शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

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प्रताड़ना के औजार
मनोज कुमार

स्त्री को प्रताड़ित करने के लिये समाज ने कई तरह के औजार एकत्र कर लिये हैं। उसके जन्म से मृत्यु तक ऐसे अनेक औजार हैं जिन्हें वह समय समय पर रूप बदल बदल कर उपयोग में लाता रहा है। भ्रूण हत्या एक औजार है तो बाल विवाह दूसरा औजार और इससे भी बात न बने तो चरित्रहीन, डायन कहकर स्त्री को मरने के लिये छोड़ दिया जाए। विधवा स्त्री के जीवन का सच और उसके लिये प्रताड़ना का औजार तो पहले से तैयार है। किसी समय, कहीं कहीं आज भी सती नाम से एक औजार उपयोग में आ रहा है। प्रताड़ना के औजार के खिलाफ कागज पर कानून बनते रहे हैं किन्तु सच में औजार अपना काम निर्बाध रूप से कर रहा हैं। लगभग पांच बरस हो गए छत्तीसगढ़ की सरकार ने स्त्री प्रताड़ना के उस औजार को भोथरा करने के लिये टोनही निरोधक कानून बनाया था लेकिन आज भी स्त्री टोनही के नाम पर सार्वजनिक प्रताड़ना का षिकार हो रही हैंं। कहीं कहीं तो नौबत जान देने की आ जाती है। अब राजस्थान सरकार ने इसी औजार को भोथरा करने के लिये डायन कहने, प्रताड़ित करने या ऐसा कुछ करने के लिये कठोर कानून बनाने जा रही है। हम तो उम्मीद कर सकते हैं कि स्त्री प्रताड़ना का यह औजार भोथरा हो जाए किन्तु सच और कागज में एक फर्क होता है बिलकुल वैसे ही जैसा कि बाल विवाह रोकने के लिये षारदा एक्ट अस्तित्व में है किन्तु मानने वाले अदृष्य हैं। हर वर्ष बाल विवाह के नाम पर हजारों बच्चियां बेड़ियों में बांध दी जाती हैं।
भ्रूण हत्या पहले एक रिवाज रहा होगा किन्तु अब यह फैषन में आ गया है। सरकार भू्रण हत्या रोकने के लिये अथक प्रयास कर ले किन्तु बाजार ऐसा नहीं होने देगा। हर साल आंकड़ें आएंगे जिनमें बेटियां गुमनाम होती जाएंगी। सरकार ने लिंग परीक्षण पर रोक लगा दिया है तो बाजार ने एक छोटा सा हथियार ईजाद कर दिया है जिसके जरिये युवती यह जान लेगी कि वह गर्भवती है कि नहीं। लिंग परीक्षण की नौबत ही नहीं आने दी जाएगी। इस तरह सरकार का कानून भी नहीं टूट रहा है और भ्रूण हत्या भी जारी है। इस साजिष के खिलाफ सरकार कब आएगी? स्त्री प्रताड़ना का यह नया औजार फैषनपरस्त समाज को भा रहा है। नैतिकता की बातें आले में रख दी गई हैं। उसे कई झंझटों से मुक्ति और मुक्त जीवन का अहसास हो रहा है। स्त्री प्रताड़ना के इस नये औजार के बारे में सरकार फिर कभी कोई कानून बनाएगी, इसके पहले हमें ही जागना होगा। नहीं जागे तो बेटियों की गुम होती हंसी हमारी नींद ले उड़ेगी। समय रहते चेत जाने में ही हमारी भलाई है।
मैं इस बात को लेकर हैरान भी हूं और परेषान भी कि आखिर स्त्री प्रताड़ना के औजार बनाने वाले कितने षातिर दिमाग के हैं। उनकी षैतानी दिमाग में कभी यह सवाल नहीं उपजा कि बेटियां कम हो जाएंगी तो उन्हें राखी बांधने वाला कौन होगा? यह सवाल भी बाद का है पहले तो लोरी सुनाने वाली अम्मां ही नहीं रहेगी तो लोरी सुनने वाला कहां से आएगा? भीड़ में गुम होते ये सवाल आज हमारे सामने यक्ष प्रष्न बन कर खड़ा है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं कि समाज में पुरूष को कब टोनही या डायन कह कर बुलाया जाएगा या फिर कब उसे सता होने का गौरव प्राप्त होगा। अभी तो सवाल यही है  िकइस बार अक्षय तृतीया पर कितने मासूमों को ब्याह की बेड़ियों में जकड़ा जाएगा।

रविवार, 24 अप्रैल 2011

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भ्रष्टाचार की जड और उसका इलाज
-मनोज कुमार

