बुधवार, 25 जून 2014

सपनों से परे


मनोज कुमार

एक अबोध मन की कल्पना इस दुनिया की सबसे सुंदर रचना होती है। कभी किसी छोटे से बच्चे की निहारिये। वह सबसे बेखबर अपनी ही दुनिया में खोया होता है। जाने वह क्या देखता है। अनायास कभी वह मुस्करा देता है तो कभी भयभीत हो जाता है। कभी खुद से बात करने की कोशिश करता है तो कभी वह सोच की मुद्रा में पड़ जाता है। तब उन्हें यह नहीं पता होता था कि हाथी किस तरह का होता है या शेर कभी हमला भी कर सकता है। चिडिय़ों की चहचहाट उनका मन मोह लेती है तो बंदर का उलछकूद उसके लिये एक खेल होता था। सच से परे वह अपनी दुनिया खुद बुनता है। शायद इसलिये ही हमारे समाज में बच्चों के खेल खिलौनों का आविष्कार हुआ। बंदर से लेकर चिडिय़ा और गुड्डे गुडिय़ा ले कर घर-गृहस्थी के सामान बच्चों के खेल में शामिल होता था। नन्हें बच्चे का आहिस्ता आहिस्ता दुनिया से परिचय होता था। यह वह समय था जब मां बाप के पास भी समय होता था। वे अपने बच्चों को बढ़ता देखकर प्रसन्न होते थे। यह वही समय होता था जब मां लोरी सुनाकर बच्चों को थपथपा कर स्नेहपूर्वक नींद के आगोश में भेज देती थी। शायद इसी समय से शुरू होता था मां का स्कूल। इस स्कूल में मां का स्नेह तो था ही, संस्कार का सबक भी बच्चा यहीं से सीखता था। बड़ों का सम्मान करना, छोटों से प्यार। यह वही समय था जब गणेश चतुर्थी से मकर संक्रात, होली, दीवाली और दशहरा मनाने के कारणों से बच्चा संस्कारित होता था। वह रंगों का मतलब जानता था। पतंग की डोर से वह जीत की सीख लेता था। इस जीत की सीख में उसके पास संस्कार थे। वह जीतना चाहता था लेकिन किसी की पराजय उसका लक्ष्य नहीं होता था। 

स्वप्र लोक में बच्चों के विचरने के दिन अब गुम हो गये हैं।  अब न वह समय बचा और न सपने। अब बच्चे वयस्क पैदा होते हैं। मां बाप के पास वक्त नहीं है। अब उन्हें कोई नहीं सिखाता है कि ह से हाथी और ग से गणेश होता है। वे जानते हैं कि एलीफेंट किसे कहते हैं। बंदर मामा की कहानी उसे पता नहीं है लेकिन मंकी से वह बेखबर भी नहीं है। गणेश चतुर्थी पर ग्यारह दिनों तक पूजन करना उसे वैसा ही समय व्यर्थ करना लगता है जैसा कि घंटों मेहनत कर पतंग उड़ाना। दीवाली पर फूटने वाले फटाकों को वह पर्यावरण दूषित करना कहता है लेकिन एके-47 जैसे घातक हथियारों के मोहपाश में बंधा है। बंदूक उसे जीवन रक्षक लगता है। बच्चे का टेलीविजन के पर्दे पर उतरने वाले रंगों की तरह रंगा हुआ है लेकिन होली के रंगों से उसे एलर्जी है। इस समय का बच्चा इंटलीजेंट है। वह आइपेड से खेलता है और कॉमिक वाले सीरियल देखता है। उसे अब सपने नहीं आते। वह एनीमेटेड कैरेक्टर्स को देखकर उन्हें ही जीने लगता है। इन कैरेक्टर्स में भी विलेन उसका प्रिय पात्र होता है। बच्चे की बोलचाल और उसका व्यवहार खली की तरह होता है, दारासिंह की तरह नहीं। आज का बच्चा जल्दी में है। वह थोड़े समय में सबकुछ पा लेना चाहता है। जीत जाना उसका एकमात्र ध्येय है। पराजय उसे नापसंद है। वह दूसरों को पराजित होता देख आनंद से भर उठता है। एक खलनायक उसके भीतर पनप रहा है। 

यह इस समय का कडुवा सच है। मां-बाप धन कमाने की मशीन बन गये हैं। वे अपने बच्चों को शीर्ष पर देखने के लिये दीवानों की तरह पैसे कमाने में जुट गये हैं। उन्होंने अपने सपनों को भी मार दिया है। बच्चों को शीर्ष पर तो पहुंचाना चाहते हैं लेकिन वे इस बात से बेखबर हैं कि उनके बच्चे के पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही है। उनके पास संस्कार नहीं हैं। एक संस्कारहीन बच्चा कामयाब तो हो सकता है लेकिन यह कामयाबी उसे इंसान नहीं बना पायेगी। मां-बाप के पास अब बच्चे को लोरी सुनाकर थपथपा कर सुलाने का वक्त नहीं है। बच्चे की जिद के आगे कान की नसों को फाड़ते बेसुरे गीत लगा देते हैं। बच्चा उसी में रम जाता है। उसका भविष्य भी इसी तरह बेसुरा हो रहा है। मां-बाप के पास बच्चों को सुनाने के लिये कहानी नहीं है। एकल परिवार के चलते दादा-दादी और नाना-नानी तो पहले ही गुम हो चुके हैं। 

अब बच्चों को खाने में दुध-भात नहीं दिया जाता बल्कि अब उनके खाने के लिये मैगी या ऐसा ही कोई फास्टफूड है। बच्चों की जरूरत का हर जवाब मां-बाप के पास पैसा है। पैसों से खरीदने की ताकत तो मां-बाप बच्चों को दे रहे हैं लेकिन जीने की ताकत जिस संस्कार से आता है, उससे खुद मां-बाप दूर हो रहे हैं। यह समय बेहद डराने वाला है। इस समय ने बच्चों के सपनों को गुमशुदा कर दिया है। वे कल्पना के बिना जी रहे हैं। उनमें जिज्ञासा नहीं बची है। बची है तो जीत लेने की होड़। जीत और हार के बीच धीमे-धीमे बड़े होते इन बच्चों को कौन वापस ले जाएगा उनके सपनों की दुनिया में, यह सवाल जवाब की प्रतीक्षा में है। कहते हैं सपनों का मर जाना सबसे बुरा होता है और हम इस बुरे समय के साक्षी बनने लिये कहीं मजबूर हैं तो कहीं हम खुद होकर बच्चों के सपनों का कत्ल कर रहे हैं।

रविवार, 18 मई 2014

संडे स्पेशल...

