सोमवार, 25 सितंबर 2017

बुद्ध चुनें या युद्ध?


-मनोज कुमार
     एक बार फिर हम अधर्म पर धर्म की जीत का उत्सव मनाने की तैयारियों में जुट गए हैं. बुराईयों पर अच्छाई की जीत का पर्व सदियों से मनाते चले आए हैं लेकिन ऐसा क्या है कि ये बुराई कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है? मैं सोचता था कि कभी कोई साल ऐसा भी आएगा जब हम अच्छाईयों का पर्व मनाएंगे. विजय का पर्व होगा. किसी की पराजय की चर्चा तक नहीं करेंगे, पराजित करना तो दूर रहा लेकिन आखिर वह साल अब तक मेरे जीवन में नहीं आया है. इसके बावजूद मैं निराश नहीं हूं. हताश भी नहीं हूंं क्योंकि मुझे लगता है कि एक दिन वह साल भी आएगा जब हम अच्छाई का पर्व मना रहे होंगे. इस अवसर का दीप जला रहे होंगे. सवाल यह है कि सदियां गुजर जाने के बाद भी जब यह संभव नहीं हो पाया तो यह होगा कैसे? मुझे लगता है कि इसमें मुश्किल कुछ भी नहीं है. बस, थोड़ा सा दृष्टि और थोड़ी सी सोच बदलने की जरूरत है. अब तक हम जय बोलते आए हैं और बुराई को पराजित कर उत्सव में मगन हो गए हैं. क्यों ना हम किसी को पराजित करने के बजाय हम उस बुराई की जड़ को ढूंढऩे की कोशिश करें जिसकी वजह से हर बार वह पराजित तो होता है लेकिन अपनी बेलें कहीं छोड़ जाता है जो साल बीतते बीतते फिर एक बड़े आकार में हमारे सामने खड़ी हो जाती है. सवाल यह है कि हमें बार बार युद्व को चुनना है या बुद्ध को? हां, यह जरूर है कि बुद्ध को चुनने से पहले युद्ध के कारणों को तलाश करना पड़ेगा. 
महात्मा कहते थे कि पाप से नफरत करो, पापी से नहीं लेकिन हमारी नजर में पाप दूजे स्थान पर है और पापी पहले. यही एक गलती बार बार हमें बुद्ध से दूर और युद्ध के करीब ले आती है. बुराई क्या है? क्या रावण बुराई है या बुराई का प्रतीक है? हम हर वर्ष प्रतीकों को मारते हैं. भारतीय उत्सवी समाज है. वह हर अवसर को उत्सव के अनुरूप बना लेता है. दशहरा का पर्व भी इसी बात का द्योतक है. वर्तमान समाज में हमें रावण जैसा ज्ञानी तो नहीं मिल रहा है लेकिन बुराई का प्रतीक रावण हरेक कदम पर बिठा दिया गया है. एक चपरासी के घर से अवैध कमाई का लाखों रुपया, जमीन-जायदाद और जाने क्या-क्या मिलता है तो हम उसकी कमाई की ओर देखते हैं. विधिसम्मत उसे सजा दिलाने की कार्यवाही करते हैं लेकिन कभी हमने इस बात की कोशिश नहीं की कि आखिर उसने इस बुराई के रास्ते पर चलने को क्यों मजबूर हुआ? आर्थिक कमजोरी उसके भीतर के बुद्ध को हरा देती है और वह युद्ध के भाव से गलत रास्ते पर चल पड़ता है. जब हम इस बुराई की जड़ की तरफ जाने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि पहले पहल जब उसने 10 या 5 हजार रुपये गलत ढंग से हासिल किए होंगे तो उसके हाथ भले ही ना कांपें हों, मन जरूर कांपा होगा. भयभीत हुआ होगा. उसे एक बार तो लगा होगा कि वह गलत कर रहा है. लेकिन जब यह प्रक्रिया एक से अधिक बार होने लगी तो वह निश्चित हो गया कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. चंचल लक्ष्मी उस बिगड़ते व्यक्ति के चेहरे पर चमक ला देता है. उसके ऊपर के अफसरान को भी इस बात की खबर होगी लेकिन उन्होंने भी रोकने और टोकने की हिम्मत नहीं की. करते भी कैसे? उन्हीं को देखकर उसके भीतर लोभ जागा. उसके भीतर का बुद्ध विलुप्त होता गया और वह युद्ध के भाव से जीवन को जीने लगा. यह वही जगह है जहां से हम बुराई की जड़ को ढूंढ सकते हैं. उस बिगड़ते गरीब आदमी को समझने की कोशिश कर सकते हैं कि आखिर उसने गांधी का रास्ता क्यों छोड़ा? वह रावणरूपी बुराई का प्रतीक क्यों बन गया? वह लंकेश की तरह ज्ञानी तो हो नहीं सकता था. 
    जिस दिन हम इस बुराई की जड़ पर चोट करेंगे, यकीन रखिए कि हमें हर साल रावण के वध के लिए हथियार नहीं उठाना पड़ेगा. और वह दिन भी दूर नहीं होगा जब हम अच्छाई का पर्व मनाएंगे. एक ऐसा पर्व जिसमें किसी की पराजय नहीं होगी बल्कि चौतरफा जय और जय होगी. इसे करने के लिए अपने भीतर गांधी और बुद्ध को जिंदा करना होगा. कबीर और तुलसी को समझ कर अपने जीवन में उतारना होगा. भौतिक सुविधाओं के फेर में अ से लेकर ज्ञ तक सभी बौरा गए हैं. कनक और कनक में भेद करना भूल गए हैं. एक कनक जो देह की सुंदरता को बढ़ाता है तो दूसरा कनक जीवन की सांस को रोक देता है. सही मायने में दोनों कनक एक से हो गए हैं जिसमें शारीरिक तौर पर व्यक्ति भले ही जीवित हो लेकिन उसकी आत्मा को यह कनक मार देता है. हमें इस बार तय करना होगा कि हम युद्ध के रास्ते पर चलेंगे या बुद्ध के रास्ते पर? हमें रावण बनना है या ज्ञानी लंकेश से कुछ सीखना चाहेंगे? हम गांधी और कबीर बनकर एक नए समाज का निर्माण करेंगे या जीवन भर युद्ध के रास्ते पर चलते रहेंगे? 

