गुरुवार, 15 जून 2017
रविवार, 4 जून 2017
जिम्मेदारी का घड़ा और स्वच्छता की पहल
मनोज कुमार
गर्मी की तपन बढऩे के साथ ही अनुपम मिश्र की याद आ गयी. उनके लिखे को एक बार फिर पढऩे का मन किया. उनको पढ़ते हुए मन में बार बार यह खयाल आता कि वे कितनी दूर की सोचते थे. एक हम हैं कि कल की भी सोच पाने में समर्थ नहीं है. तालाब आज भी खरे हैं, को पढ़ते हुए लगता है कि जिस राजधानी भोपाल में मैं रहता हूं, वह तो ताल और तलैया की नगरी है. इससे छलकता पानी बरबस हमें सम्मोहित कर लेता है लेकिन 25-30 किलोमीटर दूर चले जाने पर वही भयावह सूखा दिखता है. गर्मी की तपन के साथ ही सबसे पहले गले को चाहिए ठंडा पानी लेकिन जब मैंने पानी बचाया ही नहीं तो मुझे पानी मिलेगा कहां से? यह सोचते हुए मन घबरा जाता है. सोचता हूं कि मेरे जैसे और भी लोग होंगे. प्यासे और पसीने से तरबतर. ऐसेे में मुझे सहसा लाल कपड़ों में लिपटे घड़ों की याद आ जाती है. दूर से ही अपनी ओर बुलाती है. हर घड़ा कहता है आओ, अपनी प्यास बुझाओ. मैं बरबस उसकी तरफ खींचा चला जाता हूं. घड़े के भीतर से पानी का दो बूंद गले से उतरते ही जैसे मन खिल उठता है.
ऐसा करते समय एक सवाल मन में उठता है. सवाल है कि घड़ा तो तपती दोपहरी में भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है लेकिन मैं अपनी जिम्मेदारी से क्यों बच रहा हूं. माना की जल का संकट है लेकिन इतना तो कर ही सकता हूं कि राहगीरों के लिए दो घड़े पानी रख दूं. जिम्मेदारी का घड़ा रखने का खयाल मन में सहज भाव से आता है. साथ में यह भी खयाल आता है कि मैं तो जिम्मेदारी का घड़ा उठाने के लिए तैयार हूं. औरों को भी इसके लिए प्रेरित करूंगा. जिम्मेदारी का यह घड़ा न केवल राहगीर की प्यास ही नहीं मिटाएगा बल्कि वह कई समस्याओं का समाधान करेगा. यह तो सच है कि प्यास लगेगी तो पानी पीना ही पड़ेगा. यह पानी उस घड़े का ठंडा पानी हो या और किसी स्रोत से. जब और किसी स्रोत की बात करते हैं तो एक ही विकल्प दिखता है बाजार का पानी. बाजार का पानी का मतलब पाउच या बोतलबंद पानी. दो रुपये का पाउच का पानी और 15 रुपये के बोतलबंद पानी के विकल्प में किसी के सामने दो रुपये का पाउच ही सस्ता सौदा साबित होता है. एक गिलास पानी के लिए 15 रुपये जेब से ढीला करना गंवारा नहीं और फिर उसे साथ लेकर चलने की मुसीबत अलग से. सो दो रुपये का पाउच लिया. हलक में उसके भीतर का पानी उतारा और मर्जी जहां फेंका और आगे निकल गए.
राहगीर को रास्ते में जिम्मेदारी का जल से भरा घड़ा मिल जाए तो उसे विकल्प की तरफ भागना नहीं होगा. अंजुलियों में पानी भरकर न केवल पियेगा बल्कि हथेलियों में उलझी पानी की बूंदों से वह चेहरे को भी ठंडक दे पाएगा. क्या पाउच या बोतलबंद पानी में वह कर पाएगा? शायद नहीं. इसके इतर जिम्मेदारी का घड़ा नहीं होगा तो राहगीर के भीतर बाजार का भाव आएगा. वह इस गुमान में होगा कि मोल चुकता कर पानी खरीदा है तो वह मर्जी से खर्च करेगा. यानि पानी बचाने की भावना तो उसके भीतर आएगी नहीं और बेपरवाह अलग हो जाएगा. अपनी इसी बेपरवाही में वह पानी का पाउच उपयोग करने के बाद यूं ही सडक़ पर फेंक कर चलता बनेगा. इस प्लास्टिक के पाउच से होने वाले नुकसान का वह अंदाज भी नहीं पाता है क्योंकि उसने जिम्मेदारी का घड़ा उठाया ही नहीं है. उसके भीतर पानी बचाने की भावना पैदा करनी है और जिम्मेदार बनाना है तो पुरखोंं के जमाने से चले आ रहे प्याउ की परम्परा को जिंदा करना होगा. यह सच है कि यह परम्परा अभी खत्म नहीं हुई है लेकिन सहज और सुविधा के बाजार ने इसे छीन लेने के लिए जाल जरूर फैला दिया है.
प्याउ की इस संस्कारवान परम्परा को आगे बढ़ाने का यह बेहतर अवसर है. स्कूलों से बच्चों की छुट्टियां लग चुकी है या लगने वाली है. उनके पास भी टाइमपास के लिए कोई काम चाहिए तो सो उन्हें एक-एक घड़ा पानी भरने का काम सौंप दीजिए. शर्त यही है कि इसमें उनका साथ आपको भी देना होगा. बच्चों को जब आप जिम्मेदारी का घड़ा उठाना सिखा रहे होंगे तब आप उनके भीतर एक संस्कार का श्रीगणेश करते हैं. यही नहीं, पानी के साथ पर्यावरण स्वच्छता का पाठ भी आप उन्हें पढ़ाते हैं. टेलीविजन और मोबाइल से इतर भी एक दुनिया है जहां जिम्मेदारी के घडक़े के साथ आप बच्चों को प्रवेश दिला सकते हैं. यकिन मानिये उनके भीतर संस्कार का यह बीज आने वाले सालों साल तक एक एक बच्चे के भीतर अनुपम मिश्र को जिंदा रखेगा क्योंकि जिम्मेदारी के इस घड़े में अनुपम छाप जो होगी.
