शनिवार, 6 दिसंबर 2014

एक त्रासदी का खबरनामा

-मनोज कुमार
तीस बरस का समय कम नहीं होता है। भोपाल के बरक्स देखें तो यह कल की ही बात लगती है। 2-3 दिसम्बर की वह रात और रात की तरह गुजर जाती किन्तु ऐसा हो न सका। यह तारीख न केवल भोपाल के इतिहास में बल्कि दुनिया की भीषणतम त्रासदियों में शुमार हो गया है। यह कोई मामूली दुर्घटना नहीं थी बल्कि यह त्रासदी थी। एक ऐसी त्रासदी जिसका दुख, जिसकी पीड़ा और इससे उपजी अगिनत तकलीफें हर पल इस बात का स्मरण कराती रहेंगी कि साल 1984 की वह 2-3 दिसम्बर की आधी रात कितनी भयावह थी।
1984 से लेकर साल दर साल गुजरते गये। 1984 से 2014 तक की गिनती करें तो पूरे तीस बरस इस त्रासदी के पूरे हो चुके हैं। समय गुजर जाने के बाद पीड़ा और बढ़ती गयी। इसे एक किस्म का नासूर भी कह सकते हैं। नासूर इस मायने में कि इसका कोई मुकम्मल इलाज नहीं हो पाया या इस दिशा में कोई मुकम्मल कोशिशें नहीं हुई। इस पूरे तीस बरस में इस बात पर जोर दिया गया कि त्रासदी के लिये हमसे से कौन कसूरवार था? किसने यूनियन कार्बाइड के कर्ताधर्ता वारेन एंडरसन को भोपाल से दिल्ली और दिल्ली से उन्हें अपने देश भागने में मदद की? हम इस बात में उलझे रहे कि कसूरवार किसे ठहराया जाये लेकिन इस बात की हमने परवाह नहीं की जो लोग बेगुनाह थे, जिनकी जिंदगी में जहर घुली हवा ने तबाही मचा दी थी, जिनके सपने तो दूर, जिंदगी नरक बन गयी थी। 
भोपाल गैस त्रासदी के नाम से कुख्यात हो चुके दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के इन तीस सालों को देखें और समझने का यत्न करें तो सरकारों और राजनीतिक दलों के लिये 2-3 दिसम्बर की तारीख रस्मी रह गयी है और मीडिया के लिये यह त्रासदी  महज एक खबरनामा बन कर रह गयी है।  2-3 दिसम्बर की आधी रात का सच यह है कि अनगिनत बेगुनाहों को अकाल मौत के मुंह में समा जाना है तो 30 बरस का सच भी यही है। यह वही त्रासदी है जो राजनीतिक दलों के लिये खासा मायने रखती थी। हर बरस 3 दिसम्बर को सर्वधर्म सभा का आयोजन हुआ करता था। संवेदनाओं की गंगा बह निकलती थी। न्याय और हक दिलाने की बातें होती थी। इन तीस बरसों के हर चुनाव में गैस पीडि़त एक मुद्दा हुआ करते थे। जैसे जैसे साल गुजरता गया, गैस पीडि़त हाशिये पर जाते गये। चुनावी एजेंडे में अब गैस पीडि़त और गैस त्रासदी, त्रासदी न होकर महज एक दुर्घटना जैसी रह गयी थी। 
अब रस्मी संवेदनायें होती हैं और अगले ही दिन जिंदगी पटरी पर आ जाती है। तीन दिसम्बर को जिस त्रासदी के दुख में भोपाली अवकाश मनाते हैं, उस दिन बाजार में रौनक कम नहीं होती है। सिनेमा घरों में न तो कोई शो बंद होता है और ना ही कोई आयोजन। दुख और पीड़ा उस परिवार की न तो पहले कम थी और न शायद जिंदगी के आखिरी सांस तक कम होगी क्योंकि जिन्होंने अपनों को खोया है, वे ही अपनों की दर्द समझ सकते हैं। ऐसे लोगों की तादात आज भी कम नहीं है जो जिंदा लाश बनकर अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं। यह मंजर बेहद डरावना और भयावह है। यह एक ऐसा सच है जो उस तारीख की आधी रात का था तो आज सुबह के उजाले में अपने सवालों के जवाब पाने के लिये खड़ा है।
कहने वाले तो कह सकते हैं कि आखिरी कब तक इस त्रासदी पर आंसू बहायेेंगे? यह कड़ुवी बयानबाजी से परहेज करने वाले कल भी थे और आज भी रहेंगे। याद करना होगा उस समय के हमारे संस्कृति सचिव महोदय आइएएस अधिकारी अशोक वाजपेयी को। वाजपेयी को याद करना इसलिये भी जरूरी है कि जिस तरह त्रासदी का यह दर्द जीवन में कभी नहीं भूलेगा, उसी तरह नश्तर की तरह चुभते उनके वह शब्द भी हवा में कभी विस्मृत नहीं हो पायेंगेे जब उन्होंने कहा था कि-‘मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता है’। वाजपेयी एक संवेदनशील संस्कृति के संवाहक के रूप में हमारे साथ हैं लेकिन तब एक निष्ठुर प्रशासक के रूप में उन्होंने यह बयान देकर कराहते भोपाल में विश्व कविता समारोह का आयोजन सम्पन्न करा लिया था। वाजपेयी जब यह बात कह रहे थे, तब इस बात का अंदाज समाज को नहीं रहा होगा कि आने वाले समय में विश्व की यह भीषणतम त्रासदी महज एक खबरनामा बन कर रह जायेगी। इस खबरनामा की शुरूआत अशोक वाजेपयी ने की थी और आज हम इस खबरनामा को महसूस कर रहे हैं।
इन तीस सालों में अनेक किताबें बाजार में आ गयीं। लेखकों, रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचना-धर्मिता का धर्म पूरा किया। अपने अपने स्तर पर त्रासदी को जांचने का प्रयास किया। किसी लेखक के केन्द्र में संवेदना थी तो कोई इसके दुष्परिणामों को जांच रहा था। कोई लेखक, लेखकीय सीमा से परे जाकर एक जासूस की तरह त्रासदी के लिये दोषियों को तलाश कर रहा था। गैस त्रासदी पर कुछेक छोटी प्रभावी फिल्में भी बनी और एक फीचर फिल्म भी परदे पर आ गयी। रचनाधर्मिता का यह पक्ष उजला-उजला सा है लेकिन सवाल  है कि इस रचनाकर्म से किसकी नींद खुली और कौन पीडि़तों के पक्ष में खड़ा हुआ? यह सवाल भी जवाब की प्रतीक्षा में खड़ा ही रह जायेगा।
एक त्रासदी का खबरनामा से ज्यादा कुछ दिखायी नहीं देता और न ही महसूस किया जा सकता है। इस बात को और भी संजीदा ढंग से जांचना है तो यूनियन कार्बाइड के मुखिया वॉरेन एंडरसन की मौत की खबर एक सूचना की तरह प्रस्तुत की गयी। क्या एंडरसन की मौत से इस पूरे प्रकरण पर कोई गंभीर प्रभाव नहीं पड़ेगा? क्या इस बात पर मीडिया के मंच पर विमर्श नहीं होना चाहिये था? क्या एंडरसन की मौत एक आम आदमी की मौत थी? ऐसे अनेक सवाल हैं जो इस बात को स्थापित करते हैं कि विश्व की भीषणतम त्रासदी महज एक खबरनामा ही बन कर रह गयी है और यही सच है। भोपाल गैस त्रासदी के कई पहलु हैं जो समाज को आज भी झकझोर रहे हैं। इससे जुड़ा आर्थिक पक्ष तो है ही, सामाजिक जिम्मेदारी का पक्ष भी है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इस सिलसिले में अपना निजी अनुभव शेयर करना सामयिक लगता है। 
इस त्रासदी की तीसरी बरसी थी। एक अखबारनवीस होने के नाते ह्यूमन स्टोरी की तलाश में जेपी नगर गया था। यहां मुलाकात होती है लगभग 11-12 वर्ष की उम्र के सुनील राजपूत से। सुनील की एक छोटी बहन और एक छोटे भाई को छोडक़र पूरा परिवार इस त्रासदी में अकाल मारा गया था। राहत के नाम पर मिले अकूत पैसों ने सुनील को बेपरवाह बना दिया था। हालांकि बाद के सालों में उसमें सुधार दिखा और इन पैसों से अपने  छोटे भाई और बहन की जिम्मेदारी पूरी की किन्तु स्वयं मानसिक रूप से बीमार हो चुका था। सुनील की मृत्यु के कुछ समय पहले मेरी मुलाकात संभावना ट्रस्ट में हुयी थी जहां सुनील रहता था और उसका इलाज चल रहा था। सुनील एक उदाहरण मात्र है। ऐसे अनेक परिवार होंगे जो खबरों से दूर अपना दर्द अपने साथ समेटे जी रहे हैं।  त्रासदी के आरंभिक कुछ वर्ष छोड़ दिये जायें तो आमतौर पर 30 नवम्बर से 4 दिसम्बर तक अखबारों के पन्नों और टेलीविजन के परदे पर गैस त्रासदी से जुड़े मुद्दे पर विमर्श होता है। 
सवाल यह है कि जिस त्रासदी को हम विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी मान चुके हैं, जिस त्रासदी के शिकार लोगों को 30 बरस गुजर जाने के बाद भी न्याय और हक नहीं मिला है, जिस भोपाल की खुशियों को इस त्रासदी ने निगल लिया है, क्या इसे महज चंद दिनों के लिये हम खबरनामा बनने दें? शायद यह बात किसी को गंवारा नहीं होगी और न ही कोई इस तरह की पैरोकारी करेगा। यह त्रासदी महज एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं बल्कि विकासशील समाज के समक्ष एक चुनौती है जिसे सामाजिक जवाबदारी के साथ ही पूरा किया जा सकेगा।  यह सवाल भी मौजूं है कि एक तरफ तो हम अभी भी भोपाल गैस त्रासदी से उबर नहीं पाये हैं और दूसरी तरफ उद्योगों का अम्बार लगाने के लिये बेताब हैं। औद्योगिकीकरण के लिये पूरा देश बेताब है और हर राज्य इन उद्योगों के लिये रेडकॉर्पेट बिछा रहा है। क्या हमने भोपाल गैस त्रासदी से कुछ सीखा है या इसे यूं ही हम भुला दे रहे हैं।
इन तीस साला सफर में एक बात का और अनुभव हुआ है। जिस वेदना के साथ हम इस त्रासदी का उल्लेख करते हैं, वह वेदना आज भी आम आदमी के भीतर है। वह उस त्रासदी की याद कर सिहर उठता है लेकिन वह लोग संवेदनहीन हो चुके हैं जो इस कालखंड में कमान सम्हाले हुये थे।  फौरीतौर पर बयान देने के लिये अशोक वाजपेयी को इतिहास नहीं भुला पायेगा तो तत्कालीन भोपाल कलेक्टर मोतीसिंह की बातों को भुला पाना मुश्किल होगा जब गैस त्रासदी से जुड़े सवालों के जवाब में वे कहते हैं-छोड़ो इन बातों को, आओ, बनारस की बातें करें। 
एक कहता है कि मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता है, दूसरे को बनारस की याद आती है। सोच की यह दृष्टि हो तो गैस त्रासदी एक खबरनामा से अधिक रह भी नहीं जाती है। यह हमारे लिये दुर्भाग्य की बात है कि हम एक ऐसे समय में, एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां परपीड़ा हमें सालती नहीं है। हम संवेदनहीन होते जा रहे हैं। अखबारों में छपने वाली खबरें हमें झकझोरती नहीं हैं और ऐसे में भोपाल त्रासदी, खबरनामा ही बन कर रह जाये तो शिकायत किससे और कैसी?

