सोमवार, 14 सितंबर 2020
मनोज कुमार ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी के चलन पर ब्रेक लग गया है. आप हिन्दी
के हिमायती हों और हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिन्दी को अलंकृत करते रहें,
उसमें विशेषण लगाकर हिन्दी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न करें
लेकिन सच है कि नकली अंग्रेजियत में डूबे हिन्दी समाचार चैनलों ने हिन्दी को हाशिये
पर ला खड़ा किया है. हिन्दी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ने दर्शकों
को भरमा कर रख दिया है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारिता की राह से गुजरते
हुए समाचार चैनल मीडिया में बदल गए हैं. संचार या जनसंचार शब्द का उपयोग अनुचित
प्रतीत होता है तो विकल्प के तौर पर अंग्रेजी का मीठा सा शब्द मीडिया तलाश लिया गया
है. अब मीडिया का हिन्दी भाव क्या होता है, इस पर चर्चा कभी लेकिन जब परिचय
अंग्रेजी के मीडिया शब्द से होगा तो हिन्दीकी पूछ-परख कौन करेगा. हालांकि
पत्रकारिता को नेपथ्य में ले जाने में अखबार और पत्रिकाओं की भी भूमिका कमतर नहीं
है. चैनलों की नकल करते हुए अखबारों ने खबरों और परिशिष्ट के शीर्षक भी अंग्रेजी
शब्दों से भर दिए हैं. शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है.
प्रधानमंत्री लिखने से अखबारों में जगह की कमी हो जाती है तो पीएम से काम चलाया जा
रहा है. मुख्यमंत्री सीएम हो गए और आयुक्त कमिश्रर. जिलाधीश के स्थान पर कलेक्टर
लिखना सुहाता है तो संपादक के स्थान पर एडीटर शब्द सहज हो गया है. यानि समाचार चैनल
से लेकर अखबार के पन्नों में भी हिन्दी को दरकिनार किया जा रहा है. हालांकि इस दौर
का मीडिया गर्व से इस बात को लिखता जरूर है कि हिन्दी का श्रेष्ठ चैनल या हिन्दी का
सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार लेकिन हिन्दी को कितना स्थान है, यह उन्हें भी नहीं
मालूम. हम हर साल 14 सितम्बर को इस बात को लेकर शोर मचाते रहें कि हिन्दी माथे की
बिंदी है. हिन्दी से हमारा स्वाभिमान है. हिन्दी हमारी पहचान है लेकिन सच यही है कि
पत्रकारिता से मीडिया में बदलते परिदृश्य में हिन्दी हाशिये पर है. हिन्दी के
चैनलों के पास हिन्दी के शब्दों का टोटा है. उनके पास सुप्रभात कमतर शब्द लगता है
और गुडमार्निंग उनके लिए ज्यादा प्रभावी है. दस बड़ी खबरों के स्थान पर टॉप टेन
न्यूज की सूची पर्दे पर दिखाना उन्हें ज्यादा रूचिकर लगता है. हिन्दी के नाम पर
कुमार विश्वास की कविता का पाठ कराने वाले चैनलों को कभी निराला या पंत की कविताओं
को सुनाने या पढ़ाने में रूचि नहीं होती है. सच तो यह है कि हिन्दी की पीठ पर सवार
होकर अंग्रेजी की टोपी पहने टेलीविजन न्यूज चैनलों ने जो हिन्दी को हाशिये पर लाने
की कोशिश शुरू की है, वह हिन्दी के लिए अहितकर ही नहीं बल्कि दुर्भाग्यजनक है.
हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने वालों का दिल इस बात से दुखता है कि जिनकी पहुंच
करोड़ों दर्शक और पाठक के बीच है, वही संचार माध्यम हिन्दी से दूर हैं. इन संचार
माध्यमों की आत्मा हिन्दी के प्रति जाग गई तो हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने में कोई
बड़ी बाधा नहीं होगी लेकिन यह संभव होता नहीं दिखता है. हम तो हिन्दी के दिवस,
सप्ताह और अधिक से अधिक हिन्दी मास तक ही स्वयं को समेट कर रखना चाहते हैं. हिन्दी
की श्रीवृद्धि के नाम पर यह पाखंड हम दशकों से करते चले आ रहे हैं और शायद यह क्रम
ना टूटे. इसे हिन्दी के प्रति पाखंड परम्परा का नाम भी दे सकते हैं. कुछेक को यह
नागवार गुजरेगा लेकिन सच से कब तक मुंह चुराएंगे. हिन्दी की यह दुर्दशा अंग्रेजी से
प्रभावित हिन्दी समाचार चैनलों के आने के पहले से हो रही है. मेरी तरह आपने भी कभी
महाविद्यालय की परीक्षा दी होगी. परीक्षा में प्रश्र पत्र आपके सामने शिक्षक ने रखे
होंगे और उसमें प्रश्र पहले हिन्दी में और इसी हिन्दी का रूपांतरण अंग्रेजी में
दिया होता है. अब असल बात यह है कि प्रश्र पत्र के निर्देश को पढ़ें जिसमें साफ साफ
लिखा होता है कि हिन्दी में कोई त्रुटि हो तो अंग्रेजी के सवाल ही मान्य है. अर्थात
हमें पहले समझा दिया गया है कि हिन्दी के चक्कर में मत पड़ो, अंग्रेजी ही सर्वमान्य
है. हिन्दी पत्रकारिता में शिक्षा लेकर हाथों में डिग्री लेकर भटकते प्रतिभावान
विद्यार्थियों को उचित स्थान क्यों नहीं मिल पाता है तो इसका जवाब है कि उन्हें
अंग्रेजी नहीं पढ़ाया गया. बताया गया कि हिन्दी माध्यम में भी अवसर हैं. यदि ऐसा है
तो प्रावीण्य सूची में आने वाले विद्यार्थियोंं का भविष्य अंधेरे में क्यों है?
