फिर से ऑनलाइन हो जाने का वक्त
बुधवार, 5 जनवरी 2022
फिर से ऑनलाइन हो जाने का वक्त
मंगलवार, 30 नवंबर 2021
कोरोना : डरने, डराने का नहीं, सम्हलने का वक्त है
मनोज कुमार
कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरोना की दूसरी लहर को याद करने के बाद रूह कांप जाती है और तीसरी लहर ने भी ऐसे ही कयामत ढाया तो जिंदगी कल्पना से बाहर होगी। पहली लहर को सभी वर्गों ने हल्के में लिया था और कोरोनो को लोग मजाक बता रहे थे। सामान्य खांसी-सर्दी की बीमारी बताकर उसे अनदेखा कर रहे थे लेकिन दूसरी लहर में जब जिंदगी के लाले पडऩे लगे तो समझ में आया कि सौ साल बाद महामारी किस कदर कहर ढाती है। हममें से अधिकांश को पता ही नहीं है कि सौ साल पहले आयी महामारी का प्रकोप कितना और कैसा था लेकिन जब हम खुद इस बार की महामारी का सामना कर रहे हैं तो समझ में आने लगा है कि महामारी होती क्या है? कोरोना की तीसरी लहर की अभी शुरूआत है और अपने आरंभिक लक्षणों में उसकी भयावहता का अंदाज होने लगा है। इस आहट को भांप कर हम सबको डरने की जरूरत नहीं है और ना ही डराने की जरूरत है बल्कि जरूरत है कि हम सब अपने अपने स्तर पर सावधानी बरतें क्योंकि सावधानी ही इस महामारी का इकलौता इलाज है। लापरवाही या अनदेखी के चलते पहले भी कितने घरों में तकलीफ आयी है और इसका दुहराव ना हो, इस बात की सावधानी हमें बरतनी होगी।
कोरोना की तीसरी लहर को लेकर सोशल मीडिया में जिस तरह की आधी-अधूरी बातें की जा रही है, वह किसी महामारी से कम नहीं है। संभव है कि कोरोना को लिखने वाले जानकार हों लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि आपके लिखे शब्दों से समाज में डर पैदा ना हो क्योंकि डर के कारण आपाधापी मचती है और बीमारी से ज्यादा डर बेकाबू हो जाता है। कोशिश होना चाहिए कि संतुलित भाषा में कोरोना से बचाव के लिए लोगों को जागरूक करें। कोरोना के दरम्यान बरतने वाली सावधानी से लोगों को अवगत कराया जाए ताकि स्थिति पहले पायदान पर ही नियंत्रण में हो सके। जो जिस क्षेत्र में है, उस क्षेत्र की मेडिकल सुविधाओं के बारे में बताया जाए ताकि जरूरत पडऩे पर लोगों को भटकना ना पड़े। देखने में यह भी आया है कि वैक्सीन को लेकर भी यह चर्चा की जा रही है कि यह कारगर नहीं है। इस सूचना का कोई तर्क नहीं है और एक कारण लोगों का वैक्सीन नहीं लगाने में यह भी है। कायदे से हम लोगों को प्रेरित करें कि अविलम्ब कोरोना प्रतिरोधक वैक्सीन लगा लें ताकि कोरोना के शिकार होने के बाद भी गंभीर स्थिति से बचा जा सके। अभी डराने या बिना तर्क की बात करने का नहीं है क्योंकि डर से व्यवस्था बाधित होती है और महामारी को फैलने के लिए स्थान मिल जाता है।
कोरोना के आरंभ के साथ मीडिया की भूमिका सकरात्मक रही है और यही कारण है कि बीते दो लहर से व्यवस्था के नियंत्रण में शासकीय तंत्र को सहायता मिली है। कमियों की आलोचना से शासकीय तंत्र सजग हुआ और व्यवस्था दुरूस्त की गई। जैसे निजी अस्पतालों द्वारा इलाज के नाम पर जो मनमानी की जा रही थी, उसे रोकने के लिए मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान स्वयं आगे आए। ऐसी आपदाओं में मीडिया की भूमिका बड़ी और गंभीर हो जाती है। समाज की अपेक्षा होती है कि मीडिया सारा सच बताये लेकिन सच तो यह है कि स्थिति को नियंत्रण में रखने, लोगों में डर ना फैले तथा वे व्यवस्था के प्रति सुनिश्चित रहें, इसकी जवाबदारी भी मीडिया की होती है। मीडिया रिपोट्र्स की भाषा और प्रस्तुति बेहद संयत और संवेदनशील होती है जिससे लोगों के भीतर उपजने वाला डर खत्म होता है। डरे हुए लोग भीड़ में तब्दील हो जाते हैं और भीड़ को नियंत्रण में रखना मुश्किल कार्य होता है। ऐसे में सामंजस्य बनाकर रखना ऐसी विकट स्थिति में मीडिया का कार्य होता है क्योंकि मीडिया समाज और सरकार के मध्य सेतु का कार्य करती है।