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

बाल पत्रकारिता : संभावना एवं चुनौतियां

-मनोज कुमार

बीते 5 सितम्बर 2014, शिक्षक दिवस के दिन जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बच्चों से रूबरू हो रहे थे तब उनके समक्ष देशभर से हजारों की संख्या में जिज्ञासु बच्चे सामने थे। अपनी समझ और कुछ झिझक के साथ सवाल कर रहे थे। इन्हीं हजारों बच्चों में छत्तीसगढ़ दंतेवाड़ा से एक बच्ची ने आदिवासी बहुल इलाके में उच्चशिक्षा उपलब्ध कराने संबंधी सवाल पूछा। यह सवाल उसके अपने और अपने आसपास के बच्चों के हित के लिये हो सकता है लेकिन यह सवाल बताता है कि ऐसे ही बच्चे पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर हैं। एक पत्रकार का दायित्व होता है कि वह समाज के बारे में सोचे और सरकार को अपनी सोच के केन्द्र में खड़ा करे। इस स्कूली छात्रा ने यह कर दिखाया जब उसके सवाल सेे प्रधानमंत्रीजी न केवल संजीदा हुये बल्कि इसे देश का सवाल माना। यह सवाल एक विद्यार्थी का था लेकिन उसके सवाल पूछने का अंदाज और भीतर का आत्मविश्वास बताता है कि यह आग पत्रकारिता के लिये जरूरी है।
वर्तमान समय में हम पत्रकारिता की कितनी ही आलोचना कर लें। कितना ही उसे भला-बुरा कह लें और उसे अपने ध्येय से हटता हुआ साबित करें लेकिन दंतेवाड़ा की छात्रा ने अपने एक सवाल से कई सवालों का जवाब दे दिया है। उच्चशिक्षा की चिंता करते हुये सवाल करने का अर्थ ही है अपने ध्येय पर डटे रहना। इससे भी बड़ी बात है कि सरकार को अपने ध्येय से अवगत कराना और इस दिशा में कार्यवाही करने के लिये बाध्य करना। हम नहीं जानते कि प्रधानमंत्री से सवाल करने वाली यह आदिवासी छात्रा भविष्य में अपने कॅरियर को किस दिशा में ले जायेगी लेकिन इतना तय है कि उसने यह बता दिया कि अभी नहीं सही, लेकिन गर्भ में ऐसे पत्रकार पल रहे हैं जो समाज के हित में कुछ कर गुजरने की ताकत रखते हैं।
पत्रकारिता पर लगते आक्षेप कई बार मन को दुखी कर जाते हैं लेकिन पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर इस बात की आश्वस्ति होते हैं कि आज भले ही कुछ पीड़ादायक हो लेकिन आने वाला कल सुंदर और बेहतर है। मध्यप्रदेश सहित देश के अनेक हिस्सों में पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर अपनी प्रतिभा से समाज को परिचित करा रहे हैं। अभी वे उडऩा सीख रहे हैं। जब वे उड़ान भरने लायक हो जायेंगे तो दुनिया उनके हुनर की कायल हो जायेगी। अलग अलग हिस्सों में, अलग अलग लोगों से चर्चा करने पर यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि पत्रकारिता के ये नये हस्ताक्षर नगरों और महानगरों में तैयार नहीं हो रहे हैं बल्कि ये माटी की सोंधी खुश्बू के साथ गांव में तैयार हो रहे हैं। इन्हें पत्रकारिता की तालीम नहीं दी जाती है बल्कि ये लोग अपने भीतर समाज को बदलने की जो आग जलाये बैठे हैं, वही इनकी पत्रकारिता की तालीम है।
पत्रकारिता के बारे में साफ है कि यह किसी स्कूली महाविद्यालयीन शिक्षा से नहीं आती है बल्कि इसके लिये अनुभव की जरूरत होती है। पत्रकारिता के इन नये हस्ताक्षर के पास अनुभव की थाती नहीं है लेकिन जो जीवन इन्होंने जिया है अथवा जी रहे हैं, वह इनके अनुभव का पहला पाठ है। स्कूल भवन की कमी हो, पानी या सडक़ का अभाव हो, अस्पताल की कमी और गरीबी की मार से इनकी कलम आग उगलने को बेताब रहती है। पत्रकारिता के ये नये हस्ताक्षर जज्बाती हैं। बेहद सच्चे और साफ दिल से इनकी कलम आग उगल रही है।
भविष्य के ये अनचीन्हें नायक भारतीय पत्रकारिता का चेहरा बदल देंगे, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। अभी ये पत्रकारिता की टेक्रालॉजी से बाबस्ता नहीं हुये हैं और न ही इन्हें मीडिया का अर्थ मालूम है। देहात की पत्रकारिता की आत्मा अमर है तो इन्हीं हस्ताक्षरों से। इनकी पत्रकारिता गांव की सरहद तक होती है लेकिन इनके शब्द की गूंज प्रदेश और देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंचती है। अभी पत्रकारिता में जिन नये हस्ताक्षर उदित हो रहे हैं, उन्हें किसी किस्म का प्रशिक्षण नहीं दिया जा रहा है बल्कि उन्हें स्वतंत्रता है कि वे अपने मन की लिखें। जो दिखे, जो महसूस करें और जिस तर्क और तथ्य से वे सहमत हों, वह लिखें। लिखने की यह आजादी उनके भीतर उत्साह पैदा करती है।
समूचे देश में पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर की संख्या वर्तमान में सौ-पचास नहीं बल्कि हजारों की संख्या में है। मध्यप्रदेश में तो आदिवासी विद्यार्थियों ने पत्रकारिता की राह चुनी है और उनमें भी बड़ी संख्या लड़कियों की है। यह सूचना, यह आंकड़ें विश्वास जगाते हैं कि जितनी आलोचना पत्रकारिता की इन दिनों हो रही है, उतने ही गर्व करने वाले दिन आने वाले हैं।
पत्रकारिता की पहली शर्त होती है जिज्ञासा। जो व्यक्ति जितना ज्यादा जिज्ञासु होगा, वह उतने ही सवाल करेगा और जो जितना सवाल करेगा, वह समस्या का समाधान तलाश कर पायेगा। इस पैमाने पर प्रधानमंत्री से सवाल करती दंतेवाड़ा की आदिवासी छात्रा में खरी उतरती है। हालांकि यह छात्रा अकेली नहीं थी। साथ में अनेक विद्यार्थी थे जो प्रधानमंत्री से सवाल कर रहे थे किन्तु इस आदिवासी छात्रा के सवाल पर स्वयं प्रधानमंत्री ने गौर किया, इसलिये यह छात्रा दूसरों से अलग दिखती है।