टेलीविजन चैनलों में उनका चयन इसलिए नहीं हो पाता है कि वे अंग्रेजी नहीं जानते हैं
या उस तरह की अंग्रेजी नहीं जानते हैं जिसके बूते पर वे एलिट क्लास को ट्रीटमेंट दे
सकें. ऐसे में हिन्दी के प्रति विमोह और अंग्रेजी के प्रति मोह स्वाभाविक हो जाता
है. हालांकि हिन्दी के प्रति समर्पित लोगों को ‘एक दिन हमारा भी टाइम आएगा’ जैसे
भाव से भरे लोग उम्मीद से हैं. हिन्दी के हितैषी भी इस बात का सुख का अनुभव करते
हैं कि वे वर्ष में एक बार हिन्दी को लेकर बोलते हैं, लिखते हैं और हिन्दी की
श्रीवृद्धि के लिए लिए विमर्श करते हैं. एक दिन, एक सप्ताह और एक माह के बाद हिन्दी
आले में टांग दी जाती है. कुछ लोग हैं जो वर्ष भर क्या लगातार हिन्दी की प्रतिष्ठा
के लिए प्राण-प्रण से जुटे हुए हैं. इन लोगों की गिनती अंगुली भर की है लेकिन
हिन्दी को हाशिये पर डालने वालों की संख्या असंख्य है. इस पर सबसे पहले मीडिया
कटघरे में आता है. यूरोप की नकल करते हुए हम भूल जाते हैं कि हिन्दीभाषी जनता ही
इनके चैनल को टीआरपी दिलाती है. उनके होने से ही मीडिया का अस्तित्व है लेकिन
करोड़ों लोगों की बोली-भाषा को दरकिनार कर उस अंग्रेजी को सिर पर कलगी की तरह बांधे
फिरते हैं, जो उन्हें अपना अर्दली समझती है. यह भी सच है कि टेलीविजन चैनलों में
काम करने वाले साथियों में अधिसंख्य मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि
में शायद ही अंग्रेजियत हो लेकिन उन्हें टेलीविजन प्रबंधन भी लार्ड मैकाले की तरह
अंग्रेजी बोलने और लिखने पर मजबूर करता है. मैकाले की समझ में यह बात आ गई थी कि
भारत को बर्बाद करना है तो उसकी शिक्षा पद्धति को नष्ट करो और उनमें कुंठा भर दो.
मैकाले यह करने में कामयाब रहा और मैकाले के रूप में आज लाखों मीडिया मैनेजर यही कर
रहे हैं. जिस किसी को अंग्रेजी नहीं आती, वे हीनता के भाव से भरे हैं. अंग्रेजी उन
पर लाद दिया गया है क्योंकि अंग्रेजी के बिना जीवन शून्य है. मैं अपने निजी अनुभव
से कह सकता हूं कि आज से कोई 35 वर्ष पूर्व जब पत्रकारिता का सबक लेने गया वहां भी
अंग्रेजी जानने वाले को हमसे ज्यादा सम्मान तब भी मिलता था और आज भी हम. हम
हिन्दीपट्टी के लोग दरकिनार कर दिया करते थे. तब मीडिया उत्पन्न नहीं हुआ था. अखबार
था तो पत्रकारिता थी. आज की तरह पेडन्यूज नहीं हुआ करता था बल्कि पीत पत्रकारिता की
यदा-कदा चर्चा हुआ करती थी. लेकिन हमारे गुरु तो हिन्दुस्तानी भाषा में पगे-बढ़े थे
और वे हमें आकर्षित करते थे. हमें लगता था कि जिस भाषा को समाज समझ सके, वही
पत्रकारिता है. शायद आज भी हम पिछली पंक्ति में खड़े हैं तो हिन्दी के प्रति मोह के
कारण है या कह सकते हैं कि अंग्रेजी को अंगीकार नहीं किया, इसलिए भी पीछे धकेल दिए
गए. हालांकि सच यह भी है कि हम जो कर रहे हैं, वह आत्मसंतोष है. किसी एक अघढ़ समाजी
का फोन आता है कि आप का फलां लेख पढऩे के बाद मैं आपको फोन करने से रोक नहीं पाया
तो लगता है कि मैंने यहां आकर अंग्रेजी को परास्त कर दिया है. क्योंकि फोन करने
वाला कोई टाई-सूट पहने नकली किस्म का बुद्धिजीवी नहीं बल्कि ठेठ भारतीय समाज का वह
पुराने किस्म का कोई आदमी है जिसके पास दिमाग से अधिक दिल है. हिन्दी की श्रेष्ठता
के लिए, हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने लिए दिमाग नहीं दिल चाहिए. दिल वाले आज भी
पत्रकारिता कर रहे हैं और दिमाग वालों की जगह मीडिया में है. हिन्दी को श्रेष्ठ
स्थान दिलाना चाहते हैं तो दिल से हिन्दी को गले लगाइए. हिन्दी दिवस और सप्ताह, मास
तो औपचारिकता है. एक बार प्रण लीजिए कि हर सप्ताह हिन्दी में एक लेख लिखेंगे,
हिन्दी में संवाद करेंगे. हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा. मीडिया का क्या है, वह तो बदल
ही जाएगा.
