मंगलवार, 3 अगस्त 2010

vivad

स्त्री के लिये कानून नहीं, मन साफ करें

-मनोज कुमार

केन्द्र सरकार के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार की खबरें अभी धुंधली भी नहीं हुई थी कि एक और महाशय ने महिलाओं के प्रति अभद्र बयान दे डाला। हालांकि दो दिन बाद उन्होंने अपने बयान के लिये सफाई दी और माफी भी मांग ली। क्या इन महाशय के माफी मांग लेेने से समूची महिला समाज आहत हुई हैं, उनके जख्म पर मरहम लग जाएगा? मुझे तो नहीं लगता कि ऐसा हो पायेगा। इस पूरे मामले से एक बात यह जरूर साफ हो गई है कि स्त्री की स्वाधीनता के लिये हम चाहे जितना कानून बनाये, बंदिशें लगायें, इसके पहले हमारा मन साफ करना होगा। मन के भीतर जो रचा बसा है, वह दूर नहीं हो सका तो कानून केवल कागज में कैद हो कर रह जाएंगे। स्त्री के सम्मान के खिलाफ यह पहली बार नहीं बोला गया है। बार बार और हर बार किसी न किसी बहाने स्त्री को टारगेट पर रखा जाता है। यदि स्त्री चरित्रहीन है तो उसे ऐसा बनाने वाले तो हमारा पुरूष समाज ही है जो अपनी स्वार्थ की पूर्ति के लिये भेड़िये की तरह तरह तरह की साजिश करता रहता है।

राजनीति के मंचों पर पचास फीसदी आरक्षण देने से उनके अधिकारों की रक्षा तो हो जाएगी किन्तु जब स्त्री ही सुरक्षित नहीं रहेगी तो उनकी रक्षा कोैन करेगा। पेट के लिये अनाज की जरूरत होती है न कि अनाज के लिये पेट की जरूरत। कानून स्त्री की रक्षा करने के लिये बनता है और जब स्त्री ही नहीं बचेगी तो कानून किसके काम आएगा। उच्च पदों पर आसीन लोगों को बोलने से पहले अपने आप में मंथन करना होगा कि उनके बोलने का अभिप्राय क्या है और इसका असर पूरे समाज पर क्या होगा। चरित्र और नैतिकता की बातें करने वाले लोग जब अपनी सीमा लांघ जाते हैं तो इस तरह की समस्या उठ खड़ी होती है। यह बात भी तय है कि थोड़ा समय गुजर जाने के बाद लोग भूल जाएंगे किन्तु क्या इतिहास इस बात को विस्मृत कर पाएगा? क्या ऐसे बयान देेने वाले अपने आपको माफ कर पाएंगे? उन्हें तो न बोलने का मलाल है और न माफी मांगने पर शर्म।

इस पूरे संदर्भ में लगभग अनुचित किस्म की ही सही, शिकायत है कि मीडिया में ऐसे लोगों को स्थान नहंीं दिया जाना चाहिए। यह बात सही है कि मीडिया में ऐसे लोगों की करतूतांे को स्थान नहीं दिया गया तो लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि बड़ी बड़ी कुर्सियों पर बैठने वाले महानुभाव अपनी ही जननी अर्थात किसी भी स्त्री के बारे में कितने उम्दा खयाल रखते हैं। इसके बावजूद ऐसे बेहूदे बयान को उसकी हैसियत के अनुरूप् स्थान दिया जाना चाहिए। बल्कि इससे एक कदम आगे यह कि आने वाले दिनों में मीडिया में ऐसे लोगों को ब्लेकलिस्ट कर दिया जाना चाहिए और उनके नाम को, काम को कहीं भी स्थान नहीं दिया जाए। इस बात से किसी को इंकार नहीं होगा कि मीडिया अगर इन्हें स्थान न दे ंतो शायद कोई इन्हें जानें तक नहीं इसलिये ऐसे लोगों के खिलाफ मीडिया का रूख कठोर होना चाहिए।

सोमवार, 2 अगस्त 2010

RTI Aur Hum

आरटीआई का उपयोग और आपकी छवि

-मनोज कुमार

सूचना का अधिकार कानून का यदि आप उपयोग नहीं करते हैं तो समझ लीजिये कि आप इस संसार के सबसे अच्छे लोगों में हैं और इसका उपयोग करते हैं तो आप उन लोगों के बीच खलनायक के तौर पर माने जाएंगे जिनका आपके हस्तक्षेप से कुछ नुकसान होने की आशंका है। पहले तो आपको समझाया जाएगा कि आप भले आदमी हैं। आपकी ऐसी छवि नहीं है और जब आप इन बातों में नहीं आएंगे तो वे कहेंगे आखिर आप भी वैसे ही निकले। लब्बोलुआब यह है सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने वाले किसी भी उस व्यक्ति की जो आमतौर पर किसी विवादों में नहीं पड़ता है। मुझे पता नहीं कि आपने आरटीआई अर्थात सूचना के अधिकार के तहत कोई जानकारी मांगने का कभी कोई प्रयास किया या नहीं और यदि इस कानून का उपयोग आप कर रहे हैं तो आपके अनुभव की भी मुझे कोई जानकारी नहीं। इस मामले में मैं अपना अनुभव जरूर आज आपसे बांटना चाहूंगा।

