गुरुवार, 29 जुलाई 2021

‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मनोविज्ञान शिक्षकों की भूमिका’ पर संगोष्ठी

 ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मनोविज्ञान शिक्षकों की भूमिका’ पर संगोष्ठी

‘शिक्षा नीति में मनोविज्ञान  के शिक्षकों की प्रभावी भूमिका-प्रो. मिश्र

महू (इंदौर). ‘शिक्षा नीति-2020 के पूरे प्रारूप में मनोविज्ञान विषय के शिक्षकों की प्रभावी भूमिका रेखांकित की गई है. शिक्षा पद्धति, मूल्यांकन  और शिक्षा तथा विद्यार्थियों के संबंध में जो नई संकल्पना प्रस्तुत की गई है, उसे कार्य व्यवहार में लाने के लिए मनोविज्ञान शिक्षकों की अहम भूमिका है.’ यह बात महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर गिरिश्वर मिश्र ने डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय (ब्राउस)के शिक्षा अध्ययन शाला एवं भारतीय शिक्षण मंडल के संयुक्त तत्ववाधान में आयोजित राष्ट्रीय वेबीनार में कही. प्रोफेसर मिश्र का कहना था कि शिक्षा की रूपरेखा बदल गई है. अब नए तरीके से माइंडसेट करने की जरूरत शिक्षकों, विद्यार्थियों और पालकों को करने की जरूरत है. प्रोफेसर मिश्र का सुझाव था कि मनोविज्ञान के शिक्षकों को भी इस नई संकल्पना में प्रशिक्षण की आवश्यकता है. विद्यार्थी की रचनात्मकता और उसकी रूचि के अनुरूप अब शिक्षा देने की जो व्यवस्था की जा रही है, उसमें मनोविज्ञान के शिक्षकों की भूमिका बड़ी और गंभीर होगी क्योंकि यह मनोविज्ञान का कौशल है कि वह दिशा तय कर सके और परामर्श दे सके. शिक्षा ऐसी हो जो सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करे.

वेबीनार के आरंभ में स्कूल ऑफ एजुकेशन, सेंट्रल यूर्निवसिटी, हिमाचल प्रदेश, धर्मशाला के अधिष्ठाता प्रोफेसर विशाल सूद ने शिक्षा नीति में मनोविज्ञान शिक्षकों की भूमिका का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी अब मनोविज्ञान शिक्षकों पर है. उन्होंने कहा कि मनोविज्ञान शिक्षकों  की योग्यता होती है कि वह विद्यार्थियों की ऊर्जा और रचनात्मकता की पहचान कर सके. अब उन्हें यह जवाबदारी और गंभीरता से पूर्ण करना होगी. प्रोफेसर सूद ने भारतीय ज्ञान परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा नीति 2020 ने विद्यार्थियों के कौशल को पहचान कर उन्हें शिक्षा का खुला आकाश उपलब्ध कराया है. एमिटी यूर्निवसिटी, गुरुग्राम हरियाणा में क्लिनिकल सॉयकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास शर्मा ने कहा कि शिक्षा नीति में अब संवेदनशीलता को स्थान दिया गया है जिसकी समझ मनोविज्ञान शिक्षकों में होती है. उन्होंने आउटकम की बात करते हुए कहा कि विद्यार्थी जो क्लास रूम में पढ़ रहा है, वह कितना सीख और समझ रहा है, इसका आंकलन मनोविज्ञान शिक्षक ही कर पाएंगे. समस्या को समझना और उसका विवेचन करने का कौशल मनोविज्ञान शिक्षकों  के पास होता है. उन्होंने छोटे बच्चों की शिक्षा पर कार्य करने और योजना बनाने का सुझाव दिया. 

दिल्ली यूर्निवसिटी में मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आनंदप्रकाश ने कहा कि मनोविज्ञान के शिक्षक नई शिक्षा नीति के अनुरूप ढाल सकते हैं. चुनौती के साथ संभावना की पहचान की योग्यता मनोविज्ञान के शिक्षकों में होती है. उन्होंने तीन बिंदुओं का उल्लेख करते हुए अपनी बात रखी जिसमें पहला यह कि मनोविज्ञान के शिक्षकों में व्यक्ति को विस्तार देना तथा संभावना तलाश करना, दूसरा समाज के साथ सरोकार स्थापित करना, तीसरा मानव सभ्यता के सृजन में योगदान करना. प्रो. आनंदप्रकाश का कहना था कि शिक्षा संभावनाओंं का विस्तार है. उन्होंने कहा कि हमारे यहां मनोविज्ञान के शिक्षित लोगों की जरूरत 10 हजार है जबकि हम केवल हजार से ज्यादा शिक्षित नहीं कर पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि ब्राउस इस दिशा में रोल मॉडल बन सकता है. बरकतउल्लाह विश्वविद्याल में मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर दिनेश नागर ने अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा कि दुनिया के अन्य देशों के विश्वविद्यालय में अन्य विषयों के विभागों में मनोवैज्ञानिकों को रखा जाता है. अब यह प्रक्रिया शिक्षानीति-2020 में भी हो पाएगी. उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए मनोविज्ञान के शिक्षकों की आवश्यकता होगी और इसके बिना हम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाएंगे.

कार्यक्रम की अध्यक्ष एवं कुलपति प्रोफेसर आशा शुक्ला ने मन को आंकलन करने का कार्य मनोविज्ञान विषय के शिक्षक ही कर सकते हैं. शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह शिक्षा बहुआयामी है. इसलिए अब मनोविज्ञान के शिक्षकों की भूमिका और बढ़ गई है. उन्होंने कोरोना काल में किए गए अध्ययन का हवाला भी दिया. शिक्षा अध्ययन शाला (ब्राउस) की अधिष्ठाता एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. मनीषा सक्सेना ने अतिथियों का स्वागत एवं आभार व्यक्त किया. कार्यक्रम की समन्वय डॉ. कृष्णा सिन्हा ने किया. कार्यक्रम का प्रशासनिक समन्वय रजिस्ट्रार अजय वर्मा का था. डॉ. भरत भाटी एवं डॉ. मनोज कुमार गुप्ता के साथ ही ब्राउस परिवार का सक्रिय सहयोग रहा.

