बुधवार, 7 अप्रैल 2021

                                                                         शोध पत्रिका ‘समागम’ का नया अंक राष्ट्र-कवि पंडित                                                                                  माखनलाल  चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ के                                                                              शताब्दी वर्ष पर


शनिवार, 3 अप्रैल 2021

दादा का ‘पुष्प’ और देश की ‘अभिलाषा’

मनोज कुमार

भारत की आजादी के 75वें वर्ष का अमृत-महोत्सव आरंभ हो चुका है। एक वर्ष पश्चात जब हम आजादी का अमृत-पान कर रहे होंगे तब इस पूरी अवधि में स्वाधीनता संग्राम के उन नायकों को तलाश करना आवश्यक हो जाता है। यह संयोग है कि सम्पूर्ण स्वाधीनता संग्राम में अपनी कलम से अलग जगाने वाले पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कालजयी कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ अपने रचे जाने का शताब्दी वर्ष मना रही है। एक वर्ष बाद इस कविता के गौरवशाली सौ वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। हिन्दी साहित्य के पन्नों में अनेक कविताएं ऐसी हैं जिन्हें आप कालजयी रचना की श्रेणी में रखते हैं लेकिन पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ उन सबसे इतर है। यह इसलिए कि पहला तो इस कविता की रचना सामान्य परिस्थितियों में कवि की भावनाओं का लेखन ना होकर जेल की काल-कोठरी में हुआ था। दादा माखनलाल जी को यह काल-कोठरी स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय होने की सजा के तौर पर मिली थी। आजादी के दीवानों को भला कौन कैद रख सकता है, इस बात की गवाही उनकी कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ की अभिलाषा देती है। शरीर से वे जरूर अंग्रेजों के बंधक थे लेकिन मन में देश-प्रेम के भाव को भला अंग्रेजी शासक किस तरह कुचल देते, सो तमाम कोशिशों और अन्याय के बावजूद पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कलम ना रूकी और ना झुकी।
बीते सौ साल में कई पीढ़ियां गुजर गईं। स्वाधीनता भारत का अमृत- महोत्सव मनाने की तैयारी में हम जुट गए हैं और इस समय आते-आते तक परिस्थितियां बदल चुकी है। आज नौजवानों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाना पड़ता है। आज की पीढ़ी को बताना पड़ रहा है कि व्यक्ति से ऊपर परिवार, परिवार से ऊपर समाज, समाज से ऊपर राज्य और राज्य से ऊपर राष्ट्र होता है। ऐसे में शताब्दी मनाने जा रही कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ का बार-बार पाठ किया जाना आवश्यक प्रतीतत होता है। हालांकि इस सौ वर्ष की यात्रा में यदि कुछ नहीं बदला तो वह अमर कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ है। इस कविता को किसी भी आयु-वर्ग का व्यक्ति पढ़े तो उसके भीतर स्वयमेव राष्ट्र के प्रति भावना भर जाती है। एक पुष्प की अभिलाषा का संसार इतना व्यापक है कि वह ईश्वर के शीश पर बैठने की चाह नहीं है। इसके पहले की पंक्ति में दादा लिखते हैं कि पुष्प की यह अभिलाषा भी कभी नहीं रही कि वह सुरबाला के गहनों में गूंथा जाए, वह प्रेमी का हार बने या सम्राट के लिए उसका उपयोग हो। वह उस वीर, पराक्रमी और देश के लिए मर-मिटने वाले जवान के कदमों में बिछ जाने की मंशा जाहिर करती है ताकि उसका जीवन सार्थक हो सके। एक पुष्प की चाहत हर भारतीय की चाहत होनी चाहिए जो अपने राष्ट्र के लिए सर्वस्व स्वाहा कर दे। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी अपनी कविता के माध्यम से एक पुष्प को आधार बनाकर राष्ट्र भक्ति का जो मानक गढ़ते हैं, वह अप्रतिम है।
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की अनेक कविताएं हैं और हर कविता का अपनापन है। शिक्षा और संदेश से भरी इन कविताओं में जीवन है और जीवन सीख भी। स्वाधीनता सेनानी के तौर पर दादा का योगदान कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता है। वे विरल स्वाधीनता सेनानी रहे हैं जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से गोरे शासकों को परेशान कर रखा था। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी एक स्वाधीनता सेनानी होने के साथ साथ कवि और प्रखर पत्रकार थे। वे हमेशा से निर्भिक रहे और लेखन में कोई समझौता नहीं किया। जो उन्हें अनुचित लगता था, उसे वह इस तरह प्रस्तुत करते थे कि अन्यायी को भीतर तक पीड़ा होती है।
