सोमवार, 13 सितंबर 2021

श्यामपट्ट से की-बोर्ड तक हिन्दी

 मनोज कुमार

हर साल की तरह बिसूरने के लिए 14 सितम्बर का दिन फिर आ गया और यह अंक जब आपके हाथों में होगा, दिन, सप्ताह, पखवाड़ा और महीना लोप हो चुका होगा. कदाचित हिन्दी डे से हिन्दी मंथ पर बहस चल रही होगी. हिन्दी को लेकर हमारा आग्रह-अनुराग होना चाहिए और यह हो भी रहा है लेकिन हिन्दी को लेकर हमें हीनता से बाहर आना होगा. कल तक जो हिन्दी मध्यम और निम्र मध्यम वर्ग की भाषा थी, आज वह गूगल की भाषा बनकर पूरी दुनिया की जरूरत बन गई है. एक समय था जब अंग्रेजी पत्रिकाओं को हिन्दी में अनुदित होकर पाठकों के मध्य आना विवशता थी कि क्योंकि अंग्रेजी से उनका जीवन गुजरता था लेकिन रोटी हिन्दी से ही मिलती थी. टेक्रालॉजी के विस्तार के साथ हिन्दी का साम्राज्य बढ़ता चला गया. कल तक भारतीय प्रकाशक हिन्दी को मजबूरी मान रहे थे तो आज वैश्विक समाज के लिए हिन्दी जरूरी है. ऐसे में हिन्दी को लेकर विलाप करने के बजाय हमें हिन्दी के प्रभाव पर चर्चा करना चाहिए. हिन्दी कभी रूढ़िवादी नहीं रही. बल्कि वह बहते निर्मल जल की तरह अपना रास्ता बनाती गई. भाषा का यह लचीलापन हिन्दी का सबसे सबल पक्ष है. उसके समक्ष यह बंधन कभी नहीं रहा कि वह किसी एक कालखंड में बंधी रहे. हिन्दी के ज्ञाता इस बात से सहमत होंगे कि हिन्दी हर कालखंड में स्वयं को परिवर्तित और स्वयं को समृद्ध बनाती गई. घूरे से गूगल तक के अपनी यात्रा में हिन्दी ने अंग्रेजी को बार-बार आईना दिखाया है. आज जब हम हिन्दी दिवस उत्सव मना रहे हैं तब हमें हिन्दी के गौरव पक्ष को नयी पीढ़ी के समक्ष रखना होगा.

कभी-कभी तो लगता है कि एक सुनियोजित ढंग से हिन्दी को पीछे रखने की साजिश की जा रही है. हिन्दी हमारी मातृभाषा है और मां को मां कहने के लिए सिखाने की जरूरत नहीं होती है तब हिन्दी को सीखने-सिखाने के लिए हम क्यों बेताब हैं? अंग्रेजी सीखने-सिखाने के लिए हमने जोर नहीं डाला लेकिन लोग उसके सम्मोहित हैं तो ऐसा व्यवहार हिन्दी के साथ क्यों नहीं होना चाहिए? कोविड महामारी के दौर में हिन्दी की प्रतिष्ठा में और भी श्रीवृद्धि हुई है. सुदूर गांव में बैठा बच्चा जो ठेठ हिन्दी का है, उसने भी अपनी पढ़ाई पूरी की और शहर में बैठा बच्चा भी. कल्पना कीजिए कि जब शालाओं के कपाट बंद थे और लोग घरों में कैद थे, तब भी जीवन चल रहा था. यह कैसे संभव हुआ? कौन सा जादू था जो बच्चों को शिक्षित भी कर रहा था और समाज को सूचित भी. यह इसलिए संभव हुआ कि हिन्दी हठी नहीं हुई बल्कि टेक्रालॉजी की संगी बन गई. यह दीगर बात है कि तकनीकी कारणों से व्यवधान हुआ लेकिन हिन्दी जीवन को सहज बनाने में सहायक रही, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. यह हिन्दी की ताकत है कि वह निराला और पंत को साथ लेकर चलती है तो परसाईं और दुष्यंत कुमार भी साथ होते हैं.

हिन्दी राजभाषा है, उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की हिमायत हम करते रहे हैं लेकिन यह संभव नहीं होते दिख रहा है तो यह हमारे कमजोर आत्मबल का प्रतीक है. सरकार किसी की भी रही हो लेकिन सबका आग्रह हिन्दी रहा है लेकिन वह केवल भाषणों में सीमित रहा. इसके पीछे क्या कारण है, इसे तलाश किया जाना चाहिए. हमारा आग्रह हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बने लेकिन हम स्वयं उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दे नहीं पा रहे हैं तब शिकायत कैसी? कोई भी शुभ कदम हमारे अपने द्वार से होना चाहिए तब दुनिया हल्दी-कुंकुम लिये खड़ी होगी. एक शिकायत जायज है कि हिन्दी के प्रकाशनों, खासकर दैनिक अखबारों के पन्नों पर जो बेहिसाब अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग होता है, उससे बचना चाहिए. कुछेक शब्द जो बोलचाल में हिन्दी मान लिये गए हैं, उनका उपयोग तो ठीक है लेकिन जानबूझकर अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग करना और यह कहना कि नयी पीढ़ी ऐसा ही समझती है तो आप स्वयं को धोखे में रख रहे हैं. हिन्दी, हिन्दुस्तानी भाषा है और इसकी मिठास और अपनापन भी इसी में है. यह गैरवाजिब बात होगी कि हम हिन्दी के उन कठिन शब्दों का उपयोग करें, जो आज की पीढ़ी की समझ से बाहर है. हिन्दी का गौरव हमेशा कायम रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए.