हिन्दी पत्रकारिता दिवस 30 मई पर


-मनोज कुमार
संडे स्पेशल शीर्षक देखकर आपके मन में गुदगुदी होना स्वाभाविक है। संडे यानि इतवार और स्पेशल मतलब खास यानि इतवार के दिन कुछ खास और इस खास से सीधा मतलब खाने से होता है लेकिन इन दिनों मीडिया में संडे स्पेशल का चलन शुरू हो गया है। संडे स्पेशल स्टोरी इस तरह प्रस्तुत की जाती है मानो पाठकों को खबर या रिपोर्ट पढऩे के लिये न देकर खाने के लिये कह रहे हों। हिन्दी पत्रकारिता के सवा दो सौ साल के सफर में हिन्दी और समृद्ध होने के बजाय कंगाल होती चली जा रही है। हर साल 30 मई को जब हम हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं तब हमारा सिर गर्व से ऊंचा नहीं होता है बल्कि हम अपनी करतूतों से स्वयं को छिपाने का भरसक यत्न करते हैं। हिन्दी के साथ जो ज्यादती हम लगातार कर रहे हैं, वह हमें आत्ममुग्ध तो कर ही नहीं सकता है। हिन्दी के साथ अंग्रेजी के घालमेल पर तर्क और कुतर्क दोनों हो सकते हैं लेकिन इस घालमेल पर तर्क कम और कुतर्क अधिक होगा। कुतर्क के रूप में यह बात रखी जाती है कि आज का पाठक हिन्दी नहीं समझता है और इससे आगे जाकर कहेगा कि स्कूल में पढऩे वाला बच्चा भी अंग्रेजी के अंक समझता है। उसे उनसठ कहा जाये तो उसके समझ से परे होगा लेकिन फिफ्टी नाइन कहा जाये तो वह समझ जाएगा। यह बात सही है लेकिन इसके लिये दोषी कौन है? बच्चा या हम और आप? अंग्रेजी शिक्षा पाये, इससे किसी को क्या एतराज हो सकता है लेकिन अपनी भाषा भूल जाए, यह तो एतराज की बात है ही। यहीं से हिन्दी की चुनौती शुरू होती है और हर दिन, हर पल हिन्दी के लिये चुनौती भरा होता है। 

मीडिया ने भाषा का मटियामेट किया है, इस बात से कौन इंकार कर सकता है। खासतौर पर इसके लिये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पूरी तरह दोषी है। यह माध्यम भाषा के नाम पर न केवल कंगाल है बल्कि दरिद्र भी। टेलीविजन के पर्दे पर जब रिपोर्ट की जाती है, साक्षात्कार होता है, परिचर्चा में समन्वयक की भूमिका निभा रहे उद्घोषक के उच्चारण को देखें तो सिर पीट लेने की इच्छा होती है। यह माध्यम स्वयं को हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान की पत्रकारिता से परे स्वयं को देखता है और वह अपने को विश्व ग्राम में पाता है। इंटरनेट के विस्तार के साथ ग्लोबल विलेज की अवधारणा प्रतिपादित की गई। अब यहां भी देखिये कि विश्व ग्राम अथवा ग्लोबल विलेज अर्थात गांव यहां भी केन्द्र में है। ऐसे में यह बात ध्यान में रखना होगा कि भारत गांवों का देश है और इस देश की भाषा अंग्रेजी हो नहीं सकती। विश्व ग्राम की कल्पना कर लें और उसका हिस्सा भी बन जायें लेकिन भारत ग्राम को भूल कर हम किसी भी कीमत पर विकास नहीं कर सकते हैं। 

मुद्रित माध्यम का अपना स्वर्णिम इतिहास है और हम गर्व कर सकते हैं कि भारत को स्वाधीनता दिलाने में इस माध्यम का सबसे अहम योगदान रहा लेकिन आज दुर्र्र्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हम अपने ही स्वर्णिम इतिहास से स्वयं को दूर कर रहे हैं। हमें अपनी भाषा-बोली की ताकत का अंदाज ही नहीं है और हम अंग्रेजियत का अंधानुकरण कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खिचड़ी भाषा का हम अनुसरण कर रहे हैं। मुझे तब इस बात का दुख ज्यादा होता है जब मैं पाता हूं कि अच्छे स्कॉलर भी हिन्दी से स्वयं को दूर रख रहे हैं। शोध पत्रिका समागम का सम्पादन करते हुये बार बार इस बात की पीड़ा होती है जब स्कॉलर मीडिया के आलेख में खबरों को परोसा जाना जैसे वाक्य का उपयोग करते हैं। क्या खबर कोई भोज्य पदार्थ है जिसे परोसा जा रहा है? इस तरह फलां समाचार पत्र निकलते हैं जैसे वाक्य भी स्कॉलर की समझ पर सवालिया निशान लगाते हैं। समाचार पत्र निकलता नहीं है बल्कि वह प्रकाशित होता है और खबरें परोसी नहीं जाती है बल्कि उसकी प्रस्तुति होती है। अंधानुकरण का आलम यह हो गया है कि सौ शब्दों के वाक्य में 40 से 50 शब्द अंग्रेजी के होते हैं जो न केवल खबर के प्रति रूचि को कम करते हैं बल्कि समाचार पत्र की गरिमा भी प्रभावित होती है।

