गुरुवार, 2 जून 2011

kuch alg

ईमानदारी पर भारी बेईमानी
मनोज कुमार

आज दो खबरें हैं जिसमें पहली खबर मायने रखती है। खबर एक रिक्षा चालक को लेकर है। किसी सवारी ने रिक्षे में पचास हजार रुपये का बैग भूल आया था। रिक्षे वाले ने ईमानदारी का परिचय देते हुए उसे लौटा दिया। निष्चित रूप से इस खबर को जगह मिलनी चाहिए थी सो मिली किन्तु ठीक इसके नीचे एक खबर और लगी है कि पचास करोड़ के आसामी कार चोर थे। इस खबर को उतनी ही जगह दी गई है जितना कि रिक्षे वाले की ईमानदारी की खबर को। सवाल यह है कि ईमानदारी पर भारी पड़ती बेईमानी की खबर क्या इतना वजूद रखती है अथवा कि ईमानदारी और बेईमानी को एक तराजू पर तौला जाना चाहिए?
    राय अलग अलग हो सकती है किन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि खबरें दोनो महत्वपूर्ण हैं किन्तु रिक्षा चालक की खबर ज्यादा मायने रखती है और कारचोरों की खबर कोई खास मायने की नहीं है। दूसरी खबर इस मायने में बेकार है अथवा अर्थहीन है कि इस समय समाज में सबसे बड़ा मुद्दा भ्रश्टाचार का है और ऐसे में ईमानदारी की कोई खबर सामने आये तो इसे बड़ी खबर माना जाना चाहिए। औसतन दस खबरों में छह तो बेईमानी की होती हैं। बेईमानी के मुद्दे और तथ्य अलग अलग होते हैं किन्तु चरित्र एक सा होता है। इस हालात में रिक्षा चालक की ईमानदारी को सलाम करना चाहिए। यह खबर सुकून देती है कि बिगड़ते दौर में भी ईमानदारी बाकि है और षायद यही ईमानदारी ही हमारे देष और समाज को बचाये रखी है।
    मीडिया की जवाबदारी है कि जब वे संेध लगाकर लोगों के निजी जीवन में ताक-झांक कर मसालेदार खबरें खोज लाते हैं तो ऐसे ईमानदार लोगों को भी सामने लायें ताकि किसी अन्ना हजारे को, किसी रामदेव को भ्रश्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने की जरूरत ही ना पड़े क्योंकि इस मुहिम के कई अर्थ हैं। भ्रश्टाचार मिटाना इनका लक्ष्य है किन्तु कई बेईमान इनके साथ खड़े होकर स्वयं ही ईमानदार होने का सर्टिफिकेट पा रहे हैं। इस विसंगती से समाज को बचाने के लिये जरूरी है कि सकरात्मक खबरों को प्रमोट किया जाए।

बुधवार, 1 जून 2011

Sarkar aur Dar

सरकार के डरने का डर

मनोज कुमार

इन दिनों एक बात सुनियोजित ढ़ंग से स्टेबलिस करने की कोशिशें हो रही हैं कि सरकार डर रही है। सरकार के डर के पीछे के जो कारण बताये जा रहे हैं, उसकी मीमांसा अलग अलग ढ़ंग से हो रही है किन्तु कहीं भी कोइ्र भी, इसका तर्कपूर्ण जवाब नहीं दे पा रहा है। विवाद की स्थिति को निपटाने को सरकार का डर कहा जा रहा है तो इस पर कोई तर्क नहीं किया जा सकता है। एक लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व होता है कि वह हर अवसर पर आगे आकर लोगों की सुने, समझे और एक सर्वमान्य हल निकालने की कोशिश करे। हाल-फिलहाल केन्द्र सरकार यही कर रही है और इसे सरकार के डरने की बात कही जा रही है। मेरे विचार से यह निरर्थक प्रयास है। सरकार तो सरकार होती है और डरने का शब्द उसकी डिक्शनरी में नहीं होता है और होना भी नहीं चाहिए। अक्सर होता यह है कि जो फैसले हमारी मर्जी के मुताबिक होते हैं, उन्हें हम सही फैसला मान लेते है किन्तु जब ऐसा नहीं होता है तो हम उस सरकार की कमजोरी मान लेते हैं।

सरकार के डरने का शब्द सबसे पहले गढ़ा गया अन्ना हजारे के लोकपाल के मुद्दे को लेकर। सरकार ने पहल की और हजारे की बात सुनी और अपनी बात रखी। सरकार ने अलग अलग आयामों पर सोचा होगा, समझा होगा और सरकार हजारे की बात से सहमत हुई। सरकार के इस फैसले को उसके डरे होने का फैसला माना गया। इसी मामले में अब बाबा रामदेव अनशन की धमकी दे रहे हैं। सरकार एक बार फिर पहल कर बाबा को समझाने के लिये आगे आयी तो इसे भी सरकार का डर बताया जा रहा है। अभी हाल में आतंकवादियों को सजा देने और न देने के मुद्दे में सरकार को डरा हुआ कहा गया है। सवाल यह है कि सरकार डरे तो किससे और क्यों? कोई माकूल जवाब तो लोगों के पास हो। अनुभव यही बताता है कि मीडिया रोज एक नया शब्द गढ़े और उसे प्रचारित कर दे। जो शब्द चलन में आ जाए, वही चरित्र बन जाता है। कभी शाइनिंग इंडिया शब्द गढ़ा गया था और उसका जो हश्र हुआ वह सब जानते हैं। जहां तक सरकार के डरने का मामला है तो यह गफलत पैदा करता है और गफलत का खामियाजा पूरे समाज को भुगतना होता है। मीडिया शब्दों के चयन को लेकर सावधान नहीं है। उसकी यह प्रवृत्ति आने वाले समय के लिये घातक और मारक है।

