मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

हर नये शब्द में दा साथ होंगे



-मनोज कुमार
राजनारायण मिश्र को आप जानते हंै? तब शायद ही कुछ लोगों का जवाब होगा हां किन्तु जब आप कहेंगे दा को जानते हैं तो शायद ना कहने वालों की संख्या गिनना मुश्किल सा हो जाए. यहां जो कुछ लिख रहा हूं, वह एक किस्म की जुर्रत कर रहा हूं. दा पर लिखने का मुझे कोई अधिकार नहीं है, यह बात मैं जानता हूं. मैं यह भी जानता हूं कि दा के बारे में मुझे कुछ भी नहीं मालूम क्योंकि जितने समय उनके आसपास रहा, सिवाय डांट डपट के कुछ नहीं मिला. उन्हें देखकर सहम जाना और कभी बच्चों की तरह उनके सामने जिद पर उतर जाने पर जो लाड़ मिला, उसे मैं कैसे भूला सकता हूं. सही मायने में यहां पर मैं दा के बारे में नहीं बल्कि दा के बहाने अपने आप पर ही कुछ लिख रहा हूं.

बात यह कोई साल बयासी-तिरासी की है. मैं नगर निगम स्कूल का पढऩे वाला छात्र 11वीं की परीक्षा पास कर देशबन्धु से जुड़ गया. ईमानदारी से तब पत्रकार क्या होता है, यह बात पूरी तरह पता नहीं थी. पढऩे का शौक था, लिख लेता था और इससे आगे हैंडराइटिंग सुंदर थी, सो देशबन्धु में प्रवेश पा गया. अनजाने में पत्रकार तो बन गया लेकिन दा जैसे पत्रकारिता के स्कूल ने मुझे सही मायने में पत्रकार बनाया. एक ऐसा पत्रकार जिसका लेखन प्रभावी हो किन्तु दंभ कहीं न दिखे. चिंतन और मनन करने वाला पत्रकार. मेरी ट्रेनिंग के पहले चरण में दा का आदेश था सम्पादक के नाम पत्र लिखो. अपनी समझ के हिसाब से पत्र लिखते, दा उसे सम्पादित करते और छोटा सा कर छाप देते. अखबार के पन्ने पर नाम छपा देख हम आसमान में उड़ते. दा की नजर मेरे काम पर लगातार बनी रही. नुक्ताचीनी के लिये नहीं बल्कि उस सीख के लिये जहां आज मैं हूं और जहां से मुझे और आगे जाना है.

एक वाकया जीवन भर नहीं भूल पाऊंगा. एक कहानी लिखने की कोशिश की. कुछ पन्ने लिखकर घर पर अपनी टेबल पर छोड़ दिया कि समय मिलने पर पूरा करूंगा. इत्तेफाकन दा वहां से गुजरे, आदतन सिर पर चढ़ाया हुआ चश्मा आंखों पर लगाया. सरसरी तौर पर पढ़ कर पन्ने को फाडक़र रद्दी की टोकरी में डाल दिया. मैं अवाक देखता रहा. हिम्मत तो थी नहीं कि पूछ लूं कि आपने ऐसा क्यों किया. मन में सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे, तभी दा की आवाज गूंजी-कहानी लिखना चाहते हो, लिखो लेकिन अभी नहीं. अभी पढ़ो और खूब पढ़ो. रोज दस नये शब्द ढूंढ़ों और उसका उपयोग करो. कुछ वर्ष बाद शब्दों का भंडार हो जाएगा तब लिखो. जवाब मिल गया था. उनकी यह सीख आज भी जीवन में काम आ रही है. तहलका पत्रिका पढ़ते हुए एक जगह प्रेम-फ्रेम शब्द और दोस्त सुनील मिश्र के लेख में नीम बेहोशी शब्द पढ़ा तो मन में बिठा लिया कि कहीं न कहीं इसका उपयोग करना है. मेरे लिये जो शब्द नये होते हैं अथवा प्रचलन में कम होते हैं, उसका जब उपयोग करता हूं तो दा का स्मरण सहज हो आता है. दा आज जरूर हम सबका साथ छोड़ गये हैं किन्तु वे हमारे मन मस्तिष्क में हमेशा बने रहेंगे क्योंकि हर नये शब्द में दा साथ चलेंगे.