अभी एक दो दिन में खबर पढ़ रहा था कि जायज काम के लिये रिष्वत देना गलत नहीं है। अन्ना साहेब के अभियान को इस खबर से ठेस पहुंची होगी। यह स्वाभाविक भी है किन्तु सवाल यह है कि भ्रष्टाचार की जड़ में क्या है? क्यों भ्रष्टाचार का हम इलाज नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं? भ्रष्टाचारियों को मारना या उन पर नियंत्रण पाना उतना मुष्किल नहीं है जितना कि भ्रष्टाचार के कारणों को ढूंढ़ना। हमारे देष में लाखों की संख्या में मौत इसलिये नहीं होती है कि उन्हें इलाज नहीं मिल पाया बल्कि मौतों का कारण उसकी बीमारी का समय रहते पता नहीं लग पाना होता है। अन्ना साहेब को और हमसब को इस दिषा में प्रयास करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार की जड़ को ढूंढ़ने का समवेत प्रयास करें।
मध्यप्रदेष में भ्रष्टाचार की जड़ को पहचााने की कोषिष की गई है और फकत सात महीनों में इसकेे परिणाम देखने को भी मिल रहे हैं। राज्य सरकार ने सात महीने पहले लोक सेवा गारंटी अधिनियम बनाया। यह अधिनियम लोकलुभावनी नहीं है और न ही यह अधिनियम सरकार को सत्ता में बने रहने की गारंटी देता है बल्कि यह आम आदमी के लिये राहत का कानून है। अधिनियम में षासन स्तर पर हर काम के लिये समय सीमा दी गई है। इस तयषुदा समयसीमा में काम नहीं करने वाले सेवकों को दंड भुगतना होगा। सात महीने बाद समीक्षा में जो आंकड़ें आये हैं, उन पर भले ही यकिन न किया जाए किन्तु इस बात पर यकिन किया जा सकता है कि लोगों को अधिनियम से राहत तो मिली है। आंकड़ें भरमाने और रिझाने के लिये होते हैं, खासकर तब जब वह सरकारी हों।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि लोकसेवा गारंटी अधिनियम और भ्रष्टाचार की जड़ ढूंढ़ने का आपस में क्या रिष्ता हो सकता है। सीधे न सही, किन्तु दोेनों के बीच गहरा रिष्ता है। समय पर काम नहीं होने के कारण आदमी परेषान हो जाता है और वह कोषिष करता है कि जैसे तैसे लेदेकर अपना काम करवा ले। षासकीय सेवक को भी यह रास्ता आसान लगता है कि समय पर काम नहीं करो तो झकमार कर आम आदमी उसकी हथेली गरम करेगा। जब बाबू स्तर का आदमी काम रोकने और करनेे के एवज में कमाता है तो इसका हिस्सा भी उसे उपर तक देना होता है। यह तंत्र का असली चेहरा है और मध्यप्रदेष सरकार ने इस चेहरे को पहचान लिया था। इसे आप सहज भाषा में ताजा हिन्दी फिल्म दम मारो दम के एएसपी कामथ के रूप में मुख्यमंत्री को और राणे के रूप में बाकि तंत्र को देख सकते हैं।
यहां हम भ्रष्टाचार राडिया के रार वाली नहीं कर रहे हैं बल्कि हम उस छोटे से पौधे की बात कर रहे हैं जो आगे चलकर वटवृक्ष बन जाता है और देष का अधिकांष उर्जा इस वटवृक्ष को उखाड़ने में लग जाता है जिससे हमारा स्वाभाविक विकास का रास्ता अवरूद्ध हो जाता है। आज अन्ना हजारे जैसे सक्रिय भारतीय की ताकत भ्रष्टाचार को हटाने में लगी हुई है तब सहज रूप से यह विचार आना स्वाभाविक है कि असली चेहरा तो यही है। मध्यप्रदेष में लोकसेवा गारंटी योजना सफल हो रही तो इसका अर्थ हुआ कि भ्रष्टाचार पर चोट हो रही है। समय पर काम की गारंटी ही भ्रष्टाचार को रोकने में कामयाब हो सकती है और भ्रष्टाचार के खिलाफ जूझ रहे लोगों को यह बात समझ लेना चाहिए कि चोट कहां करनी है।


शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

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कलम की विनम्रता और पत्रकारिता के संस्कार
मनोज कुमार

