गुरुवार, 25 सितंबर 2025

कैंपस कॉरिडोर

21 लाख का साहित्यिक पुरस्कार

प्रख्यात कवि श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट ने हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और कला के लिए अगले वर्ष से अभी तक के सबसे बड़े पुरस्कारों की घोषणा की है. साहित्य की पुरस्कार राशि 21 लाख, पत्रकारिता के लिए 5 लाख और कला क्षेत्र में परफार्मिंग और विज़ुअल आर्ट के क्षेत्र में 2-2 लाख रुपए की सम्मान राशि के साथ पुरस्कार दिए जाएँगे. यह सूचना श्रीकांत वर्मा के पुत्र अभिषेक वर्मा के माध्यम से प्राप्त हुई है. कब और कैसे इसके लिए आवेदन करना है, क्राइटेरिया क्या होगा, प्रत्येक वर्ष 18 सितम्बर को अवार्ड दिए जाने की सूचना जरूर है.

पीएम इंटर्नशिप बढऩे की संभावना

कार्पोरेट मामलों का मंत्रालय पीएम इंटर्नशिप प्रोजेक्ट को आगे दो महीने बढ़ाने पर विचार कर रहा है. हालांकि मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक 30 अगस्त को इसकी अवधि खत्म हो चुकी है. अक्टूबर 2024 से आरंभ हुए इस उद्देश्य टॉप पांच सौ कम्पनियों को एक करोड़  युवाओं को इंटर्नशिप प्रदान करना है. इस इंटर्नशिप का उद्देश्य भारत के युवाओं को उद्योग जगत की आवश्यकता के अनुरूप कौशल विकास करना है.

आकाशवाणी भोपाल में करे अप्लाई

आकाशवाणी भोपाल को मध्यप्रदेश के 7 जिलों के लिए अंशकालिक करसपांडेंट की जरूरत है. 17 अक्टूबर तक आवेदन करने के लिए जिन जिलों में जरूरत बतायी गई है उसके अनुसार अलीराजपुर, मुरैना, मऊगंज, मैहर, पांर्ढुना, टीकमगढ़ एवं उज्जैन हंै. आवेदन के लिए समाचार सेवा प्रभाग की वेबसाईट देखा जा सकता है.  

एनसीईआरटी को चाहिए सेके्रटरी

एनसीईआरटी ने सेक्रेटरी पद के लिए योग्य उम्मीदवारों से आवेदन बुलाये हैं. यह नियुक्ति प्रतिनियुक्ति, स्थानांतरण या अल्पकालिक संविदा के लिए पाँच साल के लिए अथवा निर्धारित 60 वर्ष तक की आयु के लिए जो पहले होगी. यह पद वेतन मैट्रिक्स के लेवल-13 के लिए है. अधिक जानकारी के लिए एनसीईआरटी के ऑफिशियल वेबसाइट सर्च की जा सकती है. 

कर्दम के कदम प्रेस क्लब में

इंदौर प्रेस क्लब का चर्चित इलेक्शन हो गया और निवृत्तमान चेयर पर्सन अरविंद तिवारी की टीम का दबदबा बना रहा. दीपक कर्दम ने अध्यक्ष की कुर्सी सम्हाल लिया तो अरविंद जोशी महासचिव बन गए. उपाध्यक्षद्वय का चेयर संजय त्रिपाठी एवं प्रियंका पांडे के पास तो कोष सम्हालेंगे मुकेश तिवारी. कार्यकारिणी सदस्यों में पूनम वर्मा, प्रमोद दीक्षित, अभय तिवारी, मनीष मक्खर, अंशुल मुकाती, श्याम कामले व विजय भट्ट शामिल हैं.

आवन-जावन का सेलिब्रेशन

सेंट्रल प्रेस क्लब, भोपाल पहली बार शायद जाने वाले आयुक्त जनसम्पर्क और नवागत आयुक्त जनसम्पर्क के लिए वेलकम पार्टी का आयोजन किया. आयुक्त जनसम्पर्क से कमिश्रर इंदौर बने डॉ. सुदाम खाड़े पहले और दूसरे कार्यकाल में पत्रकारों में लोकप्रिय रहे. नवागत आयुक्त जनसम्पर्क श्री दीपक सक्सेना का कलेक्टर जबलपुर रहते हुए प्रायवेट स्कूलों पर जो नकेल डाली थी, उससे अपने सख्त प्रशासन के लिए चर्चित रहे. विदाई वेलकम पार्टी सेंट्रल प्रेस क्लब, भोपाल के भवन में ना होकर अरेरा क्लब में किया गया.

ग्रामीण पत्रकारिता का बड़ा अवार्ड भास्कर को

ग्रामीण पत्रकारिता के लिए द स्टेट्समेन अवार्ड इस बार भास्कर के विशेष संवाददाता को मिला है. विजयपाल डूडी उदयपुर संस्करण में कार्यरत हैं. उन्हें बहुराज्यीय बाल तस्करी के मामले को उजागर करने के लिए यह सम्मान दिया गया है. ग्रामीण पत्रकारिता के लिए द स्टेट्समेन अवार्ड किसी भी रिपोर्टर के लिए सपना हो सकता है. खासतौर पर जब समूची पत्रकारिता महानगरीय केन्द्रित हो चला है. यहां बता देना उचित होगा कि ग्रामीण पत्रकारिता के लिए द स्टेट्समेन अवार्ड सबसे ज्यादा हासिल करने वाला देशबन्धु समाचार पत्र समूह है. ग्रामीण पत्रकारिता के लिए द स्टेट्समेन अवार्ड ग्रामीण पत्रकारिता करने वालों के लिए एक बड़ी उम्मीद है.

