शुक्रवार, 17 मार्च 2017

शोध पत्रिका "समागम" मार्च 2017

साल 2017 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का 100 साल था. इन 100 साल में आधी दुनिया के हालात में क्या बदलाव आया, यह विमर्श का विषय है. खासतौर पर भारतीय मीडिया में. शोध पत्रिका "समागम" में कुछ तलाशने की कोशिश की है. शोध पत्रिका "समागम" पढ़ने के लिए www.sabrangweb.com आप देख सकते है 

शनिवार, 4 मार्च 2017

एक अलहदा राजनेता शिवराजसिंह चौहान

जन्मदिवस 5 मार्च पर विशेष
मनोज कुमार
शिवराजसिंह सरकार के खिलाफ राजधानी भोपाल में प्रतिपक्ष कांग्रेस जंगी प्रदर्शन करती है और इस प्रदर्शन में शामिल होकर लौटते समय एक सडक़ हादसे में एक कांग्रेसी कार्यकर्ता की मृत्यु हो जाती है. इस कार्यकर्ता के परिवार को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह दो लाख रुपयों की मदद करते हैं.  यह शायद पहली बार हो रहा हो कि जिसके खिलाफ मोर्चा खोला गया हो, वही आपकी मदद के लिए तत्पर है. इसी तरह विदिशा में सडक़ निर्माण का औचक निरीक्षण के लिए पहुंचे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को मजदूरों नेे पहचानने से इंकार कर दिया. इस वाकये से शिवराजसिंह के चेहरे पर गुस्से का भाव नहीं आता है बल्कि वे हंसी में लेते हैं. साथ चल रहे अफसरों को कहते हैं-चलो, भाई यहां शिवराज को कोई पहचानता नहीं. क्या यह संभव है कि एक मुख्यमंत्री को उसकी जनता पहचानने से इंकार करे और वह निर्विकार भाव से लौट आए?  ऐसी अनेक बातें हैं जो शिवराजसिंह चौहान को एक अलहदा राजनेता के रूप में चिंहाकित करती हैं. यूं तो  मध्यप्रदेश ने अपनी उम्र के 60 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं और इन सालों में उसने अलग अलग तेवर और तासीर के नेता देखे हैं. सबमें खूबियां और खासियत थी लेकिन इनमें एक अलहदा किस्म का राजनेता भी मिला जिसे यह प्रदेश शिवराजसिंह चौहान के नाम से जानता है. अलहदा इसलिए नहीं कि वे शिवराज हैं बल्कि अलहदा इसलिए कि उन्होंने मध्यप्रदेश को एक अलग तरह से पहचान दी. वे अलहदा इस मामले में भी हैं कि वे निरपेक्ष बने रहे. 11 वर्षों से लगातार सत्ता में बने रहने के बाद भी उनका अपना कोई गुट नहीं बना और वे सर्वप्रिय बने रहे. यह अपने किस्म की बड़ी राजनीतिक घटना है.  लम्बे समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजे रहना और अपना कोई गुट नहीं बनाना या किसी गुट का नेता नहीं होना ही उन्हें अलहदा बनाता है.   
2005 के जाते साल के एक महीना पहले नवम्बर में शिवराजसिंह चौहान की मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी होती है. 2005 नवम्बर से 2017 के मार्च महीना आते आते वे अपनी उम्र में 11 बरस का इजाफा कर चुके होते हैं. वे जब मुख्यमंत्री बनते हैं तो उनके खाते में अनुभव के नाम पर बहुत कुछ नहीं होता है लेकिन जब 2017 में जब इसकी पड़ताल की जाती है तो वे एक अनुभवी और वजनदार नेता के रूप में हमारे सामने होते हैं. सवाल यहां यह नहीं है कि ये 11 साल के अनुभव उनके बेहतरीन कामों के ही हैं या नहीं. सवाल यहां यह है कि उन्होंने तहेदिल से मध्यप्रदेश को संवारने की कोशिश की. 
