भारत में हिंदी पत्रकारिता में तारीख 30 मई 1826 मील का पत्थर है. इस दिन पहला हिंदी समाचार पत्र का प्रकाशन आरम्भ हुआ था. तब से लेकर आज तक हिंदी पत्रकारिता ने अनेक मानक गढ़े है. इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दौर आया और अब हम सोशल मीडिया की जद में हैं. कहना होगा कि कहाँ से चले थे हम और कहाँ पहुंच गए... ठोंकने की पत्रकारिता अब निपटाने की मीडिया में बदल रही है.. कुछ इस बदलते दौर की कहानी कह रहा है शोध पत्रिका "समागम"
शनिवार, 13 मई 2017
गुरुवार, 27 अप्रैल 2017
किसकी जय और किसकी पराजय?
मनोज कुमार
दिल्ली म्युनिसपल कॉर्पोरेशन के चुनाव होने के पहले से लेकर परिणाम आने तक ऐसा हल्ला मचा रहा कि मानो कोई आम चुनाव होने जा रहा है. जैसे देश के हजारों नगर निगमों में चुनाव होते हैं, वैसा ही दिल्ली का चुनाव था लेकिन इसे राष्ट्रीय स्वरूप देकर अनचाहे में अरविंद केजरीवाल का कद और ऊंचा कर दिया गया. जैसा कि पहले से माना जा रहा था कि इस स्थानीय निकाय के चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर होगा सो रहा. आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन संतोषजनक रहा क्योंकि उसके पास वहां खोने के लिए कुछ नहीं था और ऐसे में जो मिला, वह कम नहीं है. चिंतनीय स्थिति तो कांग्रेस की है जिसके बारे में चर्चा भी नहीं हो रही है. परिणाम के लिहाज से वह तीसरे स्थान पर रही लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि कांग्रेस प्रत्याशियों की रिकार्ड जमानत जब्त हुई. यह तो दिल्ली नगर निगम के चुनाव का मोटा मोटा हिसाब किताब है. बिन्दुवार जब इस विश£ेषण करते हैं तो पाते हैं कि चुनाव परिणाम में पीछे रहने वाली आम आदमी पार्टी का जलवा कायम है जबकि भाजपा के पास सिवाय मोदी मंत्र के कुछ और नहीं है. इस चुनाव में विजय हासिल करने में अमित शाह की रणनीति का वैसे जिक्र नहीं हो रहा है, जैसा कि उत्तरप्रदेश के चुनाव में हुआ था. कांग्रेस का सूपड़ा साफ है और अब विश£ेषण में भी उसकी गिनती उल्लेखनीय नहीं रह गयी है. भाजपा की चुनौती एक बड़ा कारण है जिसके चलते ‘आप’ का कद कम नहीं हो रहा है जबकि इतिहास गवाह है कि ऐसी क्षेत्रीय पार्टी थोड़े समय में नेपथ्य में चली जाती हैं फिर वह असम गण परिषद हो या लोकजनशक्ति पार्टी.
हैरानी तो इस बात की थी कि इस मामूली से चुनाव को लेकर नेशनल कहलाने वाले मीडिया ने इस पूरे चुनाव को इस तरह कव्हर किया मानो दिल्ली नगर निगम के चुनाव जीतने या हारने से दिल्ली की तख्त को खतरा हो जाएगा. ‘आप’ ने जीत दर्ज कर ली तो वह दिल्ली के तख्तोताज पर बैठ जाएगी और भाजपा हार गई तो मोदी जी को प्रधानमंत्री की कुर्सी छोडऩा पड़ेगी. यह भी शायद पहली बार हुआ कि इस मामूली से चुनाव को लेकर बकायदा एक्जिट पोल कराया गया. चुनाव परिणाम विश£ेषण के लिए उन विशेषज्ञों का पैनल बिठाया गया जो आम चुनाव और विधानसभा चुनाव में अपनी समझ रखते हैं. ये सारे मीडिया के महारथी दिल्ली नगर निगम चुनाव में विश£ेषण करते दिख रहे थे. दिल्ली नगर निगम का चुनाव और हम भोपाल, रायपुर, पटना और लखनऊ में बैठ कर परिणाम को इस तरह देख रहे थे और हमें दिखाया जा रहा था कि दिल्ली नगर निगम चुनाव के बाद पूरे देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल जाएगा. चुनाव परिणाम आते ही मीडिया जिस तरह ‘आप’ पर टूट पड़ा, वह भी अविश्सनीय सा था. केजरीवाल से इस्तीफा मांगा गया तो ‘आप’ की तरफ से बचकाना बयान आया कि बिहार में भाजपा की पराजय के बाद मोदी ने इस्तीफा दे दिया था? सवाल यह है कि प्रधानमंत्री के इस पद की गरिमा का इस तरह हस क्यों किया जा रहा है? क्यों बात बात में एक नगर निगम के चुनाव में प्रधानमंत्री को क्लब किया जाता है? क्यों स्थानीय नेता का नाम नहीं लिया जाता? कांग्रेस के माकन ने इस हार को अपनी हार बताते हुए इस्तीफा दिया, उसकी चर्चा नहीं हो रही है. मीडिया इन बातों पर चर्चा नहीं करता है. मीडिया का यह महाकवरेज यदा-कदा प्रायोजित हो तो हैरान होने की जरूरत नहीं है. मिशन से प्रोफेशन तक का रास्ता यहीं से होकर जाता है.
