शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

डॉ. दांडेकर भोज के कुलगुरु, दिल्ली के स्कूलों में राष्ट्रीय नीति पाठ्यक्रम और चाय पर शोध

 भोज को मिला कुलगुरु, रायपुर प्रतीक्षा में

लंबे समय से कुलगुरु की राह ताकते भोज मुक्त विश्वविद्यालय को प्रो. मिलिंद दांडेकर कुलगुरु नियुक्त किया गया है। गोविन्दराम सक्सेरिया प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान में इंजीनियरिंग विभाग में ज़रूरत डॉ. दांडेकर को गवर्नर ने कुलगुरु के रूप में नामांकित किया है। उधर छत्तीसगढ़ के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कुलपति का पद लम्बे समय से रिक्त पड़ा है. बलदेव भाई का कार्यकाल पूर्ण होने के बाद कुलपति पद के लिए विज्ञापन जारी किया गया था किन्तु थोड़े समय में इस विज्ञापन को निरस्त कर दिया गया. कार्यकारी कुलपति के रूप में कमिश्रर रायपुर संभाग को प्रभार दिया गया. कुलपति बनने की आस लगाये बैठे भोपाल से रायपुर तक लोगों को प्रतीक्षा ही है.

आईएफएम में मौका

भारतीय वन प्रबंधन संस्थान भोपाल को विभिन्न विषयों के लिए सहायक प्राध्यापक, सह प्राध्यापक एवं प्राध्यापक की जरूरत है। आईआईएफएम की विज्ञप्ति में 6 पदों के लिए सीधी भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन बुलाए गए हैं। आरक्षित पद, वेतनमान एवं योग्यता के लिए ऑफिशल वेबसाइट देखें।

डर की क्लास

एमसीयू प्रशासन क्लास में सौ परसेंट उपस्थिति के लिए स्टूडेंट्स के खिलाफ एक्शन लेना शुरू कर दिया है. पिछले सत्र में सवा सौ से अधिक स्टूडेंट्स को परीक्षा में बैठने नहीं दिया गया था. इस बार आंतरिक परीक्षा में कोई पांच सौ विद्यार्थियों को रोके जाने की खबर एमसीयू के सूत्रों ने दी है. डर की इस क्लास में स्टूडेंट्स तो खौफ में हैं लेकिन विभागाध्यक्ष आनंद में हैं. 

भोपाल रेल मेट्रो को चाहिए पीआरओ 

अक्टूबर में शुरू होने वाली मेट्रो टे्रन का कोई आसार नजर नहीं आ रहा है. शायद नवंबर में कोई मौका आए लेकिन मौका उन लोगों के लिए जरूर है जो इस उपक्रम में पीआरओ बनना चाहते हैं. अपनी योग्यता जांचने और अन्य जरूरतोंं की जानकारी के लिए भोपाल रेल मेट्रो की वेबसाइट खंगाल लीजिए। 

राष्ट्रीय नीति पाठ्यक्रम

आरएसएस का इतिहास, दर्शन और सामाजिक योगदान के साथ-साथ सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में बताने दिल्ली सरकार स्कूल राष्ट्रीय नीति पाठ्यक्रम शुरू करने जा रही है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता द्वारा शुरू किए गए इस कार्यक्रम का उद्देश्य कक्षा 1 से 12 तक के छात्रों में नागरिक जागरूकता, नैतिक शासन और राष्ट्रीय गौरव की भावना को बढ़ाना है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह पाठ्यक्रम आपदा राहत प्रयासों में आरएसएस की भागीदारी, जैसे रक्तदान अभियान, केदारनाथ और बिहार की बाढ़ के दौरान सहायता और कोविड-19 महामारी के दौरान दिए गए समर्थन को भी शामिल किया जाएगा। 

चाय पर चर्चा ही नहीं, अब रिसर्च भी

चाय की किस्म, खुशबू और गुणवत्ता पर अब चर्चा से आगे जाकर इस पर विश्लेषण किया जाएगा। यह काम कौशल उन्नयन पाठ्यक्रम में सरकार ने जोड़ दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय चाय बोर्ड अब चाय साक्षरता को भी बढ़ावा देगा। देश में चाय पर चर्चा के बाद अब चाय पर शोध का यह नया अध्याय है। 

पार्टटाइम पीएचडी करें

जेएस बोस यूनिवर्सिटी, हरियाणा मीडिया प्रोफेशनल्स को पार्ट टाइम पी-एचडी का मौका दे रहा है। आप भी अपने नाम के साथ डॉक्टर  लगाना चाहते हैं तो जल्द ही अप्लाय कर दें. 21 अक्टूबर 2025 तक आवेदन लिए जाएंगे और अगले महीने 8 नवम्बर को एंट्रेंस एक्जाम होगा. और अधिक जानकारी चाहिए तो जेएस बोस यूनिवर्सिटी के वेबसाइट सर्च कर लें।

बातों ही बातों में

खबरें बनाना सिखाने वाले संस्थान की खबरें बनना शुरू हो जाए तो कान खड़े हो जाते हैं. विवादों में घिरी एक एचओडी के बारे में खबरें बनने और चलने लगी हैं। खबर है कि इससे नाराज विश्वविद्यालय प्रशासन जल्द ही बड़ा फेरबदल कर ऐसी खबरों को रोकने की कोशिश करेगा. हालांकि एचओडी इन बातों को खारिज करती हुई बेफिक्र हैं. अब उनकी बेफिक्री रहेगी या प्रशासन सख्त होगा, ये तो वही जानें। अब ये बातें हैं बातों का क्या?