आरटीआई है क्या, यह तो अब लोगों, खासतौर पर इलिट क्लास को बताने की जरूरत नहीं है। इसका उपयोग कहां और कैसे करना, यह भी उन्हें मालूम है और यह भी कि इसके उपयोग से उनके हितों पर क्या असर पड़ सकता है। कभी इस कानून का सच जानना है तो आप सीधे न सही, उस व्यक्ति के कान में फुसफुसा दीजिये कि आप फलां जानकारी के लिये सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने जा रहे हैं। यकिन मानिये, ऐसा करने से वे आपको रोकेंगे तो बिलकुल भी नहीं लेकिन आपको नेक सलाह दी जाएगी...कहां आप झंझट में पड़ रहे हैं। आपकी छवि ऐसी नहीं है। देख लेते हैं कि रास्ता कहां से निकल सकता है। मुझे एकाधि बार ऐसे अनुभव से गुजरना पड़ा है।

मैं नहीं जानता कि ऐसे सलाह देने वाले मेरे दोस्त हैं या दुश्मन लेकिन उन्होंने मेरे अधिकार का हनन जरूर किया है अथवा कर रहे हैं, यह मेरा मानना है। जब वे कहते हैं कि आपकी छवि ऐसी नहीं है तो मुझे लगता है कि सूचना के अधिकार के तहत मैं जानकारी मांगने गया तो इलिट वर्ग में कुख्यात हो जाऊंगा। जो लोग आरटीआई का उपयोग कर रहे हैं, लगभग हर आदमी को इसी नजर से देखा जाता है। सवाल यह है कि इस कानून के उपयोग से इतना डर क्यों? क्यों कानून के उपयोग से रोका जाता है? क्या इस कानून के तहत मांगी गई जानकारी से पोल खुल जाती है? इन सभी सवालों का जवाब हां में होगा क्योंकि डर इस बात का है कि आपके द्वारा मांगी गयी जानकारी उन तमाम गलत फैसलों और उन निहित स्वार्थों को सामने ले आएगी जो वे छिपाना चाहते हैं। यह भी सच है कि आरटीआई ने जानकारी छिपाने वालों की नींद उड़ा दी है। शायद यही कारण है कि आरटीआई का उपयोग करने वालों को लगभग असामाजिक तत्व मान लिया गया है। मध्यप्रदेश में नहीं किन्तु किसी अन्य राज्य में इस कानून का उपयोग करने वाले किसी एक्टिविस्ट को मौत के घाट उतार दिया गया है। मध्यप्रदेश इस मामले में अभी भीरू है लेकिन ये भीरू कब वीरता का परिचय दे बैंठेंगे, कहा नहीं जा सकता।