4 अप्रेल को पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का अवतरण दिवस है। बाकियों का तो जन्मदिवस होता है क्योंकि वे एक सामान्य मनुष्य की तरह जीते हैं लेकिन पंडित चतुर्वेदी का अवतरण दिवस इसलिए है कि वे युग-पुरुष की तरह आए और अपने जीवन का हरेक पल राष्ट्र को समर्पित कर दिया। यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है कि स्वाधीनता संग्राम के इस योद्धा का जन्म मध्यप्रदेश की धरा पर हुआ। अनेक कथाएं हैं जिनमें पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता का परचम फहरता है। पत्रकारिता को लेकर उनकी गहरी समझ थी। उस कालखंड में जब वर्तमान समय की तरह आधुनिक यंत्र नहीं थे। तब पंडितजी ने पत्रकारों के लिए बकायदा प्रशिक्षण की बात कही थी। पत्रकारिता के लिए विश्वविद्यालय स्थापित कर गुणी और राष्ट्र के प्रति अनुराग रखने वाले पत्रकारों को प्रशिक्षित करने की बात कही थी। आज हम जिस ले-आउट की चर्चा करते हैं और विभिन्न सॉफ्टवेयर के माध्यम से आकर्षक पेज-सज्जा करते हैं। तब पंडित जी ने पृष्ठ सज्जा के लिए पत्रकारों को प्रशिक्षित किए जाने की चर्चा की थी। पत्रकारिता की भाषा-शैली को लेकर वे बहुत सख्त हैं। उनका मानना था कि एक पत्रकार की भाषा में गुणवत्ता होना चाहिए। वाक्यों के गठन एवं समाचारों की प्रस्तुति को लेकर भी पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की अपनी दृष्टि थी।
सन 1913 ई. में इन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ कर पूर्ण रूप से पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्र्र की सेवा में लग गए। लोकमान्य तिलक के उद्घोष ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ को ये बहुत ही कर्मठता से अपने राष्ट्र्रीय आन्दोलन में उतार लिए थे। चतुर्वेदी जी ने खंडवा से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘प्रभा’ का सम्पादन किया। राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी के द्वारा आहूत सन 1920 के असहयोग आंदोलन में महाकोशल अंचल से पहली गिरफ्तारी दादा माखनलाल की थी। इसी तरह 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी गिरफ्तारी देने का प्रथम सम्मान इन्हीं को मिला। इनका उपनाम एक भारतीय आत्मा है। राष्ट्रीयता माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य का कलेवर है तथा रहस्यात्मक प्रेम उसकी आत्मा है।
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के सम्पादन में ‘प्रभा’, ‘प्रताप’ और ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन होता था। बाद के समय में वे अपनी अंतिम धड़कन तक ‘कर्मवीर’ का सम्पादन करते रहे। 1927 में आयोजित हिन्दी सम्पादक सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि-‘यदि समाचार पत्र संसार की बड़ी ताकत है तो उसके सिर जोखिम भी कम नहीं। पर्वत के जो शिखर हिम से चमकते हैं और उनसे राष्ट्रीय रक्षा की महान दीवार बनती हैं, उसे ऊंची होना पड़ता है। जगत में समाचार पत्र यदि बड़प्पन पाए हुए हैं तो उनकी जिम्मेवारी भी भारी है। बिना जिम्मेवारी के बड़प्पन का मूल्य ही क्या और वह बड़प्पन तो मिट्टी के मोल का हो जाता है, जो अपनी जिम्मेवारी को संभाल नहीं सकता। समाचार पत्र तो अपने गैर जिम्मेदारी से स्वयं ही मिट्टी के मोल का हो जाता है, किंतु वह देश के अनेक महान अनर्थों का उत्पादक और पोषक भी हो जाता है।’
मध्यप्रदेश में उनकी पत्रकारिय अवदान को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए उनके नाम से माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। वर्तमान सरकार इस विश्वविद्यालय की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए हमेशा से प्रयासरत रही है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का अतिरिक्त स्नेह पत्रकारिता के इस स्कूल के साथ है। हालांकि बदलते समय में पत्रकारिता का यह विश्वविद्यालय पत्रकार पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के मानदंडों पर कितना खरा है, इस पर पृथक से विमर्श की आवश्यकता होगी।
बहरहाल, यह वक्त आजादी के अमृत-महोत्सव का है और दादा की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ का शताब्दी वर्ष है तो समाज का यह दायित्व बनता है कि वह नयी पीढ़ी को दादा के रचना-कर्म और राष्ट्र चेतना के उनके अवदान से अवगत कराये। दादा को किसी राज्य की सीमा से बांधने के बजाय पूरे राष्ट्र में कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ का शताब्दी वर्ष की अनुगूंज हो। कोशिश होना चाहिए कि पाठशालाओं और महाविद्यालयों के साथ अन्य सार्वजनिक स्थलों पर सांगीतिक प्रस्तुति कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ की हो। विभिन्न साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के आयोजनों में प्रमुखता से कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ का पाठ हो। यह इसलिए आवश्यक नहीं है कि हमें खानापूर्ति करना है बल्कि इसलिए जरूरी है कि कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ के माध्यम से राष्ट्र चेतना की कोशिश की जाए। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का स्मरण कर हम उन्हें नहीं, स्वयं का भला करेंगे क्योंकि वे तो समाज के मील के पत्थर हैं। उन्होंने राष्ट्र-भक्ति और भावना का एक संदेश हमारे लिए छोड़ गए हैं। उनके इस संदेश का पाठ भी करें और जीवन में उतारने की सच्चा प्रयास भी। यह हम सबके लिए, पूरे देश और समाज के लिए गौरव की बात है कि हमें समय मिला है कि हम ऐसे भारतीय आत्मा का स्मरण कर सकें।

सोमवार, 14 सितंबर 2020