कौन होगा चेयरमैन 

निजी विश्वविद्यालय आयोग अध्यक्ष के लिए रिटायड आईएएस और पूर्व कुलपतियों ने दावेदारी पेश किया है। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो डॉ. नीलिमा गुप्ता का दावा मजबूत माना जा रहा है। उनका विकल्प चुना गया तो पूर्व आईएएस एपी सिंह हो सकते हैं। डॉ. नीलिमा गुप्ता  डॉकटर हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति रह चुकीं हैं। आयोग के पांच पदों के लिए 250 आवेदन करने की जानकारी मिली है। अकेले आयोग के अध्यक्ष पद के लिए 75 आवेदन उच्च शिक्षा विभाग को मिला है।ं वर्तमान सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है लेकिन नए पदाधिकारियों के आने तक यही लोग कार्य करते रहेंगे.

बातों ही बातों में

जैसा कि परम्परा रही है कि बड़ी कुर्सी के निकट कौन? दौड़ लगी रहती है नंबर बढ़ाने की तो इन दिनों एमसीयू के एक अध्यापक सबको पीछे छोडक़र आगे निकलते दिख रहे हैं. लगातार सोशल मीडिया में गुरु का आभार जताकर जो जता रहे हैं, वह सबको खबर है. बातें तो यह भी है कि बदलाव की भूमिका बन चुकी है और आने वाले समय में पत्थर से किस अहिल्या के भाग जागते हैं. अब बातें हैं बातों का क्या?

सोमवार, 15 सितंबर 2025

सीधी बात, नो बकवास




प्रो. मनोज कुमार

भीड़ को चीरते हुए एक परेशान नौजवान सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास जा पहुँचता है. अपनी तकलीफ बताता है और प्रमाण के तौर पर उनके सामने कागज धर देता है. बमुश्किल 20 सेकंड सुनने के बाद डॉ. यादव पास खड़े एसपी को आदेश देते हैं कि युवक के साथ धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ 420 का मामला दर्ज करें. एसपी के पास यश सर के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है. यह है ‘सीधी बात, नो बकवास’. बहुत कुछ सुनना और समझना है नहीं, तब जब मामला क्रिस्टल क्लियर हो. पहले मामला दर्ज होगा और फिर होगी विधानसम्मत कार्यवाही. अमन और दहशत का माहौल बन चला है. डॉ. यादव पीठ पर दिलासा देते और कार्यवाही होगी का आश्वासन देने से आगे निकल गए हैं. इन दिनों मछली जाल में फंसी हुई है. कानून अदालत अपना काम कर रही और जनसेवक के रूप में मोहन सरकार का अपना तेवर. कौन उनके साथ है और किसका भविष्य बिगड़ेगा या बनेगा, यह तो आने वाला समय तय करेगा लेकिन अपराधी और अपराधी से गठजोड़ करने वाले दहशत में हैं. आम नागरिक सुकून में है. ऐसे सीधे एक्शन की उम्मीद केवल उसने सिनेमा के पर्दे पर देखा था लेकिन आज वह खुद महसूस कर रहा है.  ‘365 नाटआउट’ से आगे चलते डॉ. मोहन यादव की सरकार का हिसाब-किताब देखें तो मध्यप्रदेश में सरकार के तेवर का पता चल जाएगा. कभी सख्त-सख्त तो कभी नर्म-नर्म सा तेवर लिए डॉ. मोहन यादव को समझना थोड़ा मुश्किल सा है. बचपन से अखाड़े के शौकीन डॉ. मोहन यादव डिग्री के लिहाज से पी.एचडी वाले डॉक्टर हैं लेकिन इलाज करने के मामले में सौफीसद असली डॉक्टर.

अपनी दुनिया में मस्त रहने वाले डॉक्टर मोहन यादव ने सोचा भी नहीं था कि कभी वे प्रदेश के सिरमौर होंगे लेकिन यह भी तय है कि उन्हें इसके पहले जो भी दायित्व मिला, उसकी सीरत और सूरत बदलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. मध्यप्रदेश में भाजपा दो दशक से सत्ता सम्हाल रही है तो वाजिब बात है कि लोगों की उम्मीद पर खरा भी उतरना था. यह डॉ. मोहन यादव के लिए चुनौती भरा था किन्तु अपने सांगठनिक क्षमता पर यकिन था. महाकाल के भक्त और सम्राट विक्रमादित्य के रास्ते पर चलकर सबका साथ, सबका विकास को अंजाम देने में जुट गए. चौतरफा योजनाओं और कार्यक्रमों को जनता के हक में फलीभूत करते रहे. उनकी प्राथमिकता थी कि केन्द्र सरकार की हरेक जनकल्याणकारी योजनाओं को जमीन पर उतारना. लोगोंं के जीवन को सुगम बनाना और वे अपने ‘365 नाटआउट’ से आगे सक्सेस भी होते दिख रहे हैं. यह बात कम लोगों को पता होगी और जिन्हें पता होगी, वे भूल गए होंगे कि शायद मध्यप्रदेश की स्थापना के बाद पहली बार अविस्मरणीय साम्प्रदायिक सद्भाव का चेहरा देखने को मिला वह भी उज्जैन जैसे संवेदनशील नगर में. इस महीने उज्जैनवासियों के लिए इम्तहान का समय आ गया था जब शहर के केडी मार्ग चौड़ीकरण के लिए धार्मिक स्थलों को हटाया जाना जरूरी हो गया था। उज्जैन ही नहीं, पूरा प्रदेश हैरान था कि शहर के विकास के लिए सभी धर्मों के लोग एकत्रित होकर स्वेच्छा से हटाना मंजूर कर लिया. रत्तीभर कोई आवाज विरोध में नहीं उठा बल्कि उठे तो हजारों हाथ उज्जैन के विकास के लिए.  केडी मार्ग चौड़ीकरण के लिए आपसी सामंजस्य एवं समन्वय से शांतिपूर्वक धार्मिक स्थलों को लोगों द्वारा स्वेच्छा से हटाना विकास की दिशा में सांप्रदायिक सौहार्द का उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करता हैं।.सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह रहा कि एकाध धार्मिक स्थल को हटाने का मसला होता तो बात कुछ और होती, यहां तो 18 धार्मिक स्थलों को हटाया जाना था. मोहन भिया का गुरुमंत्र काम आ गया और लोगों ने शांति और सामंजस्य से एक अनुकरणीय पहल की. यह पहल उज्जैन ही नहीं, पूरे देश के लिए नज़ीर बन गया. 