साल के दो महीने खास होते हैं जिनमें पहला महीना अप्रेल का होता है। इस महीने पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, पंडित माधवराव सप्रे और राजेन्द्र माथुर के नाम है तो दूसरा महीना मई का है। मई की पहली तारीख श्रमजीवियों के नाम है जिसे हम मजदूर दिवस के नाम पर जानते हैं। इसी महीने की तीन तारीख को प्रेस दिवस है और तीस मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। ये दोनों महीने बेहद अर्थवान हैं, खासकर पत्रकारिता के लिये। यहां मैं मीडिया षब्द से परहेज करने की कोषिष करूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि मीडिया का अर्थ पत्रकारिता से एकदम जुदा है। बहरहाल, हम पत्रकारिता के संदर्भ में बात करेंगे। पत्रकारिता के संदर्भ में दो बातें हैं कि इन दोनों महीनों की तारीख पत्रकारिता के पुरोधाओं से जुड़ी हुई है और इन तारीखों का सीधा संबंध कलम से है। मेरी बातें उलझी उलझी लग सकती हैं किन्तु इस पर जब विस्तार से लिखी गयी मेरी बातों को पढ़ेंगे, मनन करेंगे तो षायद आप भी मुझसे सहमत होंगे।
    दादा माखनलाल की विष्व प्रसिद्व रचना है पुश्प की अभिलाशा। इस कविता में उन्होंने फूल की विन्रमता का बखान किया है और इससे जुड़ी बात कलम की मैं कहता हूं। कलम भी आपको विनम्रता सिखाती है। आप देखेंगे कि आमतौर पर कलम नीचे की तरफ होती है अर्थात वह विनम्र है। पत्रकारिता भी विनम्रता सिखाती है और विनम्र पत्रकारिता ही दुनिया बदलने की ताकत रखती है। तलवार नीचे की तरफ होगी तो वह भीरूपन का परिचायक होगी किन्तु कलम ऊपर की तरफ होगी तो उसकी अकड़ दिखेगी। क्या कलम अकड़ दिखा सकती है? नहीं, कभी नहीं। कलम की प्रकृति रचने की है, सिखाने की है और रचियता हमेषा विनम्र होता है। जो लोग आस्तिक नहीं हैं वे भी इस बात को मानेंगे कि ईष्वर, अल्लाह, ईषु, गुरूनानक किसी ने भी, कहीं भी विनयषील व्यवहार के अलावा कोई सीख नहीं दी है।
जब हम यह मानते हैं कि कलम विन्रम है तो भला हममें विनम्रता क्यों नहीं आना चाहिए। पत्रकारिता का दायित्व समाज के किसी भी दायित्व से बड़ा है। दूसरे दायित्व कम नहीं हो सकते हैं किन्तु उनमें कहीं न कहीं, लाभ की लालसा बनी होती है किन्तु पत्रकारिता में लाभ का कोई लोभ नहीं होता है। पत्रकारिता सहज रूप् से एक सुंदर, विचारवान और विकसित समाज की रचना करने की कोषिष है। कुछ लोग इस बात को हजम नहीं कर पाएंगे कि आज जब चौतरफा पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात चल रही है, कदाचित प्रमाणित भी हो चुकी है तब मेरा यह कहना केवल काल्पनिक बातें हो सकती हैं। मेरा उन सभी लोगों से आग्रह है कि वे इसे दूसरी नजर से देखें। पत्रकारिता तो आज भी नफा-नुकसान से परे है। आप एक पत्रकार हैं तो आप खबर लिखते हैं समाज के लिये किन्तु जिस कागज पर खबर छपती है वह वस्तु है और वस्तु का सौदा होता है। आपकी लिखी खबर षब्द सत्ता है और इसकी कोई कीमत नहीं होती है। पत्रकार का लाभ इतना ही होता है कि उसे जीवनयापन के लिये वेतन के रूप् में कुछ हजार रुपये मिल जाते हैं। यदि आप और हम पत्रकार नहीं भी होते तो किसी और व्यवसाय में भी यही करते। संभवतः इसलिये ही हमें श्रमजीवि कहा जाता है क्योंकि श्रम ही हमारे जीवन का आधार है। हम सरस्वती के उपासक हैं और हमारी उपासना का माध्यम हमारी कलम है। इस कलम की विन्रमता देखिये कि यदि इसे आप सीधा कर देते हैं तो यह लिखने का उपक्रम रोक देती है किन्तु जैसे ही यह झुकती है, वह नदी के पानी की तरह बहने लगती है। हमारे विचार और कलम की स्याही एक सुंदर अभिव्यक्ति का माध्यम बनते हैं।
मेरा यह विचार महज एक लेख नहीं है बल्कि एक आग्रह है उस युवा पत्रकार पीढ़ी से जो इस महायज्ञ में षामिल तो हो गये हैं किन्तु उन्हंे अपनी ताकत का अहसास नहीं है। वे हर समय भ्रम की स्थिति में रहते हैं। अच्छा लिखना जानते हैं, अच्छा सोचते हैं और अच्छा करने का जज्बा भी उनमें है किन्तु उन्हें इस बात का इल्म नहीं है  िकवे फकीरी के पेषे में आये हैं। वे लिखेंगे तो समाज और देष में षुचिता का निर्माण होगा और उनके इस लिखे से अखबार का मालिक कदाचित मालामाल बनेगा। षुचिता और माल के बीच हमारी नयी पीढी को तय करना होगा कि वे आखिर उनका रास्ता क्या हो? वे माल की तरफ भागें या समाज में षुचिता के लिये जो जवाबदारी उनके कंधों पर है, उसे पूरा करें। इस बात को लिखने में मुझे परहेज नहीं है कि हममे से अनेक दिग्गज पत्रकार भावी पीढ़ी में कलम का संस्कार उत्पन्न करने के बजाय कमाने की संस्कृति पैदा कर रहे हैं। भावी पत्रकारों को इस गफलत में नहीं पड़ना चाहिए। हमें महान पत्रकार दादा माखनलाल की पत्रकारिता को, गांधीजी की पत्रकारिता को स्मरण में रखकर कलम के संस्कार को आगे बढ़ाना है। झुकने का अर्थ समझौता नहीं है बल्कि यह विनम्रता है और पत्रकारिता विनम्रता की पहली सीढ़ी है। पत्रकारिता के अवधूतों के प्रसंग में जो बातें लिखी हैं, वह मेरी भावना है और मेरा विष्वास है कि कलम के संस्कार की पत्रकारिता हमेषा अपनी आभा बिखरेते रहेगी।(लेखक मीडिया एवं सिनेमा की षोध पत्रिका समागम के सम्पादक एवं मीडिया अध्येता हैं।)