किसी खबर को तलाश करने, उससे गढऩे और विस्तार देने के लिये पांच तत्व बताये गये हैं। पत्रकारिता के इन नये हस्ताक्षरों को शायद इस बात का ज्ञान न हो लेकिन वे पत्रकारिता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करते दिखते हैं। पत्रकारिता में अलग दिखने और करने की एक और शर्त होती है कि आपका होमवर्क कम्पलीट हो अर्थात जिस विषय के बारे में आप जानना चाहते हैं, उसकी आवश्यकता और उसके प्रतिफल से भी आपका अवगत रहना चाहिये। आदिवासी क्षेत्रों में उच्च शिक्षा का सवाल उठाती छात्रा इस बात से वाकिफ थी और किसी भी पूरक सवाल का जवाब उसके पास था। छात्रा का यह सवाल अचानक नहीं था बल्कि उसने होमवर्क किया था। उसे स्वयं को आगे चलकर उच्चशिक्षा की आवश्यकता है और यह आवश्यकता उसकी अकेले की नहीं बल्कि पूरे आदिवासी क्षेत्र की है। इस प्रकार प्राथमिक रूप से वह एक प्रतिनिधि के रूप में खड़ी दिखती है। पत्रकार समाज का प्रतिनिधि होता है। पैरोकार होता है जो समाज में व्याप्त समस्याओं, कुरीतियों और नवाचार के लिये प्रतिबद्ध होता है। सबसे खास बात यह होती है कि उसका यह कार्य निरपेक्ष और स्वार्थविहिन होता है।
मध्यप्रदेश के होशंगाबाद संभाग में सोहागपुर नाम की तहसील है। सोहागपुर पान के बरेज के लिये ख्यात है। यहां पर वरिष्ठ साहित्यकार डाक्टर गोपालनारायण आवटे रहते हैं। डॉ. आवटे विगत लम्बे समय से बच्चों के साथ काम कर रहे हैं। उनसे बात होती है तो वे अपने साथ काम कर रहे बच्चों को लेकर बेहद उत्साहित होते हैं। वे बताते हैं कि उनके साथ काम कर रहे तीन सौ से भी अधिक संख्या में बाल पत्रकार काम कर रहे हैं जिसमें बच्चियों की संख्या अधिक है। इन बाल पत्रकारों में तो कई ऐसे हैं जो कानूनन वयस्क होने की कगार पर हैं। पत्रकारिता में नये हस्ताक्षर आयें और पूरे उत्साह के साथ वे काम करते रहें, यह कोशिश डा. आप्टे कर रहे हैं। इन बाल पत्रकारों को मंच देेने के लिये वे एक मासिक समाचार पत्र का प्रकाशन भी करते हैं जिसकी जवाबदारी पत्रकारिता के नये हस्ताक्षरों के कंधे पर है।
डॉ. आप्टे पत्रकारिता के इन नये हस्ताक्षरों के स्कील डेवलप करने के लिये समय समय पर कार्यशाला का आयोजन करते हैं। इस कार्यशाला में पूरे प्रदेश के चिंहित पत्रकार एवं अध्यापक पढ़ाने आते हैं। वे कुछ नामचीन संस्थाओं के साथ भी बाल पत्रकारिता के लिये काम करते रहे हैं लेकिन उनका अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा। डॉ. आप्टे कहते हैं कि मैं बच्चों को पत्रकार बना रहा हूं, मजदूर नहीं। इसलिये किसी के आदेश पर, उनकी मर्जी से वे जहां चाहे, शॉर्ट नोटिस पर पहुंच जाऊं, यह संभव नहीं। उन्होंने इन नामचीन संस्थाओं से स्वयं को अलग कर लिया है।
डा. आप्टे का यह अनुभव इस बात का प्रमाण है कि संभावनाओं से लबरेज पत्रकारिता के इन नये हस्ताक्षरों की यह ताजगी कहीं मुरझा न जाये, इस बात की चिंता भी करनी होगी। भोपाल से दिल्ली तक पत्रकारिता का झंडा उठाये वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ पत्रकारों को पत्रकारिता के इन नये हस्ताक्षरों की चिंता करनी होगी। ये नये हस्ताक्षर अभी पत्रकारिता का ककहरा सीख रहे हैं इसलिये जरूरी है कि आगे भी ये पत्रकारिता करें न कि मीडिया के दलदल में फंस जायें।
एक पत्रकार की दुनिया पूरा समाज होता है जिसकी अपेक्षा और आवाज वह होता है। पत्रकार एक ऐसा मंच होता है जहां आम आदमी अपनी पीड़ा और तकलीफ लेकर बिना किसी औपचारिकता के वह पहुंच जाता है। पीडि़त व्यक्ति को न तो कोई फीस देनी होती है और न मिलने का समय पहले से तय करना होता है। पत्रकार पीडि़त की बात सुनता और समझता है तथा वह उन सबसे से सवाल करने पहुंच जाता है। तथ्य और तर्क के साथ वह खबर की शक्ल में समस्या को समाज के समक्ष रखता है।
पत्रकार के प्रयासों से पीडि़त को राहत मिल जाती है और उसका विश्वास पत्रकारिता पर बढ़ जाता है। पत्रकारिता की यही पूंजी है और पत्रकार का यही सुख कि वह एक व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कराहट देख सका। यह जज्बा आप बाल पत्रकारों में महसूस कर सकते हैं। वे समाज की आवाज उठा रहे हैं। वे पीडि़तों की आवाज बने हुये हैं।
बाल पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता में नये हस्ताक्षर पर चर्चा करते हैं तो कई किस्म के खतरे डराते हैं कि कहीं ये आवाज खो न जाये। कोई पत्रकार मीडियाकर्मी हो सकता है या हो रहा है, यह सुनकर हैरानी होती है। मीडियाकर्मी शब्द अपशकुन नहीं है लेकिन इससे यह बात भी स्थापित हो जाती है कि वह पत्रकार नहीं है और उसका समाज के प्रति कोई उत्तरदायित्व भी नहीं है। वह एक प्रोफेशनल है जो रोजगार की गरज से मीडिया से संबद्ध है और उसकी चिंता अपने इर्द-गिर्द सिमटी हुई होती है। बाल पत्रकारों के लिये प्रशिक्षण-कार्यशाला एक जरूरत है लेकिन कई बार लगता है कि यह प्रशिक्षण-कार्यशाला उन्हें मशीनी बना देगा। पत्रकारिता सही अर्थों में मन के भीतर बदलाव की एक आग है। इस आग को आप न तो जला सकते हैं और न बुझा सकते हैं इसलिये कहा गया है कि आप पत्रकार को तराश तो सकते हैं लेकिन पत्रकार स्वयं से बनता है, उसे बनाया नहीं जा सकता है। गांव और कस्बों की धूल से सने ये पत्रकार जब भोपाल और दिल्ली की सडक़ों पर चलेंगे तो कुछ गुमनाम हो जायेंगे तो कुछ मीडियाकर्मी भी बन जायेंगे। जिस जनसरोकार की पत्रकारिता वे करते रहे हैं, अब वे मीडिया की आवाज बन जायेंगे जिनके पास हर वक्त निर्देश होगा कि यह लिखो या नहीं लिखो, यह दिखाओ या यह नहीं दिखाओ। अर्थात समझौता महानगरीय पत्रकारिता जिसे हम मीडिया कहते हैं, पहला सबक होगा। पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर को पत्रकारिता की मुख्य धारा में लाना आवश्यक है लेकिन इससे भी बड़ी आवश्यकता इन प्रतिभाओं को बचाकर रखने की है। इन प्रतिभाओं को बचाने की जवाबदारी महानगरीय पत्रकारिता के महापुरूषों को ही पहल करनी होगी। यह बात सुखद है कि चुनौतियों और संघर्ष के बीच भी पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर आ रहे हंै जो इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता की आत्मा गांव और कस्बों में आज भी जीवित है।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