शनिवार, 27 मई 2017
ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म
-मनोज कुमार
‘ठोंक दो’ पत्रकारिता का ध्येय वाक्य रहा है और आज मीडिया के दौर में ‘काम लगा दो’ ध्येय वाक्य बन चुका है। ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म का यह बदला हुआ स्वरूप हम देख रहे हैं। कदाचित पत्रकारिता से परे हटकर हम प्रोफेशन की तरफ आगे बढ़ चुके हैं जहां उद्देश्य तय है, ध्येय तो गुमनाम हो चुका है। इस बदलाव का परिणाम है कि हम अपने ही देश मेें अभिव्यक्ति की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हम भूल जाते हैं कि पराधीन भारत में हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता गोरे शासकों ने नहीं दी थी और उनसे जो बन पड़ा, वह हम पर नियंत्रण करने की कोशिश करते रहे लेकिन पत्रकारिता के हमारे पुरोधाओं ने उनकी परवाह किए बिना ‘ठोंकते’ रहे और वे बेबस रह गए। आज ऐसा क्या हुआ कि हम संविधान में उल्लेखित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बावजूद बेबस हैं? सवाल यह नहीं है कि हमें अभिव्यक्ति की आजादी है कि नहीं। सवाल यह है कि हमने अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वच्छंदता मान लिया और उसका बेजा उपयोग करने लगे। जब स्वतंत्रता का अर्थ बदल कर स्वछंदता हो जाए तो यह स्थिति आनी ही है।
भारत में हिन्दी पत्रकारिता का उदयकाल 30 मई 1826 को माना जाता है। इस दिन साप्ताहिक पत्र ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन आरंभ हुआ था। इसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता देश के कोने कोने से समाचारपत्र एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन आरंभ हुआ। यह वह समय था जब प्रकाशन व्यवसाय नहीं था। पत्रकारिता मिशन थी और यही मिशन ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता कहलाती थी। तब प्रकाशनों के समक्ष सर्वजन सुखाय, सर्वजनहिताय प्रमुख होता था। प्रकाशनों से आय अर्जित करना लक्ष्य नहीं था बल्कि तब घर फूंक तमाशा देखा जाता था। एक कमिटमेंट के साथ पत्रकारिता होती थी। यह परम्परा भारत के स्वाधीन होने के बाद भी बनी रही। अब भारत की पत्रकारिता के समक्ष नव-भारत के निर्माण का लक्ष्य था। चुनौती यह थी कि अब अपने ही लोगों के खिलाफ लडऩा है। उनकी कमियां बतानी है और उन्हें सजग और सचेत करना है। यह जवाबदारी भी एक परम्परा के रूप में पूरी हो रही थी क्योंकि आजादी के जंग में जिन्होंने अपना सर्वस्व स्वाहा किया था, वह सोने की चिडिय़ा कहलाने वाले भारत को उसका गौरव, उसका अभिमान लौटाने के लिए बेताब थे। इस बात से भी इंकार नहीं कि उस दौर में प्रतिबद्ध पत्रकारों की फौज थी तो उनका सम्मान करने वाले राजनेताओं की संख्या भी बड़ी थी। दोनों के मध्य समझ और सामजंस्य से पत्रकारिता लगातार परवान चढ़ रही थी। हैरानी की बात यह है कि तब पत्रकारिता को अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सत्ता और शासन से लडऩा नहीं पड़ा। पत्रकारिता को लिखने की पूर्ण स्वतंत्रता थी बल्कि कई बार तो ऐसी रिपोर्ट और लेखों पर सरकार और सत्ता की तरफ से हौसला बढ़ाया जाता था। दोनों पक्षों को यह पता था कि जो लिखा जा रहा है, वह लक्ष्यभेदी नहीं है बल्कि ध्येनिष्ठ है और समाज की शुचिता के लिए है।
यह वह समय था जब अखबार को समाज का दर्पण माना गया और सत्ता-शासकों ने पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ कहा। भारत में ही पत्रकारिता की इस महत्ता को समझा गया था क्योंकि भारत की ही पत्रकारिता ने अंंग्रेजों को भारत छोडऩे के लिए मजबूर किया और असंख्य भारतवासियों को शब्द से जगाने का कार्य किया। जो पत्रकारिता कल तक भारत का चौथा स्तंभ थी और आज क्या हुआ कि वह स्वयं की स्वतंत्रता के लिए बेबस हो गई है? क्या देश के तीन और स्तंभ ने भी कभी अपनी स्वतंत्रता के लिए गुहार लगायी है? तब जवाब ना में होगा और कुतर्क के तौर पर दलील दी जाएगी कि शेष तीन स्तंभ संवैधानिक हैं। बात कुछ हद तक गलत नहीं है लेकिन पूरी तरह सही भी नहीं है क्योंकि जिस पत्रकारिता में राजसत्ता बदलने की ताकत हो, वह पत्रकारिता स्वयं की स्वतंत्रता को कायम ना रख पाए तो अनेक सवाल खड़े होते हैं। जैसा कि पहले ही कहा गया कि स्वतंत्रता और स्वछंदता में महीन सा अंतर होता है। स्वतंत्रता का अर्थ अनुशासन से है जबकि स्वच्छंदता का अर्थ अनुशासनहीनता से। कोई गुरेज नहीं कि हमने स्वतंत्रता का अर्थ ही बदल दिया है और स्वच्छंदता के लिए लड़ रहे हैं। यह स्थिति दुर्भाग्यजनक क्योंकि जो पत्रकारिता समाज का दर्पण हो, समाज आज उसे अपना चेहरा देखने के लिए कह रही है।