सूचना के अधिकार का डर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है क्योंकि इस अधिकार का उपयोग करने पर रोक तो नहीं है किन्तु जानकारी देने का अर्थ छिपी बातों को उजागर करना है। यह उनकी स्वेच्छारिता से नहीं, बल्कि कानून के डंडे के डर से हो रहा है। शायद यही वजह है कि पहले पहल तो हरसंभव कोशिश की जाती है कि किसी भी तरह से इस कानून का उपयोग नहीं किया जाए और किया गया तो उपयोगकर्ता को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहां तक कि उसके साथ बैठने में भी परहेज किया जा रहा है जबकि कल तक उसी के साथ बैठने में यही लोग गर्व का अनुभव करते थे। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने का नागरिक हक संविधान में है और इस बारे में हीला-हवाली करने वालों के खिलाफ दंड का प्रावधान भी है। व्यावहारिक रूप् में देखा जाए तो अधिकांश मामलों में टालने का रवैया अख्तियार किया जाता है। यह भी सच है कि कानून का उपयोग करने वालों को पूरी प्रक्रिया पता नहीं होती है और इसका फायदा संबंधित लोग उठाने से नहीं चूकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सूचना के अधिकार देने में लगभग सभी लोग खुद को बचाना चाह रहे हैं अथवा जानकारी देने से बचने की कोशिश में है। इसका एक पक्ष और भी है जिस पर गौर करना, सोचना और रास्ता निकालने की कोशिश करना चाहिए। नब्बे बल्कि पिचनाबे फीसदी जानकारी छिपायी जा रही है या नहीं दी जा रही है अथवा लेटलतीफ की जा रही है तो यह तंत्र की कमजोरी है किन्तु सूचना के अधिकार के तहत जानकारी चाहने वालों के समक्ष एक बड़ी बाधा उन लोगों से भी है जो निजी हित के लिये इसका उपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं। यह कहना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा है कि कौन सी जानकारी सर्वजनहित के लिये है और कौन सी जानकारी व्यक्तिगत हित अथवा परेशानी खड़ी करने के लिये। ऐसी स्थिति में कई बार आवश्यक होने के बावजूद सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मिल पाना दुष्कर कार्य हो जाता है। सूचना के अधिकार कानून से जुड़े लोगों से बात करने पर यह जानकारी मिलती है उनकी परेशानी का कारण ज्यादतर वे लोग होते हैं जो रंजिशवश जानकारी हासिल करना चाहते हैं। जानकारी उपलब्ध कराना कानूनी दायित्व है किन्तु इस सबमें समय और अर्थ दोनों का बड़ा नुकसान होता है। ये लोग इस बात को मानते हैं कि सही और जनहित से संबंधित जानकारी मांगी जानी चाहिए किन्तु सिर्फ जानकारी के लिये जानकारी मांगने से कई तरह की उलझने पैदा हो रही हैं। पहले से सूचना के तहत जानकारी मांगने वालों की लम्बी लाइन है। जो वास्तव में जनहित में अथवा न्याय पाने की गरज से जानकारी चाहते हैं, उन्हें परेशानी हो रही है। किसी भी विभाग का प्रशासकीय अमला सीमित है और एक जानकारी देने में उस प्रशासकीय अमले का सत्तर फीसद अमला जुट जाता है। मांगी गयी जानकारियों का कहां और किस तरह उपयोग किया जाएगा अथवा किया जा रहा है, इस बारेे में कुछ बातें अस्पष्ट हैं, इस बात का भी खुलासा किया जाना चाहिए।

सूचना के अधिकार के तहत जानकारी नहीं देने के प्रयास में संबंधित लोग नहीं रहते हैं तो कुछ परेशानियां अकारण इस कानून का उपयोग करने वालों से भी हो रही है। हालांकि दूसरा पक्ष शायद बड़ा नहीं है। यदि होता तो बार बार और हर बार सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने की बात से ही अड़चनें पैदा नहीं की जाती। ऊपर जिन पांच फीसदी लोगों का उल्लेख मैंने किया है, वह गैरवाजिब नहीं है किन्तु इन पांच फीसदी लोगों की आड़ लेकर पिचानबे फीसदी लोगों को जानकारी से वंचित किया जा रहा है, यह भी सच है। मुझे लगता है कि इस कानून का उपयोग करने से यदि कोई आपको खलनायक मान कर चलता है तो चले लेकिन आप अपने अधिकार का उपयोग करना नहीं भूलें। इसके लिये यह भी जरूरी है कि आप कानून का अध्ययन कर लें और उन बारीकियों को समझ लें जिससे आपको इस कानून के उपयोग में सुविधा होगी।

jago sathiyo

हम क्यों करें मुफ्त की समाजसेवा

-मनोज कुमार

लगभग एक सप्ताह पहले दिल्ली से आरंभ हो रहे किसी बेवसाइट के संचालक का फोन आया। वे चाहते थे कि मैं उनके लिये लिखूं। साथ ही उनकी मंशा थी कि मेरे ब्लॉग पर लगे आलेख का वे उपयोग करें। पहले पहल तो मुझे उनके आग्रह पर कोई आपत्ति नहीं हुई। मैंने हामी भर दी कि जो आलेख मेरे ब्लाग पर पब्लिश हो चुके हैं, उनका आप उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने ऐसा किया भी। बेवसाइट शुरू होने के पहले तक मुझे पता नहीं था कि वे कितने और कैसे लेख का उपयोग करेंगे अथवा कर रहे हैं। इस बीच मैंने फोन करने वाले सज्जन को मेल से संदेश भेजा कि आप चाहें तो केवल आपके लिये आलेख लिखूंगा किन्तु इसके बदले मानदेय की व्यवस्था जरूर चाहूंगा। मेरे इस मेल का जवाब देना जरूरी नहीं समझा। अलबत्ता दो दिन बाद उनका संदेश मिला जिसमें बेबसाइट के आरंभ होने की सूचना थी। वेबसाइट पर जाकर सर्च किया तो पता चला कि मेरे दो आलेख का उपयोग किया गया है। एक आलेख मेरे नाम के साथ और एक आलेख बिना नाम के दिया गया है।