बुधवार, 8 सितंबर 2021

सरकारी नहीं, ‘असर-कारी’ होंगे सीएम राइज स्कूल

मनोज कुमार

राज्य के आखिरी छोर पर बसे किसी गांव के बच्चे के लिए किसी महंगे प्रायवेट स्कूल में पढऩे की लालसा एक अधूरे सपने की तरह है. दिल्ली दूर है कि तर्ज पर वह अपनी शिक्षा उस खंडहरनुमा भवन में पूरा करने के लिए मजबूर था जिसे सरकारी स्कूल कह कर बुलाया जाता था. बच्चों के इन सपनों की बुनियाद पर प्रायवेट स्कूलों का मकडज़ाल बुना गया और सुनियोजित ढंग से सरकारी स्कूलों के खिलाफ माहौल बनाया गया. शिक्षा की गुणवत्ता को ताक पर रखकर भौतिक सुविधाओं के मोहपाश में बांध कर ऊंची बड़ी इमारतों को पब्लिक स्कूल कहा गया. सरकारें भी आती-जाती रही लेकिन सरकारी स्कूल उनकी प्राथमिकता में नहीं रहा. परिवर्तन के इस दौर में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने राज्य में ऐसे स्कूलों की कल्पना की जो प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से कमतर ना हों. मुख्यमंत्री चौहान की इस सोच में प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से अलग अपने बच्चों के सपनों को जमीन पर उतारने के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है. इसी सोच और भरोसे की बांहें थामे मध्यप्रदेश के सुदूर गांवों से लेकर जनपदीय क्षेत्र में ‘सीएम राइज स्कूल’ की कल्पना साकार होने जा रही है. अनादिकाल से गुरुकुल भारतीय शिक्षा का आधार रहा है लेकिन समय के साथ परिवर्तन भी प्रकृति का नियम है. इन दिनों शिक्षा की गुणवत्ता पर चिंता करते हुए गुरुकुल शिक्षा पद्धति का हवाला दिया जाता है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में गुरुकुल नए संदर्भ और नयी दृष्टि के साथ आकार ले रहा है. सरकारी शब्द के साथ ही हमारी सोच बदल जाती है और हम निजी व्यवस्था पर भरोसा करते हैं. हमें लगता है कि सरकारी कभी असर-कारी नहीं होता है. इस धारणा को तोड़ते हुए मध्यप्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता के साथ नवाचार करने के लिए ‘सीएम राइज स्कूल’ सरकारी से ‘असरकारी’ होने की कल्पना के जल्द ही वास्तविकता की जमीन पर खड़ा होगा.

वर्तमान में राज्य के स्कूलों पर नजर डालें तो एक बात स्पष्ट होती है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने असंतोष को दूर करने के लिए स्कूलों की भीड़ लगा दी. किसी स्कूल में दो बच्चे तो किसी स्कूल में पांच और कहीं-कहीं तो महीनों से ताला डला है. कागज पर स्कूल चल रहे हैं लेकिन हकीकत में इन स्कूलों पर केवल बजट खर्च हो रहा है. ऐसे में एक बड़ी सोच के साथ शिवराजसिंह सरकार ने एक सर्वे करा कर यह तय किया कि फिलहाल एक लाख से ऊपर ऐसे स्कूलों को एकजाई कर ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू किया जाए. योजना के मुताबिक अभी 9200 ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू होंगे. 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में संचालित होने वाले इन स्कूलों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी और अंग्रेजी दोनों होगा. आवागमन की सुविधा के लिए सरकार बस और वैन की सुविधा भी दे रही है. बच्चों, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को अकल्पनीय सुविधायें इस स्कूल में होगी. मसलन स्वीमिंग पूल, बैंकिंग काउंटर, डिजिटल स्टूडियो, कैफेटेरिया, जिम, थिंकिंग एरिया होगी जो अभी तक प्रायवेट पब्लिक स्कूल में भी ठीक से नहीं है.  प्री-नर्सरी से हायर सेकंडरी की कक्षा वाले ‘सीएम राइज स्कूल’ आने वाले 2023 तक पूरे राज्य में शुरू हो चुके होंगे. 

उल्लेखनीय है कि प्रदेश के बच्चे पढ़ाई के मामले में सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के बच्चों से मुकाबला कर सकें, इसलिए सरकार प्रत्येक स्कूल पर 20 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करेगी. योजना के अनुरूप स्कूल चार स्तर (संकुल से नीचे, संकुल, ब्लॉक और जिला) पर तैयार होंगे। इन स्कूलों में बच्चों को ड्रेस कोड भी निजी स्कूलों जैसा रखने की योजना है.मध्यप्रदेश में अक्टूबर से अस्तित्व में आ रहे सीएम राइज स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को लिखित और मौखिक परीक्षा देनी होगी। इसमें पढ़ाने के प्रति उनकी रुचि, पढ़ाने का तरीका और विषय पर पकड़ देखी जाएगी। वर्तमान में सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों में से ही सीएम राइज स्कूलों के लिए शिक्षकों का चयन होगा, पर उन्हें लंबी चयन परीक्षा से गुजरना पड़ेगा. लिखित और मौखिक परीक्षा के अलावा जिस कक्षा के लिए उनका चयन होना है, उसमें पढ़ाकर भी दिखाना होगा ताकिसुनिश्चित किया जा सके कि योग्य शिक्षक का चयन हुआ है. उन्हें विधिवत नियुक्ति दी जाएगी. इन स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को परीक्षा देनी होगी और उन्हें नियमित शिक्षकों की तुलना में ज्यादा वेतन दिया जाएगा. शिक्षकों को स्कूल परिसर में ही मकान भी मिलेगा, ताकि उनके अप-डाउन में उलझने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो. सीएम राइज योजना के लिए चयनित स्कूलों में अक्टूबर से पढ़ाई का तरीका बदल जाएगा। जैसे ही ये स्कूल खुलेंगे, सरकारी स्कूलों की परंपरागत पढ़ाई से इतर नए तरीके से पढ़ाई कराई जाएगी.