मनोज कुमार ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी के चलन पर ब्रेक लग गया है. आप हिन्दी के हिमायती हों और हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिन्दी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिन्दी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न करें लेकिन सच है कि नकली अंग्रेजियत में डूबे हिन्दी समाचार चैनलों ने हिन्दी को हाशिये पर ला खड़ा किया है. हिन्दी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ने दर्शकों को भरमा कर रख दिया है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारिता की राह से गुजरते हुए समाचार चैनल मीडिया में बदल गए हैं. संचार या जनसंचार शब्द का उपयोग अनुचित प्रतीत होता है तो विकल्प के तौर पर अंग्रेजी का मीठा सा शब्द मीडिया तलाश लिया गया है. अब मीडिया का हिन्दी भाव क्या होता है, इस पर चर्चा कभी लेकिन जब परिचय अंग्रेजी के मीडिया शब्द से होगा तो हिन्दीकी पूछ-परख कौन करेगा. हालांकि पत्रकारिता को नेपथ्य में ले जाने में अखबार और पत्रिकाओं की भी भूमिका कमतर नहीं है. चैनलों की नकल करते हुए अखबारों ने खबरों और परिशिष्ट के शीर्षक भी अंग्रेजी शब्दों से भर दिए हैं. शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है. प्रधानमंत्री लिखने से अखबारों में जगह की कमी हो जाती है तो पीएम से काम चलाया जा रहा है. मुख्यमंत्री सीएम हो गए और आयुक्त कमिश्रर. जिलाधीश के स्थान पर कलेक्टर लिखना सुहाता है तो संपादक के स्थान पर एडीटर शब्द सहज हो गया है. यानि समाचार चैनल से लेकर अखबार के पन्नों में भी हिन्दी को दरकिनार किया जा रहा है. हालांकि इस दौर का मीडिया गर्व से इस बात को लिखता जरूर है कि हिन्दी का श्रेष्ठ चैनल या हिन्दी का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार लेकिन हिन्दी को कितना स्थान है, यह उन्हें भी नहीं मालूम. हम हर साल 14 सितम्बर को इस बात को लेकर शोर मचाते रहें कि हिन्दी माथे की बिंदी है. हिन्दी से हमारा स्वाभिमान है. हिन्दी हमारी पहचान है लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता से मीडिया में बदलते परिदृश्य में हिन्दी हाशिये पर है. हिन्दी के चैनलों के पास हिन्दी के शब्दों का टोटा है. उनके पास सुप्रभात कमतर शब्द लगता है और गुडमार्निंग उनके लिए ज्यादा प्रभावी है. दस बड़ी खबरों के स्थान पर टॉप टेन न्यूज की सूची पर्दे पर दिखाना उन्हें ज्यादा रूचिकर लगता है. हिन्दी के नाम पर कुमार विश्वास की कविता का पाठ कराने वाले चैनलों को कभी निराला या पंत की कविताओं को सुनाने या पढ़ाने में रूचि नहीं होती है. सच तो यह है कि हिन्दी की पीठ पर सवार होकर अंग्रेजी की टोपी पहने टेलीविजन न्यूज चैनलों ने जो हिन्दी को हाशिये पर लाने की कोशिश शुरू की है, वह हिन्दी के लिए अहितकर ही नहीं बल्कि दुर्भाग्यजनक है. हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने वालों का दिल इस बात से दुखता है कि जिनकी पहुंच करोड़ों दर्शक और पाठक के बीच है, वही संचार माध्यम हिन्दी से दूर हैं. इन संचार माध्यमों की आत्मा हिन्दी के प्रति जाग गई तो हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने में कोई बड़ी बाधा नहीं होगी लेकिन यह संभव होता नहीं दिखता है. हम तो हिन्दी के दिवस, सप्ताह और अधिक से अधिक हिन्दी मास तक ही स्वयं को समेट कर रखना चाहते हैं. हिन्दी की श्रीवृद्धि के नाम पर यह पाखंड हम दशकों से करते चले आ रहे हैं और शायद यह क्रम ना टूटे. इसे हिन्दी के प्रति पाखंड परम्परा का नाम भी दे सकते हैं. कुछेक को यह नागवार गुजरेगा लेकिन सच से कब तक मुंह चुराएंगे. हिन्दी की यह दुर्दशा अंग्रेजी से प्रभावित हिन्दी समाचार चैनलों के आने के पहले से हो रही है. मेरी तरह आपने भी कभी महाविद्यालय की परीक्षा दी होगी. परीक्षा में प्रश्र पत्र आपके सामने शिक्षक ने रखे होंगे और उसमें प्रश्र पहले हिन्दी में और इसी हिन्दी का रूपांतरण अंग्रेजी में दिया होता है. अब असल बात यह है कि प्रश्र पत्र के निर्देश को पढ़ें जिसमें साफ साफ लिखा होता है कि हिन्दी में कोई त्रुटि हो तो अंग्रेजी के सवाल ही मान्य है. अर्थात हमें पहले समझा दिया गया है कि हिन्दी के चक्कर में मत पड़ो, अंग्रेजी ही सर्वमान्य है. हिन्दी पत्रकारिता में शिक्षा लेकर हाथों में डिग्री लेकर भटकते प्रतिभावान विद्यार्थियों को उचित स्थान क्यों नहीं मिल पाता है तो इसका जवाब है कि उन्हें अंग्रेजी नहीं पढ़ाया गया. बताया गया कि हिन्दी माध्यम में भी अवसर हैं. यदि ऐसा है तो प्रावीण्य सूची में आने वाले विद्यार्थियोंं का भविष्य अंधेरे में क्यों है? टेलीविजन चैनलों में उनका चयन इसलिए नहीं हो पाता है कि वे अंग्रेजी नहीं जानते हैं या उस तरह की अंग्रेजी नहीं जानते हैं जिसके बूते पर वे एलिट क्लास को ट्रीटमेंट दे सकें. ऐसे में हिन्दी के प्रति विमोह और अंग्रेजी के प्रति मोह स्वाभाविक हो जाता है. हालांकि हिन्दी के प्रति समर्पित लोगों को ‘एक दिन हमारा भी टाइम आएगा’ जैसे भाव से भरे लोग उम्मीद से हैं. हिन्दी के हितैषी भी इस बात का सुख का अनुभव करते हैं कि वे वर्ष में एक बार हिन्दी को लेकर बोलते हैं, लिखते हैं और हिन्दी की श्रीवृद्धि के लिए लिए विमर्श करते हैं. एक दिन, एक सप्ताह और एक माह के बाद हिन्दी आले में टांग दी जाती है. कुछ लोग