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

असत्य ही असत्य!


मनोज कुमार
इस बार जब मेरे मोहल्ले में रावण का कद नापा गया तो इस बार उसका कद कुछ फीट और बढ़ गया था। मैं पिछले कई सालों से देख रहा हूं कि मेरे मोहल्ले का रावण साल दर साल ऊंचा होता चला जा रहा है। बिलकुल वैसे ही जैसा कि हमारा असत्य। हम मोबाइल के जरिये असत्य के प्रतीक हो गये हैं। हर पल झूठ, हर पल धोखा और न जाने क्या क्या। ऐसे में मेरे मोहल्ले का रावण कुछ फीट और ऊंचा हो जाए तो हमें एतराज नहीं करना चाहिए और न ही इतराना चाहिए कि हमने रावण का कद और ऊंचा का पाठ तो जरूर पढ़ाते हैं लेकिन व्यवहार में सत्य को पराजित करने में कभी पीछे नहीं रहते। कर दिया। एतराज इसलिये नहीं होना चाहिए कि असत्य के इस प्रतीक ने हमसे ऊंचा होने की हिमाकत नहीं की है और इतराना इस बात पर नहीं चाहिए कि हमने असत्य के इस प्रतीक को इतना ऊंचा कर दिया। सच तो यह है कि हमें विजयादशमी मनाने का कोई नैतिक हक है ही नहीं क्योंकि हम अपनी पीढ़ी को असत्य पर सत्य की जीत का पाठ तो जरूर पढ़ाते हैं लेकिन व्यवहार में सत्य को पराजित करने में कभी पीछे नहीं रहते।

परम्परागत विजयादषमी का पर्व मनाने की तैयारी में पूरा समाज जुट गया है। हर साल हम खुद रावण बनाते हैं और उसे मारने का स्वांग भी खुद ही रच डालते हैं। परम्परा का निर्वाह करने के पीछे सत्य और असत्य की परख करना एक पैमाना हो सकता है किन्तु आज की स्थिति में क्या हम विजयादशमी मनाने की स्थिति में हैं? क्या वास्तव में हमने असत्य पर विजय पा ली है? सैंकड़ों साल पहले न जाने राम नाम के एक सात्विक ने रावण का वध किया था, सैकड़ों साल पहले न जाने एक युवा ने पिता के वचन की लाज रखने के लिये वनवास जाना मंजूर कर लिया था। रावण को मारने का हमारा साहस कब का मर चुका है और पिता के वचनों के खातिर वनवास जाने की बात कल्पना से परे है। जब भी वनवास जाने की बात होगी तो हम पिता को ही वनवास भेज देंगे। हमने इसके लिये वृद्धाश्रम बना दिया है। बात जहां तक रावण के मारने की है तो हम अपने आपको क्यों और कैसी सजा दें? आज हम अनैतिकता की पराकाष्ठा को छू रहे हैं। लोकलाज को त्याग दिया है और अराजकता के घोर अंधेरे में भटक रहे हैं। असत्य को असत्य से मारने की हरसंभव हम कोषिष कर रहे हैं। सत्य से हम दूर जा चुके हैं। जीवन की सुबह असत्य से होती है और इसी असत्य को बिछाकर सो जाते हैं।
विजयादषमी का अर्थ होता है विजय की दषमी और हम हर पल पराजित हो रहे हैं। हर कदम पर हमारी पराजय है। इस पराजय के काल में किसकी विजयादषमी और कौन मनाये विजयादशमी। विजयादशमी एक उत्सव की बेला है और यह बेला है असत्य पर सत्य की विजय की। सत्य से हम कोसों दूर हैं। सत्य का अर्थ सिर्फ असत्य बोलना और बोना है। असत्य का यह घनघोर अंधेरा, समाज के किसी कोने में नहीं है बल्कि हर कोना असत्य से काला काला हुआ जा रहा है। किसी समय अपनी मेहनत के बिना कमाने वाले धन को पाप की कमाई कहा जाता था और कोशिश होती थी कि बच्चों को इससे दूर रखा जाये। आज सारे पर्दे गिर गये हैं और बच्चों को पता है कि उसके ठाठ के रास्ते कहां से शुरू होता है। बचपन जब इस पाप की कमाई से बड़ा होता है तो सत्य कहां टिक पायेगा।

