रविवार, 28 नवंबर 2010

samaj

लोकतंत्र में राजशाही का दबदबा बता गया किचन शेफ

मनोज कुमार
भारत में लोकतांत्रिक सरकार के चौंसठ बरस होने जा रहे हैं। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजा का बाजा बहुत पहले श्रीमती इंदिरा गांधी ने बजा दिया था। प्रीविपर्स की समाप्ति के साथ राजा-रजवाड़े के दिन लद गये थे। वे अपनी सम्पत्ति के साथ अपने महलों में राज कर रहे थे। उन्हें राजा कहना या उन्हें सलामी देने की बाध्यता समाप्त हो गयी थी। अपनी भावी पीढ़ी को भी मैं यही बताता रहा हूं कि भारत में लोकतंत्र का उदय हो चुका है और राजशाही के दिन लद गये हैं। किन्तु तीन दिन पहले अक्षय कुमार के रियलिटी शो किचन शेफ देखते समय अंदाज हुआ कि भारत में लोकतंत्र और राजशाही दोनों साथ साथ चल रहे हैं। समानांतर सत्ता की तरह। थोड़ा विस्तार में बता दें।
किचन शेफ उन लोगों के लिये है जो विभिन्न किस्म के खाना बनाना जानते हैं और जो इनमें सबसे ज्यादा हुनरमंद होगा, उन्हें किचन शेफ ऐलान किया जाएगा। विभिन्न पड़ावों से होता हुआ यह प्रोग्राम जब ढाबे पर प्रतियोगियों को जांचने पहुंचा तो भला लगा कि फाईव स्टार होटल ही नहीं, ढाबे के खाने का सलीका भी होना चाहिए। मेरी यह खुशी थोड़े समय तक ही रही क्योंकि प्रोग्राम अब राजस्थान एक राजदरबार में पहुंच गया था। कभी रहे होंगे राजा किन्तु अक्षय उन्हें श्रीजी कह कर पुकार रहे थे। गुलामी की भाषा हिज हाइनेस कह रहे थे। स्वाभाविक है कि प्रतियोगियों को भी यही सब कहना था।
अक्षय अपने राजा साहब के लिये बार बार जोर देकर कह रहे थे कि श्रीजी को इंतजार की आदत नहीं है। वे दो बजे खाना खाते हैं। यह कहते हुए अक्षय भूल गए थे कि उनके श्रीजी इस वक्त खाने के लिये नहीं, एक जज के तौर पर थे और उन्हें प्रोग्राम के मुताबिक चलना था न कि उनके मुताबिक प्रोग्राम। अब जब राजा कह कर संबोधन दिया जा रहा है तो गुलाम जनता की क्या मजाल कि वे अपने मुताबिक चल सकें। जिस तरह श्रीजी को सलामी ठोंक अनुमति ली गयी और भोजन परोसा गया, उसने सचमुच की राजशाही के दिनों की याद दिला दी। बच्चे बड़े जिज्ञासा से पूछते हैं कि राजा ऐसे होते थे? उन्हें इस तरह सलामी दी जाती थी।
इस पूरी कहानी का मकसद श्रीजी की भव्यता सुनाना नहीं है बल्कि यह बताना है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के कोने कोने में राजशाही व्यवस्था लागू है। ये राजशाह लोकतंत्र का माखौल उड़ा रहे हैं। यह शानो-शौकत उनका निजी मामला हो सकता है किन्तु करोड़ों दर्शकों के लिये बनाये जा रहे प्रोग्राम के जरिये किसी राजा को महिमामंडित करने का अर्थ देश की करोड़ों जनता का अपमान करना है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजा और प्रजा एक हैं। यहां चुनी हुई सरकारें काम करती हैं। संविधान एक है। ऐसे में इस तरह के प्रोग्राम से आयोजकों को आर्थिक लाभ हो सकता है किन्तु देश की भावना पर जो जख्म लगते हैं, उसकी भरपायी कैसे होगी?