कोरोना प्रकोप को नियंत्रण में देखकर सरकार ने जीवन को सहज बनाने के लिए अनेक फैसले लिये हैं जिसमें शैक्षणिक संस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित किये जाने के आदेश हैं। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में ऑनलाइन शिक्षा की चर्चा की गई है। अभी समाज मुसीबत से दूर नहीं हुआ है और जरूरी है कि ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था को बनाये रखें ताकि शिक्षण संस्थाओं में एकत्र होने वाली भीड़ से कोरोना वायरस फैलने से रोका जा सके। यूं भी टेक्रालॉजी का जिस तरह से विस्तार हो रहा है और आने वाला भविष्य टेक्रालाजी फ्रेंडली होना है तब ऑनलाइन शिक्षा और वर्क फ्रॉम होम को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इन विकल्प से ना केवल हम कोरोना के हमले से बच सकते हैं बल्कि पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के साथ ही संस्थागत व्यय पर भी नियंत्रण हो जाता है। यह किया जाना आज के लिए ही नहीं, भविष्य के लिए भी जरूरी हो जाता है। शादी-ब्याहो, सभा-संगत और मॉल-टॉकीज शुरू करने की जो छूट दी गई है, उस पर पुर्नविचार किया जाना चाहिए। निश्चित रूप से भारतीय जीवनशैली का पाश्चात्य जीवनशैली से कोई मेल नहीं है लेकिन कोरोना के चलते एक बार विचार किया जाना जरूरी हो जाता है।
यह सूचना राहत देती है कि कोरोना की आहट के पहले ही चिकित्सा व्यवस्था चाक-चौबंद कर ली गई है लेकिन इसकी वास्तविकता को जांचना भी जरूरी है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इस मामले में गंभीर हैं और कलेक्टरों को आदेश देकर यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि अपने अपने जिलों में ऑक्सजीन प्लांट की स्थिति का निरीक्षण-परीक्षण करें और उसे चालू करें। आग लगने पर कुंआ खोदने से अच्छा है कि कुंआ पहले तैयार रखें ताकि वक्त-बे-वक्त काम आ सके। मेडिकल सहित संबद्ध सेवाओं को आपातकालीन घोषित करना भी समय की जरूरत है। ऐसा किये जाने से विपत्ति का समाधान मौजूद होगा। सरकार के इन प्रयासों को मूर्त रूप देने के लिए समाज को भी आगे आना होगा। अफवाहों से दूर रहकर वेक्सीन लगवा लें। अनावश्यक यात्रा या बाजार जाने से बचें। मॉस्क और सेनिटाइजर का उपयोग जीवनशैली में शामिल कर लें। मॉस्क ना केवल कोरोना से बचाती है बल्कि प्रदूषण से भी आपके शरीर को बचाती है। दिल्ली का हाल किसी से छिपा नहीं है। झीलों की नगरी भोपाल अपनी ताजगी के साथ अपनी पहचान कायम रखे, इसके लिए जरूरी है कि हम सब मिलकर कोरोना का मुकाबला करें। सजग रहें, स्वस्थ्य रहें क्योंकि जीवन हमारा अपना है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक हैं)
रविवार, 28 नवंबर 2021
टंट्या मामा को सलामी देने आज भी ट्रेन के पहिये थम जाते हैं
गुरुवार, 4 नवंबर 2021
सहारा देकर जिम्मेदारी का बीज बोती सरकार
मनोज कुमार
शनिवार, 30 अक्टूबर 2021
मैं और मेरे से मुक्त, हमारा मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश स्थापना दिवस पर विशेष
मंगलवार, 5 अक्टूबर 2021
शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक
शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक स्वाधीनता संग्राम और महात्मा गांधी पर केन्द्रीत है. गांधी की बड़ी यात्रा, आंदोलन एवं मध्यप्रदेश में उनका हस्तक्षेप केन्दि्रय विषय है.