बेवसाइट के आरंभ होने पर बधाई का संदेश तथा एक नया आलेख बेवसाइट के लिये प्रेषित किया। अपनी शिकायत भी मैंने संदेश में भेजा। इस बार उन महाशय का जवाब आया इस सफाई के साथ कि इस वेबसाइट का संचालन कोई समाजसेवी संस्था करती है और जो लेखकों को भुगतान नहीं करती है। महोदय साथ में लिखते हैं कि वे मुझे अंधेरे में नहीं रखना चाहते हैं इसलिये जानकारी दे रहे हैं और साथ में लेख वापस भेज रहे हैं।

आप सोच रहे होंगे कि इस सब रामकहानी का मतलब क्या? आप ठीक सोच रहे हैं। दरअसल मैं अपने साथ हुए इस वाकये के माध्यम से यह बताना चाहता हूं कि बेवसाइट बनाने के लिये, संचालन के लिये तो सबके पास धन है किन्तु लेखकों को देने के लिये उनके पास कौड़ी नहीं है। यह ठीक है कि वे समाजसेवा करें किन्तु हम पत्रकार/लेखकों से मुफ्त की सेवा की उम्मीद क्यों रखते हैं। हमारा जीवन तो लेखन से ही चलता है और हम मुफ्त के चंदन घिसते रहे तो हमारी हालत समझी जा सकती है। बेवसाइट समाजसेवा के लिये है तो विज्ञापन क्यों लिया जा रहा है, उससे होने वाली कमायी आखिर किसके जेब में जा रही है। मैं अपने उन तमाम ब्लॉगर लेखक/पत्रकार साथियों से आग्रह करता हूं कि जो लोग समाजसेवा का दंभ भर रहे हैं, उनके लिये एक लाइन न लिखें। हम मीडिया के लोग हैं और मीडिया के लिये बिना शर्त लिख रहे हैं और लिखते रहेंगे। जिन्हें समाजसेवा का शौक है, वे हमसे कोई उम्मीद न करें।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

media

मेरे अपने लोग
मनोज कुमार
तीस बरस एक लम्बा समय होता है। अनुभव की एक बड़ी लायब्रेरी होती है। एक ट्रेनी जर्नलिस्ट से संपादक बन जाने के सफर में अनेक नाम और अनाम लोगों का साथ मिला जो मुझे यहां तक पहुंचाने में मददगार रहे। इन सालों में मैंने हर डेस्क पर काम किया। पत्रकारिता के दिग्गजों में अनेक नाम हैं लेकिन इससे इतर उनकी तादात भी कम नहीं है जो संपादकीय विभाग के साथी तो नहीं थे लेकिन उनसे भी कमतर नहीं। इन सबको याद करते हुए मैं अपने पुराने दिनों में लौट जाना चाहता हूं।
बहरहाल, इस बारे में बातंे तफसील से करता हूं। गुुजरे दो दशक में पत्रकारिता का चेहरा बदल गया है। टेक्नॉलाजी ने विस्तार पा लिया है। अब हेंड कम्पोजिंग का जमाना गया। फोरमेन भी नहीं रहे जो आपके हाथों के लिखे पन्नों को देखकर बता दें कि कितने कॉलम की खबर होगी। जब हेंड कम्पोजिंग अथवा नये दौर में प्रवेश करते फोटो कम्पोजिंग की बात करें तो कुछ यादें साथ चलती हैं। पत्रकारिता के मेरे आरंभिक दिनों में लीलू भइया नाम के फोरमेन देशबन्धु में हुआ करते थे। उन्हें गुस्सा शायद आता ही नहीं था। वे कई दिग्गजों के साथ काम कर चुके थे। मेरे और मेरे साथ उस दौर में काम कर रहे साथियों के लिये वे उतना ही मायने रखते थे जितने कि हमारे वरिष्ठ पत्रकार। लीलू भइया पत्रकार नहीं थे, खबर भी लिखना नहीं जानते थे लेकिन उनकी समझ किसी भी दिग्गज पत्रकार से कम नहीं थी। वे सबकुछ जानते और समझते थे। किस खबर का क्या अर्थ है और वह ऐसे क्यों लिखी गयी है। जानने समझने के बाद भी वे कभी रिएक्ट नहीं करते थे। ऐसे लीलू भइया से सीखने के अनेक अवसर मिले। सम्मान देना तो कोई उनसे सीखे। उस समय मेरी उम्र कोई सत्रह बरस के आसपास होगी लेकिन कभी आप से नीचे का संबोधन नहीं दिया। गलतियां देखते तो आहिस्ता से बता देते। इस बात का कभी अहसास ही नहीं होने दिया कि वे अपरोक्ष रूप् से हमारे गुरू हैं। सच तो यह है कि पत्रकारिता का एक बड़ा पाठ सीखने का अवसर उनसे मिला। देशबन्धु के सम्पादक एवं स्वामी ललित सुरजन भी हमेशा उन्हें लीलू भइया कह कर ही पुकारते।

