शुक्रवार, 22 मई 2015

उर्मिला बनी बदलाव की सबब


-मनोज कुमार
शादी का मंडप बना हुआ था. गीत-संगीत में सब मगन थे. उर्मिला भी दूसरी युवतियों की तरह सपने बुन रही थी. एक सुखी और आनंदमयी जिंदगी के लिये. कुछ ही घंटों बाद उर्मिला अपनी नयी जिंदगी की शुरूआत करने जाने वाली थी. इन शेष बचे घंटों ने उर्मिला की जिंदगी में तूफान ला खड़ा किया. जिस व्यक्ति के साथ पूरी जिंदगी बिताने के सपने बुन रही थी, उन सपनों से सेकंड में बाहर आकर उर्मिला ने शादी तोडऩे का ऐलान कर दिया. घर, परिवार, बराती, दुल्हा और मेहमान सब आवाक. उर्मिला ने इस ब्याह के लिये अपनी रजामंदी दी थी लेकिन उसे इस बात की खबर नहीं थी कि जिसे वह अपना जीवनसाथी बनाने जा रही है, वह नशे का आदी है. और यहां तक कि शादी के पवित्र मंडप में भी वह स्वयं को नशे से दूर नहीं कर पाया. उर्मिला को यह बात खल गयी और उसने शादी से इंकार कर दिया. उर्मिला के फैसले से सन्नाटा खिंच जाना स्वाभाविक था. कुछ समझाने बुझाने का दौर भी चला लेकिन उर्मिला अपने फैसले पर अडिग रही. लोगों को भी लगा कि उर्मिला का फैसला उचित है और वे उर्मिला के साथ खड़े हो गये. नशे में धुत्त दुल्हे को बैरंग वापस लौटना पड़ा. यह घटना है इसी साल 21 अप्रेल की. यह वही दिन था जब समूचा भारतीय समाज अक्षय तृतीया का उत्सव मना रहा होता है. इस साल का यह दिन इतिहास बन गया और उर्मिला एक ऐसी रोल मॉडल जिसके फैसले को नजीर मानकर युवतियों ने ऐसी शादी के खिलाफ स्वयं को खड़ा किया.
उर्मिला सोनवाने छत्तीसगढ़ राज्य के एक छोटे से कस्बानुमा नगर देवभोग की एक बहुत ही गरीब मध्यम परिवार की बेटी है. पिता ने अपनी जमीन बेचकर उर्मिला की शादी के लिये प्रबंध किया था. उर्मिला स्वयं राज्य शासन में एक  शासकीय कर्मचारी के तौर पर कार्य करती है. उर्मिला एक पिता की मजबूरी को समझती थी और वह अपने पिता के अरमानों को पूरा करना चाहती थी लेकिन वह अपनी जिंदगी को भी नरक नहीं बनने देना चाहती थी. अपने फैसले के बाद वह कहती है- कुछ खोकर भविष्य बचाया जा सकता है तो यह करना चाहिये. पिता की जमीन बिक गयी, यह सही है लेकिन मेरा भविष्य सुरक्षित हो गया. उर्मिला के इस फैसले से समाज का सन्नाटे में आ जाना कोई अनपेक्षित नहीं था लेकिन बदलाव की शुरूआत जो उर्मिला ने की है, उसकी गूंज देवभोग जैसे छोटे से हिस्से में ही नहीं बल्कि पूरे देश में होने लगी है. उर्मिला के इस साहसिक फैसले ने उन युवतियों को भी हौसला दिया है जो जानते और समझते हुये भी परिवार के दबाव में नशे का विरोध नहीं कर पाती थीं. आज वे भी ऐसे फैसले लेने के लिये आगे आ रही हैं. छत्तीसगढ़ के अनेक नगर और गांव में युवतियों ने अपना फैसला सुना दिया है कि शराबी दुल्हे से वे किसी भी कीमत पर ब्याह नहीं करेंगी.
छत्तीसगढ़ राज्य आदिवासी बाहुल्य राज्य है और शराब का नशा करना कभी इनकी जीवनशैली थी तो अब फैशन के रूप में यह जहर पूरे समाज को निगल रहा है. एक सच यह है तो दूसरा सच यह भी कि यह वही राज्य है जहां शराब के खिलाफ महिलाओं ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है. धुर आदिवासी जिला जशपुर में आज से तीन दशक पहले महिलाओं ने शराब के खिलाफ जो मोर्चा खोला था तो पुरूषों ने शराब से तौबा कर ली थी. इसी तरह अविभाजित मध्यप्रदेश में वर्तमान छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 40 किलोमीटर दूर स्थित भानसोज में शराब के खिलाफ महिलाओं ने 364 दिनों की लम्बी लड़ाई लड़ी थी और सरकार को हार मानकर शराब दुकान का लायसेंस निरस्त करना पड़ा था. बाद में शराब के खिलाफ इस आंदोलन पर पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय में पीएचडी की गई. शराब के खिलाफ छत्तीसगढ़ में महिलाओं ने दशकों से मोर्चा खोल रखा है और उर्मिला इस आवाज को आगे बढ़ाते हुये रोल मॉडल बन गयी हैं.
उर्मिला सोनवाने के इस साहसिक फैसले ने पूरे भारतीय समाज की दशा और दिशा बदल दी है. उर्मिला ने तो नशेड़ी दुल्हे को ठुकराया तो मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में एक युवती ने सलीके से बात नहीं करने पर ही शादी से इंकार कर दिया. मुख्यमंत्री सामूहिक योजना में शादी करने पहुंची युवती ने देखा कि उसका होने वाला पति अपने दोस्तों के साथ सरेआम गाली-गलौच से बात कर रहा है. गंदे-गंदे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है. युवती को अपने होने वाले पति का यह व्यवहार नागवार गुजरा. उसने सोचा कि आज शादी के मंडप में उसकी यह हालत है तो शादी के बाद वह उसके साथ भी ऐसी ही बदसलूकी करेगा. भविष्य की चिंता करते हुये युवती ने अपना रिश्ता तोड़ दिया. 
बदलते समय में बदलाव की यह बयार एक नये समाज के निर्माण का संकेत देती हैं. एक ऐसे समाज की जहां पुरूषों को अपनी मानसिकता बदलना होगी. सरकार और समाज को भी इस दिशा में उर्मिला, तुलेश्वरी और धनेश्वरी जैसी युवतियों के साथ खड़ा होकर नशे के खिलाफ संदेश देना होगा. बदलाव की यह बयार शुरू हो चुकी है।(