        ऐसा नहीं है कि धार्मिक स्थलों को हटाने के लिए पहुँचे जिला प्रशासन, पुलिस एवं नगर निगम की संयुक्त टीम की पेशानी पर शिकन ना हो लेकिन उन्हें भी उज्जैनवासियों पर पूरा भरोसा था। प्रशासन की इस कार्यवाही में केडी गेट तिराहे से तीन इमली चौराहे के जद में आने वाले 18 धार्मिक स्थलों को जनसहयोग से शांतिपूर्वक ढंग से हटाने की कार्रवाई की गई है. इस कार्य में धार्मिक स्थलों के व्यवस्थापकों, पुजारियों और लोगों द्वारा दिल से सहयोग किया गया. जिन 18 धार्मिक स्थलों को हटाया गया था, उनमें 15 मंदिर, 2 मस्जिद, एक मजार थे. केडी चौराहे से  पीछे करने और अन्यत्र स्थापित करने की कार्यवाही की गई हैं। हटाई गई प्रतिमाओं को प्रशासन द्वारा धार्मिक स्थलों के व्यवस्थापकों द्वारा बताए गए निर्धारित स्थान पर विधि विधान से स्थापित किया गया. साथ ही 20 से अधिक भवन जिनका गलियारा आगे बढ़ा लिया गया था. ऐसे भवनों के उस हिस्से को भी भवन स्वामियों द्वारा स्वेच्छा से हटाने की कार्यवाही की गई.

यह कामयाबी डॉ. मोहन यादव के लीडरशिप पर था तो यह भी जानते हैं कि मोहन भिया याने ‘सीधी बात, नो बकवास’. वे संवेदनशील भी हैं. हर साल पत्रकारों की बीमा की राशि बढ़ जाती है और फिर सरकार से गुहार लगाना पड़ता है लेकिन इस बार खुद आगे आकर पत्रकारों को राहत देने का ऐलान किया. इस मामले में नवनियुक्त आयुक्त दीपक सक्सेना का भी अहम भूमिका है. हालांकि राहत मिल जाने के बाद कुछ लोगों को पच नहीं रहा है. खैर, यह उनकी समस्या है. जिस पर विपदा टूटती है और इस बीमा से राहत के चार छींटें ही सही, वह इसकी कीमत जानता है. ‘सीधी बात, नो बकवास’ का यह नमूना भी जान लें कि आरोपियों को पुलिस और कानून से तो सजा मिल रही है, मिलेगी भी, उनका साम्राज्य नेस्तनाबूद कर दिया. मछली तो पहले ही जाल में फंसकर अपना सबकुुछ गंवा चुकी है. तभी तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कहते हैं- कोई मछली मरगमच्छ नहीं बचेगा. सब कुछ ठीक है, कहना ठीक नहीं होगा लेकिन सब कुछ ठीक हो रहा है, इससे कौन इंकार कर सकता है. मध्यप्रदेश में सम्राट विक्रमादित्य की न्याय व्यवस्था के वे पक्षधर हैं. और वे इस दिशा में आगे भी बढ़ रहे हैं. मध्यप्रदेश विशाल है और चुनौतियां भी विशाल तो इसे सुलझाने में वक्त तो लगेगा लेकिन दहशतगर्द जान गए हैं कि मध्यप्रदेश का नया डॉयलाग है-‘सीधी बात, नो बकवास’ (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

कैंपस कॉरिडोर


 एमसीयू को मिले कुलाध्यक्ष

सी.पी. राधाकृष्णन देश के 15वें  उपराष्ट्रपति होंगे और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के नए कुलाध्यक्ष होंगे. उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ के इस्तीफे बाद से विश्वविद्यालय का कुलाध्यक्ष पद रिक्त था. 12 सितंबर को पदभार ग्रहण करने के बाद श्री राधाकृष्णन कुलाध्यक्ष होंगे. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के विधान के अनुरूप देश के उपराष्ट्रपति कुलाध्यक्ष होते हैं. विश्वविद्यालय के पहले कुलाध्यक्ष श्री भैरोसिंह शेखावत रहे. मो. हामिद अंसारी, श्री एम. वेंकैया नायडु एवं श्री जगदीप धनखड़ के पश्चचात श्री राधाकृष्णन पाँचवें कुलाध्यक्ष होंगे.

