शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

शोध पत्रिका समागम का अगस्त अंक जनक्रांति 2014 व्हाया सोशल मीडिया

आप सभी को स्वाधीनता पर्व की हार्दिक शुभकानाएं।

शोध पत्रिका समागम के अगस्त अंक का केंद्रीय विषय जनक्रांति 2014 व्हाया सोशल मीडिया है।  भारत में पहली क्रांति से हमें आज़ादी मिली। इसके बाद आपतकाल के बाद एक क्रांति हुई और अब सोशल मीडिया के जरिये जनक्रांति 2014 में हुई है जिसके परिणामस्वरूप देश में तीस वर्ष बाद किसी दल को पूर्ण बहुमत मिला है. गठबंधन सरकारों का सिलसिला समाप्त हुआ है. अन्ना हज़ारे से लेकर अब तक के बदलाव की मीमांषा करता समागम का नया अंक जारी कर दिया गया है. 

शोध पत्रिका समागम का अगला अंक हिंदी का महागीत : लता मंगेशकर पर है.

बुधवार, 30 जुलाई 2014

प्रेमचंद को पढ़ें ही नहीं, गढ़े भी


मनोज कुमार
हम लोग ईश्वर,अल्लाह, गुरूनानक और ईसा मसीह को खूब मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी नहीं मानते हैं बिलकुल वैसे ही जैसे हम प्रेमचंद को पढक़र उनकी तारीफ करते अघाते नहीं लेकिन कभी उनके पात्रों को मदद करने की तरफ हमारे हाथ नहीं उठते हैं। प्रेमचंद पर बोलकर, लिखकर हम वाहवाही तो पा लेते हैं लेकिन कभी ऐसा कुछ नहीं करते कि उनका लिखा सार्थक हो सके। प्रेमचंद की जयंती पर विशेष आयोजन हो रहे हंै, उनका स्मरण किया जा रहा है। लाजिमी है कि उनके जन्म तारीख के आसपास ही ईद का पाक उत्सव भी मनाया जाता है। ईद को केन्द्र में रखकर गरीबी की एक ऐसी कथा प्रेमचंद ने ईदगाह शीर्षक से लिखी कि आज भी मन भर आता है। सवाल यह है कि दशक बीत जाने के बाद भी हर परिवार उसी उत्साह से ईद मना पा रहा है। शायद नहीं, इस बात का गवाह है ईद के दिन अपनी गरीबी से तंग आकर एक युवक ने मौत को गले लगा लिया। उसे इस बात का रंज था कि वह ईद पर अपने दो बच्चों के लिये नये कपड़े नहीं सिला पाया। उन्हें ईदी भी नहीं दे पाया होगा। एक पिता के लिये यह शायद सबसे ज्यादा मुश्किल की घड़ी होती है। मरने वाला संवेदनशील था और उसे अपनी बेबसी का मलाल था। वह चाहता तो दूसरों की तरह मजबूरी का रोना रोकर और कुछ दिन गुजार लेता लेकिन मरने वाले का जिंदगी से जिस्मानी नहीं, दिली रिश्ता था। वह अपने बच्चों को दुखी देखकर जी नहीं पाया। 

एक आम आदमी की तरह मैं उसके आत्महत्या की तरफदारी नहीं करूंगा लेकिन एक पिता के नाते उसके भीतर की तड़प को समझने की ताकत मुझमें है। शायद मैं भी कभी इस समय से गुजर चुका हूं लेकिन तब कोई काम मिल गया था और मेरी मदद हो गई थी। मैं थोड़ा बेशर्म किस्म का इंसान हूं इसलिये नजरें झुकाये जी लेता लेकिन मौत को गले नहीं लगाता। बस, उसमें और मुझमें यही फर्क था कि वक्त ने उसका साथ नहीं दिया और मेरा साथ दे दिया था। उसे तो दुनिया से फना हो जाना था, सो हो गया लेकिन क्या यह समाज उसके दर्द को समझ पायेगा? उसके रहते, उसकी बेबसी और मजबूरी के चलते उसके परिवार ने एक ईद नहीं मनायी लेकिन उसके जाने के बाद हर दिन बेवजह उपवास रखने की जो नौबत आ रही है, उसका क्या कीजियेगा?