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है


मनोज कुमार

     इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो और खुद को बचा ले जाओ। इक्का-दुक्का अखबार और पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में ‘‘टेग लाइन‘‘ होती है- ‘‘यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक की सहमति अनिवार्य नहीं।‘‘इस टेग लाइन से यह बात तो साफ हो जाती है कि जो कुछ भी छप रहा हैवह सम्पादक की सहमति के बिना है। लेकिन छप रहा है तो सहमति किसकी है लेखक अपने लिखे की जवाबदारी से बच नहीं सकता लेकिन प्रकाषन की जवाबदारी किसकी हैसम्पादक ने तो किनारा कर लिया और लेखक पर जवाबदारी डाल दी। ऐसे में यह प्रश्न उलझन भरा है और घूम-फिर कर बात का लब्बोलुआब इस बात पर है कि प्रकाशनों को अब सम्पादक की जरूरत ही नहीं है और जो परिस्थितियां हैं, वह इस बात की हामी भी है। इस ‘‘टेग लाइन‘‘ वाली पत्रकारिता से हम टेलीविजन की पत्रकारिता को सौफीसदी बरी करते हैं क्योंकि यहां सम्पादक नाम की कोई संस्था होती है या जरूरत होगी, इस पर चर्चा अलग से की जा सकेगी। यहां पर हम पत्रकारिता अर्थात मुद्रित माध्यमों के बारे में बात कर रहे हैं। अस्तु। 

   भारतीय पत्रकारिता की आज की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। जवबादारी से बचती पत्रकारिता भला किस तरह से अपनी सामाजिक जवाबदारी का निर्वहन कर पाएगी, सवाल यह भी है कि क्या समय अब गैर-जवाबदार पत्रकारिता का आ गया है। यह सवाल गैर-वाजिब नहीं है क्योंकि भारतीय पत्रकारिता ने पत्रकारिता का वह स्वर्णयुग भी देखा है जहां सम्पादक न केवल जवाबदार होता था बल्कि सम्पादक की सहमति के बिना एक पंक्ति का प्रकाशन असंभव सा था। भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि व्यवस्था के खिलाफ लिखने के कारण एक नहीं कई पत्रकारों को जेल तक जाना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी भी जवाबदारी से खुद को मुक्त नहीं किया। उल्टे सम्पादक उपत कर सामने आता और कहता कि हां, इस लेख की मेरी जवाबदारी है और आज के सम्पादक का जवाब ही उल्टा है। मैं कुछ नहीं जानता, मेरा कोई वास्ता नहीं है।

   आज की पत्रकारिता में सम्पादक की गौण होती या खत्म हो चुकी भूमिका पर चर्चा करते हैं तो भारतीय पत्रकारिता के उस गौरवशाली कालखंड की सहज ही स्मरण हो आता है जब सम्पादक के इर्द-गिर्द पत्रकारिता की आभा होती थी। हालांकि सम्पादक संस्था के लोप हो जाने को लेकर अर्से से चिंता की जा रही है। यह चिंता वाजिब है। एक समय होता था जब कोई अखबार या पत्रिका, अपने नाम से कम और सम्पादक के नाम पर जानी जाती थी। बेहतर होने पर सम्पादक की प्रतिभा पर चर्चा होती थी और गलतियां होने पर प्रताड़ना का अधिकारी भी सम्पादक ही होता था। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक नहीं अनेक सम्पादक हुए हैं जिन्होंने भारतीय पत्रकारिता को उजाला दिया। समय गुजरता रहा और आहिस्ता आहिस्ता सम्पादक संस्था का लोप होने लगा। प्रकाशन संस्थाओं ने मान लिया कि सम्पादक की जरूरत नहीं है। प्रकाशन संस्था का स्वामी स्वयं सम्पादक हो सकता है और अपने अधीनस्थों से कार्य करा सकता है। उन्हें यह भी लगने लगा था कि सम्पादक करता-वरता तो कुछ है नहीं, बस उसे ढोना होता है। ये लोग उस समय ज्यादा कष्ट महसूस करते थे जब सम्पादक उनके हस्तक्षेप को दरकिनार कर दिया करते थे। एक तरह से यह अहम का मामला था। 
     स्वामी या सम्पादक के इस टकराव का परिणाम यह निकला कि सम्पादक किनारे कर दिए गये। प्रकाषन संस्था के स्वामी के भीतर पहले सम्पादक को लेकर सम्मान का भाव होता था, वह आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने लगा। कई घटनाएं हैं जो इस बात का प्रमाण है जो यह बात साबित करती हैं कि सम्पादक के समक्ष स्वामी बौना हुआ करता था। स्वामी इस बात को जानता था कि सम्पादक ज्ञानी है और प्रकाशन एक सामाजिक जवाबदारी। इस नाते वह स्वयं के अहम पर न केवल नियंत्रण रखता था बल्कि अपने प्रकाशन के माध्यम से लोकप्रिय हो जाने का कोई लालच उसने नहीं पाला था। कहने के लिए तो लोग सन् 75 के आपातकाल के उन काले दिनों का स्मरण जरूर कर लेते हैं जब पत्रकारिता अपने कड़क मिजाज को भूल गई थी। सवाल यह है कि 40 साल गुजर जाने के बाद भी हम पत्रकारिता के आपातकालीन दिनों का स्मरण करेंगे या और गिरावट की तरफ जाएंगे. जहां तक मेरा अनुभव है और मेरी स्मरणशक्ति काम कर रही है तो मुझे लगता है कि सम्पादक संस्था को विलोपित करने का काम आपातकाल ने नहीं बल्कि प्रकाषन संस्था के स्वामी के निजी लालच ने किया है। उन्हें लगने लगा कि कागज को कोटा-सोटा तो खत्म हो गया है। सो आर्थिक लाभ तो घटा ही है बल्कि उसके भीतर स्टेटस का सपना पलने लगा। वह अपने सम्पादक से ज्यादा पूछ-परख चाहता है और चाहता है कि शासन-प्रशासन में उसका दखल बना रहे।