शनिवार, 27 नवंबर 2010

sarkar ka din

२९ नवम्बर २०१० के लिये विशेष

हमारे समय के रॉबिनहुड - शिवराजसिंह चौहान

-मनोज कुमार-

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इन दिनों वनवासी सम्मान यात्रा पर निकले हुए हैं। यात्रा का तीसरा दौर समाप्त हो चुका है और आने वाले उन्तीस नवम्बर तक पूरे प्रदेश में उनकी यात्रा पूरी हो जाए। वनवासी सम्मान यात्रा के दौरान उन्होंने शिद्दत के साथ परतंत्रता के दौर के रॉबिनहुड यानि जननायक टंट्या मामा को याद किया। उनकी यादों को स्थायी बनाने के लिये प्रयास कर रहे हैं। टंट्या मामा से लेकर आज तक का समय बदल चुका है। रॉबिनहुड यानि जननायक हर दौर में हुए हैं। कुछ को याद किया गया तो कुछ भुला दिये गये। टंट्या मामा उन लोगों में हैं जिन्हें भुला देने का अर्थ अपनी परम्परा को भुला देना है किन्तु बदलते समय में हमारे बीच जो जननायक हुए उन्हें भुला देना भी उचित नहीं होगा। अब सवाल यह है कि हमारे समय का कौन है जननायक? किसे हम रॉबिनहुड मानें और इसे मानने के पीछे का मापदंड क्या हो? सवाल कठिन है किन्तु जवाब बहुत मुश्किल नहीं। खासतौर पर उस दौर में सवाल का जवाब ढूंढ़ना मुश्किल नहीं है जब देश के सबसे बड़े और ह्दय प्रदेश मध्यप्रदेश पुर्नगठित हो गया हो और उसके पुनर्गठन के दस बरस गुजर चुके हों। बेशक हमारे समय के जननायक शिवराजसिंह चौहान हैं और वे इसलिये नहीं कि वे राज्य के मुख्यमंत्री हैं बल्कि इसलिये कि जो काम परतंत्रता काल में टंट्या मामा ने किया था वही काम आज के दौर में शिवराज मामा कर रहे हैं। तंत्र को पारदर्शी बनाकर, भूमाफियाओं से कब्जे छुड़ाकर और गरीबों, महिलाओं और बच्चों को उनके अधिकार दिलाकर। अपने पांच बरस के कार्यकाल में शिवराजसिंह ने सरकार और आम आदमी के बीच की दूरी खत्म कर जननायक बन गये हैं। यह भी संयोग है कि वनवासी सम्मान यात्रा की शुरूआत टंट्या मामा को स्मरण कर वह शिवराजसिंह कर रहे हैं जिन्हें हमारे समय में हमारे समाज ने बच्चों के मामा होने का सम्मान दिया है।

सन् दो हजार में मध्यप्रदेश का विभाजन हुआ और उससे अलग कर छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण किया गया। छत्तीसगढ़ नवनिर्मित राज्य बना तो मध्यप्रदेश विभाजित होकर पुर्नगठित हो गया। हालांकि इस मायने में पुर्नगठन शब्द उचित नहीं है क्योंकि छत्तीसगढ़ के अलग हो जाने के बाद भी मध्यप्रदेश की भौगोलिक आकार ही छोटा हुआ और कोई बदलाव नहीं आया। सन् उन्नीस सौ छप्पन में नवगठित मध्यप्रदेश और चौंतीस बरस बाद विभाजित मध्यप्रदेश में तीन साल बाद दो हजार तीन में पहला विधानसभा चुनाव हुआ। इस चुनाव में दस साल से सत्तासीन कांग्रेस को बाहर कर भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत के साथ प्रदेश की कमान सम्हाल ली। छत्तीसगढ़ में भी गैरकांग्रेसी सरकार ने सत्ता सम्हाल ली थी। अविभाजित मध्यप्रदेश में भी गैरकांग्रेसी सरकारें रही हैं किन्तु इस बार गैरकांग्रेसी दल का सरकार बनाने का अर्थ कई मायने में भिन्न था। यह बदलाव का संकेत था तो एक नये युग में प्रवेश का संदेश भी। पुराना अनुभव यह बताता रहा है कि अविभाजित मध्यप्रदेश में गैरकांग्रेसी सरकारों का जीवन लम्बा नहीं रहा है। इस बार भी यही आशंका थी लेकिन समय गुजरने के साथ आशंका निर्मूल साबित हुई। पहले पांच बरस भाजपा सरकार ने सफलतापूर्वक राज किया तो दूसरी बार दो हजार आठ के चुनाव में कब्जा कायम रहा। राजनीतिक विश्लेषकों को यह बदलाव चौंका गया। अनेक तरह के विश्लेषण हुए और इस बदलाव के पीछे कई कारक बताये और बनाये गये।