हैरान इस बात को लेकर हूं कि एक मानवीय खबर को भीतर के पन्ने पर एक दुर्र्घटना के समाचार के रूप में छाप कर अपने दायित्वों की इतिश्री कर ली गई। इस पर कोई बात नहीं हुई। हां, बीजेपी नेता प्रभात झा ने कह दिया कि लाल गाल वाले टमाटर खाते हैं तो अखबारों की प्रमुख खबर तो बन ही गई, आमजन में चर्चा का विषय भी। क्या जो लोग आज और कल प्रेमचंद का स्मरण कर रहे होंगे, वे इस युवक के बारे में कोई बात करेंगे। ईदगाह के हामिद की बार बार चर्चा होगी कि कैसे ईदी के पैसों से उसने दादी की चिंता की लेकिन क्या कोई इस युवक की चर्चा करेगा कि कैसे उसे अपने बच्चों का दुख देखा नहीं गया और उसने मौत को गले लगा लिया। दरअसल, अब हमें ढोंग से उबर जाना चाहिये। हमेें मान लेना चाहिये कि मूर्तिपूजक बन कर रह गये हैं। हमें मूर्ति से वास्ता है, मूर्ति के बताये रास्ते हमारे लिये नहीं हैं।

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

छोटी ही रहना चाहती हूं...पापा


-मनोज कुमार 
अखबार पढ़ते हुये अचानक नजर पड़ी कि कुछ दिनों बाद फादर्स डे है। मन में जिज्ञासा आयी और लगा कि अपनी बिटिया से पूछूं कि वो इस फादर्स डे पर क्या करने वाली है। मैंने सहज भाव से पूछ ही लिया कि बेटा, थोड़े दिनों बाद फादर्स डे आने वाला है। तुम अपने फादर अर्थात मेरे लिये क्या करने वाली हो? वह मेरा सवाल सुनकर मुस्करायी और मेरे सामान्य ज्ञान को बढ़ाते हुये कहा कि हां, पापा मुझे पता है कि फादर्स डे आने वाला है। अच्छा आप बताओ कि आप मेरे लिये क्या करने वाले हो? मैंने कहा कि दिन तो मेरा है, फिर मैं क्यों तु हारे लिये कुछ करने लगा। तु हें मेरे लिये करना चाहिये? इसके बाद हम बाप-बेटी के बीच जो संवाद हुआ, वह एक दार्शनिक संवाद  जरूर था लेकिन डे मनाने वालों के लिये सीख भी है। बेटी ने कहा कि पहली बात तो यह कि मैं अभी आपकी इनकम पर अपना भविष्य बना रही हूं और जो कुछ भी करूंगी आपके जेब से निकाल कर ही करूंगी। ऐसे में आपके लिये कुछ करने का मतलब आपको खुश करने के बजाय दुखी करना होगा क्योंकि जितने पैसों से मैं आपके लिये उपहार खरीदूंगी, उतने में आप हमारी कुछ जरूरतें पूरी कर सकेंगे। तो इसका मतलब यह है कि जब तुम कमाने लगोगी तो फादर्स डे सेलिब्रेट करोगी। अपने पापा के लिये उपहार खरीदोगी? इस बार भी बिटिया का जवाब अलग ही था। नहीं पापा, मैं चाहे जितनी बड़ी हो जाऊं, जितना कमाने लगूं लेकिन कभी इतनी बड़ी न हो पाऊं कि अपने पापा को उपहार देने की मेरी हैसियत बने। जिस पापा ने अपनी नींद खोकर मेरी परिवरिश की, जिस पापा ने अपनी जरूरतों को कम कर मेरी जरूरतों को पूरा करने में पूरा समय और श्रम लगा दिया, जिस पापा ने मेरे सपनों को अपना सपना मानकर मुझे बड़ा किया, उस पापा को भला मैं क्या दे सकती हूं। और पापा ही क्यों, मम्मी, दादाजी, दादीजी सब तो मिलकर मुझे बनाने की कोशिश कर, फिर भला मैं कैसे आप लोगों के लियेे उपहार खरीदने की हिम त कर सकती हूं। 
बिटिया की बातों को सुनकर मेरी आंखें भर आयी। मुझे लगा कि मैंने जो कुछ किया, वह निरर्थक नहीं गया। बेटी के भीतर वह सबकुछ मैंने समाहित कर दिया, जो मुझे मेरे पिता से मिला था। मुझे लगा कि फादर्स डे पर इससे अच्छा कोई उपहार हो भी नहीं सकता है। जब मां-बाप अपने बच्चों से हारते  हैं तो सही मायने में विजेता होते हैं। हारते हुयेे माता-पिता को सही मायने में खुशी मिलती है क्योंकि बच्चों की जीत ही माता-पिता की असली जीत है। हमारे समाज में ये जो डे मनाने का रिवाज चल पड़ा है और यह रिवाज भारतीय नहीं बल्कि यूरोपियन देशों की देन है। भौतिक जरूरतों की चीजों में उनके रिश्ते बंधे होते हैं और वे हर रिश्तों को वस्तु से तौलते हैं लेकिन भारतीय मन भावनाओं की डोर से बंधा होता है। वस्तु हमारे लिये द्वितीयक है, प्रथम भावना होती है और आज मेरी बेटी ने जता दिया कि वह जमाने के साथ भाग रही है्र दौड़ रही है लेकिन अपनी संस्कृति और संस्कार को सहेजे हुये। अपनी भावनाओं के साथ, अपने परिजनों की भावनओं की कद्र करते हुये। वह बाजार जाकर कुछ सौ रुपयों के तोहफों से भावनाओं का व्यापार नहीं कर रही है। यह मेरे जैसे पिछड़ी सोच के बाप के लिये अनमोल उपहार है। 
भारतीय समाज में भी डे मनाने की पुरातन परमपरा है। हम लोग यूरोपियन की तरह जीवित लोगों के लिये डे का आयोजन नहीं करते हैं बल्कि उनके हमारे साथ नहीं रहने पर करते हैं। उनकी मृत्यु की तिथि पर उनके पसंद का भोजन गरीबों को खिलाया जाता है, वस्त्र इत्यादि गरीबों में वितरित किया जाकर उनकी आत्मा की प्रसन्नता के लिये करते हैं, इसे हम पितृपक्ष कहते हैं। जीते जी हम उन्हें भरपूर स मान देते हैं और मरणोपरांत भी उनका स्थान हमारे घर-परिवार के बीच में होता है। दुर्भाग्य से हम यूरोपियन संस्कृति के साथ चल पड़ हैं। सक्षम पिता या माता का डे तो मनाते हैं लेकिन वृद्ध होते माता-पिता को वृद्वाश्रम पहुंचाने में देर नहीं करते हैं। बाजार जिस तरह अनुपयोगी चीजों का सेल लगाता है या चलन से बाहर कर देता है, वही हालत यूरोपियन समाज में रिश्तों का है, भावनाओं का है। हम भी इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। पालकों के पास धन है, साधन है, सक्षम हैं तो दिवस है और नहीं तो उनके लिये दिल तो क्या घर पर स्थान नहीं है। मेरी गुजारिश है उन बच्चों माता-पिता को बाजार की वस्तु बनाने के बजाय उन्हें अपना स्नेह दें। उनकी भावनाओं का खयाल रखें और एक दिन फादर्स डे, मदर्स डे के बजाय पूरे साल का हर दिन उनके लिये समर्पित करें। यही हमारी परम परा और संस्कृति है और यही भारतीय समाज की धरोहर भी। 