अज़ीमजी प्रेमजी स्कॉलरशिप

अज़ीम प्रेमजी स्कॉलरशिप पहल के तहत ज़रूरतमंद छात्राओं को कॉलेज शिक्षा हासिल करने के लिए मदद की जाती है। इस स्कॉलरशिप के तहत कॉलेज की शिक्षा हासिल करने के लिए मदद के तौर पर वार्षिक 30,000 रुपयों की सहायता की जाती है.  यह स्कॉलरशिप छात्राओं के पहले ग्रैजुएशन के लिए डिग्री या डिप्लोमा पूरा होने तक उपलब्ध कराई जाएगी.स्थानीय सरकारी स्कूलों या कॉलेज से 10वीं और 12वीं कक्षा नियमित विद्यार्थी के रूप में पास होना अनिवार्य है. यह स्कूल नीचे बताए गए राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में होना चाहिए।आवेदन के समय भारत में कहीं भी सरकारी संस्थान या विश्वसनीय प्रामाणिक निजी कॉलेज या विश्वविद्यालय के मान्यता प्राप्त स्नातकउपाधिया डिप्लोमा (2 से 5 वर्षों की समयावधि वाले) के प्रथम वर्ष (2025-26 के अकादमिक सत्र) में नियमित छात्रा के रूप में प्रवेश प्राप्त किया होना चाहिए. पहले चरण के आवेदन की प्रक्रिया आरंभ हो चुका है. अधिक जानकारी या सवाल के लिए अज़ीमजी प्रेमजी स्कॉलरशिप के वेबसाइट को देखें 

पीएचडी करें यहां से

सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी में पीएचडी के लिए आवेदन की आखिरी तारीख 15 सितंबर है। दिसंबर 2024 और 25 नेट, जेआरएफ स्टूडेंट्स ही पात्र होंगे। अधिक जानकारी के लिए विवि की वेबसाइट देखें। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में पीएचडी के लिए ऑनलाइन आवेदन करने की तारीख 17 सितंबर है।

इग्नू में बचा है मौका

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में अब एडमिशन 15 सितंबर तक होंगे। साथ में 200 रुपया अदा कर इसी तारीख तक री रजिस्ट्रेशन कराया जा सकता है। जिन्हें एडमिशन लेना है, वह इग्नू की वेबसाइट देखें। 

कुलपति बनें इलाहाबाद में

भारत सरकार शिक्षा मंत्रालय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए आवेदन बुलाए हैं। जारी विज्ञापन के मुताबिक 2 अक्टूबर तक ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। आवेदक से अपेक्षा की गई है कि सत्यनिष्ठा, नैतिकता और संस्था के प्रति प्रतिबद्ध हो। अकादमिक योग्यता के साथ प्रशासनिक दक्षता अनिवार्य है। 

गोविंद का अनुष्ठान 

ब्यावरा में एक हैं गोविंद बडोने जो अपने आप में मिसाल हैं। वे देश के संभवतः एकमात्र पत्रकार हैं जो अपने संस्थान नवभारत के संस्थापक रामगोपाल माहेश्वरी जी के स्मरण में 26 वर्षों से निरंतर संवाद का आयोजन करते चले आ रहे हैं। आयोजन भी भव्य होता है। इस वर्ष भी नीयत तारीख 13 को यह अनुष्ठान होने जा रहा है। वे देश भर से विषय विशेषज्ञ एवं पत्रकारों को बुलाते हैं। गोविंद के इस समर्पण के लिए सेल्यूट करना तो बनता है। 

आइआइएमसी में बनें प्रोफेसर

आइएमएमसी ने देश भर में स्थापित अपने सेंटर्स के लिए प्रोफेसर और असिसटेंट प्रोफेसर के लिए वेंकेसी एडवाटाइज की है. आइजोल, मिजोरम, अमरावती, महाराष्ट्र, ढेकनाल, उड़ीसा, जम्मू जम्मू एंड कश्मीर एवं कोट्टायम, केरला में मॉस कम्युनिकेशन एवं जर्नलिजम के लिए विभिन्न भाषाओं में पढ़ाने वाले चाहिए. प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार एक पद प्रोफेसर एवं 20 पोस्ट असिसटेंट प्रोफेसर के लिए आवेदन मांगे गए हैं. 6 अक्टूबर के पहले ऑनलाइन आवेदन करना होगा. अधिक जानकारी के लिए आइएमएमसी की ऑफिशियल वेबसाइट देखा जा सकता है.  

बातों ही बातों में

इन दिनों अखबारों ने अपनी अपनी पसंद के लोग चुन लिए हैं. एक अखबार एक व्यक्ति की तर्ज पर उसी अखबार में खबर छपेगी, जिसकी पसंद का हो. और तो और पसंद का व्यक्ति फेसबुक में लिख रहा है तो वह भी खबर की सूरत में पढ़ सकते हैं. वैसे कभी मीडिया से दूर रहने वाले एक बुजुर्ग इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर अखबार और पत्रकारों से रूबरू हो रहे हैं. सुनते हैं कि किसी ने सलाह दी है कि ये आखिरी पारी है. अब ये बातें हैं बातों का क्या

सोमवार, 8 सितंबर 2025

रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का नया अंक 2025

 


रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का नया अंक 

हिन्दी हैं हम, हिन्दोस्तां हमारा... 

उतंड मार्तंड से लेकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा के लिए पैरवी करते महात्मा गाँधी का प्रथम उद्घोष इंदौर से...