छत्तीसगढ़ नवगठित राज्य है इसलिये कहा जा सकता है कि यह बदलाव वर्षाें से उपेक्षित रहने का परिणाम है किन्तु मध्यप्रदेश के साथ यह बात लागू नहीं होती है। इस बरस मध्यप्रदेश अपनी उम्र के चौंवन साल पूरे कर चुका है और भाजपा सरकार आठ बरस। गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान दो पारियों में किन्तु लगातार पांच वर्ष मुख्यमंत्री रह कर मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा चुके हैं। मध्यप्रदेश में किसी गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री के लगातार पांच वर्ष पूरे करने को सहजता से नहीं लिया जा सकता है बल्कि इसके पीछे के कारणों की तलाश करेंगे तो यह बात सहज रूप से सामने आएगी कि वे हमारे समय के रॉबिनहुड हैं और जिन्हें सही मायने में समाज का जननायक कहा जा सकता है। अवसर विशेष पर ऐसे विशेषण दिये जाने की परम्परा है किन्तु यह शायद पहला अवसर होगा जब जननायक शब्द उनके लिये विशेषण न रहकर एक सच्चाई है। आइए इस जननायक शब्द की पड़ताल कर लें।

दो हजार तीन में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो सहज रूप से चुनाव का बागडोर सम्हालने वाली तत्कालीन भाजपा नेत्री उमा भारती को मुख्यमंत्री बनाया गया। एक साल बीतते बीतते कानूनी बाध्यता के चलते उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और उनके स्थान पर भाजपा के वरिष्ठ नेता बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया। संयोग से भाजपा के आंतरिक कलह के चलते गौर को भी मुख्यमंत्री पद का त्याग करना पड़ा। उमा के बाद गौर की रवानगी के बाद सर्वमान्य नेता के रूप में शिवराजसिंह चौहान का चयन मुख्यमंत्री के रूप में किया गया। उनकी छाप एक सौम्य एवं मृदुभाषी राजनेता की रही है। वे लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं और प्रदेश की राजनीति में उनका दखल कम रहा है। उन्हें जब मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गयी तो यह माना गया कि उमा और गौर की तरह थोड़े समय में उनकी विदाई हो जाएगी। समय समय पर कयास लगाये गये और उनके विरोधियों ने विवाद की स्थिति भी उत्पन्न की किन्तु सारे अनुमान और विरोध भोथरे पड़ गये और दिन-पर-दिन शिवराजसिंह चौहान एक कामयाब और सफल जननायक के रूप में स्थापित हो गये।

मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह ने उन्नतीस नवम्बर दो हजार पांच को शपथ ली तब सुनहरे भविष्य संभावनाएं कम और आशंका अधिक थी। आरंभिक दिन भी कुछ ऐसे गुजरे। एक किसान परिवार के बेटे और और एक सांसद के रूप में पांव पांव वाले भइया के नाम पर ख्याति पाने वाले शिवराजसिंह की सौम्यता एवं सादगी पर अफसरशाही के हावी हो जाने की आशंका बनी हुई थी किन्तु यह खबर नहीं थी कि जनता का प्रतिनिधि जनता के हक में काम करने के लिये बेलगाम अफसरशाही को कस भी सकता है और ठीक भी कर सकता है। आहिस्ता आहिस्ता दिन गुजरने लगे और शिवराजसिंह सरकार की कार्यशैली से तंत्र का परिचय होने लगा। अफसरशाही की आवाक और आम आदमी खुश। एक साल पूरा होते न होते शिवराजसिंह आम आदमी की उम्मीदों पर खरा उतरने लगे थे। लाडली लक्ष्मी योजना लागू कर उन्होंने मातृशक्ति का वि·ाास जीत लिया था। लिंगभेद को कम करने में उनके प्रयास एक ओर जहां सार्थक बना वहीं मां-बाप के चेहरे से चिंता की लकीरें मिटने लगीं। कल तक की अभिशप्त बेटियां आज हर परिवार के लिये लाडली लक्ष्मी बन गयी हैं। राजनीति में स्त्रियों की पचास फीसदी भागीदारी सुनिश्चित कर उन्होंने जता दिया कि उनकी कथनी और करनी एक है। उन्होंने इस बात का दावा नहीं किया कि वे भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा देंगे लेकिन भ्रष्टाचार की जड़ पर चोट करने में वे पीछे नहीं रहे और इसी मंशा के तहत उन्होंने कह दिया कि महिला एवं बच्चों की योजनाओं में गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं होगी। सत्ता में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कर भ्रष्टाचार पर अंकुश पाने की उनकी पहल को देशव्यापी पहचान मिली।

