क्यों बंद हो जाते हैं कॉलम?
राजधानी भोपाल के एक बड़े अखबार ने एकाएक सारे खबरी कॉलम बंद कर दिये जाने से पत्रकारों के साथ पाठकों में भी हैरत है। आखिरी अचानक ऐसा क्यों किया गया? यूं भी अखबारों में साप्ताहिक कॉलम लिखने की आजादी पत्रकारों को मिलती है। संभवत: इस कॉलम लिखवाने के पीछे संपादक का उद्देश्य संभवत: यही होता है कि जो तथ्य खबरों के माध्यम से पाठकों तक नहीं पहुंच पाती हैं, वह कॉलम के माध्यम से पाठकों तक पहुंच जाएं। इससे पत्रकार को भी यह लाभ होता है कि लोग जान जाते हैं कि अमुक विभाग की खबर कौन लिख रहा है। पत्रकार की वि·ासनीयता और प्रतिष्ठा दोनों बढ़ती है। कॉलम छपता रहे यहां तो ठीक हैं लेकिन अचानक बिना किसी सूचना कॉलम बंद कर दिया जाना पाठकों के हित में नहीं है।
रविवार, 11 अक्टूबर 2009
मीडिया
मीडिया
अंजनी भास्कर रायपुर में एनीपत्रकार अंजनी कुमार झा भास्कर रायपुर में समाचार संपादक बनाये गये हैं. टेलीफोन पर स्वयं श्री झा ने इसकी सूचना दी. श्री झा इसके पहले न्यूज एजेंसी हिन्दुस्तान समाचार एवं नवभारत में काम कर चुके हैं. मूलत: बिहार के रहने वाले अंजनी कुछ वर्ष पहले ही मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में सक्रिय हुए. मध्यप्रदेश जनसम्पर्क संचालनालय द्वारा दिया जाने वाला राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप, स्वराज संस्थान संचालनालय का स्वाधीनता फेलोशिप मिल चुका है. मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा उनकी पांडुलिपि के लिये आर्थिक सहायता भी मिली है.
सोमवार, 5 अक्टूबर 2009
कुछ अलग
एक खबर यह भीरिपोर्टरमध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग ने हाल ही में सतना में तुलसी संस्थान के नये भवन का उद्घाटन किया। कार्यक्रम में कांगे्रस के वरिष्ठ नेता अर्जुनसिंह उपस्थित थे। उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित भी किया। कार्यक्रम में वर्तमान भाजपा सरकार की शिक्षामंत्री अर्चना चिटनीस भी उपस्थित थी और स्वाभाविक है कि कांग्रेस और भाजपा के कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इस कार्यक्रम मेें मध्यप्रदेश के संस्कृति सचिव मनोज श्रीवास्तव, संस्कृति संचालक श्रीराम तिवारी और आदिवासी लोककला अकादमी के निदेशक कपिल तिवारी भी उपस्थित थे। इस भवन का निर्माण श्री सिंह के सांसद निधि से मिले चालीस लाख और मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग के पांच लाख को मिलाकर किया गया है। उद्घाटन खबर नहीं है लेकिन खबर यह है कि लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर उठे बवाल के बाद एकाएक हाशिये पर चले गये अर्जुनसिंह पहली दफा किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में दिखे। राजनीतिक हलकों में बात चल पड़ी है कि अर्जुनसिंह बहुत जल्द की प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने वाले हैं। कुछेक चुटकी लेने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं कि भाजपा के शासनकाल में अर्जुनसिंह की वापस सक्रियता के मायने क्या हैं। फिलहाल यदि कुछ ऐसा होता है तो अर्जुनसिंह की इस नयी पारी के साक्षी होंगे संस्कृति सचिव मनोज श्रीवास्तव, संस्कृति संचालक श्रीराम तिवारी और आदिवासी लोककला अकादमी के निदेशक कपिल तिवारी।
शनिवार, 3 अक्टूबर 2009
पत्रकारिता
तो मान ही लिया जाये कि खबर की कीमत तय हो ही गई?