आरंभ से उनकी छवि जुझारू और साधारण लोकनायक की रही है. वे पांव-पांव वाले भइया कहलाते हैं तो उनकी सादगी पर आम आदमी आज भी फिदा है. अब सवाल यह है कि क्या उनके 11 वर्ष उपलब्धियों के साथ खुशी में बीत गए? तब यह सवाल अपने साथ कई सवाल लेकर खड़ा होगा. वे लगातार काम करते रहे और उनकी कामयाबी से बेजार होते अपने और परायों ने उन्हें लगातार सवालों में खड़ा किया. हर सवाल उन्हें बैचेन करती रही. इस बैचेनी को वे अपनी मुस्कराहट और हंसी में उड़ा दिया करते हैं. अपनी निजी चिंता और पीड़ा को उन्होंने मध्यप्रदेश के विकास में रूकावट नहीं बनने दिया. वे हर बार और बार-बार एक नयी ताकत के साथ ऊर्जावान बनकर खड़े हो जाते. उनकी यह ऊर्जा से उनके विरोधियों को  ऊर्जाहीन बना देती है. 
आमतौर पर राजनीति में जो होता है, वह उनके साथ भी हुआ. कोशिश रही कि वे सत्ताहीन हो जाएं तो उनका जवाब था कि वे सत्ता के साथ नहीं, जनता के साथ हैं और इसी साथ के सहारे वे लगातार चलते हुए सत्ता की कमान सम्हाले हुए हैं. हर बार विजय हो, यह कामना भले ही उन्होंने नहीं की हो लेकिन विजय उनके गले लगती रही है. बात चाहे पहली दफा विधायक बनने की हो या लगातार चार बार लोकसभा के लिए चुने जाने की. शिवराजसिंह का इस तरह चुना जाना कोई आसान बात नहीं है. वे प्रतिकूल स्थितियों में भी स्वयं को अनुकूल बना लेते हैं. उनकी यह खासियत विरोधियों को और भी परेशान कर देती है.
अपने 11 साल के कार्यकाल में प्रदेश में जनहित में ऐसी योजनाओं को आरंभ किया जिसने जनता को लाभ दिया लेकिन नुकसान में उनके विरोधी रहे. वे सर्वधर्म समभाव के पैरोकार हैं. लेकिन प्रदेश के अमन पर आंच भी आ जाए तो उनसे ज्यादा सख्त प्रशासक और कोई नहीं. वे लगातार गुस्सा नहीं करते हैं और ना ही मुख्यमंत्री होने का तेवर बताते हैं लेकिन जब भी गुस्सा करते हैं और बताते हैं कि मुख्यमंत्री का तेवर क्या होता है तो प्रशासन में हलचल सी मच जाती है. उनकी मुस्कराहट में उनके फैसले छिपे होते हैं. शायद यही कारण है कि कई बार फैसले उनके बिना कुछ कहे ही अमल में आ जाते हैं.
बेटियों की चिंता करते शिवराजसिंह चौहान के लिए मातृशक्ति का सर्वशक्तिमान हो जाना पहला लक्ष्य है सो सत्ता में 33 प्रतिशत की भागीदारी उन्होंने तय कर दी. महिला एवं बाल विकास विभाग को सशक्त देखना चाहते हैं इसलिए उसे समझने वाले को विभाग सौंपा. किसान कल्याण के लिए हरसंभव कोशिश में जुटे शिवराजसिंह सरकार ने मदद की पहल की है.  गांव और ग्रामीणों की दशा सुधारने के लिए उनकी पहल का स्वागत किया जाना चाहिए. वे पर्यावरण संरक्षण के लिए चिंता करते हैं तो वे नर्मदा की स्वच्छता को बचाये रखने के लिए एक बड़ी पहल करते हैं. इस पहल को देशव्यापी समर्थन मिलता है क्योंकि नदी संरक्षण के लिए मध्यप्रदेश से आवाज उठी है. इस मामले में एक बार फिर मध्यप्रदेश, एक बार फिर शिवराजसिंह चौहान अव्वल हो जाते हैं जब देश इस फैसले का अनुसरण करता है. इसी तरह के उनके अनन्य फैसले उन्हें राजनीति में अलहदा राजनेता का दर्जा दिलाते हैं.
प्राकृतिक आपदायें राज्य सरकार के लिए चुनौती के रूप में लगातार खड़ी होती रही हैं। मध्यप्रदेश में कभी सूखा तो कभी अतिवृष्टि खेती पर मुसीबत बनकर टूटती रही है। लाख जतन करने के बाद भी प्रकृति के प्रकोप के सामने किसान बेबस हो गए और सरकार भी मजबूर। ऐसे में किसान टूटने लगे। उन्हें लगने लगा था कि बस, अब जिंदगी खत्म होने वाली है। सरकार भी हतप्रभ थी लेकिन उसकी जवाबदारी बड़ी थी। सरकार अपनी जवाबदारी जानती थी कि ऐेसे समय में ही उसे निराश किसानों का सहारा बनना है। उनके भीतर के टूटते विश्वास को जगाना है और यह विश्वास भी दिलाना था कि उन्होंने लड़ाई हारी नहीं है। किसानों के भीतर इस विश्वास को जगाने के लिए कई प्रयास किए गए जिनमें कर्जमाफी से लेकर बिटिया के ब्याह के लिए व्यवस्था करने की जवाबदारी सरकार ने स्वयं के ऊपर ले ली। सरकार के निर्मल प्रयासों को राजनीतिक चश्में से देखने की कोशिशें हुई लेकिन सरकार किसानों का विश्वास जीतने में कामयाब रही।