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

मास्साब से शिक्षा कर्मी : कहाँ तलाशें राधाकृष्णन



प्रो. मनोज कुमार

आज एक महान दिन है. आज हम सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म को शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं. किसी महान व्यक्ति के जन्मदिन का उत्सव इसलिए नहीं मनाते हैं कि उन्होंने अपने जीवनकाल में उपलब्धियाँ अर्जित की बल्कि इसलिए मनाते हैं कि समाज उनके नक्शेकदम पर चल कर उनकी दृष्टि के साथ नए समाज का निर्माण करे. लेकिन दुर्भाग्य से आज हम जिस समय में जी रहे हैं, उस समय में शिक्षक दिवस महज औपचारिक बन कर रह गया है. शिक्षक मास्साब से शिक्षाकर्मी हो गए हैं और विद्यार्थी तो विद्यार्थी रहे ही नहीं. शिक्षा और विद्यालय दोनों ही बाजार बन गए हैं. सरकारी स्कूलों पर बदहाली का ठप्पा है तो प्रायवेट स्कूल मनमानी फीस लेकर स्टेट्स सिंबल बन गए हैं. दुर्भाग्य इस बात का है कि लगभग सभी प्रायवेट स्कूलों  स्वयं को इंटरनेशनल का तमगा दे रखा है. होगा भी, अच्छी बात है लेकिन पहली बात यह है कि क्या कोई प्रायवेट स्कूल स्थानीय या राज्य का नहीं हो सकता है. प्रायवेट स्कूल कभी अपने को जनता विद्यालय संबोधित नहीं करते हैं, उन्हें गर्व होता है पब्लिक स्कूल संबोधित करते हुए. हम आजादी के साथ ही इस बात का शोर मचा रहे हैं कि मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति का नाश कर दिया. बात सही है लेकिन क्या मैकाले इस करतूत का जवाब हम अच्छा करके नहीं दे सकते हैं. स्वाधीनता के बाद हम अनेक सेक्टर में बेहतर प्रदर्शन किया, स्वयं को खड़ा किया और विश्व गुरु बनने की ओर एक बार तैयार हैं तो ऐसा क्या हुआ कि हम शिक्षा को नहीं सुधार पाए? ऐसा क्या हुआ कि शिक्षा को जागरूक समाज का हिस्सा बनाने के बजाय डिग्री से जोड़ दिया और नौकरी के लिए मोहताज कर दिया. सच तो यह है कि मैकाले ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर मठा डाल गया था और हम उसकी गलती को आगे बढ़ाते रहे. 
जो लोग इस बात को लेकर माथा पीट रहे हैं कि सरकारी स्कूल बदहाल हैं लेकिन पन्ने पलटिए  और देखिए कि देश और दुनिया में जो महान लोग हैं, वे इन्हीं सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं. और आज भी कामयाब लोगों की सूची बनाएंगे तो उनमें ज्यादतर सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले मिलेंगे. हर साल परीक्षा परिणाम जाँचेंगे तो पता चलेगा कि प्रायवेट स्कूल से ज्यादा बेहतर परिणाम सरकारी स्कूलों की है. थोड़ी के लिए मान लेते हैं कि सरकारी स्कूल बदहाल हैंं तो हमने उसमें सुधार के लिए क्या किया? हम आगे नहीं आए और अपने नौनिहालों को अंग्रेजी मीडियम के पब्लिक स्कूलों के हवाले कर दिया. हमें अंग्रेजी नहीं आती है लेकिन बच्चों को अंग्रेजी बोलते देख हम खुश हो जाते हैं. हमारे अवचेतन में जो हमारी नाकामयाबी है, कुंठा है, उसका शमन हम इस तरह करते दिखते हैं. इसी समाज में जब मास्साब को शिक्षा कर्मी बनाया जा रहा था तो किसने आवाज उठायी?  जब ऐसा हो रहा था तो हम चुप थे. अब शिकायत किस बात की. यहाँ भी बदले रूप में आपको मैकाले दिख जाएगा. पचास वर्ष की उम्र और उससे अधिक वाले हम लोग जो अपने अपने विषय के जानकार हैं, विशेषज्ञ हैं, उन्होंने कभी आगे आकर कहा कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं तो हम पढ़ाऐंगे. जिस समाज ने आपको मान और जीवन जीने लायक बनाया, क्या वहाँ आपका दायित्व नहीं है कि उस समाज को कुछ लौटाएं? नहीं, हमारा सुर तो शिकायत का है. कवि कुमार विश्वास कहते हैं कि जब राज्य फेल होता है तो निजी संस्थाएं पनपती हैं लेकिन मेरा कहना है कि जब समाज फेल होता है तब निजी संस्थाएं पनपती हैं. हर बात पर सरकार पर निर्भरता समाज को कमजोर बनाती है। 
एक वीडियो इन दिनों चर्चा में है जिसका लब्बोलुआब यह है कि बच्चा फेल हो रहा है तो यह स्कूल की और शिक्षक की जवाबदारी है ना कि पालकों की. यह सच है कि जब स्कूल  मोटी फीस वसूल रहे हैं तो उन्हें इस बात की जिम्मेदारी लेना पड़ेगी. लेकिन क्या किसी के पास इस बात का जवाब है कि पालकों की अपनी जिम्मेदारी नहीं है कि वह अपने बच्चों को जाँचे कि वह क्या पढ़ रहे हैं या नहीं? दरअसल यहां मानसिकता बाज़ार की हो गई है।