-मनोजकूमारातो अब यह मान ही लिया जाए कि हम पत्रकार बंधु मालदार हो गये हैं। जो कभी निखालिस तनख्वाह पर जीते थे, उनके सोर्स अब बढ़ गये हैं। अब वे खबरों के सेल्समेन बन गये हैं। कुछ उम्दा किस्म के सेल्समेन के पास आमद बहुत हो गई है और यही कारण है कि समाज ने जिनके कंधे पर काले धंधे करने वालों का पर्दाफाश करने की जिम्मेदारी सौंपी थी, आज उन्हें ही समाज के सामने सफाई देने के लिये खड़ा होना पड़ रहा है। पत्रकारों के अलग अलग मंच से यह बात उठ रही है कि पत्रकारों को भी अपनी सम्पत्ति की घोषणा करना चाहिए। मुझे अब तक लगता था कि पत्रकार तो निरीह होता है और इसलिये वह सरकार के सामने बार बार सुविधा बढ़ाने की मांग करता है। रियायत देने की मांग करता है। लेकिन इस बहस के बाद अब मेरी राय बदलने लगी है। अब मुझे लगने लगा है कि जो बात बार बार उठायी जा रही है कि पत्रकारिता से मिशन का लोप हो गया है, वह बेबुनियाद नहीं है। मैं साथियों से बहस करता था कि आजाद भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी और ऐेसी जीवन जीने लायक मांगों के लिये लिखी जाने वाली खबरें मिशन ही तो हैं। कुछ सहमत थे और कुछ असहमत। मैं एकला चलो के अभियान पर चल रहा था लेकिन अब लगता है कि मुझे भीड़ की बातों को समझना होगा। उनसे सहमत होना होगा और अपनी राय बदलनी होगी कि मिशन नहीं कमीशन की बात कीजिये क्योंकि बिना कमीशन के किसी पत्रकार की ताकत नहीं िकवह सम्पत्ति बना सके। एकाध छोटा मोटा मकान और साथ में एकाध छोटी गाड़ी तो आज जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है और वह है तो यह देखना होगा कि पत्रकार की पत्नी और उसके परिवार के कितने लोग और भी नौकरी अथवा किसी अन्य सेवाकार्यों से जुटकर धनोपार्जन कर रहे हैं।भोपाल में पत्रकारों को सरकार से रियायती दरों पर जमीन मिली है। इसके एवज में एकसाथ दो लाख रुपये जमा किया जाना था। बहुत सारे साथियांे ने खुशी-खुशी मांगी गई राशि समय पर जमा कर दी किन्तु बहुत सारे ऐसे साथी भी थे जिनके पास दो लाख जैसी बड़ी रकम थी ही नहीं। अभी इसके बाद दूसरी किश्त में और भी राशि देना है। यहां सवाल यह भी नहीं है कि जमीन किसे मिली और कितनों ने पैसा देेने का साहस दिखाया। सवाल यहां यह है कि सरकार ने रियायती दरों पर जमीन देने का पुण्य काम किया है तो उसे यह भी समझना चाहिए था कि जमीन की कीमत भी छोटी छोटी किश्तों में वसूल किया जाए। शायद यह भी संभव है कि सरकार यह मान बैठी है कि पत्रकारों के पास एकमुश्त दो लाख देने की ताकत है। ऐसे में पत्रकारों के मंच पर सम्पत्ति सार्वजनिक करने की घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए।मेरी अपनी राय भी यह है कि जब पत्रकारों की स्थिति सम्पत्ति की घोषणा करने बन चली है तब उन्हें वेतन आयोग जैसे मांग उठाना बंद कर देना चाहिए। कार्पोरेट जर्नलिज्म में यह सब मांगें बेमानी हो जाती हैं क्योंकि हम तब पत्रकारिता नहीं कर रहे होते हैं बल्कि एक उद्योग के सेल्स प्रमोशन के प्रतिनिधि होते हैं। आज एक बड़े अखबार के संपादक की तनख्वाह सुन कर मुझ जैसे छोटे पत्रकार की नींद उड़ जाती है। जिसने पांच साल पहले संपादक के समकक्ष पद पर लगभग दस हजार की तनख्वाह ले सका, आज वही लोग लाखों में बात कर रहे हैं। यह मेरी अपनी कमी हो सकती है कि मैं पत्रकार बना रहा, सेल्स प्रमोटर नहीं बन पाया। इसका सुख भी है और यह मेरा ही है। इस सिलसिले में मेरे दो लेख का उल्लेख जरूर करना चाहूंगा। पहला यह कि खबर की कीमत तो तय हो जाने दीजिये....इस लेख को लिखते समय मेरे मन में था कि खबर की कोई कीमत नहीं होती है किन्तु आज शायद मैं गलत हूं। इसके बाद दूसरा लेख ये पत्रकारिता है... में मैंने उन मुद्दों को छूने का प्रयास किया था जिसमें बार बार कहा जाता है कि फलां फर्जी पत्रकार पकड़ा गया। पत्रकार फर्जी नहीं हो सकता है बल्कि पत्रकारिता की आड़ में फर्जीवाड़ा चल रहा था। इसी तरह किसी भी मामले में वह भले ही आपसी रंजिश हो लिखा जाता है कि पत्रकार मारा गया...यदि वह खबर लिखतेे हुए किसी हादसे का शिकार हुआ है अथवा कि प्राकृतिक अथवा दुर्घटना में उसका निधन हुआ है तो हजार बार गर्व के साथ पत्रकार की मौत लिखा जाना उचित है किन्तु अब यह सारी बातें मुझे अपने स्तर पर ही बेमानी लग रही हैं। जिस पत्रकार के कंधे पर समाज ने बुराईयों के खिलाफ लड़ने का जिम्मा डाला हो और उन्हीं पत्रकारों को अपनी ईमानदारी साबित करना पड़े तो समझ लेना चाहिए कि खबर की कीमत तय हो गई है और मिशन कमीशन की पत्रकारिता में बदल चुकी है।
शुक्रवार, 25 सितंबर 2009
मीडिया
अभिमनोज नवभारत मुंबई संस्करण के नये स्थानीय संपादक बनेपत्रकार अभिमनोज नवभारत के मुंबई संस्करण के नये स्थानीय संपादक बनाये गये हैं। इसके पहले वे नवभारत जबलपुर में विगत आठ वर्षों से स्थानीय संपादक के रूप में पदस्थ थे। अभिमनोज के नवभारत जबलपुर छोड़ने के बाद जबलपुर में सम्पादकों की जो अदला-बदली का क्रम चल रहा था वह निरंतर बना हुआ है। फिलहाल नवभारत जबलपुर में अभिमनोज के स्थान पर किसी और की नियुक्ति की सूचना नहीं है। मूलतः बिहार के रहने वाले पत्रकार अभिमनोज की मध्यप्रदेश के प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक नईदुनिया से पत्रकारिता की शुरूआत हुई। नईदुनिया के विभाजन के बाद वे इंदौर संस्करण के साथ होकर इंदौर चले गये। कुछ वर्ष व्यतीत करने के बाद रायपुर छत्तीसगढ़ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक से जुड़ गये। एक बार फिर उनकी वापसी इंदौर में हुई और वे नवभारत इंदौर के सम्पादक बनाये गये। नवभारत ने अपने नये संस्करण सतना में उन्हें सम्पादक बनाकर भेजा और इसके बाद वे नवभारत जबलपुर के स्थानीय सम्पादक बनाये गये। लगभग एक पखवाड़ा पूर्व उन्होंने स्वयं होकर नवभारत को अलविदा कह दिया। उनके नवभारत जबलपुर से पृथक हो जाने के बाद नवभारत समूह के नागपुर ग्रुप ने मुंबई संस्करण का स्थानीय सम्पादक नियुक्त किया है।