  स्वामी के इस लालच के चलते सम्पादक संस्था को किनारे कर दिया गया और सम्पादक के स्थान पर प्रबंध सम्पादक ने पूरे प्रकाशन पर कब्जा कर लिया। एक प्रकाशन संस्था से शुरू हुई लालच की यह बीमारी धीरे-धीरे पूरी पत्रकारिता को अपने कब्जे में कर लिया। पत्र स्वामियों के इस लालच के कारण उन्होंने कम होशियार और उनकी हां में हां मिलाने वाले सम्पादक रखे जाने लगे। गंभीर और जवाबदार सम्पादकों ने इस परम्परा का विरोध किया लेकिन संख्याबल उन सम्पादकों की होती गई जो हां में हां मिलाने वालों में आगे रहे। सम्पादक संस्था की गुपचुप मौत के बाद पत्रकारिता का तेवर ही बदल गया। प्रबंध सम्पादक की कुर्सी पर बैठने वाले सम्पादक के सामने लक्ष्य पत्रकारिता नहीं बल्कि अर्थोपार्जन होता है सो वह पत्र स्वामी को बताता है कि फलां स्टोरी के प्रकाशन से कितना लाभ हो सकता है। स्वामी का एक ही लक्ष्य होता है अधिकाधिक लाभ कमाना। सम्पादक संस्था के खत्म होने और प्रबंध सम्पादक के इस नए चलन ने पेडन्यूज जैसी बीमारी को महामारी का रूप दे दिया।

  कुछ भी कहिएयह ‘‘टेग लाइन' वाली पत्रकारिता है मजेदार। जिस अखबार में लेख छापा जा रहा हैउसका सम्पादक-स्वामी कहता है कि यह विचार लेखक के निजी हैं। इसका सीधा अर्थ होता है कि बड़ी ही गैर-जवाबादारी के साथ पत्र-पत्रिकाओं ने लेख को प्रकाशित कर दिया है। न तो प्रकाशन के पूर्व और न ही प्रकाशन के बाद लेख को पढ़ा गया। जब सम्पादक इस तरह की भूमिका में है तो सचमुच में उसकी कोई जरूरत नहीं है। जब एक सम्पादक किसी लेख अथवा प्रकाशन सामग्री को बिना पढ़े प्रकाषन की अनुमति दे सकता है और साथ में इसकी जवाबदारी लेखक के मत्थे चढ़ा देता है तो क्यों चाहिए हमें कोई सम्पादक, जब लेखक को अपने लिखे की जवाबदारी स्वयं ही कबूल करनी है तो सम्पादक क्या करेगा, इन सम्पादकों को कानून का ज्ञान नहीं होगा, यह बात उचित नहीं है लेकिन प्रबंध सम्पादक की हैसियत से वह इससे बचने का उपाय ढूंढ़ते हैं और इसी का तरीका ये ‘‘टेग लाइन वाली पत्रकारिता है। गैर-जवाबदारी के इस दौर में भारतीय पत्रकारिता जिम्मेदार सम्पादक की प्रतीक्षा में खड़ी है जो कहेगी कि छपे हुए एक आलेख नहीं अपितु एक-एक शब्द में सम्पादक की सहमति है और वह इसके प्रकाशन के लिए जवाबदार है। 

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

अंग्रेजी के मोहपाश से आखिर कब मुक्त होंगे?