आम आदमी पार्टी को महत्वपूर्ण बनाने में भाजपा और मीडिया का अहम रोल रहा है. स्थानीय निकाय के चुनाव को विधानसभा और लोकसभा चुनाव से तुलना कर ‘आप’ को इतना महत्व दिया गया कि अनजाने में वह स्वयं में बड़ी पार्टी बन गयी. अरविंद केजरीवाल का डर भी साफ दिख रहा था. भाजपा ने दिल्ली नगर निगम के चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्र बना लिया था और वह किसी विधानसभा चुनाव के लिहाज से ही मैदान में थी. इस समय हम इस मामूली चुनाव में हुए खर्चे की बात नहीं करेंगे लेकिन जिस आक्रामक रूप से प्रचार किया गया, वह अनोखा था. अनोखा तो यह भी था कि एक स्थानीय स्तर के चुनाव में मोदी ब्रांड का इस्तेमाल किया गया जबकि जिस मनोज तिवारी को दिल्ली की कमान सौंपी गयी थी, उन्हें ही किला फतह करना था. यह सब जानते हैं कि मोदी के नाम के बिना सफलता असंभव सा है, सो आम चुनाव से लेकर नगर निगम के चुनाव भी मोदी के नाम पर जीते गए. ऐसे में मनोज तिवारी ऐंठते दिखते हैं तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि अभी उनका कद ऐसा नहीं हुआ है कि वे एक मामूली चुनाव भी स्वयं के दम पर लड़ सकें.
साल 2014 में केन्द्र में जब नरेन्द्र मोदी सरकार सत्तारूढ़ हुई तभी से वह हमेशा चुनाव के मोड में रही है. दिल्ली नगर निगम का चुनाव हो, विधानसभा, लोकसभा का चुनाव हो या उपचुनाव हो, हर चुनाव इस तरह लड़ा गया, मानो यह आखिरी चुनाव है. धन-बल के साथ पूरा फोकस नरेन्द्र मोदी के चेहरे को सामने रखकर किया गया. एक मायने में भाजपा नेपथ्य में है और मोदी परिदृश्य में. कहने को अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की हैसियत रखते हैं लेकिन हर कैम्पन में मोदी-शाह की जोड़ी दिखती है. यही कारण है कि पहले महाराष्ट्र, फिर गुजरात, राजस्थान और अब दिल्ली नगर निगम के चुनाव को लेकर मोदी-शाह की पार्टी उत्साहित और उत्तेजित है. उनकी इस उत्तेजना को बढ़ाने में केजरीवाल की बड़ी भूमिका है. चार साल पहले एक जनांदोलन से जन्मी यह पार्टी राष्ट्रीय चुनौती का कारण बन चुकी है तो बार बार पराजय के बाद भी वह विजेता की भूमिका में है. भाजपा और कांग्रेस जैसे दिग्गज दलों के सामने बहुत मामूली सी पार्टी होने के बाद भी जिस तरह से तवज्जो दी जाती है, उससे केजरीवाल का कद और भी बढ़ जाता है.
केजरीवाल की पृष्ठभूमि राजनीतिक नहीं रही है लेकिन उनकी नजर राजनीति की शीर्ष बिन्दु पर रही है. वे एक नौकरीपेशा व्यक्ति रहे हैं और इत्तेफाकन अन्ना हजारे के आंदोलन में उन्हें जगह मिल गई. जनलोकपाल को लेकर जो आंदोलन हुआ, उसने भारतीय राजनीति को एक नई दिशा की तरफ ले गया, जैसा कि आपातकाल के बाद देश मेें राजनीति ने नई करवट ली थी. आपातकाल के बाद क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ लेकिन सबको धता बताते हुए इंदिरा गांधी फिर सत्ता के शिखर पर थीं. लेकिन अन्ना आंदोलन से राजनीति एक नई दिशा की तरफ गई और कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा. आपातकाल के समय की तरह क्षेत्रीय पार्टी का उदय हुआ लेकिन एकमात्र आम आदमी पार्टी की. अन्ना हजारे हाशिये में चले गए और केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी की उम्मीदों की पार्टी बन गई. पहली बार आम आदमी पार्टी ने 15 साल की कांग्रेस की दिल्ली सरकार को धूल चटाकर अपना वर्चस्व स्थापित किया लेकिन पूर्ण बहुमत से दूर रहने के कारण उन्होंने सरकार नहीं बनायी. इसी उहापोह के चलते एक वर्ष बाद फिर दिल्ली विधानसभा का चुनाव हुआ और अबकी बार, केजरीवाल की तर्ज पर कांग्रेस क्या, भाजपा भी साफ हो गई. इस जीत से केजरीवाल को हौसला तो मिला, राजनीति दलों में अपरोक्ष रूप से आप को लेकर कशमकश की स्थिति बनी रही. यह तब और हुआ जब 2014 के आम चुनाव में मोदी की आंधी में पूरा देश उनके साथ था, तभी आप ने पंजाब में लोकसभा की 4 सीटों पर जीत दर्जकर अपना वर्चस्व दिखा दिया. कांग्रेस के खिलाफ खड़े होने वाले अन्ना हजारे अपने गांव तक सिमट गए.