रविवार, 17 मई 2015

दोस्तों,
शोध पत्रिका "समागम" का मई 2015 का अंक सौपते हुए प्रसन्नता हो रही है. दुख इस बात का है कि हर बार एक नया वेतन आयोग आता है और हम सबको उम्मीद होती है कि अब की बार, वेतन भरमार होगी लेकिन ऐसा नहीं होता है. एक कोशिश है हमारी पीड़ा को आवाज़ देने की. अंक आपको कैसा लगा, ज़रूर बताएंगे।
संपादक

बुधवार, 6 मई 2015

सब्सिडी के त्यागी


मनोज कुमार
            नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वे अपने प्रचार के लिये कोई भी अवसर नहीं खोते हैं. पिछले कुछ महीनों से यह देखा जा रहा है कि जो भी नेता, मंत्री, विधायक या अन्य पदों पर विराजे लोग गैस सब्सिडी छोड़ रहे हैं, इस पर बकायदा अखबारों के लिये खबर जारी की जाती है. हालांकि वे इस बहाने अपने नेता नरेन्द्र मोदी तक तो बात पहुंचाना चाहते ही हैं कि उनके आदेश का पालन किया गया है और आम आदमी के बीच अपनी छवि भी बनाना चाहते हैं. सवाल यह है कि एक नेता के गैस सब्सिडी छोड़ दिया जाना खबर है या अब तक उसकेे द्वारा गैस सब्सिडी का लाभ लिया जाना? क्या इस पर कोई विमर्श नहीं होना चाहिये कि मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनते और वे अपने नेताओं को सब्सिडी छोडऩे के लिये निर्देश नहीं देते तो क्या उनका जमीर स्वयं होकर नहीं जागता? क्या उन्हें नहीं लगता कि भारी-भरकम मानदेय के साथ ही अनेक किस्म की सरकारी सुविधाओं से लैस होने के बाद भी वे सब्सिडी का लाभ उठाना अनुचित था? 
           सब्सिडी के मुद्दे पर एक सवाल यह भी उठता है कि एक के बाद एक नेता सब्सिडी छोडऩे का ऐलान कर रहे हैं. क्यों एक साथ समूचे लोग सब्सिडी छोडऩे का संकल्प नहीं लेते हैं? क्यों प्रधानमंत्री को ऐसी छोटी-छोटी बातों के लिये पहल करनी पड़ रही है? क्यों जनता के जनप्रतिनिधि जनता के लिये मिसाल नहीं बनते हैं? ऐसे हजार क्यों हैं, जिसे जवाब का इंतजार है लेकिन जवाब नहीं मिलता है. एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या केवल गैस सब्सिडी ही छोड़ देने से देश की अर्थव्यवस्था को लाभ होगा, आम गरीब आदमी को लाभ होगा? शायद नहीं, ऐसे दर्जनों विषय हैं जिन पर प्रधानमंत्री को नहीं, स्वयं राजनेताओं को सोचना होगा. इससे पहले उन्हें सस्ती लोकप्रियता के लिये ऐसी खबरें जारी करने से स्वयं को रोकना होगा. अपने अधीनस्थ पीआरओ को निर्देश देना होगा कि वे इस तरह के निजी हित की खबरों को न जारी करें और न ही प्रकाशन-प्रसारण में अपनी समय व शक्ति का उपयोग करें. पीआरओ तो मंत्री-नेता को खुश करने के लिये ऐसा करते हैं और करते रहेंगे क्योंकि उन्हें तनख्वाह ही इसी बात की मिलती है लेकिन मंत्री-नेता स्व-विवेक से तय करें कि कौन सी खबर से उनकी इमेज बनती है और कौन सी खबर उनकी इमेज की सेहत खराब करती है. पीआरओ तो अपना काम करते हैं. अखबार वालों पर भी तरस आता है कि वे ऐसी मामूली और गैर-जरूरी खबरों को न केवल प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं बल्कि संबंधित नेता-मंत्री की तस्वीर लगाना भी नहीं भूलते हैं. इसके लिये अखबार के सम्पादक और रिपोर्टर दोनों की जवाबदेही बनती है. यह भी सच है कि इस तरह की खबरों को अनदेखा करने का साहस सम्पादक और रिपोर्टर कई बार चाहने के बावजूद नहीं दिखा पाते हैं क्योंकि उनके अखबार का हित जुड़ा होता है और पत्र स्वामी का दबाव बना होता है.  
           इस मामले में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को संजीदा होने की जरूरत है. उन्हें अपने नेताओं को ताकीद करना होगा कि सब्सिडी छोडऩे जैसा मामला जनहित का नहीं, बल्कि स्वयं के नैतिकता का है तो नैतिक आधार पर ऐसी खबरों को अखबारों में जारी नहीं किया जाये और न ही इसे प्रचारित किया जाये. अपितु एक कदम आगे बढ़ते हुये अपने क्षेत्राधिकार के अधिकार सम्पन्न और आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को भी सब्सिडी छोडऩे के लिये प्रेरित करें ताकि सब मिलकर इस मुफ्तखोरी की आदत से मुक्ति पा सकें. होना यह चाहिये कि जिन नेताओं ने अब तक सब्सिडी का लाभ लिया है, उनसे इसके बदले मुआवजा वसूला जाना चाहिये. ऐसा किया गया तो आम आदमी में संदेश जाएगा कि हां, अब राजनीति नैतिक हो रही है. मोदीजी ने एक बेहतर पहल की है तो इस पहल को प्रपोगंंडा न बनाया जाये बल्कि समाजहित में इसे आगे बढ़ाने की पहल की जाये. एक भगीरथ प्रयास किया जाये और प्रयास को भगीरथ ही बनें रहने दें.