हैं जो वर्ष भर क्या लगातार हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए प्राण-प्रण से जुटे हुए हैं. इन लोगों की गिनती अंगुली भर की है लेकिन हिन्दी को हाशिये पर डालने वालों की संख्या असंख्य है. इस पर सबसे पहले मीडिया कटघरे में आता है. यूरोप की नकल करते हुए हम भूल जाते हैं कि हिन्दीभाषी जनता ही इनके चैनल को टीआरपी दिलाती है. उनके होने से ही मीडिया का अस्तित्व है लेकिन करोड़ों लोगों की बोली-भाषा को दरकिनार कर उस अंग्रेजी को सिर पर कलगी की तरह बांधे फिरते हैं, जो उन्हें अपना अर्दली समझती है. यह भी सच है कि टेलीविजन चैनलों में काम करने वाले साथियों में अधिसंख्य मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि में शायद ही अंग्रेजियत हो लेकिन उन्हें टेलीविजन प्रबंधन भी लार्ड मैकाले की तरह अंग्रेजी बोलने और लिखने पर मजबूर करता है. मैकाले की समझ में यह बात आ गई थी कि भारत को बर्बाद करना है तो उसकी शिक्षा पद्धति को नष्ट करो और उनमें कुंठा भर दो. मैकाले यह करने में कामयाब रहा और मैकाले के रूप में आज लाखों मीडिया मैनेजर यही कर रहे हैं. जिस किसी को अंग्रेजी नहीं आती, वे हीनता के भाव से भरे हैं. अंग्रेजी उन पर लाद दिया गया है क्योंकि अंग्रेजी के बिना जीवन शून्य है. मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि आज से कोई 35 वर्ष पूर्व जब पत्रकारिता का सबक लेने गया वहां भी अंग्रेजी जानने वाले को हमसे ज्यादा सम्मान तब भी मिलता था और आज भी हम. हम हिन्दीपट्टी के लोग दरकिनार कर दिया करते थे. तब मीडिया उत्पन्न नहीं हुआ था. अखबार था तो पत्रकारिता थी. आज की तरह पेडन्यूज नहीं हुआ करता था बल्कि पीत पत्रकारिता की यदा-कदा चर्चा हुआ करती थी. लेकिन हमारे गुरु तो हिन्दुस्तानी भाषा में पगे-बढ़े थे और वे हमें आकर्षित करते थे. हमें लगता था कि जिस भाषा को समाज समझ सके, वही पत्रकारिता है. शायद आज भी हम पिछली पंक्ति में खड़े हैं तो हिन्दी के प्रति मोह के कारण है या कह सकते हैं कि अंग्रेजी को अंगीकार नहीं किया, इसलिए भी पीछे धकेल दिए गए. हालांकि सच यह भी है कि हम जो कर रहे हैं, वह आत्मसंतोष है. किसी एक अघढ़ समाजी का फोन आता है कि आप का फलां लेख पढऩे के बाद मैं आपको फोन करने से रोक नहीं पाया तो लगता है कि मैंने यहां आकर अंग्रेजी को परास्त कर दिया है. क्योंकि फोन करने वाला कोई टाई-सूट पहने नकली किस्म का बुद्धिजीवी नहीं बल्कि ठेठ भारतीय समाज का वह पुराने किस्म का कोई आदमी है जिसके पास दिमाग से अधिक दिल है. हिन्दी की श्रेष्ठता के लिए, हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने लिए दिमाग नहीं दिल चाहिए. दिल वाले आज भी पत्रकारिता कर रहे हैं और दिमाग वालों की जगह मीडिया में है. हिन्दी को श्रेष्ठ स्थान दिलाना चाहते हैं तो दिल से हिन्दी को गले लगाइए. हिन्दी दिवस और सप्ताह, मास तो औपचारिकता है. एक बार प्रण लीजिए कि हर सप्ताह हिन्दी में एक लेख लिखेंगे, हिन्दी में संवाद करेंगे. हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा. मीडिया का क्या है, वह तो बदल ही जाएगा.

रविवार, 6 सितंबर 2020

कभी पेट में चिकोटी तो कभी कान उमेठते मास्साब, आप हैं तभी हम हैं मनोज कुमार कहते हैं कि संकट में ही व्यक्ति की पहचान होती है और आप इस बात पर यकीन करते हैं तो आपको इस बात पर भी यकिन करना होगा कि हर बुरे समय में, हर बुरे दौर में शिक्षक ही समाज को रोशनी देने वाला होता है. भारतीय समाज में आज भी शिक्षक का अर्थ मास्साब, गुरूजी से लगाया जाता है. ये वो शिल्पकार हैं जो अगढ़ मिट्टी को आकार देते हैं. उन्हें उसका महत्व बताते हैं और छोटे-छोटे सबक से उनका जीवन संवारते हैं. मास्साब कहें, गुरूजी या कहें शिक्षक तो ये वो शिल्पकार हैं जो स्कूल में अपना कर्तव्य पूरा करते हैं. शिक्षा की सारी धुरी इन्हीं के आसपास घूमती है. शिक्षक की क्या भूमिका होती है, यह कोरोना के महासंकट के दौर में देखने को मिला. एकाध मिसाल तो इसका उल्लेख किया जाए. यहां तो असंख्य मिसाल है जिसका उल्लेख किसी छोटे से लेख में करना संभव नहीं होगा. अखबारों में छप रही खबरों से पता चलता है कि कोरोना की बीमारी की चिंता किए बिना कहीं शिक्षक मोहल्ले में कक्षा लगाकर पढ़ा रहे हैं तो कहीं रेडियो के माध्यम से बच्चों को अक्षर ज्ञान करा रहे हैं. शिक्षा से बच्चे वंचित ना रह जाए, यह शिक्षकों का मिशन है और वे इस बात से तसल्ली पा रहे हैं कि जो कुछ संभव हो रहा है, वह करने की कोशिश कर रहे हैं. आज शिक्षक दिवस के अवसर पर डॉ. सर्वपल्लीराधाकृष्णन का स्मरण करना हमारा दायित्व है तो जो लोग डॉ. राधाकृष्णन के रास्ते पर चलकर समाज में शिक्षा का उजियारा फैला रहे हैं, उन्हें याद करना भी जरूरी हो जाता है. मैं-आप सब कभी अपने छोटे बच्चे की तरह स्कूल जाया करते थे. आज हम किसी बच्चे के पालक हैं तब कोई हमारा पालक हुआ करते थे. तब और अब में फर्क इतना है कि मास्साब, गुरूजी के हाथों में अनुशासन का डंडा हुआ करता था और आज कानून का डंडा है जो अनुशासन पर भारी पड़ रहा है. सबक याद ना रख पाने के कारण आप और हमारे पेट में मास्साब जो चिकोटी काटते थे, उसका दर्द