मुझे स्मरण हो आता है कि कभी अपने गांव में रामलीला किया करते थे। लगातार आठ नौ दिन की रामलीला। पूरा का पूरा आयोजन जुगाड़ से। हल्की ठंड में लोग अपने अपने घरों से बैठने की व्यवस्था कर आते। मजे लेते और अपने बच्चों को भी अगले बरस रामलीला मंे भागीदार बनने के लिये प्रोत्साहित करते। घर घर से मदद आती। इस रामलीला का मकसद हुआ करता सत्य का संदेश पहुंचाना। इसका मकसद हुआ करता था लोगों के भीतर छिपी प्रतिभा से समाज को अवगत कराना लेकिन अब रामलीला होती है तो पूरी साज-सज्जा के साथ। उस काल के राम आज हमारे बीच आ जाएं तो साज-सज्जा देखकर चौंक जाएं। यह बाजार है और बाजार की लीला से भला कौन अपरिचित है। यह रामलीला की लीला है जो संदेश देती है स्वयं के विजय हो जाने का। जो बताती है बाजार के रास्ते चलो, सत्य और असत्य के फेर में मत पड़ो। विजयादषमी का जो अर्थ बाजार सिखाता है, वही विजयादशमी है क्योंकि अब यह परम्परा का उत्सव नहीं, बदलते बाजार का फेस्टिवल है।

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

भगवान की याद



मनोज कुमार
जब कभी हम पर मुसीबत टूटती है तो हमें सबसे पहले भगवान याद आते हैं। ऐसा लगता है कि भगवान हमारी सारी पीड़ा दूर कर देंगे। भगवान के स्मरण से पीड़ा भले ही दूर न हो किन्तु पीड़ा सहने की षक्ति मिल ही जाती है। भगवान की तरह ही स्वतंत्र भारत में गांधीजी को पूछा और पूजा जा रहा है। हर किसी को गांधी का रास्ता मंजिल पा लेने का सबसे सरल रास्ता लगता है। अन्ना हजारे ने भी गांधी को सामने रखकर भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वयं को प्रस्तुत किया था। आरंभिक दिनों में देषवासियों को उनका समर्थन भी मिला लेकिन आहिस्ता आहिस्ता अन्ना का जादू खत्म होने लगा और एक समय ऐसा भी आया जब अन्ना को अपना आंदोलन खत्म करना पड़ा। अन्ना के लिये यह आसान था कि वे आंदोलन को वापस ले लें। अन्ना की टीम के लिये यह मुष्किल था कि वे आंदोलन वापस लें क्यांे कि उन्हें पता था कि जब तक वे लाठी भांजते रहेंगे, तब तक ही उनकी पूछ बनी रहेगी। षायद यही कारण है कि इनका आंदोलन तो षुरू हुआ था सत्याग्रह से और पहुंच गये कटी बिजली का तार जोड़ने, पहुंच गये मंत्री सलमान खुर्षीद के कारनामे बाहर लाने के लिये। लोकपाल की बात हाषिये पर चली गयी। अब लोकपाल नहीं, लोक हंगामा केजरीवाल टीम के लिये जरूरी हो गया है। मुद्दों के साथ साथ सिर पर पहनी टोपी का स्लोगन भी बदलता गया। पहले कहा गया कि मैं अन्ना हूं, फिर मैं केजरीवाल और अब मैं आदमी हूं कि टोपी पहने घूमा जा रहा है।

अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ब्रांड थे। उम्रदराज व्यक्ति का यह साहस लोगों को लुभा रहा था लेकिन उनके हटते ही जैसे भ्रष्टाचार का आंदोलन ही हट गया। गांधीजी की टेक लेकर जो आंदोलन आगे बढ़़ रहा था, उसने बीच में ही दम तोड़ दिया। यह होना चौंकाने वाला नहीं है बल्कि यह आज नहीं होता तो कल होता। गांधीजी की टेक लेकर चल रहे इस आंदोलन में गांधीजी कहीं नहीं थे। अन्ना से लेकर केजरीवाल हमेषा से कहते चले आ रहे हैं कि वे अपनी मांग पूरी होने तक जरूरत पड़ी तो जान दे देंगे। गांधीजी को ऐसे सवालों से भी चिढ़ थी। पराधीन भारत में एक बार उनसे सवाल किया गया कि क्या अपनी मांग मनवाने के लिये वे मरना पसंद करेंगे? सवाल का जवाब देने के बजाय गांधीजी ने कहा था खराब सवाल है। अन्ना टीम की तरह गांधीजी का विष्वास भीड़ एकत्र करने में कभी नहीं रहा बल्कि वे भीड़ के साथ हो लेते थे। अपने आंदोलन के साथ गांधीजी लघु उद्योगों पर जोर देते थे, खेती पर उनका जोर था लेकिन अच्छी तकनीक जानने के बाद भी अन्ना खेतों को छोड़कर भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोल दिया था। 

गांधीजी छोटे छोटे प्रयासों से अंग्रेजों को मजबूर किया करते थे लेकिन आज हम सीधे सरकार पलटने की बात करते हैं। गांधीजी का पूरा प्रयास भारत को स्वाधीन बनाने के लिये था। अन्ना ने जो आंदोलन आरंभ किया, वह समय की जरूरत है किन्तु उनका आंदोलन रातोंरात भारत बदल देने की थी जो लगभग असंभव सा था। अन्ना के अलग हो जाने के बाद केजरीवाल से किरण बेदी भी अलग हो गयी हैं। वे ठेठ राजनीतिज्ञ की तरह बर्ताव करने लगे हैं। सत्तासीन नेताओं और केजरीवाल में फकत इतना ही फर्क है कि अभी वे संसद से बाहर षोर मचा रहे हैं और षायद आने वाले दिनों में संसद के भीतर यही विरोध दर्ज करते नजर आएंगे। तस्वीर बदल पाएंगे, यह तो संभव सा दिखता नहीं है। गांधीजी के बाद जयप्रकाष नारायण, विनोबा भावे ने जो तस्वीर बदलने की लकीर खींची है, उससे पूरी तस्वीर भले ही न बदल पायी हो किन्तु आज भी लोगों के दिल में बदलाव की तमन्ना है। यही कारण है कि जयप्रकाष नारायण के बताये रास्ते पर चलने की कोषिष करते दिखते हैं। केजरीवाल यदि सच में तस्वीर बदलना चाहते हैं तो नेताओं का नहीं, आम आदमी का मन बदलने की कोषिष करें। जब तक भारतीय मन नहीं बदलेगा, ऐसे ही भ्रष्टाचार में डूबे नेता चुने जाते रहेंगे। विकल्प की तलाष में खड़ी जनता को एक रास्ता अन्ना का नजर आया था, दुर्भाग्य से वह रास्ता भी बंद होकर वहीं जा मिला है जहां से हम मुक्ति पाना चाहते हैं। केजरीवाल की लड़ाई से केजरीवाल का कद तो ऊंचा होगा लेकिन आम आदमी वहीं और वैसा ही खड़ा रहेगा जैसा कि आजादी के छह दषक गुजर जाने के बाद भी खड़ा हुआ है।    

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012


समागम का यह अंक गांधीजी के दर्शन एवं विचारो पर केन्द्रित है।
 गांधीजी सर्वकालिक रहे है, यही कारन है की उनके विरोधी भी आज उनके कायल है।
 हमारी  कोशिश है की नई पीढ़ी गाँधी को जाने और समझे। 

समागम एक पूर्णकालिक शोध पत्रिका है। संपर्क कर सकते है 
संपादक  समागम 
3, जूनियर ऍमआई जी, अंकुर कालोनी, शिवाजी नगर भोपाल 16
मोबइल 09300469918 