-अनामिका
एक के बाद एक वर्ष गुजरते जा रहे हैं और देखते ही देखते लगभग 70 वर्ष गुजर गए लेकिन भारतीय समाज अंग्रेजी के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पाया है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाने की जितनी पुरजोर कोशिश की जा रही है, अंग्रेजी का वर्चस्व उतना ही बढ़ रहा है। कभी अंग्रेजों पर फ्रेंच ने राज किया था और अंग्रेजी भाषा को दरकिनार कर दिया था लेकिन फ्रेंच शासन से मुक्त होने के बाद अंग्रेजी को पूरी ताकत के साथ वापस उसका सम्मान दिलाया गया। किन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि जिन अंग्रेजों के हम अनुगामी बने हुए हैं, उनसे यह नहीं सीख पाये कि कैसे हम अपनी मातृभाषा, राष्ट्रभाषा हिन्दी को उसका सम्मानजनक स्थान दिलायें। यह तथ्य सर्वविदित है कि हिन्दी दुनिया में सर्वाधिक बोली जाती है, पढ़ाई जा रही है लेकिन भारत में अंग्रेजी का वर्चस्व इन उपलब्धियों पर पानी फेर देता है। इस बार 14 सितम्बर को फिर एक दिन, एक सप्ताह तथा एक माह का हिन्दी के नाम होगा और इसके बाद हम वापस अंग्रेजी की कक्षा में चले जाएंगे।
हिन्दी भाषा को हमारी सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक चेतना, हमारी भारतीयता, हमारी सभ्यता, हमारा साहित्य, हमारी कलाएं, सभी मिलकर समृद्ध और बहुआयामी बनाती हैं। आधुनिक होती मानव सभ्यता की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जिस तकनीक का, जिस शब्द भंडार का, जिस गहन अनुसंधान करने वाली बहुआयामी जीवंत, सर्वमान्य सभी माध्यमों में सहज ढंग से स्वयं को ढालने वाली वैज्ञानिक, संवेदनशील और सशक्त भाषा की आज हमें जरूरत है, वह हिन्दी के अलावा और कौन सी भाषा हो सकती है? हिन्दी की सहज सम्प्रेषणीयता, विविधता और सार्वभौमिकता को लेकर कोई संदेह या सवाल पैदा हो सकता है? ज्ञान की तमाम धाराएं, उप-धाराएं, अंतर्धाराएं, तकनीक तथा अन्य अनुशासनों की आवश्यकताओं को पूरा करने की आत्माशक्ति और विराटता हिन्दी के अलावा और किस भाषा में हम पाते हैं? हिन्दी का वैश्विक स्वरूप जिस तेजी के साथ उभरा है, स्थापित हुआ है, उसमें बाजार की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। भू-मंडलीकरण ने भी हिन्दी को प्रसारित तथा प्रचारित किया है। 
हिन्दी जब आज दुनिया में अपना डंका बजा रही है तो फिर उसके अपने ही घर में उसका अपमान क्यों? हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाएं हमारी अस्मिता हैं तथा अंग्रेजी हमारी कुंठा, लेकिन त्रासदी यह है कि हम कुंठा-जीवी हो गए हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्र के समुचित विकास के लिए हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को प्रभावशाली बनाया जाए। सरकारी कामकाज में इनका प्रयोग करके, इन्हें नौकरी का माध्यम बनाकर प्रभावशाली बनाया जा सकता है, लेकिन अब तक यह काम दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में संभव नहीं हो पाया है। हर तरह के संवैधानिक उपबंधों, नियमों और विनियमों के क्रियाशील होने के बावजूद हम हिन्दी को उसका अधिकार दिला पाने में नाकाम रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद तक भी हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाएं निर्वासन भोगने के लिए विवश हैं। 
फ्रांस और इंग्लैंड के बीच चले सौ वर्षों के लम्बे युद्ध के दौरान अंग्रेजों में फ्रेंच भाषा के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई। 14वीं शताब्दी (1362) में पार्लियामेंट में ‘स्टेच्यूट ऑफ प्लीडिग’ अधिनियम अंग्रेजी के पक्ष में पारित हुआ।  भाषाई अस्मिता की रक्षा का जो काम अंग्रेजों ने 14वीं शताब्दी में अंग्रेजी के परिप्रेक्ष्य में कर दिखाया, हमें यह काम आज हिन्दी में करना होगा। राष्ट्रीय महत्व के इस कार्य को करने के लिए हमारे पास संबल के रूप में संवैधानिक उपबंध हैं। ये संवैधानिक उपबंध के अनुच्छेद 343 से लेकर 351 तक हैं। 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को भारत संघ की राज भाषा के रूप में स्वीकार किया गया तथा संविधान सभा के अध्यक्ष ने घोषणा की थी कि-‘राज भाषा हिन्दी देश की एकता को कश्मीर से कन्याकुमारी तक अधिक सुदृढ़ बना सकेगी। अंग्रेजी की जगह भारतीय भाषा को स्थापित करने से हम निश्चित ही और भी एक-दूसरे के निकट आएंगे।’ संविधान के अनुच्छेद 344 के अनुसार 1955 गठित राजभाषा आयोग की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए 1957 में संसदीय समिति बनायी गई। तद्नुसार निर्णय किया गया कि अंग्रेजी का प्रयोग 26 जनवरी 1965 के बाद भी जारी रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 351 में व्यवस्था है कि ‘हिन्दी भाषा की प्रसार वृद्धि करना, उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके, यह दायित्व केन्द्र शासन का होगा।’
ऐसा नहीं है कि हिन्दी का साम्राज्य कुछ थोड़ा-सिमटा हुआ हो, उसका वर्चस्व ना हो और दुनिया में उसका फैलाव या विस्तार न हो। यह सोच कर हम गौरवान्वित हो उठते हैं कि हमारी फिल्मों और फिल्मी गीतों ने हिन्दी को अपार लोकप्रियता दी है। यह जानकर हम खुश हो उठते हैं कि दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी की पढ़ाई और सिखाई जाती है। यह जानकर हम प्रसन्नता का अनुभव करते हैं कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों, साहित्यकारों तथा कलाकारों ने हिन्दी को प्रतिष्ठित किया है। यह सोचकर भी हम अपनी पीठ थपथपा लेते हैं कि गाहे-बगाहे हमारे बड़े बड़े नेता विदेशी जमीन पर अपनी भाषा यानी हिन्दी में भाषण देकर इतिहास रच देते हैं। यह सोच कर भी हम गर्व महसूस कर लेेते हैं कि हिन्दी और हिन्दी की सांस्कृतिक परम्परा को विदेशी लोग सीखने की, अपनाने की कोशिश करते हैं। पर हमारी ये खुशी, ये गर्व की भावना तब चूर-चूर हो जाती है जब हम देखते हैं कि भारत के स्कूल तथा कॉलेजों में हिन्दी के प्रति न तो किसी प्रकार का सम्मान का भाव है और न ही सीखने, पढऩे और पढ़ाने की अभिरूचि। 
वास्तविकता हमेशा कड़ुवी होती है, कठोर होती है। इन सच्चाईयों से जूझना जरूरी है क्योंकि आज हम उन्हीं चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। चतुर-चालक विश्व बाजार हिन्दी को अपने साम्राज्य विस्तार में सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर रहा है इसलिए हिन्दी की जो असली पहचान है, अपनी गरिमा है, उसको आघात न पहुंचे, इसके लिए हमें चौकस रहना होगा। विदेशी बाजार हो या देशी बाजार, उन्हें हिन्दी भाषा के विकास और विस्तार से कोई बहुत वास्ता नहीं है बल्कि वे उस हिन्दी मानस के भारतीय को अपना टारगेट बनाते हैं जो उनके लिए महज उपभोक्ता की तरह है। शायद यही कारण है कि हिन्दी भाषा के लिए लगातार कोशिशों के बावजूद वह मंच नहीं मिल पाया है जिस पर हिन्दी भाषा का हक है। इसके उलट जब हम अंग्रेजी की तरफ देखते हैं तो विस्मय हो जाना सहज है जो विश्व भाषा न होते हुए भी विश्व मंच पर बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के सुस्थापित है। अंग्रेजी की जानकारी और शिक्षण से परहेज नहीं किया जाना चाहिए लेकिन हिन्दी को बाजार की तरह उपयोग किया जाना अनुचित है। हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए हम सबको सचेत रहना होगा। 