इस तरह की जीत से केजरीवाल का मनोबल बढ़ता गया जो आहिस्ता आहिस्ता अहम में बदलने लगा. योगेन्द्र यादव, किरण बेदी सरीखे नेताओं ने केजरीवाल से किनारा कर लिया. जिस भाजपा के खिलाफ किरण बेदी ने हुंकार भरा था, उसी भाजपा में उन्हें जगह मिली लेकिन योगेन्द्र यादव उम्मीदों के सहारे स्वराज इंडिया का बैनर लेकर एकला चलो की राह पर निकल पड़े. केजरीवाल से झटका खाए हजारे योगेन्द्र के साथ भी नहीं आए. यह एक ऐसा मौका था जब केजरीवाल को अनदेखा कर उन्हें तोड़ा जा सकता था लेकिन भाजपा ने उसे गंभीरता से लिया और केजरीवाल के पैर उखडऩे के बजाय और गहरे जमते चले गए. पंजाब, गोवा में करारी पराजय के बाद भी दिल्ली नगर निगम चुनाव में जिस तरह केजरीवाल को भाजपा ने चुनौती दी, उससे वे और मजबूत हो गए. अनचाहे में मीडिया ने भले ही भाजपा के पक्ष में काम किया हो लेकिन फायदा केजरीवाल को ही मिला. ऐसा नहीं है कि केजरीवाल एकमात्र नेता हैं जिनकी पार्टी पहली क्षेत्रीय पार्टी है. स्मरण रखना होगा कि छात्रनेता प्रफुल्ल महंतों की पार्टी असम गण परिषद भी इसी तरह उभरी थी लेकिन वह असामयिक हो गई. कांग्रेस के कई क्षत्रपों ने क्षेत्रीय दल बनाये और कांग्रेस में वापसी उनकी मजबूरी थी. स्वयं उमा भारती को अपनी लोकजनशक्ति पार्टी को भाजपा में तिरोहित करना पड़ा क्योंकि भाजपा के बिना उनका सरवाइव करना मुश्किल सा था. एक और ताजा उदाहरण केजरीवाल की तरह आईएएस की नौकरी छोडक़र राजनीति में आने वाले अजीतप्रमोद जोगी का है. बरसों तक कांग्रेस में सत्ता का सुख भोगने वाले जोगी इस समय स्वयं की पार्टी बनाकर कांग्रेस और भाजपा को चुनौती देने की बात कर रहे हैं जबकि हकीकत में अभी उन्हें उड़ान भरने में वक्त है. यही नहीं, उनके कांग्रेस वापसी या भाजपा में जाने की चर्चा भी चल पड़ी है. ऐसे में केजरीवाल को चुनौती मानकर उनका कद बढ़ाने की जगह पर उनकी अनदेखी से आप का कद घट सकता है.
इस नए दौर में एक और अलग किस्म का राजनीतिक अनुभव हो रहा है. लोकसभा से पंचायत चुनाव तक प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक जुट जा रहे हैं. मध्यप्रदेश में बीते सालों में ऐसा कोई चुनाव नहीं होगा जिसमें स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने कमान न सम्हाली हो. इन चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम का सहारा ना लिया गया हो, ऐसा भी नहीं हुआ. जबकि अनुभव यही कहता है कि स्थानीय स्तर के चुनाव प्रत्याशी के व्यक्तित्व एवं कार्यों पर जीते या हारे जाते हैं. भाजपा का जीत एकमात्र लक्ष्य है. यह अनुचित भी नहीं लेकिन शून्य को शिखर बना देने की यह राजनीति केजरीवाल को एक बड़ा स्पेस देती है. और इस स्पेस को बढ़ाने में मीडिया के वे महारथी भी शामिल हैं जो अनचाहे में केजरीवाल का साथ दे रहे हैं. ईवीएम मशीन के बहाने जो दृश्य केजरीवाल ने पैदा किया, वह महज दिशाभ्रम था और इसमें ही सब लोग उलझ गए. हालांकि मध्यप्रदेश के अटेर विधानसभा उप-चुनाव में इसी ईवीएम मशीन को लेकर बवाल हुआ था और उसमें भी कांग्रेस की जीत ने सवालों को पुख्ता कर दिया था जिसका लाभ केजरीवाल को मिला.