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

भाव भरी भूमि

-मनोज कुमार
एक साल पुरानी बात है. तब  23 जुलाई को अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की पुण्यभूमि पर जाने का मुझे अवसर मिला था. यह दिन मेरे लिये किसी उत्सव से कम नहीं था. कभी इस पुण्यभूमि को भाबरा के नाम से पुकारा जाता था किन्तु अब इस नगर की पहचान अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के रूप में है. मध्यप्रदेश शासन के आदिमजाति कल्याण विभाग के सहयोग से राज्य के आदिवासी बाहुल्य जिलों में सामुदायिक रेडियो केन्द्रों की स्थापना की पहली कड़ी में यहां दो वर्ष पहले रेडियो वन्या की स्थापना हुई. 23 जुलाई को रेडियो वन्या के दूसरी सालगिरह पर मैं बतौर रेडियो के राज्य समन्वयक के नाते पहुंचा था. मैं पहली दफा इस पुण्य धरा पर आया था. इस धरा पर अपना पहला कदम रखते ही जैसे मेरे भीतर एक कंपन सी हुई. कुछ ऐसा मन में लगा जिसे अभिव्यक्त कर पाना मुश्किल सा लग रहा है. एक अपराध बोध भी मेरे मन को घर कर गया था. भोपाल से जिस वाहन से हम चंद्रशेखर आजाद नगर पहुंचे थे, उसी वाहन में बैठकर मैं और मेरे कुछ साथी आजाद की कुटिया की तरफ रवाना हुये. कुछ पल बाद ही मेरे मन में आया कि मैं कोई अनैतिक काम कर रहा हूं. उस वीर की भूमि पर मैं कार में सवार होकर उसी तरह चल रहा हूं जिस तरह कभी अंग्रेज चला करते थे. मन ग्लानि से भर गया और तत्काल अपनी भूल सुधार कर वाहन से नीचे उतर गया. वाहन से नीचे उतरते ही जैसेे मन हल्का हो गया. क्षणिक रूप से भूल तो सुधार लिया लेकिन एक टीस मन में शायद ताउम्र बनी रहेगी.