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान बचपन से धार्मिक प्रवृत्ति के रहे हैं और उन्हें विरासत में सर्वधर्म समभाव की सीख मिली है। मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी वे इस बात के हामी हैं कि एक मुख्यमंत्री के नाते, एक भारतीय होने के नाते उनका दायित्व है कि वे अपने जीवन में, अपने कार्य व्यवहार में सर्वधर्म समभाव को अपनाएं। यही कारण है कि मुख्यमंत्री निवास बीते दस सालों से सर्वधर्म-समभाव का साक्षी बना हुआ है। होली-दीवाली, ईद-क्रिसमस के साथ ही अन्य सभी धर्मों के पर्व मनाने की परम्परा डाली है। जिस तरह प्रदेश के आखिरी छोर पर बैठे अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री निवास आकर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के साथ भोजन का अवसर मिला, वैसे ही मुख्यमंत्री के साथ विभिन्न धर्म और वर्ग के लोगों के साथ मुख्यमंत्री उत्साह से उत्सव का आयोजन करते हैं, जो सभी के लिए उत्साह का कारण बनता है। 
अपना सा लगने वाला यह मुख्यमंत्री हमारे बीच का, आज भी अपना सा ही है. शिवराजसिंह के चेहरे पर तेज है तो कामयाबी का लेकिन मुख्यमंत्री होने का गरूर नहीं, चेहरे पर राजनेता की छाप नहीं. सत्ता के शीर्ष पर बैठने की उनकी कभी शर्त नहीं रही बल्कि उनका संकल्प था प्रदेश की बेहतरी का. वे राजनीति में आने से पहले भी आम आदमी की आवाज उठाने में कभी पीछे नहीं रहे. वे किसी विचारधारा के प्रवर्तक हो सकते हैं लेकिन वे संवेदनशील इंसान है. एक ऐसा इंसान जो अन्याय को लेकर तड़प उठता है और यह सोचे बिना कि परिणाम क्या होगा, अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने निकल पड़ता है. बहुतेरों को यह ज्ञात नहीं होगा कि शिवराजसिंह चौहान मजदूरों को कम मजदूरी मिलने के मुद्दे पर अपने ही परिवार के खिलाफ खड़े हो गए थे. शिवराजसिंह चौहान का यह तेवर परिवार को अंचभा में डालने वाला था. मामूली सजा भी मिली लेकिन उन्होंने आगाज कर दिया था कि वे आम आदमी के हक के लिए आवाज उठाते रहेंगे.
उनके इन कामों के लेखा-जोखा का यह वक्त मुफीद है क्योंकि 2017 के मार्च महीने की 5 तारीख को अपनी उम्र के एक और पड़ाव पूरा कर लेंगे. शिवराजसिंह चौहान का आंकलन भले ही मुख्यमंत्री के तौर पर ना करना चाहें लेकिन एक राजनेता के रूप में करेंगे तो पाएंगे कि सच में यह राजनेता अलहदा है. वे बड़े दिल के व्यक्ति हैं इसलिए वे अपनी आलोचना को दिल से नहीं लगाते हैं. वे आलोचना का परीक्षण करते हैं और सुधार की कोशिश करते हैं. यह कहना मुनासिब नहीं होगा कि वे सौफीसदी खरे हैं. वे भी मनुष्य हैं तो गलतियां संभव है. हालांकि तामझाम और शोशेबाजी के इस आधुनिक दौर में शिवराजसिंह की यह सादगी उन्हें औरों से अलग, बिलकुल अलग बनाती है. ‘आम’ से ‘खास’ बनने में उनकी कोई रूचि नहीं रही सो वे जैसा थे, वैसा ही बना रहना चाहते हैं. लगभग हर जगह वे अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ पायजामा-कुरता में मिलेंगे. कोई 48 बरस की उम्र में उन्होंने मध्यप्रदेश की बागडोर सम्हाली थी और आज 59 वर्ष के होने जा रहे हैं तब एक नए मध्यप्रदेश में उनका स्वागत होता है. उन्हें जन्मदिन की बधाई और शुभकामनाएं मिलती है तो ध्यान रखिए कि यह बधाई और शुभकामनाएं शिवराजसिंह चौहान के हिस्से की है, मुख्यमंत्री की नहीं. मुख्यमंत्री को बधाई देना है तो नवम्बर महीने की प्रतीक्षा करें, फिलहाल तो यह बधाई शिवराजसिंह चौहान को.