सोमवार, 28 अगस्त 2017

स्वरोजगार बनाम स्टार्टअप


मनोज कुमार
लम्बे सफर के बाद जब आप अपनी मंजिल तक पहुंचने वाले होते हैं तब रेल्वे स्टेशन पर सहसा आपकी नजरें कुली को ढूंढने लगती थी. कोई कुली लपक कर आता और आपके बोझ को अपने कंधों पर उठाकर रेल्वे स्टेशन से बाहर छोड़ आता था. लेकिन अब ऐसा नहीं होता है. अब आप कुली को नहीं ढूंढते हैं और रेल्वे स्टेशन पर कुली भी आपको नहीं मिलता है. समय बदल गया है. चुपके से आप यात्री के साथ साथ स्वयं भी कुली बन गए हैं, यह खबर स्वयं को नहीं हो पायी है. जब आप सफर के लिए सूटकेस खरीदने जाते हैं तो और खासियतों के साथ दुकानदार आपको बताता है कि इस सूटकेस के  पहिए घुमावदार और मजबूत है. आपको सामान ले जाने में दिक्कत नहीं होगी. तब वह आपको अपरोक्ष रूप से बता देता है कि कुली के तौर पर आप अपना भार स्वयं उठाने के लिए तैयार हैं. हमें भी लगता है कि कोई सौ-पचास रुपये बचाकर हमने बड़ा काम कर लिया है लेकिन यह भूल जाते हैं कि ऐसा करके हमने एक आदमी का रोजगार छीन लिया है. हमारे बोझ को उठाकर हमें राहत देता था तो हमें मिलने वाली राहत से उसके घर का चूल्हा जलता था. हम बेखबर रहे और हमारी वजह से कई घरों के चूल्हे बुझने लगे. कुछ लोग शायद मेरी तरह संवेदनशील होते हैं तो उन्हें यह बात अखरती है तो उन्हें साजिशन समझा दिया जाता है कि हम अपना बोझ दूसरे के कंधे पर डाल कर उसका शोषण कर रहे हैं. इस शोषण जैसे शब्द से पूरी कायनात पलट जाती है. 
यह एक कुली की बात नहीं है. ऐसे करके हमने जाने कितने लोगों का, अलग अलग ट्रेंड के रोजगार को खत्म कर दिया है. हमने अपनी पारम्परिक संस्कृति को दरकिनार कर दिया है. फैशन के फेर में भी हमने सैकड़ों घरों के चूल्हे की आग को ठंडा कर दिया है. भारतीय समाज में कांच की चूडिय़ां सौभाग्य का प्रतीक हुआ करती थी. तीज-त्योहार से शादी-ब्याह तक हमारी मां-बहनें, भाभी-चाची हाथों भरकर लाल-हरी चूडिय़ां पहनती थीं. इन चूडिय़ों से उनका सौंदर्य निखर उठता था. रसोई में जब वह रोटी बेलती तो बेलन चलने के साथ आपस में टकराती चूडिय़ां उस रोटी के स्वाद को दुगुना कर देती थी. चूडिय़ों के प्रति आसक्ति इतनी कि उनकी आलमारियों में किसम किसम की चूडिय़ां होती थी. यही नहीं, चूडिय़ों के दरक जाने पर फौरन उसे बदल दिया जाता था. बड़े-बूढ़ों ने समझाया था कि दरकी चूडिय़ां सौभाग्यवती नहीं पहनती हैं. वास्तव में इसके पीछे सामाजिक विज्ञान था, मनोविज्ञान काम करता था. दस-बीस और पचास रुपयों की चूडिय़ों से भाग्य कितना संवरता है या नहीं, यह तो उन्हें भी नहीं मालूम होगा लेकिन इन चूडिय़ों की खरीददारी से चूडिय़ां बनाने वाले कारीगरों के बच्चों को दो जून की रोटी आराम से मिलती थी. फिर समय बदला. कुलियों की तरह चूडिय़ों के दिन भी लदने लगे. फैशन ने दस्तक दी और हाथ भर की चूडिय़ां महिलाओं को बंधन लगने लगा. अब कांच की जगह उसी कीमत की मेटल या कुछ ऐसी ही एक-दो पटले हाथों में डाल लिए. महीनों और बल्कि सालों ना खराब होने वाली चूडिय़ां मात्र परम्परा को पूरी करने पहनी जाने लगी. धीरे-धीरे चूडिय़ां बनाने के कारखाने बंद होने लगे. स्वरोजगार के साथ एक और कुटीर उद्योग मरने लगा. खनकती कलाईयों से रोटी में आने वाली मिठास खत्म होने लगी क्योंकि अब रोटियां बेली नहीं बल्कि बनायी जाती हैं क्योंकि घर-घर में रोटीमेकर है. 
मशीनों के हम इतने मोहताज हो गए हैं कि अब हमारी हर सांस मशीनों पर टिकी हुई है. जो मशीनें हमारी जरूरत के लिए बनी थी, वह हमारी दिनचर्या में शामिल हो गई हैं. हम निकम्मे और नकारा होते जा रहे हैं क्योंकि हमने एक-दूसरे का हाथ छोड़ दिया है. और यही कारण है कि खुद का सामान ढोकर पचीस-पचास रुपये बचाकर किसी कुली को बेरोजगार कर रहे हैं तो फैशन के नाम पर चूडिय़ों से भागकर हमने अपने ही लोगों के हाथों का रोजगार छीन लिया है. मशीनों से हमें शारीरिक श्रम से रोक दिया है और हमारी कमाई का एक बड़ा हिस्सा डॉक्टरों के पास जा रहा है. 25-30 साल के युवाओं के गर्दन में, पीठ और कमर में दर्द की शिकायतें बेपनाह हो रही हैं. ऐसा क्यों इस पर हमने सोचा ही नहीं? भागमभाग की जिंदगी में हमारे मुंह में जिस अचार और पापड़ का स्वाद होता था, सेहत बनाती थी, वह गायब है. नकली और सेहत पर भारी पडऩे वाले मशीनों से बने महीनों पुरानी चीजें खाने के बाद बीमारी की दस्तक अस्वाभाविक नहीं है. ऐसे में जब जब स्टार्टअप  की बात होती है मुझे हिन्दी की महत्वपूर्ण कृति ‘सतह से उठता आदमी’ की याद आ जाती है. स्टार्टअप का मोटेतौर पर शायद मायना शायद ‘सतह से उठता आदमी’ हो सकता है. हमने स्टार्टअप तो ले लिया है लेकिन जमीनी सच से कब जुड़ेंगे? महात्मा गांधी कुटीर उद्योगों के पक्षधर थे क्योंकि वे जानते थे कि इससे समाज, संस्कृति के साथ सेहत भी बची रहेगी. बहुत कुछ अभी भी शेष है. योग को योगा बनाकर लौट रहे हैं तो फैशन की तरह लेकिन योग कर लें और थोड़ा दूसरों के प्रति संवेदनशील हो जाएं तो शायद मशीन और डॉक्टर से हमारा पीछा तो छूटेगा ही. चूडिय़ों की खनक और कुलियों की मुस्कराहट से अपनी नई पीढ़ी को दिखा सकेंगे.

