात साथियों से चर्चा में आयी कि न्यूज से किसी का महिमामंडन या छीछालेदर नहीं किया जा सकता है अत: पेडन्यूज जैसा कोई फ्रेम उचित नहीं है. समाचार ताजा स्थिति की सूचना का प्रारंभिक चरण होता है अत: यहां वह गुंजाईश नहीं होती है कि समाचार को बेचा जा सके.अपितु समाचार विश£ेषण, टिप्पणी, सम्पादकीय अथवा लेख के माध्यम से किसी का महिमामंडन या छीछालेदर करना सहज होता है. 

इस समय जिन पांच राज्यों में चुनाव प्रक्रिया शबाब पर है, वहां पेडन्यूज पर नियंत्रण पाने के लिये चुनाव आयोग ने पहरा बिठा दिया है. कुछ राज्यों में चुनाव आयोग तक शिकायतें पहुंच चुकी हैं और शायद यह क्रम जारी रहेगा. सवाल यह है कि पेडन्यूज की परख कैसे हो? इम्पेक्ट फीचर और एडवाटोरियल को क्या पेडन्यूज की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा? इससे भी एक अहम सवाल यह है कि क्या पेडन्यूज पर नियंत्रण चुनाव की बेला में ही होगा इसके बाद कोई रोक नहीं होगी? पेडन्यूज क्या पत्रकारिता के उद्देश्यों को प्रभावित नहीं करती? सवाल अनेक हैं और पेडन्यूज पर नियंत्रण की कोशिशें एक निश्चित समय-सीमा के लिये नहीं बल्कि हमेशा के लिये होना चाहिये. मीडिया समाज का दर्पण है और दर्पण ही दागदार हो जाये तो चेहरा साफ कैसे दिखेगा. मीडिया की विश्वसनीयता दांव पर है और यह विश्वसनीयता तभी वापस आ सकती है जब पेडन्यूज जैसी बीमारी से मीडिया को मुक्त किया जा सके.

पेडन्यूज को एक बड़े विस्तार के रूप में ओपिनियन पोल को देखा जा सकता है. एक राय है कि यह चुनावी सर्वे किसी शोध का नहीं बल्कि शो का नतीजा होता है. लगभग 90 के दशक के आसपास से श्ुारू हुआ चुनावी सर्वे पहले पहल तो लोगों को लुभाने लगा लेकिन इस सर्वे की विश्वसनीयता कभी नहीं रही. लाखों मतदाताओं के बीच से सौ-पचास लोगों की राय पर परिणाम किसी भी हालत में विश्वसनीय तो हो ही नहीं सकता. बाद के सालों में सर्वे करने वालों की तादात बढ़ती गयी और पेड-सर्वे की गंध आने लगी. पेडन्यूज की तरह पेड सर्वे भी मीडिया में महामारी की तरह पनप रही है और इस पर रोक लगाना चाहिये ताकि कल कोई ना कहे बिकाऊ मीडिया या बिकी हुई...

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

मीडिया में आत्महत्य


मनोज कुमार

भोपाल में हाल ही में पत्रकार राजेन्द्र राजपूत ने तंत्र से तंग आकर आत्महत्या कर ली। ऐसा करने वाले राजपूत अकेले नहीं हैं। मीडिया वाले अनेक वेबसाइट पर जांचा तो देखा कि हर प्रदेश में एक राजेन्द्र राजपूत हैं। कुछेक राजेन्द्र के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं तो कुछेक अभी मुसीबत से घिरे हुये हैं। यह आश्चर्यजनक ही नहीं, दुखद है कि जिन लोगांे ने समाज को जगाने और न्याय दिलाने की शपथ लेकर फकीरी का रास्ता चुना है, आज उन्हें मरने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। सरकार गला फाड़-फाड़ कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई दे रही है और पत्रकार एक के बाद एक जान देने के लिये मजबूर हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का यही सिला है तो पराधीन भारत ही ठीक था जहां गोरे जुल्म करते थे लेकिन शिकायत तो यह नहीं थी कि अपने लोग ऐसा कर रहे हैं। स्वाधीन भारत में पत्रकारों का यह हाल देखकर यह सोचना लाजिमी हो गया है कि आने वाले दिनों में पत्रकार नहीं, प्रोफेशनल्स ही मिलंेगे। और ऐसी स्थिति में पत्रकार मिले भी क्यों? क्यों वह समाजसेवा भी करे और बदले में जान भी गंवाये। एक प्रोफेशनल्स के सामने कोई जवाबदारी नहीं होती है। वह टका लेता है और टके के भाव काम कर खुद को अलग कर लेता है। तंत्र को उससे कोई शिकायत नहीं होती है और वह तंत्र से पूरा लाभ लेता है।