बुधवार, 8 अक्टूबर 2025

खतों किताबत के दिन















प्रो. मनोज कुमार 

थोड़े दिन पहले डाकघर गया था। वहां पोस्टकार्ड देखे मन डोल गया। बरबस काउंटर पर बैठी क्लर्क से चार पोस्टकार्ड मांग लिया। पोस्टकार्ड का आकर, उसकी खुशबू जैसे मुझे पुराने दिनों की ओर खींच ले गई। कभी धर्मयुग के संपादक गणेश मंत्री के हस्ताक्षर युक्त तो कभी किसी अन्य संपादक के हस्ताक्षर के साथ रचना प्रकाशन के लिए स्वीकृति का पोस्ट कार्ड मिलते ही मैं मुस्करा उठता। पिछले कुछ साल तक दादा बालकवि बैरागी जी एवं विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के कुलसचिव का नियमित पोस्ट कार्ड मिलता रहा। दादा बैरागी जी के नहीं रहने से यह सिलसिला भी टूट गया।

मोबाइल और ईमेल के ज़माने में लिखना और छपना तो खूब हो रहा है। मन भी प्रसन्न है कि मैं लिख रहा हूं लेकिन खतों किताबत का दौर कई बार उदास कर जाता है। एक समय था जब लिखने और लिख कर डाक में डालने की होड़ लगी होती थी। कुछ दिन पहले अब मुंबई में बस चुके मित्र नीलकंठ पारठकर से बात करते हुए वही दिन याद आ गए। दोनों को मालूम था कि चाहे कितनी जल्दी करें, डाक एक साथ ही निकलेगी लेकिन डिब्बे में लिफाफा पहले कौन डालेगा, इसकी होड़ लगी होती थी। रपट, लेख  लिखने के लिए देर रात तक जागना। वो भी मजे के दिन थे। फिर रोज डाकिया का इंतजार कि वह जल्दी से संपादक की मंजूरी की चिट्ठी लेकर आए। वो दिन हवा हुए।

अब हाथ से लिखने का चलन खत्म हो गया। टाइप कीजिए और बना बनाया लेख, समाचार अखबारों को, पत्रिकाओं को भेज दीजिए। लौटती डाक तो छोड़िए, एक संदेशा भी नहीं आता है कि छापा जाएगा या नहीं। वाट्सअप पर आने वाले पीडीएफ फाइल में तलाश कीजिए। छप गया तो मुस्कान और नहीं तो अगले दिन की प्रतीक्षा। 

थोड़े समय से अखबारों में संपादक के नाम पत्र की आंशिक वापसी हुई है। संपादक के नाम पत्र लिखने के लिए अब पोस्ट कार्ड की जरूरत नहीं होती है। लिखकर वाट्सअप कर दें या ईमेल। राहत यही है कि कुछ तो पीछे लौटे। संपादक के नाम पत्र एवं पोस्टकार्ड का आपस में गहरा रिश्ता है। यह नए लेखकों के लिए लिखने का तरीका सिखाता है। कम शब्दों में अपनी बात कैसे कहना। मैं जब कभी, जहां कहीं मीडिया के स्टूडेंट्स को पढ़ाने गया, वहां पोस्ट कार्ड जरूर लेकर जाता हूं। यह सीखने, बताने के लिए कि सीखने की यह पहली कड़ी है। बहुत सारे स्टूडेंट्स को तो पोस्टकार्ड भी नहीं मालूम। तभी तो सुनिए, पढ़िए जिंदगी का पोस्टकार्ड।

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सोमवार, 29 सितंबर 2025

बेकार, बेकाम नहीं हैं हमारे वृद्धजन

बेकार, बेकाम नहीं हैं हमारे वृद्धजन












प्रो. मनोज कुमार

सक्सेना जी पीएचई विभाग में चीफ इंजीनियर के पद से रिटायर हुए हैं. किसी समय उनकी तूती बोला करती थी लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव में ना केवल वे अकेले हैं बल्कि वृद्धाश्रम का एक कोना उनका बसेरा बन गया है. कभी करोड़ों का मामला सुलटाने वाले अग्रवाल दंपति की कहानी भी यही है. गणित और अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे द्विवेदी दंपति भी उम्र के आखिरी पड़ाव पर वृद्धाश्रम में रह रहे हैं. ये वे लोग हैं जिनकी काबिलियत और अनुभवों से समाज रोशन होता था. उनके अपने बच्चे आज किसी मुकम्मल मुकाम पर हैं तो उनका ही सहारा था. जिन्हें आप माता-पिता कहते हैं, वे शागिर्द आज वृद्धाश्रम में बिसूर रहे हैं. निराश और हताश भी हैं. ये दो चार लोग नहीं बल्कि वृद्धजनों की पूरी टोली है. आपस में बतिया लेते हैं और वृद्धाश्रम के दरवाजे पर टकटकी लगाये देखते हैं कि कहीं बहू-बेटा तो लेने नहीं आए? पोता-पोती की सूरत याद कर हौले से मुस्करा देते हैं लेकिन गोद में उठाकर लाड़ ना कर पाने की हसरत उनके चेहरे पर मायूसी बनकर उभर आती है. यह कहानी घर-घर की होती जा रही है. थोड़ा पैसा, थोड़ा रसूख कमाने के साथ ही वृद्धजन बोझ बनने लगते हैं. और जल्द ही तलाश कर लेते हैं उनके लिए वृद्धाश्रम का कोई कोना. पहले पहल आना-जाना भी होता है लेकिन धीरे-धीरे वह भी भुला दिया जाता है. संस्कारों में रची-बसी भारतीय संस्कृति का यह दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है. इन पर लिखते हुए मैं भी एक गलती कर रहा हूँ क्यों एक दिन वृद्धजन दिवस पर लिख रहा हूँ. क्यों साल में बार-बार इस बात का स्मरण नहीं कराता हूँ. सच है लेकिन यह दिन इसलिए चुना कि आज अंतरराष्ट्रीय दिवस वृद्धजन के बहाने लोग पढ़ तो लेेंगे. खास बात यह है कि हमारे वृद्धजन लिए नहीं बल्कि बाजार का दिन है. उम्र भर लतियाते वृद्धजनों का ऐसा सम्मान किया जाएगा कि लगेगा कि कुछ हुआ ही नहीं. इसी दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय की चर्चा कर रहा हूँ.  