बुधवार, 26 सितंबर 2012

बापू का जन्मदिन


 
-मनोज कुमार
बापू इस बार आपको जन्मदिन में हम चरखा नहीं, वालमार्ट भेंट कर रहे हैं.गरीबी तो खतम नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये  गरीबों को  खत्म करने का अचूक नुस्खा हमने इजाद कर लिया है. खुदरा बाजार में हम विदेशी पंूजी निवेश को अनुमति दे दी है. हमें ऐसा लगता है कि समस्या को ही नहीं, जड़ को खत्म कर देना चाहिए और आप जानते हैं कि समस्या गरीबी नहीं बल्कि गरीब है और हमारे इन फैसलों से समस्या की जड़ गरीब ही खत्म हो जाएगी. बुरा मत मानना, बिलकुल भी बुरा मत मानना. आपको तो पता ही होगा कि इस समय हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं और आप हैं कि बारमबार सन् सैंतालीस की रट लगाये हुए हैं कुटीर उद्योग, कुटीर उद्योग. एक आदमी चरखा लेकर बैठता है तो जाने कितने दिनों में अपने एक धोती का धागा जुटा पाता है. आप का काम तो चल जाता था  लेकिन हम क्या करें. समस्या यह भी नहीं है, समस्या है कि इन धागों से हमारी सूट और टाई नहीं बन पाती है और आपको यह तो मानना ही पड़ेगा कि इक्कसवीं सदी में जी रहे लोगों को धोती नहीं, सूट और टाई चाहिए वह भी फटाफट  . हमने गांव की ताजी
सब्जी खाने की आदत छोड दी है क्योंकि डीप फ्रीजर की सब्जी हम कई दिनों बाद खा सकते हैं. दरअसल आपके विचार हमेशा से ताजा रहे हैं लेकिन हम लोग बासी विचारों को ही आत्मसात करने के आदी हो रहे हैं. बासा खाएंगे तो बासा
सोचेंगे भी. इसमें गलत ही क्या है?
        बापू माफ करना लेकिन आपको आपके जन्मदिन पर बार बार यह बात याद दिलानी होगी कि हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं. जन्मदिन, वर्षगांठ बहुत घिसेपिटे और पुराने से शब्द हैं, हम तो बर्थडे और एनवरसरी मनाते हैं. अब यहां भी देखिये कि जो आप मितव्ययता की बात करते थे, उसे हम नहीं भूला पाये हैं इसलिये शादी की वर्षगांठ हो या मृत्यु ,  हम मितव्ययता के साथ एक ही शब्द का उपयोग करते है एनवरसरी. आप देख तो रहे होंगे कि हमारी बेटियां कितनी मितव्ययी हो गयी हैं. बहुत कम कपड़े पहनने लगी हैं. अब आप इस बात के लिये हमें दोष तो नहीं दे सकते हैं ना कि हमने आपकी मितव्ययता की सीख को जीवन में नहीं उतारा. सडक़ का नाम महात्मा गांधी रोड रख लिया और मितव्ययता की बात आयी तो इसे एम.जी. रोड कह दिया. यह एम.जी. रोड आपको हर शहर में मिल जाएगा. अभी तो यह शुरूआत है बापू, आगे आगे देखिये हम मितव्ययता के कैसे कैसे नमूने आपको दिखायेंगे.
        अब आप गुस्सा मत होना बापू क्योंकि हमारी सत्ता, सरकार और संस्थायें आपके नाम पर ही तो जिंदा है. आपकी मृत्यु से लेकर अब तक तो हमने आपके नाम की रट लगायी है. कांग्रेस कहती थी कि गांधी हमारे हैं लेकिन अब सब लोग कह रहे हैं कि गांधी हमारे हैं. ये आपके नाम की माया है कि सब लोग एकजुट हो गये हैं. आपकी किताब  हिन्द स्वराज पर बहस हो रही है, बात हो रही है और आपके नाम की सार्थकता ढूंढ़ी जा रही है. ये बात ठीक है कि गांधी को सब लोग मान रहे हैं लेकिन गांधी की बातों को मानने वाला कोई नहीं है लेकिन क्या गांधी को मानना, गांधी को नहीं मानना है. बापू आप समझ ही गये होंगेकि इक्कसवीं सदी के लोग किस तरह और कैसे कैसे सोच रखते हैं. अब आप ही समझायें कि हम ईश्वर, अल्लाह, नानक और मसीह को तो मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी माना क्या? मानते तो भला आपके हिन्दुस्तान में जात-पात के नाम पर कोई फसाद हो सकता था. फसाद के बाद इन नामों की माला जप कर पाप काटने की कोशिश जरूर करते हैं.
बापू छोड़ो न इन बातों को, आज आपका जन्मदिन है. कुछ मीठा हो जाये. अब आप कहेंगे कि कबीर की वाणी सुन लो, इससे मीठा तो कुछ है ही नहीं. बापू फिर वही बातें, टेलीविजन के परदे पर चीख-चीख कर हमारे युग नायक अमिताभ कह रहे हैं कि चॉकलेट खाओ, अब तो वो मैगी भी खिलाने लगे हैं. बापू इन्हें थोड़ा समझाओ ना पैसा कमाने के लिये ये सब करना तो ठीक है लेकिन इससे बच्चों की सेहत बिगड़ रही है, उससे तो पैसा न कमाओ. मैं भी भला आपसे ये क्या बातें करने लगा. आपको तो पता ही नहीं होगा कि ये युग नायक कौन है और चॉकलेट मैगी क्या चीज होती है. खैर, बापू हमने शिकायत का एक भी मौका आपके लिये नहीं छोड़ा है. जानते हैं हमने क्या किया, हमने कुछ नहीं किया. सरकार ने कर डाला. अपने रिकार्ड में आपको उन्होंने कभी कहीं राष्ट्रपिता होने की बात से साफ इंकार कर दिया है. आप हमारे राष्ट्रपिता तो हैं नहीं, ये सरकार का रिकार्ड कहता है. बापू बुरा मत, मानना. कागज का क्या है, कागज
पर हमारे बापू की शख्सियत थोड़ी है, बापू तो हमारे दिल में रहते हैं लेकिन सरकार को आप जरूर बहादुर सिपाही कह सकते हैं. बापू माफ करना हम इक्कसवीं सदी के लोग अब चरखा पर नहीं, वालमार्ट पर जिंदा रहेंगे. इस बार आपके बर्थडे पर यह तोहफा आपको अच्छा लगे तो मुझे फोन जरूर करना. न बापू न..फोन नहीं, मोबाइल करना और इंटरनेट की सुविधा हो तो क्या बात है..