पत्रकारिता में भाषा की शुद्धता पहली शर्त होती है। यह स्मरण रखा जाना चाहिये कि समाचार पत्र समाज के लिये एक नि:शुल्क पाठशाला होती है। समाचार पत्रों के माध्यम से हर उम्र वर्ग के लोग अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं। मेरे हमउम्र अनेक लोग होंगे जो भिनसारे से समाचार पत्र आने की प्रतीक्षा करते थे और समाचार पत्र आते ही उसमें छपे शीर्षक को पढक़र सीखते थे। मैं तब से लेकर अब तक समाचार पत्रों को पढक़र अपने शब्द भंडार को समृद्ध कर रहा हूं लेकिन आज के समाचार पत्रों में जिस तरह की भाषा का उपयोग हो रहा है, वह सिखाने के बजाय जो आता है, उसे भी दूषित कर रही हैं। मैं इस बात को निरपेक्ष रूप से कह सकता हूं कि इस घालमेल के दौर में हिन्दी के लिये जनसत्ता हमारे बीच शेष रह गया है। प्रभाष जोशी जी ने जो भाषा और बोली के प्रति चेतना जागृत करने का अभियान चलाया, जो परम्परा डाली, आज उसके बूते हिन्दी पत्रकारिता में जनसत्ता का विशेष स्थान है। ऐसा नहीं है कि अन्य हिन्दी के समाचार पत्र भाषा के मामले में नकारा हो गये हैं लेकिन उनका अंग्रेजी प्रेम उनके लिये बाधक है, इस बात को मानना ही होगा। 

अपनी ही भाषा-बोली से परहेज करती हिन्दी पत्रकारिता के लिये पत्रकारिता की नवागत पीढ़ी दोषी नहीं है बल्कि यह दोष हिन्दी पत्रकारिता के उन मठाधीशों का है जिन्होंने अपनी जवाबदारी और जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया। इन मठाधीशों का भाव हमेशा से चलेगा का, रहा। वे स्वयं भाषा-बोली के मामले में दरिद्र रहे इसलिये भी हिन्दी पत्रकारिता आज अपनी ही भाषा-बोली से परहेज करती दिख रही है। यदि ऐसा नहीं होता तो अंग्रेजी के पत्रकार राजेन्द्र माथुर हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधा के रूप में याद नहीं किये जाते। सब जानते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता के यशस्वी हस्ताक्षर राजेन्द्र माथुर अंग्रेजी के मझे हुये पत्रकार थे लेकिन उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध किया। श्री माथुर की पत्रकारिता का आरंभ एक हिन्दी दैनिक से होता है और वे जानते थे कि अपनी बात भारत की असंख्य जनता तक पहुंचाने का माध्यम केवल हिन्दी है और वे आम आदमी के पत्रकार और सम्पादक बनकर हिन्दी पत्रकारिता में स्थापित हुये।   

मैं इस बात से भी इत्तेफाक रखता हूं कि अंग्रेजी के जो शब्द चलन में आ गये हैं, उनका उपयोग किया जाना चाहिये। जैसे कि ट्रेन, सिगरेट, मोबाइल, कम्प्यूटर, कलेक्टर, कमिश्रर आदि-इत्यादि लेकिन संडे स्पेशल, इम्पेक्ट, सटरडे, वीकएंड, सिटी फ्रंं ट पेज जैसे शब्दों के उपयोग से परहेज किया जाना नितांत आवश्यक प्रतीत होता है। हिन्दी पत्रकारिता की भाषा को मटियामेट करने में बाजार एक बड़ा कारण है। जिस तरह से बाजार कहता है और हम उसके अनुगामी बन जाते हैं। दिवस शब्द हमारे शब्दकोश से गुम हो गया है, डे पर हमारी निर्भरता बढ़ गयी है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि हिन्दी डे और हिन्दी वीक मनाते हैं। हिन्दी मंथ भी चलन में है। भाषा की यह दुर्दशा हमारे लिये दुर्भाग्य की बात ही कही जाएगी। बाजार के हाथों में खेलती पत्रकारिता अब सरोकार नहीं, स्वार्थ की पत्रकारिता बनती जा रही है। पत्रकारिता से हटकर वह मीडिया बन गयी है। हिन्दी भाषा और बोली इतनी समृद्ध है कि इनके उपयोग से हम और भी धनवान हो जाते हैं। प्रभाष जी ने कृषक के स्थान पर किसान और गृह के स्थान पर घर जैसे सरल और मीठे शब्दों के उपयोग पर बल दिया था। ऐसे असंख्य शब्द हैं जिनके उपयोग से हिन्दी पत्रकारिता का वैभव बढ़ेगा लेकिन ऐसा नहीं किया गया और विदेशी भाषा का अंधानुकरण किया गया तो हम केवल हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाने की औपचारिकता पूर्ण करते रहेंगे।
(टिप्पणीकार मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम के सम्पादक हैं)

मंगलवार, 6 मई 2014

निजता पर हमला और बदजुबानी का आम चुनाव 2014

मनोज कुमार
वर्ष 2014 का चुनाव गरिमा खोते नेताओं के लिये याद रखा जाएगा तो यह चुनाव इस बात के लिये भी कभी विस्मृत नहीं किया जा सकेगा कि देश को अरविंद केजरीवाल जैसे मुद्दों पर राजनीति करने वाला गैर-पेशवर नेता मिला। इस बार के आम चुनाव में स्थापित राजनीति दल कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह मुद्दाविहिन रही। इनके पीछे खड़ी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी तो केवल उपस्थिति दर्ज कराती नजर आयीं। इन दोनों दलों का वैसा हस्तक्षेप आम चुनाव में नहीं देखने को मिला, जैसा कि पूर्ववर्ती चुनावों में हुआ करता था। अलबत्ता नई-नवेली आम आदमी पार्टी ने न केवल प्रजातांत्रिक रूप से सशक्त उपस्थिति दिखायी और हस्तक्षेप किया बल्कि कांग्रेस और भाजपा की परेशानी का सबब भी बन गयी। खैर, मुद्दाविहिन राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को भटकाने और भरमाने के लिये एक-दूसरे की निजता पर हमले करना शुरू किया। व्यक्तिगत हमले तो चुनाव के मैदान में पहले भी होते रहे हैं लेकिन जिस तरह से निजता पर हमला किया गया, वह दुर्र्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा। हर नेता दूसरे नेता की बीवी को तलाशने में लगा था। किसने किसको छोड़ा, कौन किसके साथ हनीमून मना रहा है और किससे किसकी शादी हो रही है, जैसे विषयों पर नेता पसीना बहाते दिखे। इनमें सबसे अलग दिखे तो आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल। 