शुक्रवार, 11 सितंबर 2020
रविवार, 6 सितंबर 2020
कभी पेट में चिकोटी तो कभी कान उमेठते मास्साब, आप हैं तभी हम हैं मनोज कुमार कहते हैं कि संकट में ही व्यक्ति की पहचान होती है और आप इस बात पर यकीन करते हैं तो आपको इस बात पर भी यकिन करना होगा कि हर बुरे समय में, हर बुरे दौर में शिक्षक ही समाज को रोशनी देने वाला होता है. भारतीय समाज में आज भी शिक्षक का अर्थ मास्साब, गुरूजी से लगाया जाता है. ये वो शिल्पकार हैं जो अगढ़ मिट्टी को आकार देते हैं. उन्हें उसका महत्व बताते हैं और छोटे-छोटे सबक से उनका जीवन संवारते हैं. मास्साब कहें, गुरूजी या कहें शिक्षक तो ये वो शिल्पकार हैं जो स्कूल में अपना कर्तव्य पूरा करते हैं. शिक्षा की सारी धुरी इन्हीं के आसपास घूमती है. शिक्षक की क्या भूमिका होती है, यह कोरोना के महासंकट के दौर में देखने को मिला. एकाध मिसाल तो इसका उल्लेख किया जाए. यहां तो असंख्य मिसाल है जिसका उल्लेख किसी छोटे से लेख में करना संभव नहीं होगा. अखबारों में छप रही खबरों से पता चलता है कि कोरोना की बीमारी की चिंता किए बिना कहीं शिक्षक मोहल्ले में कक्षा लगाकर पढ़ा रहे हैं तो कहीं रेडियो के माध्यम से बच्चों को अक्षर ज्ञान करा रहे हैं. शिक्षा से बच्चे वंचित ना रह जाए, यह शिक्षकों का मिशन है और वे इस बात से तसल्ली पा रहे हैं कि जो कुछ संभव हो रहा है, वह करने की कोशिश कर रहे हैं. आज शिक्षक दिवस के अवसर पर डॉ. सर्वपल्लीराधाकृष्णन का स्मरण करना हमारा दायित्व है तो जो लोग डॉ. राधाकृष्णन के रास्ते पर चलकर समाज में शिक्षा का उजियारा फैला रहे हैं, उन्हें याद करना भी जरूरी हो जाता है. मैं-आप सब कभी अपने छोटे बच्चे की तरह स्कूल जाया करते थे. आज हम किसी बच्चे के पालक हैं तब कोई हमारा पालक हुआ करते थे. तब और अब में फर्क इतना है कि मास्साब, गुरूजी के हाथों में अनुशासन का डंडा हुआ करता था और आज कानून का डंडा है जो अनुशासन पर भारी पड़ रहा है. सबक याद ना रख पाने के कारण आप और हमारे पेट में मास्साब जो चिकोटी काटते थे, उसका दर्द आज भी कहीं उठ जाता है. इस दर्द में तकलीफ नहीं, मिठास है कि मास्साब यह सजा नहीं देते तो हम सबक याद भी नहीं कर पाते. कोई डॉक्टर बन गया, कोई ऑफिसर बन गया, कोई पत्रकार लेखक बना तो किसी ने राजनीति की राह पकड़ी और कामयाब हुए तो मास्साब की वजह से. ये वो मनीषी लोग थे जिन्हें परिवार चलाने लायक तब पेटभर वेतन भी नसीब नहीं हुआ करता था. घर बदहाली में होता था लेकिन माथे पर कभी शिकन नहीं दिखी. समय के पाबंद मास्साब स्कूल में आते थे और जाने के भी पाबंद थे. समय नहीं, अपने काम के. बच्चे शिक्षित हों, होशियार बनें, भाषा की तमीज हो, आदि-इत्यादि उनकी चिंता होती थी. सबसे बड़ी चिंता बच्चों में नैतिक व्यवहार का विस्तार हो. मास्साब यह साहस इसलिए कर पाते थे कि बच्चों के माता-पिता यह मानकर चलते थे कि उनके बच्चे की कुटाई हुई है तो जरूर बच्चे ने गलती की होगी. बच्चे ने गलती से मास्साब की शिकायत की तो पिता शिकायत सुनने के बजाय उल्टे जूते से उसका समाधान करते थे. यही नहीं, पालकों को पता होता था कि मामूली तनख्वाह मेें मास्साब के परिवार का बसर नहीं होता है तो हर कोई अपने सामथ्र्य के अनुरूप साग-भागी, राशन दे आते थे. यह रिश्वत नहीं होता था बल्कि गुरु ऋण से उऋण होने का एक छोटा सी दान परम्परा थी. आज जब हम शिक्षक दिवस मनाने जा रहे हैं तो यह सबकुछ औपचारिक सा लगता है. शिक्षा और शिक्षक दोनों बदल गए हैं. हालांकि यह अधूरा सच है लेकिन सच तो है. सुरसा के मुंह की तरह निजी स्कूलों ने शिक्षा का घोर व्यवसायिकरण किया है. कोरोना काल में बच्चों से फीस लेने के लिए अदालत में मामले चल रहे हैं. यह एक जीवंत उदाहरण है. वहीं सरकारी स्कूल की हालत भी वैसी ही है लेकिन वहां कोई शोरगुल नहीं है. जो शिक्षक कोरोना में भी अपने विद्यार्थियों की चिंता में नवाचार करने में जुटे हुए हैं, उनमें ज्यादतर सरकारी स्कूल के मास्साब हैं. सर और मैडम तो ऑनलाईन क्लास में बिजी हैं. नवाचार का वक्त उनका स्कूल प्रबंधन देता ही नहीं है. इन हालात में शिक्षक दिवस महज औपचारिक लगता है. अखबारों में खबरें हैं कि सरकारी स्कूल के शिक्षकों को तीन-तीन महीने से तनख्वाह नहीं बट पायी है और हैरान परेशान शिक्षक जान देने में पर उतारू हैं. एक-दो ऐसी दुखद घटना की खबर भी पढऩे को मिली है. समाज को शिक्षा से रौशन करने वाले मास्साब के सामने आत्महत्या का विकल्प शेष हो तो शिक्षक दिवस औपचारिक सा ही हो जाता है. निजी स्कूलों में भी बहुतेरे शिक्षक ऐसे हैं जो नवाचार करना चाहते हैं और कुछेक कर भी रहे हैं लेकिन कानून का डंडा उन्हें रोकता है. स्टूडेंट को सजा नहीं दे सकते हैं क्योंकि शिकायत मिलने पर शिक्षक की नौकरी जा सकती है और कहीं तो सजा भी हो सकती है. स्कूल प्रबंधन झमेला नहीं चाहता है इसलिए वह पाठ्यक्रम पूरा करने पर जोर देता है और इससे आगे बढक़र वह स्टूडेंट को सेलिब्रेटी बनाने में आमादा रहता है. साल भर निजी स्कूलों में पढ़ाई से ज्यादा प्रोग्राम का आयोजन होता है. नाच-गाने से लेकर फैशन और जाने क्या-क्या. इसे स्टूडेंट की प्रतिभा संवारने की बात कही