पत्रकारों की इस ताजा स्थिति की जानकारी प्रखर वक्ता और केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारीजी को भी होगी। उनकी तरफ से या मंत्रालय की तरफ से अब तक पत्रकारों की सुरक्षा के लिये अथवा दोषियों पर कार्यवाही के लिये कोई संदेश नहीं आया है। इस सवाल पर शायद जवाब होगा कि यह मामला राज्यों का है और राज्य शासन के मामले में हस्तक्षेप करने का हक केन्द्र को नहीं है। इन स्थितियों में ऐसे ही जवाब की उम्मीद की जा सकती है। खैर, सरकारें तो अपनी तरह से ही काम करती हैं। शिकायत तो उस समाज से है जिसके लिये पत्रकार जूझते और मरते हैं। हाल ही में प्राकृतिक आपदा फैलिन के समय जब लोग टेलीविजन को निहार रहे थे, सूचना पाने के लिये आतुर थे तब पत्रकार ही ऐसा शख्स था जो अपनी जान की परवाह किये बिना जन-जन तक सूचना दे रहा था। उनकी कुशलता के लिये आगाह और सजग कर रहा था। आज उसी पत्रकार की मौत पर समाज खामोश है। उसे इस बात की चिंता नहीं है कि सीमा पर सेना और समाज में पत्रकार ही उसके रक्षक हैं और रक्षक जब हताशा के पायदान पर पहुंच जाये तो आगे की स्थिति समझ लेना चाहिये।

पत्रकार जब अपना दायित्व करते हुये मौत के मुंह में समा जाते हैं तो वह शहीद होने के बराबर होता है। जिस तरह सीमा पर दुश्मनों से दो-दो हाथ करते हुये सैनिक शहीद हो जाते हैं तो हमारा सीना गर्व से फूल जाता है और जब पत्रकार शहीद हो जाता है तो कम से कम पत्रकार बिरादरी का सीना गर्व से फूल जाता है। दुख इस बात का है कि पत्रकार शहीद नहीं हो रहे हैं बल्कि उन्हें मरने के लिये मजबूर किया जा रहा है। यह एक जागरूक समाज के लिये मामूली सवाल नहीं है बल्कि तंत्र को सजग बनाये रखने वाले समाज के प्रहरी जब खतरे में हो तो आवाज हर तरफ से उठना चाहिये कि आखिर ऐसा क्यों। मुझे विश्वास है कि पत्रकारांे को मरने के लिये समाज यूं ही नहीं छोड़ेगा बल्कि उनकी भी खैर-खबर लेगा जो इसके लिये दोषी हैं। समाज का चैथास्तंभ इस समय खतरे में है और चैथास्तंभ ही ढहने लगा तो समूचा लोकतांत्रिक ताना-बाना ध्वस्त हो जाएगा। खतरे की शुरूआत में ही रोक लिया जाये तो बेहतर।

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

विजय का दशहरा


मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश£ेषक
भारत वर्ष में बस्तर और कुल्लू का दशहरा पर्व संसार भर में ख्यात है. दोनों स्थानों में मनाये जाने वाले दशहरा पर्व की अपनी अपनी विशेषतायें हैं. इस बार बस्तर का दशहरा पर्व कुछ अलग ही मायने रखता है. बस्तर का इस वर्ष का दशहरा पर्व सही अर्थों में विजय का दशहरा पर्व कहा जा सकता है. कुछ महीने पहले ही बस्तर की हरी-भरी भूमि पर जो रक्तपात हुआ और इसके पहले जो रक्तपात होता रहा है, वह दिल दहला देने के लिये कम नहीं है. पूरा देश इस रक्तपात की घटनाओं से जख्मी है और हतप्रभ भी. ऐसी विषम स्थितियों में भी आदिवासियों द्वारा अपने परम्परागत दशहरा पर्व को उसी उत्साह से मनाये जाने को विजय का दशहरा ही कहा जा सकता है. एक मामूली बम फटने के बाद जब लोग दुबक जाते हैं, बम फटने की आवाज देर तक डराती रहती है तब बस्तर की धरती और उसके जन बार बार के रक्तपात से न सहमते हंै, न सिहरते हैं बल्कि दुगुने उत्साह के साथ स्वयं को खड़ा कर लेते हंै. बस्तर के आदिवासियों का यह उत्साह केवल उत्सव का उत्साह नहीं है बल्कि जीवन का उत्साह है जो समूचे संसार को एक नया पाठ पढ़ाता है. 