रविवार, 3 अक्टूबर 2021
महेन्द्र का 'गगन' से बुलावा
मनोज कुमार
सुबह सुबह फोन की घंटी घनघना उठी... मन में कुछ खयाल आया... स्वाभाविक था कि यह खयाल अच्छा तो होगा नहीं... कुछ अनमने मन से फोन उठाया तो उधर से संजय द्विवेदी की आवाज आयी... लगा कि रोज राम-राम करने फोन करते हैं, सो किया होगा लेकिन यह क्या.. अगले पल उसने पूछा कि क्या आपको पता है.. महेन्द्र गगन नहीं रहे... एकाएक मुंह से निकल गया क्या बकवास कर रहे हो... दरअसल, मन ऐसी किसी खबर के लिए तैयार ही नहीं था.. फिर खुद को सम्हालते हुए कहा कि पता करता हूं, ऐसा होना तो नहीं चाहिए.. एक-दो दिन पहले ही मित्र शिवअनुराग पटेरिया के जाने की खबर से मन उबरा ही नहीं था कि यह दूसरा दुख.. भरे मन से अग्रज अरूण पटेल जी को फोन किया.. महेन्द्र भाई रिश्ते में उनके समधि थे.. उन्हें भी इस बात की कोई खबर नहीं थी.. वे चौंके और थोड़ी देर बाद उनका जवाब आया.. हां, मनोज जी, खबर सही है.. मुझे तकलीफ ना हो.. इसलिये मुझे नहीं बताया गया था...
महेन्द्र गगन के जाने का अर्थ था समाज के एक ऐसे गगन का रिक्तता से भर जाना जो पत्रकारिता, साहित्य और सेवा से परिपूर्ण हो.. महेन्द्र भाई मुझसे उम्र में कुछेक साल बड़े थे.. लेकिन वर्षों की मुलाकात में उम्र कभी बाधा नहीं बनी.. जब भी मिले, मोहब्बत से मिले. दरअसल, उनके और मेरे बीच का रिश्ता मेरी पत्रिका ‘समागम’ बनी रही. इस दुखद हादसे के शायद एकाध पखवाड़े पहले मैं, महेन्द्र भाई और पटेल साहब कुछ घंटे साथ रहे. तय भी हुआ था कि इसी दिन दोपहर को फिर मुलाकात होगी.. मेरी व्यवस्ता और थोड़ी अलाली के चलते कल मिल लेंगे के साथ मिलने की आस अधूरी रह गयी. खैर, जो लोग महेन्द्र भाई को जानते हैं, वे लोग यह भी जानते हैं कि एक संवेदनशील आदमी का जाना क्या होता है.. उनकी पहचान पहले पहल प्रिंटरी से थी तो उनके पाक्षिक अखबार पहले पहले से भी थी. वे एक अच्छे लेखक और कवि थे... जिस कोरोना के कू्रर हाथों से महेन्द्र भाई को हमसे अलग कर दिया, उसी कोरोना से उपजी स्थितियों पर उन्होंने कविता लिखी थी...