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

डिजीटल अम्ब्रेला के नीचे शासन और सरकार

 मनोज कुमार

क्या आप इस बात पर यकीन कर सकते हैं कि पेपरलेस वर्क कर कोई विभाग कुछ महीनों में चार करोड़़ से अधिक की राशि बचा सकता है? सुनने में कुछ अतिशयोक्ति लग सकती है लेकिन यह सौफीसदी सच है कि ऐसा हुआ है. यह उपलब्धि जनसम्पर्क संचालनालय ने अपने हिस्से में ली है. हालांकि यहां स्मरण करना होगा कि खंडवा सहित कुछ जिला जनसम्पर्क कार्यालयों को पेपरलेस बना दिया गया था. तब इस पेपरलेस वर्क कल्चर से कितनी बचत हुई, इसका लेखाजोखा सामने नहीं आया था. कोरोना के कहर के बाद जनसम्पर्क संचालनालय ने सुध ली और पेपरलेस वर्क कल्चर को अमलीजामा पहनाकर खर्च में कटौती की तरफ अपना कदम बढ़ा दिया है. निश्चित रूप से इसे आप नवाचार कह सकते हैं. ऐसा भी नहीं है कि अन्य विभागों ने इस दिशा में कोई उपलब्धि हासिल नहीं की हो लेकिन उनकी ओर से ऐसे आंकड़े सार्वजनिक नहीं होने से आम आदमी को पता नहीं चल रहा है. 

मध्यप्रदेश अपने नवाचार के लिए हमेशा चर्चा में रहा है लेकिन इस वक्त हम जिस नवाचार की बात कर रहे हैं, वह सुनियोजित नहीं है लेकिन अब वह दिनचर्या में शामिल हो गया है. नवाचार की यह कहानी शुरू होती है करीब दो वर्ष पहले कोरोना के धमकने के साथ. आरंभिक दिनों में सबकुछ वैसा ही चलता रहा और लगा कि बस थोड़े दिन की बात है लेकिन ऐसा था नहीं. कोरोना की दूसरी लहर ने जो कोहराम मचाया तो सब तरफ हडक़म्प मच गया. कोरोना के शिकार लोगों को इलाज, उनकी देखरेख और व्यवस्था बनाये रखने के लिए मुस्तैद अधिकारियों और कर्मचारियों को मोर्चे पर डटना मजबूरी थी. जिंदगी उनकी भी थी, डर उनके पास था. और इस डर ने एक संभावना को जन्म दिया. टेक्रालॉजी का यह नया दौर है और इस महामारी के पहले हम इस कोशिश में लगे थे कि पूरा तंत्र डिजीटल हो जाए लेकिन सौफीसदी करने में तब वैसी रूचि लोगों की नहीं थी. आज भी सौफीसदी डिजीटलीकरण नहीं हो पाया है लेकिन डर से उपजी संभावना में जो जहां है, वहीं रूक गया और हाथों में कोई मोबाइल लिये तो कोई आइपैड तो कोई घर पर रहकर लेपटॉप से अपने दायित्व को पूरा कर रहा था. इस तरह से जो काम बीस वर्ष में नहीं हो पाया था, वह दो वर्ष में हो गया. इस डिजीटल अम्ब्रला के नीचे पूरा शासन और सरकार आ गई है. बदलते जमाने के साथ हम अब चलने के लिए अब पूरी तरह से तैयार हैं बल्कि चलने लगे हैं.

इस डिजीटल सिस्टम ने पूरे तंत्र का चेहरा बदल दिया है. पेपरलेस जिस प्रक्रिया की बात हम करीब एक दशक से कर रहे थे लेकिन व्यवहार में संभव नहीं हो पा रहा था, जो अब संभव है. डिजीटलकरण के पश्चात एक और बड़ी पहल यह हुई है कि हर माह अलग अलग विभागोंं की बैठक में झाबुआ से लेकर मंडला जिले के अधिकारी कभी राजधानी मुख्यालय भोपाल आते थे तो कभी संभागीय मुख्यालय में उन्हें शामिल होना पड़ता था. शासकीय दस्तूर के मुताबिक बैठक का परिणाम भले शून्य हो लेकिन भौतिक उपस्थिति लाजिमी थी. इस आवन-जावन में सब मिलाकर लाखों रुपये के डीजल-पेट्रोल, भत्ता और अन्य खर्चे होतेे थे. साथ में अधिकारी के जिला मुख्यालय में नहीं रहने से कई अनिवार्य कार्य रूक जाते थे, या टल जाते थे. यही प्रक्रिया जिला मुख्यालय में भी होती थी और जिले के भीतर आने वाले अधिकारी-कर्मचारी शामिल होते थे. लेकिन अब प्रशासन का चेहरा-मोहरा बदलने लगा है. कोई कहीं नहीं आ जा रहा है, सब अपने ठिकाने पर मुस्तैद हैं. ऑनलाईन मीटिंग हो रही है. चर्चा और फैसले हो रहे हैं. खर्चों पर जैसे कोई ब्रेकर लग गया है. एक किस्म से इसे आप अनुपात्दक व्यय भी कह सकते हैं, जो नियंत्रण में आ गया है. स्वागत-सत्कार में भी होने वाले खर्च लगभग समाप्त हो गए हैं. राजधानी के मंत्रालय से लेकर जिला और तहसील मुख्यालय में ही सब काम निपट जा रहा है. यह अपने आप में नवाचार है क्योंंकि इससे होने वाली बचत का समुचित उपयोग किया जा सकेगा. 