पंकज पाठक पीपुल्स पत्रकारिता संस्थान के प्राचार्य
पीपुल्स पत्रकारिता संस्थान ने अब तक तीन प्राचार्य बदल दिये हैं और तीसरे पत्रकार पंकज पाठक हैं। आरंभ में पत्रकार विनोद तिवारी को प्राचार्य बनाया गया था। विनोद ने अपने कार्यकाल में संस्थान को एक नयी पहचान दी थी। विनोद के चले जाने के बाद आकाशवाणी से सेवानिवृत्त श्री गोस्वामी को प्राचार्य बनाया गया और पिछले दिनों उन्होंने भी स्वयं को अलग कर लिया। तीसरे प्राचार्य के रूप में पत्रकार पंकज पाठक संस्थान का काम देख रहे हैं। पंकज नईदुनिया के मंजे हुए पत्रकार हैं और लम्बे समय तक नईदुनिया में काम करने के बाद नवभारत भोपाल में सम्पादक रहे।
पीपुल्स पत्रकारिता संस्थान ने अब तक तीन प्राचार्य बदल दिये हैं और तीसरे पत्रकार पंकज पाठक हैं। आरंभ में पत्रकार विनोद तिवारी को प्राचार्य बनाया गया था। विनोद ने अपने कार्यकाल में संस्थान को एक नयी पहचान दी थी। विनोद के चले जाने के बाद आकाशवाणी से सेवानिवृत्त श्री गोस्वामी को प्राचार्य बनाया गया और पिछले दिनों उन्होंने भी स्वयं को अलग कर लिया। तीसरे प्राचार्य के रूप में पत्रकार पंकज पाठक संस्थान का काम देख रहे हैं। पंकज नईदुनिया के मंजे हुए पत्रकार हैं और लम्बे समय तक नईदुनिया में काम करने के बाद नवभारत भोपाल में सम्पादक रहे।
मीडिया
अभिमनोज नवभारत मुंबई संस्करण के नये स्थानीय संपादक बनेपत्रकार अभिमनोज नवभारत के मुंबई संस्करण के नये स्थानीय संपादक बनाये गये हैं। इसके पहले वे नवभारत जबलपुर में विगत आठ वर्षों से स्थानीय संपादक के रूप में पदस्थ थे। अभिमनोज के नवभारत जबलपुर छोड़ने के बाद जबलपुर में सम्पादकों की जो अदला-बदली का क्रम चल रहा था वह निरंतर बना हुआ है। फिलहाल नवभारत जबलपुर में अभिमनोज के स्थान पर किसी और की नियुक्ति की सूचना नहीं है। मूलतः बिहार के रहने वाले पत्रकार अभिमनोज की मध्यप्रदेश के प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक नईदुनिया से पत्रकारिता की शुरूआत हुई। नईदुनिया के विभाजन के बाद वे इंदौर संस्करण के साथ होकर इंदौर चले गये। कुछ वर्ष व्यतीत करने के बाद रायपुर छत्तीसगढ़ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक से जुड़ गये। एक बार फिर उनकी वापसी इंदौर में हुई और वे नवभारत इंदौर के सम्पादक बनाये गये। नवभारत ने अपने नये संस्करण सतना में उन्हें सम्पादक बनाकर भेजा और इसके बाद वे नवभारत जबलपुर के स्थानीय सम्पादक बनाये गये। लगभग एक पखवाड़ा पूर्व उन्होंने स्वयं होकर नवभारत को अलविदा कह दिया। उनके नवभारत जबलपुर से पृथक हो जाने के बाद नवभारत समूह के नागपुर ग्रुप ने मुंबई संस्करण का स्थानीय सम्पादक नियुक्त किया है।
पंकज पाठक पीपुल्स पत्रकारिता संस्थान के प्राचार्य