भारतीय पत्रकारिता के बीते तीन दशक के दौर को छोड़ दें तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठा। उल्टे जब तब अवसर आया तो हर बार छपी खबरों का हवाला देकर प्रमाणित करने की कोशिश की गई। अखबारों का उल्लेख तो इस तरह होता है जिस तरह किसी धार्मिक ग्रंथ को साक्ष्य मानकर बोला जाता है। इतनी विश्वसनीयता समाज के दूसरे किसी सेक्टर पर कभी नहीं रहा। आज भी हम पत्रकारिता के संक्रमणकाल से गुजर रहे हैं और बार-बार पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगने के बाद भी भरोसा अभी पूरी तरह टूटा नहीं है। जब समाज का हम पर इतना भरोसा है तो फिर क्या कुछ हुआ कि हम बेबस हो गए हैं? इस बेबसी के बरक्स हमें आत्मचिंतन करना होगा। आखिर हमारी चूक कहां हुई और शायद कर रहे हैं।
पत्रकारिता से मीडिया में परिवर्तित हुआ यह परिदृश्य क्यों अविश्वसनीय हुआ, इसकी पड़ताल करना जरूरी लगता है। इस क्रम में सबसे पहले मुद्रित माध्यम की चर्चा करना जरूरी लगता है। भारत में पत्रकारिता का श्रीगणेश मुद्रित माध्यम से ही हुआ है, सो इसकी चर्चा पहले जरूरी है। पराधीन भारत से स्वतंत्र भारत तक मुद्रित माध्यमों के जरिये पत्रकारिता जीवित रही और वह अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही। अखबारों में नाम प्रकाशित होने का भी अपना गौरव और शर्म की बात होती थी। किसी अच्छे कार्यों के सिलसिले में किसी सत्ता-शासक या प्रतिष्ठित व्यक्ति का नाम का उल्लेख हो जाए तो उसके लिए शान की बात होती थी। वह गौरव का अनुभव करता था किन्तु यही नाम जब किसी ऐसे मामले में प्रकाशित हो जाए तो उसका सिर शर्म से झुक जाता था। यही कारण है कि पत्रकारिता के तालिम के समय हमें यह सबक दिया गया कि किसी व्यक्ति की मानहानि को ध्यान में रखकर खबर लिखो। तुम्हारे सही या गलत लिखे को पढऩे वालों की तादाद सैकड़ों में होगी जिससे गलत लिख जाने पर उसकी मानहानि भी उसी स्तर की होगी किन्तु जब गलती पर भूल सुधार छपेगा तो संवैधानिक प्रक्रिया पूर्ण हो जाएगी किन्तु उसका खोया हुआ आत्मसम्मान किस तरह लौटा पाओगे? पत्रकारिता की यह जिम्मेदारी उसकी प्रतिष्ठा होती थी। पत्रकारिता पर भरोसे का यह एक बड़ा सबब था लेकिन आजादी के साल जैसे-जैसे गुजरते गए पत्रकारिता के स्थान पर पीत-पत्रकारिता ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी। सही मायने में हम जिस टारगेटेड जर्नलिज्म की बात कर रहे हैं, उसकी नींव 70-80 के दशक में ही पड़ गयी थी।
सत्ता-शासकों में पत्रकारिता के प्रति असहिष्णुता का पहला दृश्य आपातकाल के समय देखने को मिला। अराजक और तानाशाही का बेमिसाल दौर था जब पत्रकारिता पर नकेल डालने की स्वतंत्र भारत में पहली शुरूआत हुई थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने की जो हिमाकत अंग्रेज शासक भी नहीं कर पाये थे, वह मंजर हमने अपने ही आजाद मुल्क में देखा था। बावजूद इसके गर्व से कहा जा सकता है कि इस तानाशाही में भी पत्रकारिता ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की ना तो दुहाई दी और ना ही रिहाई की मांग की। आत्मस्वाभिमान के साथ पत्रकारिता के उस तेवर से सत्ता-शासन का परिचय कराया जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। अखबारों ने कोरे पन्ने छोड़ कर चेता दिया कि पत्रकारिता कोई पेशा नहीं, आत्मस्वाभिमान है।
हालांकि यही वह दौर है जब कुछ टूटे और सहमे से लोगों ने आपातकाल के दरम्यान सत्ता-शासन के समक्ष घुटने टेक दिए। पत्रकारिता का यह चरित्र सही मायने में पत्रकारिता का नहीं था बल्कि पत्र स्वामियों का था जो व्यापार करते थे और नफा कमाना जिनका एकमात्र लक्ष्य था। हालांकि इनकी संख्या भी बहुत अधिक नहीं थी लेकिन पत्रकारिता की नींव हिलाने के लिए यह कम नहीं था। ऐसे वक्त पर हाशिये पर बैठे भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी की टिप्पणी थी कि- सत्ता-शासन ने कहा झुको तो लेट गए और घुटनों के बल चलने लगे। आपातकाल के समाप्त होते ही पत्रकारिता दो दिशाओं में बंट गई थी। एक सत्ता-शासक का चारण बन चुका था तो दूसरा बड़ा वर्ग आत्मस्वाभिमान से वैसे ही खड़ा था।