सरकार ने कोरोना महामारी के दरम्यान शासकीय कार्यालयों को पहले जुलाई तक पांच दिनी सप्ताह घोषित किया था, जिसे बढ़ाकर अब अक्टूबर 2021 तक कर दिया गया है. यह फैसला भी स्वागतयोग्य है. हालांकि कोरोना के पहले सरकार ने पांच दिवसीय कार्यालयीन सप्ताह के लिए सुझाव मांगे थे लेकिन अरूचि के चलते मामला ठंडे बस्ते में चला गया था लेकिन कोरोना ने एक पुरानी और सकरात्मक योजना को आरंभ कर दिया है. पहली नजर में यह पांच दिनी वर्किंग का कांसेप्ट थोड़ा ठीक नहीं लगता है लेकिन यह शासन और अधिकारी कर्मचारियों के लिए हितदायक है. तंत्र के स्तर पर देखें तो लगातार दो दिन कार्यालय बंद रहने से स्थापना व्यय में कमी आती है. संसाधनों की बचत होती है या कहें कि खर्च नियंत्रण में होता है. इन दो दिनों में अधिकारी-कर्मचारी अपने निजी कार्य पूर्ण कर सकते हैं और मानसिक रूप से रिलेक्स होते हैं. वैसे भी माह के दूसरे और तीसरे शनिवार को अवकाश होता ही है. तब केवल दो दिन की इसमें वृद्धि किया जाना अनुचित नहीं होता है. इन दो दिनों के कार्यदिवस में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए कार्यालय का समय सुबह जल्दी और देर शाम तक कर पूर्ण किया जा सकता है. कई राज्यों में पहले से पांच कार्य दिवस प्रचलन में है. 

इस तरह से हम मान सकते हैं कि कोरोना ने ना केवल आम आदमी की जिंदगी में परिवर्तन लाया बल्कि शासकीय तंत्र में भी बेहतर बदलाव की दिशा में प्रेरित किया है. यह तो निश्चित है कि आज नहीं तो कल, हमें डिजीटल दुनिया में सौफीसदी प्रवेश करना है तो आज से क्यों नहीं. कुछ लोगों का कहना है कि यह असुविधाजनक है. मान लिया तो जो खरीददारी आप इंटरनेट के माध्यम से करते हैं, रेल-बस का किराया अनेक तरह के एप के माध्यम से करते हैं, तब क्या आपके लिए यह असुविधाजनक नहीं है. एक बार कोशिश करके देख लीजिए राह आसान हो जाएगी. सबसे बड़ी बात यह है कि समूचे तंत्र में पारदर्शिता आ जाएगी क्योंकि वर्क रिर्पोट करने से लेकर बिल जमा करने और भुगतान पाने की  सारी व्यवस्था ऑनलाईन है तो रिश्वतखोरी का कॉलम भी हाशिये पर चला जाएगा. इसलिए मध्यप्रदेश जिस तरह से डिजीटल अम्ब्रेला के नीचे आ गया है, वह सराहनीय है. अब जरूरत है कि अम्ब्रेला को ओपन कर सभी से कहा जाए आओ, थोड़ा थोड़ा डिजीटल हो जाएं.

सोमवार, 19 जुलाई 2021

समाचार और विज्ञापन में भेद करना मुश्किल-प्रो. सुधीर गव्हाणे

 ‘मीडिया शिक्षा के सौ वर्ष : चुनौतियां और संभावनाएं’ विषय पर राष्ट्रीय वेबीनार

महू (इंदौर). ‘समाचार विज्ञापन बनता जा रहा है और विज्ञापन अब समाचार के रूप में परिवर्तित हो रहा है. अब समाचार और विज्ञापन में भेद करना मुश्किल है.’ यह बात प्रो. सुधीर गव्हाणे ने कही. सुपरिचित मीडिया शिक्षक प्रो. गव्हाणे  ‘मीडिया शिक्षा के सौ वर्ष : चुनौतियां और संभावनाएं’ विषय पर आयोजित वेबीनार को संबोधित करते हुए कहा कि पत्रकारिता की प्रतिबद्धता लोकतंत्र एवं देश के संविधान के प्रति होना चाहिए. डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू, भारतीय जनसंचार संस्थान, नईदिल्ली एवं देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेबीनार में उन्होंने पत्रकारिता के पांच सूत्र बताये जिसमें पत्रकारिता की प्रतिबद्धता जनहित, समाज के वंचित एवं पीडि़त लोगों के लिए, सभ्य समाज के निमार्ण तथा राष्ट्रहित एवं देशहित पत्रकारिता का लक्ष्य होना चाहिए. उन्होंने पत्रकारिता को अलग अलग कालखंड में रखकर बताया कि 1920-1947 की प्रहार पत्रकारिता का दौर था तो 1947-60 प्रयोगकाल, 1970-1990 आधार खंड रहा तो 1990-2020 का दौर बहार पत्रकारिता का रहा और 1920-1930 का दौर सायबर कालखंड का रहा. प्रो. गव्हाणे ने पत्रकारिता के विगत और आगत का विहंगम विवेचना की.