बुधवार, 26 अप्रैल 2017
*घोस्टराइटर्स सर्विस: सोच आपकी, शब्द हमारे!*
*घोस्टराइटर्स सर्विस: सोच आपकी, शब्द हमारे!*
मुंबई. विश्व में घोस्टराइटर्स की भूमिका अनेक महत्वपूर्ण मौकों पर रही है! लेख, समाचार आदि लिखने से लेकर भाषण लिखने तक में घोस्टराइटर्स का योगदान उल्लेखनीय रहा है, लेकिन... इसे अब तक सार्वजनिक मान्यता नहीं मिल पाई है! इसी के मद्देनजर पीपीआई की ओर से... सोच आपकी, शब्द हमारे... धारणा पर आधारित विश्व की पहली घोस्टराइटर्स सर्विस प्रारंभ की जा रही है.
* पीपीआई के निर्देशक (कंटेंट) प्रदीप द्विवेदी ने बताया कि लोगों के विचारों को वाक्यों में ढालने के इरादे से यह विचारकों के लिए विशेष सेवा है ताकि वे अपनी बात सही तरीके से लोगों तक पहुंचा सकें!
* पीपीआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अभिमनोज ने बताया कि अच्छे विचारों को पलपलइंडियाडॉटकाम (palpalindia.com) पर भी प्रकाशित करने का प्रयास किया जाएगा.
* एक रुपया प्रति अक्षर की दर से दी जानेवाली इस सेवा के लिए शुरूआती आमंत्रण दर एक रुपया प्रति शब्द रखी गई है.
* इस सेवा में न केवल लोगों के विचारों, अनुभवों, जानकारियों पर आधारित... लेख/समाचार/रचनाएं आदि तैयार की जाएंगी बल्कि यह उन विचारक/पत्रकार/लेखक/मार्केटिंग हेड के लिए भी उपयोगी रहेगी जो ठेठ ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं. उन्हें स्टोरी आईडिया के साथ-साथ डेली कंटेंट के लिए रेफरेंस मटेरियल भी उपलब्ध करवाया जाएगा. विशेष परिशिष्ट के लिए भी सेवाएं उपलब्ध रहेंगी!
* पत्रकारों और लेखकों के लिए यह अपनी तरह की पहली सेवा है. जो विचारक... लेखक बनना चाहते हैं... पत्रकार बनना चाहते हैं... और यह सेवा लेना चाहते हैं, वे संपर्क कर सकते हैं...
* व्हॉट्स एप नंबर 9772354346... ppirajasthannews@gmail.com.
सोमवार, 17 अप्रैल 2017
बिहार के चम्पारण सत्याग्रह के 100 साल का स्मरण किया जा रहा है. मीडिया के स्टूडेंट को यह जानना भी ज़रूरी है कि यह क्या था. बेहद सीमित संसाधनों में यह अंक हमेशा की तरह तैयार किया गया.. सहयोग के लिए आप सभी का शुक्रिया। साथ में अप्रैल की ख़ास तारीख का भी उल्लेख किया गया है.
शोध पत्रिका "समागम" का अगला अंक पत्रकारिता पर है. मीडिया वर्सेस सोशल मीडिया।
सम्पादक
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मंगलवार, 21 मार्च 2017
पानी के लिए हथियार नहीं, हाथ बढ़ाइए
मनोज कुमार
जल है तो कल है, जीवन का हर पल है- यह बात उतनी ही अगम्य और अचूक है जितनी कि ईश्वर के प्रति हमारी आस्था, धार्मिकता और अटल विश्वास। प्रकृति प्रदत्त वरदानों में हवा के बाद जल की महत्ता सिद्ध है। जल पर हम जन्म से लेकर मृत्यु तक आश्रित हैं। वैदिक शास्त्रों के अनुसार जल हमें मोक्ष भी प्रदान करता है। पानी का एक गुण और है। यह राह बनाना जानता है। पत्थरों में रुकता से नहीं, अवरोधों से सिमटता नहीं। दबकर, पलटकर, कुछ देर ठहरकर यह अपनी राह खोज लेता है। और यही पगडंडी धीरे-धीरे दरिया का रास्ता बनती है। देख लीजिए जिन्होंने अपनी पगडंडी चुनी, जो पानी की तरह तरल, सहज और विलायक हुए वही समाज के पथप्रदर्शक भी बने। उन्हें ही सुकून भी मिला। दो दशक से ज्यादा समय से यह बात वजनदारी के साथ कही जा रही है कि अगला विश्व युद्ध पानी के मुद्दे पर लड़ा जाएगा। जल के लिये एक और युद्ध होगा जैसे सकरात्मक और नकरात्मक नारों और बातों से उठकर काम करना होगा। पानी के संकट में हथियार नहीं, सहयोग का हाथ बढ़ाइए. जलसंकट से उबरने की जुगत बिठाइए, पानी के खर्च को रोकिए और अपनी नयी पीढ़ी को जागरूक और शिक्षित करिए।
‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून/ पानी गए न उबरे, मोती मानुष चून।’