अपने पहले एक साल की शुरूआत के साथ उनकी छवि जननायक की बन गयी। यह छवि प्रदेश के आखिरी छोर तक तब पहुंची जब उन्होंने मुख्यमंत्री की चौपाल कार्यक्रम का आगाज किया। हर वर्ग और हर हुनर के लिये उन्होंने उन गुमनाम लोगों के लिये मुख्यमंत्री निवास का दरवाजा खोल दिया जो कभी आम आदमी के लिये तिलस्म बना हुआ था। पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने भी आम आदमी को जोड़ने की गरज से दरबार लगाते रहे हैं किन्तु उन अभियानों में मुख्यमंत्री के राजा होने की धमक होती थी किन्तु शिवराजसिंह के चौपाल में आम आदमी के शिवराजसिंह के साथ होने का अहसास था। आजादी के बाद से गांव की सुरक्षा में जुटे कोटवार को मुख्यमंत्री, उनके निवास तो दूर की बात, राजधानी भोपाल आना भी मयस्सर नहीं था लेकिन मुख्यमंत्री की पाती पर न केवल उनका सपना सच हुआ बल्कि मुख्यमंत्री के साथ बैठकर भोजन कर उन्होंने पहली दफा शायद स्वतंत्र होने का अर्थ भी समझा होगा। यही अनुभव अन्नदाता कहलाने वाले किसान, भूमिपुत्र आदिवासी, गृहलक्ष्मी मातृशक्ति, आर्थिक क्षमता बढ़ाने वाले कारोबारी, खेल के मैदान में जौहर दिखाने वाले खिलाड़ी और अनजाने, गुमनाम सिद्वहस्त कारीगरों को भी मिला।

मुख्यमंत्री की चौपाल मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के विरोधियों के लिये एक सस्ती लोकप्रियता थी किन्तु जमीनी स्तर पर सरकार की जो पकड़ बनी, उसका अंजाम दो हजार आठ के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला जब भारतीय जनता पार्टी दुबारा उसी ठाठ से प्रदेश की सत्ता में लौट आयी। विनम्र मृदुभाषी शिवराजसिंह के लिये यह जीत उनकी जीत नहीं थी, जनता जीत थी, भाजपा की जीत थी। वे एक आम कार्यकर्ता के भांति पहले की तरह खुद को बनाये रखा। मुख्यमंत्री बन जाने के बाद आमतौर पर लुक बदल जाता है किन्तु शिवराजसिंह मुख्यमंत्री तो बन गये लेकिन अपना लुक नहीं बदला। उसी पाजामा-कुर्ते में बने रहे। अफसरशाही ने कोशिशें की होंगी लेकिन वे नाकायाब हो गये। अफसरशाही मुख्यमंत्री को संवारना जानती है और शिवराजसिंह चौहान जनता की नब्ज पहचानते हैं। जनता को अपने बीच का अपने जैसा नेता चाहिए और शिवराजसिंह वैसे ही बने रहे जैसा कि वे अपने आरंभिक दिनों में थे। यही कारण है कि वे पांच बरस में मुख्यमंत्री न रहकर जननायक बन गये।

शिवराजसिंह के जननायक बनने की कहानी टंट्या मामा की कहानी से अलग नहीं है। कोई बात अलग है तो समयकाल की। टंट्या मामा परतंत्रता के दौर के जननायक थे तो शिवराजसिंह हमारे समय के जननायक हैं। टंट्या मामा के लिये दुश्मनों से लड़ना आसान नहीं था तो मुश्किल भी नहीं क्योंकि दुश्मनों के लिये निर्मम हो जाने में कोई तकलीफ नहीं होती है किन्तु शिवराजसिंह के लिये यह मुश्किल का दौर है। मुश्किल इसलिये कि उन्हें दुश्मनों से नहीं बल्कि अपने ही उन लोगों से लड़ना है जो अपने स्वार्थ के लिये अपने ही लोगों के दुश्मन बन गये हैं। मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह ने यह चुनौती भी मंजूर की। एक आम आदमी का सपना होता है कि उसका अपना घर बने और प्रदेश में भूमाफियाओं का जाल ऐसा था कि चौवन बरस में किसी सरकार ने उन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं की। शिवराजसिंह ने भूमाफियाओं पर नकेल डालने की न केवल हिम्मत दिखायी और कार्यवाही की। राज्य के अनेक हिस्सों में हजारों लोगों ने राहत की सांस ली। जिन भूमाफियाओं के खिलाफ कार्यवाही शुरू हुई उन्हें यह बात रास नहीं आयी लेकिन वे बेबस बने हुए हैं।