वेबीनार के मुख्य वक्ता आईआईएमसी, नईदिल्ली में डीन अकादमिक डॉ. गोविंद सिंह ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भारत और भारतीयता की बात की गई है जिससे हम एक नईदृष्टि विकसित कर सकेंगे. उन्होंने कहा कि पत्रकारिता शिक्षा में गंभीरता नहीं है और हम पश्चिमी मॉडल पर आश्रित हैं. उन्होंने मीडिया एजुकेशन काउंसिल बनाने की बात की और कहा कि नारद और संजय ही नहीं, गुरु नानकदेव और शंकराचार्य भी कुशल संचारक थे. यह बात हमें मानना चाहिए. उन्होंने मीडिया इंडस्ट्रीज और शिक्षक संस्थाओं के बीच गेप की चर्चा भी की और निदान भी सुझाया. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विज्ञापन एवं जनसम्पर्क विभाग के एचओडी डॉ. पवित्र श्रीवास्तव ने कहा कि होनहार बच्चा जर्नलिज्म की ओर आता नहीं है लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में यह अवसर दिया गया है. उन्होंने पत्रकारिता एवं संचार को यूपीएससी एवं पीएससी परीक्षाओं में शामिल करने की बात कही. पेंडेमिक में हेल्थ कम्युनिकेशन जैसे विषय की जरूरत को महसूस किया गया.

स्कूल ऑफ जर्नलिज्म, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की विभागाध्यक्ष डॉ. सोनाली नरगुंदे ने कहा कि पत्रकारिता शिक्षा का सामाजिकरण किया जाना चाहिए. संचार के सभी तत्वों को महत्व देना होगा. उन्होंने कहा कि मिशन, प्रोफेशन एवं पेशन तीन अलग अलग चीजेें हैं. उन्होंने प्रेक्टिकल एजुकेशन पर जोर दिया. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय केन्द्रीय विश्वविद्यालय में वोकेशनल एजुकेशन के एचओडी प्रो. राघवेन्द्र मिश्रा ने पत्रकारिता शिक्षा के आरंभ से लेकर अब तक विवेचन किया. उन्होंने कहा कि भारत में पत्रकारिता की शुरूआत 1780 से होती है और 1911 में एनीबिसेंट पत्रकारिता शिक्षा की नींव रखती हैं. 1991 में उदारीकरण की चर्चा करते हुए प्रो. मिश्रा ने कहा कि इस दौर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रेडियो का आगमन तेजी से हुआ. उन्होंने कहा कि 3 हजार से 3 लाख तक में मीडिया शिक्षा दी जा रही है, जो बच्चे आ रहे हैं, वे ग्लैमर की वजह से आ रहे हैं. प्रो. मिश्रा ने ज्ञान आधारित शिक्षा की पैरवी करते हुए कहा कि एनईपी और मीडिया शिक्षा के उद्देश्य एक हैं. प्रेस्टिज इंस्ट्यूट में पत्रकारिता विभाग की समन्वयक सुश्री भावना पाठक ने कहा कि अब समय बदल रहा है और पत्रकारिता शिक्षा का पैटर्न भी बदल रहा है. उन्होंने फैकल्टी डेवलपमेंट एवं ट्रेनिंग को पत्रकारिता शिक्षा के सुधार में एक जरूरी कदम बताया.

वेबीनार की अध्यक्ष एवं कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने कहा कि जिस तरह निर्भया कांड को जनआंदोलन बनाने में मीडिया की भूमिका रही, वही मीडिया अन्य नारी अपराधों को जनआंदोलन बनाने में क्यों आगे नहीं आ पायी, इसके कारणों की तलाश की जानी चाहिए. आज भी जनमानस का पत्रकारिता पर भरोसा है और किसी घटना पर वह अखबार में छपी खबर का हवाला देता है. पत्रकारिता को सामाजिक बोध के साथ अपने दायित्व को भी समझना होगा और इसके लिए पत्रकारिता शिक्षा एक बेहतर रास्ता है. उन्होंने वेबीनार में उपस्थिति अतिथियों का स्वागत किया. वेबीनार का संचालन मीडिया एवं नेक, सलाहकार ब्राउस  डॉ. सुरेन्द्र पाठक ने किया. आभार प्रदर्शन मीडिया प्रभारी ब्राउस मनोज कुमार ने किया. वेबीनार के आयोजन में रजिस्ट्रार अजय वर्मा, डीन प्रो. डीके वर्मा के साथ ब्राउस परिवार का सहयोग रहा.

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

बेटी, बोझ नहीं, बेटी बरक्कत का सबब


 

मनोज कुमार

मन के अंधियारे को दूर करने के लिए एक दीपक जलाना जरूरी होता है. और जब भारतीय समाज बेटी की बात करता है तो उसके मन में एक किस्म की निराशा और अवसाद होता है. बेटी यानि परिवार के लिए बोझ. यह किसी एक प्रदेश, एक शहर या एक समाज की कहानी नहीं है बल्कि घर-घर की कहानी है. किसी राज्य या शहर में ऐसी सोच रखने वालों की कमी या अधिकता हो सकती है लेकिन हैं सब इस मानसिक बीमारी से ग्रस्त. मध्यप्रदेश इससे अछूता नहीं था. असमय बच्चियों का ब्याह, स्कूल भेजने में हील-हवाला करना और उनके स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही आम थी. लेकिन साल 2007, तारीख 1 अप्रेल जैसे बेटियों के भाग्य खुलने का दिन था. इस दिन देश के ह्दयप्रदेश अर्थात मध्यप्रदेश बेटियों के भाग्य जगाने के लिए योजना आरंभ की थी-लाडली लक्ष्मी योजना. जैसा कि हमारा मन बना होता है सरकार की योजना है, कुछ नहीं होने वाला. कागज पर बना है और कागज पर ही दम तोड़ देगा. आहिस्ता आहिस्ता समय ने करवट ली और शहर से गांव तक बेटियों के हिस्से में खुशियां दस्तक देने लगी. सालों से सरकारी योजनाओं के बारे में बना भरम टूटने लगा. किसी को यकिन ही नहीं हो रहा था कि बेटी, बोझ नहीं, बेटी बरक्कत का सबब है. और आज जब इसमें एक नया पाठ मुख्यमंत्री शिवराजसिंह लिखते हैं कि लाड़ली लक्ष्मी योजना को शिक्षा और रोजगार से जोड़ा जाएगा तो किसी को शक नहीं होता है. बीते सालों के उनके अपने अनुभव सच के करीब होते हैं तो इस नए सबक पर कैसा शक?