लीलू भइया के साथ द्वारिका भइया भी थे। दुलीचंद को भी नहीं भूल सकता। बुधारू नाईट शिफ्ट के प्रभारी थे। बुधारू शहर से दूर गांव से आते ओर हमेशा हड़बड़ी में रहते। हम जूनियर भी बुधारू से मजाक करते रहते। वह भी कभी बुरा नहीं मानते। हेमलाल भइया फोटो कम्पोजिंग के इंचार्ज थे। उन्होंने भी खूब सिखाया। मंडलवार और रामसिंह कम्पोजिंग डिपार्टमेंट के लोग थे और उनका साथ मेरे लिये खास मायने रखता है। शिव भी इन्हीं साथियों में एक थे किन्तु उनकी रूचि पढ़ने में थी और वे कम्पोजिंग विभाग से उबर कर किसी दूसरी नौकरी में चले गये। ये सारे लोग पत्रकारिता में मेरे आरंभिक दिनों के गुरुवर साथी थे।

कालूराम और जागेश्वर नाम के दो साथी और थे। उनका पद तो चपरासी का था लेकिन थे बहुत प्यारे। जागेश्वर को हमेशा आर्थिक तंगी रहती थी सो उसने एक नायाब ढंग निकाल लिया था। छह-आठ महीने के अंतराल में पत्नी की डिलवरी का आवेदन देता और अग्रिम पा लेता। कार्मिक विभाग को पहले पहल तो ध्यान नहीं गया लेकिन आखिर जागेश्वर बचता कहां तक? एक दिन पकड़ा गया। कार्मिेक अधिकारी विवेक भइया ने पूछ ही लिया क्यों भई तुम्हारे यहां हर छह माह में डिलवरी होती है क्या? कालूराम भी कुछ कम नहीं थे। हमारे साथ एक महिला पत्रकार का आगमन हुआ। वे उस दौर की शायद पहली आधुनिक पत्रकार थीं। नाम लेना उचित नहीं लगता इसलिये नाम नहीं दे रहा हूं। मिनी स्कर्ट और टी शर्ट में आना। कालूराम जब तब कभी कैंची तो कभी टेप लेकर उनकी सेवा में हाजिर। एक दिन मैंने टोक ही दिया क्यों भई कालू, उन्हीं को पूछोगे या हमें भी तो वह बड़े भोलेपन से कहता है-नई भइया, अइसे कोनो बात नहीं हावय, भगवान के दे ले मोरो घर एक झन डउकी हावय। टीवी पर पापड़ पोल देखते हुए सहसा कालूराम की याद आ जाती है।

देशबन्धु में काम करते हुए कभी लगा ही नहीं कि हम लोग किसी संस्था में काम कर रहे हैं। वेतन का तो पता नहीं होता था लेकिन किसी के परिवार में सुख हो या दुख, सारे लोग एकसाथ खड़े हो जाते थे। मैं भले ही संपादकीय विभाग का सदस्य था लेकिन कान खींचने का हक प्रसार और अकाउंट या अन्य किसी भी विभाग के वरिष्ठ सदस्य को था। दरअसल यह स्नेह ही देशबन्धु की ताकत थी। 1994 में मेरा देशबन्धु से नाता टूट गया और इन सालों में बहुत कुछ बदल गया। इन सबके बावजूद मुझे लगता है कि बुनियाद शायद आज भी मजबूत है। बहरहाल, ये लोग आज के दौर में भले ही असामयिक हो गये हों, गुमनाम हो गये हों किन्तु मैं और मेेरे जैसे अनेक लड़कों को पत्रकार बनाने में उनकी भूमिका अविस्मरणीय रहेगी। मैं इनमें से किसी को भी नहीं भूल सकता।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

sarokar

बंदूक का जवाब कलम से

-राजेन्द्र

छत्तीसगढ़ में बंदूक का जवाब कलम से देने के प्रयास में सरकार जुटी हुई है। जो बच्चे नक्सली इलाकों में शिक्षा से दूर होते जा रहे थे, उनके लिये सरकार ने विशेष प्रयास आरंभ कर उन्हें वापस स्कूल भेजने का इंतजाम किया है। शांति के लिये प्रतिबद्ध वनपुत्रों ने भी सरकार के साथ इस मुहिम में साथ देने के लिये निश्चय किया और निकल पड़े सरकार के साथ। देखते ही देखते स्थितियां बदलने लगी। स्कूलों से दूर होते बच्चों के हाथों में किताब-कलम थी और चेहरे पर कामयाबी की मुस्कान। बोर्ड परीक्षा में इन बच्चों ने कमाल कर दिखाया। प्रथम श्रेणी में आने वाले इन उस्तादों ने प्राप्तांक को इतना छू लिया कि यह हर किसी के लिये अचंभा था। कामयाबी इसलिये महत्वपूर्ण् है कि ये बच्चे उन लोगों में शामिल नहीं हैं जिन्हें हर किस्म की सुविधाएं मिल रही हैं, ये वो बच्चे हैं जिनके पांव के आसपास हमेशा डर की डोरी बंधी रहती है। डर को कलम से मात देकर उन्होंने एक नया सबक समाज को सिखाया है। नक्सली हिंसा में अपने माता-पिता को खोने वाले इन अनाथ बच्चों के साहस की जितनी सराहना की जाए, उतनी कम है।