बस्तर में पिछले दशकों में निरंतर आतंक के साये में रहा है. नक्सलियों और तंत्र के साथ मुठभेड़ के बीच जो रक्तपात होता रहा है, वह जनपदीय समाज को भयभीत किये हुये है. जंगलों के बीच जी रहे आदिवासियों के मन में भी भय न हो, यह कहना मुश्किल है. सरकारें बदलती रहीं और हर सरकार ने बस्तर के आदिवासियों का लेखा भी बदलने की कोशिश की. इन कोशिशों से बस्तरिया आदिवासियों का जीवन कितना बदला या नहीं बदला, यह तो कहना मुश्किल है लेकिन उनका उल्लास से भरे आदिम मन को कोई तंत्र, कोई सरकार नहीं बदल पायी, यह दावे के साथ कहा जा सकता है. बरसों पुराने परम्परागत बस्तर दशहरे के उत्साह को देखकर कोई अंदाज नहीं लगा सकता कि इस जमीन पर कुछ महीने पहले आतंक ऐसे पसरा था, मानो समय थम गया हो. समय को उसी गति से जीने और चलने देने की जीजिविषा आदिम समाज में अपनी उत्पत्ति के समय रही होगी, वह ताप आज 21वीं सदी में भी देखने को मिल रहा है.

बस्तर दशहरा दो-एक दिन का उत्सव नहीं होता है और न ही प्रतीकात्मक रूप से रावण का पुतला जलाने की रस्मअदायगी होती  है. बस्तर दशहरा का उत्सव पूरे पचहत्तर दिन का होता है. पूरे विधान के साथ जिसमें आम आदमी से लेकर राज परिवार तक शामिल होता है. बस्तर दशहरे के लिये बनाये जाने वाले रथ के लिये आदिम समाज जुट जाता है. इस विशालकाय बस्तर रथ के निर्माण में जुटे आदिवासीजनों का उत्साह देखने योग्य होता है. बस्तर दशहरे का रथ भोपाल में बने मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय  एवं राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में भी देखने को मिल जायेगा. 75 दिनों के इस उत्सव का उल्लास और भी पहले से शुरू हो जाता है. इस उल्लास में कोई खलल डाले, यह आदिम समाज को मंजूर नहीं है. जो रक्तपात हो रहा है, बस्तर के घने जंगलों में आतंक की जो सरसराहट है और जो इस उत्सव में बाधा पैदा कर सके, वह स्थितियां भी हैं लेकिन आदिम समाज इस सबसे बेफिकर हंै. उनके लिये हर सांझ दुख बिसराने के लिये होता है और हर सुबह वह प्रकृति का स्वागत करता है, मुस्करता है. उसके पास पीछे देखने के लिये कुछ भी नहीं होता है. इस बार के दशहरे को लेकर जनपदीय समाज में भले ही आशंका रही हो लेकिन आदिम समाज हमेशा से आशा में जीता रहा है. बस्तर दशहरे की गमक और खनक इस बार भी वैसा ही है, जैसा कि परम्परागत रूप से बीते अनेक दशकों से रहा है. बस्तर का यह दशहरा सचमुच में विजय का दशहरा है जो सिखाता है कि तम से कैसे लड़ें, कैसे आतंक को आशंका से नहीं आशा से निपट लें. बस्तर का यह दशहरा पर्व समूचे संसार को आतंक के खिलाफ एक संदेश देता है आओ, हम सब मिलकर रोज पैदा हो रहे दशानन का वध करें, तम को दूर कर उजाले का दीपक जलायें.