2007 से लेकर 2021 तक की इस योजना की पड़ताल करें तो आप बहुत बारीक नहीं, मोटा-मोटा आंकड़ा भी देखें तो चौंक जाएंगे. इस समय लाडली लक्ष्मी योजना में 39 लाख 37 हजार बालिकाएं पंजीकृत हैं. राज्य में बेटियों को साहस और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए लाड़ली लक्ष्मी अधिनियम 2018 प्रभावशील है. लाड़ली लक्ष्मी निधि में 9,150 करोड़ रुपए जमा हैं. इस योजना में कक्षा 6 में प्रवेश पर 2 हजार रूपए, कक्षा 9 में प्रवेश पर 4 हजार रूपए, कक्षा 11 में प्रवेश पर 6 हजार रूपए और कक्षा 12 में प्रवेश पर 6 हजार रूपए की छात्रवृत्ति दी जाती है.  5 लाख 91 हजार 203 स्कूल जाने वाली लाडलियों को 136 करोड़ की छात्रवृत्ति का अब तक वितरण किया जा चुका है. 12वीं की परीक्षा में शामिल होने लाडली और 18 वर्ष की आयु तक विवाह न करने तथा 21 वर्ष पूर्ण होने पर एक लाख रुपये भी उसके भावी जीवन के लिए सरकार की ओर से दिया जाता है.

लाडली लक्ष्मी योजना के बाद जैसे मां-बाप का मन बदलने लगा. प्रदेश में लगातार बाल विवाह का ग्राफ गिरने लगा. बेटियों को बरक्कत मानकर उन्हें पढ़ाने पर जोर दिया जाने लगा. उनके स्वास्थ्य को लेकर भी समाज में जागरूकता आयी. लैंगिक विभेद को लेकर भी लोगों का मन बदलने लगा. मध्यप्रदेश में लैंगिग समानता के लिए एक नया माहौल बनने लगा है. लाडली लक्ष्मी योजना के पहले बेटियों को लेकर जो भाव था, वह निराश कर रहा था. हालांकि इसके पहले भी योजनाएं बनी लेकिन वह बेटियों के आंगन में रोशनी पहुंचा पाती, इसके पहले दम तोड़ दे रही थीं. 

बेटियों को लेकर लगातार चिंता करने वाले मध्यप्रदेश ने देश के अन्य राज्यों के लिए आदर्श बनकर खड़ा हुआ है. अलग अलग नाम के साथ लाडली लक्ष्मी योजना अन्य राज्यों में लागू है. लाडली लक्ष्मी योजना अपने आरंभिक चरण में लोगों के मन में विश्वास उत्पन्न करने में कामयाब रही. अब इसे विस्तार देते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंशा जतायी है कि अब एक कदम आगे बढक़र लाड़ली लक्ष्मी योजना को शिक्षा और रोजगार से जोड़ा जाएगा। लाड़ली लक्ष्मी योजना में पंजीकृत बेटियां सशक्त, समर्थ, सक्षम और आत्म-निर्भर बनकर समाज में योगदान दें, इसके लिए लाड़ली लक्ष्मियों को उच्च शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, रोजगार, स्व-रोजगार आदि के लिए हरसंभव मार्गदर्शन और प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जाएगा. लाड़ली लक्ष्मी योजना में बालिकाओं के आर्थिक सशक्तिकरण, कौशल संवर्धन और उन्हें आत्म-निर्भर बनाने के लिए आवश्यक व्यवस्था की जाएगी।  12वीं कक्षा पास करने के बाद लाड़ली लक्ष्मी की रूचि, दक्षता और क्षमता के अनुसार उच्च शिक्षा या तकनीकी/व्यवसायिक शिक्षा के लिए आवश्यक मार्गदर्शन और प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जाएगा. इसके पहले लाड़ली लक्ष्मी योजना में पंजीकृत सभी बालिकाओं की शिक्षा की निरंतरता के लिए कक्षावार ट्रेकिंग किये जाने की योजना है. लाड़ली के पहली में प्रवेश लेने से लेकर 12वीं कक्षा तक ट्रेकिंग के लिए पोर्टल विकसित किया जाएगा. पंजीकृत बालिकाओं को 12वीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी करने पर आगे की शिक्षा अथवा व्यवसायिक प्रशिक्षण के लिए प्रोत्साहन स्वरूप 20 हजार रूपए की राशि उपलब्ध कराई जाएगी। एक लाख रूपए में से शेष 80 हजार रुपए का भुगतान 21 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर होगा। बालिकाओं के सर्वांगीण विकास के लिए योजना को स्वास्थ्य और पोषण से भी जोड़ा जाएगा। 

मुख्यमंत्री का मानना है कि लाड़ली लक्ष्मी योजना को आर्थिक सहायता वाली योजना से बाहर लाकर बालिकाओं को यह अनुभव कराना होगा कि वे अपने माता-पिता और समाज के लिए विशेष महत्व रखती हैं। उन्हें विश्वास देना होगा कि वे जीवन में नए आयाम और उपलब्धियां प्राप्त कर सकती हैं। समाज में यह धारणा भी स्थापित करना है कि बेटी बोझ नहीं बुढ़ापे का सहारा है। मध्यप्रदेश देश ह्दय प्रदेश है और यह ह्दय बेटियों के लिए धडक़ता है क्योंकि बेटी और जल हमारा कल बनाती ही नहीं, संवारती भी है.