एक वह भी समय था जब मास्साब गलती होने पर, पढ़ाई नहीं करने पर पेट में चिकोटी काट कर उठा देते थे और घर पर जाकर बच्चे की शिकायत करते थे. पालक मास्साब का आवभगत करते थे और घर आने पर धुनाई. लेकिन अब बच्चे को इस तरह की सजा देने की बात करना तो दूर, अब उनसे ऊँची आवाज में बात नहीं कर सकते हंै. यदि कुछ किया तो कार्यवाही करने के लिए अनेक कानूनी मंच हैं. अब ऐसे में मैकाले से कैसे मुक्ति पाएंगे. यह नौबत आयी कैसै, कौन है इसके लिए दोषी? इस दौर की यह भी एक सच्चाई यह है कि अनेक खबरें आती हैं कि जिसमें शिक्षक ने गुस्से में बच्चे को बेरहमी से पीटा या कि बच्चियों के साथ अश£ील हरकतें की. शिक्षक शराब पीकर स्कूल में पहुँच गए हैं. ये हुआ वह भयावह है लेकिन हुआ क्यों? हुआ इसलिए कि हमने डिग्री देखकर उसे शिक्षक बना दिया. उसके भीतर शिक्षक का भाव है कि नहीं, वह जवाबदार है कि नहीं, यह देखने का कोई सिस्टम हमारे पास है नहीं. पब्लिक स्कूलों के शिक्षक के लिए पहली जरूरत होती है अँग्रेजी का ज्ञान और सरकारी स्कूलों की जरूरत होती है खाली पदों को भरना. हालांकि सिस्टम ही यही है तो क्या ही किया जा सकता है.
समस्या तो बड़ी है और आने वाले दिनों में भयावह होगी. इसलिए आवश्यक हो जाता है कि जिस तरह पीपीपी मोड में अन्य कार्य हो रहे हैं, वैसा ही एक ढाँचा शिक्षण के लिए बनाया जाए. हरेक घर से एक व्यक्ति यह जिम्मेदारी ले और अपनी विशेषज्ञता के साथ बच्चों को पढ़ाने जाए. फिलवक्त समस्या का एक समाधान यह भी हो सकता है कि वृद्धाश्रम में निराशा में डूबते-उतरते अपने समय के काबिल लोगों को शिक्षण के कार्य पर लगायें. वे अपने अनुभव से पूरी शिक्षा व्यवस्था का चेहरा बदल देंगे. समाज को भी ये इंटरनेशल पब्लिक स्कूलों से भी दूर जाना होगा. राष्ट्रीय शिक्षा नीति से एक उम्मीद जगती है कि मातृभाषा में शिक्षा. यह अंग्रेजी से मुक्ति का एक बड़ी कोशिश है. सरकारी स्कूलों से ही आपको डॉ. राधाकृष्णन, कलाम साहब, डॉ. शंकर दयाल शर्मा और अनन्य लोग मिल जाएंगे. समाज को फिर से मास्साब चाहिए ना कि शिक्षा कर्मी. साक्षात्कार एवं अन्य प्रयोग से आप शिक्षण संस्थानों के लिए कर्मी तो बना सकते हैं लेकिन शिक्षक तो स्वयं से बनते हैं. एक जुनून ही शिक्षक का दूसरा नाम होता है. ऐसा कर सकें तो ना केवल महान शिक्षाविद् हमें मिलेंगे बल्कि मैकाले की कालीछाया से भी मुक्ति पा सकेंगे.(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

सोमवार, 18 अगस्त 2025

वो ना आए तोगुस्सा, वो आए तो भी

 


प्रो. मनोज कुमार

    अरे यार, क्या लिखते हैं? क्या छापते हैं? समझ में नहीं आता कैसी पत्रकारिता कर रहे हैं. सब बिक गए हैं. ढोल पीट रहे हैं. झूठ को सच बनाकर परोस रहे हैं. जो लोग रोज अखबार को कोसते रहते हैं उनके लिए आज 16 अगस्त का दिन भारी पड़ रहा होगा. चाय की पहली प्याली के साथ कोसने के लिए, बड़बड़ाने के लिए उनके हाथों में अखबार का पन्ना नहीं है. आखिर अब वो दिन भर कोसें किसे? किसे बताएं कि मीडिया कितना बेइमान हो गया है. बेइमान शब्द थोड़ा तल्ख हो जाता है तो कहते हैं कि मीडिया की विश्वसनीयता खत्म हो गयी है. और इस अविश्वसनीय होते दौर में आज 16 अगस्त को अखबार उनके हाथों में नहीं हैं तो भी उन्हें बुरा लग रहा है. अब इस मर्ज का क्या इलाज करें? हम हैं तो बुरे और नहीं है तो भी बुरे! अरे, साहबान हम पत्रकारों को साल में दो दिन ही तो मिलता है जब आपकी निंदा, आलोचना और कई बार गालियों से बच निकलते हैं. आज 16 अगस्त और अगले साल 27 जनवरी को आपके हाथ नहीं आते हैं.

अब सोचिए और गुनिए कि जिन अखबार को आप कोसते हुए थकते नहीं हैं, वही एक दिन आपसे दूर हो जाता है तब आप तनाव में आ जाते हैं. अखबार के साथ आपकी संगत ऐसी हो गई है कि चाय की पहली प्याली की चुस्की लेते हुए आपके दिन की शुरूआत होती है. और शायद यही वजह है कि रोज की तरह आज भी आप अखबा तलाश कर रहे होते हैं लेकिन अखबार ना देखकर आप भिन्ना उठते हैं. आपको लगता है कि आज हॉकर बदमाशी कर गया, अखबार देकर नहीं गया. फिर आदतन अपनी धर्मपत्नी को आवाज देते हैं कि अखबार देखा क्या? जब उधर से भी ना का जवाब मिलता है तब आपको खयाल आता है कि कल 15 अगस्त के अवकाश के कारण आज अखबार नहीं आया. मन व्याकुल हो जाता है. सही बात तो यह है कि जिस अखबार और मीडिया को आप दुश्मन समझते हैं, वह दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त है. इससे आगे और जाएं तो आप भीतर झांक कर देखेंगे तो पता चलेगा कि अखबार से आपको इश्क है. वैसा ही जैसा आप किसी से करते हैं. यहां इश्क से मतलब किसी स्त्री से होना ही नहीं है. एक ऐसा दोस्त जो रोज आपको परेशान भी करता है और सुकून भी देता है, वह दूर हो जाए तो दिनभर मन में एक कसक रह जाती है. आज आपके साथ यही हो रहा है. सच बोलिएगा?