इस बदलते समय में एकाएक प्रकाशनों की बाढ़ सी आ गई। सत्ता के निकट जाने का यह सबसे सहज और सुलभ रास्ता माना गया। सत्ता-शासकों को भी लुभाने लगा कि जिन्हें कल तक सिंगल कॉलम खबर में भी स्थान नहीं मिल पा रहा था, आज वे बैनर के हकदार हो गए हैं। सत्ता-शासन का यह लोभीवर्ग पत्रकारिता के उन नौसीखियों के लिए भी लाभ था कि अब उनके सीधे रिश्ते बन चले हैं। इस सब में दोनों पक्षों ने अपने-अपने लाभ का गणित देखा। जो लोग इस काम में जुटे हैं, उन्हें पत्रकारिता नहीं आती और जो राजनीति के पाये पर खड़े थे, वे आज सिरमौर बन गए हैं। इन सबमें पत्रकारिता का बड़ा नुकसान हुआ। रही-सही कसर पत्रकारिता शिक्षण की संस्थाओं ने कर दिया। हर साल बीए-एमए की तर्ज पर हर प्रदेश से पांच-दस हजार विद्यार्थी पत्रकारिता के मैदान में उतार दिए। किताबी ज्ञान से भरपूर हो सकते हैं लेकिन जमीनी ज्ञान नहीं होने के कारण बेरोजगारी से इनकी दोस्ती अटूट रही। हालांकि धक्के खाने के बाद ये भी उस रास्ते पर चल पड़े जहां से पत्रकारिता का पतन आरंभ हो रहा था।
इस नए दौर की मुद्रित पत्रकारिता का एक बड़ा संकट और है। पहले पत्रकार बनने की चाहत, फिर सम्पादक और मालिक बन जाने की जुगत में अनेक औचित्यहीन प्रकाशन आरंभ हो गए। निजी हित के लिए आरंभ हुए प्रकाशनों ने पर्यावरण को पूरी तरह नष्ट करने में अपनी भूमिका निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। एक पन्ने के प्रकाशन में औसतन एक पेड़ अपना जीवन खो देता है। ऐसे में इन प्रकाशनों पर सवालिया निशान लग रहे हैं। जिस तेजी से प्रकाशनों की संख्या में इजाफा हो रहा है, उससे यहां एक सवाल यह भी है कि प्रकाशन क्यों और किसके लिए? बिना औचित्य के इन प्रकाशनों से केवल और केवल पर्यावरण का नुकसान हो रहा है। हाल में केन्द्र सरकार द्वारा ऐसे औचित्यहीन प्रकाशनों को लेकर कड़ा रूख अपनाया गया है जिसे तथाकथित लोगों अभिव्यक्ति की आजादी में खलल बताकर विरोध किया जा रहा है। सच तो यह है कि सही और प्रभावी प्रकाशनों पर कोई प्रतिबंध नहीं है तब अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल कहां उठता है?
अभिव्यक्ति की आजादी का रोना सेटेलाईट टेलीविजनों की बाढ़ आने के बाद से बढ़ा है। 24 घंटे के न्यूज चैनलों में कटेंट का अभाव है और ऐसे में सनसनी बनाये रखने के लिए ऐसी खबरों को प्रमुखता दी जा रही है जिसका कोई जनसरोकार नहीं, सामाजिक सरोकार नहीं। पत्रकारिता से मीडिया और पाठक से दर्शक में बदलते समय में विश्वसनीयता का संकट यहीं से उपजता है। निजी हमले और ‘निपटा दो’ का टारगेटेड जर्नलिज्म का बिगड़ा हुआ चेहरा यहीं दिखता है। भारत के पत्रकारिता के इतिहास में हमारे पुरखों को अंग्रेजी शासन ने जेल भेजा तो हमने आत्मगौरव का अनुभव किया। वे अपने काम के खातिर, हमारे और अपने देश के खातिर जेल यात्र की लेकिन आज जब हमारे पत्रकार जेल भेजे जा रहे हैं, तो कारण सबके सामने है। आज के पत्रकारों पर जो लांछन लग रहे हैं, वह दिल को जख्मी कर देने के लिए काफी है। इसी दौर में पीत पत्रकारिता ने अपना घेरा बढ़ाते हुए पेडन्यूज की तरफ बढ़ा। पीत पत्रकारिता की निंदा होती रही लेकिन पेड न्यूज पर लगाम कसने के लिए कार्यवाही भी की गई। ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म के इस दौर में पत्रकार, पत्रकार नहीं रहे। अब उन्हें मीडियाकर्मी पुकारा जाने लगा है। इसके पहले और शायद आगे भी कभी पत्रकारकर्मी नहीं बुलाया गया। स्वाभाविक है कि श्रमजीवी से आप जब मीडियाकर्मी का तमगा पहन लेंगे तो आप का आचरण भी उसी की तरह होगा।
टारगेटेड जर्नलिज्म की शुरूआत में ऐलान कर दिया गया था कि अब मुद्रित पत्रकारिता के दिन पूरे हो गए हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। थोड़ी खलबली मची और अपने अपने रास्ते पर काम करते रहे। हुआ यूं कि दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी बन जाने के बजाय एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी बन गए। अखबार टेलीविजन पत्रकारिता का स्पांसर बन गया तो टेलीविजन पत्रकारिता की सूचना देने का माध्यम अखबार बन गया।
सबसे खतरनाक और सौफीसदी टारगेटेड जर्नलिज्म का दौर नव मीडिया के समय हुआ। हालांकि साल 2000 के समाप्त होते ना होते यह नए किस्म के मीडिया ने पैर पसारना शुरू कर दिया था लेकिन लगभग डेढ़ दशक की लम्बी यात्रा के बाद वह बेकाबू ढंग से फैल गया। राजनीतिक दलों ने भरपूर उपयोग किया और अपनी सूचनाएं, अपने पक्ष में लोगों को करने का काम इस मीडिया के माध्यम से किया गया। हालांकि बोलचाल की भाषा में इस मीडिया को सोशल मीडिया कहा जरूर गया लेकिन सामाजिक जिम्मेदारी से यह मीडिया बेखबर रहा। इसकी सबसे बड़ी कमजोरी नियंत्रण का अभाव रहा। नियंत्रण के अभाव में कई बार ऐसी बातें और बयान पोस्ट किए जाते रहे जिससे लोगों की मानहानि हुई। दूसरा इस मीडिया में काम करने वालों ने व्यक्तिगत लक्ष्य बनाया और अनचाहे में कई तरह की विषम स्थितियां समाज के समक्ष खड़ी हुई। सोशल मीडिया में एक बड़ा खेल लाईक और कमेंट का रहा। कहा जाता है कि लाईक और कमेंट का यह एक बड़ा कारोबार है जिसमें एक बड़ा समूह जुड़ा हुआ है जो किसी व्यक्ति, पोस्ट को हिट करने में अपनी भूमिका निभाता है। हैरानी की बात तो यह है कि इस किस्म का आरोप लगातार लगता रहा लेकिन किसी ने भी तो खंडन किया और ना ही इन आरोपों की कोई जांच की गई। कहा जाता है चुप रहना भी स्वीकार करना होता है तो लगता है कि आरोप बेबुनियाद नहीं हैं।