बचपन बचाने वाले शांतिदूत कैलाश सत्यार्थी को नोबल


-मनोज कुमार
  बचपन बचाने की जिम्मेदारी उठाने का साहस दिखाने वाले कैलाश सत्यार्थी को नोबल दिये जाने का ऐलान किया जा चुका है। कैलाश सत्यार्थी ने बचपन बचाओ आंदोलन आरंभ किया तो उनके मन में एक टीस थी कि कैसे बचपन को बचाया जाये? कैसे बच्चों की मोहक मुस्कान उन्हें लौटायी जाये। काम कठिन है लेकिन सत्यार्थी जैसे लोगों के लिये असंभव भी नहीं और यही कारण है कि साढ़े तीन दशक से अधिक समय से वे बचपन बचाओ अभियान में जुटे हुये हैं। सत्यार्थी की चिंता केवल भारत के बचपन की नहीं है बल्कि उनकी चिंता इस दुनिया के तमाम बच्चों की है और यही कारण है कि सत्यार्थी के बताये और बनाये रास्ते पर पूरी दुनिया के लोग चल पड़े हैं। सत्यार्थी चले तो अकेेले थे लेकिन आज उनके साथ इतने लोग हैं कि गिनती कम पड़ जाये। सत्यार्थी को नोबल दिये जाने का ऐलान शायद इसलिये नहीं हुआ क्योंकि वे एक ऐसे मिशन पर हैं जो समाज को बचाने के लिये जरूरी है बल्कि लगता है कि यह नोबल उनके साहस के लिये दिया जा रहा है। 
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से चलकर देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंचने वाली रेललाईन के बीच स्थित है विदिशा रेल्वे स्टेशन। विदिशा समा्रट अशोक की ससुराल है और वे पूरी दुनिया में शांति के दूत के रूप में पहिचाने गये। इसी विदिशा शहर से इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल करने वाले कुशाग्र एवं अपने मिशन के प्रति अडिग बने रहने वाले कैलाश नारायण शर्मा चाहते तो अपने साथ डिग्री लिये राजधानी दिल्ली की ट्रेन पकड़ लेते और किसी भी बड़ी कम्पनी में, बड़े ओहदे पर, मोटी तनख्वाह में मजे से जिंदगी बसर कर सकते थे लेकिन शिक्षा प्राप्त कर ऐसा करने की उनकी ख्वाहिश कभी नहीं रही। वे समाज में बेहतरी के लिये शिक्षा हासिल कर रहे थे और वे कुछ ऐसा करना चाहते थे कि समाज का विकृत चेहरा ठीक हो सके। अपने स्कूली समय से उनके मन में भीख मांगते बच्चों को लेकर टीस उठती थी। वे बच्चों का ऐसा जीवन देखकर विचलित हो उठते थे। उन्हें बार बार यह लगता था कि एक तरफ तो हम यह कहते अघाते नहीं कि बच्चे देश का भविष्य है और देश के भविष्य बच्चों के हाथों में कटोरा हो, यह उन्हें मंजूर नहीं था। वे बच्चों को सम्मान का जीवन देने का इरादा रखते थे। अपने अभियान का श्रीगणेश उन्होंने अपने शहर विदिशा से आरंभ कर दिया था। 
        कैलाश नारायण शर्मा से कैलाश सत्यार्थी बने सत्यार्थी एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुये थे। चार भाईयों में सबसे छोटे और सबसे ज्यादा संवेदनशील सत्यार्थी एक आदमी की तरह जीने के बजाय वे कुछ करगुजरने के लिये प्रतिबद्व थे। गांधीजी उनकी प्रेरणा थे। वे गांधी के रास्ते पर चलकर अहिंसा के मार्ग से समस्या का हल ढूंढऩे का प्रयास करते थे। बचपन बचाओ आंदोलन आरंभ करने के पहले उन्होंने विदिशा में गांधीजी की प्रतिमा के समक्ष अछूतों से भोजन बनवाया और अपने होने का अहसास दिलाया। सत्यार्थी का बचपन बचाओ आंदोलन देश-दुनिया में नाम और धन कमाने के लिये नहीं था बल्कि यह कांटों भरा रास्ता था जिस पर चलना एक चुनौती थी। अनेक बार उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन सत्यार्थी सत्य के बूते पर हमेशा जीत हासिल करते रहे। इस दुर्गम राह पर चलने का साहस उन्हें गांधीजी से मिली। बिना डिगे, बिना हिले वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे। 
अपने स्वयं के स्कूली दिनों में सत्यार्थी जब भीख मांगते बच्चों को अपने हिस्से का खाना खिला देते या उन्हें किताब-कॉपियां और दूसरी जरूरतें पूरी करते तो परिजनों से उन्हें शाबासी की जगह पर सजा मिलती। एक बार तो उन्हें काफी समय तक धूप में खड़े रहना पड़ा। यह और बात है कि बाद के दिनों में परिजनों ने भी सत्यार्थी के प्रयासों में साथ दिया। हालांकि यह सजा, सत्यार्थी के इरादों को और पक्का बनाती।  लगभग 35 वर्ष पूर्व सत्यार्थी ने बचपन बचाओ आंदोलन नामक संस्था का गठन कानूनी तौर पर किया। भारत वर्ष में बच्चों के शोषण के खिलाफ यह पहला सिविल सोसायटी अभियान था। उन्होंने बच्चों को बचाने की गुजारिश के साथ पक्के कानून की मांग करते हुये 1993 में बिहार से दिल्ली, अगले वर्ष 1994 में कन्याकुमारी से दिल्ली तक की यात्रा करने के बाद 95 में कोलकाता से काठमांडू तक की यात्रा पूरी की। 2001 में सत्यार्थी ने कन्याकुमारी से कश्मीर होते हुये 20 राज्यों से गुजरते हुये 15 हजार किलोमीटर की जनयात्रा की। इसी कड़ी में 2007 में बाल व्यापार विरोधी दक्षिण एशियाई यात्रा एक प्रमुख पड़ाव है। 
        बचपन बचाने और बच्चों को सम्मानजनक जिंदगी के लिये सत्यार्थी शिक्षा को ही एकमात्र रास्ता मानते हैं। उन्हीं के प्रयासों का सुफल बच्चों को यह मिला कि संविधान में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की पहल हुई। सत्यार्थी अपने अनुभवों से बताते हैं कि वर्तमान में अकेले भारत में 5 करोड़ बाल मजदूर हैं जिनसे 1.2 लाख करोड़ कालाधन उद्योगपति एवं दीगर लोग कमा रहे हैं। सत्यार्थी बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से न केवल बचपन बचाने का प्रयास कर रहे हैं बल्कि उनके एजेंडे में बच्चों की सुरक्षा एवं पुर्नवास भी शामिल है। इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करनेे लिये बाल मित्र ग्राम योजना भी संचालित की जा रही है। देश के 11 राज्यों के अब तक 356 गांव बाल मित्र ग्राम बन चुके हैं। बाल मित्र ग्राम उन गांवों को कहा जाता है जहां सौफीसदी बालश्रम समाप्त हो चुका हो। ऐसे गांवों में बच्चे स्कूल जा रहे हैं तथा समय समय पर पंचायत में अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त कर चुके हैं। सत्यार्थी के प्रयासों से अब तक भारत में ही 80 हजार से अधिक बच्चों को बालश्रम से मुक्ति दिलायी जा चुकी है। 
         सत्यार्थी ने अपने इस तीन दशकों के सफर में अनेक खट्टे-मीठे अनुभव हासिल किये हंै। वे इस बात से हमेशा खुश रहते हैं कि उनके इस आंदोलन को उनके अपने परिवार का सहयोग प्राप्त है। उनकी जीवनसंगिनी सुमैधा कैलाश के लिये सत्यार्थी को नोबल मिलना कोई बड़ी बात नहीं है। वे सत्यार्थी की इस बात से सहमति जताती हैं कि यह सम्मान गांधीजी को मिलता तो ज्यादा प्रसन्नता होती। नोबल ऐलान के बाद सत्यार्थी ने कहा था कि वे गांधीजी के देहावसान के बाद पैदा हुये थे और यह सम्मान के सच्चे हकदार गांधीजी थे और यह सम्मान उन्हें मिलता तो प्रसन्नता और अधिक होती। 
            श्रीमती सुमैधा कैलाश बताती हैं कि जब हमने पहली दफा एक बच्चे को बचा कर घर लाये तो उसने घर में सोने से मना कर दिया क्योंकि तब हम दोनों अखबार बिछाकर सोते थे। वे कहती हैं कि सत्यार्थी को अपने काम के दरम्यान ऐसे अनेक कड़ुवे अनुभवों से गुजरना पड़ा है लेकिन वे हिम्मती हैं। वे सकरात्मक सोच रखते हैं और अपने अभियान को सफल होते देखना चाहते हैं। वे यह भी कहती हैं कि ऐसे अनेक बच्चे हैं जिनकी जिंदगी संवर गयी है और वे बेहतर जिंदगी जी रहे हैं। विदिशा के किराने की दुकान चलाने वाले बंशीलाल साहू को लगभग 35 सालों से सत्यार्थी तीन सौ रुपये देते आ रहे हैं। सत्यार्थी जब भी विदिशा आते हैं, वे साहू को तीन सौ रुपये देना नहीं भूलते। रुपये देने के साथ साहू को ताकीद यह होती है कि गरीब बच्चे को पैसा नहीं होने पर इन्हीं पैसों से चॉकलेट दे देना। सत्यार्थी सत्य के साथ सादगी से जीने की प्रेरणा गांधीजी से पाते हैं और यही कारण है कि सत्यार्थी के लिये नोबल का मिलना, उनके कार्य को और भी जिम्मेदार बनाता है। 
हम हैं हिन्दुस्तानी..
यह हम हिन्दुस्तानियों की फितरत है कि जहां भी जाते हैं अपना झंडा गाड़ देते हैं। गांधीजी के सम्मान में फिरंगियों ने कई बार अपने कानून बदले हंै, इतिहास इस बात का गवाह है तो इस समय में भी फिरंगी भारतीयों को सम्मान देने में कभी पीछे नहीं रहे। इस सिलसिले में सन् 2009 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उस वाकये का जिक्र करना जरूरी है जब कैलाश सत्यार्थी को अलग से मान दिया गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह मुख्य अधिवेशन बाल अधिकारों पर केन्द्रित था। नियमानुसार इस अधिवेशन को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ही संबोधित करते हैं लेकिन परम्परा को तोड़ते हुये कैलाश सत्यार्थी को बोलने का अवसर दिया गया। सत्यार्थी को इन वर्षों में ब्रिटेन, जर्मनी, इटली आदि-इत्यादि देशों की संसदों की विशेष बैठकों को संबोधित करने का सम्मान मिल चुका है। 
कैलाश सत्यार्थी को मिले अब तक के सम्मान :
1. 1984 में जर्मनी का द आचेनेर इंटरनेशनल पीस अवार्ड।
2. 1985 में अमेरिका का द ट्रमपेटेर अवार्ड।
3. 1985 में अमेरिका का रॉबर्ट एफ कैनेडी ह्यूमन राईट अवार्ड।
4. 1999 में जर्मनी का फ्राइड्रीव इबर्ट स्टीफटंग अवार्ड।
5. 2002 में वैलेनबर्ग मेडल, यूर्निवसिटी ऑफ मिशिगन।
6. 2006 में अमेरिका का फ्रीडम अवार्ड।
7. 2007 में मेडल ऑफ द इटालियन सेनाटे।
8. 2008 में स्पेन का अलफांसो कोमिन इंटरनेशनल अवार्ड।
9. 2009 में अमेरिका का डेफेंडर ऑफ डेमोक्रेसी अवार्ड।
कुछ बातें मलाला के बारे में भी :
17 साल की मलाला नोबल पुरस्कार पाने वाली दुनिया की सबसे कम उम्र की हैं। पाकिस्तान की स्वात घाटी में 12 जुलाई 1997 को जन्मी मलाला बच्चियों की शिक्षा के लिये साहस दिखाने के लिये चर्चा में आयीं। 2007 में तालिबानियों ने स्वात पर कब्जा कर लिया और लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी लगा दी तो मलाला न केवल स्वयं छिपकर स्कूल जा रही थीं बल्कि अन्य बच्चियों को भी प्रेरणा दे रही थीं। यही नहीं, उन्होंने दो साल बाद 2009 में बीबीसी के लिये ब्लॉग लिखना भी शुरू कर दिया था। इससे गुस्साये तालिबानियों ने मलाला और उसके पिता को मारने की धमकी दी थी। हौसलामंद मलाला पर तालिबानियों की धमकी बेअसर रही। गुस्साये तालिबानियों ने 9 अक्टूबर 2012 के दिन स्कूल से लौटती मलाला के सिर पर गोली मार दी। साहसी मलाला मौत से लडक़र वापस आ गयी। लंदन में इलाज चला और दुरूस्त होकर वापस पढ़ाई में जुट गयी। मलाला को उनके साहस के लिये 2014 का नोबल दिये जाने का ऐलान हुआ है और इसी के साथ वे दुनियां की सबसे कम उम्र की नोबल विजेता बन गयी हैं। 