पीपुल्स पत्रकारिता संस्थान ने अब तक तीन प्राचार्य बदल दिये हैं और तीसरे पत्रकार पंकज पाठक हैं। आरंभ में पत्रकार विनोद तिवारी को प्राचार्य बनाया गया था। विनोद ने अपने कार्यकाल में संस्थान को एक नयी पहचान दी थी। विनोद के चले जाने के बाद आकाशवाणी से सेवानिवृत्त श्री गोस्वामी को प्राचार्य बनाया गया और पिछले दिनों उन्होंने भी स्वयं को अलग कर लिया। तीसरे प्राचार्य के रूप में पत्रकार पंकज पाठक संस्थान का काम देख रहे हैं। पंकज नईदुनिया के मंजे हुए पत्रकार हैं और लम्बे समय तक नईदुनिया में काम करने के बाद नवभारत भोपाल में सम्पादक रहे।
पीपुल्स पत्रकारिता संस्थान ने अब तक तीन प्राचार्य बदल दिये हैं और तीसरे पत्रकार पंकज पाठक हैं। आरंभ में पत्रकार विनोद तिवारी को प्राचार्य बनाया गया था। विनोद ने अपने कार्यकाल में संस्थान को एक नयी पहचान दी थी। विनोद के चले जाने के बाद आकाशवाणी से सेवानिवृत्त श्री गोस्वामी को प्राचार्य बनाया गया और पिछले दिनों उन्होंने भी स्वयं को अलग कर लिया। तीसरे प्राचार्य के रूप में पत्रकार पंकज पाठक संस्थान का काम देख रहे हैं। पंकज नईदुनिया के मंजे हुए पत्रकार हैं और लम्बे समय तक नईदुनिया में काम करने के बाद नवभारत भोपाल में सम्पादक रहे।
मंगलवार, 22 सितंबर 2009
उत्सव
लोकपर्व बस्तर दशहरा
-मनोज कुमार
बस्तर दषहरा हिन्दुस्तान के प्रमुख तीन दषहरा पर्वों में एक है। छह सौ साल पुराना दषहरा पर्व लोकसमाज का आयोजन है। दुनिया में अपनी तरह के इस इकलौते लोकपर्व पूरी दुनियां में विख्यात है। यह व्यक्ति विशेष की जागीरदारी नहीं बल्कि सामूहिक धार्मिक और सामाजिक भावना को अभिव्यक्त करने का माध्यम है। राजतंत्र ने बस्तर दशहरा को पोषित किया और लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक धरोहर की तरह सहेजा जा रहा है। बस्तर दशहरा की भव्यता को देखने और इसका आनंद लेने के लिए दुनिया भर से हजारों की संख्या में सैलानी आते हैं। बस्तर यूं भी पर्यटकों के लिए स्वर्ग रहा है और बस्तर दशहरा इसमें श्रीवृद्धि करता रहा है। समय की मार ने भी इस बहुरंगी आयोजन की चमक खोने नहीं दी। परम्परा और संस्कृति का अद्भुत् मिलन पर्व दशहरा बस्तर की विशिष्ट पहचान है। सैलानियों के लिए बस्तर दशहरा कौतूहल और नवीनता लिए हुए है तो स्थानीय निवासियों के लिए प्रतिष्ठा से कम नहीं। विश्व में ताजमहल अपने अद्भुत कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है तो बस्तर दशहरा का सैकड़ों वर्ष पुराना इतिहास उसके वैभव में चारा चांद लगाता है। पर्यटकों के लिए मनोहारी बस्तर दशहरा अपनी विविधताओं के लिए हमेंशा से आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है वहीं बस्तर की सांस्कृतिक परम्परा इसकी जीवंतता का प्रमाण है। राजतंत्र मंे सन् 1408 में बस्तर दशहरा का श्रीगणेश हुआ था। पर्यटन के नए अवसर के रूप में बस्तर दशहरा को रेखांकित किया गया। लगभग ढाई महीने अर्थात् 75 दिनों तक मनाया जाने वाला बस्तर दशहरा दुनियां में मनाये जाने वाले पर्वों में सबसे लम्बा पर्व है। बस्तर दशहरा विविध किस्म के 12 रस्मों को लेकर मनाया जाता है। हरियाली अमावस्या के दिन बस्तर दशहरा का श्रीगणेश होता