क्या ही हैरानी की बात है कि जिनसे हम रौशन हैं, जिनसे हमारा घर रौशन है, उनके लिए हमने एक दिन तय कर दिया है और नाम दे दिया है वृद्धजन दिवस. और इसका फलक बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय कर दिया है. यूरोप की मानसिकता में वृद्धजन  के लिए यह सौफीसदी मुफीद हो सकता है लेकिन भारतीय सनातनी संस्कृति में वृद्धजन बेकार और बेकाम नहीं हैं लेकिन दुर्र्भाग्य से हमने भी यूरोपियन संस्कृति का अंधानुकरण कर उन्हें बेकार और बेकाम मान लिया है. उम्र के आखिरी पड़ाव में ठहरे वृद्धजनों के पास अनुभव है, कौशल है और है दुनियादारी की वह समझ लेकिन वे निहायत अकेले होकर वृद्धाश्रम में अपना समय गुजार रहे हैं. कितनी विडम्बना है कि एक तरफ हम सनातनी होने और संस्कार की दुहाई देते नहीं थकते और दूसरी ओर वृद्धजन की उपेक्षा और तिरस्कृत करने में पीछे नहीं हटते. आखिर क्या मजबूरी हो गई कि जिनकी छाँह में पलकर हम बढ़े हुए, वही हमारे लिए बोझ बन गए? क्यों हम उनके अनुभवों का लाभ लेकर जीवन को संवार नहीं पा रहे हैं? क्या कारण है कि उन्हें साथ रखते हुए कथित प्रायवेसी में बाधा आ रही है? सवाल अनेक हैं लेकिन सवालों के बीच अपने दुख और अहसास के बीच घुटते-घबराते वृद्धजनों की सुध कौन लेगा? क्या वृद्धाश्रम ही अंतिम विकल्प है.

वृद्धजनों को घर से बाहर निकाल देना, उनके साथ शारीरिक हिंसा करना और उन्हें अपमानित करने की खबरें अब रोजमर्रा की हो गई हैं. संवेदहीन होते समाज में वृद्धजन दिवस बाजार के लिए एक दिन है. वृद्धजनों को उत्पाद बना दिया जाएगा. दरअसल बाजार से बाहर आकर इन वृद्धजनों के टैलेंट का उपयोग करना होगा. परिवार के नालायक बच्चों ने वृद्धजनों को वृद्धाश्रम में भेज दिया है तो समाज का, सरकार का दायित्व है कि उन्हें मुख्यधारा में लाकर उनकी ना केवल प्रतिभा का सम्मान करे बल्कि उन्हें सम्मानपूर्वक जीने का हौसला दे. देशभर के शासकीय स्कूलों की हालत एक जैसी है. शिक्षकों की कमी है तो इस कमी को इन वृद्धजनों  से पूरा क्यों नहीं किया जा सकता है? इन्हें स्कूलों में अध्यापन का अवसर दिया जाए और बदलेे में सम्मानजनक मानदेय. ऐसा करने से उनके भीतर का खोया आत्मविश्वास लौटेगा. वे स्वयं को सुरक्षित और उपयोगी समझेंगे तो डॉक्टर और दवा से उनकी दूरी बन जाएगी. एक बेटे, पोते-पोती की कमी को दूर कर सकेंगे. स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता आएगी. आखिरकार अनुभव अनमोल होता है. 

कुछ वृद्धजन गणित, विज्ञान, हिन्दी, अंग्रेजी और अन्य विषयों के जानकार होंं लेकिन कुछ वृद्धजन ऐसे होंगे जो विषयों के सिद्धहस्त ना होंं लेकिन दूसरी विधा के जानकार हों, उन्हें कौशल विकास के कार्यों में नई पीढ़ी को दक्ष करने के कार्य में उपयोग किया जाना चाहिए. वृद्धाश्रम के भीतर ही कौशल उन्नयन की कक्षा आयोजित कर उत्सुक युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे सीख सकें. अध्यापन का कार्य हो या कौशल उन्नयन का. ज्यादा कुछ नहीं तो वृद्धाश्रम के भीतर ही हम विविध विषयों की साप्ताहिक कोचिंग कक्षा के संचालन की शुरूआत कर सकते हैं. जिसमें विषय की शिक्षा तो होगी ही, विविध कलाओं की कक्षाएं भी होंगी. जो जिस विधा में पारंगत है, वे उसमें सक्रिय हो जाएंगे. इन गतिविधियों में वृद्धजनों का जुड़ाव होगा तो वे वापस स्वस्थ्य और प्रसन्न हो जाएंगे. जिंदगी के प्रति उनका अनुराग बढ़ जाएगा. हौसला बढ़ेगा तो वे दवा से दूर हो जाएंगे. 

बस, थोड़ा सा हमें उनके प्रति मेहनत करना है. थोड़ा सा साहस देना है. परिवार से टूटे लोग शरीर से ज्यादा मन से टूट जाते हैं और मन से टूटे को जोडऩा आसान नहीं होता लेकिन मुश्किल कुछ भी नहीं है. दो को खड़ा कीजिए, दस अन्य स्वयं सामने आ जाएंगे. इसमें जेंडर का कोई भेद नहीं हैं. वृद्धजनों का अर्थ माता और पिता दोनों ही हैं और दोनों ही अपने बच्चों से सताये हुए हैं. इस बार वृद्धजन दिवस पर हमें, हम सबको संकल्प लेना होगा कि अबकी बार वे वृद्धाश्रम में नहीं, कौशल की पाठशाला में रह रहे होंगे. वृद्धाश्रम  को कौशल की पाठशाला में परिवर्तन ही भारतीय संस्कृति की ओर वापसी का पहला कदम होगा. नालायक बच्चों के लिए यह एक पाठ होगा कि उन्होंने कौन सा अनमोल हीरा गंवा दिया है. बाजार को अपना काम करने दीजिए, हम सब अपना काम करेंगे. एक बार कोशिश तो करके देखिए. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

बापू कुछ मीठा हो जाए..