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

उम्मीद के मजदूर


मनोज कुमार
    एक मई की तारीख कितने लोगों को याद है? बस, उन चंद लोगों के स्मरण में एक मई शेष रह गया है जो आज भी इस उम्मीद में जी रहे हैं कि एक दिन तो हमारा भी आएगा. वे यह भी जानते हैं कि वह दिन कभी नहीं आएगा लेकिन उम्मीद का क्या करें? उम्मीद है कि टूटती नहीं और हकीकत में उम्मीद कभी बदलती नहीं. एक वह दौर था जब सरकार की ज्यादती के खिलाफ, अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने मजदूर सडक़ों पर चले आते थे. सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध करते हुये लाठी और गोली खाकर भी पीछे नहीं हटते लेकिन दुर्भाग्य देखिये. कैलेंडर पर जैसे-जैसे तारीख आगे बढ़ती गयी, मजदूर आंदोलन वैसे वैसे पीछे होता गया. अब तो मजदूर संगठनों की स्थिति निराशाजनक है. यह निराशा मजदूर संगठनों की सक्रियता की कमी की वजह से नहीं बल्कि कार्पोरेट कल्चर ने निराशाजनक स्थिति उत्पन्न की है.  मजदूर एकता जिंदाबाद के नारे सुने मुझे तो मुद्दत हो गये हैं. आपने शायद कभी सुना हो तो मुझेे खबर नहीं. भारत सहित समूचे विश्व के परिदृश्य को निहारें तो सहज ही ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी कि मजदूर नाम का यह शख्स कहीं गुम हो गया है. 
    कार्पोरेट सेक्टर के दौर में मजदूर यूनियन गुमशुदा हो गये हैं. एक के बाद एक संस्थानों का निजीकरण किया जा रहा है. निजी संस्थाओं को मजदूरों की जरूरत नहीं होती है. दस मजदूरों का काम एक मशीन करने लगी है. कार्पोरेट सेक्टर को मजदूर नहीं गुलाम चाहिये. मजदूर कभी गुलाम नहीं हो सकता है. मशीन गुलाम होती है और गुलाम का कर्तव्य होता है आदेश का पालन करना. मशीन कभी आवाज नहीं उठाती है.  लगातार बढ़ती यंत्र व्यवस्था ने समूचे सामाजिक जीवन का ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया है. हमारी जरूरतों के उत्पादों के निर्माण में यंत्रों के उपयोग से समय की बचत हो रही है, गुणवत्ता भी शायद ज्यादा होगी लेकिन जीवंतता नदारद है. एक मजदूर के बुने गये कपड़ों में उसकी सांसों की गर्मी सहज रूप से महसूस की जा सकती है. उसके द्वारा बुने गये धागों में मजदूर की धडक़न को महसूस किया जा सकता है. एक मशीन के उत्पाद में कोई जीवंतता नहीं होती है. इन उत्पादों से मनुष्य की बाहरी आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो रही है किन्तु मन के भीतर संतोष का अभाव महसूस किया जा सकता है. 
     इस यंत्र व्यवस्था ने न केवल मजदूरों का हक छीना बल्कि लघु उद्योगों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया है. हर तरफ यंत्र ने ऐसा कब्जा जमाया है कि आम आदमी स्वयं का गुलाम होकर रह गया है. रेल्वे स्टेशनों पर आपको कुलियों की फौज देखने को नहीं मिलेगी क्योंकि इस यांत्रिक व्यवस्था ने हर मुसाफिर को कुली बना दिया है. भारी-भरकम सूटकेस में लगे पहियों को खींचते हुये वह पैसा बचाने में लगा है. सूटकेस में लगे पहिये कुलियों को चिढ़ा रहे हैं और शायद कह रहे हैं ले, अब हो गई तेरी छुट्टी. छुट्टी कुली के रोजगार की ही नहीं हुई है बल्कि उसके चौके-चूल्हे की भी हो गई है. मजदूरी नहीं मिलेगी तो चूल्हा जलेगा कैसे? ऐसे कई काम-धंधे हैं जिन्होंने कामगारों के हाथों को बेकार और बेबस किया है. सत्ता और शासकों की नींद उड़ा देने वाली आवाज आहिस्ता आहिस्ता मंद पडऩे लगी है. यंत्रों ने जैसे मजदूरों की शेर जैसी दहाड़ को अपने भीतर कैद कर लिया है. शायद यही कारण है कि मजदूर दिवस की ताप से अब समाज गर्माता नहीं है. सोशल मीडिया में भी मई दिवस की आवाज सुनाई नहीं देती है. अखबार के पन्नों पर कहीं कोई खबर बन जाये तो बड़ी बात, टेलीविजन के पर्दे पर भी मजदूर दिवस एक औपचारिक आयोजन की तरह होता है. हैरान नहीं होना चाहिये कि आपका बच्चा कहीं आपसे यह सवाल कभी कर बैठे-यह मजदूर क्या होता है? नयी पीढ़ी को तो यह भी नहीं पता कि एक मई क्या होता है?  इस विषम स्थिति के बावजूद मजदूर उम्मीद से है. उसे इस बात का इल्म है कि दुनिया बदल रही है. इस बदलती दुनिया में मजदूर की परिभाषा भी बदल गई है लेकिन मजदूर और किसान कभी नाउम्मीद नहीं होते. उनकी दुनिया बदल जाएगी, इस उम्मीद के साथ वे जीते हैं. वे मौका आने पर कह भी देते हैं कि - ‘हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे/इक गांव नहीं, इक खेत नहीं, सारी की सारी दुनिया मांगेंगे. उम्मीद से जीते मजदूर और मजदूर दिवस को मेरा लाल सलाम. 