आज भी कहीं उठ जाता है. इस दर्द में तकलीफ नहीं, मिठास है कि मास्साब यह सजा नहीं देते तो हम सबक याद भी नहीं कर पाते. कोई डॉक्टर बन गया, कोई ऑफिसर बन गया, कोई पत्रकार लेखक बना तो किसी ने राजनीति की राह पकड़ी और कामयाब हुए तो मास्साब की वजह से. ये वो मनीषी लोग थे जिन्हें परिवार चलाने लायक तब पेटभर वेतन भी नसीब नहीं हुआ करता था. घर बदहाली में होता था लेकिन माथे पर कभी शिकन नहीं दिखी. समय के पाबंद मास्साब स्कूल में आते थे और जाने के भी पाबंद थे. समय नहीं, अपने काम के. बच्चे शिक्षित हों, होशियार बनें, भाषा की तमीज हो, आदि-इत्यादि उनकी चिंता होती थी. सबसे बड़ी चिंता बच्चों में नैतिक व्यवहार का विस्तार हो. मास्साब यह साहस इसलिए कर पाते थे कि बच्चों के माता-पिता यह मानकर चलते थे कि उनके बच्चे की कुटाई हुई है तो जरूर बच्चे ने गलती की होगी. बच्चे ने गलती से मास्साब की शिकायत की तो पिता शिकायत सुनने के बजाय उल्टे जूते से उसका समाधान करते थे. यही नहीं, पालकों को पता होता था कि मामूली तनख्वाह मेें मास्साब के परिवार का बसर नहीं होता है तो हर कोई अपने सामथ्र्य के अनुरूप साग-भागी, राशन दे आते थे. यह रिश्वत नहीं होता था बल्कि गुरु ऋण से उऋण होने का एक छोटा सी दान परम्परा थी. आज जब हम शिक्षक दिवस मनाने जा रहे हैं तो यह सबकुछ औपचारिक सा लगता है. शिक्षा और शिक्षक दोनों बदल गए हैं. हालांकि यह अधूरा सच है लेकिन सच तो है. सुरसा के मुंह की तरह निजी स्कूलों ने शिक्षा का घोर व्यवसायिकरण किया है. कोरोना काल में बच्चों से फीस लेने के लिए अदालत में मामले चल रहे हैं. यह एक जीवंत उदाहरण है. वहीं सरकारी स्कूल की हालत भी वैसी ही है लेकिन वहां कोई शोरगुल नहीं है. जो शिक्षक कोरोना में भी अपने विद्यार्थियों की चिंता में नवाचार करने में जुटे हुए हैं, उनमें ज्यादतर सरकारी स्कूल के मास्साब हैं. सर और मैडम तो ऑनलाईन क्लास में बिजी हैं. नवाचार का वक्त उनका स्कूल प्रबंधन देता ही नहीं है. इन हालात में शिक्षक दिवस महज औपचारिक लगता है. अखबारों में खबरें हैं कि सरकारी स्कूल के शिक्षकों को तीन-तीन महीने से तनख्वाह नहीं बट पायी है और हैरान परेशान शिक्षक जान देने में पर उतारू हैं. एक-दो ऐसी दुखद घटना की खबर भी पढऩे को मिली है. समाज को शिक्षा से रौशन करने वाले मास्साब के सामने आत्महत्या का विकल्प शेष हो तो शिक्षक दिवस औपचारिक सा ही हो जाता है. निजी स्कूलों में भी बहुतेरे शिक्षक ऐसे हैं जो नवाचार करना चाहते हैं और कुछेक कर भी रहे हैं लेकिन कानून का डंडा उन्हें रोकता है. स्टूडेंट को सजा नहीं दे सकते हैं क्योंकि शिकायत मिलने पर शिक्षक की नौकरी जा सकती है और कहीं तो सजा भी हो सकती है. स्कूल प्रबंधन झमेला नहीं चाहता है इसलिए वह पाठ्यक्रम पूरा करने पर जोर देता है और इससे आगे बढक़र वह स्टूडेंट को सेलिब्रेटी बनाने में आमादा रहता है. साल भर निजी स्कूलों में पढ़ाई से ज्यादा प्रोग्राम का आयोजन होता है. नाच-गाने से लेकर फैशन और जाने क्या-क्या. इसे स्टूडेंट की प्रतिभा संवारने की बात कही जाती है जबकि सरकारी स्कूल के मास्साब कहते हैं हम तो ठोंक-पीटकर छोड़ देते हैं, फिर वह कलेक्टर बने, या एसपी. लेकिन बनेगा जरूर. यह विश्वास मास्साब की पूंजी है. हाल में देश के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद अपने गुरु का सार्वजनिक रूप से चरणवंदन करते हुए दिखते हैं तो भरोसा हो जाता है कि अभी शिक्षा में पूरी तरह अंधियारा नहीं आया है. अभी शेष है बहुत कुछ. अभी उम्मीद बाकी है. एक राधाकृष्णन जैसी राष्ट्रपति के स्मरण में शिक्षक दिवस की परम्परा की नींव रखी गई तो एक दूसरे राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद शिक्षकों के लिए मिसाल हैं और चरितार्थ करते हैं जब कहा जाता है-‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पायं’। यह बात हम सब जानते हैं कि गोविंद से बड़े गुरु होते हैं और इस परम्परा को राष्ट्रपति महोदय निभाते हैं और लोगों को संदेश देते हैं. ये वो उदाहरण है जिससे हमारी भारतीय संस्कृति की श्रीवृद्धि होती है. हम अपने आपको दुनिया में इसलिए श्रेष्ठ नहीं कहते हैं कि हमने तरक्की कर ली बल्कि हम इसलिए श्रेष्ठ कहते हैं कि परम्परा को सहेजा है. संजोया है, उसे आगे बढ़ाया है. एक शिक्षक से ज्यादा सहिष्णु इस संसार में कोई नहीं होता है. उसका विद्यार्थी जब पाठ पढक़र श्रेष्ठ और समर्थ लोगों की पंक्ति में जब खड़ा होता है तो सबसे ज्यादा खुश, सबसे ज्यादा गौरवांवित एक शिक्षक होता है. जब राष्ट्रपति महोदय अपने शिक्षक के चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं तो शिक्षक के चेहरे पर जो सुकून और संतोष का भाव दिखता है, वही उस शिक्षक की कामयाबी है. शिक्षा का जिस तरह से निजीकरण और व्यवसायिक चरित्र सामने आ रहा है, वह दुखद है लेकिन उल्लेखित प्रसंग इस बात की आश्वस्ति हैं कि यह रोशनी मंद हो सकती है लेकिन बुझेगी नहीं, और जब समाज को जरूरत होगी तब पूरे ताब के साथ शिक्षाजगत रोशन हो जाएगा. सभी शिक्षकगणों को इस महिमा दिवस अर्थात शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं. आप हैं तो हम हैं.