सोमवार, 21 अगस्त 2017

यह जश्र आम आदमी के भरोसे का है


मनोज कुमार
किसी भी राज्य के समग्र विकास के लिए स्थायीत्व पहली शर्त होती है. सरकारों का चुन जाना और थोड़े समय में सत्ता में फेरबदल से विकास न केवल प्रभावित होता है बल्कि आम आदमी में निराशा का भाव भी उत्पन्न होता है. यही कारण है कि इस बार निर्वाचित सरकार को अगली बार निर्वाचित होने में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इस मामले में छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने आम आदमी को भरोसा दिलाया है कि राज्य के समग्र विकास के लिए स्थायी सरकार बनी रहेगी. रमन सरकार के 5000 दिनों का कार्यकाल पूर्ण होने को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए. साल 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य का दर्जा मिला और पहली बार बहुमत के आधार पर कांग्रेस ने अपनी सरकार बनायी. तीन वर्षों में कांग्रेस की सरकार के प्रदर्शन को, उसके विकास कार्यक्रमों को और कांग्रेस से उपजी निराशा ने भाजपा को अवसर दिया. भाजपा ने स्वच्छ छवि वाले केन्द्र में राज्यमंत्री रहे डॉ. रमनसिंह को राज्य की बागडोर सम्हालने की जिम्मेदारी सौंपी. मृदुभाषी, समन्वय के पक्षधर और राज्य के विकास के लिए स्वयं को झोंकने वाले डॉ. रमनसिंह ने छत्तीसगढ़ को विकास के ऐसे रास्ते पर लेकर निकले कि एक आदिवासी राज्य आज देश के विकसित प्रदेशों की गिनती में आ गया है. राज्य की अपनी धरोहर को उन्होंने विश्वमंच पर पहचान दिलायी. शिक्षा, स्वास्थ्य, सडक़, पानी, बिजली और रोजगार के अनेक अवसर के लिए उन्होंने रास्ते खोले. कुछ राज्य की जरूरतों के अनुरूप योजनाओं का श्रीगणेश किया जो कुछ केन्द्र समर्थित लोककल्याणकारी योजनाओं को व्यवहारिक रूप से अमल में लाकर छत्तीसगढ़ के विकास को नया आयाम दिया. 
साल 2003 के बाद से डॉ. रमनसिंह छत्तीसगढ़ की जनता के दिल में ऐसे बसे कि लगातार तीन बार उनकी सरकार को जनादेश मिला. आज जब वे अपनी सरकार के 5 हजार दिन का जश्र मना रहे हैं तो यह रमन सरकार का जश्र नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ राज्य का जश्र है, उस मतदाता का जश्र है जिन्होंने सरकार पर भरोसा किया और सरकार ने उनके भरोसे को बनाये रखा. एकाएक यकीन करना मुश्किल सा हो जाता है कि लगातार कोई इतने लम्बे समय तक बहुमत के साथ रह सकता है? असंभव को संभव करना मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह को आता है. आखिरकार वे डाक्टर जो ठहरे. वे नब्ज पकड़ कर बीमारी जान लेते हैं और दवा करना भी उन्हें आता है. कवर्धा के डॉ. रमनसिंह ने मुख्यमंत्री के रूप में सरगुजा से लेकर बस्तर तक ऐसी ऐसी दवा का इंतजाम किया है जिसकी कल्पना आम आदमी ने नहीं की थी. मिसाल के तौर पर जिस नमक के लिए सदियों से आदिवासी लूटे जाते रहे हैं, उन्हें महज 25 पैसे में नमक देकर लूट से बचा लिया. एक किलो नमक के बदले महंगी चिंरौजी देने वाले आदिवासियों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलने लगा. नक्सलियों की तथाकथा से आज पूरा देश वाकिफ है लेकिन पीडि़त परिवारों की बच्चों की शिक्षा का ऐसा मुकम्मल इंतजाम रमन सरकार ने किया कि वे देश के नामचीन कॉलेजों में गौरव करने वाले अंकों से परीक्षा पास करने लायक बन गए हैं. कोई इंजीनियर बन रहा है तो कोई डॉक्टर, किसी ने कौशल उन्नयन में कारीगरी सीख कर स्वयं का रोजगार पैदा कर लिया तो महतारी-बहनों को आत्मनिर्भर बनने के इतने अवसर मिले कि लोगों को सोचना पड़ रहा है कि इससे बेहतर और कौन सी सरकार होगी. 
लाइवलीहुड कॉलेज मुख्यमंत्री कौशल उन्नयन योजना का एक उपक्रम है। राज्य के सभी 27 जिलों में लाइवलीहुड कॉलेज की स्थापना की गई है और इन कॉलेजों में राज्य के युवाओं को नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है। मोटेतौर पर अब तक एक लाख से अधिक युवाओं को विभिन्न कार्यों का प्रशिक्षण दिया गया है। प्रशिक्षण उपरांत कुछेक ने राज्य के उद्योगों में नौकरी प्राप्त कर ली है तो अनेक ऐसे हैं जिन्होंने स्वयं का उद्यम स्थापित कर जीवोकोपार्जन कर रहे हैं। लाइवलीहुड कॉलेज में ट्रेनिंग प्राप्त करने वालों में लडक़े और लड़कियां दोनों हैं। लाइवलीहुड कॉलेज का यह कांसेप्ट वास्तव में रोजगार की दिशा खोलने के लिए अनूठा है। 