है जो दशहरा मनाये जाने के चार-पांच दिनों तक चलता रहता है। बारह रस्म मनाये जाने की प्रथा है उसमें पाठा यात्रा और स्तंभारोपण पहली रस्म है। दो माह पूर्व अमावस के दिन दशहरा रथ के निमित्त जंगल से लकड़ी का लट्ठा लाकर सिंह द्वार के पास रख देते हैं और परम्परानुसार उसकी पूजा की जाती है। पाठा यात्रा के बाद भादो शुक्लल पक्ष तेरस के दिन जगदलपुर स्थित सीरासार में स्तंभारोहण की प्रथा पूरी की जाती हैं। इस रस्म में लकड़ी के दो शुभ स्तंभ पर्व के नाम से स्थाति किया जाता है। बस्तर दशहरा पर्व एकल न होकर सामूहिक भावना का पर्व है सो रथ के लिए लकड़ी लाने के लिए अगरवारा, कचोरपाटी, और रायकेटा परगनों के विभिन्न गांव निश्चित किए गए हैं। इसी तरह झाड़ उमरगांव और बेड़ा उमरगांव के बढ़ई तथा लुहार रथ का निर्माण करते हैं। जबकि रथ खींचने के लिए करंगी, सोनाबाल और केशरपाल के ग्रामीण रस्सी बनाते हैं। बस्तर दशहरे के काछन गाड़ी का दायित्व अंचल के हरिजन कुटुम्ब निभाता आ रहा है। छह सौ वर्षों से अधिक पुराने बस्तर दषहरा को लेकर अनेक किवदंतियां हैं तो कई रोचक तथ्य भी। बस्तर दषहरा दषहरे की तिथि से ढाई माह पहले ही आरंभ हो जाता है। बस्तर दशहरा वास्तव में आज जिस स्वरूप में है, वह अपने आरंभिक काल में नहीं था। चमकोट राजवंशीयकाल के राजा पुरुषोत्तम राज्य के बड़े डोंगर से पैदल चलकर जगन्नाथपुरी जाने के लिए निकले। नियमानुसार भगवान जगन्नाथजी का स्मरण करते हुए दण्डवत करते जाना पड़ता था। इसके लिए भी डगों का क्रम पहले सह तय था। यह एक कष्टप्रद यात्रा थी। लेकिन देवभक्त राजा पुरुषोत्तम ने एकाग्र होकर यात्रा की। भगवान जगन्नाथ राजा की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें रथपति होने का आशीर्वाद दिया। इसी के साथ आरंभ हुआ बस्तर दशहरा में रथ का उपयोग। लगभग छह सौ साल पहले राजा पुरुषोत्तम देव दिया गया। बस्तर दशहरा का अनुपम उपहार छत्तीसगढ़ की पहचान बन गया। बस्तर का दशहरा का सबसे महत्वपूर्ण रस्म काछिल गादी है। काछिन गादी का अर्थ होता है काछिन देवी की गद्दी जो कांटों की होती है। कांटेदार झूले की गद्दी पर आसीन होकर जीवन में कंटकजयी होने का संदेश सांकेतिक हुआ करती है। अश्विनी मास की अमावस्या के दिन काछिन गादी का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। परम्परा के अनुसार प्रतिवर्ष माहरा जाति की एक नाबालिग बालिका पर काछिन देवी आरूढ़ होती है। काछिन देवी आने पर लड़की को एक कांटेदार झूले पर लिटा कर सिरहा उसे झुलाता है। पूजा-अर्चना के बाद दशहरा मनाने की स्वीकृति मिल जाती है और पर्व का शुभारंभ हो जाता है। काछिन देवी बस्तर में मिरगान, चंडार और तिकड़ा अनुसूचित जनजातियों की ईष्टदेवी मानी जाती हैं। इसी क्रम में रैला पूजा होती है। मिरगान जाति के इस पूजन में महिलाएं मिरगानी बोली में लोकगाथा प्रस्तुत करती है। नवरात्र जोग बिठाई की परम्परा बहुत पुरानी है। कभी कोई हल्का ग्रामीण दशहरा पर्व में बाधा