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020


संकट, संयम और स्वावलंबन का पर्व
मनोज कुमार
15 अगस्त, 1947 से लेकर 2019 तक हम आजादी का पर्व उत्साहपूर्वक मनाते आए हैं. इन वर्षों में ऐसा भी नहीं है कि कोई संकट नहीं उपजा हो लेकिन साल 2020 में जहां इस वक्त हम खड़े हैं, वह संकट, संयम और स्वावलंबन का पर्व बन गया है. कोविड-19 ने ना केवल भारत वर्ष के समक्ष चुनौतियों और संकटों का पहाड़ खड़ा किया है बल्कि पूरी दुनिया की मानवता के समक्ष भयावह संकट के रूप में उपस्थित है. जानकारों का कहना है कि हर सौ साल में ऐसी त्रासदी दुनिया में एक बार कयामत बन कर टूटती है. भारत की आजादी के बाद संभवत: यह पहला अवसर होगा जब हम इन चुनौतियों का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार कर रहे हैं. हालांकि बीते सालों में कई किस्म की महामारी के शिकार हमारी सोसायटी होती रही है लेकिन कोविड-19 पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है.
कोविड-19 का यह संकट हमारे लिए कुछ अधिक पीड़ादायक है. यह पीड़ा है उस तारीख के लिए जिस दिन हम गर्व के साथ अपना तिरंगा फहराते हैं. अपने भीतर देशभक्ति और स्वाभिमान से भर उठते हैं. यह हमारा राष्ट्रीय उत्सव होता है लेकिन इस बार हमारा राष्ट्रीय उत्सव रस्मी होगा. यह जरूरी भी है क्योंकि मौत की बांहें पसारे कोविड-19 को यह ज्ञात नहीं है कि हम अपना राष्ट्रीय पर्व मना रहे हैं या कोई उत्सव का आयोजन कर रहे हैं. एक कशिश मन में रह जाएगी लेकिन ऐसा नहीं है कि जैसे पहले महामारी एक समय के बाद विलुप्त हुइ्र्र तो यह नहीं होगी. इस बार ना सही, अगले साल हम दुगुने उत्साह के साथ हमारा अपना राष्ट्रीय पर्व का आयोजन करेंगे. देश हमारा है.
कोविड-19 संकट का भयावह समय है. यह संयम और स्वावलंबन का समय भी है. संकट से समाधान का रास्ता भी निकलता है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है. सोना भी तभी दमकता है, जब वह आग में तपकर निखरता है. एक पत्थर भी तभी मूर्ति के रूप में आकार ग्रहण करती है जब शिल्पकार अपने औजार से उसे छलनी करता है. ऐसे में मनुष्य भी संकट से स्वयं को और आत्मविश्वासी बनाता है. जीने के नए राह तलाशता है. सोने का आग में निखरना या पत्थर का मूर्ति का आकार लेने में शिल्पी का संयम काम करता है लेकिन संकट में मनुष्य का संयम उसे सोने की तरह निखारता है. यकिन ना हो तो कोई 6 माह का अनुभव स्वयं कर लीजिए. रोग से बचाव के लिए लॉकडाउन जैसे कठिन उपाय सरकार ने किए. बाजार बंद, रोजगार पर संकट और सीमित बचत के बीच जिंदगी को बचाये रखने की चुनौती. थोड़े से लोगों को अपवाद स्वरूप छोड़ भी दें तो अधिकांश लोगों ने इस स्थिति में भी संयम से काम लिया. स्वयं के हाथों में ऐसे काम करने लगे जिससे खर्च में कमी आए. जो बचत की राशि है, उसका अधिकतम और जरूरी खर्च किए जा सकें. साधनसम्पन्न परिवारों की चर्चा बेमानी है लेकिन मध्यम और निम्र मध्यमवर्ग की चर्चा करें तो उन्होंने संयम के साथ इस समय को गुजारा है और आने वाले समय में जिंदगी आहिस्ता आहिस्ता पटरी पर आ जाएगी, यह यकिन करना नामुमकिन नहीं है.