रमन सरकार ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है. आर्थिक रूप से उन्हें संबल बनाने के अनेक प्रयास तो किया ही गया है बल्कि मानसिक रूप से भी उन्हें पक्का बनाया गया है. इसका एक उदाहरण उर्मिला राज्य के एक छोटे से कस्बानुमा नगर देवभोग की एक बहुत ही गरीब मध्यम परिवार की बेटी उर्मिला सोनवाने है. पिता ने अपनी जमीन बेचकर उर्मिला की शादी के लिये प्रबंध किया था. उर्मिला स्वयं राज्य शासन में एक  शासकीय कर्मचारी के तौर पर कार्य करती है. उर्मिला एक पिता की मजबूरी को समझती थी और वह अपने पिता के अरमानों को पूरा करना चाहती थी लेकिन वह अपनी जिंदगी को भी नरक नहीं बनने देना चाहती थी. अपने फैसले के बाद वह कहती है- कुछ खोकर भविष्य बचाया जा सकता है तो यह करना चाहिये. पिता की जमीन बिक गयी, यह सही है लेकिन मेरा भविष्य सुरक्षित हो गया. उर्मिला के इस फैसले से समाज का सन्नाटे में आ जाना कोई अनपेक्षित नहीं था लेकिन बदलाव की शुरूआत जो उर्मिला ने की है, उसकी गूंज देवभोग जैसे छोटे से हिस्से में ही नहीं बल्कि पूरे देश में होने लगी है. 
मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह अपनी आलोचना से विचलित नहीं होते हैं बल्कि वे अपने आलोचकों से संवाद कर अपनी गलतियों को ठीक करने की कोशिश करते हैं. यही कारण है कि मीडिया का साथ उन्हें हमेशा मिलता रहा है और मीडिया भी उन पर भरोसा बनाये रखा है. रमन सरकार ने एक रुपये किलो चावल देकर क्रांति का बिगुल फूंक दिया. उन्होंने सत्ता सम्हालते ही राज्य की जनता से वायदा किया था कि कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोएगा. अपने वचन की पूर्ति के लिए उन्होंने कई योजनाओं का श्रीगणेश किया. रोजगार के अभाव में पलायन सबसे बड़ी चुनौती थी सो उन्होंने एक रुपये किलो चावल देने की महत्वाकांक्षी योजना का आरंभ किया। साथ में तेल और नमक जैसी जरूरत की दूसरी चीजों को भी रियायती दर पर देना आरंभ किया। अपनी इस योजना को लेकर वे विरोधियों के निशाने पर भी रहे। डॉ. रमनसिंह की यह योजना थोड़े ही समय में लोकप्रियता की बुलंदी को छूने लगी। काम के अभाव में पलायन करने वाले छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और मजदूर पलायन से तौबा करने लगे। अनाज का वितरण में धांधली न हो, इसकी पुख्ता व्यवस्था उन्होंने की और इसका परिणाम यह निकला कि छत्तीसगढ़ के पीडीएस प्रणाली की सुप्रीम कोर्ट ने सराहना की।  उनके इन प्रयासों का सुफल यह मिला कि हर वर्ष बड़ी संख्या में काम की तलाश में पलायन करने वाले भाई-बहिनों को अब घर से बाहर भटकना बंद हो गया. सस्ते में अनाज, तेल और नमक के साथ साल भर रोजगार की व्यवस्था ने पलायन को ही पलायन करने पर मजबूर कर दिया. ऐसे लोग जो तीज-त्योहार पर अपनों से दूर रहते थे, परदेस में अत्याचार सहते थे लेकिन उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था, ऐसे में रमन सरकार से मिली मदद ने उनकी घरवापसी करा दी. आज वे अपनों के साथ प्रसन्न हैं.
रमन सरकार आम आदमी की सरकार बन गई थी। रमन सरकार राज्य की जनता को रोजगार और बेहतर जिंदगी देने के लिए ही प्रयासरत नहीं थी बल्कि उसकी कोशिश थी कि छत्तीसगढ़ की जीवनशैली, परम्परा एवं संस्कृति को न केवल संरक्षित किया जाए बल्कि उसे विस्तार भी दिया जाए। इस कड़ी में रमन सरकार ने राजिम कुंभ को विधान रूप धार्मिक गुरुओं की सहमति से मान्यता दिलाने का प्रयास किया। आज राजिम कुंभ छत्तीसगढ़ का प्रतिष्ठा आयोजन बन चुका है।  इस तरह इन 5 हजार दिनों में हर दिन एक ऐसे फैसले का रहा है जो छत्तीसगढ़ के विकास को नया आयाम देता है. ये दिन और बढ़ेंगे और विकास की नई इबारत लिखता दिखेगा मोर सुघ्घर छत्तीसगढ़.