रविवार, 26 अप्रैल 2015

एक रिपोर्टर के रोमांचक अनुभव का दस्तावेज है किताब ‘ऑंखों देखी फॉंसी’


भोपाल। किताब ‘ऑंखों देखी फॉंसी’ एक रिपोर्टर के रोमांचक अनुभव का दस्तावेज है. किसी पत्रकार के लिये यह अनुभव बिरला है तो संभवत: हिन्दी पत्रकारिता में यह दुर्लभ रिपोर्टिंग. लगभग पैंतीस वर्ष बाद एक दुर्लभ रिपोर्टिंग जब किताब के रूप में पाठकों के हाथ में आती है तो पीढिय़ों का अंतर आ चुका होता है. बावजूद इसके रोमांच उतना ही बना हुआ होता है जितना कि पैंतीस साल पहले. एक रिपोर्टर के रोमांचक अनुभव का दस्तावेज के रूप में प्रकाशित किताब ‘ऑंखों देखी फॉंसी’ हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध बनाती है. देश के ख्यातनाम पत्रकार एवं राजनीतिक विश£ेषक के रूप में स्थापित श्री गिरिजाशंकर की बहुप्रतीक्षित किताब का विमोचन भोपाल में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने 25 अप्रेल 2015 को एक आत्मीय आयोजन में किया. इस अवसर पर कार्यक्रम में वरिष्ठ सम्पादक श्री श्रवण गर्ग भी उपस्थित थे.
किताब लोकापर्ण समारोह में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने कहा कि उनके लिये यह चौंकाने वाली सूचना थी कि फांसी की आंखों देखा हाल कव्हरेज किया गया हो. वे अपने उद्बबोधन में कहते हैं कि किताब को पढऩे के बाद लगा कि समाज के लिये बेहद जरूरी किताब है. वे कहते हैं कि फांसी के मानवीय पहलुओं को लेखक ने बड़ी गंभीरता से उठाया है. उनका कहना था कि गिरिजा भइया जितने सहज और सरल हैं और उतने ही संकोची भी बल्कि वे भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं जो थोड़े में संतोष कर लेते हैं. 
किताब लोकापर्ण समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ सम्पादक श्री श्रवण गर्ग ने कहा कि-यह किताब रिपोर्टिंग का अद्भुत उदाहरण है. एक 25 बरस के नौजवान पत्रकार की यह रिपोर्टिंग हिन्दी पत्रकारिता के लिये नजीर है. उन्होंने किताब में उल्लेखित कुछ अंश को पढक़र सुनाया तथा कहा कि आज तो हर अपराध पर फांसी दिये जाने की मांग की जाती है. फांसी कभी दुर्लभ घटना हुआ करती थी लेकिन आज वह सार्वजनिक हो चुका है. उन्होंने दिल्ली में किसान गजेन्द्रसिंह द्वारा लगाये जाने वाले फांसी के संदर्भ में अपनी बात कही.
किताब लोकार्पण समारोह में लेखक श्री गिरिजाशंकर ने अपने अनुभव उपस्थित मेहमानों के साथ साझा करते हुये कहा कि यह किताब कोई शोध नहीं है और न कोई बड़ी किताब, लाईव कव्हरेज एवं अनुभवों को पुस्तक के रूप में लिखा गया है. श्री गिरिजाशंकर कहते हैं कि 25 बरस की उम्र में जब मुझे फांसी का लाइव कव्हरेज करने का अवसर मिला था, तब यह इल्म नहीं था कि कौन सा दुर्लभ काम करने जा रहे हैं. अखबार में फांसी का लाइव कव्हरेज प्रकाशित हो जाने के बाद जब देशभर में यह रिपोर्टिंग चर्चा का विषय बनी तब अहसास हुआ कि यह रिपोर्टिंग साधारण नहीं थी. 
फांसी की रिपोर्टिंग की यह दुर्लभ घटना हिन्दी पत्रकारिता के लिये स्वर्णकाल है. उल्लेखनीय है कि वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर के सेंट्रल जेल में वर्ष 1978 में बैजू नामक अपराधी को चार हत्याओं के लिये फांसी की सजा दी गई थी.