इस तरह हम देखते हैं कि ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म की तरफ हम बढ़ते चले गए। प्रकाशन और प्रसारण की संख्या में बढ़ोत्तरी चौंकाने वाली है लेकिन मूल उद्देश्य सूचना, शिक्षा और मनोरंजन से हमने शिक्षा के उद्देश्य को तिरोहित कर दिया है। अब हमारे पास सूचनाओं का भंडार है बल्कि विस्फोटक स्थिति में हैं और मनोरंजन का जो सबसे घटिया दर्जा हो सकता है, वह हम छाप रहे हैं और दिखा रहे हैं। लोकप्रिय और विवादों का कपिल शर्मा शो में कपिल बार-बार पर्दे पर ‘बाबाजी का ठुल्लु’ कहता है और यह डॉयलाग छोटे बच्चों की जुबान पर भी चढ़ गया है। मनोरंजन की यही परिभाषा है तो जॉनी वाकर को भूल जाइए या फिर दूरदर्शन के उल्टा-पुल्टा धारावाहिक को भूले से भी याद मत करिए। भारतीय परिवेश में आज भी इतना खुलापन नहीं आया है कि हम बेशर्म हो जाएं और बेपरदा हो जाएं। यह निपटाने वाले जर्नलिज्म का दौर है तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता को निपटाया जा रहा है। हमें खुले दिल से इसका स्वागत किया जाना चाहिए ना कि एतराज।
जब 300 साल से कुछ साल पहले पत्रकारिता पर विवेचना करते हैं तो हमारे अपने हालात पर रोना ही आता है। इस बात पर भी दो राय नहीं कि पत्रकारिता का आज जो हाल है, उसके लिए हमारे वरिष्ठ जवाबदार हैं। बड़े-बड़े मंचों से शोर मचाने वाले और पत्रकारिता को गरियाने वाले ये तथाकथित बड़े पत्रकारों ने पत्रकारिता को शुभ की ओर ले जाने में कोई प्रयत्न नहीं किया। पेजथ्री के जर्नलिज्म की बात आज हम करते हैं, वास्तव में वह बहुत पहले से आरंभ हो गया था। सुख-सुविधाओं से सम्पन्न महानगरों के पत्रकारों का एकमात्र लक्षण था कि वह नयी पीढ़ी को गरियायें। बार-बार और हर बार, हर मंच पर बतायें कि पत्रकारिता किस तरह गर्त में जा रही है? किस तरह उसकी विश्वसनीयता पर आंच आ रही है? लेकिन कभी, किसी मंच से पत्रकारिता के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए कोई कोशिश होती हुई नहीं दिखी और ना ही कोई सुझाव दिया गया। पत्रकारिता की नई पीढ़ी को सिखाने की कोई कोशिश पत्रकारिता के इन महानुभावोंं ने कभी नहीं किया। इसके बाद भी शिकायतों का पुलिंदा बढ़ता गया। पत्रकारिता का स्तर गिर रहा है, उसकी विश्वसनीयता कटघरे में है तो क्या सत्ता-शासन उसके अच्छे दिनों के लिए काम करेगा? कोई डॉक्टर या इंजीनियर श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए ऑपरेशन करेगा या भवन बनाकर देगा? जब हम स्वयं अपना घर ठीक नहीं कर पा रहे हैं तो विलाप क्यों? हां, इस बात की तारीफ की जा सकती है कि डॉक्टर, इंजीनियर, राजनेता और विविध क्षेत्रों के लोगों में इतना आत्मबल नहीं रहा कि वे अपने क्षेत्रों की गिरावट को समाज के समक्ष कबूल कर सकें लेकिन यह हिम्मत केवल और केवल पत्रकारिता में है सो उसने यह कर दिखाया। अपने इन्हीं कारणों की वजह से बहुत बिगड़े हालात में भी पत्रकारिता पर समाज का विश्वास है तो इसलिए कि पत्रकारिता आज भी जिम्मेदार है। बस, कुछ तानाबाना बिगड़ गया है, उसे भी ठोंक-पीटकर ठीक कर दिया जाएगा। हां, चिंता है तो इस बात कि इस काम को हम सब मिलकर जितनी जल्दी कर सकेंगे, उतना ही बेहतर होगा। इस बार संकल्प ले लें कि पत्रकारिता के पुराने दिन लौटेंगे और ‘ठोंकने की पत्रकारिता’ होती रहेगी, ‘निपटाने’ की नहीं।
शनिवार, 13 मई 2017
शोध पत्रिका "समागम" मई 2017
भारत में हिंदी पत्रकारिता में तारीख 30 मई 1826 मील का पत्थर है. इस दिन पहला हिंदी समाचार पत्र का प्रकाशन आरम्भ हुआ था. तब से लेकर आज तक हिंदी पत्रकारिता ने अनेक मानक गढ़े है. इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दौर आया और अब हम सोशल मीडिया की जद में हैं. कहना होगा कि कहाँ से चले थे हम और कहाँ पहुंच गए... ठोंकने की पत्रकारिता अब निपटाने की मीडिया में बदल रही है.. कुछ इस बदलते दौर की कहानी कह रहा है शोध पत्रिका "समागम"
गुरुवार, 27 अप्रैल 2017
किसकी जय और किसकी पराजय?