रहिमन की इस बात को हम रोज सुनते और गुनते हैं लेकिन उनके कहे पर अमल करने की जरूरत नहीं समझते हैं. शायद यही कारण है कि जलसंकट विश्वव्यापी बन चुका है। यह बात तय है कि जल ही जीवन है और जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। ऐसे में जल नहीं बचेगा तो जीवन बचाने के लिये युद्ध की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। हमारे जीवन का ‘आधार’ है और ‘जल’ के बिना हम अपने अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकते। आधुनिक वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारे शरीर का तीन-चौथाई भाग ‘जलमय’ है। हमारी धरती का भी तीन चौथाई भाग ‘जलमय’ है। जल है तो हम हैं, जल नहीं तो हम भी नहीं। संसार का प्रत्येक जीवधारी, प्रत्येक प्राणी जल का ‘तलबगार’ है। शायद यही कारण है कि प्राचीन शास्त्र-ग्रंथों में जल को ‘जीवन’ कहा गया है।
जल हमारे लिए ईश्वर का सबसे बड़ा ‘वरदान’ है, जो हमें वर्षा, पर्वतों के झरनों, धरती के स्रोतों, नदियों, तालों, देवखातों, कूपों, वाउरियों, पोखरों, तालाबों और समुद्रों आदि से प्राप्त होता है। किन्तु हमारी ‘स्वार्थपरता’ और हमारे वैज्ञानिक प्रयोगों ने इस युग में जल को हमारे लिए दुर्लभ-सा कर दिया है। वह दिनोंदिन और भी दुर्लभ होता जा रहा है। अत: अब हमारा कर्तव्य हो गया है कि हम जल के बारे में अधिक से अधिक जानें ताकि हमारा यह जीवनदाता हमसे कहीं अधिक दूर न चला जाये।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि 2,000 या इससे अधिक व्यक्तियों के बीच प्रतिवर्ष दस लाख घन मीटर की खपत होती हो, तो जल की कमी हो जाती है। इतने ही जल के लिए इंग्लैंड, इटली, फ्रांस, भारत और चीन में औसतन 350 व्यक्ति हैं, जबकि ट्यूनेशिया में 2000 व्यक्ति और इस्राइल तथा सऊदी अरब में 4000 व्यक्ति हैं। नेपाल, स्वीडन, इंडोनेशिया और बांग्लादेश में प्रतिवर्ष दस लाख घन मीटर जल सौ से भी कम व्यक्तियों के लिए उपलब्ध रहता है। अमेरिका में सौ से थोड़े ज्यादा और जापान में 200 व्यक्ति इतने जल का उपयोग कर पाते हैं। जल की उपलब्धता, वर्षा की मात्रा और अवधि पर भी निर्भर करती है। सहारा रेगिस्तान के आस-पास बसे देशों, दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका, सऊदी अरब, दक्षिण ईरान, पश्चिमी भारत, पाकिस्तान, दक्षिणी-पश्चिमी मेक्सिको, चिली और ब्राजील के कुछ भागों में पहले जिस जगह अधिक समय तक औसत वर्षा होती थी वहां पिछले कुछ वर्षों में 40 प्रतिशत से भी कम वर्षा हुई है। इसके कारण इन क्षेत्रों में अब सूखा पड़ जाता है। लगभग 50 वर्ष पहले माले के कुछ भागों में 715 मिली लीटर औसत वर्षा होती थी, किन्तु पिछले 15 वर्षों में इन्हीं क्षेत्रों में मात्र 517 मिली मीटर वर्षा दर्ज की गई है।
एक अनुमान के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष 2,600 से 3,500 घन किलो मीटर के बीच जल की वास्तविक खपत है। मनुष्य को जिंदा रहने के लिए प्रतिवर्ष एक घन मीटर पीने का पानी चाहिए, परन्तु समस्त घरेलू कार्यों को मिलाकर प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष 30 घन मीटर जल की आवश्यकता होती है। विश्व जल की खुल खपत 6 फीसदी हिस्सा घरेलू कार्यों में प्रयुक्त होता है। कृषि कार्यों में 73 प्रतिशत जल और उद्योगों में 21 प्रतिशत जल की खपत होती है। पूर्वी यूरोप के देशों में जल की कुल खपत का 80 प्रतिशत उद्योगों में प्रयुक्त होता है, जबकि तुर्की में यही खपत 10 प्रतिशत, मैक्सिको में 7 प्रतिवशत और घाना में 3 प्रतिशत है। कुछ देश जल की उपलब्धता की दृष्टि से सम्पन्न हैं क्योंकि उनकी जनसंख्या कम है। कनाडा में प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता 1,22,000 घन मीटर प्रतिवर्ष है, जबकि वास्तविक खपत मात्र 1,500 घन मीटर है। इसके विपरीत मिस्र में जल की प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष उपलब्धता 1,180 घन मीटर के मुकाबले उसकी खपत 1,470 घन मीटर है।
अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा, यह बात हम कई वर्षों से सुन रहे हैं. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि पूरी दुनिया में जलसंकट पसरता जा रहा है. जल संरक्षण के प्रति समाज को सचेत करने की कोशिश भी जारी है लेकिन राजनीति मंच पर जल संकट हाशिये पर है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. वह फिर भारत की राजनीति हो या अमेरिका की. लगभग सब जगह हालात एक से हैं. सवाल यह है कि जब हम जल को लेकर विश्व युद्ध की आशंका से घिरे हैं तब राजनीतिक दलों के एजेंडे में जलसंरक्षण की बातें क्यों शामिल नहीं होती हैं? क्या राजनीतिक दलों के लिए जल संकट कोई मायने नहीं रखता है? यह बड़ा सवाल राजनीतिक सोच को स्पष्ट करता है कि वह लोकलुभावन योजनाओं के जरिए सत्ता में आने का रास्ता तो बना लेता है लेकिन जीवन की मूलभूत जरूरतों को वह नजरअंदाज करता रहता है. मीडिया ने भी कभी इस बात पर जोर नहीं दिया कि वह राजनीतिक दलों को सचेत करे कि वह अपने एजेंडे में जलसंकट को प्रमुखता से ले. यह स्थिति चिंताजनक है. हालांकि सत्ता में आते ही सरकारों के लिए जलसंकट का निदान प्राथमिक सूची में आ जाता है और एक तयशुदा फ्रेम में जलसंकट से निपटने की कोशिशें जारी हो जाती हैं. हालांकि ये सारे प्रयास औपचारिक ही होते हैं. अब समय आ गया है कि जलसंकट राजनीतिक एजेंडे में प्राथमिक तौर पर शामिल हो ताकि समाज में संदेश जा सके। फोटो गूगल से साभार
शुक्रवार, 17 मार्च 2017
शनिवार, 4 मार्च 2017
एक अलहदा राजनेता शिवराजसिंह चौहान
जन्मदिवस 5 मार्च पर विशेष
मनोज कुमार
शिवराजसिंह सरकार के खिलाफ राजधानी भोपाल में प्रतिपक्ष कांग्रेस जंगी प्रदर्शन करती है और इस प्रदर्शन में शामिल होकर लौटते समय एक सडक़ हादसे में एक कांग्रेसी कार्यकर्ता की मृत्यु हो जाती है. इस कार्यकर्ता के परिवार को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह दो लाख रुपयों की मदद करते हैं. यह शायद पहली बार हो रहा हो कि जिसके खिलाफ मोर्चा खोला गया हो, वही आपकी मदद के लिए तत्पर है. इसी तरह विदिशा में सडक़ निर्माण का औचक निरीक्षण के लिए पहुंचे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को मजदूरों नेे पहचानने से इंकार कर दिया. इस वाकये से शिवराजसिंह के चेहरे पर गुस्से का भाव नहीं आता है बल्कि वे हंसी में लेते हैं. साथ चल रहे अफसरों को कहते हैं-चलो, भाई यहां शिवराज को कोई पहचानता नहीं. क्या यह संभव है कि एक मुख्यमंत्री को उसकी जनता पहचानने से इंकार करे और वह निर्विकार भाव से लौट आए? ऐसी अनेक बातें हैं जो शिवराजसिंह चौहान को एक अलहदा राजनेता के रूप में चिंहाकित करती हैं. यूं तो मध्यप्रदेश ने अपनी उम्र के 60 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं और इन सालों में उसने अलग अलग तेवर और तासीर के नेता देखे हैं. सबमें खूबियां और खासियत थी लेकिन इनमें एक अलहदा किस्म का राजनेता भी मिला जिसे यह प्रदेश शिवराजसिंह चौहान के नाम से जानता है. अलहदा इसलिए नहीं कि वे शिवराज हैं बल्कि अलहदा इसलिए कि उन्होंने मध्यप्रदेश को एक अलग तरह से पहचान दी. वे अलहदा इस मामले में भी हैं कि वे निरपेक्ष बने रहे. 11 वर्षों से लगातार सत्ता में बने रहने के बाद भी उनका अपना कोई गुट नहीं बना और वे सर्वप्रिय बने रहे. यह अपने किस्म की बड़ी राजनीतिक घटना है. लम्बे समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजे रहना और अपना कोई गुट नहीं बनाना या किसी गुट का नेता नहीं होना ही उन्हें अलहदा बनाता है.
2005 के जाते साल के एक महीना पहले नवम्बर में शिवराजसिंह चौहान की मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी होती है. 2005 नवम्बर से 2017 के मार्च महीना आते आते वे अपनी उम्र में 11 बरस का इजाफा कर चुके होते हैं. वे जब मुख्यमंत्री बनते हैं तो उनके खाते में अनुभव के नाम पर बहुत कुछ नहीं होता है लेकिन जब 2017 में जब इसकी पड़ताल की जाती है तो वे एक अनुभवी और वजनदार नेता के रूप में हमारे सामने होते हैं. सवाल यहां यह नहीं है कि ये 11 साल के अनुभव उनके बेहतरीन कामों के ही हैं या नहीं. सवाल यहां यह है कि उन्होंने तहेदिल से मध्यप्रदेश को संवारने की कोशिश की.