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

bachpan bachye

बचपन को ईमानदार बनाना जरूरी

-मनोज कुमार

अन्ना हजारे ने बेइमानों के खिलाफ हल्ला बोल दिया है। देखते ही देखते सैकड़ों लोग उनके मुरीद हो गये हैं। अपनी बात कहने के पहले अन्ना हजारें को मेरा सलाम। इस मुहिम से जुड़े कितने लोगों का यह मालूम है कि वास्तव में भ्रश्टाचार होता क्या है? पहली बात तो यह कि जो लोग अन्ना हजारे के साथ बेइमानों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं अथवा हो गये हैं, उनमें से ऐसे कितने लोग हैं जो राषनकार्ड बनवाने, रेल में आरक्षण पाने, टेलीफोन के बिल पटाने में बचने की कोषिष, बिजली की चोरी या ऐसे ही रोजमर्रा की जरूरत को जल्द से जल्द निपटा लेेने के लिये रिष्वत नहीं दिया है? मेरे खयाल में कुछ प्रतिषत को ऐसे लोग होंगे किन्तु इनकी संख्या मुट़ठी भर होगी और उन लोगों की तादात अधिक होगी जो कहेंगे कि बेइमानी तो अब हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है यानि भ्रश्टाचार को षिश्टाचार मानने और बताने वालों की संख्या अधिक है। क्या हम ऐसा सोचकर अथवा अपना समय बचाने के लिये जो बेइमानी कर रहे हैं, क्या वह इस मिषन के खिलाफ नहीं है।

दरअसल जीवन में बहुत सारी ऐसी गलतियां हम करते हैं और कर रहे हैं जिन्हें हम बेइमानी नहीं मानते हैं। अक्सर यह बात कही जाती है कि फलां अफसर बेहतरीन काम करता है। क्या किसी के पास जवाब है कि एक सरकारी मुलाजिम, भले ही वह अफसर क्यों न हो, सरकार खराब काम करने का वेतन देती है? जवाब ना में होगा तो फिर भला हम क्यों इनकी तारीफ के पुल बांधे? हमें इस बात का इल्म भी नहीं होता है कि एक आदमी की तारीफ करने से दूसरे अनेक लोगों में हीनभावना घरकर आती है जिससे पूरा तंत्र प्रभावित होता है और कदाचित बेइमानी की षुरूआत यहीं कहीं से होती है। सिर्फ पैसा लेना ही भ्रश्टाचार नहीं है बल्कि इसकी कहानी एक बड़े केनवास पर है।

जनलोकपाल बनना चाहिए और सरकार के साथ साथ पूरे देष को इसके लिये पहल करनी चाहिए किन्तु यह जनलोकपाल कागजी घोड़ा न बन कर रह जाए। मध्यप्रदेष में लोकसेवा गारंटी अधिनियम लागू है। काम की समय-सीमा भी सरकार ने तय कर दी है किन्तु वास्तव में क्या ऐसा हो रहा है? इस बात की पड़ताल की जानी चाहिए। सरकार ने ऐलान कर दिया कि षासकीय सेवकों को भ्रश्टाचार के लिये दंडित किया जाएगा किन्तु आज तक कितने ऐसे भ्रश्टों को सजा मिली है, सरकार बताने की स्थिति में नहीं है। छापे डल रहे हैं, माल निकल रहा है और एक नया भ्रश्ट बाहर आ रहा है किन्तु जांच पर जांच और तारीखों पर तारीख के चलते मामला जस का तस बना हुआ है। सरकार कह सकती है कि हम बेइमानों को पकड़ने की कोषिष कर रहे हैं किन्तु दंड तो तभी मिलेगा जब अपराध साबित होगा।

मेरी अपनी निजी सोच यही है कि अन्ना हजारे जैसे इस देष में सौ-पचास नहीं बल्कि लाखों की संख्या में ईमानदार लोग हैं जिनके लिये पैसे से बढ़कर वतन है। ऐसे लोगों को सामने लाइये और लोगों के लिये उन्हें रोल मॉडल के तौर पर प्रस्तुत कीजिये। आज की पीढ़ी तो भ्रश्टाचार में डूब चुकी है। बचाना है तो भविश्य को बचाइए। बचपन को बचाइए। उन्हें सिखायें कि ईमानदारी का फल क्या होता है। हर पिता, हर माता अपने बच्चों को नेक कथायें पढ़ायें और उनमें संयम उत्पन्न करें। धीरज रखना सिखायें न कि काम निकालने के लिये रिष्वत देकर समय बचाने की आदत डालें। उन्हें लोभ और लालच से बचायें। बच्चों को बचा लिया तो आप यकिन मानिये कि हमारा आने वाला कल बेइमान नहीं होगा। एक अन्ना हजारे के सामने आने से देष का भला नहीं होने वाला और न ही बेइमानों का पत्ता साफ होगा। यह कांेषिष जारी रहना चाहिए लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है बचपन को बचाना। बचपन बचा लिया तो मान लीजिये कि भ्रश्टाचार की जंग आपने जीत ली है।