रविवार, 23 सितंबर 2012

समागम का नया अंक हिंदी अवम बोलियों पर


समागम का नया अंक सितम्बर 2012 पब्लिश। 
यह अंक हिंदी दिवस पर हिंदी अवम बोलियों पर केन्द्रित है।

समागम के लिए शोध पत्र एवं लेख आमंत्रित है।

सम्पर्क करे 
संपादक 
समागम 
3, जूनियर ऍम आय जी, अंकुर कालोनी 
शिवाजी नगर, भोपाल 16
फ़ोन 09300469918
ईमेल k.manojnews@gmail.com

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

मेरे दोस्त दरख्त माफ करना...



मनोज कुमार

वे मेरे दोस्त थे. रोज सुबह घर से दफ्तर जाते समय वे मुझे हंसी के साथ विदा करते. देर षाम जब मैं घर लौट रहा होता तो लगता कि वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं. मेरे और उनके बीच एक रिष्ता कायम हो गया था. ये ठीक है कि वे बोल नहीं सकते थे तो यह भी सच है कि मैं भी उनसे अपनी बात नही कह सकता था लेकिन बोले से अधिक प्रभावी अबोला होता था. हमारी दोस्ती को कई साल गुजर गये थे. इस बीच मैंने लगभग नौकरी का इरादा त्याग दिया था. यह वह समय था जब न तो मेरे आने का वक्त होता था और न जाने का लेकिन क्योंकर षाम को उनके पास से गुजरना मन को अच्छा लगता था. अचानक कहीं से बुलावा आया और न चाहते हुए भी मैं नौकरी का हिस्सा बन गया. इस नौकरी से मेरा मन जितना खुष नहीं था, षायद मेरे ये दोस्त खुष थे. रोज मिलने और एक दूसरे को देखकर मुस्कराने का सिलसिला लम्बे समय से चल रहा था। यह रिष्ता अनाम थ. आज सुबह मैंने उन्हें हलो कहा था और वे मुस्करा कर मुझे रोज की तरह विदा किया. तब षायद मुझे पता नहीं था कि रोज की तरह जब मैं षाम को घर लौटूंगा तो उसी रास्ते से लेकिन मेरे दोस्त मुझसे बिछड़ गये होंगे। कोई मुस्काराता हुआ आज मेरा स्वागत नहीं करेगा। षाम का मंजर देखते ही जैसे मेरा दिल बैठने लगा। थोड़ी देर के लिये मेरे पैर थम से गये। मैं अवाक था कि ये क्या हो गया। एक हफ्ते में मेरे लिये यह दूसरा हादसा था. दोनों हादसों में कोई साम्य नहीं था लेकिन दोनों के बिछड़ जाने का गम एक जैसा था.़ मेरी भांजी को विदा कर घर लौटते मेरे अपने जीजाजी सड़क हादसे में नहीं रहे. बहुत दिनों बाद मन जार जार कर रोया. अभी हफ्ता नहीं गुजरा था कि मेरे दोस्त की मौत ने मुझे झकझोर दिया है.