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह की यह कार्यवाही टंट्या मामा की उस कार्यवाही की तरह है जिसमें टंट्या मामा ने अंग्रेजों के हाथों से छीन कर गरीबों में बांट दिया। कुछ कुछ शिवराजसिंह चौहान भी इसी तरह की कार्यवाही कर रहे हैं। भूमाफियाओं के हाथों से गैरकानूनी ढंग से हथियायी गयी सम्पत्ति को वाजिब हकदारों को दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह की नजर अफसरशाही पर भी है जो अकूत धनसंपदा के मालिक हैं। ऐसे कई अफसरों के खिलाफ कार्यवाही की। सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों पर नियंत्रण पाने के मकसद से दुनिया में पहली दफा लोकसेवा गारंटी अधिनियिम मध्यप्रदेश सरकार ने पारित किया। अपनी जिम्मेदारी से कोताही बरतने वाले अफसर और कर्मचारी हर आदमी के लिये जवाबदार होंगे। आने वाले दिनों में जनप्रतिधियों को भी इस कानून की जद में लाने की कोशिश है। एक तरफ सूचना का अधिकार और दूसरी तरफ लोकसेवा गारंटी अधिनियिम ने तंत्र को पारदर्शी बना दिया है।

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

REPORTER: rone ke liye hum nahi

REPORTER: rone ke liye hum nahi

rone ke liye hum nahi

विलाप नहीं, कीमत खुद तय करें

-मनोज कुमार

एक नौजवान पत्रकार साथी ने शोषण के संदर्भ में एक अखबार कह कर जिक्र किया है और संकेत के तौर पर साथ में एक टेबुलाइड अखबार देने की बात भी कही है। समझने वाले समझ गये होंगे और जो नहीं समझ पाए होंगे, वे गुणा-भाग लगा रहे होंगे। यहां पर मेरा कहना है कि एक तरफ तो आप शोषण की कहानी साथियों को बता सुना रहे हैं और दूसरी तरफ आपके मन में डर है कि अखबार का नाम बता देने से आपका भविष्य संकट में पड़ सकता है। आप नौजवान हैं और पत्रकारिता के चंद साल ही हुए हैं। अपने आरंभिक दिनों में यह डर मुझे कुछ ठीक सा नहीं लगता है। बोलते हैं तो बिंदास बोलिये वरना खामोशी ही बेहतर।

पत्रकारिता में आने वाले हर साथी से हमारा आग्रह है और उन्हें सलाह भी कि पत्रकारिता में हम तो गंवाने ही आये हैं, कमाना होता तो इतनी काबिलियत है कि कहीं बाबू बन जाते और बैठकर सरकार को गालियां देते रहते। ये हमारी फितरत में नहीं है। इस तस्वीर को बदलने के लिये ही हम आए हैं। जहां तब बात शोषण की है तो सभी को यह समझ लेना चाहिए कि यह शोषण हमारी ट्रेनिंग की पहली सीढ़ी है। जब हम खुद शोषित होते हैं तो पता चलता है कि समाज में शोषण किस स्तर पर हो रहा है। मैं शोषण की तरफदारी नहीं कर रहा हूं लेकिन यह जरूर कहता हूं कि आप काबिल हैं तो अपनी कीमत खुद तय कीजिए। आपको लगता है कि आपकी एक रिपोर्ट/लेख की कीमत पांच हजार है तो उतना मांगिये और नहीं दे तो रिपोर्ट/लेख लिखने की जरूरत ही नहीं। ऐसी बातों से कुंठित होकर आप अपना समय खराब कर रहे हैं। देश के नामचीन अखबारों में शोषण आम बात है।