बहरहाल, मेेरे रेडियो स्टेशन पर कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद लगभग हजार विद्यार्थियों की बड़ी रैली अमर शहीद चंद्रशेखर की जयकारा करते हुये निकली तो मन खुश हो गया. परम्परा को आगे बढ़ाते देखना है तो आपको चंद्रशेखर नगर जरूर आना होगा. वीर शहीद की कुटिया को सरकार की तरफ से सुंदर बना दिया गया है. इस कुटिया में मध्यप्रदेश स्वराज संस्थान संचालनालय की ओर उनकी पुरानी तस्वीरों का सुंदर संयोजन किया गया है. इस कुटिया में प्रवेश करने से पूर्व ही एक अम्मां मिलेंगी जो बिना किसी स्वार्थ कुटिया की रखवाली करती हैं, जैसे वे अपने देश को अंग्रेजों से बचा रही हों. इस कुटिया के भीतर वीर शहीद चंद्रशेखर आजाद की आदमकद प्रतिमा है जिसे देखते ही लगता है कि वे बोल पड़ेंगे हम आजाद थे, आजाद रहेेंगे. सब-कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने से गुजरती हुई प्रतीत होता है. जब मैं प्रतिमा निहार रहा था तभी एक लगभग 30-35 बरस का युवा अपनी छोटी सी बिटिया को लेकर कुटिया में आया और बिना समय गंवाये नन्हीं बच्ची को गोद में उठाकर उसे इतना ऊपर उठाया कि बिटिया शहीद का तिलक कर सके. उसने यही नहीं किया बल्कि बिटिया को शहीद के पैरों पर ढोक लगाने के लिये प्रेरित किया. नन्हीं सी बच्ची को शहीद और भगवान में अंतर नहीं मालूम हो लेकिन एक पिता के नाते उस युवक की जिम्मेदारी देखकर मन भाव से भर गया. 

एकाएक मन में आया कि काश, भारत आज भी गांवों का देश होता तो अभाव भले ही उसे घेरे होते किन्तु भाव तो नहीं मरते. बिलकुल जैसा कि मैंने चंद्रशेखर आजाद की नगरी में देखा. विकास के दौड़ में हम अपना गौरवशाली अतीत को विस्मृत कर रहे हैं लेकिन यह छोटा सा कस्बानुमा आज भी उस गौरवशाली इतिहास को परम्परा के रूप में आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित कर रहा है. परम्परा के संवर्धन एवं संरक्षण की यह कोशिश ही सही मायने में भारत की तस्वीर है. मैं यह बात बड़े गौरव के साथ कह सकता हूं कि देश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में जितना बड़ा योगदान दिया और इनके शहीदों को जिस तरह समाज ने सहेजा है, वह बिराला ही उदाहरण है. यह वही चीज है जिसे हम भारत की अस्मिता कहते हैं, यह वही चीज है जिससे भारत की दुनिया में पहचान है और शायद यही कारण है कि तमाम तरह की विसंगितयां, विश्व वक्रदृष्टि के बावजूद भारत बल से बलवान बना हुआ है.
दुख इस बात है कि विकास की अंधी दौड़ से अब चंद्रशेखर आजाद नगर भी नहीं बचा है. मकान, दुकान पसरते जा रहे हैं. वीर शहीद के नाम पर राजनीति अब आम हो रही है. हालांकि इसे यह सोच कर उबरा जा सकता है कि विकास होगा तो यह लालच बढ़ेगा और लालच बढ़ेगा तो विसंगतियांं आम होंगी लेकिन यह बात भी दिल को सुकून देेने वाली हैं कि चंद्रशेखर आजाद की नगरी में 23 जुलाई का दिन हर वर्ष दीपावली से भी बड़े उत्सव की तरह मनाया जाता है. अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद को मेरा कोटिश: प्रणाम.