बस्तर के अंदरूनी इलाकों में इस क्षेत्र-विशेष के नक्सलियों ने इन बच्चों के कंधों से बस्ता उतारकर, बंदूकें टाँगना अपना मकसद माना, ऐसी बेजा पहल से भी स्वयं को बचाते हुए, इन होनहार बच्चों ने अपना मुकाम पा ही लिया। गोलियों और धमाकों के बीच लाशों को अपनी आँखों से देखने वाले इन वनपुत्रों ने अपनी मशक्कत के बूते लक्ष्य पाकर एक उत्तम आदर्श स्थापित किया है। हिंसक वातावरण में भी अपने मंसूबों को पा लेने वाले लगभग सवा तीन सौ बच्चों को राज्य के आदिम जाति कल्याण विभाग ने एक विशेष अभियान के तहत तराशा है। सबसे अहम बात यह रही है कि इनमें से अधिकांश बच्चों ने ऐसे स्कूलों में शिक्षा हासिल की है, जिनमें विषयों के शिक्षक तक नहीं थे। इन आदिवासी छात्रों ने दसवीं बोर्ड में ७० से ९५ फीसदी अंक हासिल कर नायाब मिसाल पेश की है। इन होनहार छात्रों ने विपरीत माहौल में अपने जज्बे को कायम रखते हुए, संसाधनहीन शैक्षणिक दायरे में भी अपनी लगन के बूते बुलंदियों के मुकाम पर पहुँचने में कामयाबी पाई है।

राज्य के नक्सल प्रभावित इलाकों में सरकार ने "प्रयास" नामक बाल शिक्षा योजना बनाकर जंगल की इन प्रतिभाओं को राजधानी के स्कलू आश्रम में स्थान दिया। यहां इनके रहने, पढ़ने, खाने एवं चिकित्सा जैसी सुविधाएँ देकर इन्हें शिक्षित करने का मुकम्मल इंतजाम किया गया। इस आश्रम स्कूल में आने वाले बच्चों ने सरकार को उम्मीद से ज्यादा का परिणाम दिया। प्रयास से यह उम्मीद थी कि वे सदमे से उबरकर आम जीवन जीना शुरू कर दें। शिक्षा तो इनके जीवन में बदलाव का मात्र माध्यम था किन्तु अब चौंकने की बारी सरकार की थी जहां इन बच्चों ने पच्चहतर फीसदी से ज्यादा अंक पाकर जता दिया कि वे किसी से कम नहीं।

बच्चों की इस कामयाबी ने सरकार को उत्साहित किया है। आदिम जाति कल्याण विभाग होनहार विद्यार्थियों के व्यक्तित्व, खेलकूद, मानसिक एवं शारीरिक विकास तथा योग संबंधी शिक्षा के जरिए इन्हें संवारने की पहल की है। जो विद्यार्थी कक्षा बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं, उनके आगे की शिक्षा का इंतजाम सरकार कर रही है औ इसी कड़ी में इंजीनियरिंग तथा मेडिकल जैसे लक्ष्य से जोड़ने की खातिर कोचिंग क्लासेस की प्रभावी शिक्षा देने का प्रयास भी किया गया है। आने वाले समय में वनपुत्रों के ये लाडले राज्य की पहचान बनेंगे।
राज्य के नक्सलियों के मंसूबे पर पानी फेरते ये बच्चे इस बात का सबूत हैं कि जीने का मतलब दूसरों को डराना नहीं, अराजकता फैलाना नहीं, विकास में बाधक बनना नहीं बल्कि जीवन में प्रेम और उत्साह भरना है, अराजकता की जगह सकरात्मकता को स्थान देना है, विकास में बाधक बनने की जगह विकास को आगे ले जाना है और इन सब को करने के लिये एकमात्र उपाय है लोगों का शिक्षित होना। शिक्षा ही विकास का रास्ता बनाती है और जंगलों में डरने-दुबकने के बजाज शिक्षा के रास्ते साहस और प्रतिभा का परिचय दिया है। बच्चों की इस कामयाबी ने एक बार साबित कर दिया है कि कितनी भी मुश्किलें क्यों न हो, रास्ता कभी बंद नहीं होता है। आइए, इस रास्ते पर चलकर डर का जवाब कलम से दें।