याद कीजिए उस कू्रर दिन को जिसे हम कोरोना काल कहते हैं.. आप डरे, दुबके हुए घर में छिपे-सहमे से बैठे थे तब अखबार की सूरत में आपका दुश्मन दोस्त सूचना और खबरें लेकर धमक जाता था. लाख चेतावनी के बाद कि अखबार से कोरोना फैल सकता है लेकिन आप नहीं मानते थे. थोड़ी सावधानी के लिहाज से एकाध घंटे अखबार को बाहर पड़े रहने देते थे फिर सेनेटाइजर छिडक़र टोटका कर अखबार को साथ लेकर सोफे पर पसर जाते थे. फिर एक प्याली चाय और अखबार आपकी साथी आपके साथ होता था. कितना बेशर्म है ना ये अखबार और हम खबर लिखने वाले लोग जो रोज आपकी आलोचना, निंदा और गालियां सुनने के बाद भी बिलानागा आपकी टेबल पर होते हैं. कभी आपने हमारे बारे में सोचा कि आपको अलर्ट रखने के लिए, अच्छी-बुरी सूचना इक_ी करने के लिए हम अपने परिवार को भूल कर, अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर काम पर निकल जाते हैं. हमारी कौम को तो ये भी पता नहीं होता है कि हमारे घर में राशन कब खत्म हो गया है, बच्चे के स्कूल की फीस जमा है कि नहीं या मां की दवा लाने के लिए पैसों का इंतजाम कैसे करेंगे? वो तो भला हो हमारी कौम की उन स्त्रियों का जो मेरी पत्नी है, भाभी है, माँ है और बहन है जो हमारा हौसला बढ़ाती हैं. उनके मुँह में निवाला कब जाता है, यह भी हमें खबर नहीं होती है लेकिन दो परांठे और दही खिलाकर भेजती हैं, वैसे ही जैसे कि एक जवान को उनके परिजन भेजते हैं. हमारे घर की स्त्रियों को पता है कि घर लौटने तक इनके पेट में कुछ कप चाय और एकाध-दो सड़े-गले तेल में बना समोसा मिल जाए तो बहुत लेकिन इन सबके बदले हमारा पेट भरता है आपकी निंदा से, आलोचना. 

ये 16 अगस्त और आने वाले नए साल में 27 अगस्त आपको इस बात का याद दिलाता रहेगा कि अखबार आपका दुश्मन नहीं, बिकाऊ नहीं, अविश्वसनीय नहीं बल्कि आपका हमदर्द है, आपको सूचना से लबरेज रखता है. आपको समाज में घट रहे अच्छे बुरे की खबर देता है. इस बात से कोई शिकायत नहीं कि गलतियां होती हैं, कुछ यशोगान भी होता है और अगर यह बात आप उस प्रबंधन को दोष दीजिए, उसे कोसिए ना कि अखबार और टेलीविजन के पर्दे पर आने वाले हम जैसे राई जैसे पत्रकारों को. आपका तो शनिवार-रविवार मौज का होता है. हर तीज-त्योहार पर आपको छुट्टी मिल जाती है और हमें? हमें तो ये दो दिन ही मिलते हैं और यह दो दिन इसलिए कि आप अपने भीतर झांक सकें कि क्या वास्तव में मीडिया अविश्वसनीय हो गया है? आपको याद दिलाते कविवर बाबा नागार्जुन की पंक्तियां सहसा स्मरण में आ जाता है कि 

किसकी है छब्बीस जनवरी, 

किसका है पन्द्रह अगस्त

यहां पर बाबा से माफी के साथ अपने कौम के लिए कहता हूं - 

किसकी है होली, किसकी है दीवाली

हर दिन है बेहाली, हर दिन निंदा और गाली                                                   तस्वीर गूगल से साभार   



सोमवार, 11 अगस्त 2025

दिग्विजय-सिंधिया प्रसंग



 इस खूबसूरत पल को थाम लीजिए 

प्रो. मनोज कुमार

    राजनीति, समाज और आसपास जब अंधेरा घटाघोप हो रहा हो और ऐसे में कहीं भी एक लौ दिखाई दे तो उस पल को थाम लीजिए. यह लौ अंधेरे को चीर नहीं सकता है लेकिन उम्मीद की किरण के मानिंद हमें भरोसा दिलाता है कि अभी सबकुछ खराब नहीं हुआ है. अभी उम्मीद बाकि है. राजनीति के पटल पर देखते हैं तो यह अंधेरा घनघोर है. ऐसे में एक सार्वजनिक सभा में ज्योतिरादित्य सिंधिया मंच से उतर कर दिग्विजयसिंह का हाथ थाम कर मंच पर ले जाते हैं. यह महज संयोग नहीं है बल्कि उन दिनों के लौट जाने का संकेत है कि राजनीति में शुचिता शेष है. शेष है एक-दूसरे को सम्मान देने की नियत. लेकिन आनंद लीजिए कि ज्योतिरादित्य सिंधिया वक्त गंवाए और कोई दूसरा मनोभाव बनाये. मुस्कराते हुए मंच से उतरते हैं. आसपास खड़े लोगों का अभिवादन करते हैं और पूरे अधिकार के साथ दिग्विजयसिंह को मंच पर साथ ले जाते हैं.