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

21 अप्रेल अक्षय तृतीया पर विशेष


रूढिय़ों से मुक्त करेंगी हमारी बेटियां 
-मनोज कुमार
भारतीय उत्सव एवं तीज-त्योहारों में एक प्रमुख और शुभ दिन यूं तो अक्षय तृतीया को माना गया है किन्तु यह दिन भारतीय समाज के लिये कलंक का दिन भी होता है जब सैकड़ों की संख्या में दुधमुंहे बच्चों को शादी के बंधन में बांध दिया जाता है. समय परिवर्तन के साथ सोच में बदलाव की अपेक्षा किया जाना सहज और सरल है लेकिन व्यवहार रूप में यह कठिन भी. बाल विवाह नियंत्रण के लिये कानून है लेकिन कानून से समाज में कोई खौफ उत्पन्न हुआ हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता है. बीते एक दशक में समाज की सोच में परिवर्तन दिखने लगा है तो यह बदलाव राज्य सरकारों द्वारा महिलाओं के हित में क्रियान्वित की जा रही वह विविध योजनायें हैं. यह योजनायें महिलाओं में शिक्षा से लेकर रोजगार तक के अवसर दे रही हैं. इसके पहले समाज के समक्ष बेटियों के लिये ऐसा कोई ठोस विकल्प नहीं था, सो बाल विवाह कर जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना ही एक रास्ता था लेकिन अब पूरे देश में बेटियों के लिये आसमान खुला है. वे जहां तक चाहें, उड़ सकती हैं, खिलखिला सकती हैं. शादी की बेडिय़ां टूटने लगी हैं. 
भारतीय समाज में बाल विवाह एक पुरातन रूढि़वादी परम्परा रही है. दुर्भाग्यजनक बात तो यह है कि बदलते समय के साथ हम अपनी मानसिकता नहीं बदल पा रहे थे. दुनियादारी से अबूझ बच्चों को शादी के बंधन में बांध कर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते थे. यह दृष्टि खासतौर पर बेटियों के लिये थी क्योंकि सयानी बेटी के लिये दहेज एक भीषण संकट होता था. महिला शिक्षा का प्रतिशत तो शर्मनाक था. कहने के लिये हम आजाद भारत के नागरिक हैं किन्तु स्त्रियों के साथ जो कुछ होता था, वह शर्मनाक है. हमारा यह भी आशय नहीं है कि सारी दुनिया बदल गयी है लेकिन बदलाव की आहट से रूढि़वादी परम्परा के खिलाफ एक उम्मीद की किरण जागी है. बहुत समय नहीं हुुआ है. कोई एक और अधिकतम डेढ़ दशक का समय है जब समाज की सोच बदलने के लिये सरकारों ने लोकतांत्रिक ढंग से एक बेहतर शुरूआत की है. महिला सशक्तिकरण की बातें करते युग गुजर गया लेकिन महिला सशक्तिकरण की कोई मुकम्मल तस्वीर नहीं बन पायी थी. आज स्थिति एकदम उलट है.