 

प्रो. मनोज कुमार
बापू इस बार आपको जन्मदिन में हम चरखा नहीं, वालमार्ट भेंट कर रहे हैं. गरीबी तो खतम नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये  गरीबों को  खत्म करने का अचूक नुस्खा हमने इजाद कर लिया है. खुदरा बाजार में हम विदेशी पंूजी निवेश को अनुमति दे दी है. हमें ऐसा लगता है कि समस्या को ही नहीं, जड़ को खत्म कर देना चाहिए और आप जानते हैं कि समस्या गरीबी नहीं बल्कि गरीब है और हमारे इन फैसलों से समस्या की जड़ गरीब ही खत्म हो जाएगी. बुरा मत मानना, बिलकुल भी बुरा मत मानना. आपको तो पता ही होगा कि इस समय हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं और आप हैं कि बारमबार सन् सैंतालीस की रट लगाये हुए हैं कुटीर उद्योग, कुटीर उद्योग. एक आदमी चरखा लेकर बैठता है तो जाने कितने दिनों में अपने एक धोती का धागा जुटा पाता है. आप का काम तो चल जाता था  लेकिन हम क्या करें. समस्या यह भी नहीं है, समस्या है कि इन धागों से हमारी सूट और टाई नहीं बन पाती है और आपको यह तो मानना ही पड़ेगा कि इक्कसवीं सदी में जी रहे लोगों को धोती नहीं, सूट और टाई चाहिए वह भी फटाफट... हमने गांव की ताजी सब्जी खाने की आदत छोड़ दी है क्योंकि डीप फ्रीजर की सब्जी हम कई दिनों बाद खा सकते हैं. दरअसल आपके विचार हमेशा से ताजा रहे हैं लेकिन हम लोग बासी विचारों को ही आत्मसात करने के आदी हो रहे हैं. बासा खाएंगे तो बासा सोचेंगे भी. इसमें गलत ही क्या है?
        बापू माफ करना लेकिन आपको आपके जन्मदिन पर बार बार यह बात याद दिलानी होगी कि हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं. जन्मदिन, वर्षगांठ बहुत घिसेपिटे और पुराने से शब्द हैं, हम तो बर्थडे और एनवरसरी मनाते हैं. अब यहाँ भी देखिये कि जो आप मितव्ययता की बात करते थे, उसे हम नहीं भूला पाये हैं इसलिये शादी की वर्षगांठ हो या मृत्यु , हम मितव्ययता के साथ एक ही शब्द का उपयोग करते है एनवरसरी. आप देख तो रहे होंगे कि हमारी बेटियां कितनी मितव्ययी हो गयी हैं. बहुत कम कपड़े पहनने लगी हैं. अब आप इस बात के लिये हमें दोष तो नहीं दे सकते हैं ना कि हमने आपकी मितव्ययता की सीख को जीवन में नहीं उतारा. सडक़ का नाम महात्मा गाँधी रोड रख लिया और मितव्ययता की बात आयी तो इसे एम.जी. रोड कह दिया. यह एम.जी. रोड आपको हर शहर में मिल जाएगा. एम.जी. रोड रखने से हम गंतव्य तक तो पहुँच जाएंगे लेकिन रोड की जगह मार्ग रख देते तो मुश्किल आ पड़ती. लोग कहते गाँधीमार्ग पर चलना कठिन है...एम.जी. रोड ही ठीक है.. अभी तो यह शुरूआत है बापू, आगे आगे देखिये हम मितव्ययता के कैसे कैसे नमूने आपको दिखायेंगे.
        अब आप गुस्सा मत होना बापू क्योंकि हमारी सत्ता, सरकार और संस्थायें आपके नाम पर ही तो जिंदा है. आपकी मृत्यु से लेकर अब तक तो हमने आपके नाम की रट लगायी है. कांग्रेस कहती थी कि गाँधी हमारे हैं लेकिन अब सब लोग कह रहे हैं कि गाँधी हमारे हैं. ये आपके नाम की माया है कि सब लोग एकजुट हो गये हैं. आपकी किताब  हिन्द स्वराज पर बहस हो रही है, बात हो रही है और आपके नाम की सार्थकता ढूंढ़ी जा रही है. ये बात ठीक है कि गाँधी को सब लोग मान रहे हैं लेकिन गाँधी की बातों को मानने वाला कोई नहीं है लेकिन क्या गाँधी को मानना, गाँधी को नहीं मानना है. बापू आप समझ ही गये होंगेकि इक्कसवीं सदी के लोग किस तरह और कैसे कैसे सोच रखते हैं. अब आप ही समझायें कि हम ईश्वर, अल्लाह, नानक और मसीह को तो मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी माना क्या? मानते तो भला आपके हिन्दुस्तान में जात-पात के नाम पर कोई फसाद हो सकता था. फसाद के बाद इन नामों की माला जप कर पाप काटने की कोशिश जरूर करते हैं.
बापू छोड़ो न इन बातों को, आज आपका जन्मदिन है. कुछ मीठा हो जाये. अब आप कहेंगे कि कबीर की वाणी सुन लो, इससे मीठा तो कुछ है ही नहीं. बापू फिर वही बातें, टेलीविजन के परदे पर चीख-चीख कर हमारे युग नायक अमिताभ कह रहे हैं कि चॉकलेट खाओ, अब तो वो मैगी भी खिलाने लगे हैं. बापू इन्हें थोड़ा समझाओ ना पैसा कमाने के लिये ये सब करना तो ठीक है लेकिन इससे बच्चों की सेहत बिगड़ रही है,  वो तो कह रहे हैं कर्ज लेकर घी पीओ..कभी वो किसी सोना खरीदने की बात करते हैं तो कभी उसी सोने को गिरवी रखकर घर चलाने का मशवरा देते हैं.. बापू हो सके तो इनको समझाओ ना... बच्चों की सेहत और बड़ों की मेहनत को तो बेकार ना करो... उससे तो पैसा न कमाओ. मैं भी भला आपसे ये क्या बातें करने लगा. आपको तो पता ही नहीं होगा कि ये युग नायक कौन है और चॉकलेट मैगी क्या चीज होती है. खैर, बापू हमने शिकायत का एक भी मौका आपके लिये नहीं छोड़ा है. जानते हैं हमने क्या किया, हमने कुछ नहीं किया. सरकार ने कर डाला. अपने रिकार्ड में आपको उन्होंने कभी कहीं राष्ट्रपिता होने की बात से साफ इंकार कर दिया है. आप हमारे राष्ट्रपिता तो हैं नहीं, ये सरकार का रिकार्ड कहता है. बापू बुरा मत, मानना. कागज का क्या है, कागज पर हमारे बापू की शख्सियत थोड़ी है, बापू तो हमारे दिल में रहते हैं लेकिन सरकार को आप जरूर सिपाही बहादुर कह सकते हैं. बापू माफ करना हम इक्कसवीं सदी के लोग अब चरखा पर नहीं, वालमार्ट पर जिंदा रहेंगे. इस बार आपके बर्थडे पर यह तोहफा आपको अच्छा लगे तो मुझे फोन जरूर करना. न बापू न..फोन नहीं, मोबाइल करना और इंटरनेट की सुविधा हो तो क्या बात है..बापू कुछ मीठा हो जाए...(व्यंग्य या कविता लिखना नहीं जानता लेकिन कभी-कभार मन हो जाता है. बस यूं ही.)