जाती है जबकि सरकारी स्कूल के मास्साब कहते हैं हम तो ठोंक-पीटकर छोड़ देते हैं, फिर वह कलेक्टर बने, या एसपी. लेकिन बनेगा जरूर. यह विश्वास मास्साब की पूंजी है. हाल में देश के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद अपने गुरु का सार्वजनिक रूप से चरणवंदन करते हुए दिखते हैं तो भरोसा हो जाता है कि अभी शिक्षा में पूरी तरह अंधियारा नहीं आया है. अभी शेष है बहुत कुछ. अभी उम्मीद बाकी है. एक राधाकृष्णन जैसी राष्ट्रपति के स्मरण में शिक्षक दिवस की परम्परा की नींव रखी गई तो एक दूसरे राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद शिक्षकों के लिए मिसाल हैं और चरितार्थ करते हैं जब कहा जाता है-‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पायं’। यह बात हम सब जानते हैं कि गोविंद से बड़े गुरु होते हैं और इस परम्परा को राष्ट्रपति महोदय निभाते हैं और लोगों को संदेश देते हैं. ये वो उदाहरण है जिससे हमारी भारतीय संस्कृति की श्रीवृद्धि होती है. हम अपने आपको दुनिया में इसलिए श्रेष्ठ नहीं कहते हैं कि हमने तरक्की कर ली बल्कि हम इसलिए श्रेष्ठ कहते हैं कि परम्परा को सहेजा है. संजोया है, उसे आगे बढ़ाया है. एक शिक्षक से ज्यादा सहिष्णु इस संसार में कोई नहीं होता है. उसका विद्यार्थी जब पाठ पढक़र श्रेष्ठ और समर्थ लोगों की पंक्ति में जब खड़ा होता है तो सबसे ज्यादा खुश, सबसे ज्यादा गौरवांवित एक शिक्षक होता है. जब राष्ट्रपति महोदय अपने शिक्षक के चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं तो शिक्षक के चेहरे पर जो सुकून और संतोष का भाव दिखता है, वही उस शिक्षक की कामयाबी है. शिक्षा का जिस तरह से निजीकरण और व्यवसायिक चरित्र सामने आ रहा है, वह दुखद है लेकिन उल्लेखित प्रसंग इस बात की आश्वस्ति हैं कि यह रोशनी मंद हो सकती है लेकिन बुझेगी नहीं, और जब समाज को जरूरत होगी तब पूरे ताब के साथ शिक्षाजगत रोशन हो जाएगा. सभी शिक्षकगणों को इस महिमा दिवस अर्थात शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं. आप हैं तो हम हैं.
शुक्रवार, 14 अगस्त 2020
मनोज कुमार
15 अगस्त, 1947 से लेकर 2019 तक हम आजादी का पर्व उत्साहपूर्वक मनाते आए हैं. इन वर्षों में ऐसा भी नहीं है कि कोई संकट नहीं उपजा हो लेकिन साल 2020 में जहां इस वक्त हम खड़े हैं, वह संकट, संयम और स्वावलंबन का पर्व बन गया है. कोविड-19 ने ना केवल भारत वर्ष के समक्ष चुनौतियों और संकटों का पहाड़ खड़ा किया है बल्कि पूरी दुनिया की मानवता के समक्ष भयावह संकट के रूप में उपस्थित है. जानकारों का कहना है कि हर सौ साल में ऐसी त्रासदी दुनिया में एक बार कयामत बन कर टूटती है. भारत की आजादी के बाद संभवत: यह पहला अवसर होगा जब हम इन चुनौतियों का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार कर रहे हैं. हालांकि बीते सालों में कई किस्म की महामारी के शिकार हमारी सोसायटी होती रही है लेकिन कोविड-19 पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है.
कोविड-19 का यह संकट हमारे लिए कुछ अधिक पीड़ादायक है. यह पीड़ा है उस तारीख के लिए जिस दिन हम गर्व के साथ अपना तिरंगा फहराते हैं. अपने भीतर देशभक्ति और स्वाभिमान से भर उठते हैं. यह हमारा राष्ट्रीय उत्सव होता है लेकिन इस बार हमारा राष्ट्रीय उत्सव रस्मी होगा. यह जरूरी भी है क्योंकि मौत की बांहें पसारे कोविड-19 को यह ज्ञात नहीं है कि हम अपना राष्ट्रीय पर्व मना रहे हैं या कोई उत्सव का आयोजन कर रहे हैं. एक कशिश मन में रह जाएगी लेकिन ऐसा नहीं है कि जैसे पहले महामारी एक समय के बाद विलुप्त हुइ्र्र तो यह नहीं होगी. इस बार ना सही, अगले साल हम दुगुने उत्साह के साथ हमारा अपना राष्ट्रीय पर्व का आयोजन करेंगे. देश हमारा है.
कोविड-19 संकट का भयावह समय है. यह संयम और स्वावलंबन का समय भी है. संकट से समाधान का रास्ता भी निकलता है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है. सोना भी तभी दमकता है, जब वह आग में तपकर निखरता है. एक पत्थर भी तभी मूर्ति के रूप में आकार ग्रहण करती है जब शिल्पकार अपने औजार से उसे छलनी करता है. ऐसे में मनुष्य भी संकट से स्वयं को और आत्मविश्वासी बनाता है. जीने के नए राह तलाशता है. सोने का आग में निखरना या पत्थर का मूर्ति का आकार लेने में शिल्पी का संयम काम करता है लेकिन संकट में मनुष्य का संयम उसे सोने की तरह निखारता है. यकिन ना हो तो कोई 6 माह का अनुभव स्वयं कर लीजिए. रोग से बचाव के लिए लॉकडाउन जैसे कठिन उपाय सरकार ने किए. बाजार बंद, रोजगार पर संकट और सीमित बचत के बीच जिंदगी को बचाये रखने की चुनौती. थोड़े से लोगों को अपवाद स्वरूप छोड़ भी दें तो अधिकांश लोगों ने इस स्थिति में भी संयम से काम लिया. स्वयं के हाथों में ऐसे काम करने लगे जिससे खर्च में कमी आए. जो बचत की राशि है, उसका अधिकतम और जरूरी खर्च किए जा सकें. साधनसम्पन्न परिवारों की चर्चा बेमानी है लेकिन मध्यम और निम्र मध्यमवर्ग की चर्चा करें तो उन्होंने संयम के साथ इस समय को गुजारा है और आने वाले समय में जिंदगी आहिस्ता आहिस्ता पटरी पर आ जाएगी, यह यकिन करना नामुमकिन नहीं है.