स्कूल शिक्षा विभाग के मानक के अनुरूप निजी स्कूलों की तरह व्यवस्थित भवन और अन्य जरूरी सुविधाएं, हर विद्यार्थी के लिए परिवहन सुविधा, नर्सरी एवं केजी कक्षाएं, शिक्षकों एवं अन्य स्टाफ के सौ फीसद पद भरे जाएंगे, स्मार्ट क्लास एवं डिजिटल लर्निंग, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, व्यावसायिक शिक्षा के साथ नए भवनों में स्वीमिंग पूल, खेल सुविधाएं, संगीत कक्षाएं भी रहेंगी. सीएम राइस स्कूल योजना के प्रथम चरण में 259 स्कूल खोले जाएंगे. इनमें से 253 स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा और 96 स्कूल आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा खोले जाएंगे. सी.एम. राइज स्कूल की संरचना के अनुरूप जिला स्तर पर प्रत्येक जिले में एक अर्थात कुल 52 सी.एम. राइज स्कूल होंगे, जिसमें प्रति स्कूल 2000 से 3000 विद्यार्थी होंगे. विकास खंड स्तरीय 261 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 1500 से 2000 विद्यार्थी होंगे. इसी प्रकार संकुल स्तरीय 3200 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 100 से 1500 विद्यार्थी होंगे. ग्रामों के समूह स्तर पर 5687 सी.एम.राइस स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 800 से 1000 विद्यार्थी होंगे. कैबिनेट ने इस योजना के प्रथम चरण के लिए 6952 करोड़ की मंजूरी दे दी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के मानक के अनुरूप सीएम राइज स्कूल में कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाएगी. डिग्री के स्थान पर बच्चों को रोजगारपरक शिक्षा देेने पर जोर होगा. नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें भारतीयता से जोड़ा जाएगा. स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह के अनुसार इन स्कूलों का मुख्य उद्देश्य बच्चों को ज्ञान, कौशल और नागरिकता के संस्कार देना है। साथ ही, भारतीय संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा देना है। स्कूली शिक्षा में बहुविध गतिविधियों के सूर्योदय की उम्मीद के साथ सीएम राइज स्कूल जमीनी तौर पर जल्द ही काम करने लगेंगे.

शनिवार, 4 सितंबर 2021

शिक्षा और दीक्षा

 शिक्षा और दीक्षा

मनोज कुमार 

    आज हमारे पड़ोसी शर्माजी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया. शिक्षित अर्थात उसने बीई की डिग्री हासिल कर ली. बेटे के स्नातक हो जाने की खुशी उनके चेहरे पर टपक रही थी. यह अस्वाभाविक भी नहीं है. एक डिग्री हासिल करने के लिए कई किसम के जतन करने पड़ते हैं. अपनी जरूरतों और खुशी को आले में रखकर बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाता है. और बच्चा जब सफलतापूर्वक डिग्री हासिल कर ले तो गर्व से सीना तन जाता है. उनके जाने के बाद एक पुराना सवाल भी मेरे सामने आ खड़ा हुआ कि क्या डिग्री हासिल कर लेना ही शिक्षा है? क्या डिग्री के बूते एक ठीकठाक नौकरी हासिल कर लेना ही शिक्षा है? मन के किसी कोने से आवाज आयी ये हो सकता है लेकिन यह पूरा नहीं है. फिर मैं ये सोचने लगा कि बोलचाल में हम शिक्षा-दीक्षा की बात करते हैं तो ये शिक्षा-दीक्षा क्या है? शिक्षा के साथ दीक्षा शब्द महज औपचारिकता के लिए जुड़ा हुआ है या इसका कोई अर्थ और भी है. अब यह सवाल शर्माजी के बेटे की डिग्री से मेरे लिए बड़ा हो गया. मैं शिक्षा-दीक्षा के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए पहले स्वयं को तैयार करने लगा.

    एक पत्रकार होने के नाते क्यों पहले मन में आता है. इस क्यों को आधार बनाकर जब शिक्षा-दीक्षा का अर्थ तलाशने लगा तो पहला शिक्षा-दीक्षा का संबंध विच्छेद किया. शिक्षा अर्थात अक्षर ज्ञान. वह सबकुछ जो लिखा हो उसे हम पढ़ सकें. एक शिक्षित मनुष्य के संदर्भ में हम यही समझते हैं. शिक्षा को एक तंत्र चलाता है इसलिए शिक्षा नि:शुल्क नहीं होती है. विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हासिल करने के लिए हमें उसका मूल्य चुकाना होता है. इस मूल्य को तंत्र ने शब्द दिया शिक्षण शुल्क. यानि आप शिक्षित हो रहे हैं, डिग्री हासिल कर रहे हैं और समाज में आपकी पहचान इस डिग्री के बाद अलहदा हो जाएगी. आप डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार और शिक्षा जैसे अनेक पदों से सुशोभित होते हैं. चूंकि आपकी शिक्षा मूल्य चुकाने के एवज में हुई है तो आपकी प्राथमिकता भी होगी कि आप चुकाये गए मूल्य की वापसी चाहें तो आप अपनी डिग्री के अनुरूप नौकरी की तलाश करेंगे. एक अच्छी नौकरी की प्राप्ति आपकी डिग्री को ना केवल सार्थक करेगी बल्कि वह दूसरों को प्रेरणा देगी कि आप भी शिक्षित हों. यहां एक बात मेरे समझ में यह आयी कि शिक्षित होने का अर्थ रोजगार पाना मात्र है.