गुरुवार, 25 सितंबर 2025

कैंपस कॉरिडोर

21 लाख का साहित्यिक पुरस्कार

प्रख्यात कवि श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट ने हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और कला के लिए अगले वर्ष से अभी तक के सबसे बड़े पुरस्कारों की घोषणा की है. साहित्य की पुरस्कार राशि 21 लाख, पत्रकारिता के लिए 5 लाख और कला क्षेत्र में परफार्मिंग और विज़ुअल आर्ट के क्षेत्र में 2-2 लाख रुपए की सम्मान राशि के साथ पुरस्कार दिए जाएँगे. यह सूचना श्रीकांत वर्मा के पुत्र अभिषेक वर्मा के माध्यम से प्राप्त हुई है. कब और कैसे इसके लिए आवेदन करना है, क्राइटेरिया क्या होगा, प्रत्येक वर्ष 18 सितम्बर को अवार्ड दिए जाने की सूचना जरूर है.

पीएम इंटर्नशिप बढऩे की संभावना

कार्पोरेट मामलों का मंत्रालय पीएम इंटर्नशिप प्रोजेक्ट को आगे दो महीने बढ़ाने पर विचार कर रहा है. हालांकि मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक 30 अगस्त को इसकी अवधि खत्म हो चुकी है. अक्टूबर 2024 से आरंभ हुए इस उद्देश्य टॉप पांच सौ कम्पनियों को एक करोड़  युवाओं को इंटर्नशिप प्रदान करना है. इस इंटर्नशिप का उद्देश्य भारत के युवाओं को उद्योग जगत की आवश्यकता के अनुरूप कौशल विकास करना है.

आकाशवाणी भोपाल में करे अप्लाई

आकाशवाणी भोपाल को मध्यप्रदेश के 7 जिलों के लिए अंशकालिक करसपांडेंट की जरूरत है. 17 अक्टूबर तक आवेदन करने के लिए जिन जिलों में जरूरत बतायी गई है उसके अनुसार अलीराजपुर, मुरैना, मऊगंज, मैहर, पांर्ढुना, टीकमगढ़ एवं उज्जैन हंै. आवेदन के लिए समाचार सेवा प्रभाग की वेबसाईट देखा जा सकता है.  

एनसीईआरटी को चाहिए सेके्रटरी

एनसीईआरटी ने सेक्रेटरी पद के लिए योग्य उम्मीदवारों से आवेदन बुलाये हैं. यह नियुक्ति प्रतिनियुक्ति, स्थानांतरण या अल्पकालिक संविदा के लिए पाँच साल के लिए अथवा निर्धारित 60 वर्ष तक की आयु के लिए जो पहले होगी. यह पद वेतन मैट्रिक्स के लेवल-13 के लिए है. अधिक जानकारी के लिए एनसीईआरटी के ऑफिशियल वेबसाइट सर्च की जा सकती है. 

कर्दम के कदम प्रेस क्लब में

इंदौर प्रेस क्लब का चर्चित इलेक्शन हो गया और निवृत्तमान चेयर पर्सन अरविंद तिवारी की टीम का दबदबा बना रहा. दीपक कर्दम ने अध्यक्ष की कुर्सी सम्हाल लिया तो अरविंद जोशी महासचिव बन गए. उपाध्यक्षद्वय का चेयर संजय त्रिपाठी एवं प्रियंका पांडे के पास तो कोष सम्हालेंगे मुकेश तिवारी. कार्यकारिणी सदस्यों में पूनम वर्मा, प्रमोद दीक्षित, अभय तिवारी, मनीष मक्खर, अंशुल मुकाती, श्याम कामले व विजय भट्ट शामिल हैं.