मंगलवार, 15 मार्च 2011

SAMAGAM

मासिक पत्रिका समागम अब
मीडिया और सिनेमा की शोध पत्रिका 
 भोपाल। विगत दस सालों से निरंतर प्रकाशित हो रही मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम अब मीडिया और सिनेमा की शोध पत्रिका के रूप में प्रकाशित होगा। समागम का पंजीयन शोध पत्रिका के रूप में हो चुका है। मार्च 2011 का अंक शोध पत्रिका के रूप में आया है। समागम के इस नये अंक में पांच अलग अलग शोध पत्रों का प्रकाशन किया गया है। मीडिया और सिनेमा शोध पत्रिका के रूप में प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका संभवतः अपनी तरह की इकलौती पत्रिका है। इस आशय की जानकारी समागम के सम्पादक मनोज कुमार ने दी।

पत्रिका समागम के बारे में वे बताते हैं कि मीडिया में शोध और अनुसंधान खूब हो रहे हैं किन्तु इन पर शोध पत्रिकाओं की कमी है। कोशिश होगी कि समूची दुनिया में हो रहे शोध अनुसंधान को प्रकाशित किया जाए ताकि पत्रकारिता की नयी पीढ़ी को इससे लाभ हो सके। शोध पत्रिका समागम का मार्च 2011 का अंक मीडिया केनवास पर महिलाएं पर केन्द्रीत है। पत्रिका का पूर्व का हर अंक किसी खास मुद्दे को केन्द्र में रखकर प्रकाशित किया गया है। मीडिया पर गंभीर किस्म की सामग्री को पत्रिका में प्रकाशित किया जा रहा है। इस पत्रिका का टारगेट आडियेंस पत्रकारिता के विद्यार्थी एवं स्कॉलर हैं। सम्पादक का यह भी कहना है कि पत्रिका में मीडिया एवं सिनेमा पर हो रहे शोध को प्रमुखता दी जाएगी किन्तु दूसरे विषयों पर हो रहे प्रामाणिक एवं सारगर्भित शोधपरक प्रकाशन सामग्री के लिये भी पत्रिका में स्वागत है। अप्रेल का महीना पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे एवं राजेन्द्र माथुर के नाम है। ये लोग अपने समय के चर्चित सम्पादक रहे हैं किन्तु आज के दौर में सम्पादक की स्थिति नही के बराबर है। सम्पादक का स्थान मैनेजर ने ले लिया है। आज के दौर के इस सामयिक विषय पर समागम का केन्द्रीय सब्जेक्ट होगा।