    अब दूसरा शब्द दीक्षा है. दीक्षा शब्द आपको उस काल का स्मरण कराता है जब डिग्री का कोई चलन नहीं था. शिक्षित होने की कोई शर्त या बाध्यता नहीं थी. दीक्षा के उपरांत नौकरी की कोई शर्त नहीं थी. दीक्षित करने वाले गुरु कहलाते थे. दीक्षा भी नि:शुल्क नहीं होती थी लेकिन दीक्षा का कोई बंधा हुआ शुल्क नहीं हुआ करता था. यह गुरु पर निर्भर करता था कि दीक्षित शिष्य से वह क्या मांगे अथवा नहीं मांगे या भविष्य में दीक्षित शिष्य के अपने कार्यों में निपुण होने के बाद वह पूरे जीवन में कभी भी, कुछ भी मांग सकता था. यह दीक्षा राशि से नहीं, भाव से बंधा हुआ था. दीक्षा का अर्थ विद्यार्थी को संस्कारित करना था. विद्यालय-विश्वविद्यालय के स्थान पर गुरुकुल हुआ करते थे और यहां राजा और रंक दोनों की संतान समान रूप से दीक्षित किये जाते थे. दीक्षा के उपरांत रोजगार तलाश करने के स्थान पर विद्यार्थियों को स्वरोजगार के संस्कार दिये जाते थे. जंगल से लकड़ी काटकर लाना, भोजन स्वयं पकाना, स्वच्छता रखना और ऐसे अनेक कार्य करना होता था. यह शिक्षा नहीं, संस्कार देना होता था. दीक्षा अवधि पूर्ण होने के पश्चात उनकी योग्यता के रूप में वे अपने पारम्परिक कार्य में कुशलतापूर्वक जुट जाते थे. अर्थात दीक्षा का अर्थ विद्यार्थियों में संस्कार के बीज बोना, उन्हें संवेदनशील और जागरूक बनाना, संवाद की कला सीखाना और अपने गुणों के साथ विनम्रता सीखाना.

    इस तरह हम शिक्षा और दीक्षा के भेद को जान लेते हैं. यह कहा जा सकता है कि हम नए जमाने में हैं और यहां शिक्षा का ही मूल्य है. निश्चित रूप से यह सच हो सकता है लेकिन एक सच यह है कि हम शिक्षित हो रहे हंै, डिग्रीधारी बन रहे हैं लेकिन संस्कार और संवेदनशीलता विलोपित हो रही है. हम शिक्षित हैं लेकिन जागरूक नहीं. हम डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदार नहीं. शिक्षक हैं लेकिन शिक्षा के प्रति हमारा अनुराग नहीं, पत्रकार हैं लेकिन निर्भिक नहीं. जिस भी कार्य का आप मूल्य चुकायेंगे, वह एक उत्पाद हो जाएगा. शिक्षा आज एक उत्पाद है जो दूसरे उत्पाद से आपको जोड़ता है कि आप नौकरी प्राप्त कर लें. दीक्षा विलोपित हो चुकी है. शिक्षा और दीक्षा का जो अंर्तसंबंध था, वह भी हाशिये पर है. शायद यही कारण है कि समाज में नैतिक मूल्यों का हस हो रहा है क्योंकि हम सब एक उत्पाद बन गए हैं. शिक्षा और दीक्षा के परस्पर संबंध के संदर्भ में यह बात भी आपको हैरान करेगी कि राजनीति विज्ञान का विषय है लेकिन वह भी शिक्षा का एक प्रकल्प है लेकिन राजनेता बनने के लिए शायद अब तक कोई स्कूल नहीं बन पाया है. राजनेता बनने के लिए शिक्षित नहीं, दीक्षित होना पड़ता है. यह एक अलग विषय है कि राजनेता कितना नैतिक या अनैतिक है लेकिन उसकी दीक्षा पक्की होती है और एक अल्पशिक्षित या अपढ़ भी देश सम्हालने की क्षमता रखता है क्योंकि वह दीक्षित है. विरासत में उसे राजनीति का ककहरा पढ़ाया गया है. वह हजारों-लाखों की भीड़ को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है और यह ककहरा किसी क्लास रूम में नहीं पढ़ाया जा सकता है. शिक्षक दिवस तो मनाते हैं हम लेकिन जिस दिन दीक्षा दिवस मनाएंगे, उस दिन इसकी सार्थकता सिद्ध हो पाएगी.