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

कौन जुकरबर्ग?


मनोज कुमार
         जुकरबर्ग को आप जानते हैं? मैं नहीं जानता और न ही मेरी जानने में कोई रुचि है। दरअसल, पिछले दिनों ये कोई जुकरबर्ग नाम के श स ने हिन्दी पत्रकारों के साथ जो व्यवहार किया, वह अनपेक्षित नहीं था। वास्तव में ये महाशय भारत में तो आये नहीं थे। इनका वेलकम तो इंडिया में हो रहा था। फिर ये भारतीय पत्रकारों को क्यों पूछते? जुकरबर्ग ने क्या किया और उनका व्यवहार कितना घटिया था, इस पर कोई बात नहीं की जा सकती है। सही और असल सवाल तो यह है कि हम फिरंगियों के प्रति इतने आसक्त क्यों होते हैं? हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिका प्रवास पर गये और वहां की मीडिया ने जिस तरह से उपेक्षा की, वह एक बड़ा मसला था लेकिन हम विरोध नहीं कर पाये क्योंेिक मोदी को लेकर हम अभी भी भाजपा और कांग्रेस में बंटे हुये हैं। अमेरिकी मीडिया ने मोदी के साथ जो व्यवहार किया, वह मोदी के साथ नहीं था बल्कि सवा सौ करोड़ के प्रतिनिधि और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ था। मोदी के साथ क्या होता है और क्या होना चाहिये, इसकी हमें बड़ी चिंता होती है। याद करें जब मोदी को वीजा देने से अमेरिका ने मना कर दिया था तब भारतीय मीडिया ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया था लेकिन अमेरिकी मीडिया हमारे भारतीय प्रधानमंत्री की उपेक्षा करता है तो यह हमारे लिये मुद्दा नहीं बनता है। ऐसे में ये कोई जुकरबर्ग भारतीय मीडिया की उपेक्षा कर इंडियन मीडिया से गलबहियां करता है तो शिकायत क्यों? भारतीय प्रधानमंत्री की उपेक्षा के खिलाफ भारतीय मीडिया समवेतस्वर में अपना विरोध दर्ज कराता तो एक क्या, ऐसे सौ जुकरबर्ग की ताकत नहीं होती कि वह कहे कि हिन्दी के पत्रकार उनकी सूची में नहीं हैं।