ये दोस्त थे मेरे आने जाने के रास्ते मंे खड़े हरे-भरे दरख्त. इनकी षाखाओं के लहराते पत्ते जैसे बार बार मुझे गले लगाने को बेताब होते थे. मैं कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इस तरह एक दिन कोई निर्दयी इन्हें अकाल मौत दे देगा. कभी अपनी हरियाली के लिये इतराने वाला भोपाल आहिस्ता आहिस्ता कंगाल हो रहा है. क्रांकीट की इमारतों को खड़ा करने, सड़कों की छाती को रौंदने के लिये रोज ब रोज आ रही  महंगी विदेषी कारों के लिये पहले ही सालों से खड़े दरख्तों को अकाल मौत दे दी गयी है. आज एक और दरख्त ऐसा ही मारा गया. किसी आदमी की मौत का गम तो थोड़े वक्त का होता है लेकिन किसी दोस्त की मौत षायद पूरे जीवन के लिये जख्म दे जाती है. जिस जगह यह दरख्त था, वहां खून का कोई निषान नहीं था लेकिन कटे हुए डंगाल, टूटे हुए पत्ते किसी बेरहम हाथों की कहानी बयान कर रहे थे. रोज की तरह चलता हुआ मैं जब गुजरने लगा तो एकाएक सन्नाटे सा महसूस हुआ. पैरों के नीचे मेरे दोस्त पत्ते कुचल गये तो मुझे झटका सा लगा. लगा कि जैसे मैंने अपने किसी को पैर से रौंदने का पाप कर लिया है. मैं आत्मग्लानी से भर गया. 

मेरी आत्मग्लानी केवल पत्ते को पैर से कुचल जाने के लिये नहीं थी. बल्कि इस बात को लेकर भी मन विषाद से भर गया कि हम कितने निरीह हो गये हैं एक जीते-जागते दरख्त को अपने स्वार्थ के लिये बेमौत मार देते हैं. यह तो ठीक है कि हमारे कर्म उस गेंद की तरह होते हैं जो पलट कर हमारे पास आती है अर्थात हम अच्छा करते हैं तो अच्छा पाते हैं. इसे किताबी बात न मानें तो यह मानना ही पड़ेगा कि ऐसे बेमौत मरने वाले दरख्त हमारे दुख का कारण हैं. जीते-जी वे हमारे मुस्काने की वजह थी. उनसे हमंे छांह, पानी और साफ हवा मिलती थी और एक मुस्कान के लिये यह सब जरूरी है. अब जब हम एक बार नहीं, बार बार दरख्त को मौत दे रहे हैं तो उस दरख्त की आह भला हमें कब तक जीने देगी? यह सवाल उन सब लोगों से है जो दरख्त को मौत दे रहे हैं या देने में साथ दे रहे हैं या उसे चुपचाप मरने के लिये मजबूर होने दे रहे हैं. उन सब में मैं भी षामिल हूं. आज इस दरख्त की मौत ने मुझे एक बार फिर उस चिपको आंदोलन की याद दिला दी जिसकी याद आज की युवा पीढी को होगी भी नहीं. हे दरख्त, तुझे न बचा सकने का जो अपराध मुझसे हुआ है, उसके लिये मैं माफी चाहूंगा....सिर्फ माफी...       

samagam ka naya ank Bhartiy Girmitiya

https://samagam.co.in/samagam-october-2026/