गुरुवार, 19 अगस्त 2021

‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इतिहास’ विषय के शिक्षकों की भूमिका पर राष्ट्रीय वेबीनार

 ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इतिहास’ विषय के शिक्षकों की भूमिका पर राष्ट्रीय वेबीनार

इतिहास की पुर्नव्याख्या करने की जरूरत- डॉ. रत्नम
महू (इंदौर). 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय मूल्यों की बात की गई है. इस संदर्भ में इतिहास विषय के शिक्षकों की जिम्मेदारी बढ़ गई है क्योंकि नई शिक्षा नीति में उनके प्रभावी क्रियान्वयन उन्हें करना है.  उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टि के साथ इतिहास की पुर्नव्याख्या करने की जरूरत है. यह बात भारतीय इतिहास परिषद, भारत शासन के सदस्य प्रो. कुमार रत्नम ने कही. प्रो. रत्नम डॉ. बी.आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू एवं भारतीय शिक्षण मंडल के संयुक्त तत्वावधान में ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इतिहास’ विषय के शिक्षकों की भूमिका पर आयोजित राष्ट्रीय वेबीनार को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि देश का एकमात्र विश्वविद्यालय है जो निरंतर अकादमिक चिंतन कर रहा है और एनईपी के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा निर्धारण करने में अपना योगदान दे रहा है. प्रो. रत्नम ने ब्राउस को इस बात का प्रस्ताव दिया कि भारतीय इतिहास परिषद साथ मिलकर काम करना चाहता है जिससे ब्राउस के कार्यों को और ऊंचाई मिल सके. उन्होंने अपने सारगर्भित व्याख्यान में इतिहास विषय से जुड़ी अनेक बातों को स्पष्ट किया और बताया कि एनईपी कैसे शिक्षा को दिशा देगी.
कार्यक्रम के चेयरपर्सन पूर्व कुलपति प्रो. सुगम आनंद ने इतिहास की व्याख्या भारतीय ज्ञान परम्परा के अनुरूप होना चाहिए. उन्होंने कहा कि 1857 को जिस तरह हम विद्रोह कहते हैं, ऐसे और भी अनेक शब्द हैं जिसे बदले जाने की जरूरत है. इतिहास की पुर्नव्याख्या वर्तमान समय की जरूरत है. अब तक जो इतिहास लिखा गया है, वह भ्रमित करता है. उन्होंने इतिहास शिक्षकों की महती भूमिका है कि वह अब नए और प्रभावी ढंग से विद्यार्थियों को शिक्षित करें.  गुरुकुल कांगड़ी यूर्निवसिटी हरिद्वार में इतिहास विभाग के प्रोफेसर प्रभात कुमार ने कहा कि चीन और जापान की प्रगति का कारण उनकी अपनी भाषा है और एनईपी में भी यही प्रावधान किया गया है जो देश के लिए सबसे अच्छा है. प्रो. कुमार ने कहा कि शिक्षा विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाती है और आत्मनिर्भरता से देश का विकास होता है. हमारे समाज की सबसे बड़ी कमजोरी अंग्रेजी भाषा है. सबकुछ जानते हुए भी हमारे विद्यार्थी अंग्रेजी नहीं जानने के कारण पीछे रह जाते हैं. लेकिन भाषा सिर्फ माध्यम है।उन्होंने इतिहास विषय के संदर्भ मेंं कहा कि शिक्षकों को अपडेट होने का अवसर मिलेगा. मुंडी लिपि का प्रदर्शन करते हुए प्रो. कुमार ने कहा कि लिपि पढऩे वाले कम लोग रह गए हैं. हम ब्राह्मी, उर्दू और फारसी पढ़ लेते हैं लेकिन मुंडी को पढ़ पाना मुश्किल है. उन्होंने बताया कि मुंडी लिपि विक्टोरिया महारानी के समय में प्रचलन में थी. लिपि या भाषा खुद को सीखना पड़ती है.
चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग की अध्यक्ष प्रो. आराधना गुप्ता ने कहा कि इतिहास एक परम्परागत विषय है. प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक इतिहास शिक्षण की समस्या बड़ी है लेकिन समाधान हम शिक्षकों को ही तलाश करना होगा. उन्होंने कहा कि एनईपी में नैतिक शिक्षा पर जोर दिया है जो विद्यार्थियों को भारतीयता की ओर लौटता है. प्राथमिक शिक्षा में ही इतिहास को पढ़ाना होगा और उन्हें अपने इतिहास के बारे में बताना होगा. दीनदयाल उपाध्याय यूर्निवसिटी गोरखपुर में इतिहास विभाग की अध्यक्ष प्रो. निधि चतुर्वेदी ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा कि 21वीं-22वीं शताब्दी की चुनौतियों का जवाब है एनईपी. उन्होंने कहा कि हिस्ट्री की शिक्षा का प्रारूप बदलना होगा. उन्होंने उदाहरण के साथ बताया कि शिवाजी महाराज को क्षेत्रीय नायक के रूप में बताया गया जबकि वे राष्ट्र नायक थे. उन्होंने कहा कि एनईपी में शिक्षकों को नवाचार सीखने का अवसर मिलेगा क्योंकि अब शिक्षा का स्वरूप शोधपरक होगा. उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को सांस्कृति और राष्ट्रवादी इतिहास के बारे में बताना जरूरी हो गया है. गुरु कांगड़ी यूर्निवसिटी देहरादून में इतिहास विभाग की हेड प्रो. रेणु शुक्ला ने कहा कि एनईपी में इतिहास के महत्व को रेखांकित किया गया है जो अब तक नहीं हो पा रहा था. शिक्षा का उद्देश्य अच्छा व्यक्ति और दृष्टिसम्पन्न समाज का निर्माण करना है. अब शिक्षकों की जवाबदारी बढ़ गई है. एनईपी में न्याय, समानता और रोजगार का प्रावधान किया गया है जिसकर जरूरत आज थी.
वेबीनार के आरंभ में अध्यक्ष एवं कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने अतिथि वक्ताओं का स्वागत करते हुए विश्वविद्यालय का संक्षिप्त जानकारी दी. उन्होंने कहा कि देश के एकमात्र सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय होने के नाते हमारी जवाबदारी बड़ी है. डॉ. रत्नम के प्रस्ताव पर कुलपति प्रो. शुक्ला ने अपनी सहमति व्यक्त करते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया और विश्वास जाहिर किया कि अकादमी गतिविधियों को और विस्तार मिल सकेगा. आभार प्रदर्शन एवं संचालन डॉ. मनोज कुमार गुप्ता ने किया. परम्परानुसार कार्यक्रम के आरंभ में ध्येय वाक्य का वाचन अधिवक्ता श्री नरेश मिश्रा ने किया. वेबीनार के सफल आयोजन में समस्त डीन एवं कुलसचिव श्री अजय वर्मा के साथ ब्राउस परिवार का सक्रिय सहयोग रहा.