राज्य सरकारों ने सुनियोजित ढंग से बेटियों की सुरक्षा, विकास और आत्मविश्वास के लिये योजनाओं का श्रीगणेश किया. बेटियों को आगे बढऩे के लिये शिक्षा पहली शर्त थी और इसके लिये सारे उपाय किये गये. स्कूल तो पहले ही थे लेकिन फीस, कॉपी-किताब और गणवेश के लिये मां-बाप के पास धन नहीं था. घर से स्कूल की दूरी इतनी होती थी कि पालक बेटियों को पढ़ाना नहीं चाहते थे. सरकारों ने समस्या को देखा और इन समस्याओं को चुटकियों में हल कर दिया. शिक्षा नि:शुल्क हो गई. कॉपी-किताब और गणवेश सरकार के खाते से मिलने लगी और स्कूल आने-जाने के लिये सायकल भी मुहय्या करा दी गई. स्कूल के बाद कॉलेज की शिक्षा का प्रबंध भी सरकार ने कर दिया. शिक्षा ने बेटियों के मन में आत्मविश्वास उत्पन्न किया और वे देखते ही देखते सशक्त होती चली गयीं. पाठशाला से परदेस तक शिक्षा हासिल करने का रास्ता सरकार ने बेटियों के लिये सुगम कर दिया है. सरकार ने शिक्षित बेटियों के साथ साथ उन महिलाओं के लिये नये नये रोजगार के अवसर उत्पन्न किये जिसके चलते वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गयीं. गांव-गांव में फैली स्व-सहायता समूह से जुड़ी महिलायें न केवल आय अर्जित कर रही हैं बल्कि समाज के विकास में वे अपनी समझ का लोहा भी मनवा रही हैं. पंचायतों में उनकी सक्रिय भागीदारी से विकास का नया ककहरा लिखा जा रहा है. 
शासन की विभिन्न लोककल्याणकारी योजनाओं के निरंतर क्रियाशील रहने से अनेक रूढि़वदी परम्पराओं पर नियंत्रण पाने में आसानी होने लगी है. रूढि़वादी परम्पराओं में से एक बाल विवाह विकासशील समाज के लिये चुनौती था. इससे निपटने के लिये सरकार ने जहां बेटियों को स्वयं के स्तर पर सक्षम हो जाने के अवसर दिये, वहीं उन्होंने पालकों को शासन की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आश्वतस्त किया कि बेटियों के ब्याह की चिंता ना करें. शासन का यह आश्वासन कागजी नहीं था. बेटियों के जन्म लेने से लेकर शिक्षा और उनके ब्याह की जिम्मेदारी सरकार ने स्वयं ले ली थी. बेटियों को जन्म के साथ ही आर्थिक सुरक्षा प्रदान की गई जो 18 बरस की होते होते लखपति बन जाती हैं. बेटियों की शादी के लिये आर्थिक मदद के साथ ही गृहस्थी के सामान का बंदोबस्त कर दिया जिससे पालक बेफ्रिक हो गये. 
शासन की इन योजनाओं ने समाज का मन बदला है. डेढ़ दशक पहले के बाल विवाह के आंकड़ों को देखें और आज तो यह बात साफ हो जाती है कि लोगों का मानस बदल रहा है. यह कहना भी बेमानी होगी कि शासन की योजना के कारण समूचे समाज का मानस बदल चुका है लेकिन बदलाव के लिये कदम बढ़ चुके हैं. यह बदलाव नहीं है बल्कि बदलाव की बयार है जो आने वाले समय में पूरा परिदृश्य बदल कर रख देगी. यह बदलाव लाने का उपक्रम शासन की योजनाओं से हुआ हो लेकिन बदलाव का सबब बनेंगी आज शिक्षा हासिल करती बेटियां. आज सशक्त होती बेटियां, आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती बेटियां. आज की बेटियां, कल का भविष्य हैं और यही एक नये भारत का निर्माण करेंगी जहां बाल विवाह, दहेज और छुआछूत जैसे सामाजिक कोढ़ से मुक्त होगा हमारा समाज.