रविवार, 25 जुलाई 2010

media

पत्रकारिता से पवित्र पेशा और कोई नहीं
मनोज कुमार
इन दिनों पत्रकारिता को लेकर काफी बहस हो रही है। बहस यदि पत्रकारिता के कार्य और व्यवहार की आलोचना को लेकर होती तो ठीक है बल्कि उसकी सीमा को लेकर हो रही है। वे लोग पत्रकारिता की सीमारेखा की बातंे कर रहे हैं जिन्होंने हर हमेशा अपनी सीमाएं लांघी हैं। इन दिनों पत्रकारिता की आलोचना शब्दों से नहीं, बल्कि उन पर हमला कर हो रही है जिसकी किसी भी स्थिति में निंदा होनी चाहिए। मेरा अपना मानना है कि पत्रकारिता संसार का सबसे पवित्र पेशा है और वह हमेशा से अपनी जवाबदारी निभाता आया है। मुझे व्यक्तिगत रूप् से दुख है कि हमारे लोग ही एक आवाज में अपने बारे में बात नहीं कर पा रहे हैं। ग्वालियर से साथी पंकज की बातों से मैं सहमत हूं। पंकज के लिखे के बहाने एक टिप्पणी में मैं कुछ अनुभवों को सुनाना चाहूंगा कि जो लोग अखबारों से शीर्ष पर पहुंच गये और आज उसी के बूते शीर्ष पर खड़े हैं किन्तु लगभग नफरत की दृष्टि भी बनाये हुए हैं। करेगा। पंकज बहुत सुंदर लिखा है। बधाई।

मैं अपनी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों से इसे संसार का सबसे पवित्र पेशा मानकर चला हूं। पत्रकारिता की आलोचना आज और अभी नहीं हो रही है बल्कि यह पुरानी परम्परा है। साहित्य और आलोचना का जिस तरह का साथ है लगभग पत्रकारिता में भी वही परम्परा है किन्तु इन दिनों आलोचना के नाम पर हमले हो रहे हैं। शाब्दिक और शारीरिक। संभवतः पत्रकारिता ही एकमात्र ऐसा प्रोफेशन है जिसकी आलोचना करने की आजादी सर्वाधिक है। पत्रकारिता इन आलोचना को आत्मसात करता है। मीमांसा करता है और अपने आपको सुधरने का मौका देता है। अपनी गलती मानने में भी पत्रकारिता ने कभी गुरेज नहीं किया तो समाज के कोढ़ को सामने लाने में भी वह सबसे आगे रहा। शायद यही कारण है कि समाज हर पेशे की गलती को व्यवसायिक होने का लिबास पहना कर मुक्त कर देता है किन्तु पत्रकारिता को वह नहीं बख्शता है बल्कि वह गहरे से अपने विरोध दर्ज कराता है। समाज से यहां आशय उस आम आदमी से है जिसकी आशा और निराशा अखबारों से जुड़ी होती है। उसके लिये न्याय का मंच, बहरे कानों तक बात पहुंचाने का माध्यम अखबार ही हैं। ऐेसे में वह चाहता है कि पत्रकारिता और मजबूत हो।

रही बात फिल्म लम्हा में ऐश्वर्या के नाम का इस्तेमाल करने और अमिताभ के नााराज होने की तो यह उनका व्यवसायिक मामला है और इससे फिल्म को लोकप्रियता मिलती है और अमिताभ इतने नासमझ नहीं हैं िकवे ऐसे डायलाग पर ऐतराज करें वह भी तब जब ऐश्वर्या के बहाने मीडिया पर वार किया जा रहा है। एक तीर से दो निशाने लगा है एक तरफ ऐश्वर्या की लोकप्रियता दिखायी गयी है तो दूसरी तरफ मीडिया को ऐश्वर्या के करीब लाकर खड़ा कर दिया गया है। यह एक सुनियोजित ढंंग से मीडिया को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश है। मुझे तो इस बात की खुशी है कि अनुपम खेर जैसा सकरात्मक सोच का अभिनेता ऐसे छोटे डायलाग से अमिताभ से डर रहा है। साथी पंकज क ेलेख के प्रतिक्रियास्वरूप् किसी सज्जन ने रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण दिया है। यह ठीक उदाहरण है और मेरी समझाइश है कि अनुपम खेर रामकृष्ण परमहंस के उदाहरण से कुछ सीख लें, फिर फिल्मों के जरिये आम आदमी को सिखाने और समझाने की कोशिश करें क्योंकि एक डरा हुआ व्यक्ति आम आदमी के डर को भला कैसे और किस तरह दूर करेंगे।