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

Bharat Bhavan

झाडू, सूपा, चलनी, कुटेला और भारत भवन
-मनोज कुमार
       झाडू, सूपा, चलनी अब हमारे घरों से बाहर हो रहा है। झाडू की जगह मोप और सूपा और चलनी की जगह मिक्सर ग्राइंडर जैसी आधुनिक मशीनें आ गयी है। कुटेला भी अब विदाई के कगार पर है। कपड़े अब कुटेला की कुटाई से बच जाएंग क्योंकि वाशिंग मशीन के भीतर वह बेहद आहिस्ता आहिस्ता घूम घूम कर सफाई करा सकेगा। आपको भी लग रहा होगा कि लिखने वाला पगला गया है। कहां से झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला की बातें करने लगा है। भला यह भी कोई चीज है जिस पर चर्चा की जाए?
       आपकी तरह मुझे भी तकरीबन बीस बरस पहले ऐसा ही लगा था। तब जब मैं पहली दफा भारत भवन गया था। भारत भवन में एक हिस्सा इन चीजों के लिये सुरक्षित रख दिया गया है। पहली पहली दफा जब मैंने इन सामानों को देखा तो मुझे हंसी आ गयी। समझ में नहीं आया कि हमारे जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों की इन चीजों को भला यहां क्यों सजा कर रखा गया है। मैं अपनी जगह गलत नहीं था क्योंकि मैं महानगर का रहने वाला नहीं था और न ही उस रईस परिवार से मेरा कोई वास्ता था जिनकी दुनिया हर घंटे में बदल जाया करती है। मैं तो कस्बानुमा शहर रायपुर से भोपाल अपने अखबारी नौकरी के सिलसिले में भोपाल आ गया था। तब मध्यप्रदेश विभाजित नहीं था।
       मैं एक पत्रकार और लेखक होने के नाते बार बार और कई बार भारत भवन का चक्कर लगाया। मेरी जिज्ञासा थी कि रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों को इतना सहेज कर क्यों रखा गया है। किसी से पूछने का साहस भी नहीं हुआ। मेरे अपने सवाल और सवाल का जवाब ढूंढ़ने की स्वयं की चुनौती। कई बार जाने के बाद आखिरकार मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल ही गया। मैं आज से आगे चलकर देखने लगा। उस बदलती दुनिया की कल्पना करने लगा जब आहिस्ता आहिस्ता ये सारी चीजें खत्म हो जाएंगी तब बच्चों को बताने और समझाने के लिये भारत भवन का यह हिस्सा काम आएगा।
       समय ने करवट ली। इन बीस बरसों में दुनिया ही बदल गयी। उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों के घरों से झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला बाहर हो गया। उनकी जगहों पर आधुनिक मशीनों ने अपना स्थान बना लिया। जमाना बदल रहा है किन्तु आम मीडिल क्लास फेमिली आज भी झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला पर आश्रित है। वह दिन दूर नहीं जब इनके घरों से भी इन सामानों की विदाई हो ही जाएगी।
       झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला की बात करते समय मुझे अपने एक भाई शेषप्रकाशजी की तीस बरस और शायद कुछ ज्यादा पुरानी बात याद आ जाती है। वे बता रहे थे कि उनकी नातिन मुंबई से रायपुर आयी थी। भाईसाहब के घर गाय पलती थी। मुंबई में जन्मी इस नन्हीं बच्ची ने न कभी गाय देखा था और न गाय का तबेला। उसके लिये यह एकदम नयी चीज थी।  उसने अपने नाना से बेसाख्ता सवाल कर डाला- वोह दिस इस काउ। हम सब उसकी अज्ञानता पर मुस्करा पड़े लेकिन आज मुंबई तो छोड़िये, भोपाल के बच्चों के लिये भी यह सब हैरत में डालने वाली चीजें हैं। यूज एंड थ्रो और पाउच संस्कृति में गाय, गांव और किसान बीती बातें बन कर रह जाएंगे।
       बहरहाल, वापस भारत भवन प्रसंग पर। अचानक आज हाथ में फैशन की एक महंगी पत्रिका आ गई। महंगे खूबसूरत कागज और वैसी ही छपाई। पत्रिका मुझ जैसे मध्यमवर्गीय पत्रकार-लेखक के लिये तो हो नहीं सकती। खैर, इस पत्रिका में वह सब उत्पाद शामिल थे जो धनाड्य परिवार उपयोग में लाते हैं किन्तु इसके
दो या शायद तीन पन्ने पर छपी एक फीचर स्टोरी मेरा ध्यान आकर्षित कर गयी। इस लेख में झाडू को लगभग दुर्लभ बताते हुए एक संग्रहालय का उल्लेख किया गया था। रूचिकर विषय था सो पढ़ लिया लेकिन इसके साथ ही मैं तकरीबन बीस बरस पहले की दुनिया में जा पहुंचा। बीस बरस पहले जो विषय मेरी जिज्ञासा का सबब था, आज वही विषय मेरे आसपास है। बदलती दुनिया के साथ झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला की यादें लिये उस किसान की तरह वापस लौटने की कोशिश कर रहा हूं जब भारत को सोने की चिड़िया और किसानों को अन्नदाता कहा जाता था।

शनिवार, 29 जनवरी 2011

Mahtma Gandhi

साथियों,

आज उस महात्मा की पुण्यतिथि है जिन्हें हम महात्मा गांधी के नाम से जानते हैं। महात्मा को भारतीय पत्रकारिता के एक छोटे से प्रतिनिधि की हैसियत से इस लेख के माध्यम से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

महात्मा की पत्रकारिता दिल्ली से देहात के बीच

-मनोज कुमार

महात्मा की पत्रकारिता और वर्तमान समय को लेकर विमर्श हो रहा है और यह कहा जा रहा है कि महात्मा की पत्रकारिता का लोप हो चुका है। बात शायद गलत नहीं है किन्तु पूरी तरह ठीक भी नहीं। महात्मा की पत्रकारिता को एक अलग दृष्टि से देखने और समझने की जरूरत है। महात्मा की पत्रकारिता दिल्ली से देहात तक अलग अलग मायने रखती है। पत्रकारिता का जो बिगड़ा चेहरा दिख रहा है वह महानगरीय पत्रकारिता का है। वहां की पत्रकारिता का है जिन्हें एयरकंडीशन कमरों में रहने और इसी हैसियत की गाड़ियों में घूमने का शौक है। पत्रकारिता का चेहरा वहां बिगड़ा है जहां पत्रकार सत्ता में भागीदारी चाहता है और यह भागीदारी महानगर में ही संभव है। दिल्ली से देहात की पत्रकारिता के बीच फकत इसी बात का फरक है। दिल्ली की पत्रकारिता से महात्मा पत्रकार दूर हैं तो देहाती पत्रकारिता में वे आज भी मौजूद हैं।