रायपुर से भोपाल आने के बाद जिनकी सोहबत मुझे मिली, उनमें महेन्द्र भाई एक थे. वे ऐसे व्यक्ति थे जो सामने वाले का पूरा सम्मान करते थे. वे राग-द्वेष से विलग थे. हमेशा संजीदा रहने वाले महेन्द्र भाई हमेशा हल्के से मुस्करा देते थे. कभी चिंता में डूबे उनको देखा नहीं. हमेशा अपने काम में लगे रहते थे. आखिरी दफा जब हम मिले तो कोरोना से साथियों के देहांत से दुखी थे. मुझे क्या पता था कि महेन्द्र भाई भी इसी बीमारी के शिकार हो जाएंगे. उनके देहांत के पहले पटेल साहब से बात हुई थी. उन दिनों बिस्तर और ऑक्सीजन को लेकर मारामारी चल रही थी. अचानक तबियत बिगडऩे के कारण उन्हें एडमिट करना जरूरी हो गया था. आनन-फानन में पटेल साहब अपने संबंधों और संपर्कों से उन्हें एडमिट करा सके थे. दो-एक दिन बाद जब मैंने महेन्द्र भाई की तबियत का हाल पूछा तो पटेल साहब ने कहा कि अब ठीक हैं. जल्द ही घर वापस आ जाएंगे. यह वह दौर था जब हस्पताल से किसी के घर आने की खबर बहुत बड़ी बन चली थी. पटेल साहब से यह सुनकर मन को दिलासा दिलाया कि ईश्वर का शुक्र है. ईश्वर निर्मम हो चला था. शायद उसके पास भी अच्छे कवि और लेखक की कमी हो गई होगी. सो महेन्द्र भाई को वहां रचने-गढऩे के लिए बुला लिया..
महेन्द्र भाई के लिए जब यह लिख रहा हंू तो सहज ही स्मरण हो आता है कि आज वे होते तो वे अपना 68वां जन्मदिन आने वाले माह अक्टूबर की 4 तारीख को मना रहे होते. लेकिन नियति को यह कहां मंजूर था. 4 अक्टूबर, 1953 को उज्जैन की भाटी दम्पत्ति के घर रौशन हुए महेन्द्र ने अपने कुल का नाम इतना ऊंचा किया कि आज उनके नहीं रहने पर आंखें नम हैं. एक खालीपन सा महसूस हो रहा है और हम चाहने वालों की चलती तो कैलेंडर के पन्ने से 21 अप्रेल की उस मनहूस तारीख को हमेशा हमेशा के लिए दफा कर देते. साल तो अपनी रफ्तार से गुजर जाएगा लेकिन कैलेंडर के पन्ने पर अप्रेल माह की 21 तारीख टीस देने के लिए हर साल हमारी आंखों के सामने होगी. परिवार में उनकी जीवनसंगिनी मीना भाभी किसको अपना दर्द बताये? बिसूरती मां को ढाढस देने के लिए बेटों की भूमिका में दामाद आनंद और पलाश साये की तरह उनके साथ हैं. बेटियां यामिनी और पूर्वा हकीकत से वाकिफ हैं. खुद के साथ मां को सम्हाल कर पिता की लाडली बेटियां अचानक सयानी हो गई हैं. महेन्द्र भाई के पीछे उनके दो छोटे भाई मोहन और पुष्कर उनकी छोड़ी विरासत साहित्य, संस्कृति और प्रेम को सम्हालेंगे.
रघु ठाकुर उन्हें याद करते हुए अपनी आंखें भीगो लेते हैं तो लाजपत आहूजा उनके साथ बिताये पलों को याद करते हैं. हर गतिविधियों में साथ रहने वाले संतोष चौबे के लिए तो यह कभी ना भर पाने वाला नुकसान है तो साहित्य के साथी मुकेश वर्मा की आंखें भी सजल है. पटेल साहब के लिए यह दुख तो ऐसा है जैसे किसी ने अचानक उनकी आंखों के सामने अंधेरा कर दिया हो. यारों के यार भाई महेन्द्र की यादें ‘मिट्टी जो कम पड़ गई’ और ‘तुमने छुआ’ के पन्नों पर हमेशा हमेशा के लिए दर्ज है. यादें तो उन सम्मान पत्र पर भी हैं जो कभी उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक अववदान के लिए वागीश्वरी सम्मान, राजबहादुर पाठक स्मृति सम्मान, शब्दशिल्पी सम्मान, विनय दुबे स्मृति सम्मान के साथ रामेश्वर गुरु पुरस्कार हैं. महेन्द्र भाई जैसे कोई जाता है क्या? लेकिन क्या करें. सबकुछ हमारे हिसाब से तय नहीं होता है. शायद इसी को जीवन कहते हैं.
गिरमिटया महात्मा गांधी
आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...
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-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
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समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीड...
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मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...