कोविड-19 ने समाज को बाजार से भी परे किया है. हम सब बाजार के शिकार हो चले थे. हमारी जिंदगी में बाजार का हस्तक्षेप इतना अधिक हो गया था कि स्वावलंबन को हम भूल चुके थे. दाम चुकाओ और आराम करो हमारी नियती बन रही थी लेकिन इस महामारी ने हमें स्वावलंबी बना दिया. बहुतेरे काम जो हम कभी स्वयं करते थे, उसे छोड़ दिया था. आज हम उन्हीं काम को फिर से कर ना केवल स्वावलंबी बन रहे हैं बल्कि आत्मसंतुष्टि का भाव भी महसूस कर रहे हैं. परिवार के बीच में जो खालीपन आ गया था, इस महामारी के कारण आपस में आत्मीयता का भाव बढ़ा है. यह कड़ुआ सच है कि कई घरों में पालकों को अपने ही बच्चों के बारे में यह ज्ञात नहीं था कि वह क्या पढ़ता है, उसकी जीवनशैली क्या है, उन्हें इस दौरान बच्चों को समझने का अवसर मिला. दूसरी तरफ जिन बच्चों ने मां-बाप को एटीएम मशीन समझ लिया था, उन्हें भी इस बात का अहसास हुआ कि मां-बाप एटीएम मशीन नहीं बल्कि ममता की वो मशीन है जिनके सिर पर हाथ फेरते ही मीठी नींद आ जाती है. पति-पत्नी ने एक-दूसरे की भावना को समझा. ये जो बदलाव आया है, उससे बाजार भौंचक है. उसे डर है कि यह बदलाव पूरे बाजार को बदल देगा. कोविड-19 को तो एक दिन विदा होना ही है लेकिन बाजार के प्रति लोगों का जो अनुराग विदा होगा, वह डर बाजार को बैठ गया है.
संकट, संयम और स्वावलंबन ने जहां भारतीय समाज को एक नए ढंग से परिभाषित किया है, वह हमारी कई पीढिय़ों का मार्गदर्शन करता रहेगा. जिस भारतीय परम्परा की हम केवल चर्चा करते रहे हैं, मुझे निजी तौर पर लगता है कि उस रास्ते पर हम लौटने लगे हैं. हमारे रिवाज में था कि पहले जूते-चप्पल घर से बाहर उतारें और बाहर ही रखे बर्तन के पानी में हाथ-मुंह धोकर घर में प्रवेश करें. यह चेतावनी थी कि किसी किस्म की बीमारी घर के भीतर लेकर नहीं आएं. लेकिन बदलते दौर में हम यह भूल गए थे लेकिन कोरोना ने याद दिला दिया है कि वही ठीक था, जिसे छोड़ आए हो. हालांकि यह भी कपोल कल्पना होगी कि हम उन पुराने दिनों में चले जाएंगे लेकिन यह सत्य है कि हम नए जमाने में होंगे. हाथ में मोबाइल और लेपटॉप होगा लेकिन संस्कार से हम भारतीय होंगे. दर्शन और संस्कृति की नई जड़ें इस संकटकालीन स्थितियों में हमारे और हमारी नवीन पीढ़ी के भीतर जमने लगी है, वह कालजयी होगी. एक बार घर लौटने की देर थी लेकिन इस संकट ने मजबूरी में ही सही, हमें, आपको घर की तरफ लौटा दिया है. इसे सहेज कर रखना और आगे बढ़ाने की जवाबदारी हमारी और आपकी है.
हम यह मान लें कि इस बार का हमारा स्वाधीनता पर्व संकट, संयम और स्वावलंबन का घर-घर मनाया जाने वाला उत्सव है. एक कमी, एक दुख तो होगा लेकिन हम बचेंगे तो समाज बचेगा, समाज से राज्य और राष्ट्र सुरक्षित होगा. इसलिए आवश्यक है कि हम उन तमाम किस्म की सावधानी को बरतें जिससे यह महामारी आपको, हमें और हमारे लोगों तक ना फटके. मास्क लगाना उतना ही आवश्यक है जितना की आपस में शारीरिक दूरी कायम रखना. स्वच्छता का एक सबक इस महामारी ने सिखाया है. जान है तो जहान है, यह सच है लेकिन यह भी सच है कि हमारी परम्परा रही है कि साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा मिलकर भोज उठाना. यानि एक संदेश इस पर्व पर यह भी है कि हम आज भी वसुधैव कुंटुंबकंम के साथ जीते हैं. इसीलिए तो सबसे प्यारा, हिन्दुस्तान हमारा.