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

आत्मनिर्भर महिलाओं की नईदुनिया

अनामिका


महिलाएं आत्मनिर्भर कैसे होती हैं? इसका जीता-जागता मिसाल देखना है तो आपको छत्तीसगढ़ आना पड़ेगा. एक नगर, एक कस्बा या एक गांव में एक आत्मनिर्भर महिला की संख्या आप अंगुलियों पर नहीं गिन पाएंगे. कहीं पूरा का पूरा गांव महिलाओं के आत्मनिर्भरता की पहचान बन गया है तो कहीं समूह आत्मनिर्भर है. कुछ ऐसी जगह भी है जहां अपने हुनर के बूते छत्तीसगढ़ से पार जाकर स्वयं के जीवन को खुशहाल बना लिया है। इन सबकी दास्तां सुनने और सुनाने के लिए वक्त चाहिए. आज हम एक छोटी सी कहानी में इनकी सफलता से आपका परिचय कराते हैं। इन सफलताओं की कड़ी में पहला नाम है एक छोटे से गांव जिगयिा की कुमारी सनेश्वरी.  सनेश्वरी पहाड़ी को लाईवलीहुड कॉलेज बलरामपुर ने गारमेन्ट मेकिंग में तराश कर हुनरमंद बनाया और आज वह फ्रांनटीयर निटर प्राईवेट लिमिटेड तिरूपुर तमिलनाडु में 8500 रूपये प्रति माह वेतन के साथ आवासीय सुविधा भी मिल रही है।
बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के विकासखण्ड कुसमी के ग्राम जिगनिया की रहने वाली 20 वर्षीय कुमारी सनेश्वरी पहाड़ी कक्षा 11वीं तक पढ़ी है। पेशे से किसान पिता भगचंद गांव में रहकर खेती किसानी करते हैं और किसी तरह अपना परिवार का भरण पोषण करते हैं। सनेश्वरी के गांव में सुख-सुविधाओं का अभाव था। सपने बड़े थे और हौसले भी कम नहीं था। जरूरत थी तो एक अवसर की और सनेश्वरी को अवसर मिला लाईवलीहुड कॉलेज में। लाईवलीहुड कॉलेज में सनेश्वरी को कपड़ा कटिंग, सिलाई और गारमेन्ट मेकिंग के बारे में बारीकी से सीखा। प्रशिक्षण पूर्ण होने के उपरान्त सनेश्वरी पहाड़ी को रोजगार के रूप में फ्रांनटियर निटर प्राईवेट लिमिटेड तिरूपुुर तमिलनाडु में प्रतिमाह 8500 रूपये वेतन एवं आवासीय सुविधा मिल रही है साथ ही वह अपनी पढ़ाई को भी आगे जारी रखी हुई है। सनेश्वरी की यह कामयाबी दूसरी बच्चियों के लिए मार्गदर्शक साबित हो रही है। वे भी सनेश्वरी की तरह अपनी भविष्य बनाना चाहती हैं। ऐसे हुनर और हौसलों से भरपूर बच्चों को लाइवलीहुड कॉलेज हाथोंहाथ ले रहा है।
अब आपको उन ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं की सफलता से अवगत कराते हैं जिनके लिए शहर में व्यापार करना नहीं है लेकिन इनके हौसलों के आगे चुनौती छोटी पड़ जाती है। सारी झिझक खत्म हो जाती है। इस बात का प्रमाण है कुदालगांव की सूरज महिला ग्राम संगठन।  इस संगठन से जुड़ी महिलाएं  ‘आमचो बस्तर बाजार’ का संचालन करने लगी है जो उनके आत्मविश्वास का परिचय देती हैं।  राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत सूरज महिला ग्राम संगठन बेलबेटल, लौहशिल्प, बांस शिल्प, टेराकोटा, शीशल उत्पाद, कोसा उत्पाद, बस्तर वन उत्पाद, काष्ठ शिल्प, कौडी शिल्प के साथ ही बस्तर से जुड़ी साहित्य का विक्रय कर रही हैं। आमचो बस्तर बाजार में स्थानीय लोगों के साथ ही प्रदेश के बाहर से आने वाले पर्यटक निरंतर पहुंच रहे हैं। इसके साथ ही यहां विदेशों से आने वाले पर्यटक भी पहुंचते हैं। इनके और ग्राहक के बीच भाषा एक बाधा थी लेकिन युवक रितेश ने साथ देकर इस बाधा को दूर कर दिया है।  ‘आमचो बस्तर बाजार’ में महिलाएं बांस से बने बैग, पर्स, फाईल फोल्डर, मोबाईल पर्स, डायनिंग सेट, फर्नीचर, मिट्टी के बने गुल्लक, हाथी, लैम्प, फूलदान, देव प्रतिमाएं, शीशल की बनी फल टोकरी, टेबल क्लॉथ, डॉल, डिजाईनर बैग, झूला, बॉल हैंगिंग, पेन स्टैण्ड, टी कोस्टर, कोसा की बनी साडिय़ां, शाल, सूट पीस, जैकेट, शर्ट कपड़ा, स्कार्फ, सागौन और बीजा लकडिय़ों की बनी सुंदर प्रतिमाएं, कौड़ी शिल्प आदि का विक्रय कर रही हैं। इसके साथ ही यहां आवला जूस, जामुन जूस, शहद एवं विभिन्न प्रकार के चूर्ण के साथ ही जैविक कृषि उत्पाद के तौर पर रागी, कोदो, कुटकी, कोसरा आदि लघुधान्य उत्पाद भी रखे गए हैं। यहां हाथों से घुमाकर बजाई जाने वाली बासुरी और बांस से बने बक्कल की आज कल काफी ज्यादा मांग है।
आमचो बस्तर बाजार में छत्तीसगढ़ की कला नमूदार हो रही है तो नारायणपुर नगर की महिलाएं राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन की सहायता से ईंट निर्माण गतिविधि संचालित कर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। की महालक्ष्मी स्व सहायता समूह की अध्यक्ष बबीता बेसरा ने बताती हैं कि कि समूह गठित करने के पहले सभी महिलायें ईट निर्माण में मजदूरी कर परिवार के भरण-पोषण में मदद करती थी। इस दौरान राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के प्रबंधक रितेश पाटीदार ने सभी महिलाओं को समूह गठित कर बचत, साझा ऋण सहित छोटी आर्थिक गतिविधि संचालित करने की समझाईश दी जिससे इन महिलाओं में आत्मविश्वास में वृद्धि हुई। अपनी छोटी सी बचत की 10 हजार रुपये के साथ इन महिलाओं ने ईंट निर्माण करने की ठानी। वहीं समूह के सदस्यों ने अपनी ईट निर्माण के लिए 50 हजार रुपये बैंक ऋण लेने का आवेदन आजीविका मिशन परियोजना में जमा किया। इस दौरान समूह की महिलाओं ने स्वयं के पास उपलब्ध रुपयों से ईंट निर्माण प्रारंभ कर दिया। बैंक ने भी उन्हें ऋण देकर उनके काम को आगे बढ़ाने में मदद की है।  समूह अब तक 30 हजार ईट बेच चुकी है और 30 हजार ईंट उपलब्ध है। इस महिला समूह को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत 20 व्यक्तिगत शौचालय निर्माण के लिए ईंट आपूर्ति का काम नगर पालिका ने सौंपा है। समूह सभी 20 शौचालय निर्माण के लिए ईंट सुलभ कराया है। समूह की अध्यक्ष बबीता बेसरा कहती है कि समूह की महिलायें नगर को स्वच्छ और साफ-सुथरा रखने के इस महती कार्य में उक्त शौचालय बनाने वाले हितग्राहियों का सहयोग कर रहे हैं। वहीं अपने ईंट निर्माण गतिविधी को भी सुचारू ढंग से संचालित कर रही हैं। इस तरह एक एक कदम चलकर छत्तीसगढ़ की महिलाएं आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ रही हैं। यह उनके आत्मविश्वास की कहानी है जो दूसरों के लिए सबक और जमाने के लिए आदर्श है।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान के 12 वर्ष