          यहां यह सवाल भी अहम है कि जुकरबर्ग की भारत यात्रा क्यों थी? क्या वे मीडिया को प्रमोट करने आये थे या अपने बिजनेस को। एक व्यवसायी के साथ जो बर्ताव करना चाहिये था, वह हिन्दी के पत्रकारों को करना चाहिये लेकिन हमारी कमजोरी है कि किसी फिरंगी को देखे नहीं कि लट्टू हो जाते हैं और फिर वे हमें जुकरबर्ग की तरह लतियाते हैं। हमारी कमजोरी रही है कि आज भी हम दासता की मानसिकता से उबर नहीं पाये हंै। इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव संचार विश्वविद्यालय के निदेशक जगदीश उपासने  का स्पष्ट मानना है कि इस मुद्दे पर स्यापा नहीं करना चाहिए। उनके हिंदी को महत्व देने या न देने की हिंदी की प्रतिष्ठा और ताकत कम नहीं हो सकती है। वे अंग्रेजी के जरिए अपना आर्थिक हित साधने में लगे हैं। जगदीशजी के इस कथन से हमें अपनी ताकत समझ लेना चाहिये क्योंकि हिन्दी की ताकत बड़ी है और वह एकाध व्यक्ति के अनदेखा किये जाने से कम नहीं होती है बल्कि इसे इस नजरिये से ाी देखा जाना चाहिये कि कहीं वे हिन्दी की ताकत से भय खाकर पीछे के दरवाजे से अपना हित साधने तो नहीं आये थे।

        वरिष्ठ पत्रकार डॉ.वेद प्रताप वैदिक ने कहा कि यदि यह सच है कि जुकरबर्ग न सिर्फ अंग्रेजी पत्रकारों के साथ संवाद किया है तो मानना होगा कि जुकरबर्ग भारत को बिल्कुल नहीं समझते हैं। भारतीय भाषाओं के अखबारों, चैनलों की पहुंच अंग्रेजी के मुकाबले 100 गुना ज्यादा है। उनकी उपेक्षा कर वे अपनी ही नुकसान कर रहे है। उनके प्रति सहानुभूति है। उन्होंने कहा कि आज जहां विश्व में हिंदी का प्रभुत्व लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में फेसबुक के सीईओ जुकरबर्ग द्वार हिंदी को नकारना उनकी असमझ का परिचायक है। वैदिकजी की यह बात सही है कि जुकरबर्ग एक सफल व्यवसायी नहीं हैं। यदि होते तो उन्हें पता होता कि भारत में प्रभुत्व करना है तो हिन्दी ही एकमात्र रास्ता है। इस बात का प्रमाण पिछले दो-तीन दशकों में अंग्रेजी प्रकाशनों का हिन्दी में आना है। वे जान चुके हैं कि अंग्रेजी में पाठक मिल सकते हैं लेकिन ग्राहक हिन्दी में मिल पायेंगे। अंग्रेजी के हिन्दी प्रकाशनों की अनिवार्यता यह थी कि बाजार में टिके रहना है तो हिन्दी के बीच स्थान बनाना होगा। हालांकि इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता है कि जुकरबर्ग के व्यवहार से हिन्दी का अपमान हुआ है। ये साहब हैं कौन जो हमारी हिन्दी का अपमान करेंगे?  मैं अमर उजाला के पॉलिटिकल एडिटर विनोद अग्निहोत्री कीइस बात से सहमत नहीं हूं कि इस तरह से अपमान भारत के स्वाभिमान को चोट पहुंचाता है। यह सही है कि भारतीय भाषाओं के प्रति संकीर्ण मानसिकता के साथ-साथ जुकरबर्ग यहां के बाजार को भी नहीं समझ पाए हैं। आउटलुट (हिंदी) पत्रिका के प्रमुख संवाददाता कुमार पंकज ने इस मुद्दे पर कहा कि हिंदी भारत की मातृभाषा है और जिस तरह विदेशी जुकरबर्ग ने इसका अपमान किया है वे चिंता का विषय है, इस बात से सहमत हुआ जा सकता है। उनका यह भी कहना सही है कि  हिंदी के लिए प्रतिबद्ध मोदी को इस विषय को जुकरबर्ग के सामने उठाया चाहिए। साथ ही उन्होंने मांग की कि सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को भी जुकरबर्ग को हिंदी पत्रकारिता की पहुंच और प्रभाव के बारे में बताना चाहिए।

           यह मसला गंभीर है और इस पर चिंतन की और विमर्श की जरूरत है क्योंकि पहले भी ऐसा हुआ है और आगे ऐसा नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। हालांकि हमें अपनी मानसिकता भी बदलनी होगी। वर्षों से भारतीय फिल्में ऑस्कर पा लेने के लिये बेताब हैं। आखिर ऑस्कर में ऐसा क्या है जिसे हम नहीं पा सके तो हमारी उपलब्धि और हमारी पहुंच कम हो जायेगी। ऐसे पुरस्कार और स मान के लिये भी सरकारी बंदिश होना चाहिये। भारत एक धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्म-समभाव का देश है। हिन्दी इस देश की आत्मा है और यही कारण है कि समूचे विश्व में भारत का पताका फहरा रहा है। भारत विनयशील देश है किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हम जवाब देना नहीं जानते हैं। जुकरबर्ग को यह बात स्मरण में रखना चाहिये कि जिस देश में इतनी ताकत है कि वह अंग्रेजों को खदेड़ सकती है तो अपने आत्मगौरव के लिये वह आज भी संघर्ष करने की ताकत रखती है। मेरा आग्रह मेरे अपने लोगों से है, भारतीय मीडिया से है कि ऐसे फिरंगियों को तवज्जो ना दें बल्कि अपने देश के भीतर भी जो लोग फिरंगियों सा व्यवहार कर रहे हैं, उन्हें भी अनदेखा करें। यह इसलिये भी आवश्यक है कि एक तरफ तो हम देश में संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षायें हिन्दी माध्यम से कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ अंग्रेजों के मोह से छूट नहीं पा रहे हैं। अब सोचना साथियों को है कि हमें किसका साथ देना है और किसका विरोध करना है।

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

बापू, कुछ मीठा हो जाए

-मनोज कुमार
बापू इस बार आपको जन्मदिन में हम चरखा नहीं, वालमार्ट भेंट कर रहे हैं.गरीबी तो खतम नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये  गरीबों को  खत्म करने का अचूक नुस्खा हमने इजाद कर लिया है. खुदरा बाजार में हम विदेशी पंूजी निवेश को अनुमति दे दी है. हमें ऐसा लगता है कि समस्या को ही नहीं, जड़ को खत्म कर देना चाहिए और आप जानते हैं कि समस्या गरीबी नहीं बल्कि गरीब है और हमारे इन फैसलों से समस्या की जड़ गरीब ही खत्म हो जाएगी. बुरा मत मानना, बिलकुल भी बुरा मत मानना. आपको तो पता ही होगा कि इस समय हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं और आप हैं कि बारमबार सन् सैंतालीस की रट लगाये हुए हैं कुटीर उद्योग, कुटीर उद्योग. एक आदमी चरखा लेकर बैठता है तो जाने कितने दिनों में अपने एक धोती का धागा जुटा पाता है. आप का काम तो चल जाता था  लेकिन हम क्या करें. समस्या यह भी नहीं है, समस्या है कि इन धागों से हमारी सूट और टाई नहीं बन पाती है और आपको यह तो मानना ही पड़ेगा कि इक्कसवीं सदी में जी रहे लोगों को धोती नहीं, सूट और टाई चाहिए वह भी फटाफट. हमने गांव की ताजी सब्जीखाने की आदत छोड दी है क्योंकि डीप फ्रीजर की सब्जी हम कई दिनों बाद खा सकते हैं. दरअसल आपके विचार हमेशा से ताजा रहे हैं लेकिन हम लोग बासी विचारों को ही आत्मसात करने के आदी हो रहे हैं. बासा खाएंगे तो बासा सोचेंगे भी. इसमें गलत ही क्या है?