इस अर्थ में पत्रकार महात्मा की इस दौर में अनुपस्थिति शायद ठीक ही है। पत्रकारिता का आज जो हाल है उसे देखकर पत्रकार महात्मा स्वयं को माफ नहीं कर पाते। वे पत्रकारिता को समाजसेवा का साधन मानते थे किन्तु पत्रकारिता आज स्वयं के जीवन का साध्य बन कर रह गयी है। आजादी के साढ़े छह दशक में पत्रकारिता ने अनेक बदलाव देखे हैं। इन बदलाव की पत्रकारिता गवाह रही है। विदेशी आक्रमण से लेकर देश के भीतर इमरजेंसी को पत्रकारिता ने करीब से देखा है। आज वही पत्रकारिता पेडन्यूज छापने के लिये रोज ब रोज दागदार हो रही है। ठीक ही है कि पत्रकार महात्मा गांधी इस समय हमारे साथ नहीं हैं। उनकी पत्रकारिता आज के दौर में छिन्न-भिन्न हो गयी है। सत्ता को रास्ता बताने वाले सत्ता के साथ चलने लगे हैं। आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति को उसका हक दिलाने वाली पत्रकारिता उनका हक छीनने में आगे हो गयी है।

महात्मा की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता को जांचने के पहले कुछ बुनियादी बातों की चर्चा कर लेना सामयिक होगा। पत्रकार महात्मा द्वारा पत्रकारिता के लिये बताये गये मानदंड और आज की पत्रकारिता के मानदंड में कोई साम्य नहीं है। दोनों की पत्रकारिता एक तरह से नदी के दो पाट की तरह हो गये हैं जो चलेंगे तो साथ साथ किन्तु कभी मिल नहीं पाएंगे। पत्रकारिता की बात होगी और पत्रकारिता के लिये पत्रकार महात्मा को याद किया जाएगा किन्तु जब उनके बताये रास्ते पर चलने की बात होगी तो दोनों वापस नदी के दो किनारों की तरह हो जाएंगे। यह बात तो शीशे की तरह साफ है कि आज की पत्रकारिता में महात्मा की पत्रकारिता का लोप हो चुका है किन्तु क्या यह सच नहीं है कि इतना स्याह हो जाने के बाद भी पत्रकारिता की बुनियाद उन्हीं बातों पर टिकी है जो पत्रकार महात्मा बता गये थे।

पत्रकार महात्मा के साथ साथ चलते हुए इस दौर के महान पत्रकारों के बारे में बात करना लाजिमी होगा। पत्रकारिता की जो बुनियादी बातें हैं उनमें पहला है पत्रकारिता की निष्पक्षता। दूसरी बात है पत्रकारिता का तथ्यों को तटस्थ होकर पाठकों के समक्ष रखना न कि न्यायाधीश बनकर फैसला देना। तीसरी बात पत्रकारिता को व्यवसाय न बनाना। फौरीतौर पर तीनों ही बातें पत्रकारिता से खारिज कर दी गयी लगती हैं किन्तु सच यह है कि पत्रकारिता आज भी इन्हीं तीन बातों के कारण जनमानस की आवाज बनी हुई है। जीवन जीने के बुनियादी अधिकार को दिलाने में पत्रकारिता हमेशा से सक्रिय रहा है किन्तु कभी इस पर चर्चा नहीं की गई।

नीरा राडिया मामले में पत्रकारिता की जो भूमिका रही हो उसको लेकर ऐसा हंगामा हो रहा है कि मानो पत्रकारिता नेस्तनाबूद हो गई हो। पत्रकारिता पर कयामत आ गयी हो गई। जो लोग इस मामले को लेकर हंगामा कर रहे हैं वे शायद भूल गये हैं कि अरूण शौरी आज भले ही राजनेता के रूप में स्थापित हों किन्तु उन्हीं की कलम का कमाल था कि तीन दशक बाद भी बोफोर्स का मामला खत्म नहीं हुआ। मेरा सवाल है कि नीरा राडिया के साथ चलने वाले दस पांच पत्रकारों के नाम आ भी गये तो हंगामा क्यों होना चाहिए? क्यों कभी किसी ने अरूण शौरी से सवाल नहीं किया कि उन्हें राजनीति में आने की क्या जरूरत थी? अब अरूण शौरी के नक्शेकदम पर बाद की पत्रकारिता की पीढ़ी चलती है तो इसे सहज रूप में लेना चाहिए। समाज के हर वर्ग में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो अपने उद्देश्य से भटकते नजर आते हैं।