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाले भारत के इस बार के आम चुनाव में देश-दुनिया की आंखें टिकी हुई थी। संचार साधनों के विस्तार के साथ पल-पल की खबर ली जा रही थी। विश्व मंच पर भारत एक शक्ति के रूप में स्थापित हुआ है, यह बात हमारे लिये गर्व की  है लेकिन यह शर्मनाक है कि दुनिया के जिस बड़े लोकतंत्र के पहरूओं को हम चुनने जा रहे हैं, उनके पास मुद्दे नहीं हैं। वे इस बात के लिये तैयार नहीं हैं कि भारत की जनता की बुनियादी जरूरतों के साथ विश्व मंच पर भारत किस तरह से अपने आपको अलग और बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करेगा। वार्ड पार्षद के चुनाव में भी स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं और निजता पर हमला करने की कोई जरूरत नहीं होती है लेकिन देश की सत्ता की बागडोर सम्हालने का दावा करने वाली कांग्रेस और भाजपा समेत सारे दल एक-दूसरे की निजता पर हमला करने में जुटे हुये हैं। 

कांग्रेस ने जिस तरह से  भाजपा नेता नरेन्द्र भाई मोदी को तलाशने में जुटी तो ऐसा लगा कि मोदी देश के लिये नहीं, अपनी पत्नी के लिये चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने बकायदा हमला बोल कर यह कुतर्क देने की कोशिश की कि जो मोदी अपने घर को नहीं सम्हाल पा रहे हैं, वह देश क्या सम्हालेंगे। इस मामले में भाजपा भी पीछे नहीं रही। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की शादी को लेकर चुनाव के पहले से ही विधवा विलाप जारी है और इस चुनाव में भी उनके कुंवारेपन को मुद्दा बनाया गया। राहुल गांधी का किसके साथ चक्कर है, यह बात भी जानने में समय एवं धन खर्च किया गया। योग गुरु रामदेव ने तो राहुल गांधी पर ऐसे आरोप दागे कि पूरा लोकतंत्र शर्मसार हो गया। आखिरी दौर में भाजपा ने कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह की उस प्रेमिका को भी ढूंढ़ निकाला जिससे वे जल्द ही शादी करने वाले हैं। मोदी, राहुल या दिग्विजयसिंह की शादी करना न करना, कौन किससे मोहब्बत कर रहा है, नितांत निजी मामला है और इसे चुनाव का मुद्दा बनाया जाना राजनीतिक दलों की बेबसी बयान करता है। यह ठीक है कि देश की जनता को अपेक्षा है कि उनके नेताओं का जीवन साफ-सुथरा हो लेकिन उसकी रूचि कतई इस बात में नहीं है कि किसकी पत्नी किसके साथ रह रही है या कोई किससे शादी करने जा रहा है। यह विषय भी विवाद का तब होता जब कोई संविधान के विपरीत जाता। जनता की रूचि नेताओं की शादी ब्याह में होती तो अटलविहारी वाजपेयी ताजिंदगी कुंवारे रहे लेकिन कभी किसी ने उनसे सवाल नहीं किया। वे बड़े कद के नेता हैं, उनकी सोच बड़ी है और वे देश का नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं। इसी तरह ममता बेनर्जी , मायावती और जयललिता के बारे में भी कोई सवाल नहीं किया गया। वे शादी की जिम्मेदारी उठाते हैं या नहीं, यह गौण बात है। असल तो यह है कि वे इस देश को, अपने प्रदेश को और समाज को कुछ दे पाते हैं या नहीं, यह महत्वपूर्ण है। किसी भी व्यक्ति अपनी तरह की स्वतंत्र जिंदगी जी ले, इस बात की अनुमति भारतीय कानून देता है।
2014 का आमचुनाव बदजुबानी के लिये भी याद रखा जाएगा। एक नहीं, बल्कि चुनाव समर में उतरे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी बदजुबानी से लोकतंत्र को दागदार किया है। करोड़ो रुपये चुनाव प्रचार में बहाते राजनीतिक दलों ने जुबान को भी बेलगाम कर दिया। मुलायमसिंह ने बलात्कारियों के पक्ष में जो कुछ कहा, वह लज्जाजनक है। कोई भी मुलायम के बयान की हिमायत नहीं करेगा तो मोदी की बदजुबानी ने इतिहास रचा है। कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह तो अपने बयानों के लिये चुनाव से पहले और चुनाव के दौर में हमेशा से चर्चा में रहे हैं, शायद ही कोई इस बात से इंकार करे। नेताओं की सोहबत में स्वयं को समाज का पहरेदार बताने वाले रामदेव ने राहुल गांधी पर जो टिप्पणी की है, वह उनकी विकृत मानसिकता का परिचायक है। रामदेव योग गुरु हैं तो उन्हें देशवासियों को सेहतमंद बनाने पर ध्यान देना चाहिये न कि राजनीति में आकर अपने बड़बोलेपन से सामाजिक समरसता को भंग करने की कोशिश। 
रामदेव जैसे लोग बदजुबानी क्यों करते हैं, इस सवाल का जवाब सीधा सा है कि मीडिया उन्हें तव्वजो देता है। रामदेव या इस परम्परा के लोगों को पता है कि कुछ ऐसा विवादित बोल जाओ और देश की जनता के दिमाग पर छा जाओ। अरबों की जनसंख्या में लाखों के बीच दीवाने होने का यह फार्मूला कौन सा बुरा है जिसमें चवन्नी भी खर्च नहीं होता है। मीडिया के इस चरित्र पर अंगुली उठाने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल आलोचना के शिकार हो गये। अरविंद ने मीडिया के बारे में जो कहा, उसे शत-प्रतिशत नहीं माना जा सकता है लेकिन जो कहा उसे शत-प्रतिशत अनदेखा भी नहीं किया जा सकता है। मुद्दों की बात करते आप नेता अरविंद इस आम चुनाव में बिरले दिखे। दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्होंने मुद्दों के साथ लड़ाई शुरू की तो अप्रत्याशित जीत उन्हें मिली। दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने केे बाद सत्ता छोडऩे की बात एक अलग विषय है लेकिन आम चुनाव में भी वे मुद्दों लेकर आम आदमी के बीच आये हैं। उन्हें अपने और देशवासियों पर भरोसा है और यही कारण है कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में नहीं, एक जनप्रतिनिधि चुने जाने के लिये पूरे भरोसे के साथ एकमात्र सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। कोई हैरानी नहीं होनी चाहिये कि पूरे देश में आम आदमी पार्टी के एक दर्जन से अधिक लोग चुनकर संसद में पहुंचे। ऐसा हुआ तो यह लोकतंत्र के लिये स्वर्णिम दिन होगा क्योंकि सत्ता की चाबी कांग्रेस समर्थित दलों के पास होगी या भाजपा समर्थित दलों के पास। ऐसे में इनके मनमाने फैसलों को रोकने के लिये अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी के कारिंदे स्पीडब्रेकर बन कर खड़े रहेंगे। यह तय है ऐसा होने से अरविंद को राजनीतिक माइलेज मिलेगा तो यह भी तय है कि इस माइलेज का लाभ देश के हित में होगा। यहां स्मरण कराना समीचीन होगा कि दिल्ली की सत्ता सम्हालने के बाद बिजली जैसे मुद्दों पर अरविंद के आक्रमक होने का ही परिणाम रहा कि देश के दूसरे राज्यों की सरकारें बिजली की कीमत बढ़ाने से पीछे हट गईं। अंबानी और अडानी के खिलाफ बोलना ही नहीं, हस्तक्षेप करने का साहस अरविंद ही दिखा सकते हैं तभी तो वे इस भीड़ में अकेले नजर आ रहे हैं।