आरंभ से उनकी छवि जुझारू और साधारण लोकनायक की रही है. वे पांव-पांव वाले भइया कहलाते हैं तो उनकी सादगी पर आम आदमी आज भी फिदा है. अब सवाल यह है कि क्या उनके 11 वर्ष उपलब्धियों के साथ खुशी में बीत गए? तब यह सवाल अपने साथ कई सवाल लेकर खड़ा होगा. वे लगातार काम करते रहे और उनकी कामयाबी से बेजार होते अपने और परायों ने उन्हें लगातार सवालों में खड़ा किया. हर सवाल उन्हें बैचेन करती रही. इस बैचेनी को वे अपनी मुस्कराहट और हंसी में उड़ा दिया करते हैं. अपनी निजी चिंता और पीड़ा को उन्होंने मध्यप्रदेश के विकास में रूकावट नहीं बनने दिया. वे हर बार और बार-बार एक नयी ताकत के साथ ऊर्जावान बनकर खड़े हो जाते. उनकी यह ऊर्जा से उनके विरोधियों को ऊर्जाहीन बना देती है.
आमतौर पर राजनीति में जो होता है, वह उनके साथ भी हुआ. कोशिश रही कि वे सत्ताहीन हो जाएं तो उनका जवाब था कि वे सत्ता के साथ नहीं, जनता के साथ हैं और इसी साथ के सहारे वे लगातार चलते हुए सत्ता की कमान सम्हाले हुए हैं. हर बार विजय हो, यह कामना भले ही उन्होंने नहीं की हो लेकिन विजय उनके गले लगती रही है. बात चाहे पहली दफा विधायक बनने की हो या लगातार चार बार लोकसभा के लिए चुने जाने की. शिवराजसिंह का इस तरह चुना जाना कोई आसान बात नहीं है. वे प्रतिकूल स्थितियों में भी स्वयं को अनुकूल बना लेते हैं. उनकी यह खासियत विरोधियों को और भी परेशान कर देती है.
अपने 11 साल के कार्यकाल में प्रदेश में जनहित में ऐसी योजनाओं को आरंभ किया जिसने जनता को लाभ दिया लेकिन नुकसान में उनके विरोधी रहे. वे सर्वधर्म समभाव के पैरोकार हैं. लेकिन प्रदेश के अमन पर आंच भी आ जाए तो उनसे ज्यादा सख्त प्रशासक और कोई नहीं. वे लगातार गुस्सा नहीं करते हैं और ना ही मुख्यमंत्री होने का तेवर बताते हैं लेकिन जब भी गुस्सा करते हैं और बताते हैं कि मुख्यमंत्री का तेवर क्या होता है तो प्रशासन में हलचल सी मच जाती है. उनकी मुस्कराहट में उनके फैसले छिपे होते हैं. शायद यही कारण है कि कई बार फैसले उनके बिना कुछ कहे ही अमल में आ जाते हैं.
बेटियों की चिंता करते शिवराजसिंह चौहान के लिए मातृशक्ति का सर्वशक्तिमान हो जाना पहला लक्ष्य है सो सत्ता में 33 प्रतिशत की भागीदारी उन्होंने तय कर दी. महिला एवं बाल विकास विभाग को सशक्त देखना चाहते हैं इसलिए उसे समझने वाले को विभाग सौंपा. किसान कल्याण के लिए हरसंभव कोशिश में जुटे शिवराजसिंह सरकार ने मदद की पहल की है. गांव और ग्रामीणों की दशा सुधारने के लिए उनकी पहल का स्वागत किया जाना चाहिए. वे पर्यावरण संरक्षण के लिए चिंता करते हैं तो वे नर्मदा की स्वच्छता को बचाये रखने के लिए एक बड़ी पहल करते हैं. इस पहल को देशव्यापी समर्थन मिलता है क्योंकि नदी संरक्षण के लिए मध्यप्रदेश से आवाज उठी है. इस मामले में एक बार फिर मध्यप्रदेश, एक बार फिर शिवराजसिंह चौहान अव्वल हो जाते हैं जब देश इस फैसले का अनुसरण करता है. इसी तरह के उनके अनन्य फैसले उन्हें राजनीति में अलहदा राजनेता का दर्जा दिलाते हैं.