कोविड-19 ने समाज को बाजार से भी परे किया है. हम सब बाजार के शिकार हो चले थे. हमारी जिंदगी में बाजार का हस्तक्षेप इतना अधिक हो गया था कि स्वावलंबन को हम भूल चुके थे. दाम चुकाओ और आराम करो हमारी नियती बन रही थी लेकिन इस महामारी ने हमें स्वावलंबी बना दिया. बहुतेरे काम जो हम कभी स्वयं करते थे, उसे छोड़ दिया था. आज हम उन्हीं काम को फिर से कर ना केवल स्वावलंबी बन रहे हैं बल्कि आत्मसंतुष्टि का भाव भी महसूस कर रहे हैं. परिवार के बीच में जो खालीपन आ गया था, इस महामारी के कारण आपस में आत्मीयता का भाव बढ़ा है. यह कड़ुआ सच है कि कई घरों में पालकों को अपने ही बच्चों के बारे में यह ज्ञात नहीं था कि वह क्या पढ़ता है, उसकी जीवनशैली क्या है, उन्हें इस दौरान बच्चों को समझने का अवसर मिला. दूसरी तरफ जिन बच्चों ने मां-बाप को एटीएम मशीन समझ लिया था, उन्हें भी इस बात का अहसास हुआ कि मां-बाप एटीएम मशीन नहीं बल्कि ममता की वो मशीन है जिनके सिर पर हाथ फेरते ही मीठी नींद आ जाती है. पति-पत्नी ने एक-दूसरे की भावना को समझा. ये जो बदलाव आया है, उससे बाजार भौंचक है. उसे डर है कि यह बदलाव पूरे बाजार को बदल देगा. कोविड-19 को तो एक दिन विदा होना ही है लेकिन बाजार के प्रति लोगों का जो अनुराग विदा होगा, वह डर बाजार को बैठ गया है.
संकट, संयम और स्वावलंबन ने जहां भारतीय समाज को एक नए ढंग से परिभाषित किया है, वह हमारी कई पीढिय़ों का मार्गदर्शन करता रहेगा. जिस भारतीय परम्परा की हम केवल चर्चा करते रहे हैं, मुझे निजी तौर पर लगता है कि उस रास्ते पर हम लौटने लगे हैं. हमारे रिवाज में था कि पहले जूते-चप्पल घर से बाहर उतारें और बाहर ही रखे बर्तन के पानी में हाथ-मुंह धोकर घर में प्रवेश करें. यह चेतावनी थी कि किसी किस्म की बीमारी घर के भीतर लेकर नहीं आएं. लेकिन बदलते दौर में हम यह भूल गए थे लेकिन कोरोना ने याद दिला दिया है कि वही ठीक था, जिसे छोड़ आए हो. हालांकि यह भी कपोल कल्पना होगी कि हम उन पुराने दिनों में चले जाएंगे लेकिन यह सत्य है कि हम नए जमाने में होंगे. हाथ में मोबाइल और लेपटॉप होगा लेकिन संस्कार से हम भारतीय होंगे. दर्शन और संस्कृति की नई जड़ें इस संकटकालीन स्थितियों में हमारे और हमारी नवीन पीढ़ी के भीतर जमने लगी है, वह कालजयी होगी. एक बार घर लौटने की देर थी लेकिन इस संकट ने मजबूरी में ही सही, हमें, आपको घर की तरफ लौटा दिया है. इसे सहेज कर रखना और आगे बढ़ाने की जवाबदारी हमारी और आपकी है.
हम यह मान लें कि इस बार का हमारा स्वाधीनता पर्व संकट, संयम और स्वावलंबन का घर-घर मनाया जाने वाला उत्सव है. एक कमी, एक दुख तो होगा लेकिन हम बचेंगे तो समाज बचेगा, समाज से राज्य और राष्ट्र सुरक्षित होगा. इसलिए आवश्यक है कि हम उन तमाम किस्म की सावधानी को बरतें जिससे यह महामारी आपको, हमें और हमारे लोगों तक ना फटके. मास्क लगाना उतना ही आवश्यक है जितना की आपस में शारीरिक दूरी कायम रखना. स्वच्छता का एक सबक इस महामारी ने सिखाया है. जान है तो जहान है, यह सच है लेकिन यह भी सच है कि हमारी परम्परा रही है कि साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा मिलकर भोज उठाना. यानि एक संदेश इस पर्व पर यह भी है कि हम आज भी वसुधैव कुंटुंबकंम के साथ जीते हैं. इसीलिए तो सबसे प्यारा, हिन्दुस्तान हमारा.