        बापू माफ करना लेकिन आपको आपके जन्मदिन पर बार बार यह बात याद दिलानी होगी कि हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं. जन्मदिन, वर्षगांठ बहुत घिसेपिटे और पुराने से शब्द हैं, हम तो बर्थडे और एनवरसरी मनाते हैं. अब यहां भी देखिये कि जो आप मितव्ययता की बात करते थे, उसे हम नहीं भूला पाये हैं इसलिये शादी की वर्षगांठ हो या मृत्यु ,  हम मितव्ययता के साथ एक ही शब्द का उपयोग करते है एनवरसरी. आप देख तो रहे होंगे कि हमारी बेटियां कितनी मितव्ययी हो गयी हैं. बहुत कम कपड़े पहनने लगी हैं. अब आप इस बात के लिये हमें दोष तो नहीं दे सकते हैं ना कि हमने आपकी मितव्ययता की सीख को जीवन में नहीं उतारा. सडक़ का नाम महात्मा गांधी रोड रख लिया और मितव्ययता की बात आयी तो इसे एम.जी. रोड कह दिया. यह एम.जी. रोड आपको हर शहर में मिल जाएगा. अभी तो यह शुरूआत है बापू, आगे आगे देखिये हम मितव्ययता के कैसे कैसे नमूने आपको दिखायेंगे.

        अब आप गुस्सा मत होना बापू क्योंकि हमारी सत्ता, सरकार और संस्थायें आपके नाम पर ही तो जिंदा है. आपकी मृत्यु से लेकर अब तक तो हमने आपके नाम की रट लगायी है. कांग्रेस कहती थी कि गांधी हमारे हैं लेकिन अब सब लोग कह रहे हैं कि गांधी हमारे हैं. ये आपके नाम की माया है कि सब लोग एकजुट हो गये हैं. आपकी किताब  हिन्द स्वराज पर बहस हो रही है, बात हो रही है और आपके नाम की सार्थकता ढूंढ़ी जा रही है. ये बात ठीक है कि गांधी को सब लोग मान रहे हैं लेकिन गांधी की बातों को मानने वाला कोई नहीं है लेकिन क्या गांधी को मानना, गांधी को नहीं मानना है. बापू आप समझ ही गये होंगेकि इक्कसवीं सदी के लोग किस तरह और कैसे कैसे सोच रखते हैं. अब आप ही समझायें कि हम ईश्वर, अल्लाह, नानक और मसीह को तो मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी माना क्या? मानते तो भला आपके हिन्दुस्तान में जात-पात के नाम पर कोई फसाद हो सकता था. फसाद के बाद इन नामों की माला जप कर पाप काटने की कोशिश जरूर करते हैं.

बापू छोड़ो न इन बातों को, आज आपका जन्मदिन है. कुछ मीठा हो जाये. अब आप कहेंगे कि कबीर की वाणी सुन लो, इससे मीठा तो कुछ है ही नहीं. बापू फिर वही बातें, टेलीविजन के परदे पर चीख-चीख कर हमारे युग नायक अमिताभ कह रहे हैं कि चॉकलेट खाओ, अब तो वो मैगी भी खिलाने लगे हैं. बापू इन्हें थोड़ा समझाओ ना पैसा कमाने के लिये ये सब करना तो ठीक है लेकिन इससे बच्चों की सेहत बिगड़ रही है, उससे तो पैसा न कमाओ. मैं भी भला आपसे ये क्या बातें करने लगा. आपको तो पता ही नहीं होगा कि ये युग नायक कौन है और चॉकलेट मैगी क्या चीज होती है. खैर, बापू हमने शिकायत का एक भी मौका आपके लिये नहीं छोड़ा है. जानते हैं हमने क्या किया, हमने कुछ नहीं किया. सरकार ने कर डाला. अपने रिकार्ड में आपको उन्होंने कभी कहीं राष्ट्रपिता होने की बात से साफ इंकार कर दिया है. आप हमारे राष्ट्रपिता तो हैं नहीं, ये सरकार का रिकार्ड कहता है. बापू बुरा मत, मानना. कागज का क्या है, कागज पर हमारे बापू की शख्सियत थोड़ी है, बापू तो हमारे दिल में रहते हैं लेकिन सरकार को आप जरूर बहादुर सिपाही कह सकते हैं. बापू माफ करना हम इक्कसवीं सदी के लोग अब चरखा पर नहीं, वालमार्ट पर जिंदा रहेंगे. इस बार आपके बर्थडे पर यह तोहफा आपको अच्छा लगे तो मुझे फोन जरूर करना. न बापू न.. फोन नहीं, मोबाइल करना और इंटरनेट की सुविधा हो तो क्या बात है..फेसबुक और ट्विटर से आप अब तक फ्रेंडली हो चुके होगे.
 
मोबा. 09300469918

शनिवार, 20 सितंबर 2014

जिम्मेदारी की स्लेट


मनोज कुमार
कोई छह या सात बरस की होगी पिंकी। इस समय वह तीसरी दर्जे में पढ़ रही है। सुबह तेजी से काम निपटा कर भागकर स्कूल जाना और लौट कर घर का काम निपटाना। बाद में ट्यूशन पढऩे जाना और फिर रात में घर का काम निपटाना। पिंकी स्लेट में लिखती तो अक्षर है और उसे सीखने की कोशिश भी करती है लेकिन उसकी स्लेट पर जो इबारत लिखी हुई है उसे जिम्मेदारी कहते हैं। जिस उमर में उसे दूसरे बच्चों की तरह खेलना और मौज करना चाहिये था, उस उमर में वह जिम्मेदारी निभा रही है। छोटे-छोटे हाथों से अपने भाइयों के लिये खाना पकाना और उन्हें खिलाकर तृप्त हो जाना कि भाई भूखे नहीं हैं। उसके भाई शारीरिक रूप से कमजोर नहीं है। इसी मोहल्ले में गोलगप्पे का व्यवसाय करते हैं लेकिन पिंकी से उनकी अपेक्षायें होती हैं। अपेक्षा केवल पिंकी द्वारा भोजन पकाने की नहीं है बल्कि गोलगप्पे बनाने में मदद करे, यह भी वे चाहते हैं। पिंकी को यह सब करते हुये किसी से कोई शिकायत नहीं है और वह शिकायत का अर्थ भी नहीं जानती होगी बल्कि उसके लिये तो यही रोजमर्रा की जिंदगी है। 
पिंकी खुश रहती है। नाखुश रहने की भी कोई वजह नहीं है। नाखुश तो तब होती जब उसे पता होता कि जो काम कर रही है, उसके हिस्से का नहीं है। वह तो अनचाहे में इसे अपनी जिम्मेदारी और अधिक व्यवहारिक होकर कहें तो गरीब परिवार का धर्म निभा रही है। उसे किसी ने यह बात भी कभी किसी ने सिखाया नहीं होगा कि जिस स्लेट पर वह लिखती है, उसे जिंदगी बनाना सिखाती है। उसे तो स्लेट और लिखने का मतलब इतना ही मालूम है कि वह कुछ सीख कर, कुछ समझ कर इतना जान ले कि बनिया हिसाब में कोई गड़बड़ ना करे। पिंकी के सपने, उसकी दुनिया, उसकी खुशी, उसका दुख इन सबके बीच मे विचरता रहता है। बेखौफ और बिना शिकायत।
पिंकी को इस बात का भले ही पता नहीं होगा कि जिस स्लेट पर वह शब्द गढ़ रही है, वह जिम्मेदारी की है लेकिन वह नम्बरों के दौड़ में आगे निकल जाना चाहती है। वह अनजाने में दुनिया जीतने निकल पड़ी है। वह हर विषय में अच्छे नम्बर लाना चाहती है। साथ में पढ़ रहे बच्चों के सामने वह किसी भी तरह से खुद को कम होता नहीं देखना चाहती। छोटे से बदन में थकान कितनी होती है या तनाव कितना होता होगा, इससे भी पिंकी बेखबर है। रात होते होते वह ऊंघने लगती है क्योंकि सुबह जिम्मेदारी की कोरी स्लेट उसके सामने होती है जिसमें रोटी बनाना, कपड़े धोना, सूखे कपड़ों को तह कर रखना लिखा हुआ है तो स्कूल जाने से पहले खुद को संवारना भी नहीं भूलती है। जिम्मेदार होती पिंकी भाइयों से पूछ लेती कि किसी को कुछ चाहिये तो नहीं। एक तरह से वह बेफ्रिक हो जाना चाहती है। 
पिंकी स्लेट पर जिम्मेदारी की इबारत जरूर लिखी हुई है लेकिन उसके सपने जिंदा है। वह भी दूसरे बच्चों की तरह नयी फ्राक पहनकर चांद को मुठ्ठी में कर लेना चाहती है। वह बारिश की पानी में भीगना चाहती है, गुनगुना चाहती है। वह चाहकर भी मजे मजे में एक पत्थर हवा में नहीं उछाल पाती क्योंकि उसे पता है कि इस पत्थर ने किसी का नुकसान कर दिया तो हर्जाना भरने की ताकत नहीं। उसे शायद पता नहीं कि कैसे उसके बचपन के सपने टूट रहे हैं लेकिन अहसास किसी उसके भीतर पल रहा है। गुस्सा आये तो सूरज से भी आंखें चार करने की ताकत रखती है पिंकी। पिंकी को बढ़ते, पढ़ते देखते हुये सहसा लगता है कि एक तरफ जहां सुविधाभोगी बच्चे अक्षर ज्ञान कर रहे हैं। कई क्लास पढ़ जाने के बाद भी उनकी स्लेट पर लिखी इबारत कोई सूरत नहीं बना पाती है। पिंकी शायद बीच में स्कूल छोड़ दे लेकिन जिम्मेदारी के स्लेट में लिखी इबारत ने जो अनुभव उसे दिये हैं, उसका कोई सानी नहीं है। वह विद्यार्थी होकर भी शिक्षक बन गयी है। जिंदगी की शिक्षक। 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