रविवार, 2 अगस्त 2020
कोरोना को पराजित करने एकजुटता पहली शर्त मनोज कुमार समूची दुनिया के साथ मध्यप्रदेश में कोरोना की भयावहता प्रतिदिन देखने को मिल रही है. आंकड़ों को देखकर मन कंपकंपा उठता है. यह ऐसा कठिन समय है जब हम रात में सोते समय मौत के आंकड़े और संक्रमितों की संख्या गिनकर सोते हैं और आंख खुलते ही अखबार के पन्नों पर छपे आंकड़ों को देखकर अफसोस से भर उठते हैं. सिहरा देने वाली खबरों के बीच कुछेक खबरें सुकून देने वाली भी होती हैं लेकिन कोरोना के कयामत के सामने ऐसी खबरें बौनी हो जाती है. कभी लगता है कि बीमारी ने किनारा कर लिया है लेकिन कुछ घंटे बीतते बीतते फिर आंकड़ें डराने लगते हैं. कहा जा रहा है कि सौ साल में ऐसी महामारी आती है लेकिन आजाद भारत में यह शायद पहला मौका होगा, जब उम्र के पचास पार लोग भी इससे दो चार हो रहे हैं. नई पीढ़ी के लिए तो यह एक सबक के समान है. वे अपनी आंखों से मौत का मंजर देख रहे हैं. किसी के पिता, तो किसी का पति, कोई भाई, कोई मां, कोई बहन और कोई दोस्त के अचानक कोरोना के गाल में समा जाने की खबर आती है. सोशल मीडिया पर लगभग हर रोज ऐसी कई खबरें पढऩे को मिल जाती है. साल 2020 के शुरूआत में ही कोरोना ने दस्तक दे दी थी. तब इसकी भयावहता से हम सब बेखबर थे. जैसे जैसे समय गुजरता गया. कोरोना के मौत के डैने पसरने लगा. सुरक्षा और सर्तकता के लिए तालाबंदी की नौबत आ गई. सरकार ने कोरोना के चैन को तोडऩे के लिए तीन महीने का लॉकडाउन ऐलान कर दिया. इस दौरान कोरोना का फैलाव थोड़ा धीमा रहा लेकिन लॉकडाउन में ढील मिलते ही कोरोना को मौका मिल गया और तेजी से वह पसरने लगा. देखते ही देखते आंकड़ों का ग्राफ बढऩे लगा. एक बार फिर जिंदगी को बचाने के लिए कभी एकाध हफ्ते तो कभी दो दिनों का लॉकडाउन करने के लिए सरकार को मजबूर होना पड़ा. शारीरिक दूरियां, मुंह पर मास्क और सेनीटाइजर से स्वच्छ रखने की हिदायत के साथ जनजागरूकता में सरकार जुटी हुई है. सरकार की इन कोशिशों से जिंदगी के बचाव में आंशिक कामयाबी तो मिली लेकिन जिंदगी पटरी से उतर गई. काम-धंधे चौपट हो गए. बचत के रुपये हवा में उड़ गए. भूख और बेकारी के सामने कोरोना का डर छोटा पडऩे लगा. लोग बेखौफ होकर काम की तलाश में निकल पड़े. सडक़ों पर काम की तलाश में निकलने वाले इन लोगों को भी जिंदगी का भय था लेकिन पेट की आग के सामने मौत भी छोटी लगती है. बेबसी और मजबूरी घरों से सडक़ पर ले तो आयी लेकिन कारखाने बंद, बाजार बंद तो बेकार हाथों को काम कहां से मिले? भूख और भय के बीच जिंदगी हर रोज तमाम हो रही है. आर्थिक रूप से आम आदमी से लेकर सरकार का खजाना भी सन्नाटे में हैं. अखबारों में छपने वाली खबरें इस बात की तस्दीक करती हैं कि हालात सुधरने में जाने कितना वक्त लगे. अभी तो खैर मना रहे हैं कि किसी तरह कोरोना किनारे हो जाए. जो लोग कुंडली और भविष्यवक्ताओं पर भरोसा नहीं करते थे, अब उनकी गणना पर उन्हें भरोसा करना पड़ रहा है. यह तो नहीं कहा जा सकता कि जो कहा जा रहा है, वैसा ही होगा लेकिन डूबते तो तिनका का सहारा वाली बात को मान लें तो सितम्बर तक वैक्सीन बनने की उम्मीद है और ग्रह नक्षत्र अपनी चाल बदलेंगे तो कोरोना का कहर कमजोर पड़ेगा. यदि ऐसा होता है तो यह राहत की बात होगी. एक तरफ आम और खास सब लोग कोरोना से भयग्रस्त हैं लेकिन राजनीति के पाले में कोरोना शतरंज के मोहरे की तरह बिछाकर खेला जा रहा है. जो सरकार से बाहर हैं, वह सरकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं. उसकी कोशिशों पर सवाल उठा रहे हैं. कौन, कहां इलाज करा रहा है? किसको क्या आर्थिक लाभ हो रहा है, जैसे सवाल लगातार उठाया जा रहा है. यह सवाल इस समय फिजूल का है क्योंकि कोरोना के लिए सब एक धान पसेरी है. कोरोना दोस्त नहीं, दुश्मन है. वह अपना देखती है और ना पराया. उसका एक लक्ष्य है मौत बनकर टूट पडऩा. जो सरकार में हैं, वह अपने तर्क के साथ जवाब दे रहे हैं. सही मायने में राजनेता आम आदमी के आईकॉन होते हैं. उनका व्यवहार आम आदमी को प्रेरित करता है लेकिन जिस तरह से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करने, मास्क नहीं लगाने की राजनेताओं की खबरें देखने और सुनने में मिल रही है, वह आम आदमी को भी लापरवाह बना रहा है. यह तो अच्छा हुआ कि समय रहते सरकार ने जुलूस, जलसे पर पाबंदी लगाकर आम आदमी को संदेश दे दिया कि कोई आम और खास नहीं. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने स्वयं कहा है कि नियमों का उल्लंघन करने वाल मुख्यमंत्री क्यों न हो, कार्यवाही की जाए. कोरोना जैसे संकट के समय में सबको एक साथ चलना होगा क्योंकि यह मौत की बीमारी चिंह कर नहीं आती है. आज सब एकजुट हो जाएं तो पुलिस, प्रशासन, डॉक्टर और कोरोना से जूझने के लिए लगे लोगों में भी साहस का संचार होगा. अपितु कम श्रम और कम खर्च में बेहतर व्यवस्था की जा सकेगी. ऐसे में तंत्र पर किया जाने वाला खर्च नियंत्रित होगा और लोगों के जीवन बचाने में उस बजट का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा. व्यवस्था बनाने में जुटी पुलिस और प्रशासन भी तनाव मुक्त होगा तो लोगों की शिकायतें भी कम होगी. जनप्रतिनिधि जब लोगों को सचेत करेंगे, जागरूक करेंगे तो उनकी बातों का असर दूर और देर तक होगा. लोग बेवजह सडक़ों पर नहीं आएंगे. जो लोग आवश्यक कार्यों से घर से बाहर निकल रहे हैं, वे सावधानी के साथ आएंगे. सोशल डिस्टेसिंग के साथ मास्क लगाकर स्वयं और दूसरों को बचाएंगे. यह समय साथ चलने का है, साथ देने का है और जहां तक सवाल जवाब का है तो उसके लिए उम्र होगी. कटघरे में खड़े कीजिएगा और जवाब मांग लीजिएगा लेकिन यह तब होगा जब जान हो तब जहान होगा.