रविवार, 2 अगस्त 2020

कोरोना को पराजित करने एकजुटता पहली शर्त मनोज कुमार समूची दुनिया के साथ मध्यप्रदेश में कोरोना की भयावहता प्रतिदिन देखने को मिल रही है. आंकड़ों को देखकर मन कंपकंपा उठता है. यह ऐसा कठिन समय है जब हम रात में सोते समय मौत के आंकड़े और संक्रमितों की संख्या गिनकर सोते हैं और आंख खुलते ही अखबार के पन्नों पर छपे आंकड़ों को देखकर अफसोस से भर उठते हैं. सिहरा देने वाली खबरों के बीच कुछेक खबरें सुकून देने वाली भी होती हैं लेकिन कोरोना के कयामत के सामने ऐसी खबरें बौनी हो जाती है. कभी लगता है कि बीमारी ने किनारा कर लिया है लेकिन कुछ घंटे बीतते बीतते फिर आंकड़ें डराने लगते हैं. कहा जा रहा है कि सौ साल में ऐसी महामारी आती है लेकिन आजाद भारत में यह शायद पहला मौका होगा, जब उम्र के पचास पार लोग भी इससे दो चार हो रहे हैं. नई पीढ़ी के लिए तो यह एक सबक के समान है. वे अपनी आंखों से मौत का मंजर देख रहे हैं. किसी के पिता, तो किसी का पति, कोई भाई, कोई मां, कोई बहन और कोई दोस्त के अचानक कोरोना के गाल में समा जाने की खबर आती है. सोशल मीडिया पर लगभग हर रोज ऐसी कई खबरें पढऩे को मिल जाती है. साल 2020 के शुरूआत में ही कोरोना ने दस्तक दे दी थी. तब इसकी भयावहता से हम सब बेखबर थे. जैसे जैसे समय गुजरता गया. कोरोना के मौत के डैने पसरने लगा. सुरक्षा और सर्तकता के लिए तालाबंदी की नौबत आ गई. सरकार ने कोरोना के चैन को तोडऩे के लिए तीन महीने का लॉकडाउन ऐलान कर दिया. इस दौरान कोरोना का फैलाव थोड़ा धीमा रहा लेकिन लॉकडाउन में ढील मिलते ही कोरोना को मौका मिल गया और तेजी से वह पसरने लगा. देखते ही देखते आंकड़ों का ग्राफ बढऩे लगा. एक बार फिर जिंदगी को बचाने के लिए कभी एकाध हफ्ते तो कभी दो दिनों का लॉकडाउन करने के लिए सरकार को मजबूर होना पड़ा. शारीरिक दूरियां, मुंह पर मास्क और सेनीटाइजर से स्वच्छ रखने की हिदायत के साथ जनजागरूकता में सरकार जुटी हुई है. सरकार की इन कोशिशों से जिंदगी के बचाव में आंशिक कामयाबी तो मिली लेकिन जिंदगी पटरी से उतर गई. काम-धंधे चौपट हो गए. बचत के रुपये हवा में उड़ गए. भूख और बेकारी के सामने कोरोना का डर छोटा पडऩे लगा. लोग बेखौफ होकर काम की तलाश में निकल पड़े. सडक़ों पर काम की तलाश में निकलने वाले इन लोगों को भी जिंदगी का भय था लेकिन पेट की आग के सामने मौत भी छोटी लगती है. बेबसी और मजबूरी घरों से सडक़ पर ले तो आयी लेकिन कारखाने बंद, बाजार बंद तो बेकार हाथों को काम कहां से मिले? भूख और भय के बीच जिंदगी हर रोज तमाम हो रही है. आर्थिक रूप से आम आदमी से लेकर सरकार का खजाना भी सन्नाटे में हैं. अखबारों में छपने वाली खबरें इस बात की तस्दीक करती हैं कि हालात सुधरने में जाने कितना वक्त लगे. अभी तो खैर मना रहे हैं कि किसी तरह कोरोना किनारे हो जाए. जो लोग कुंडली और भविष्यवक्ताओं पर भरोसा नहीं करते थे, अब उनकी गणना पर उन्हें भरोसा करना पड़ रहा है. यह तो नहीं कहा जा सकता कि जो कहा जा रहा है, वैसा ही होगा लेकिन डूबते तो तिनका का सहारा वाली बात को मान लें तो सितम्बर तक वैक्सीन बनने की उम्मीद है और ग्रह नक्षत्र अपनी चाल बदलेंगे तो कोरोना का कहर कमजोर पड़ेगा. यदि ऐसा होता है तो यह राहत की बात होगी. एक तरफ आम और खास सब लोग कोरोना से भयग्रस्त हैं लेकिन राजनीति के पाले में कोरोना शतरंज के मोहरे की तरह बिछाकर खेला जा रहा है. जो सरकार से बाहर हैं, वह सरकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं. उसकी कोशिशों पर सवाल उठा रहे हैं. कौन, कहां इलाज करा रहा है? किसको क्या आर्थिक लाभ हो रहा है, जैसे सवाल लगातार उठाया जा रहा है. यह सवाल इस समय फिजूल का है क्योंकि कोरोना के लिए सब एक धान पसेरी है. कोरोना दोस्त नहीं, दुश्मन है. वह अपना देखती है और ना पराया. उसका एक लक्ष्य है मौत बनकर टूट पडऩा. जो सरकार में हैं, वह अपने तर्क के साथ जवाब दे रहे हैं. सही मायने में राजनेता आम आदमी के आईकॉन होते हैं. उनका व्यवहार आम आदमी को प्रेरित करता है लेकिन जिस तरह से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करने, मास्क नहीं लगाने की राजनेताओं की खबरें देखने और सुनने में मिल रही है, वह आम आदमी को भी लापरवाह बना रहा है. यह तो अच्छा हुआ कि समय रहते सरकार ने जुलूस, जलसे पर पाबंदी लगाकर आम आदमी को संदेश दे दिया कि कोई आम और खास नहीं. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने स्वयं कहा है कि नियमों का उल्लंघन करने वाल मुख्यमंत्री क्यों न हो, कार्यवाही की जाए. कोरोना जैसे संकट के समय में सबको एक साथ चलना होगा क्योंकि यह मौत की बीमारी चिंह कर नहीं आती है. आज सब एकजुट हो जाएं तो पुलिस, प्रशासन, डॉक्टर और कोरोना से जूझने के लिए लगे लोगों में भी साहस का संचार होगा. अपितु कम श्रम और कम खर्च में बेहतर व्यवस्था की जा सकेगी. ऐसे में तंत्र पर किया जाने वाला खर्च नियंत्रित होगा और लोगों के जीवन बचाने में उस बजट का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा. व्यवस्था बनाने में जुटी पुलिस और प्रशासन भी तनाव मुक्त होगा तो लोगों की शिकायतें भी कम होगी. जनप्रतिनिधि जब लोगों को सचेत करेंगे, जागरूक करेंगे तो उनकी बातों का असर दूर और देर तक होगा. लोग बेवजह सडक़ों पर नहीं आएंगे. जो लोग आवश्यक कार्यों से घर से बाहर निकल रहे हैं, वे सावधानी के साथ आएंगे. सोशल डिस्टेसिंग के साथ मास्क लगाकर स्वयं और दूसरों को बचाएंगे. यह समय साथ चलने का है, साथ देने का है और जहां तक सवाल जवाब का है तो उसके लिए उम्र होगी. कटघरे में खड़े कीजिएगा और जवाब मांग लीजिएगा लेकिन यह तब होगा जब जान हो तब जहान होगा.

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