अरविंद केजरीवाल मूल रूप से नेता नहीं हैं और न ही उन्हें विरासत में राजनीति मिली है। वे देश के लाखों-करोड़ों लोगों की तरह सर्विस क्लास से आते हैं लेकिन मन में व्यवस्था के प्रति भरा गुस्सा उन्हें राजनीति की मुख्यधारा में खींच लाया। राजनीति करना उनके लिये एक बड़ी चुनौती है और वे इस चुनौती में स्वयं को साबित करने में सफल होते दिख रहे हैं। 2014 का लोकसभा चुनाव परिणाम यह भी साबित करेगा कि देश को अरविंद केजरीवाल जैसा जुझारू नेता की जरूरत है या राजनीति में जमे उन मठाधीशों की जिनके पास न तो दृष्टि है और न ही दर्शन। देश को निराश होने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि अल्पायु वाली आम आदमी पार्टी किसी राज्य में सिमट कर रहने के बजाय देशभर में चुनाव मैदान में उतरने का ताकत रखती है तो वह देश को दृष्टि और दिशा भी देगी। यह बात देश की जनता जानती है और संजीदा है। वह एक बार साबित कर देगी..यह पब्लिक है, सब जानती है.. (टिप्पणीकार मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम के सम्पादक हैं)

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

इंकलाब जिंदाबाद


मनोज कुमार

मजदूर हाशिये पर हैं। अब उनकी कोई बात नहीं करता। मजदूर कभी वोट बैंक नहीं माना गया तो बदलते दौर में मजदूरों की जरूरत भी बदल गयी। मजदूर किसे कहते हैं और मेहनतकश, यह भी अब लोगों को जानने की जरूरत नहीं रह गयी है। इस बार जब मई दिवस मनाया जा रहा है तब हिन्दुस्तान तख्तो-ताज का फैसला करने के लिये आमचुनाव के मुहाने पर खड़ा है। कभी इसी हिन्दुस्तान में मजदूरों के लिये, मेहनतकश लोगों के लिये राजनीतिक दल सडक़ पर उतर आते थे। आज किसी भी राजनीतिक दल के एजेंडे में मेहनतकश के लिये कोई जगह नहीं है। उनके पास मुद्दे हैं तो धर्म और महंगाई की, वे चुनाव में वायदे करते हैं बेहतर जिंदगी की लेकिन बेहतर कौन बनायेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। हालांकि देश की आजादी के साथ ही मेहनतकश लोगों की उन्नति का जिम्मा कम्युनिस्टों के कंधे पर रहा है। आज जिस संख्या में राजनीतिक दल मैदान में हैं, तब वैसा नहीं था। कांग्रेस पर पूंजीवादी को प्रश्रय देने का कथित रूप से ठप्पा लगा था तो जनसंघ की पहचान अपने हिन्दूवादी सेाच को लेकर थी। तब माकपा हो या भाकपा या इनकी सोच से मेल खाते दल ही बार बार और लगातार मेहनतकश के पक्ष में खड़े होते दिखायी दिये हैं। 