राजिम कुंभ 2017
अनामिका
राजिम कुंभ का यह 12वां वर्ष है. 12 वर्षों का भारतीय जीवन में विशेष महत्व होता है. 12 वर्षों के अंतराल में देश के चार प्रमुख तीर्थस्थानों पर कुंभ का आयोजन किया जाता है. छत्तीसगढ़ के राजिम में यह उत्सव हर वर्ष माघी पूर्णिमा से आरंभ होकर महाशिवरात्रि पर पूर्ण होता है. इस बार का राजिम कुंभ विशेष महत्व लिए हुए है इसलिए राजिम कुंभ कल्प-2017 का नाम दिया गया है.  राजिम कुंभ लोगों के मन की सहज श्रद्धा, उनके जीवन की सहज आस्था, सामान्य उल्लास लगने वाले जीवन को अद्भुत उल्लास और पूर्णता से भर देता है. एक ओर जहाँ श्रद्धा के भाव से भरे होते हैं तो दूसरी तरफ मेले के उल्लास के चटख रंग भी यहाँ मौजूद हैं. राजिम कुंभ अपने होने में भारतीय मानस और भारतीय जीवन के रंग-बिरंगे मेले के रूप में मन मस्तिष्क पर छा जाता है.
कुंभ स्नान का अपना महत्व है और इस स्नान का धार्मिक दृष्टि से अपनी तरह का पुण्य. भारत में चार स्थानों पर प्रत्येक बारह वर्षों में कुंभ का आयोजन होता है और बीते 12 से लगातार हर वर्ष कुंभ का आयोजन कर छत्तीसगढ़ ने धार्र्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ की पावन धरा से आम आदमी का साक्षात्कार कराया है. आज से 12 वर्ष पहले राजिम का चयन कुंभ के आयोजन के लिए चयन किया गया था. यह वह स्थान है जहां तीन नदियों का संगम है. 
सोंढूर, पैरी और महानदी के त्रिवेणी संगम-तट पर बसे छत्तीसगढ़ की इस नगरी को श्रृद्धालु श्राद्ध तर्पण, पर्व स्नान और दान आदि धार्मिक कार्यों के लिए उतना ही पवित्र मानते हैं, जितना कि अयोध्या और बनारस को. तीनों नदियों के संगम पर हर वर्ष न जाने कब से आस-पास के लोग राजिम कुंभ मनाते आ रहे हैं. राजिम कुंभ के त्रिवेणी संगम पर इतिहास की चेतना से परे के ये अनुभव जीवित होते हैं. हमारा भारतीय मन इस त्रिवेणी पर अपने भीतर पवित्रता का वह स्पर्श पाता है, जो जीवन की सार्थकता को रेखांकित करता है. अनादि काल से चली आ रहीं परम्पराएँ और आस्था के इस पर्व को राजिम कुंभ कहा जाता है..छत्तीसगढ़ का उल्लेख आते ही राजिम कुंभ का उल्लेख सर्वप्रथम होता है. 12 वर्ष पहले आरंभ हुए राजिम कुंभ ने छत्तीसगढ़ को पृथक पहचान दी है. आज 12वें वर्ष में जब राजिम कुंभ का आयोजन हो रहा है तब छत्तीसगढ़ के साथ पूरा संसार धर्म और आध्यात्म में डुबकी लगाने को तैयार है. राजिम कुुंभ की तिथि हर वर्ष पहले से तय रहती है.
राजिम छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित हैं. धार्मिक एवं सांस्कृतिक नज़रिये से राजिम एक ऐतिहासिक नगर हैं. यहाँ 8वीं-9वीं शताब्दी निर्मित राजीव लोचन मंदिर हैं. ऐसी पौराणिक मान्यता हैं कि़ जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूरी नहीं होती जब तक इस मंदिर का दर्शन ना किया जाये. संगम के बीचो-बीच कुलेश्वर महादेव का मंदिर हैं. वैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक ‘महाप्रभु वल्लभाचार्य’ का जन्म भी राजिम से लगे चंपारण में हुआ था. राजिम ऐतिहासिक रूप से शैव एवं वैष्णव संप्रदाय की मिश्रित भूमि हैं. श्रद्धालुओं के लिये श्राद्ध, पिंड दान, धार्मिक कार्यों के लिये राजिम का त्रिवेणी संगम प्रयाग के संगम जितना ही पवित्र हैं. 
12 वर्ष पहले प्रयाग के रूप में पहचाने जाने वाले राजिम को देश के संतों ने कुंभ का दर्जा दिया साल-दर-साल राजिम कुंभ वैभव का प्रकाश धर्मालुओं को आलौकित करता आ रहा है. धर्म, अध्यात्म और विज्ञान के इस सालाना अनुष्ठान का उपक्रम शुरू हो चुका है. राजिम कुंभ सदा से ही भारतीय मानस के गहरे अर्थों को रेखांकित करता रहा है. वह भारतीय जीवन के उल्लास पक्ष को भी दिखाता रहा है. शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, अखाड़ा प्रमुख तथा संतों की अमृत वाणी को लोगों ने जब ग्रहण किया, तो दुनिया के नये अर्थ सामने आए. उनका यहाँ एकत्र होना बताता है कि राजिम में त्रिवेणी पर कुंभ है और राजिम कुंभ के पावन पर्व की अनुभुति को गहराई प्रदान करते हैं. 10 फरवरी से शुरू हुये इस आयोजन को इस बार राजिममहाकुंभ कल्प-2017 नाम दिया गया है. कुंभ के 12 वर्ष पुरे होने पर इस वर्ष विशेष तैयारियां की गयी हैं. इस वर्ष तीन शाही स्नान होंगे. 24 फरवरी महाशिवरात्रि के शाही स्नान के साथ यह कुंभ समाप्त होगा. लोगों की मान्यताएं हैं कि राजिम संगम में स्नान करने से सारे रोग, सारे पाप से मनुष्य मुक्त हो जाता हैं.
राजिम कुंभ छत्तीसगढ़ के लिए महज एक उत्सव नहीं है और ना ही कोई धार्मिक मेला बल्कि यह अनुष्ठान है जीवन के उस प्रकल्प का जो इस नश्वर शरीर को परमात्मा से मिलाता है. ऐसा मानना है उन दिव्य गुरुजनों का जिन्होंने अपना जीवन ईश्वर को सौंप दिया है. ऐेेसे दिव्य गुरुओं के आश्रय में छत्तीसगढ़ की जनता धन्य धन्य हो जाती है और जीवन के वास्तविक अर्थों को समझ कर जीने का प्रयास करती है. (तस्वीर गूगल से साभार )