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

संघर्ष की प्रतिमूर्ति बाबा साहेब आम्बेडकर


-अनामिका
    डॉ. भीमराव आम्बेडकर की प्रतिष्ठा भारतीय समाज में देश के कानून निर्माता के रूप में है. भारत रत्न से अलंकृत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का अथक योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता. वे हम सब के लिये प्रेरणास्रोत के रूप में युगों-युग तक उपस्थित रहेंगे. उनके विचार, उनकी जीवनशैली और उनके काम करने का तरीका हमेशा हमें उत्साहित करता रहेगा. बाबा साहेब धनी नहीं थे और न ही किसी उच्चकुलीन वर्ग में जन्म लिया था. वे अपने जन्म के साथ ही चुनौतियों को साथ लेकर इस दुनिया में आये थे लेकिन इस कुछ कर गुरजने की जीजिविषा ने उन्हें दुनिया में वह मुकाम दिया कि भारत वर्ष का उनका आजन्म ऋणी हो गया.  बाबा साहेब आज भले ही हमारे बीच में उपस्थित नहीं हैं लेकिन उन्होंने एक सफल जीवन जीने का जो मंत्र दिया, एक रास्ता बनाया, उस पर चलकर हम एक नये भारत के लिये रास्ता बना सकते हैं. यह रास्ता ऐसा होगा जहां न तो कोई जात-पात होगा और न ही अमीरी-गरीबी की खाई होगी. समतामूलक समाज का जो स्वप्र बाबा साहेब ने देखा था और उस स्वप्र को पूरा करने के लिये उन्होंने जिस भारतीय संविधान की रचना की थी, वह रास्ता हमें अपनी मंजिल की तरफ ले जायेगा. 
14 अप्रेल 1891 का वह शुभ दिन जब देश की यह भूमि कृतार्थ हो गयी क्योंकि इस दिन एक ऐसे बालक ने जन्म लिया था, जिसने अपने कार्यों से इतिहास लिख दिया. यह वह समय था छुआ-छूत का मसला शीर्ष पर था और ऐसे में बाबा साहेब जैसे लोगों को आगे बढऩा बेहद कठिन था लेकिन कभी ‘कभी हार नहीं मानूगां’ के संकल्प के साथ उन्होंने सारे कंटक भरे रास्ते को सुगम बना लिया. कहते हैं, जहाँ चाह है वहाँ राह है। प्रगतिशील विचारक एवं पूर्णरूप से मानवतावादी बङौदा के महाराज सयाजी गायकवाङ़ ने भीमराव जी को उच्च शिक्षा हेतु तीन साल तक छात्रवृत्ति प्रदान की, किन्तु उनकी शर्त थी की अमेरिका से वापस आने पर दस वर्ष तक बङौदा राज्य की सेवा करनी होगी। भीमराव ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से पहले एम. ए. तथा बाद में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की। ‘भारत का राष्ट्रीय लाभ’  विषय पर उनके इस शोध के कारण उनकी बहुत प्रशंसा हुई। उनकी छात्रवृत्ति एक वर्ष के लिये और बढ़ा दी गई। चार वर्ष पूर्ण होने पर जब भारत वापस आये तो बङौदा में उन्हे उच्च पद दिया गया किन्तु कुछ सामाजिक विडंबना की वजह से एवं आवासीय समस्या के कारण उन्हें नौकरी छोङक़र बम्बई जाना पङ़ा। 