इस चुनाव में केवल औपचारिक रूप से माकपा हो या भाकपा का हस्तक्षेप है क्योंकि इस बार के चुनाव में मुद्दे नहीं, मौका भुनाने की होड़ है। जिस तरह प्रचार पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, वह कम से कम माकपा या भाकपा के बूते की बात तो है ही नहीं। जिस तरह से प्रचार का तरीका अपनाया गया है, वह भी माकपा या भाकपा के बूते में नहीं है। कभी इस देश में पूंजीवाद के खिलाफ सर्वहारा वर्ग के बीच संघर्ष था लेकिन अब पूंजीवाद के खिलाफ पूंजीवाद के बीच संघर्ष है। तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसी, की भी बात नहीं हो रही है बल्कि बात हो रही है कि तेरे पास सौ करोड़ तो मेरे पास 99 करोड़ क्यों? जब पंूजीवाद के खिलाफ पंूजीवाद मैदान में होगा तो सर्वहारा वर्ग का क्या काम? उसके लिये तो महात्मा गांधी के नाम पर रोजगार की गारंटी दी जा रही है। साल में सौ दिन काम करेेगा और इस सौ दिन की कमाई से पूरे 365 दिन अपने परिवार को पेट भरेगा। यह सर्वहारा वर्ग की नियती है लेकिन पूंजीपति हर मिनट में लाखों कमायेगा और उसके कमाने के लिये 365 दिन भी कम पड़ जाएंगे। 

स्थिति जब ऐसी तो किसका मई दिवस और कौन नारे लगायेगा इंकलाब जिंदाबाद। नयी पीढ़ी के लोगों को मई दिवस के बारे में पता नहीं भी हो तो हैरान होने की जरूरत नहीं है। नयी पीढ़ी तो डे मनाने में यकिन रखती है क्योंकि बाजार उसे बताता है कि उसे कौन सा डे मनाना है। बाजार को क्या जरूरत है कि वह बताये हमारे देश में मई दिवस भी होता है। अंग्रेजी में शायद इसे लेबर डे कह सकते हैं लेकिन जो खुद का पेट नहीं भर सकता हो, उस लेबर के लिये क्या डे और क्या नाईट। बाजार तो कहता है कि जिनका पेट भरा हो और जो बाजार का पेट भर सके, उसके लिये ही अलग अलग डे बने हैं। मेहनतकश के लिये कोई परवाह नहीं करता है। सुरसा की तरह बढ़ती महंगाई में रोज की मजदूरी डेढ़ सौ रुपया कर हमारी सरकार ऐसा सीना तान लेती है मानो सारा खजाना उसने मजदूर के नाम कर दिया है। दरअसल, जिस तरह मशीनीकरण का दौर शुरू हो चुका है, हाथ बेकार हो रहे हैं, वहां अब कोई इंकलाब का नारा लगाने नहीं आता है। कोई यूनियन बंद होते कारखानों के सामने धरने पर नहीं बैठती हैं और न ही अखबारों के पन्ने पर मजदूरों की मौत की कोई खबर छपती है। लाल सलाम अब लोग भूलने लगे हैं क्योंकि वर्दीधारी अब उन्हें सेल्यूट मारते हैं। इस देश से तो जैसे मेहनतकश दरकिनार कर दिये गये हैं और सभी पूंजीपति हो गये हैं। पंूजीपतियों की भीड़ में सर्वहारा वर्ग कराह रहा है। अब तो इंतजार है कि दबे-कुचले लोगों के बीच से कोई आएगा और कहेगा-इंकलाब जिंदाबाद...वह सरकार निकम्मी है..

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

जीवन की पाठशाला


मनोज कुमार

किसी नन्हें शिशु के लिये मां ही उसकी पहली पाठशाला होती है और बाद के बढ़ते उम्र में अक्षर ज्ञान के लिये उसे स्कूल जाना होता है। इन दोनों शालाओं से लगभग हर व्यक्ति का साबका पड़ता है लेकिन जीवन की एक और पाठशाला होती है जहां सही अर्थों में जीवन को समझा जा सकता है। इस पाठशाला का नाम है अस्पताल। अपने सम्पर्क, रिश्तेदारी और कुछ मानव भाव से अक्सर मुझे अस्पताल की तरफ जाना होता है। इस बार काफी अरसा गुजर जाने के बाद अस्पताल जाने का मौका मिला था। अस्पताल में कोई आपका अपन भर्ती हो या आप किसी की देखरेख में गये हों, मन में एक तनाव सा होता है लेकिन इस बार बहुत कुछ ऐसा नहीं था। मेरे परिवार की बड़ी बिटिया ने एक शिशु को जन्म दिया था। रिश्ते में मैं नाना बन चुका था। सचमुच में मन को आल्हादित करने का सुखद अवसर था। सबकुछ ठीक होने की वजह से मैं रिलेक्स था और सोचा क्यों न अस्पताल का एक चक्कर लगा आऊं। पत्रकार एवं लेखक होने के नाते मन हमेशा से जिज्ञासु रहा है सो अस्पताल का चक्कर लगाते हुये भी मन कुछ सोच रहा था। तभी देखा कि एक आदमी दो लोगों के सहारे डाक्टर के कमरे की तरफ जा रहा है। किसी एक बिस्तर में सोये मरीज को स्वयं से उठा नहीं जा रहा है और वह दो लोगों की मदद से बड़ी मुश्किल से बैठने की कोशिश कर रहा है। कोई किसी को पानी पिला रहा है तो कोई किसी को दवा खिला रहा है। असशक्त और लगभग परास्त की मुद्रा में लोग अपनों के भरोसे खड़े हैं, पड़े हैं।