मंगलवार, 10 अगस्त 2021

शोध पत्रिका "समागम " के नए अंक में


 आजादी का अमृत पर्व अर्थात उन दिनों को गौरवपूर्वक याद करने का समय जिनके साहस और बलिदान से आज हम स्वतंत्र हैं लेकिन कुछ उन ऐतिहासिक घटनाओं को भी याद करना और नई पीढ़ी को बताने की जवाबदारी भी हमारी है. इतिहास के पन्नों से कुछ कहानियां शोध पत्रिका "समागम " के नए अंक में 

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मनोविज्ञान शिक्षकों की भूमिका’ पर संगोष्ठी

 ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मनोविज्ञान शिक्षकों की भूमिका’ पर संगोष्ठी

‘शिक्षा नीति में मनोविज्ञान  के शिक्षकों की प्रभावी भूमिका-प्रो. मिश्र

महू (इंदौर). ‘शिक्षा नीति-2020 के पूरे प्रारूप में मनोविज्ञान विषय के शिक्षकों की प्रभावी भूमिका रेखांकित की गई है. शिक्षा पद्धति, मूल्यांकन  और शिक्षा तथा विद्यार्थियों के संबंध में जो नई संकल्पना प्रस्तुत की गई है, उसे कार्य व्यवहार में लाने के लिए मनोविज्ञान शिक्षकों की अहम भूमिका है.’ यह बात महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर गिरिश्वर मिश्र ने डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय (ब्राउस)के शिक्षा अध्ययन शाला एवं भारतीय शिक्षण मंडल के संयुक्त तत्ववाधान में आयोजित राष्ट्रीय वेबीनार में कही. प्रोफेसर मिश्र का कहना था कि शिक्षा की रूपरेखा बदल गई है. अब नए तरीके से माइंडसेट करने की जरूरत शिक्षकों, विद्यार्थियों और पालकों को करने की जरूरत है. प्रोफेसर मिश्र का सुझाव था कि मनोविज्ञान के शिक्षकों को भी इस नई संकल्पना में प्रशिक्षण की आवश्यकता है. विद्यार्थी की रचनात्मकता और उसकी रूचि के अनुरूप अब शिक्षा देने की जो व्यवस्था की जा रही है, उसमें मनोविज्ञान के शिक्षकों की भूमिका बड़ी और गंभीर होगी क्योंकि यह मनोविज्ञान का कौशल है कि वह दिशा तय कर सके और परामर्श दे सके. शिक्षा ऐसी हो जो सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करे.

वेबीनार के आरंभ में स्कूल ऑफ एजुकेशन, सेंट्रल यूर्निवसिटी, हिमाचल प्रदेश, धर्मशाला के अधिष्ठाता प्रोफेसर विशाल सूद ने शिक्षा नीति में मनोविज्ञान शिक्षकों की भूमिका का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी अब मनोविज्ञान शिक्षकों पर है. उन्होंने कहा कि मनोविज्ञान शिक्षकों  की योग्यता होती है कि वह विद्यार्थियों की ऊर्जा और रचनात्मकता की पहचान कर सके. अब उन्हें यह जवाबदारी और गंभीरता से पूर्ण करना होगी. प्रोफेसर सूद ने भारतीय ज्ञान परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा नीति 2020 ने विद्यार्थियों के कौशल को पहचान कर उन्हें शिक्षा का खुला आकाश उपलब्ध कराया है. एमिटी यूर्निवसिटी, गुरुग्राम हरियाणा में क्लिनिकल सॉयकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास शर्मा ने कहा कि शिक्षा नीति में अब संवेदनशीलता को स्थान दिया गया है जिसकी समझ मनोविज्ञान शिक्षकों में होती है. उन्होंने आउटकम की बात करते हुए कहा कि विद्यार्थी जो क्लास रूम में पढ़ रहा है, वह कितना सीख और समझ रहा है, इसका आंकलन मनोविज्ञान शिक्षक ही कर पाएंगे. समस्या को समझना और उसका विवेचन करने का कौशल मनोविज्ञान शिक्षकों  के पास होता है. उन्होंने छोटे बच्चों की शिक्षा पर कार्य करने और योजना बनाने का सुझाव दिया. 