रविवार, 20 अगस्त 2017

अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ संस्थान में आवश्यकता


शीघ्र शुरू होने जा रहे अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ संस्थान (ANS) को अपनी हिंदी और अंग्रेजी भाषा की वेबसाइट्स हेतु ट्रेनी, सब-एडिटर, फोटो एडिटर, सोशल मीडिया एडिटर की आवश्यकता है। बता दें कि एएनएस की निकट भविष्य की यह योजना है कि देश के अग्रणी 15 भाषाओं में कई न्यूज़ पोर्टल शुरू किया जाए। फिलहाल हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं में न्यूज वेबसाइट तैयार है जिसके लिए संस्थान को तेज-तर्रार पत्रकारों की आवश्यकता है। ऐसे पत्रकार जिन्हें अपनी लेखनी पर भरोसा है, जिन्हें कंटेंट पर अच्छी पकड़ है,पत्रकारिता क्षेत्र में डिग्री के साथ-साथ अनुभव रहा है, ऐसे पत्रकारों को प्राथमिकतास्वरूप अवसर प्रदान किया जाएगा।
पत्रकारिता में डिप्लोमा/ स्नातक / परास्नातक (या समकक्ष) की डिग्री रखने वाले उपयुक्त उम्मीदवार इसके लिए आवेदन कर सकते हैं । ज्ञात रहे उम्मीदवारों की हिन्दी टाइपिंग स्पीड ठीक हो और हिंदी से अंग्रेजी या अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद आसानी से कर लेते हों । ऐसे तो सामान्यत: २ वर्षों का अनुभव माँगा गया है, लेकिन जो नावांतुक पत्रकार हैं उन्हें उनके द्वारा लिखे हुए समाचार / लेख / ब्लॉग / पोस्ट का लिंक या उसकी प्रति माँगा गया है।
चयनित अभ्यर्थियों को फोन के माध्यम से सूचित कर साक्षात्कार के लिए 24.08.2017 को दोपहर 02:30 बजे ANS के ऑफिस ”R-559, अपर ग्राउंड फ्लोर, न्यू राजेंद्र नगर, मोती महल के समीप, फायर स्टेशन, शंकर रोड, नई दिल्ली-100060” पते पर बुलाया जाएगा।
अमरेन्द्र जी से मिली सूचना

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