मनोज कुमार
दिल्ली म्युनिसपल कॉर्पोरेशन के चुनाव होने के पहले से लेकर परिणाम आने तक ऐसा हल्ला मचा रहा कि मानो कोई आम चुनाव होने जा रहा है. जैसे देश के हजारों नगर निगमों में चुनाव होते हैं, वैसा ही दिल्ली का चुनाव था लेकिन इसे राष्ट्रीय स्वरूप देकर अनचाहे में अरविंद केजरीवाल का कद और ऊंचा कर दिया गया. जैसा कि पहले से माना जा रहा था कि इस स्थानीय निकाय के चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर होगा सो रहा. आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन संतोषजनक रहा क्योंकि उसके पास वहां खोने के लिए कुछ नहीं था और ऐसे में जो मिला, वह कम नहीं है. चिंतनीय स्थिति तो कांग्रेस की है जिसके बारे में चर्चा भी नहीं हो रही है. परिणाम के लिहाज से वह तीसरे स्थान पर रही लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि कांग्रेस प्रत्याशियों की रिकार्ड जमानत जब्त हुई. यह तो दिल्ली नगर निगम के चुनाव का मोटा मोटा हिसाब किताब है. बिन्दुवार जब इस विश£ेषण करते हैं तो पाते हैं कि चुनाव परिणाम में पीछे रहने वाली आम आदमी पार्टी का जलवा कायम है जबकि भाजपा के पास सिवाय मोदी मंत्र के कुछ और नहीं है. इस चुनाव में विजय हासिल करने में अमित शाह की रणनीति का वैसे जिक्र नहीं हो रहा है, जैसा कि उत्तरप्रदेश के चुनाव में हुआ था. कांग्रेस का सूपड़ा साफ है और अब विश£ेषण में भी उसकी गिनती उल्लेखनीय नहीं रह गयी है. भाजपा की चुनौती एक बड़ा कारण है जिसके चलते ‘आप’ का कद कम नहीं हो रहा है जबकि इतिहास गवाह है कि ऐसी क्षेत्रीय पार्टी थोड़े समय में नेपथ्य में चली जाती हैं फिर वह असम गण परिषद हो या लोकजनशक्ति पार्टी.
हैरानी तो इस बात की थी कि इस मामूली से चुनाव को लेकर नेशनल कहलाने वाले मीडिया ने इस पूरे चुनाव को इस तरह कव्हर किया मानो दिल्ली नगर निगम के चुनाव जीतने या हारने से दिल्ली की तख्त को खतरा हो जाएगा. ‘आप’ ने जीत दर्ज कर ली तो वह दिल्ली के तख्तोताज पर बैठ जाएगी और भाजपा हार गई तो मोदी जी को प्रधानमंत्री की कुर्सी छोडऩा पड़ेगी. यह भी शायद पहली बार हुआ कि इस मामूली से चुनाव को लेकर बकायदा एक्जिट पोल कराया गया. चुनाव परिणाम विश£ेषण के लिए उन विशेषज्ञों का पैनल बिठाया गया जो आम चुनाव और विधानसभा चुनाव में अपनी समझ रखते हैं. ये सारे मीडिया के महारथी दिल्ली नगर निगम चुनाव में विश£ेषण करते दिख रहे थे. दिल्ली नगर निगम का चुनाव और हम भोपाल, रायपुर, पटना और लखनऊ में बैठ कर परिणाम को इस तरह देख रहे थे और हमें दिखाया जा रहा था कि दिल्ली नगर निगम चुनाव के बाद पूरे देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल जाएगा. चुनाव परिणाम आते ही मीडिया जिस तरह ‘आप’ पर टूट पड़ा, वह भी अविश्सनीय सा था. केजरीवाल से इस्तीफा मांगा गया तो ‘आप’ की तरफ से बचकाना बयान आया कि बिहार में भाजपा की पराजय के बाद मोदी ने इस्तीफा दे दिया था? सवाल यह है कि प्रधानमंत्री के इस पद की गरिमा का इस तरह हस क्यों किया जा रहा है? क्यों बात बात में एक नगर निगम के चुनाव में प्रधानमंत्री को क्लब किया जाता है? क्यों स्थानीय नेता का नाम नहीं लिया जाता? कांग्रेस के माकन ने इस हार को अपनी हार बताते हुए इस्तीफा दिया, उसकी चर्चा नहीं हो रही है. मीडिया इन बातों पर चर्चा नहीं करता है. मीडिया का यह महाकवरेज यदा-कदा प्रायोजित हो तो हैरान होने की जरूरत नहीं है. मिशन से प्रोफेशन तक का रास्ता यहीं से होकर जाता है.
आम आदमी पार्टी को महत्वपूर्ण बनाने में भाजपा और मीडिया का अहम रोल रहा है. स्थानीय निकाय के चुनाव को विधानसभा और लोकसभा चुनाव से तुलना कर ‘आप’ को इतना महत्व दिया गया कि अनजाने में वह स्वयं में बड़ी पार्टी बन गयी. अरविंद केजरीवाल का डर भी साफ दिख रहा था. भाजपा ने दिल्ली नगर निगम के चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्र बना लिया था और वह किसी विधानसभा चुनाव के लिहाज से ही मैदान में थी. इस समय हम इस मामूली चुनाव में हुए खर्चे की बात नहीं करेंगे लेकिन जिस आक्रामक रूप से प्रचार किया गया, वह अनोखा था. अनोखा तो यह भी था कि एक स्थानीय स्तर के चुनाव में मोदी ब्रांड का इस्तेमाल किया गया जबकि जिस मनोज तिवारी को दिल्ली की कमान सौंपी गयी थी, उन्हें ही किला फतह करना था. यह सब जानते हैं कि मोदी के नाम के बिना सफलता असंभव सा है, सो आम चुनाव से लेकर नगर निगम के चुनाव भी मोदी के नाम पर जीते गए. ऐसे में मनोज तिवारी ऐंठते दिखते हैं तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि अभी उनका कद ऐसा नहीं हुआ है कि वे एक मामूली चुनाव भी स्वयं के दम पर लड़ सकें.