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जननी हमें माफ कर देना

मनोज कुमार

भारतीय संस्कृति में स्त्री की तुलना आदिकाल से देवीस्वरूपा के रूप् में की जाती रही है किन्तु सुप्रीमकोर्ट की फटकार के बाद केन्द्र सरकार का एक नया चेहरा सामने आया है जिसमें उनका रवैया स्त्री के प्रति नकरात्मक ही नहीं, अपमानजनक है। यहां मैं उन शब्दों का उपयोग करने से परहेज करता हूं जो श्रेणी स्त्री के लिये केन्द्र सरकार ने तय की है। यह इसलिये नहीं कि इससे किसी का बचाव होता है बल्कि मैं यह मानकर चलता हूं कि बार बार इन स्तरहीन शब्दों के उपयोग से स्त्री की प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचाने में मैं भी कहीं न कहीं शामिल हो जाऊंगा और मैं इस पाप से स्वयं को मुक्त रखना चाहता हूं। केन्द्र सरकार के इस रवैये से केवल स्त्री जाति की ही नहीं बल्कि समूचे भारतीय समाज का अपमान हुआ है।
एक स्त्री मां होती है, बहन होती है, भाभी होती है, मांसी होती है और उसके रिश्ते नाना प्रकार के होते हैं जिसमें वह गंुथकर एक परिवार को आकार देती है। स्त्री गृहणी है तो उसका दायित्व और बढ़ जाता है। उसे पूरे परिवार को सम्हाल कर रखने की जवाबदारी होती है। कहना न होगा कि हर स्त्री यह जवाबदारी दबाव में नहीं बल्कि स्वयं के मन से लेती हैं। स्त्री को परिवार की प्रथम पाठशाला कहा गया है। आप और हम जब कल बच्चे थे तो मां रूपी स्त्री ने हमारे भीतर संस्कार डाले, जीवन का पाठ पढ़ाया, नैतिक और अनैतिक की समझ पैदा की और आज उसी स्त्री को हम ऐसे शब्द दे रहे हैं। मां रूपी इसी स्त्री ने हमें धन कमाने के गुण दिये, साहस दिया और वह समझ जिसमें किसी का नुकसान न हो और वही स्त्री आज हमारे लिये दया की पात्र बन गयी है, यह बात शायद किसी के समझ में न आये।
एक स्त्री जो रिश्ते में हमारी बहन होती है और हम भाई होने के नाते उसकी अस्मत की रक्षा की जवाबदारी लेते हैं। हर रक्षाबंधन पर वह हमारी कलाई पर राखी बांध कर हमारे उत्तरदायित्व का बोध कराती है, आज उसी स्त्री के लिये हमारे मन में यह कलुषित विचार कैसे आ सकते हैं। जिसकी जवाबदारी हमने ले रखी है, उससे हम कैसे फिर सकते हैं। मुझे लगता है िकइस बार रक्षाबंधन में हर बहन की आंखों में सवाल होगा कि क्या अब भी तुम मेरी रक्षा का वचन देते हो? हर भाई कहेगा हां लेकिन उसका मन आत्मग्लानि से भरा होगा।
एक स्त्री जिसे हम भाभी का संबोधन देते हैं, मां की अनुपस्थिति में वह मां की भूमिका में रहती है। क्या इन्हें हम ऐसा कुछ कहेंगे जिससे उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचे? क्या उस स्त्री को हम ऐसा कुछ कह पाएंगे जिसे हम मांसी कहते हैं अर्थात मां जैसी को? क्या हम उन सारे रिश्तों को कभी ऐसा कहने की सोच भी सकते हैं जिनके कहने पर हम हमारी नजरों में छोटा हो जाते हैं।
आखिर में। क्या हम उस स्त्री को कुछ ऐसा अप्रतिष्ठाजनक कह पाएंगे जिसे हमारी संस्कृति, हमारे वेद अर्धाग्नि कहते हैं। अर्धाग्नि का अर्थ पुरूष का आधा हिस्सा। सात फेरों में हम समाज के सामने वचन देते हैं कि एक-दूसरे के सुख और दुख में सहभागी होंगे, क्या उन्हें हम ऐसे हिकारत भरे शब्दों से नवाज सकते हैं? नहीं, कभी नहीं। सुप्रीमकोर्ट ने फटकार लगाकर स्त्री के आत्मसम्मान और उसकी अस्मिता को सम्मान देते हुए जो भूमिका अदा की है, उससे अदालत के प्रति समाज के मन में सम्मान का भाव बढ़ा है। हम उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी कोर्ट इसी तरह चिंता कर गलत कामों को निरूत्साहित करता रहेगा। फिलहाल, जो स्थितियां हैं, उसमें मैं और हम जननी से उनकी प्रतिष्ठा पर आयी आंच के लिये माफी मांगते हैं।

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