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

समागम 2017 फरवरी का अंक

शोध पत्रिका समागम अपने निरन्तर प्रकाशन के 16 साल पुरे कर चुकी है. समाज के विविध पक्षो को मीडिया और सिनेमा के जरिये देखने और समझने की कोशिश करते रहे हैं. इस क्रम में इस बार 5 राज्यो में हो रहे विधानसभा चुनावों पर केंद्रित किया है. खासतौर पर उत्तर प्रदेश में चुनाव ज़िद और ज़िरह का चुनाव है. पिता से अलग लाइन लेकर अखिलेश का चुनाव और भाजपा का अखिलेश के कामो को लेकर ज़िरह करना। पंजाब और गोवा में आम आदमी पार्टी का दम दिखाना और आखिर में मणिपुर में इरोम का भाजपा पर आरोप लगाना। इन राज्यो के चुनाव 2019 के आम चुनाव की ज़मीं भी तैयार करेंगे। 

शनिवार, 28 जनवरी 2017

नैतिक शिक्षा के पैरोकार महात्मा गांधी

गांधी पुण्यतिथि पर विशेष

मैं कभी झूठ नहीं बोलता, यह वाक्य लगभग हर आदमी कहता है लेकिन जब स्वयं की गलती मानने का वक्त होता है तो वह केवल और केवल झूठ का सहारा लेता है। यह  बनी-बनायी बात नहीं है अपितु जीवन का एक कड़ुवा सत्य है। ऐसा क्यों हुआ या हो रहा है? इसके पीछे कारण तलाश करेंगे तो हमें ज्ञात होगा कि नैतिक शिक्षा के गुम हो जाने के साथ ही समाज में संकट सर्वव्यापी हो गया है। ऐसे में हमें महात्मा गांधी का स्मरण करना सबसे जरूरी लगता है। वे भी हमारी तरह हाड़-मांस के व्यक्ति थे। उन्होंने अपने जीवन में अनेक गलतियां की लेकिन अपनी गलतियों को समझा और पूरे साहस के साथ समाज के समक्ष ‘सत्य के प्रयोग’ शीर्षक से रखा। आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन बापू और महात्मा के रूप में मौजूद हैं। उनकी आत्मकथा नैतिक शिक्षा की पाठशाला है। एक ऐसी पाठशाला जो जीवन का सीख देती है। नैतिकता के उच्च मानदंड को पूर्ण करती हुई एक मनुष्य बनने का साहस और संकल्प का भाव उत्पन्न करती है। मनुष्य में मनुष्यता का आत्मबल जगाती है। 
आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं। हमारे भीतर सहिष्णुता का जिस तेजी से हस हो रहा है और कदाचित जीवन मूल्यों से हम बेलाग हुए जा रहे हैं तो कहीं न कहीं नैतिक शिक्षा का अभाव ही है। प्राथमिक शिक्षा में नैतिक शिक्षा का पाठ इसलिए ही पढ़ाया जाता था कि बच्चे बड़े होकर जीवन को सही परिप्रेक्ष्य में समझें। नैतिक शिक्षा का अर्थ बहुत सामान्य सा है। इसका अर्थ है जीवन में हम झूठ बोलने से बचें, बड़ों का निरादर ना करें, स्वयंसेवी बनें, राष्ट्र और समाज के प्रति हमारी निष्ठा हो तथा सबके प्रति मन में दया का भाव बना रहे। आज ये सारे लक्ष्ण नयी पीढ़ी में समाप्त होते दिख रहे हैं। दूसरों से अधिक मैं कैसे और कितना प्राप्त कर लूं, इसकी होड़ मची है। संयम और तृप्ति तो बस बीते जमाने की बात हो चुकी है। लालच ने अनेक विकारों को जन्म दिया है। इन विकारों के चलते ही समाज में टूटन की स्थिति बन रही है। यह सब एक स्वस्थ्य और विकसित समाज के लिए दुखदायी है। 
यह भारत वर्ष का सौभाग्य है कि जनवरी माह में हमें बड़े महामनाओं का स्मरण करने का देता है। इस महीने पत्रकारिता के एक अन्य पुरोधा माखनलाल चतुर्वेदीजी की पुण्यतिथि है, युवाओं के मार्गदर्शक स्वामी विवेकानंद जी की जयंती है। महात्मा की तरह इनकी जीवनी भी नैतिकता की पाठ पढ़ाती है। ये सारे लोग यूं ही हमारे प्रेरणास्रोत नहीं बनें बल्कि इन्होंने अपने जीवनकाल में वह सब कुछ किया जो सत्य, अहिंसा और सद्मार्ग की ओर ले जाते हैं। आज विश्वमंच पर भारत की आवाज गूंजती है तो हमारे इन पुरखों के कारण। आज हम अलग से चिंहित हैं तो इन पुरखों के उन कार्यों के कारण जिनको आज सारा संसार मान रहा है।  हम इठला सकते हैं और अभिभूत भी हो सकते हैं कि हम श्रेष्ठ हैं तो श्रेष्ठता इन्हीं महानुभावों के कर्मों से है किन्तु अब इठलाने की जगह पर आत्ममंथन करना होगा। हमें इस बात की जांच करनी होगी कि हम अपने पुरखों के कर्मों से आज शीर्ष पर हैं किन्तु क्या हमारे कर्म ऐसे हैं जो हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए गौरव का विषय बन सके? शायद ऐसा नहीं है। गौरव गाथा के रास्ते के लिए बनाये गए नींव का पत्थर अर्थात नैतिक शिक्षा को ही जीवन से निकाल बाहर किया है। जब जीवन में नैतिक व्यवहार ही नहीं होगा तो सत्य और अहिंसा एक दिवास्वप्र की तरह है। नैतिक शिक्षा ही सत्य और अहिंसा का मार्ग प्रशस्त करती है किन्तु वर्तमान समय भटकाव का है। यांत्रिक रूप से हम विकसित हो चुके हैं किन्तु व्यवहारिक रूप से, चरित्र के तौर पर हमारा पतन आरंभ हो चुका है, इस बात पर ऐतराज करने का कोई कारण शेष नहीं रहता है। ऐसा भी नहीं है कि इस बिगड़ रही स्थिति से हम बाहर नहीं आ सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है आत्मबल की। यह आत्मबल हमें महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ के पठन से आएगा। 
         30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर उनका स्मरण करते हुए हमें इस बात का संकल्प लेना चाहिए कि स्वयं के साथ बच्चों को नैतिक शिक्षा दें ताकि उनका कल सुंदर और सुनहरा बन सके। इस बात का ध्यान रखना होगा कि महापुरुषों के जन्म या पुण्यतिथि पर हम उनका स्मरण केवल इसलिए नहीं करते हैं कि तारीखें याद रह जाए बल्कि इसलिए करते हैं कि उनके बताये रास्ते का हम पुर्नपाठ करें। उन्हें आत्मसात करें और एक नई दुनिया की शुरूआत करें। एक बार फिर हमें महात्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, विवेकानंद और सुभाषचंद्र बोस को याद करते हुए उनके बताये रास्ते पर चलकर संकल्प लेना होगा। 