साल 2014 में केन्द्र में जब नरेन्द्र मोदी सरकार सत्तारूढ़ हुई तभी से वह हमेशा चुनाव के मोड में रही है. दिल्ली नगर निगम का चुनाव हो, विधानसभा, लोकसभा का चुनाव हो या उपचुनाव हो, हर चुनाव इस तरह लड़ा गया, मानो यह आखिरी चुनाव है. धन-बल के साथ पूरा फोकस नरेन्द्र मोदी के चेहरे को सामने रखकर किया गया. एक मायने में भाजपा नेपथ्य में है और मोदी परिदृश्य में. कहने को अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की हैसियत रखते हैं लेकिन हर कैम्पन में मोदी-शाह की जोड़ी दिखती है. यही कारण है कि पहले महाराष्ट्र, फिर गुजरात, राजस्थान और अब दिल्ली नगर निगम के चुनाव को लेकर मोदी-शाह की पार्टी उत्साहित और उत्तेजित है. उनकी इस उत्तेजना को बढ़ाने में केजरीवाल की बड़ी भूमिका है. चार साल पहले एक जनांदोलन से जन्मी यह पार्टी राष्ट्रीय चुनौती का कारण बन चुकी है तो बार बार पराजय के बाद भी वह विजेता की भूमिका में है. भाजपा और कांग्रेस जैसे दिग्गज दलों के सामने बहुत मामूली सी पार्टी होने के बाद भी जिस तरह से तवज्जो दी जाती है, उससे केजरीवाल का कद और भी बढ़ जाता है.
केजरीवाल की पृष्ठभूमि राजनीतिक नहीं रही है लेकिन उनकी नजर राजनीति की शीर्ष बिन्दु पर रही है. वे एक नौकरीपेशा व्यक्ति रहे हैं और इत्तेफाकन अन्ना हजारे के आंदोलन में उन्हें जगह मिल गई. जनलोकपाल को लेकर जो आंदोलन हुआ, उसने भारतीय राजनीति को एक नई दिशा की तरफ ले गया, जैसा कि आपातकाल के बाद देश मेें राजनीति ने नई करवट ली थी. आपातकाल के बाद क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ लेकिन सबको धता बताते हुए इंदिरा गांधी फिर सत्ता के शिखर पर थीं. लेकिन अन्ना आंदोलन से राजनीति एक नई दिशा की तरफ गई और कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा. आपातकाल के समय की तरह क्षेत्रीय पार्टी का उदय हुआ लेकिन एकमात्र आम आदमी पार्टी की. अन्ना हजारे हाशिये में चले गए और केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी की उम्मीदों की पार्टी बन गई. पहली बार आम आदमी पार्टी ने 15 साल की कांग्रेस की दिल्ली सरकार को धूल चटाकर अपना वर्चस्व स्थापित किया लेकिन पूर्ण बहुमत से दूर रहने के कारण उन्होंने सरकार नहीं बनायी. इसी उहापोह के चलते एक वर्ष बाद फिर दिल्ली विधानसभा का चुनाव हुआ और अबकी बार, केजरीवाल की तर्ज पर कांग्रेस क्या, भाजपा भी साफ हो गई. इस जीत से केजरीवाल को हौसला तो मिला, राजनीति दलों में अपरोक्ष रूप से आप को लेकर कशमकश की स्थिति बनी रही. यह तब और हुआ जब 2014 के आम चुनाव में मोदी की आंधी में पूरा देश उनके साथ था, तभी आप ने पंजाब में लोकसभा की 4 सीटों पर जीत दर्जकर अपना वर्चस्व दिखा दिया. कांग्रेस के खिलाफ खड़े होने वाले अन्ना हजारे अपने गांव तक सिमट गए.
इस तरह की जीत से केजरीवाल का मनोबल बढ़ता गया जो आहिस्ता आहिस्ता अहम में बदलने लगा. योगेन्द्र यादव, किरण बेदी सरीखे नेताओं ने केजरीवाल से किनारा कर लिया. जिस भाजपा के खिलाफ किरण बेदी ने हुंकार भरा था, उसी भाजपा में उन्हें जगह मिली लेकिन योगेन्द्र यादव उम्मीदों के सहारे स्वराज इंडिया का बैनर लेकर एकला चलो की राह पर निकल पड़े. केजरीवाल से झटका खाए हजारे योगेन्द्र के साथ भी नहीं आए. यह एक ऐसा मौका था जब केजरीवाल को अनदेखा कर उन्हें तोड़ा जा सकता था लेकिन भाजपा ने उसे गंभीरता से लिया और केजरीवाल के पैर उखडऩे के बजाय और गहरे जमते चले गए. पंजाब, गोवा में करारी पराजय के बाद भी दिल्ली नगर निगम चुनाव में जिस तरह केजरीवाल को भाजपा ने चुनौती दी, उससे वे और मजबूत हो गए. अनचाहे में मीडिया ने भले ही भाजपा के पक्ष में काम किया हो लेकिन फायदा केजरीवाल को ही मिला. ऐसा नहीं है कि केजरीवाल एकमात्र नेता हैं जिनकी पार्टी पहली क्षेत्रीय पार्टी है. स्मरण रखना होगा कि छात्रनेता प्रफुल्ल महंतों की पार्टी असम गण परिषद भी इसी तरह उभरी थी लेकिन वह असामयिक हो गई. कांग्रेस के कई क्षत्रपों ने क्षेत्रीय दल बनाये और कांग्रेस में वापसी उनकी मजबूरी थी. स्वयं उमा भारती को अपनी लोकजनशक्ति पार्टी को भाजपा में तिरोहित करना पड़ा क्योंकि भाजपा के बिना उनका सरवाइव करना मुश्किल सा था. एक और ताजा उदाहरण केजरीवाल की तरह आईएएस की नौकरी छोडक़र राजनीति में आने वाले अजीतप्रमोद जोगी का है. बरसों तक कांग्रेस में सत्ता का सुख भोगने वाले जोगी इस समय स्वयं की पार्टी बनाकर कांग्रेस और भाजपा को चुनौती देने की बात कर रहे हैं जबकि हकीकत में अभी उन्हें उड़ान भरने में वक्त है. यही नहीं, उनके कांग्रेस वापसी या भाजपा में जाने की चर्चा भी चल पड़ी है. ऐसे में केजरीवाल को चुनौती मानकर उनका कद बढ़ाने की जगह पर उनकी अनदेखी से आप का कद घट सकता है.