एक और गांधी की दस्तक


-मनोज कुमार
हाल ही के उप-चुनाव के परिणाम से जहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की सांसें लौट आयी है, वहीं भाजपा में मंथन का दौर शुरू हो गया है. सौ दिन में ही ऐसे परिणाम की अपेक्षा किसी को नहीं थी लेकिन जो हुआ, वह सच है और इससे मुकरना बचकाना होगा. अब सवाल यह है कि उपचुनाव का यह परिणाम क्यों हुआ? क्या इस उपचुनाव में भाजपा अकेले मैदान में थी और उनका सबसे प्रभावी और दमदार चेहरा नरेन्द्र मोदी गायब थे या फिर अमित शाह के भाजपा की कमान सम्हालने के बाद यह परिणाम आया है? कुछ भी हो सकता है लेकिन एक बात तय है कि इस परिणाम ने यह बता दिया कि सौ दिन पहले जिस नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा, माफ करना नरेन्द्र मोदी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, वह सौ दिन में काफूर होते नजर आ रही है। इस उपचुनाव में भाजपा ने कहीं नारा नहीं दिया इस बार मोदी सरकार. सरकार तो बन गयी थी, विधायक या सांसद के लिये भाजपा ने नहीं कहा कि मोदी की सफलता के कारण इन्हें जीताओ। इन परिणामों से यह बात तो तय हो गई कि जब भाजपा मैदान में होगी तो उसके लिये जीत का रास्ता निष्कंटक नहीं होगा लेकिन मोदी जैसे चेहरे को लेकर और इससे आगे कहें कि उनके भरोसे रहकर चुनाव लड़ेगी तो सौ दिन पुराना इतिहास दोहराया जाएगा. हालांकि एक पुरानी कहावत है काठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है और यह परिणाम इस बात के संकेत हैं.

खैर, इस चुनाव परिणाम ने अबकी बार, मोदी सरकार कहने वालों को सजग कर दिया है क्योंकि यह आगाज अंजाम तक पहुंचा सकता है. निकट भविष्य में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव में परिणाम उलटफेर वाले हो सकते हैं। उपचुनाव के परिणाम यह भी तय करेंगे कि आने वाले विधानसभा चुनाव में मोदी का चेहरा काम करेगा या भाजपा स्वयं मैदान में होगी. भाजपा में आत्ममंथन का दौर शुरू हो गया है और एक तरह से वे मोदीयुग से लौटने की तरफ है. हालांकि भाजपा की कमान सम्हाले अमित शाह ने कह दिया है उपचुनाव परिणाम से निराश होने की जरूरत नहीं है. विधानसभा चुनाव में जीत पक्की है. इसे एक ख्वाब भी कह सकते हैं. हालांकि इस परिणाम से भाजपा की पराजय दिखती जरूर है लेकिन दूरगामी फायदे का सौदा हो सकता है. आत्ममंथन के बाद भाजपा पराजय के कारणों की मीमांसा करेगी और अपनी स्थिति सुधारने का उसे जो मौका मिला है, उसका लाभ लेगी.

ऐतिहासिक पराजय से सदमें में कांग्रेस के लिये यह परिणाम एक तरह से संजीवनी का काम करते हैं. गुजरात में दो सीट और राजस्थान में तीन सीट की जीत बड़ी नहीं है लेकिन संबल  देने के लिये काफी है. कांग्रेसियों सहित जो लोग सोनिया-राहुल को कोसने में आगे निकल रहे थे, अब उनके सुर बदल जाएंगे. राजनीति का यह पुराना रोग है इसलिये इसमें अंचभे की कोई बात नहीं. हां, इस जीत को कांग्रेस सबक की तरह ले और आगामी विधानसभा चुनावों में अपनी जीत पक्की करने की कोशिश करे तो कम से कम दो-चार राज्यों के सहारे कांग्रेस का पांच वर्ष का वनवास कट सकता है.

समाजवादी पार्टी ने उत्तरप्रदेश में जो जीत दर्ज की है, वह अर्थवान है. जिस तरह से उत्तरप्रदेश, अपराध प्रदेश में बदल रहा था. इसके बावजूद इतनी बड़ी जीत भाजपा के लिये किसी सदमे से कम नहीं हैं. इस परिणाम ने एक और गांधी की आवाज तेज कर दी है. मेनका गांधी की ममता उमड़ रही है और वे अपने बेटेे को शीर्ष पर देखना चाहती हैं. पहले भी उन्होंने वरूण को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बनाने की बात कह चुकी हैं और अब इस परिणाम के बरक्स वे वरूण के दावे को पुख्ता बताने से नहीं चूक रही हैं. इससे अब देश को दो गांधी मिल जाएंगे. पहले राहुल गांधी तो जनता के सामने हैं ही, अब वरूण गांधी भी एक बड़े पद के दावेदार होंगे. मेनका की ख्वाहिश मुलायम के लिये राहत का विषय हो सकती है क्योंकि जिस तरह मेनका तेवर दिखा रही हैं, उससे समाजवादी पार्टी का नुकसान कम से कम होता जाएगा. बात साफ है कि इससे नुकसान भाजपा का ही होना है क्योंकि जिन दिग्गजों की नजरें बरसों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है, वे वरूण को कैसे आगे बढऩे दे सकते हैं.

इन उप चुनाव के परिणाम ने मीडिया की एक और सूरत दिखा दी है. कुछ पत्रकार अभी मोदी फोबिया से बाहर नहीं आ पाये हैं. एक टेलीविजन चैनल में एक बड़े पत्रकार ने कहा कि मोदी के आने के बाद बढ़ती महंगाई को मीडिया ने बढ़-चढ़ कर दिखाया था लेकिन जब कीमतें घटीं तो खबरें नदारद थी. इस वजह से जनता में संदेश अच्छा नहीं गया और चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. शायद ये पत्रकार महोदय कभी अपने घर के लिये आलू, प्याज और टमाटर खरीदने नहीं जाते हैं. दस रुपये किलो बिकने वाला आलू 40 रुपये और 15 रुपये किलो बिकने वाला टमाटर 80 रुपये हो गया और कीमत गिरी भी तो आलू 25 के भाव और टमाटर चालीस के. अगर महंगाई पर यही नियंत्रण है तो फिर क्या कहना. इससे यह भी मान लेना चाहिये कि जिस तरह लोकसभा में मतदाताओं ने महंगाई से त्रस्त आकर 272 की जरूरत को पूरा कर 282 सीटें दिला दी तो अब महंगाई की तरह गिरेंगे तो यही चुनाव परिणाम आएगा. बहरहाल, इस उपचुनाव परिणामों से यह बात साफ हो गई है कि भाजपा एक राजनीतिक दल है और वह जब भी होगी, टक्कर कांटें की होगी लेकिन मोदी जैसा चेहरा उतारेगी तो कुछ राहत पा सकती है. भाजपा को तो कहना चाहिए बार बार, हर बार मोदी सरकार.   

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

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