अस्पताल का यह दृश्य देखकर मुझे लगने लगा कि जीवन की असली पाठशाला तो यही है। जो लोग अस्पताल में भर्ती हैं, वे कहीं न कहीं अपने काम-धंधे से लगे होंगे। कुछ का नाम भी होगा। हर फन के माहिर लोग होंगे और जिन्हें कभी यह अहसास भी नहीं होगा कि वे इस तरह अस्पताल में पड़े रहेंगे अशक्त और दूसरों के सहारे। बड़ा अजीब सा लगता है सुनने और देखने में लेकिन जीवन का सच तो यही है। जिन लोगों को कभी सहारे की जरूरत महसूस नहीं हुई होगी, आज वे सहारे के लिये खड़े हैं। यह कुछ अलग सा नहीं है लेकिन सबकुछ वैसा भी नहीं है क्योंकि किसी के सहारे होने का मतलब ही स्वयं को परास्त कर देता है। मन में एक बात बार बार आ रही थी कि अस्पताल से बढक़र जीवन की पाठशाला और कौन सी होगी? जो लोग धन और लोकप्रियता के लालच में डूबे हंै, जिन लोगों को अपनों की कोई कद्र नहीं, जो लोग यह समझ बैठे हैं कि जीवन में लोग उनके आश्रित हैं, वे नहीं, जिन लोगों को यह भ्रम हो चला है कि धन से सबकुछ खरीदा जा सकता है, उन्हें इस सच से दो-चार होने के लिये एक बार अस्पताल आना जरूरी है। मरीज बन कर नहीं बल्कि जिंदगी की सच्चाई को देखने के लिये, यह जानने के लिये क्या जिंदगी वही है जो समझते हैं या जिंदगी यह है जो वे देख रहे हैं।

दुनिया की दूसरी पाठशाला किताबी ज्ञान दे सकती है। समझा सकती है कि अहंकार करना बेवकूफी है। सबकुछ यहीं धरा रह जाएगा, बंद मुठ्ठी आया था और खुली हथेली चला जाएगा, जैसी नसीहत शायद लोगों को न बदल पाये लेकिन अस्पतालनुमा पाठशाला जरूर जिंदगीको बदल देती है। दूसरों को असहाय देखकर स्वयं के असहाय होने का अहसास हो आता है और तब यही पल होता है जब अपनों की जरूरत महसूस होती है। इस जरूरत में धन और वैभव, नाम और लोकप्रियता किसी ताले में बंद तिजोरी की तरह होते हैं। किताबी ज्ञान से आगे का यह अनुभव किसी भी व्यक्ति को व्यवहारिक बना देता है। उसे उसके बनाये आवरण से बाहर निकाल कर ले आता है क्योंकि जीवन जितना बड़ा सच है, मृत्यु का भय उससे कहीं बड़ा सच। इस सच से भी बड़ा सच होता है अपनों के बिना जीना लेकिन अस्पताल अपनों के साथ जीने की शिक्षा देता है बिना किसी सीख के। शायद इसलिये मुझे लगता है कि मां, स्कूल के बाद जीवन की पाठशाला अस्पताल को ही कहा जाना चाहिये।

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

तकली की याद में...


-मनोज कुमार
यादें हैं यादों का क्या! जाने कब और कैसे आ जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। जब सारी दुनिया सोशल साइट्स की दीवानी हो रही हैं तब मुझे बापू की तकली का अनायस स्मरण हो आया। आपको भी तकली की याद हो? आपने भी अपने स्कूली समय में पोनी से तकली के माध्यम से सूत कातना सीखा होगा। मैंने तो ऐसा खूब किया है। तकली की याद दरअसल अनायस नहीं आयी बल्कि बच्चों को संस्कार देने की गरज से तकली को याद करना पड़ा। जैसे गांधी व्यक्ति नहीं एक विचार हैं, वैसा ही उनकी तकली एक उपक्रम नहीं बल्कि विचार है जो न केवल मन को एकाग्र करती है बल्कि यह विशवास भी दिलाती है कि भारत की जमीन यहीं से शुरू होती है और आगे चलती जाती है। ग्लोबल विष्व का जो सपना दुुनिया देख रही है, उसमें भारत का गांव कहीं नहीं दिखता है। गांधी जी की बातें खूब हो रही है, पर गांधी विचार पर केवल फैषन के रूप में बात हो रही है। मेरा मन तब आहत हो जाता है जब मेरे आसपास की नयी पीढ़ी का संबोधन गांधीजी को लेकर लगभग अभद्र होता है। उनकी यह अभद्रता सोची-समझी नहीं है बल्कि संस्कारगत अभाव के कारण पनपी हुई है। नयी पीढ़ी के व्यवहार को जांचने पर पाया कि उनमें विचार का पौधा तो कभी लगाया ही नहीं गया। उन्हें दौड़ना सीखा दिया गया लेकिन जिंदगी जीना नहीं सिखाया गया और परिणामस्वरूप वे बिना मकसद भाग रहे हैं। उनका मकसद मोटी सैलरी वाली नौकरी, एक बड़ी कार और तिस पर कमाऊ बीवी ही पाना रह गया है। इसको पाने के बाद मां-बाप भी यूजएंडथ्रो की श्रेणी में आ जाते हैं। यह अस्वाभाविक नहीं है और इसके लिये स्वयं पालक जवाबदार हैं। उन्होंने अपने जीवन में जो सीखा, उसे अपनी बाद की पीढ़ियों में हस्तांतरित करने की कोई कोशि
श नहीं की और उल्टे कहा नयी पीढ़ी है....नये जमाने के साथ चलेगी।
नये जमाने की बात करते हैं तो एक डॉयलाग कि जमाना जितना भी बदल गया हो, बच्चे आज भी औरतें ही जनती हैं, सारी सोच बदल जाती है। लगता है कि क्या जमाने के साथ हमारी सोच भी छोटी होती चली जा रही है? क्या हम नयी चीजों को सीखने के साथ पुराने संस्कारों को भूलते चले जा रहे हैं? इन्हीं पुराने संस्कारों में बात होती है तकली की। तकली को मैं एक विचार के रूप में अपने साथ रखना चाहता हूं। तकली के रूप में इस विचार को नयी पीढ़ी के साथ बांटना चाहता हूं। एक ऐसा विचार जो न केवल संस्कार देता है बल्कि संयम भी सिखाता है। सरपट भागती जिंदगी में एकाएक सबकुछ पा लेने की चाहत को हवा देेने के बजाय आहिस्ता आहिस्ता पा लेने की सीख देती है तकली। तकली के रूप में यह विचार हमारे बीच से कैसे और कब गायब हो गया, अहसास ही नहीं हुआ। अब जबकि भौतिक रूप से तकली को संजोने की इच्छा जागृत हुई तो मैं अवाक था। तकली हमारे विचारों और यादों से ही नहीं, बाजार से भी लुप्त हो गई है। भोपाल से दिल्ली तक के बाजारों में ढूंढ़ने पर भी तकली नहीं मिली। तकली प्राप्त करने के अपने प्रयासों में सबसे पहले तो मुझे याद दिलाना पड़ा कि तकली होती क्या है। कुछ ने चरखा बता दिया लेकिन जब उनके स्कूल के दिनों की याद दिलायी तो उन्हें स्मरण हो आया। खैर, अब तक की कोशिश  में मैं नाकाम हूं लेकिन उम्मीद है कि तकली और तकली का विचार ओझल है लेकिन विस्मृति की स्थिति में नहीं। कोई ना कोई, एक दिन मुझे तकली और विचारों से मेरे मन को उजास से भर देगा। तब तक मैं तकली का रास्ता देखता हूं....   