यह पल यकिनन स्मृतिकोष में सदैव के लिए अंकित हो जाने वाला है. इस बात पर क्या कोई विमत हो सकता है कि राजनीति में दिग्विजयसिंह वरिष्ठ हैं और ज्योतिरादित्य उनसे कम. मध्यप्रदेश की राजनीति में दिग्विजयसिंह अपने संकल्पों को पूर्ण करने में कभी हिचके नहीं, पीछे हटे नहीं। और ज्योतिरादित्य अधिकार के साथ उन्हें मंच पर ले जाते हैं तो उनका संकल्प टूट जाता है. स्मरण रहे कि कांग्रेस की एक सभा में उन्होंने संकल्प लिया था कि वे मंच पर नहीं बैठेंगे। तब से वे कांग्रेस के मंच से किनारा कर दर्शक दीर्घा में बैठने लगे. ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेसजनों ने उनका मान-मनोव्वल नहीं किया होगा. उन्हें सम्मान देने में पीछे रहे होंगे. सबने अपने हिस्से से दिग्विजयसिंह को मनाने का प्रयास किया होगा लेकिन वे अपने संकल्प पर अडिग रहे. फिर ऐसा क्या हुआ कि वे ज्योतिरादित्य सिंधिया के आग्रह को टाल नहीं सके? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने आग्रह तो किया ही, अधिकार के साथ उन्हें अपने साथ हाथ पकड़ कर मंच तक ले आए. 

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा का विषय बन गया. जैसा कि होता आया है राजनीति के मंच पर जब ऐसा कोई प्रसंग आता है तो उसके पीछे की राजनीति तलाश की जाने लगती है. अनेक बार ऐसा होता भी है लेकिन वर्तमान प्रसंग इस बात का संकेत देता है कि ज्योतिरादित्य की यह पहल अपने वरिष्ठ को सम्मान देने की है ना कि राजनीतिक विवशता. इस घटनाक्रम के अगले दिन अखबारों में दिग्विजयसिंह का बयान छपता है कि ज्योतिरादित्य उनके बेटे के समान है. ज्योतिरादित्य सिंधिया की पहल और दिग्विजयसिंंह का बयान के नीचे या पीछे कोई राजनीति नहीं देखना चाहिए. यूं कि ये महज एक परिवार सा है. सनातनी संस्कृति को समझने और मानने वाले यह समझ सकते हैं कि जब घर के बुर्जुग नाराज होते हैं, रूठ जाते हैं तो यह जिम्मेदारी बच्चों की होती है कि वे उन्हें अधिकारपूर्वक साथ लेकर चलें. उन्हें मनाने या उनसे माफी मांगने की कतई जरूरत नहीं होती है और ना ही वे चाहते हैं कि उनके बच्चे ऐसा करें. ऐसा किया भी जाता है तो यह एक औपचारिक रिश्ते में बदल जाता है. उल्टे गुस्सा कीजिए, नाराज हो जाइए और अधिकार जताइए, आपस की दूरी खत्म हो जाती है. मनोविज्ञान भी यही कहता है और भारतीय संस्कृति में भी यही रिवाज है. 

राजनीतिक गलियारे में इस सुखद प्रसंग के बाद चर्चा चल पड़ी, कयास लगाये जाने लगे कि यह सब संयोग नहीं बल्कि राजनीतिक पहल है. यह भी बिना किसी तथ्य, तर्क के यह बात गढ दी गई कि सिंधिया कांग्रेस वापसी चाहते हैं इसलिए यह पहल उन्होंंने की. कुछ ऐसी ही मीमांसा दिग्विजय सिंह के बयान को लेकर की जाने लगी. लिखने और बोलने वालों का आधार क्या है, शायद कोई नहीं जानता. अगर सबने देखा, जाना और समझा तो यह कि यह राजनीति के शह-मात का खेल नहीं बल्कि आपसी शिष्टाचार, सद्भाव और सौम्यता का प्रसंग है. मुश्किल यह है कि समाज का हर वर्ग इस बात से प्रसन्न नहीं होता है कि आज कुछ सुखद हो रहा है तो उसे आगे बढ़ायें ना कि क्लेश की जमीन को विस्तार दें. जब राजनीति में शुचिता की बात होती है तब हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं. अनेक पुराने प्रसंग और घटनाओं को बताते हैं कि देखो, वो समय कैसा था. और आज जब उन पुराने प्रसंगों, घटनाओं का किंचचित मात्र बेहतर हो रहा है तो हम उनके बीच हुई कुछ कड़ुवाहट को सामने ले आते हैं. क्या हम थोड़ी देर के लिए इस मकबूल वक्त में खो नहीं सकते हैं. माना कि राजनेताओं की राजनीति अपने अस्तित्व को लेकर होती है तो सवाल यह है कि वे सारी मेधा, सारी मेहनत समाज को आगे बढ़ाने के लिए ही तो कर रहे हैं. निश्वित रूप से वे व्यक्तिगत छवि को निखारना चाहते हैं और वे ताकतवर होंगे, तभी वे समाज हित में, राष्ट्रहित में, राज्य में कुछ ठोस कर पाएंगे. मैं राजनीति का ककहरा नहीं जानता हूं लेकिन यह भी जानता हूं कि राजनीति है, यहां कुछ भी संभव है. और यह कोई नया नहीं है. भविष्य में क्या होगा, कैसे होगा, कोई नहीं जानता लेकिन बर्फ पिघल रही है तो पिघल जाने दीजिए. इस घटाघोप अंधेरे में इस बाती को प्रज्जवलित होने दीजिए. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

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