आवन-जावन का सेलिब्रेशन

सेंट्रल प्रेस क्लब, भोपाल पहली बार शायद जाने वाले आयुक्त जनसम्पर्क और नवागत आयुक्त जनसम्पर्क के लिए वेलकम पार्टी का आयोजन किया. आयुक्त जनसम्पर्क से कमिश्रर इंदौर बने डॉ. सुदाम खाड़े पहले और दूसरे कार्यकाल में पत्रकारों में लोकप्रिय रहे. नवागत आयुक्त जनसम्पर्क श्री दीपक सक्सेना का कलेक्टर जबलपुर रहते हुए प्रायवेट स्कूलों पर जो नकेल डाली थी, उससे अपने सख्त प्रशासन के लिए चर्चित रहे. विदाई वेलकम पार्टी सेंट्रल प्रेस क्लब, भोपाल के भवन में ना होकर अरेरा क्लब में किया गया.

ग्रामीण पत्रकारिता का बड़ा अवार्ड भास्कर को

ग्रामीण पत्रकारिता के लिए द स्टेट्समेन अवार्ड इस बार भास्कर के विशेष संवाददाता को मिला है. विजयपाल डूडी उदयपुर संस्करण में कार्यरत हैं. उन्हें बहुराज्यीय बाल तस्करी के मामले को उजागर करने के लिए यह सम्मान दिया गया है. ग्रामीण पत्रकारिता के लिए द स्टेट्समेन अवार्ड किसी भी रिपोर्टर के लिए सपना हो सकता है. खासतौर पर जब समूची पत्रकारिता महानगरीय केन्द्रित हो चला है. यहां बता देना उचित होगा कि ग्रामीण पत्रकारिता के लिए द स्टेट्समेन अवार्ड सबसे ज्यादा हासिल करने वाला देशबन्धु समाचार पत्र समूह है. ग्रामीण पत्रकारिता के लिए द स्टेट्समेन अवार्ड ग्रामीण पत्रकारिता करने वालों के लिए एक बड़ी उम्मीद है.

कौन होगा चेयरमैन 

निजी विश्वविद्यालय आयोग अध्यक्ष के लिए रिटायड आईएएस और पूर्व कुलपतियों ने दावेदारी पेश किया है। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो डॉ. नीलिमा गुप्ता का दावा मजबूत माना जा रहा है। उनका विकल्प चुना गया तो पूर्व आईएएस एपी सिंह हो सकते हैं। डॉ. नीलिमा गुप्ता  डॉकटर हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति रह चुकीं हैं। आयोग के पांच पदों के लिए 250 आवेदन करने की जानकारी मिली है। अकेले आयोग के अध्यक्ष पद के लिए 75 आवेदन उच्च शिक्षा विभाग को मिला है।ं वर्तमान सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है लेकिन नए पदाधिकारियों के आने तक यही लोग कार्य करते रहेंगे.

बातों ही बातों में

जैसा कि परम्परा रही है कि बड़ी कुर्सी के निकट कौन? दौड़ लगी रहती है नंबर बढ़ाने की तो इन दिनों एमसीयू के एक अध्यापक सबको पीछे छोडक़र आगे निकलते दिख रहे हैं. लगातार सोशल मीडिया में गुरु का आभार जताकर जो जता रहे हैं, वह सबको खबर है. बातें तो यह भी है कि बदलाव की भूमिका बन चुकी है और आने वाले समय में पत्थर से किस अहिल्या के भाग जागते हैं. अब बातें हैं बातों का क्या?

सोमवार, 15 सितंबर 2025

सीधी बात, नो बकवास




प्रो. मनोज कुमार

भीड़ को चीरते हुए एक परेशान नौजवान सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास जा पहुँचता है. अपनी तकलीफ बताता है और प्रमाण के तौर पर उनके सामने कागज धर देता है. बमुश्किल 20 सेकंड सुनने के बाद डॉ. यादव पास खड़े एसपी को आदेश देते हैं कि युवक के साथ धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ 420 का मामला दर्ज करें. एसपी के पास यश सर के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है. यह है ‘सीधी बात, नो बकवास’. बहुत कुछ सुनना और समझना है नहीं, तब जब मामला क्रिस्टल क्लियर हो. पहले मामला दर्ज होगा और फिर होगी विधानसम्मत कार्यवाही. अमन और दहशत का माहौल बन चला है. डॉ. यादव पीठ पर दिलासा देते और कार्यवाही होगी का आश्वासन देने से आगे निकल गए हैं. इन दिनों मछली जाल में फंसी हुई है. कानून अदालत अपना काम कर रही और जनसेवक के रूप में मोहन सरकार का अपना तेवर. कौन उनके साथ है और किसका भविष्य बिगड़ेगा या बनेगा, यह तो आने वाला समय तय करेगा लेकिन अपराधी और अपराधी से गठजोड़ करने वाले दहशत में हैं. आम नागरिक सुकून में है. ऐसे सीधे एक्शन की उम्मीद केवल उसने सिनेमा के पर्दे पर देखा था लेकिन आज वह खुद महसूस कर रहा है.  ‘365 नाटआउट’ से आगे चलते डॉ. मोहन यादव की सरकार का हिसाब-किताब देखें तो मध्यप्रदेश में सरकार के तेवर का पता चल जाएगा. कभी सख्त-सख्त तो कभी नर्म-नर्म सा तेवर लिए डॉ. मोहन यादव को समझना थोड़ा मुश्किल सा है. बचपन से अखाड़े के शौकीन डॉ. मोहन यादव डिग्री के लिहाज से पी.एचडी वाले डॉक्टर हैं लेकिन इलाज करने के मामले में सौफीसद असली डॉक्टर.