बुधवार, 16 जून 2021

मेरठ से पहले विद्रोह हरियाणा में हुआ- प्रो. पुनिया


महू (इंदौर). भारतीय स्वाधीनता संग्राम में हरियाणा का योगदान अप्रतिम रहा है. 1857 का पहला विद्रोह के लिए मेरठ का उल्लेख मिलता है जबकि मेरठ के पहले अंबाला में प्रथम विद्रोह हुआ था. इस विद्रोह में 50 अंग्रेजों को बंदी बना लिया गया था. यह बात प्रो. महासिंह पुनिया, निदेशक युवा एवं सांस्कृतिक प्रभाग कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय ने कही. प्रो. पुनिया आजादी के अमृत महोत्सव के तीसरे व्याख्यान में ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा के योगदान विषय पर बोल रहे थे.’ यह आयोजन डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, हेरिटेज सोसायटी पटना एवं युवा एवं सांस्कृतिक प्रभाग कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय हरियाणा के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था. प्रो. पुनिया ने कहा कि हरियाणा का गठन 1966 में हुआ है लेकिन भारतीय स्वाधीनता संग्राम के समय रियासतों में बसा हरियाणा का योगदान अमिट और अमूल्य है. उन्होंने 12 बड़ी लड़ाईयों का तथ्याों के साथ विवरण देकर बताया कि किस तरह अंग्रेजों को हरियाणा के लोगों ने परेशान कर दिया था. प्रो. पुनिया ने कहा कि इतिहास को पुन: लिखने की आवश्यकता है जिसका कार्य आरंभ कर दिया गया है. मधुबन में हरियाणा का पहला संग्रहालय बनाया गया है जहां 1857 के समय के दस्तावेज को रखा गया है. चार सौ करोड़ की लागत से शहीद स्मारक का निर्माण किया जा रहा है जहां स्वाधीनता संग्राम के विविध पहलुओं को संजोया जाएगा. कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में भी स्थापित संग्रहालय की जानकारी दी.
प्रो. पुनिया ने बताया कि अंग्रेजों की एक बड़ी परेशानी का कारण था कि हरियाणा हावी हो गया था तो दिल्ली की सत्ता पर खतरा हो सकता है. इसी डर में अंंग्रेजों ने बेरहमी से स्वाधीनता सेनानियों को दबाने की कोशिश की. आम आदमी में डर पैदा हो इसलिए पेड़ों पर, हवेलियों के दरवाजे पर सरेआम फांसी दी जाती थी. उन्होंने रोहणात का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस तरह हम जलियांवाला बाग का स्मरण करते हैं, उसी तरह रोहणात के एक कुएं में स्वाधीनता सेनानियों को मारकर भर दिया गया था. एक अन्य घटना कउल्लेख करते हुए प्रो. पुनिया ने बताया कि सडक़ पर सेनानियोंं को रोडरोलर से कुचल दिया गया. पूरी सडक़ खून से रंग गई थी. आज उस सडक़ को लाल सडक़ के नाम से जानते हैं.  
कार्यक्रम की शुरुआत हेरीटेज सोसाईटी के महानिदेशक डा. अनंताशुतोश द्विवेदी के स्वागत भाषण से हुई. डा द्विवेदी ने  भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन के गुमनाम योद्धाओं के नामों  को बताने तथा  वैसे समस्त जीवित नायकों के बारे  में जानकारी उपलब्ध कराने  का निवेदन देश-दुनिया से देख रहे दर्शकों से किये.
कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो. नीरू मिश्रा ने अमृत महोत्सव एवं विश्वविद्यालय के बारे में विस्तार से जानकारी दी. प्रो. मिश्र ने कहा कि राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन के मार्गदर्शन एवं कुलपति प्रो. आशा शुक्ला के अथक मेहनत से यह सब संभव हो पा रहा है. उन्होंने इस आयोजन के लिए हेरिटेज सोसायटी पटना एवं महानिदेशक श्री द्विवेदी के प्रति आभार व्यक्त किया. कार्यक्रम का संचालन श्री भरत भाटी ने किया. अकादमिक का संयोजन योगिक साइंस विभाग के शिक्षक श्री अजय दुबे ने किया. कार्यक्रम का संयोजन डीन प्रो. डीके वर्मा के मार्गदर्शन में हुआ और रजिस्ट्रार श्री अजय वर्मा एवं तथा  हेरीटेज सोसाईटी के समस्त  पदाधिकारियों एवं  शोधार्थियों  का  योगदान रहा. संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के नेक कंसलटेंट एवं मीडिया प्रमुख डॉ. सुरेन्द्र पाठक तथा मीडिया प्रभारी मनोज कुमार ने संगोष्ठी में उपस्थित रहे.