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

मजबूरी के गांधी

 
-मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक 

महात्मा गांधी की जनस्वीकार्यता पर कभी कोई सवालिया निशान नहीं लगा. महात्मा द्वारा बताये गए  सादा जीवन, उच्च विचार लोगों को हमेशा से शालीन जीवन के लिये प्रेरित करते रहे हैं. मांस-मदिरा के सेवन से दूर रहने की शिक्षा एवं अङ्क्षहसा के बल पर जीने के जो रास्ते महात्मा ने अपने जीवनकाल में बताये थे, वह हर भारतीय के लिये आजीवन आदर्श रहे हैं. भारतीय ही नहीं, दुनिया के लोगों को भी महात्मा का बताया रास्ता जीने का सबसे सहज एवं सुंदर रास्ता लगा है. इससे परे एक-डेढ़ दशक में महात्मा गांधी के प्रति राजनीतिक दलों की स्वीकार्यता अचरज में डालने वाली है.
आज 2 अक्टूबर को हर वर्ष की तरह जब हम  महात्मा गांधी की जयंती का उल्लास मना रहे हैं और इस उल्लास में कैलेंडरी उत्सव से अलग होकर विभिन्न राजनीतिक दल भी महात्मा का स्मरण करेंगे. राजनीतिक दलों में महात्मा के प्रति यह  जो  चेतना जागृत हुई  है, उसे सकरात्मक भाव से देखें तो अच्छा लगेगा कि जिस महात्मा को अपने ही देश में पचास साल से ज्यादा समय में राजनीतिक स्वीकार्यता नहीं मिली, आज उस देश की राजनीतिक पार्टियां महात्मा के सहारे के बिना नहीं चल पा रही हैं. महात्मा की यह स्वीकार्यता सहज नहीं है. इसे अनेक दृष्टिकोण से देखना और समझना होगा. यह बात सच है कि वोट की राजनीति में रंगे राजनीतिक दलों के लिये महात्मा गांधी अचानक आदर्श बनने के पीछे  गांधी के आदर्शों की दुहाई देकर वोटबैंक को खींचने की मानसिकता ही है. भारतीय जनमानस की महात्मा में आज भी वैसी ही आस्था है, जैसा कि उनका अपने देवलोक पर. जनमानस की भावनाओं को केश कराने की जुगत  राजनीतिक दलों में महात्मा के प्रति  पहले से कही ज्यादा अनुराग बढ़ा है. 
बहुत ज्यादा छानबीन न करें तो भी 15-20 बरस से पहले सभी राजनीतिक दलों के अपने अपने आदर्श राजनेता रहे हैं. समाजवादी पार्टी लोहिया के बताये मार्ग पर चल रही है तो बहुजन समाज पार्टी के लिये डॉ. भीमराव आम्बेडकर प्रेरणास्रोत रहे हैं. कभी जनसंघ किन्तु अब भारतीय जनता पार्टी के पास डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, गोलवलकरजी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं वीर सांवरकर जैसे अनेक नेता हैं जिनके बताये रास्ते का अनुसरण ये दल करते रहे हैं. माक्र्सवादियों के भी अपने आदर्श रहे हैं. इसे आप सहज रूप में यह कह सकते हैं कि सभी दलों के पास अपने अपने ये नेता ब्रांडएम्बेसडर के रूप में मौजूद हैं जिन्हें जरूरत के अनुरूप उपयोग किया जाता रहा है. कांग्रेस के पास महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल सरीखे नेता रहे हैं. हालांकि ये नेता कांग्रेस पार्टी के नहीं बल्कि भारत वर्ष की विरासत हैं किन्तु अन्य राजनीतिक दलों ने इनसे परहेज किया है और वे अपने ही नेताओं को आदर्श मानकर राजनीति करते रहे हैं. यहां उल्लेखनीय है कि स्वाधीनता के पूर्व महात्मा गांधी से अनेक नेताओं के विचार मेल नहीं खाते थे. जिन नेताओं से गांधीजी के वैचारिक मतभेद थे, वे जगजाहिर हैं और इतिहास के पन्नों पर दर्ज हैं. गांधीजी के विचारों से सहमत नहीं होने वाले नेताओं में डॉ. अम्बेडकर, डॉ. मुखर्जी, लोहिया और यहां तक कि कांग्रेस के प्रथम पंक्ति में गिने जाने वाले अनेक नेता भी उनके विचारों से सहमत नहीं थे. 
      अस्तु, स्वाधीन भारत में लोकतंत्र स्थापित हो गया. 1975 में देश में आपातकाल लग जाने के बाद राजनीति स्थितियां तेजी से बदली और जनता दल का उदय हुआ. सत्ता संघर्ष में जनता दल के अनेक टुकड़े हुये और सबने अपने अपने रास्ते तय कर लिये. ज्यों-ज्यों समय गुजरता गया. विस्तार होता गया और नये-नये राजनीति दलों का जन्म होने लगा. बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी इन्हीं में से हैं. प्रादेशिक दलों की बातें तो इनसे बिलकुल अलग है. इन सबके तब भी आदर्श अलग-अलग नेता थे लेकिन महात्मा गांधी की स्वीकार्यता वैसी नहीं थी, जैसा कि आज हम देख और समझ रहे हैं. आज हर दल के लिये महात्मा गांधी सर्वोपरि है. 
     नोट से लेकर वोट तक महात्मा गांधी की छाप अलग से देखी जा सकती है. यह बात तो तय है कि राजनीतिक दलों के लिये गांधीजी की स्वीकार्यता जरूरी नहीं बल्कि मजबूरी हैं क्योंकि एकमात्र गांधी ही ऐसे हैं जिनका ढि़ंढ़ोरा पीट कर भारतीय जनता को बहलाया जा सकता है. राजनीति दलों का गांधीजी को मानना बिलकुल वैसा ही है जैसा कि हम ईश्वर को तो खूब मानते हैं किन्तु ईश्वर का कहा नहीं मानते. राजनीतिक दल गांधीजी को तो खूब मान रहे हैं किन्तु उनका कहा कोई मानने को तैयार नहीं है. गांधीजी की राजनीतिक दलों की स्वीकार्यता तब जरूरी समझी जाती जब दागी नेताओं को चुनाव लडऩे के अयोग्य किये जाने फैसले के खिलाफ कोई पहल नहीं की जाती. हमारे लिये महात्मा जरूरी नहीं, मजबूरी हैं और इसलिये शायद आम चलन में कहा भी जाता है मजबूरी का नाम महात्मा गांधी.

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...