अपनी दुनिया में मस्त रहने वाले डॉक्टर मोहन यादव ने सोचा भी नहीं था कि कभी वे प्रदेश के सिरमौर होंगे लेकिन यह भी तय है कि उन्हें इसके पहले जो भी दायित्व मिला, उसकी सीरत और सूरत बदलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. मध्यप्रदेश में भाजपा दो दशक से सत्ता सम्हाल रही है तो वाजिब बात है कि लोगों की उम्मीद पर खरा भी उतरना था. यह डॉ. मोहन यादव के लिए चुनौती भरा था किन्तु अपने सांगठनिक क्षमता पर यकिन था. महाकाल के भक्त और सम्राट विक्रमादित्य के रास्ते पर चलकर सबका साथ, सबका विकास को अंजाम देने में जुट गए. चौतरफा योजनाओं और कार्यक्रमों को जनता के हक में फलीभूत करते रहे. उनकी प्राथमिकता थी कि केन्द्र सरकार की हरेक जनकल्याणकारी योजनाओं को जमीन पर उतारना. लोगोंं के जीवन को सुगम बनाना और वे अपने ‘365 नाटआउट’ से आगे सक्सेस भी होते दिख रहे हैं. यह बात कम लोगों को पता होगी और जिन्हें पता होगी, वे भूल गए होंगे कि शायद मध्यप्रदेश की स्थापना के बाद पहली बार अविस्मरणीय साम्प्रदायिक सद्भाव का चेहरा देखने को मिला वह भी उज्जैन जैसे संवेदनशील नगर में. इस महीने उज्जैनवासियों के लिए इम्तहान का समय आ गया था जब शहर के केडी मार्ग चौड़ीकरण के लिए धार्मिक स्थलों को हटाया जाना जरूरी हो गया था। उज्जैन ही नहीं, पूरा प्रदेश हैरान था कि शहर के विकास के लिए सभी धर्मों के लोग एकत्रित होकर स्वेच्छा से हटाना मंजूर कर लिया. रत्तीभर कोई आवाज विरोध में नहीं उठा बल्कि उठे तो हजारों हाथ उज्जैन के विकास के लिए.  केडी मार्ग चौड़ीकरण के लिए आपसी सामंजस्य एवं समन्वय से शांतिपूर्वक धार्मिक स्थलों को लोगों द्वारा स्वेच्छा से हटाना विकास की दिशा में सांप्रदायिक सौहार्द का उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करता हैं।.सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह रहा कि एकाध धार्मिक स्थल को हटाने का मसला होता तो बात कुछ और होती, यहां तो 18 धार्मिक स्थलों को हटाया जाना था. मोहन भिया का गुरुमंत्र काम आ गया और लोगों ने शांति और सामंजस्य से एक अनुकरणीय पहल की. यह पहल उज्जैन ही नहीं, पूरे देश के लिए नज़ीर बन गया. 

        ऐसा नहीं है कि धार्मिक स्थलों को हटाने के लिए पहुँचे जिला प्रशासन, पुलिस एवं नगर निगम की संयुक्त टीम की पेशानी पर शिकन ना हो लेकिन उन्हें भी उज्जैनवासियों पर पूरा भरोसा था। प्रशासन की इस कार्यवाही में केडी गेट तिराहे से तीन इमली चौराहे के जद में आने वाले 18 धार्मिक स्थलों को जनसहयोग से शांतिपूर्वक ढंग से हटाने की कार्रवाई की गई है. इस कार्य में धार्मिक स्थलों के व्यवस्थापकों, पुजारियों और लोगों द्वारा दिल से सहयोग किया गया. जिन 18 धार्मिक स्थलों को हटाया गया था, उनमें 15 मंदिर, 2 मस्जिद, एक मजार थे. केडी चौराहे से  पीछे करने और अन्यत्र स्थापित करने की कार्यवाही की गई हैं। हटाई गई प्रतिमाओं को प्रशासन द्वारा धार्मिक स्थलों के व्यवस्थापकों द्वारा बताए गए निर्धारित स्थान पर विधि विधान से स्थापित किया गया. साथ ही 20 से अधिक भवन जिनका गलियारा आगे बढ़ा लिया गया था. ऐसे भवनों के उस हिस्से को भी भवन स्वामियों द्वारा स्वेच्छा से हटाने की कार्यवाही की गई.

यह कामयाबी डॉ. मोहन यादव के लीडरशिप पर था तो यह भी जानते हैं कि मोहन भिया याने ‘सीधी बात, नो बकवास’. वे संवेदनशील भी हैं. हर साल पत्रकारों की बीमा की राशि बढ़ जाती है और फिर सरकार से गुहार लगाना पड़ता है लेकिन इस बार खुद आगे आकर पत्रकारों को राहत देने का ऐलान किया. इस मामले में नवनियुक्त आयुक्त दीपक सक्सेना का भी अहम भूमिका है. हालांकि राहत मिल जाने के बाद कुछ लोगों को पच नहीं रहा है. खैर, यह उनकी समस्या है. जिस पर विपदा टूटती है और इस बीमा से राहत के चार छींटें ही सही, वह इसकी कीमत जानता है. ‘सीधी बात, नो बकवास’ का यह नमूना भी जान लें कि आरोपियों को पुलिस और कानून से तो सजा मिल रही है, मिलेगी भी, उनका साम्राज्य नेस्तनाबूद कर दिया. मछली तो पहले ही जाल में फंसकर अपना सबकुुछ गंवा चुकी है. तभी तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कहते हैं- कोई मछली मरगमच्छ नहीं बचेगा. सब कुछ ठीक है, कहना ठीक नहीं होगा लेकिन सब कुछ ठीक हो रहा है, इससे कौन इंकार कर सकता है. मध्यप्रदेश में सम्राट विक्रमादित्य की न्याय व्यवस्था के वे पक्षधर हैं. और वे इस दिशा में आगे भी बढ़ रहे हैं. मध्यप्रदेश विशाल है और चुनौतियां भी विशाल तो इसे सुलझाने में वक्त तो लगेगा लेकिन दहशतगर्द जान गए हैं कि मध्यप्रदेश का नया डॉयलाग है-‘सीधी बात, नो बकवास’ (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

कैंपस कॉरिडोर


 एमसीयू को मिले कुलाध्यक्ष

सी.पी. राधाकृष्णन देश के 15वें  उपराष्ट्रपति होंगे और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के नए कुलाध्यक्ष होंगे. उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ के इस्तीफे बाद से विश्वविद्यालय का कुलाध्यक्ष पद रिक्त था. 12 सितंबर को पदभार ग्रहण करने के बाद श्री राधाकृष्णन कुलाध्यक्ष होंगे. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के विधान के अनुरूप देश के उपराष्ट्रपति कुलाध्यक्ष होते हैं. विश्वविद्यालय के पहले कुलाध्यक्ष श्री भैरोसिंह शेखावत रहे. मो. हामिद अंसारी, श्री एम. वेंकैया नायडु एवं श्री जगदीप धनखड़ के पश्चचात श्री राधाकृष्णन पाँचवें कुलाध्यक्ष होंगे.