बुधवार, 9 जून 2021

ग्रामीण, किसान और आदिवासी समाज के उत्सर्ग का उल्लेख जरूरी- डॉ झा

 आजादी का अमृत महोत्सव संगोष्टी  

ग्रामीण, किसान और आदिवासी समाज के उत्सर्ग का उल्लेख जरूरी- डॉ झा
महू (इंदौर)। ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमृत महोत्सव के अवसर पर आजादी के नायकों का और सम्पूर्ण आजादी का स्मरण करना हम सबके लिए गौवर की बात है. हमारी आजादी क इतिहास उस आमजन, ग्रामीण और किसान के उत्सर्ग का स्मरण किए बिना पूरा नहीं हो सकता जिन्होंने देश की आजादी के लिये अपने प्राणों का न्योछावर कर दिया।’ यह बात केन्द्रीय विश्वद्यिालय साउथ बिहार में सेंटर फॉर हिस्टोरिकल एवं आर्कालॉजिकल विभाग के अध्यक्ष डॉ. सुधांशु कुमार झा ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नवीन परिप्रेक्ष्य : ग्रामीण बिहार प्रतिबिंब’ को संबोधित करते हुए कहा. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इतिहास लेखन के लिए हमें गांव की ओर जाना होगा जहां असंख्य अनाम शहीद हैं जिनके बारे में हम जानते भी नहीं हैं. दुनिया भर में भारत का स्वाधीनता आंदोलन अतुलनीय है. उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन अहिंसक था लेकिन अंग्रेजी शासक ने अहिंसा का जवाब हिंसा से दिया.  
डॉ बी आर अम्बेडकर यूर्निवसिटी ऑफ सोशल साइंस एवं हेरीटेज सोसायटी पटना के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित वेबीनार संगोष्ठी में डॉ. झा ने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ऐसी कई घटनाएं हैं जब अंग्रेजों ने निहत्थे अहिंसक आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाकर उन्हें शहीद कर दिया. ग्रामीण भारत की चर्चा करते हुए डॉ. झा ने कहा कि महात्मा गांधी का आंदोलन चम्पारण से शुरू होता है. गांधीजी का सविनय अवज्ञा आंदोलन बिहार से ही आरंभ होता है. उन्होंने इतिहास लेखन की चर्चा करते हुए इस बात की चिंता जाहिर की कि इतिहास लेखन में कई धाराओं ने कार्य किया लेकिन दुर्भाग्य से कुछ लोगों ने कुछेक नेताओं तक ही स्वाधीनता संग्राम को केन्द्रित कर दिया. उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम के लिए लडऩे वाले नेताओं के योगदान को ना तो कम किया जा सकता है और ना ही विस्मृत लेकिन नए भारत में इतिहास लेखन में ग्रामीण समाज के योगदान को रेखांकित किया जाना चाहिए.
डॉ झा ने अपनी चर्चा में स्वाधीनता संग्राम में मध्यप्रदेश के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश शहीद चंद्रशेखर की जन्मस्थली और कार्यस्थली रही है. उन्होंने गुंडादाई, बेया बाई, बिरजू गोंड जैसे शहीदों का उल्लेख करते हुए कहा कि घास काटते निहत्थे लोगों को अंग्रेजी पुलिस ने अपनी गोली का शिकार बना दिया. बैतूल जंगल सत्याग्रह का उल्लेख करते हुए डॉ. झा ने कहा गुंजन सिंह के नेतृत्व में जंगल सत्याग्रह में कौमा गोंड पुलिस गोली का शिकार होकर शहीद हो गए. ऐसे अनेक नाम है जिन्हें तलाश कर स्वाधीनता संग्राम के दस्तावेज का हिस्सा बनाना है. उन्होंने बिहार के मुंगेर का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां भी पुलिस ने निहत्थे 17 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया. जब सवाल उठा तो कहा गया कि चार हजार की भीड़ थाने पर हमला करने आयी थी जबकि सच्चाई यह है कि आज भी उस जगह पर चार हजार लोग इक_ा नहीं हो सकते हैं. उन्होंने अंत में कहा कि ग्रामीण भारत के योगदान को रेखांकित कर अमृत महोत्सव को गौरवशाली बनाया जा सकता है.
कार्यक्रम के आरंभ में अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर आशा शुक्ला ने कहा कि नई पीढ़ी को यह बताना होगा कि आजादी के लिए हमें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. आजादी ऐसे ही नहीं मिल गई है. नई पीढ़ी को हमारे शहीद पुरखों से परिचय कराना होगा और इसके लिए इतिहास लेखन की आवश्यकता है. उन्होंने आश्वस्त किया कि विश्वविद्यालय पुस्तकाकार में विद्वान लेखकों के विचारों का प्रकाशन करेगा. कार्यक्रम में अतिथियों का परिचय एवं आभार प्रदर्शन हेरिटेज सोसायटी, पटना के महानिदेशक अनंतआशुतोष द्विवेदी ने दिया और कार्यक्रम का संचालन ब्राउज के डॉ. अजय दुबे ने किया. विशेष सहयोग प्रोफेसर डीके वर्मा, डीन सोशल साइंस एवं रजिस्ट्रार श्री अजय वर्मा का रहा.

शनिवार, 5 जून 2021

पांच नहीं, मनुष्य अपने समाथ्र्य के अनुरूप अधिकाधिक पेड़ लगाये- शर्मा

 विश्व पर्यावरण दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी 

महू।  ‘पांच पेड़ लगाओ का संकल्प गलत है बल्कि प्रत्येक मनुष्य अपने सामथ्र्य के अनुरूप अधिकाधिक पौधा लगाये. प्रकृति ने मनुष्य को समाथ्र्य दिया है कि वह अपने कार्यों से प्रकृति का ऋण चुकाये.’ यह बात पद्यश्री से सम्मानित श्री महेश शर्मा पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि की आसंदी से बोल रहे थे. संगोष्ठी का विषय ‘प्री एंड पोस्ट कोविड-19 : इम्पेक्ट ऑफ एनवायरमेंटएंड बॉयोडॉयवर्सिटी’. संगोष्ठी का आयोजन डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू, स्कूल ऑफ सोशल साइंस, यूजीसी स्ट्राइड प्रोजेक्ट, नेशन एकेडमी ऑफ साइंस चेप्टर, भोपाल एवं सोसायटी ऑफ लाइफ साइंसेंस के संयुक्त तत्वावधान में  किया गया था. मुख्य अतिथि श्री शर्मा ने कहा कि जो रचा गया है, वह मनुष्य के पुरुषार्थ का परिणाम है और जो खराब हो रहा है, वह उसके भीतर का लालच है. उन्होंने मनुष्य एवं पशु की खासियत को स्पष्ट करते हुए कहा कि पशु उपभोग के लिए होता है लेकिन मनुष्य परामर्थ के लिए होता है. मनुष्य समस्या पैदा करता है, पशु नहीं.  उन्होंने कहा कि आप कहीं भी पेड़ लगायें, कहीं भी जलसंरक्षण करें, वह पूरे समाज के लिए उपयोगी होता है. उन्होंने आयोजन के लिए धन्यवाद करते हुए कहा कि आज का दिन परम्परा के हस्तांतरण करने का दिन है.    