प्राकृतिक आपदायें राज्य सरकार के लिए चुनौती के रूप में लगातार खड़ी होती रही हैं। मध्यप्रदेश में कभी सूखा तो कभी अतिवृष्टि खेती पर मुसीबत बनकर टूटती रही है। लाख जतन करने के बाद भी प्रकृति के प्रकोप के सामने किसान बेबस हो गए और सरकार भी मजबूर। ऐसे में किसान टूटने लगे। उन्हें लगने लगा था कि बस, अब जिंदगी खत्म होने वाली है। सरकार भी हतप्रभ थी लेकिन उसकी जवाबदारी बड़ी थी। सरकार अपनी जवाबदारी जानती थी कि ऐेसे समय में ही उसे निराश किसानों का सहारा बनना है। उनके भीतर के टूटते विश्वास को जगाना है और यह विश्वास भी दिलाना था कि उन्होंने लड़ाई हारी नहीं है। किसानों के भीतर इस विश्वास को जगाने के लिए कई प्रयास किए गए जिनमें कर्जमाफी से लेकर बिटिया के ब्याह के लिए व्यवस्था करने की जवाबदारी सरकार ने स्वयं के ऊपर ले ली। सरकार के निर्मल प्रयासों को राजनीतिक चश्में से देखने की कोशिशें हुई लेकिन सरकार किसानों का विश्वास जीतने में कामयाब रही।
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान बचपन से धार्मिक प्रवृत्ति के रहे हैं और उन्हें विरासत में सर्वधर्म समभाव की सीख मिली है। मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी वे इस बात के हामी हैं कि एक मुख्यमंत्री के नाते, एक भारतीय होने के नाते उनका दायित्व है कि वे अपने जीवन में, अपने कार्य व्यवहार में सर्वधर्म समभाव को अपनाएं। यही कारण है कि मुख्यमंत्री निवास बीते दस सालों से सर्वधर्म-समभाव का साक्षी बना हुआ है। होली-दीवाली, ईद-क्रिसमस के साथ ही अन्य सभी धर्मों के पर्व मनाने की परम्परा डाली है। जिस तरह प्रदेश के आखिरी छोर पर बैठे अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री निवास आकर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के साथ भोजन का अवसर मिला, वैसे ही मुख्यमंत्री के साथ विभिन्न धर्म और वर्ग के लोगों के साथ मुख्यमंत्री उत्साह से उत्सव का आयोजन करते हैं, जो सभी के लिए उत्साह का कारण बनता है।
अपना सा लगने वाला यह मुख्यमंत्री हमारे बीच का, आज भी अपना सा ही है. शिवराजसिंह के चेहरे पर तेज है तो कामयाबी का लेकिन मुख्यमंत्री होने का गरूर नहीं, चेहरे पर राजनेता की छाप नहीं. सत्ता के शीर्ष पर बैठने की उनकी कभी शर्त नहीं रही बल्कि उनका संकल्प था प्रदेश की बेहतरी का. वे राजनीति में आने से पहले भी आम आदमी की आवाज उठाने में कभी पीछे नहीं रहे. वे किसी विचारधारा के प्रवर्तक हो सकते हैं लेकिन वे संवेदनशील इंसान है. एक ऐसा इंसान जो अन्याय को लेकर तड़प उठता है और यह सोचे बिना कि परिणाम क्या होगा, अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने निकल पड़ता है. बहुतेरों को यह ज्ञात नहीं होगा कि शिवराजसिंह चौहान मजदूरों को कम मजदूरी मिलने के मुद्दे पर अपने ही परिवार के खिलाफ खड़े हो गए थे. शिवराजसिंह चौहान का यह तेवर परिवार को अंचभा में डालने वाला था. मामूली सजा भी मिली लेकिन उन्होंने आगाज कर दिया था कि वे आम आदमी के हक के लिए आवाज उठाते रहेंगे.
उनके इन कामों के लेखा-जोखा का यह वक्त मुफीद है क्योंकि 2017 के मार्च महीने की 5 तारीख को अपनी उम्र के एक और पड़ाव पूरा कर लेंगे. शिवराजसिंह चौहान का आंकलन भले ही मुख्यमंत्री के तौर पर ना करना चाहें लेकिन एक राजनेता के रूप में करेंगे तो पाएंगे कि सच में यह राजनेता अलहदा है. वे बड़े दिल के व्यक्ति हैं इसलिए वे अपनी आलोचना को दिल से नहीं लगाते हैं. वे आलोचना का परीक्षण करते हैं और सुधार की कोशिश करते हैं. यह कहना मुनासिब नहीं होगा कि वे सौफीसदी खरे हैं. वे भी मनुष्य हैं तो गलतियां संभव है. हालांकि तामझाम और शोशेबाजी के इस आधुनिक दौर में शिवराजसिंह की यह सादगी उन्हें औरों से अलग, बिलकुल अलग बनाती है. ‘आम’ से ‘खास’ बनने में उनकी कोई रूचि नहीं रही सो वे जैसा थे, वैसा ही बना रहना चाहते हैं. लगभग हर जगह वे अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ पायजामा-कुरता में मिलेंगे. कोई 48 बरस की उम्र में उन्होंने मध्यप्रदेश की बागडोर सम्हाली थी और आज 59 वर्ष के होने जा रहे हैं तब एक नए मध्यप्रदेश में उनका स्वागत होता है. उन्हें जन्मदिन की बधाई और शुभकामनाएं मिलती है तो ध्यान रखिए कि यह बधाई और शुभकामनाएं शिवराजसिंह चौहान के हिस्से की है, मुख्यमंत्री की नहीं. मुख्यमंत्री को बधाई देना है तो नवम्बर महीने की प्रतीक्षा करें, फिलहाल तो यह बधाई शिवराजसिंह चौहान को.
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