न आ पाए, इस कामना के साथ योग साधना में बैठ गया था और तब से यह परम्परा चली आ रही है। जो अन्य रस्में दशहरा पर्व से जुड़ी हैं उामें परिक्रमा फूल रथ की, निशा जात्रा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी, मुरिया दरबार आदि हैं। मुरिया दरबार की विशिष्ठ परम्परा रही है। मुरिया संबोघन सामूहिक होने के कारण ही अश्विनी शुल्क 12 को प्रतिवर्ष आयोजित होने वालंे बस्तर दशहरे के इस अंतिम और महत्वपूर्ण कार्यक्रम को मुरिया दरबार के नाम से जाना जाता है। मुरिया दरबार में शहरी तथा ग्रामीण दोनों वर्गों ंके प्रतिनिधि अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। पुरातन परम्परा के अनुसार इस दरबार में पहले राजा और प्रजा के बीच जरूरी मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान होता हुआ करता था और उसके निराकरण के मार्ग निकाले जाते थे। दरबार में नौकरशाही के मनमानी के विरूद्व शिकायतें दर्ज करायी जाती थी। इन शिकायतांे पर अविलम्ब फैसला कर न्याय दिलाया जाता था। मुरिया दरबार उन दिनों एक तंत्रीय व्यवस्था के अंतर्गत प्रजातांत्रिक व्यवस्था को गरिमा प्रदान किया जाता था। छै साल पुरानी परम्परा का निर्वहन आज भी सतत रूप से हो रहा है। समय के साथ इस व्यवस्था में परिवर्तन हुआ है और राजा के स्थान पर प्रशासनिक अधिकारी बैठते हैं लेकिन एक पुरानी निष्पक्ष न्याय प्रणाली के प्रमाण आज भी समाज के लिए प्रादर्श बना हुआ है। काछिन जात्रा बस्तर दशहरा का एक महत्वपूर्ण रस्म है। दशहरा निर्विघ्न सम्पन्न होने की खुशी में काछिन जात्रा तथा दशहरे में आमंत्रित देव-देवियों के सम्मान में विदा से पूर्व कुटुम्ब जात्रा के शिष्टाचारमूलक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पथरागुड़ा जाने के रास्तें पर एक पुराना काछिन मंडप आज भी स्थापित है वहां पहुंच कर काछिन देवी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किया जाता है। बस्तर का गंगा मुंडा तालाब वर्षेां बाद भी अपनी पुरानी गरिमा के साथ कुटुम जात्रा के आयोजन की प्रतीक्षा में खड़ा रहता है। परम्परागत रूप से पूजा कर पशुओं की बलि दी जाती है। इस विदाई कार्यक्रम को ओहाड़ी संबोधन दिया गया है। परम्परा, संस्कार और संस्कृति का अदभुत मिलन का नाम है बस्तर दशहरा और इस ऐतिहासिक पर्व की शान आज छह सौ साल बाद भी कायम है। इन वर्षोंं में स्थितियां बदलती गईं। कई उतार चढ़ाव बस्तर ने देखे। राजतंत्र से लोकतंत्र के इस सफर में बस्तर दशहरा के उत्साह में कभी कमी नहीं आयी। वास्तव में बस्तर दशहरा आदिम जीवन का महज एक उत्सव नहीं बल्कि संकल्प है और इसे वे प्रण-प्राण से पूरा करते हैं। दरअसल दशहरा मात्र एक उत्सव नहीं बल्कि जनजीवन का वह जीवंत अवसर होता है जहां जिस्म तो कई दिखते हैं लेकिन आत्मा एक होती है और इस मिलन को देखने देश-दुनिया के लोगा इकट्ठे होते हैं, बस्तर दशहरा की निराली शान।
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