बम्बई में सीडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए किन्तु कुछ संकीर्ण विचारधारा के कारण वहाँ भी परेशानियों का सामना करना पङ़ा। इन सबके बावजूद आत्मबल के धनी भीमराव आगे बढ़ते रहे। उनका दृढ़ विश्वास था कि मन के हारे, हार है, मन के जीते जीत। 1919 में वे पुन: लंदन चले गये। अपने अथक परिश्रम से एम.एस.सी., डी.एस.सी. तथा बैरिस्ट्री की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे। 1923 में बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत शुरु की अनेक कठनाईयों के बावजूद अपने कार्य में निरंतर आगे बढते रहे। एक मुकदमे में उन्होने अपने ठोस तर्कों से अभियुक्त को फांसी की सजा से मुक्त करा दिया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। इसके पश्चात बाबा साहेब की प्रसिद्धि में चार चाँद लग गया।
डॉ. आंबेडकर की लोकतंत्र में गहरी आस्था थी।  उनकी दृष्टि में राज्य एक मानव निर्मित संस्था है। इसका सबसे बङा कार्य ‘समाज की आंतरिक अव्यवस्था और बाह्य अतिक्रमण से रक्षा करना है।’ परन्तु वे राज्य को निरपेक्ष शक्ति नही मानते थे। उनके अनुसार- ‘किसी भी राज्य ने एक ऐसे अकेले समाज का रूप धारण नहीं किया जिसमें सब कुछ आ जाय या राज्य ही प्रत्येक विचार एवं क्रिया का स्रोत हो।’ अपने कठिन संर्घष और कठोर परिश्रम से उन्होंने प्रगति की ऊंचाइयों को स्पर्श किया था। अपने गुणों के कारण ही संविधान रचना में, संविधान सभा द्वारा गठित सभी समितियों में 29 अगस्त, 1947 को ‘प्रारूप-समिति’ जो कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण समिति थी, उसके अध्यक्ष पद के लिये बाबा साहेब को चुना गया।  संविधान सभा में सदस्यों द्वारा उठायी गयी आपत्तियों, शंकाओं एवं जिज्ञासाओं का निराकरण बङ़ी ही कुशलता से किया गया। उनके व्यक्तित्व और चिन्तन का संविधान के स्वरूप पर गहरा प्रभाव पङ़ा। उनके प्रभाव के कारण ही संविधान में समाज के पद-दलित वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उत्थान के लिये विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाओं और प्रावधानों का निरुपण किया ; परिणामस्वरूप भारतीय संविधान सामाजिक न्याय का एक महान दस्तावेज बन गया।
मधुमेह रोग से पीडि़त बाबा साहेब ने अपनी अंतिम पांडुलिपि ‘बुद्ध और उनके धम्म’ को पूरा करने के तीन दिन बाद 6 दिसंबर 1956 को अपना शरीर त्याग दिया.  बाबा साहब कहते थे कि -मैं  ऐसे  धर्म  को  मानता  हूँ  जो  स्वतंत्रता , समानता, और  भाईचारा  सिखाये.  अगर  धर्म  को  लोगो  के  भले  के  लिए  आवशयक  मान  लिया  जायेगा तो  और  किसी  मानक  का  मतलब  नहीं  होगा. उन्होंने जो कहा, उसका निर्वाह जीवन भर किया. आज भले ही बाबा हमारे बीच नहीं हैं लेकिन एक आदर्श समाज की रचना करने का जो पथ वे आलौकित कर गये हैं, वे भारत को नित विकास के पथ पर आगे बढ़ाते रहेंगे. डॉ. भीमराव आम्बेडकर का जन्म भारत की जिस धरा पर हुआ, वह आगे चलकर मध्यप्रदेश कहलाया. मध्यप्रदेश को देश का ह्दयप्रदेश भी कहा जा सकता है और उस ह्दयप्रदेश में बाबा साहेब जैसे महान व्यक्ति का जन्म हुआ तो ह्दयप्रदेश, मध्यप्रदेश स्वयं को गौरवांवित महसूस कर सकता है और करना भी चाहिये. बाबा साहेब का जन्मस्थल महू आज एक नगर नहीं बल्कि तीर्थनगरी है और हर वर्ष करोड़ों लोग आत्मबल प्राप्त करने के लिये इस तीर्थस्थल में आते हैं.

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