लगे हाथ को आपको एक मिसाल दे जाऊं, शायद अच्छा लगे और आपके काम आए। पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात काफी अर्से से चल रही है। आप जैसे कुछ नौजवान साथियों से इस बारे में मैंने बात की। वे भी इस बात के पक्षधर थे। मैंने उनसे एक सवाल किया कि देश के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार में आप नौकरी करते हैं और महीने में आपको दस हजार की तनख्वाह दी जाती है। इसके बदले में आप माह भर में दस एक्स्कूलसिव खबरें देते हैं। यानि हर खबर की कीमत एक हजार रुपये। वे मेरी बात से सहमत हुए लेकिन पूरी तरह नहीं। वे तब भी यह मानने को तैयार नहीं कि पत्रकारिता व्यवसायिक नहीं हुई है। आखिरकार मुझे थोड़ा गुस्सा आया और सच से उन्हें वाकिफ करना पड़ा कि उस अखबार का सर्कुलेशन एक लाख हो तो आपको दस पैसे के हिसाब से भुगतान किया जाता है। दस पैसे की पत्रकारिता और बातें बड़ी बड़ी। तो आपने कहा है कि दो सौ से एक हजार रुपये तक का भुगतान किया जाता है तो यहां भी मामला एक खबर का भुगतान दस पैसे जैसा ही है। वे पाठक से अखबार की कीमत तीन रुपये और कहीं कहीं अधिक वसूलते हैं और बदले में पाठक को पूरे अखबार की खास खबर के नाम पर एकाध रुपये की खबर देते हैं। शेष खर्चा तो प्रबंधन में होता है।

दोस्त, सच यही है और इस सच से आप मुंह चुराएंगे या विलाप करेंगे तो स्थिति नहीं बदलने वाली। यदि आप इतने ही दुखी हैं तो साहसी साथियों को साथ लेकर कोई उपक्रम कीजिये और यह मेहनत अपने लिये कीजिये। मेरे लिये कहना आसान है किन्तु इसे व्यवहार में लाना कठिन। फिर आपको यह भी पता होना चाहिए कि पत्रकारिता में आने के लिये आपको किसी ने आमंत्रण नहीं दिया। स्थितियों को बदलने की आग लेकर पत्रकरिता के मैदान में आयें हैं तो चुनौती का सामना करना भी सीखें। मुझे वह दिन देखना है जब आप जैसे साथी कहीं लिखेंगे कि आपने अपनी कीमत खुद पहचान ली है। चलते चलते मैं बता दूं कि एक भड़ास जैसे एक नयी नवेली मीडिया वेबसाइट का निमंत्रण आया कि मैं उनके लिये लिखूं तो मैंने फौरन पूछ लिया कि कितने पैसे दोगे? तो उनका जवाब था कि हमारे यहां नीति नहीं है भुगतान की। जब उनके पास भुगतान की नीति नहीं है तो मैंने कहा था कि वेबसाइट लांच करो। बावजूद इसके वह वेबसाइट चल रही है और चलेगी भी। भड़ास पर लिखता हूं तो अपनी मर्जी से। स्वयं के आनंद के लिये और जब लगेगा कि यशवंत भाई से भी मेहनताना मांगा जाए तो पीछे नहीं हटूंगा।यह भी सच है कि आपको यह पता होना चाहिए कि गुंबद हमेशा से चमकदार होती है किन्तु बुनियाद का कोई नामलेवा नहीं होता है। विलाप नहीं, क्रांति कीजिए और शोषकों से लोहा लीजिए। 

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

Samagam

समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत

भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत है। मीडिया के विस्तार एवं विकास के दौर में भी जनजातीय पत्रकारिता हमेशा से अछूती रही है। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ समेत अनेक राज्य हैं जहां की आदिवासी आबादी बहुलता में है। इन राज्यों में भी कभी जनजातीय पत्रकारिता को स्थान नहीं दिया गया। समागम ने एक कोशिश की है। नामचीन पत्रकार, साहित्यकार एवं शोधार्थियों के आलेख इस अंक में शामिल किया गया है, इस उम्मीद के साथ की मीडिया में इस विषय पर चर्चा होगी। आज नहीं तो कल जनजातीय पत्रकारिता को भी ग्रामीण पत्रकारिता की तरह स्वरूप मिल सकेगा।