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

लोकतंत्र, चुनाव और युद्व


-मनोज कुमार
मैं बचपन से एक शब्द का उत्तर पाने की जुगत में लगा हुआ हूं लेकिन उम्र के पचास पर पहुंचने वाला हूं, किसी ने न तो संतोषजनक जवाब दिया और न ही मेरे सवाल के इर्द-गिर्द कुछ ऐसा लिखा पढऩे को मिले, जिसमें मेरे सवाल का जवाब हो। बहरहाल, मेरा सवाल है कि चुनाव के साथ लडऩा ही क्यों लगाया जाता है, जैसे कि चुनाव लड़ा जाएगा, चुनाव लड़ेगा, प्रत्याशी मैदान में उतारा जाएगा आदि-इत्यादि। इसका अर्थ तो यह हुआ कि चुनाव को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा तो माना गया लेकिन चुनाव एक रूप में अपरोक्ष तौर पर युद्व है, इस बात से भी इंकार नहीं किया गया।  हालांकि मैं यह भी सुनता हुआ आया हूं कि युद्व और प्रेम में सब कुछ जायज होता है और इस बात को मान लें तो चुनाव के दरम्यान जो कुछ होता है, वह गलत नहीं है। यहां तक कि अनैतिक भी नहीं क्योंकि जब चुनाव का स्वरूप ही अपरोक्ष रूप से युद्व का है और यहां जो कुछ घटेगा या घटता है, वह गलत नहीं है। ‘आखिरी वार, अबकी बार’ जैसे नारे चुनाव नहीं, युद्व का अहसास करा रहे थे।

हाल ही में हमने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का अनुभव पाया है। एक पत्रकार के नाते चुनावों में होने वाली गतिविधियों पर नजर रहती है, भले ही मैं पॉलिटिकल रिर्पोटिंग में दखल न रखता हूं। इसे यूं भी कह सकते हैं कि एक जागरूक नागरिक के नाते चुनाव में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखना मेरा अधिकार और दायित्व दोनों ही है। इसके पहले के भी चुनाव की कुछ यादें संग हैं लेकिन इस बार के चुनाव में नेताओं की जुबान जरूरत से अधिक लम्बी हो गई थी। सत्ता में आने के लिये या सत्ता पाने के लिये अपनी अपनी उपलब्धियों को गिनाना, विपक्षी की कमजोरियों को मतदाताओं के सामने लाना तो अच्छी बात है लेकिन इस बार इन बातों के साथ साथ एक-दूसरे के पुरखों पर छींटे उछालना कुछ अखरने वाला था। आखिरी वार, अबकी बार वाला नारा तो इस बात का गवाही दे रहा था कि चुनाव लोकतंत्र को मजबूत करने वाली प्रक्रिया से कहीं अधिक युद्व की दस्तक दे रहा था। 

विधानसभा चुनावों की दस्तक के साथ शुरू हुआ शाब्दिक वार आम चुनाव के आने के साथ ही तेज हो चला है। पक्ष एवं विपक्ष एक-दूसरे की खामियों को इस तरह सामने ला रहे हैं जैसे वे एक-एक करके बीमारियां गिना रहे हैं। इसी आजाद भारत में एक समय वह भी था जब चुनाव प्रचार होता था लेकिन तब आखिरी वार, अबकी बार वाला नहीं बल्कि उन दिनों के भाषणों में, नारों में शालीनता होती थी। एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव होता था। यह वह भी दौर था जब चुनाव में पेडन्यूज की बीमारी नहीं लगी थी। खबरों को खरीदने और बेचने का सिलसिला आरंभ नहीं हुआ था। राजनेता अखबारों से भयभीत होते थे। उनमें खबरों को खरीदने का साहस नहीं होता था। राजनेता और पत्रकारों के बीच की वर्जनायें आपातकाल के दौरान टूटी और ऐसी टूटी कि पेडन्यूज का जादू सिर चढक़र बोल रहा है।

चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही हिस्सा होता और युद्ध जैसे शब्द उसके इर्द-गिर्द नहीं होते तो आज राजनैतिक सम्बोधन बना होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जैसे समाज के सभी क्षेत्रों में गिरावट आयी और नैतिकता विलोपित हो गई, नीति भी अनीति में परिवर्तित हो गयी, वैसा ही गिरावट राजनीति के क्षेत्र में आयी है। लिखने में भी अब कोई राजनैतिक नहीं लिखता बल्कि राजनीति संबोधन देता है। इस राजनैतिक शब्द में अनीति छिपा हुआ है क्योंकि चुनाव नैतिकता या नीति से नहीं हो रहा है बल्कि लड़ा जा रहा है और हर लड़ाई साम-दाम-दंड-भेद से ही जीती जाती है। मुझे नहीं मालूम कि चुनाव का कब और किस तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिये शुद्धिकरण होगा जब चुनाव युद्व की तरह नहीं, एक यज्ञ की तरह होगा जिसमें सबके लिये शांति और शुचिता का भाव होगा। इस दिन के आने तक अबकी बार, आखिरी वार को देखते, सुनते और पढ़ते रहिये।

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