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

शोध पत्रिका ‘समागम’ के प्रकाशन के 16 साल पूरे हुए जनवरी 2017 का अंक ‘महात्मा की पाठशाला’

शोध पत्रिका ‘समागम’ के प्रकाशन के 16 साल पूरे हुए
भोपाल। भारतीय समाज की ताकत नैतिक शिक्षा होती थी लेकिन शैक्षिक परिसरों में बाजार के प्रवेश के बाद नैतिक शिक्षा का लोप हो चुका है। आज आवश्यक हो गया है कि हम सब मिलकर प्राथमिक स्तर पर नैतिक शिक्षा को अनिवार्य करने पर जोर दें। समाज के इस ज्वलंत विषय को लेकर भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘समागम’ ने जनवरी 2017 का अंक ‘महात्मा की पाठशाला’ शीर्षक से प्रकाशित किया है। इस अंक के प्रकाशन के साथ ‘समागम’ ने अपने नियमित प्रकाशन के 16 साल भी पूरे कर लिए हैं।
मीडिया, सिनेमा एवं समाज पर केन्द्रित मासिक शोध पत्रिका ‘समागम’ ने अपने प्रकाशन के सतत 16 साल जनवरी 2017 में पूरा कर लिया है। इन सालों में ‘समागम’ बुद्धिजीवियों, शिक्षकों एवं शोधार्थी विद्यार्थियों के बीच लगातार लोकप्रिय बनती रही। इन सबका लेखकीय सहयोग से स्तरीय पत्रिका के रूप में ‘समागम’ की पहचान बनी रही। ‘समागम’ का हर अंक विशेषांक के रूप में होता है। 16 सालों में विविध विषयों पर ‘समागम’ के विशेष अंकों का प्रकाशन हुआ। नवम्बर 2016 में मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ विभाजन पर ‘समागम’ का विशेष अंक था तो दिसम्बर का अंक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के रजत जयंती पर था। इसके पूर्व स्वच्छ भारत अभियान को केन्द्र में रखकर ‘समागम’ के दो अंक का प्रकाशन किया गया था। ‘समागम’ का जनवरी एवं अक्टूबर अंक महात्मा गांधी पर केन्द्रित होता है। जनवरी-2017 का अंक ‘महात्मा की पाठशाला’ पर केन्द्रित है। महात्मा की पाठशाला का अर्थ समाज में नैतिक शिक्षा के विलुप्त होने को समझाने की विनम्र कोशिश है। इसके पूर्व अक्टूबर माह का अंक महात्मा गांधी की स्वच्छता दृष्टि और भारत सरकार के स्वच्छता अभियान को लेकर विशिष्ट सामग्री का प्रकाशन किया गया था। 
शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक एवं वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार कहते हैं कि हमें यकीं ही नहीं होता कि हमने अपने प्रकाशन के 16 साल पूरे कर लिए हैं। यह हमारे लिए एक सपने के सच होने जैसा है। बेहद सीमित साधनों में इसका प्रकाशन किया जा रहा है। वे कहते हैं कि लेखों के लेखकों की तस्वीरें प्रकाशित करने का आग्रह होता है किन्तु हम ऐसा नहीं करते हैं क्योंकि तस्वीरों के स्थान लेखक की लेखनी महत्वपूर्ण होती है। सम्पादक मनोज कुमार कहते हैं कि पत्रिका की गंभीरता बनी रहे, इसकी पूरी कोशिश होती है किन्तु पूफ्र की गलतियां अखरने वाली होती हैं। कोशिश करते हैं कि ऐसा ना हो। वे  ‘समागम’ के  प्रकाशन के लिए मार्गदर्शन करने के लिए बालकवि बैरागीजी के साथ ही कुलपति कुठियाला, परमारजी, वरिष्ठ पत्रकार गिरिजाशंकरजी, जगदीश उपासनेजी एवं पत्रकारिता शिक्षा से संबद्ध सभी लोगों का आभार मानते हैं।  ‘समागम’ का अगला अंक पांच राज्यों में होने वाले चुनाव एवं चुनाव प्रक्रिया में हो रहे बदलाव पर केन्द्रित होगा।     

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