बुधवार, 3 नवंबर 2010

Media

जनजातीय पत्रकारिता शिक्षा की जरूरत

मनोज कुमार

हिन्दुस्तान का ह्दय प्रदेश मध्यप्रदेश की पहचान एक बड़े हिन्दी एवं आदिवासीबहुल प्रदेश की है। अलग अलग अंचलों यथा भोपाल रियासत, मालवा, विंध्य, महाकोशल, बुंदेलखंड एवं छत्तीसगढ़ को मिला कर चौवन साल पहले नये मध्यप्रदेश का गठन किया गया था। दस वर्ष पहले छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश से अलग होकर पृथक राज्य की पहचान बना ली किन्तु अपनी स्थापना के साथ ही अविभाजित मध्यप्रदेश निरंतर अपनी पहचान के लिये संघर्षरत रहा है। उसका यह संघर्ष अभी भी समाप्त नहीं हुआ है। ऐसा भी नहीं है कि इन सालों में उसने विकास नहीं किया या समय के साथ कदमताल करने में पीछे रहा किन्तु कुछ बुनियादी कमियों के चलते मध्यप्रदेश की छवि एकजाई नहीं बन पायी। मध्यप्रदेश की बात शुरू होती है तो उसकी परम्परा और सांस्कृतिक विरासत को लेकर। अपने जन्मकाल से पहले ही मध्यप्रदेश की धरा हमेशा से साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में सम्पन्न रहा है। उसकी यह सम्पन्नता समय के साथ और भी बढ़ी है। इस बात का साक्षी रजतपट भी बन गया है। मुंबई के बाद अब मायानगरी बनने के लिये मध्यप्रदेश फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद बनती जा रही है। राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के अनेक हिस्सों में पहले भी कई फिल्मों की शूटिंग हुई है और अब इसकी संभावना बढ़ चली है। भोपाल में फिल्म सिटी के लिये स्थान का चयन भी हो चुका है।
मध्यप्रदेश में भाषायी फिल्म निर्माण में हमेशा संकट बना रहा है और आने वाले समय में भी इसे दूर किया जाना संभव नहीं दिखता है। ऊपर जैसा कि हमने कहा कि मध्यप्रदेश का निर्माण विभिन्न अंचलों को लेकर हुआ है तो स्थानीय बोली में बनने वाली फिल्में उस खास अंचल का प्रतिनिधित्व करती हैं न कि समूचे मध्यप्रदेश का। उदाहरण के तौर पर मालवा क्षेत्र में बनने वाली क्षेत्रीय भाषायी फिल्म मालवा का प्रतिनिधित्व करती है तो बुंदेली में बनने वाली क्षेत्रीय भाषायी फिल्म बुंदेलखंड की होगी न कि समूचे मध्यप्रदेश की। यह हाल राज्य के दूसरे अंचलों की भी है। इसे दूसरी तरह से देखें तो दस साल पहले मध्यप्रदेश से पृथक होकर छत्तीसगढ़ राज्य को अपनी पहचान के लिये इस तरह का संघर्ष नहीं करना पड़ रहा है। वहां बनने वाली फिल्में छत्तीसगढ़ी फिल्में कहलाती हैं और सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। छत्तीसगढ़ को लगातार और बड़ी संख्या में बनने वाली फिल्मों के कारण छालीवुड नाम भी दिया गया है। मध्यप्रदेश के सामने यह संकट है और बना रहेगा।

मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में फिल्म निर्माण में आदिवासी समुदाय की हमेशा से अनदेखी की गई है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में शासन स्तर पर तो कुछ फिल्मों का निर्माण किया जा रहा है किन्तु सरकारी होने के ठप्पे से वे बरी नहीं हो पायी हैं। मध्यप्रदेश ने एक कदम आगे बढ़कर अन्तर्राष्ट्रीय जनजाति फिल्मोत्सव का आयोजन भी कर रहा है किन्तु इस आयोजन का प्रभाव अभी देखने को नहीं मिला है। इस आयोजन से प्रभावित होकर निजी फिल्म निर्माता यदि रूचि दिखाते हैं तो मध्यप्रदेश का स्वरूप एक बड़े केनवास में देखने को मिल सकेगा। निजी फिल्म निर्माताओं की एक सबसे बड़ी बाधा यह है कि जब वे आदिवासी समुदाय पर फिल्म बनाने का काम करते हैं तो उन्हें उनके शोषण की कहानी ही मिलती है। यह सच है कि आदिवासी समाज का शोषण होता रहा है और समय के साथ इसमें बदलाव की गुंजाईश से भी इंकार नहीं किया जा सकता है किन्तु सिर्फ उनके शोषण को केन्द्र में रखकर फिल्म निर्माण की सोच आदिवासी समाज के साथ अन्याय होगा। आदिवासी समाज में आ रहे बदलाव एवं उनकी उत्कृष्ट परम्पराएं मुख्य धारा में जी रहे समाज के लिये मिसाल है। इस बात को जानना चाहिए कि आदिवासी समाज के मूल में तीन महत्वपूर्ण बातें हैं जिसमें पहला यह कि आदिवासी समाज हमेशा से वाचिक परम्परा में जीता आया है, दूसरा यह कि वह राज्याश्रित नहीं है तथा तीसरा यह कि वह अपने आपमें स्वतंत्र है इसलिये  किसी तरह की क्रांति की तरफ उसकी सोच नहीं जाती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उनकी अपनी परम्पराएं हैं, रीति-रिवाज हैं जो आधुनिक समाज को कई बार सीख देते हैं। उनकी इस खास चीजों को रेखांकित किये जाने की जरूरत है।

आदिवासी समाज और आधुनिक समाज के बीच सेतु का काम मीडिया कर सकता है। मीडिया की पहुंच व्यापक है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है किन्तु आदिवासी समाज को लेकर मीडिया को भी शिक्षण-प्रशिक्षण की जरूरत है। अभी तक मीडिया में दो तरह से आदिवासी समुदाय को प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है पहला वह जो सरकार की विभिन्न संस्थाओं द्वारा दिये गये साहित्य को आधार बनाकर खबरें, लेख व फीचर प्रकाशित किये जाते रहे हैं और दूसरा मंत्रालयों में दौड़ रही आदिवासी समाज की कल्याण व अकल्याण की खबरें। इसमें भी वास्तविकता तलाशने के स्थान पर सनसनी का भाव ज्यादा रहता है। इसे इस तरह से भी हम समझ सकते हैं कि झाबुआ का भगोरिया, बस्तर का घोंटुल या छिंदवाड़ा के पातालकोट को लेकर कई तरह की भ्रम-विभ्रम की स्थिति बनी हुयी है। कुछ कारण तो सरकार की वो बंदिशें हैं जहां सुरक्षा की दृष्टि से जारी हैं। इस पर भी ध्यान देना होगा।

आदिवासी समाज के विकास और विस्तार में मीडिया की भूमिका कारगर हो सकती है बशर्तें मीडिया का प्रशिक्षण हो। मध्यप्रदेश में देश का पहला जनजातीय वि·ाविद्यालय के आरंभ होने की कार्यवाही जारी है। वि·ाविद्यालय के पूर्ण स्वरूप आने में अभी समय है और तब तक या इसके बाद भी भोपाल स्थिति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार वि·ाविद्यालय में जनजातीय पत्रकारिता पर पाठ्यक्रम आरंभ किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। लगभग पन्द्रह से अधिक नये विषयों का पाठ्यक्रम इस वि·ाविद्यालय ने आरंभ किय है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए किन्तु अपने ही प्रदेश में अपने ही विषय का पाठ्यक्रम का न होना, अखरने वाली बात है। कुछ माह पहले रायपुर स्थित स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार वि·ाविद्यालय ने अखिल भारतीय स्तर पर जनजातीय पत्रकारिता पर वर्कशॉप का आयोजन कर अपनी चिंता जाहिर की थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में भोपाल के साथ रायपुर का पत्रकारिता वि·ाविद्यालय जनजातीय पत्रकारिता पाठ्यक्रम आरंभ करने की दिशा में पहल करेगा।

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

समागम का नया अंक पेडन्यूज के खिलाफ आवाज उठाने वाले अखबारों को समर्पित

भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का अक्टूबर २०१० का अंक बिहार के दो प्रमुख समाचार पत्रों प्रभात खबर एवं हिन्दुस्तान को सलाम करता है जिन्होंने बातों से आगे बढ़कर व्यवहार में पेडन्यूज नहीं छापने का ऐलान किया है।

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...