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति प्रो. अखिलेश पांडे ने कहा सुखमय जीवन के लिए संस्कृति और प्रकृति में संतुलन आवश्यक है. संस्कृति और प्रकृति में असंतुलन से विनाश की स्थिति बनती है. उन्होंने भविष्य के खतरे के प्रति सचेत करते हुए कहा कि पर्यावरण में जो सुधार दिख रहा है, वह स्थायी नहीं है. बल्कि इसे स्थायी करने के लिए हमारी जीवनशैली में परिवर्तन लाना होगा. उन्होंने कोरोना महामारी एवं फंगस डिसीस पर विस्तार से अपनी बात रखी. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर यूसी श्रीवास्तव ने कहा कि कोरोना महामारी नई नहीं है. यह बार बार रूप बदल कर आता है. 1960 में अलग अलग नाम से आया था जिसे आज हम कोविड-19 के नाम से जान रहे हैं. उन्होंने कहा कि कोविड-19 की दूसरी लहर खतरनाक है. उन्होंने कहा कि लॉकडाउन से जो हमें जलवायु सुधार का लाभ दिख रहा है, वह शॉर्टटर्म है लेकिन भविष्य में यह नुकसानदेह होगा. उन्होंने कहा कि रिसर्च लैब बंद है तो रिसर्च वर्क नहीं हो पा रहा है. जमीनी कार्य थम गया है. उन्होंने कहा कि एक संतुलित समाज के लिए संतुलन की जरूरत होती है. उन्होंने पर्यावरण एवं जैव विविधता के संदर्भ में विस्तार से अपनी बात रखी.

    महर्षि दयानंद यूर्निवसिटी, रोहतक हरियाणा की प्राणीशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. विनीता शुक्ला ने कहा कि कोरोना काल में हम उन सब जीव जंतुओं को देख पा रहे हैं जो विलुप्ति के कगार पर थे. उन्होंने कहा कि ये अच्छा संकेत है लेकिन संरक्षण और संवर्धन के लिए कोरोना महामारी की समाप्ति के बाद सुनियोजित प्रयास करना होगा. उन्होंंने प्रेजेन्टशन के माध्यम से बताया. मेपकॉस्ट, भोपाल में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजीव सक्सेना ने धरातल से जुड़ी बातें कही. उनका जोर था सेटेलाइट माध्यमों का उपयोग कर जीवन को सरल बनाना. आर्गेनिक खेती पर जोर देते हुए डॉ. सक्सेना ने बताया कि ओबेदुल्लागंज में मेपकास्ट आर्गेनिक खेती कर रहा है और लोगों को प्रशिक्षण के उपरांत रोजगार भी उपलब्ध करा रहा है. उन्होंने गांवों से पलायन को एक बड़ी समस्या के रूप में चिहिंत करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ लेकर ग्रामीण स्तर पर संभावना बढ़ी है. कस्तूरी मृग का उदाहरण देते हुए डॉ. सक्सेना ने कहा कि मृग की नाभि में ही कस्तूरी होता है लेकिन वह ढूंढता है कि सुगंध कहां  से आ रहा है. समस्या का हल हमारे पास है, बस उसे क्रियान्वयन करने की जरूरत है.
    शासकीय महाविद्यालय सतना के प्रोफेसर शिवकेश प्रताप सिंह ने संगोष्ठी के प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के बाद उत्पन्न स्थिति के चलते लॉकडाउन से जो परिणाम आए हैं. अब कई देशों की मांग है कि वर्ष में एक निश्चित समय के लिए लॉकडाउन लगाया जाए ताकि जलवायु स्वस्थ हो सके. पर्यावरण एवं जैविक संरक्षण कानून की समीक्षा करने, संशोधन करने एवं सख्ती से लागू करने पर बल दिया गया. आत्मनिर्भर भारत की तर्ज पर नगरीय संस्थायें अनुदान देकर सोलर पेनल लगाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करें. उन्होंने वॉटर हार्वेस्टिंग कम्लसरी करने की बात भी बतायी. पौधा लगाकर औपचारिकता पूरी करने के स्थान पर उसके संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाए. घटते वनक्षेत्र को बढ़ाकर क्षतिपूर्ति की जाए. अपने अध्यक्षीय उद्बबोधन में कुलपति डॉ. आशा शुक्ला ने कहा कि हमारी परम्परा में जीव-जंतु एवं पेड़-पौधों से रिश्ता बनाने की पुरानी रीत है. नागपंचमी या तुलसी पूजन इसका एकाध उदाहरण है. उन्होंने कहा कि अग्रिहोत्र एवं वैदिक यज्ञ पर रिसर्च करने का प्रस्ताव है.
    कार्यक्रम के आरंभ में डीन प्रो. डीके वर्मा ने विश्वविद्यालय का परिचय दिया एवं विस्तार से बताया कि वर्ष 2020 से कोरोना के बाद से लगातार अध्ययन किया जा रहा है. उन्होंने कुलपति डॉ. आशा शुक्ला का धन्यवाद करते हुए कहा कि वेबीनार के माध्यम से विश्वविद्यालय में संवाद का सिलसिला जारी रख. प्रो. वर्मा ने बताया कि अब तक 100 संगोष्ठी हो चुकी है और 150 का कार्यक्रम तैयार है. कार्यक्रम का संचालन डॉ. मनमोहनप्रकाश श्रीवास्तव ने किया. संगोष्ठी को कामयाब बनाने में रजिस्ट्रार श्री अजय वर्मा एवं उनकी टीम का सक्रिय सहयोग रहा. 10 जून को नई शिक्षा नीति: कौशल विकास में शिक्षकों की भूमिका पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है.

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...