इस नए दौर में एक और अलग किस्म का राजनीतिक अनुभव हो रहा है. लोकसभा से पंचायत चुनाव तक प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक जुट जा रहे हैं. मध्यप्रदेश में बीते सालों में ऐसा कोई चुनाव नहीं होगा जिसमें स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने कमान न सम्हाली हो. इन चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम का सहारा ना लिया गया हो, ऐसा भी नहीं हुआ. जबकि अनुभव यही कहता है कि स्थानीय स्तर के चुनाव प्रत्याशी के व्यक्तित्व एवं कार्यों पर जीते या हारे जाते हैं. भाजपा का जीत एकमात्र लक्ष्य है. यह अनुचित भी नहीं लेकिन शून्य को शिखर बना देने की यह राजनीति केजरीवाल को एक बड़ा स्पेस देती है. और इस स्पेस को बढ़ाने में मीडिया के वे महारथी भी शामिल हैं जो अनचाहे में केजरीवाल का साथ दे रहे हैं. ईवीएम मशीन के बहाने जो दृश्य केजरीवाल ने पैदा किया, वह महज दिशाभ्रम था और इसमें ही सब लोग उलझ गए. हालांकि मध्यप्रदेश के अटेर विधानसभा उप-चुनाव में इसी ईवीएम मशीन को लेकर बवाल हुआ था और उसमें भी कांग्रेस की जीत ने सवालों को पुख्ता कर दिया था जिसका लाभ केजरीवाल को मिला.
बुधवार, 26 अप्रैल 2017
*घोस्टराइटर्स सर्विस: सोच आपकी, शब्द हमारे!*
*घोस्टराइटर्स सर्विस: सोच आपकी, शब्द हमारे!*
मुंबई. विश्व में घोस्टराइटर्स की भूमिका अनेक महत्वपूर्ण मौकों पर रही है! लेख, समाचार आदि लिखने से लेकर भाषण लिखने तक में घोस्टराइटर्स का योगदान उल्लेखनीय रहा है, लेकिन... इसे अब तक सार्वजनिक मान्यता नहीं मिल पाई है! इसी के मद्देनजर पीपीआई की ओर से... सोच आपकी, शब्द हमारे... धारणा पर आधारित विश्व की पहली घोस्टराइटर्स सर्विस प्रारंभ की जा रही है.
* पीपीआई के निर्देशक (कंटेंट) प्रदीप द्विवेदी ने बताया कि लोगों के विचारों को वाक्यों में ढालने के इरादे से यह विचारकों के लिए विशेष सेवा है ताकि वे अपनी बात सही तरीके से लोगों तक पहुंचा सकें!
* पीपीआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अभिमनोज ने बताया कि अच्छे विचारों को पलपलइंडियाडॉटकाम (palpalindia.com) पर भी प्रकाशित करने का प्रयास किया जाएगा.
* एक रुपया प्रति अक्षर की दर से दी जानेवाली इस सेवा के लिए शुरूआती आमंत्रण दर एक रुपया प्रति शब्द रखी गई है.
* इस सेवा में न केवल लोगों के विचारों, अनुभवों, जानकारियों पर आधारित... लेख/समाचार/रचनाएं आदि तैयार की जाएंगी बल्कि यह उन विचारक/पत्रकार/लेखक/मार्केटिंग हेड के लिए भी उपयोगी रहेगी जो ठेठ ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं. उन्हें स्टोरी आईडिया के साथ-साथ डेली कंटेंट के लिए रेफरेंस मटेरियल भी उपलब्ध करवाया जाएगा. विशेष परिशिष्ट के लिए भी सेवाएं उपलब्ध रहेंगी!
* पत्रकारों और लेखकों के लिए यह अपनी तरह की पहली सेवा है. जो विचारक... लेखक बनना चाहते हैं... पत्रकार बनना चाहते हैं... और यह सेवा लेना चाहते हैं, वे संपर्क कर सकते हैं...
* व्हॉट्स एप नंबर 9772354346... ppirajasthannews@gmail.com.
सोमवार, 17 अप्रैल 2017
बिहार के चम्पारण सत्याग्रह के 100 साल का स्मरण किया जा रहा है. मीडिया के स्टूडेंट को यह जानना भी ज़रूरी है कि यह क्या था. बेहद सीमित संसाधनों में यह अंक हमेशा की तरह तैयार किया गया.. सहयोग के लिए आप सभी का शुक्रिया। साथ में अप्रैल की ख़ास तारीख का भी उल्लेख किया गया है.
शोध पत्रिका "समागम" का अगला अंक पत्रकारिता पर है. मीडिया वर्सेस सोशल मीडिया।
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