अज़ीमजी प्रेमजी स्कॉलरशिप

अज़ीम प्रेमजी स्कॉलरशिप पहल के तहत ज़रूरतमंद छात्राओं को कॉलेज शिक्षा हासिल करने के लिए मदद की जाती है। इस स्कॉलरशिप के तहत कॉलेज की शिक्षा हासिल करने के लिए मदद के तौर पर वार्षिक 30,000 रुपयों की सहायता की जाती है.  यह स्कॉलरशिप छात्राओं के पहले ग्रैजुएशन के लिए डिग्री या डिप्लोमा पूरा होने तक उपलब्ध कराई जाएगी.स्थानीय सरकारी स्कूलों या कॉलेज से 10वीं और 12वीं कक्षा नियमित विद्यार्थी के रूप में पास होना अनिवार्य है. यह स्कूल नीचे बताए गए राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में होना चाहिए।आवेदन के समय भारत में कहीं भी सरकारी संस्थान या विश्वसनीय प्रामाणिक निजी कॉलेज या विश्वविद्यालय के मान्यता प्राप्त स्नातकउपाधिया डिप्लोमा (2 से 5 वर्षों की समयावधि वाले) के प्रथम वर्ष (2025-26 के अकादमिक सत्र) में नियमित छात्रा के रूप में प्रवेश प्राप्त किया होना चाहिए. पहले चरण के आवेदन की प्रक्रिया आरंभ हो चुका है. अधिक जानकारी या सवाल के लिए अज़ीमजी प्रेमजी स्कॉलरशिप के वेबसाइट को देखें 

पीएचडी करें यहां से

सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी में पीएचडी के लिए आवेदन की आखिरी तारीख 15 सितंबर है। दिसंबर 2024 और 25 नेट, जेआरएफ स्टूडेंट्स ही पात्र होंगे। अधिक जानकारी के लिए विवि की वेबसाइट देखें। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में पीएचडी के लिए ऑनलाइन आवेदन करने की तारीख 17 सितंबर है।

इग्नू में बचा है मौका

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में अब एडमिशन 15 सितंबर तक होंगे। साथ में 200 रुपया अदा कर इसी तारीख तक री रजिस्ट्रेशन कराया जा सकता है। जिन्हें एडमिशन लेना है, वह इग्नू की वेबसाइट देखें। 

कुलपति बनें इलाहाबाद में

भारत सरकार शिक्षा मंत्रालय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए आवेदन बुलाए हैं। जारी विज्ञापन के मुताबिक 2 अक्टूबर तक ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। आवेदक से अपेक्षा की गई है कि सत्यनिष्ठा, नैतिकता और संस्था के प्रति प्रतिबद्ध हो। अकादमिक योग्यता के साथ प्रशासनिक दक्षता अनिवार्य है। 

गोविंद का अनुष्ठान 

ब्यावरा में एक हैं गोविंद बडोने जो अपने आप में मिसाल हैं। वे देश के संभवतः एकमात्र पत्रकार हैं जो अपने संस्थान नवभारत के संस्थापक रामगोपाल माहेश्वरी जी के स्मरण में 26 वर्षों से निरंतर संवाद का आयोजन करते चले आ रहे हैं। आयोजन भी भव्य होता है। इस वर्ष भी नीयत तारीख 13 को यह अनुष्ठान होने जा रहा है। वे देश भर से विषय विशेषज्ञ एवं पत्रकारों को बुलाते हैं। गोविंद के इस समर्पण के लिए सेल्यूट करना तो बनता है। 

आइआइएमसी में बनें प्रोफेसर

आइएमएमसी ने देश भर में स्थापित अपने सेंटर्स के लिए प्रोफेसर और असिसटेंट प्रोफेसर के लिए वेंकेसी एडवाटाइज की है. आइजोल, मिजोरम, अमरावती, महाराष्ट्र, ढेकनाल, उड़ीसा, जम्मू जम्मू एंड कश्मीर एवं कोट्टायम, केरला में मॉस कम्युनिकेशन एवं जर्नलिजम के लिए विभिन्न भाषाओं में पढ़ाने वाले चाहिए. प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार एक पद प्रोफेसर एवं 20 पोस्ट असिसटेंट प्रोफेसर के लिए आवेदन मांगे गए हैं. 6 अक्टूबर के पहले ऑनलाइन आवेदन करना होगा. अधिक जानकारी के लिए आइएमएमसी की ऑफिशियल वेबसाइट देखा जा सकता है.  

बातों ही बातों में

इन दिनों अखबारों ने अपनी अपनी पसंद के लोग चुन लिए हैं. एक अखबार एक व्यक्ति की तर्ज पर उसी अखबार में खबर छपेगी, जिसकी पसंद का हो. और तो और पसंद का व्यक्ति फेसबुक में लिख रहा है तो वह भी खबर की सूरत में पढ़ सकते हैं. वैसे कभी मीडिया से दूर रहने वाले एक बुजुर्ग इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर अखबार और पत्रकारों से रूबरू हो रहे हैं. सुनते हैं कि किसी ने सलाह दी है कि ये आखिरी पारी है. अब ये बातें हैं बातों का क्या

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