दिल्ली यूर्निवसिटी में मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आनंदप्रकाश ने कहा कि मनोविज्ञान के शिक्षक नई शिक्षा नीति के अनुरूप ढाल सकते हैं. चुनौती के साथ संभावना की पहचान की योग्यता मनोविज्ञान के शिक्षकों में होती है. उन्होंने तीन बिंदुओं का उल्लेख करते हुए अपनी बात रखी जिसमें पहला यह कि मनोविज्ञान के शिक्षकों में व्यक्ति को विस्तार देना तथा संभावना तलाश करना, दूसरा समाज के साथ सरोकार स्थापित करना, तीसरा मानव सभ्यता के सृजन में योगदान करना. प्रो. आनंदप्रकाश का कहना था कि शिक्षा संभावनाओंं का विस्तार है. उन्होंने कहा कि हमारे यहां मनोविज्ञान के शिक्षित लोगों की जरूरत 10 हजार है जबकि हम केवल हजार से ज्यादा शिक्षित नहीं कर पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि ब्राउस इस दिशा में रोल मॉडल बन सकता है. बरकतउल्लाह विश्वविद्याल में मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर दिनेश नागर ने अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा कि दुनिया के अन्य देशों के विश्वविद्यालय में अन्य विषयों के विभागों में मनोवैज्ञानिकों को रखा जाता है. अब यह प्रक्रिया शिक्षानीति-2020 में भी हो पाएगी. उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए मनोविज्ञान के शिक्षकों की आवश्यकता होगी और इसके बिना हम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाएंगे.

कार्यक्रम की अध्यक्ष एवं कुलपति प्रोफेसर आशा शुक्ला ने मन को आंकलन करने का कार्य मनोविज्ञान विषय के शिक्षक ही कर सकते हैं. शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह शिक्षा बहुआयामी है. इसलिए अब मनोविज्ञान के शिक्षकों की भूमिका और बढ़ गई है. उन्होंने कोरोना काल में किए गए अध्ययन का हवाला भी दिया. शिक्षा अध्ययन शाला (ब्राउस) की अधिष्ठाता एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. मनीषा सक्सेना ने अतिथियों का स्वागत एवं आभार व्यक्त किया. कार्यक्रम की समन्वय डॉ. कृष्णा सिन्हा ने किया. कार्यक्रम का प्रशासनिक समन्वय रजिस्ट्रार अजय वर्मा का था. डॉ. भरत भाटी एवं डॉ. मनोज कुमार गुप्ता के साथ ही ब्राउस परिवार का सक्रिय सहयोग रहा.

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

डिजीटल अम्ब्रेला के नीचे शासन और सरकार

 मनोज कुमार

क्या आप इस बात पर यकीन कर सकते हैं कि पेपरलेस वर्क कर कोई विभाग कुछ महीनों में चार करोड़़ से अधिक की राशि बचा सकता है? सुनने में कुछ अतिशयोक्ति लग सकती है लेकिन यह सौफीसदी सच है कि ऐसा हुआ है. यह उपलब्धि जनसम्पर्क संचालनालय ने अपने हिस्से में ली है. हालांकि यहां स्मरण करना होगा कि खंडवा सहित कुछ जिला जनसम्पर्क कार्यालयों को पेपरलेस बना दिया गया था. तब इस पेपरलेस वर्क कल्चर से कितनी बचत हुई, इसका लेखाजोखा सामने नहीं आया था. कोरोना के कहर के बाद जनसम्पर्क संचालनालय ने सुध ली और पेपरलेस वर्क कल्चर को अमलीजामा पहनाकर खर्च में कटौती की तरफ अपना कदम बढ़ा दिया है. निश्चित रूप से इसे आप नवाचार कह सकते हैं. ऐसा भी नहीं है कि अन्य विभागों ने इस दिशा में कोई उपलब्धि हासिल नहीं की हो लेकिन उनकी ओर से ऐसे आंकड़े सार्वजनिक नहीं होने से आम आदमी को पता नहीं चल रहा है. 

मध्यप्रदेश अपने नवाचार के लिए हमेशा चर्चा में रहा है लेकिन इस वक्त हम जिस नवाचार की बात कर रहे हैं, वह सुनियोजित नहीं है लेकिन अब वह दिनचर्या में शामिल हो गया है. नवाचार की यह कहानी शुरू होती है करीब दो वर्ष पहले कोरोना के धमकने के साथ. आरंभिक दिनों में सबकुछ वैसा ही चलता रहा और लगा कि बस थोड़े दिन की बात है लेकिन ऐसा था नहीं. कोरोना की दूसरी लहर ने जो कोहराम मचाया तो सब तरफ हडक़म्प मच गया. कोरोना के शिकार लोगों को इलाज, उनकी देखरेख और व्यवस्था बनाये रखने के लिए मुस्तैद अधिकारियों और कर्मचारियों को मोर्चे पर डटना मजबूरी थी. जिंदगी उनकी भी थी, डर उनके पास था. और इस डर ने एक संभावना को जन्म दिया. टेक्रालॉजी का यह नया दौर है और इस महामारी के पहले हम इस कोशिश में लगे थे कि पूरा तंत्र डिजीटल हो जाए लेकिन सौफीसदी करने में तब वैसी रूचि लोगों की नहीं थी. आज भी सौफीसदी डिजीटलीकरण नहीं हो पाया है लेकिन डर से उपजी संभावना में जो जहां है, वहीं रूक गया और हाथों में कोई मोबाइल लिये तो कोई आइपैड तो कोई घर पर रहकर लेपटॉप से अपने दायित्व को पूरा कर रहा था. इस तरह से जो काम बीस वर्ष में नहीं हो पाया था, वह दो वर्ष में हो गया. इस डिजीटल अम्ब्रला के नीचे पूरा शासन और सरकार आ गई है. बदलते जमाने के साथ हम अब चलने के लिए अब पूरी तरह से तैयार हैं बल्कि चलने लगे हैं.