सोमवार, 1 जून 2020
धीरे धीरे मरते अखबारों का सच
30 मई 1826 से हिंदी पत्रकारिता का श्रीगणेश होता है. इस लम्बे सफर की ख़ास बात यह रही कि समय गुजरने के साथ साथ हिंदी पत्रकारिता का फलक बढ़ता गया. बात यहाँ तक पहुंच गई कि अंगेरजी के प्रकाशनों को हिंदी की ओर आना पड़ा. आपातकाल से भी जूझ कर हिंदी पत्रकारिता ने अपना गौरव बढ़ाया लेकिन कोरोना काल आते तक सम्पादक की सत्ता समाप्त हो चुकी थी. कल की पत्रकारिता आज की मीडिया बन गई थी. नतीजा यह निकला कि बड़ी संख्या में साथी बेरोजगार हो गए. अख़बार मरे तो नहीं मरणासन्न हालात में पहुंच गए इन्ही मुद्दों पर चर्चा समागम के नए अंक में. विस्तार से पूरा अंक पढ़ने के लिए समागम के वेबसाइट www.sabrangweb.com पर जाकर पीडीफ देखें
रविवार, 31 मई 2020
पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी है आंचलिक पत्रकारिता
मनोज कुुमार
कल्पना कीजिए कि आपके शरीर में रीढ़ की हड्डी ना हो तो आपका जीवन कैसा होगा? क्या आप सहज जी पाएंगे? शायद जवाब ना में होगा। वैसे ही पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी आंचलिक पत्रकारिता है। आप चार पेज का अखबार प्रकाशित करें या 24 घंटे का न्यूज चैनल चलाएं, बिना आंचलिक पत्रकारिता, आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। समाचार संकलन से लेकर प्रसार तक में आंचलिक पत्रकारिता की भूमिका अहम होती है। दिल्ली की पत्रकारिता देहात से होकर ही जाती है। दिल्ली से आशय यहां पर महानगरों की पत्रकारिता से है। महानगरों की पत्रकारिता का जो ओज और तेज आपको दिखता है, वह आंचलिक पत्रकारिता की वजह से है।
पीने की पानी की समस्या से लेकर खंदक की लड़ाई आंचलिक पत्रकारिता लड़ती है और इस लड़ने और जूझने की खबर महानगरों की पत्रकारिता के लिए खुराक का काम करती है। हरसूद की कहानी बहुत पुरानी नहीं हुई है। इस पूरी लड़ाई को आंचलिक पत्रकारिता ने लड़ा लेकिन महानगरों की पत्रकारिता ने जब इसे अपनी हेडलाइन में शामिल किया तो वे हीरो बन गए। आंचलिक पत्रकारिता का दुख और दुर्भाग्य यह है कि वह बार बार और हर बार बुनियाद की तरह नीचे दबा रह जाता है और महानगर की पत्रकारिता कलश की तरह खुद को स्थापित कर लेता है। हरसूद ही क्यों, भोपाल की भीषण गैस त्रासदी को किसी बड़े अखबार ने नहीं बल्कि तब के एक अनाम सा साप्ताहिक अखबार ने उठाया था। आज उस विभीषिका से वास्ता पड़ा लेकिन महानगर की पत्रकारिता छा गई। इस घटना में उस साप्ताहिक की भूमिका को इसलिए दरकिनार नहीं किया जा सका क्योंकि उसके सम्पादक आज के रसूखदार पत्रकार राजकुमार केशवानी हैं। यही अखबार डिंडौरी, सिलवानी, बडऩगर, इछावर, कोतमा या ऐसी किसी जगह से प्रकाशित होता तो शायद आज उसका कोई नामलेवा भी नहीं होता।
आंचलिक पत्रकारिता की अपनी गमक है। इस बात को हम लोग अक्सर भूल जाते हैं और महानगर की पत्रकारिता की ओर टकटकी लगाए देखते हैं। कुपोषण को लेकर महानगर के पत्रकार सेसईपुरा, डिंडौरी और मंडला के गांवों में आते हैं और हमारे स्थानीय पत्रकारों की मदद से रिपोर्ट तैयार करते हैं लेकिन उनका नाम कहीं नहीं आता है। देश और विदेश के सारे बड़े नाम और सम्मान महानगर के पत्रकारों के खाते में चला जाता है और हमारा साथी इस बात को लेकर संतोष कर लेता है कि चलो, हमारी समस्या तो सरकार की नजर में आयी। गांवों में स्टोरी करना महानगर के पत्रकारों के लिए एक फैशन की तरह है। स्थानीय पत्रकारो की मदद से स्टोरी तैयार करते हैं और जब उसका प्रकाशन-प्रसारण बड़े बैनर पर होता है तो स्थानीय पत्रकार लापता होते हैं। किसी भी अखबार की हेडलाइन या किसी चैनल की ब्रेकिंग खबर गांव से निकलकर ही आती है। वैश्विक बीमारी कोरोना को लेकर जो स्टोरी अखबार, चैनल और सोशल मीडिया पर चल रही है उसके केन्द्र में गांव, ग्रामीण ही हैं। मुसीबत उनके हिस्से में है और खबरों का पेट भी वही भर रहे हैं जो भूखे पेट कोसों पैदल चलकर घर पहुंचने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।