दिल्ली और देहात की पत्रकारिता का फर्क वास्तव में यही तो है। दिल्ली की पत्रकारिता नदी का एक किनारा है और जो आज का सच है तो देहात की पत्रकारिता नदी का दूसरा किनारा है जो महात्मा की पत्रकारिता है। एक सच यह भी है कि ऐसे पत्रकारों के खिलाफ लिखकर पत्रकारों का एक वर्ग वाहवाही लूटना चाहता है। मुद्दा तो यह है कि इतना हंगामा करने और लिखने के बाद कथित दोषी पत्रकारों को समाज ने बहिष्कृत क्यों नहीं किया। जिस प्रभु चावला को एक प्रबंधन ने सीधी बात कर हटा दिया तो दूसरे प्रबंधन ने सच्ची बात कहने के लिये अपने साथ ले लिया। अब इसे कौन तय करेगा कि प्रभु चावला को दोष के कारण हटाया गया या इस दोष के चलते उनकी ख्याति को भुनाने के लिये दूसरे ने अपने साथ ले लिया। दिल्ली की पत्रकारिता में सबकुछ चलता है किन्तु देहात की पत्रकारिता में इस तरह की छूट नहीं है।

पत्रकार महात्मा की उस पंक्ति को याद कर लेना सामयिक होगा जिसमें वे कहते हैं कि कम समय में सच को जांच लेना मुश्किल होता है और इसलिये अच्छा है कि ऐसा लिखा ही न जाए। इस संदर्भ में एक अनुभव स्मरण हो रहा है देहाती पत्रकारिता का जिसे हम महात्मा की पत्रकारिता कह सकते हैं बल्कि कहना चाहिए।

पत्रकारिता में अपना जीवन गुजार चुके पत्रकार ने बताया कि एक बार वे एक महिला को अपनी खबर में वेश्या लिख दिया। महिला की मौत हो चुकी थी। गुस्से में लाल-पीला होता उसका बेटा हाथ में हथियार लिये वह अखबार के दफ्तर में प्रवेश कर गया। गंदी गालियों के साथ वह उस पत्रकार को तलाश करने लगा जिसने यह खबर लिखी थी। उक्त वरिष्ठ पत्रकार का डर जाना स्वाभाविक था किन्तु अपना नाम छिपाते हुए उस युवक से आपत्ति की वजह जाननी चाही। युवक को खबर में अपनी मां को वेश्या लिखे जाने पर आपत्ति थी और उसका तर्क था कि क्या उसकी मां को किसी सरकार ने या शासन ने लायसेंस दिया था, यदि नहीं तो किस आधार पर यह लिखा गया।

युवक का गुस्सा जायज था। वरिष्ठ साथी को अपनी गलती का अहसास हुआ और आगे से दुबारा बिना जांचे कोई खबर नहीं लिखने की कसम खा ली। गांधीजी यही बात कहते थे। इस अनुभव का अर्थ यही है कि देहात की पत्रकारिता में महात्मा की पत्रकारिता आज भी मौजूद है किन्तु दिल्ली की पत्रकारिता में नहीं है। यदि ऐसा होता तो नैतिकता के नाते ही सही, आरोपों के जद में आये पत्रकार अपने वर्तमान दायित्व को स्वेच्छा से छोड़कर स्वतंत्र रूप से लेखन करते किन्तु आज के दौर की पत्रकारिता में यह कहां संभव है।

थोड़ी देर के लिये मान लिया जाए कि जिन पत्रकारों के नाम आरोपों की जद में आये हैं, उनसे पत्रकार बिरादरी ने नाता तोड़ लिया है क्या? क्या उन्हें जिन पत्रकार संगठनों की मान्यता या संबद्धता है, उनसे अलग कर दिया गया है, शायद यह भी नहीं। क्या पत्रकारों ने उनसे विमर्श बंद कर दिया है, शायद यह भी नहीं। जब स्वयं पत्रकार बिरादरी में इतना साहस नहीं है तो बेवजह अखबार के पन्ने और आम आदमी का वक्त जाया करने की जरूरत ही क्या है।

इसमें जीवन के सभी रंग समाये हुए हैं। जिसमें खुशियों की इंद्रधनुषी रंग हैं तो कुछ स्याह हिस्सा भी है। नीरा मामले में जो कुछ घटा और पत्रकार कथित आरोपों से घिरे अपने उन साथियों के बारे में लिखा है और लिख रहे हैं तो यह साहस पत्रकारिता में ही हो सकता है। किसी अन्य पेशे में यह साहस नहीं हो सकता बल्कि हरचंद कोशिश की जाती रहती है कि किस तरह साथी को बचाया जा सके। इस तरह के अनेक उदाहरण समाज के पास हैं जिन्हें पत्रकारिता ने बेनकाब किया है।

कितना भी कठिन दौर क्यों न हो, पत्रकारिता अपने बुनियादी उसूलों से मुंह नहीं मोड़ सकता है। ठीक उसी तरह जिस तरह एक वकील यह जानते हुए भी कि उसका मुवक्किल एक अपराधी है किन्तु उसे बचाने का यत्न करता है क्योंकि फीस उसने उसे बचाने की ली है। एक डाक्टर की तरह जो कितना भी निर्माेही हो किन्तु मरीज को देखना नहीं भूलता है। यहां मैं अपवादों की बात नहीं करता बल्कि उन सच्चाईयों की बात कर रहा हूं जिसे पत्रकारिता कहते हैं। आज पत्रकार महात्मा होते तो यह देखकर इत्मीनान कर लेते कि इस कठिन समय में पत्रकार अपना दायित्व निभा रहे हैं।

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