इस डिजीटल सिस्टम ने पूरे तंत्र का चेहरा बदल दिया है. पेपरलेस जिस प्रक्रिया की बात हम करीब एक दशक से कर रहे थे लेकिन व्यवहार में संभव नहीं हो पा रहा था, जो अब संभव है. डिजीटलकरण के पश्चात एक और बड़ी पहल यह हुई है कि हर माह अलग अलग विभागोंं की बैठक में झाबुआ से लेकर मंडला जिले के अधिकारी कभी राजधानी मुख्यालय भोपाल आते थे तो कभी संभागीय मुख्यालय में उन्हें शामिल होना पड़ता था. शासकीय दस्तूर के मुताबिक बैठक का परिणाम भले शून्य हो लेकिन भौतिक उपस्थिति लाजिमी थी. इस आवन-जावन में सब मिलाकर लाखों रुपये के डीजल-पेट्रोल, भत्ता और अन्य खर्चे होतेे थे. साथ में अधिकारी के जिला मुख्यालय में नहीं रहने से कई अनिवार्य कार्य रूक जाते थे, या टल जाते थे. यही प्रक्रिया जिला मुख्यालय में भी होती थी और जिले के भीतर आने वाले अधिकारी-कर्मचारी शामिल होते थे. लेकिन अब प्रशासन का चेहरा-मोहरा बदलने लगा है. कोई कहीं नहीं आ जा रहा है, सब अपने ठिकाने पर मुस्तैद हैं. ऑनलाईन मीटिंग हो रही है. चर्चा और फैसले हो रहे हैं. खर्चों पर जैसे कोई ब्रेकर लग गया है. एक किस्म से इसे आप अनुपात्दक व्यय भी कह सकते हैं, जो नियंत्रण में आ गया है. स्वागत-सत्कार में भी होने वाले खर्च लगभग समाप्त हो गए हैं. राजधानी के मंत्रालय से लेकर जिला और तहसील मुख्यालय में ही सब काम निपट जा रहा है. यह अपने आप में नवाचार है क्योंंकि इससे होने वाली बचत का समुचित उपयोग किया जा सकेगा. 

सरकार ने कोरोना महामारी के दरम्यान शासकीय कार्यालयों को पहले जुलाई तक पांच दिनी सप्ताह घोषित किया था, जिसे बढ़ाकर अब अक्टूबर 2021 तक कर दिया गया है. यह फैसला भी स्वागतयोग्य है. हालांकि कोरोना के पहले सरकार ने पांच दिवसीय कार्यालयीन सप्ताह के लिए सुझाव मांगे थे लेकिन अरूचि के चलते मामला ठंडे बस्ते में चला गया था लेकिन कोरोना ने एक पुरानी और सकरात्मक योजना को आरंभ कर दिया है. पहली नजर में यह पांच दिनी वर्किंग का कांसेप्ट थोड़ा ठीक नहीं लगता है लेकिन यह शासन और अधिकारी कर्मचारियों के लिए हितदायक है. तंत्र के स्तर पर देखें तो लगातार दो दिन कार्यालय बंद रहने से स्थापना व्यय में कमी आती है. संसाधनों की बचत होती है या कहें कि खर्च नियंत्रण में होता है. इन दो दिनों में अधिकारी-कर्मचारी अपने निजी कार्य पूर्ण कर सकते हैं और मानसिक रूप से रिलेक्स होते हैं. वैसे भी माह के दूसरे और तीसरे शनिवार को अवकाश होता ही है. तब केवल दो दिन की इसमें वृद्धि किया जाना अनुचित नहीं होता है. इन दो दिनों के कार्यदिवस में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए कार्यालय का समय सुबह जल्दी और देर शाम तक कर पूर्ण किया जा सकता है. कई राज्यों में पहले से पांच कार्य दिवस प्रचलन में है. 

इस तरह से हम मान सकते हैं कि कोरोना ने ना केवल आम आदमी की जिंदगी में परिवर्तन लाया बल्कि शासकीय तंत्र में भी बेहतर बदलाव की दिशा में प्रेरित किया है. यह तो निश्चित है कि आज नहीं तो कल, हमें डिजीटल दुनिया में सौफीसदी प्रवेश करना है तो आज से क्यों नहीं. कुछ लोगों का कहना है कि यह असुविधाजनक है. मान लिया तो जो खरीददारी आप इंटरनेट के माध्यम से करते हैं, रेल-बस का किराया अनेक तरह के एप के माध्यम से करते हैं, तब क्या आपके लिए यह असुविधाजनक नहीं है. एक बार कोशिश करके देख लीजिए राह आसान हो जाएगी. सबसे बड़ी बात यह है कि समूचे तंत्र में पारदर्शिता आ जाएगी क्योंकि वर्क रिर्पोट करने से लेकर बिल जमा करने और भुगतान पाने की  सारी व्यवस्था ऑनलाईन है तो रिश्वतखोरी का कॉलम भी हाशिये पर चला जाएगा. इसलिए मध्यप्रदेश जिस तरह से डिजीटल अम्ब्रेला के नीचे आ गया है, वह सराहनीय है. अब जरूरत है कि अम्ब्रेला को ओपन कर सभी से कहा जाए आओ, थोड़ा थोड़ा डिजीटल हो जाएं.

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