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

अविश्वास की आंखें


मनोज कुमार
अविश्वास की आंखें? जब मेरे दोस्त ने कहा तो सहसा मुझे यकिन ही नहीं हुआ। उल्टे मैं उससे सवाल करने लगा कि भाई झूठ के पांव नहीं होते हैं, यह तो सुना था। अविश्वास की आंखें, यह कौन सी नयी आफत है। इस पर दोस्त ने तपाक से कहा कि यह विकास की देन है। दूसरा सवाल और भी चौंकाने वाला था। समझ नहीं आ रहा था कि विकास की देन अविश्वास की आंखें? खैर, दोस्त तो अपनी पहेली छोडक़र चला गया था लेकिन एक पत्रकार एवं लेखक होने से भी ज्यादा एक बड़ी होती बिटिया के पापा की जिम्मेदारी ने इस पहेली के प्रति जिज्ञासा बढ़ा दी। मैं अपने आसपास तलाश करता रहा कि अचानक एक खबर ने मेरी चूलें हिला दी। दैनिक अखबार के किसी पन्नेद पर खबर छपी थी कि शहर के एक बड़े शॉपिंग मॉल में चोरी करते हुये दो युवक को कैमरे ने पकड़ा। 
शॉपिंग मॉल, चोरी, कैमरा और जब्ती। अब मुझे अविश्वास की आंखों का अर्थ समझ आने लगा। दोस्त ने जिसे विकास की देन कहा था वह अविश्वास की आंखों और कोई नहीं कैमरा ही था। विकास के परवान चढ़ते नये नये टेक्रालॉजी के बारे में लिखना अच्छा लगता है। लिखता भी हूं लेकिन बड़े  शॉपिंग मॉल में प्रवेश करते ही मैं एक मामूली आदमी हो जाता हूं। किसी ब्रांडेड स्टोर में प्रवेश करते ही डर सा लगने लगता है। सच कहूं तो अपनी औकात समझ आने लगती है। तिस पर कैमरे की लगातार घूरती आंखें। डर सा लगता है कि जाने अगले पल क्या हो। ऐसे में कई बार तो शॉपिंग मॉल में जाने का प्रोग्राम ही कैंसिल कर दिया जाता है। 
सच तो यह है कि मैं ठहरा निपट देहाती आदमी। जेब में दो पांच सौ रुपये आये तो खुद को शहंशाह समझ बैठता हूं। मेरी इस गफलत को मेरे मोहल्ले का परचून वाला हमेशा बनाये रखता है। वह मुझे कभी इस बात का अहसास ही नहीं होने देता कि मैं फक्कड़ किस्म का लगभग कंगाल हूं और मेरे हाथों में जो दो-पांच सौ रुपये हैं, उसकी कोई बखत नहीं। अपने भीतर ही भ्रम पाले मैं परचून की दुकान में पहुंचता हूं। यहां अविश्वास की आंख नहीं आयी है। दुकानदार से सौदा-सुलह किया और दो शिकायतें भी ठोंक दी। कुछ सुख-दुख की बातें भी कर ली और उधार अलग कर आया। लेकिन मध्यप्रदेश की राजधानी के बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल में ऐसी सुविधा कहां। उसके पास एक ही रिवाज है। माल देखो, पसंद आया तो बैग में डालो, पैसे दो, बिल लो और घर चलते बनो। मोहल्ले के परचून की दुकानदार की तरह न तो शिकायत सुनने का मौका, न बतियाने का कोई वक्त। उधार की बातें तो करो ही नहीं। और हां, परचून की दुकान की तरह कुछ भी उठाकर टेस्ट नहीं कर सकते। टेस्ट किया और बिल पेस्ट हुआ। हो सकता है कि इस टेस्ट के चक्कर में अविश्वास की आंखों में आप कैद हो जायें और कहीं से सायरन बजा और आप धर लिये जायें।
विकास की देन अविश्वास की आंखों का विस्तार शॉपिंग मॉल से आपके हमारे घरों तक आ गया है। अविश्वास इतना बढ़ गया है कि अब हम छिपे कैमरे से एक-दूसरे की निगरानी करने लगे हैं। कहने तो हम इसे सुरक्षा के लिये लगाये हुये कैमरा कहते हैं लेकिन सच तो यह है कि हम सब घोर अविश्वास के शिकार हैं। सच तो यह है कि हमारा अपने आप से विश्वास उठ गया है। कभी हमारे बुर्जुग कहते थे कि कई बार आंखों देखी भी सच नहीं हुआ करती थी लेकिन अविश्वास की आंखें बन चुका यह यंत्र जो दिखाता है, वही सच है। यह सच इतना बड़ा और पक्का है कि लगता है कि मैं वापस अपने गांव की तरफ लौट जाऊं। परचून की दुकान में खड़ा होकर गप्पें हांकू और घर पर बेफिक्र ी के साथ लौट सकूं लेकिन अब लौटना भी मुश्किल लग रहा है, ठीक उसी तरह जिस तरह से आपसी विश्वास कहीं गुम हो गया है।

शनिवार, 5 जुलाई 2014







आज ५ जुलाई २०१४ के प्रभात किरण, इंदौर अंक में प्रकाशित मेरा आर्टिकल 

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...