पत्रकारिता की रीढ़ भले ही आंचलिक पत्रकारिता हो लेकिन आंचलिक पत्रकारिता के साथी सबसे ज्यादा समस्याओं से जूझते हैं। यह बात भी तय है कि बुनियाद का यह भाग्य ही होता है कि वह सबका भार उठाये। उसके कंधे पर चढ़कर दूसरे कलश बन जाएं और इतरायें लेकिन आंचलिक पत्रकारिता बुनियाद बनना ही पसंद करता है। यही कारण है कि हिन्दी पत्रकारिता में आंचलिकता हमेशा से मील का पत्थर बना हुआ है। पत्रकारिता का प्रथम पाठ आंचलिक पत्रकारिता से ही आरंभ होता है। आंचलिक पत्रकारिता ने कभी अपना ओज नहीं खोया। बदलते समय में वह और भी सामयिक होता गया। आज देश के नामचीन पत्रकारों की फेहरिस्त ढूंढ़ेंगे तो आपको उनमें से ज्यादतर किसी अनजान या छोेटे गांव-कस्बे के मिलेंगे। दुर्भाग्य यही है कि कोई अपनी पहचान नहीं बताना चाहता है। अपनी देशज बोली-बानी को भूलकर अंग्रेजियत का चोला पहन रखा है कि वह खुद में गुम हो गया है।
जब हम गांव की ओर लौटते हैं। आंचलिक पत्रकारिता की चर्चा करते हैं तो हम गर्व से भर उठते हैं। इस बदलती दुनिया में वे नहीं बदले हैं और ना उनका दर्द बदला है। सबकुछ यथावत है। कुछेक लोगों की बात छोड़ दें तो पत्रकारिता के लिए समर्पित साथियों के घरों में ना तो ठीक से रहने का इंतजाम है और ना ही उनके बच्चे उन बड़े स्कूलों में पढ़ पाते हैं जिनका सपना हर माता पिता का होता है। हर दीवाली पर हमारे इन साथियों के पास पैसा नहीं, आश्वासन होता है। अगली दीवाली पर टीवी आ जाएगी। इस बार इन्हीं कपड़ों से काम चला लो। हर दीवाली यही वादे। भीषण गर्मी में साथियों के तपते घरों में पंखा भी रूक रूक कर चलता है। कूलर की बात भी अगली गर्मी तक टाल दी जाती है। एयरकंडीशन तो सपने में भी नहीं है। घर पर जमाने पुरानी सायकल है। अपने काम को गति देने के लिए सेकंडहेंड स्कूटर तो खरीद लिया लेकिन सौ गज में कब धोखा दे जाए, यह ना तो स्कूटर जानता है और ना ही चलाने वाला। हमारे एक साथी शहर में आए। अच्छी सेलरी मिलने लगी तो दबे सपने बाहर आ गए। नई कार लेने की हिम्मत नहीं थी सो कार सेकंडहेंड ले ली। अब हर दो दिन बाद गैरेज में उनकी कार खड़ी रहती थी। दूसरी सुविधाओं को लेकर तर्क होता है कि इस बार जरूर ले आएंगे लेकिन आता कभी नहीं है। अपने परिवार को आश्वासन देने में हमारे साथी जितने आगे होते हैं, उसके आगे तो राजनेता भी मत्थे टेक लेते हैं। अक्सर खबरों को लेकर पटवारी और थानेदार या भी स्थानीय नेता के कोपभाजन आंचलिक पत्रकार को बनना पड़ता है। गांव की सरहद में आज भी पटवारी और थानेदार से बड़ा कोई नहीं होता है। इनसे जूझते हुए हमारे साथी हिम्मत नहीं हारते हैं। खबरें जुटाते हैं और बेखौफ लिखते हैं। लोभ-लालच से दूर होने के कारण पटवारी और थानेदारी की आवाज भी भोथरी हो जाती है।
आंचलिक पत्रकारिता के आय का मुख्य स्रोत है स्थानीय स्तर पर मिलने वाले विज्ञापनों से प्राप्त होने वाला कमीशन, वह भी तब जब विज्ञापनदाता पूरी राशि चुकता कर दे। एक और सोर्स है अखबारों के विक्रय से होने वाला कमीशन लेकिन इसके लिए भी पहले धनराशि जमा कराना होती है। टेलीविजन चैनल ऐसी जगहों पर स्ट्रिंगर बनाते हैं जिनसे बहुत ही मामूली मानदेय मिलता है। अधिकांश स्थानों पर तो खबरों के आधार पर मानदेय का भुगतान किया जाता है। ऐसा भी नहीं है कि आंचलिक पत्रकारिता का परिदृश्य नहीं बदला है। बदला है और बदल रहा है हमारी नई पीढ़ी के कारण। उन्हें लगता है कि महानगर सुविधाओं में डूबा रहे और हम अंधेरे में। यह सच है कि सुविधा का स्तर बढ़ा है तो आंचलिक पत्रकारिता का विश्वास भी कम होने लगा है।
सुविधा पाने का अर्थ है समझौता और समझौते का अर्थ है विश्वास को खो देना। हालांकि बिगड़ती स्थिति के बाद भी आंचलिक पत्रकारिता का वजूद इसलिए बना रहेगा क्योंकि वह एक हद तक समझौता कर लेता है लेकिन कहीं न कहीं उसकी कलम आग उगल देती है। पत्रकारिता को प्रोफेशन बनाइए क्योंकि ऐसा नहीं करेंगे तो प्रतिबद्ध पत्रकार की श्रृंखला खत्म हो जाएगी। स्वाभाविक है तब पत्रकारिता के स्थान पर मीडिया प्रोफेशनल्स आएंगे और आंचलिक पत्रकारिता का गौरव कहीं ना कहीं लांछित होगा, जैसा कि हम राजनीति में देख रहे हैं। आंचलिक पत्रकारिता की पीड़ा, उसके दर्द और तकलीफ से मैं बाबस्ता हूं लेकिन जरूरी है कि देहात की आवाज दिल्ली तक पहुंचाने के लिए हम पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के सपनों को अपनी आंखों में जगाए रखें। महात्मा की पत्रकारिता आंचलिक पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी है। कबीराना ही आंचलिक पत्रकारिता का स्वभाव है और उसकी पहचान भी
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