सरकार के डरने को लेकर एक इमेज बनाने की जो कोशिशें हो रही हैं, वह दुखद है। सरकार एक तंत्र है और तंत्र पूरी व्यवस्था के साथ काम करता है। सरकार में केवल राजनीतिक दल के चुने हुए लोग ही शामिल नहीं होते हैं बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक दायित्वों वाले लोगों की भागीदारी भी होती है जो सरकार के सभी निर्णय में शामिल होते हैं। मीडिया हमेशा विपक्ष की भूमिका में रहता आया है और रहना भी चाहिए किन्तु विपक्ष का अर्थ विरोध करना नहीं बल्कि सरकार को सर्तक करना भी होता है। सरकार डरती तो महंगाई काबू आने में घंटों लगते, सरकार डरती तो मेघा पाटकर का आंदोलन कभी का खत्म हो जाता, सरकार डरती तो घोटालों का पर्दाफाश नहीं हो पाता, सरकार डरती तो और भी जाने क्या क्या हो जाता। किसी आतंकवादी को फांसी न देने अथवा अन्ना हजारे या बाबा रामदेव से चर्चा की पहल को सरकार का डर बताना सर्वथा अनुचित है। सरकार के इन फैसलों को लोकतांत्रिक चश्मे से देखा जाना चाहिए न कि सरकार के विरोधी बनकर।

मंगलवार, 24 मई 2011

हिन्दी पत्रकारिता दिवस ३० मई पर विशेष

पाठकों के हिस्से में सेंधमारी कब तक?
    -मनोज कुमार
    उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने के अनेक उपक्रम संचालित हो रहे हैं। केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों में यह अभियान चला हुआ है। करोड़ों रुपयों के विज्ञापन प्रकाशित किये और कराये जा रहे हैं। उपभोक्ताओं की श्रेणी में उन्हें रखा जा रहा है जो टीवी, फ्रिज, कूलर से लेकर दवाएं खरीदते हैं। इस श्रेणी में संभवतः पत्र-पत्रिकाएं और केबल कनेक्शन लेने वालों को शामिल नहीं किया गया है। इसका कारण शायद इनकी श्रेणी अलग है क्योंकि इन्हें उपभोक्ता न कहकर पाठक और दर्शक कहा जाता है अर्थात इनका संबंध बाजार से न होकर बौद्धिक दुनिया से है। कानून की भा में भले ही ये उपभोक्ता नहीं कहलाते हों किन्तु प्राथमिक रूप से यह उपभोक्ता की ही श्रेणी में आते हैं। पढ़ने के पहले की प्रक्रिया पत्र-पत्रिका खरीदना अथवा केबल कनेक्शन के लिये तयशुदा रकम चुकाना है, ऐसे में वे पहले उपभोक्ता होते हैं और बाद में पाठक या दर्शक। पाठक और दर्शकों के हिस्से में सेंधमारी लम्बे समय से की जा रही है, वह अन्यायपूर्ण है बल्कि ये पाठक और दर्शक तानाशाही के शिकार हो चले हैं। सीधे तौर पर पाठक और दर्शकों के हिस्से में सेंधमारी का मामला साफ नहीं होता है किन्तु मैंने अपने अध्ययन में पाया है कि एक साल में पाठकों के हिस्से में लगभग पच्चीस फीसदी हक पर सेंधमारी की जाती है।
    सभी अखबारों की कीमत तय है, वैसे ही जैसे साबुन की टिकिया की। वह कम या ज्यादा हो सकती है किन्तु यह प्रबंधन का फैसला है कि वह अखबार की कीमत क्या तय करे किन्तु जो कीमत तय की जाती है, वह पाठकों से वसूली जाती है। कीमत में कमी अथवा बढोत्तरी भी की जाती है। यह सब ठीक है किन्तु जब तयशुदा कीमत आप वसूल रहे हैं तो आपकी जवाबदारी बन जाती है कि जितने पन्नों के अखबार का वायदा किया है, वह पाठकों को दिया जाए। पन्ने ही नहीं बल्कि खबरों वाले पन्ने दिये जाएं किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है। हमें पढ़ाया गया है, बताया गया है कि किसी समय अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों के लिये एक हिस्सा तय होता था। पहले अस्सी प्रतिशत खबरें और बीस प्रतिशत विज्ञापन और बाद में यह प्रतिशत बदल गया और साठ प्रतिशत खबरें और चालीस प्रतिशत विज्ञापन की जगह हो गई। शायद अभी भी यही फार्मूला काम कर रहा है किन्तु कागज में, वास्तविकता में नहीं। अखबार जब तब पाठकों के हिस्से में सेंधमारी कर देते हैं।
    हर साल एबीसी अर्थात आडिट ब्यूरो सर्कुलेशन पड़ताल कर यह जानकारी देता है कि किन अखबारों की बिक्री में कितना इजाफा हुआ अथवा कितना ग्राफ उसका गिरा। एबीसी मशीन पर छपने वाले अखबार की प्रतियों गिनने के बाद अपना निर्णय सुनाता है। लिहाजा हर अखबारों की संख्या अलग अलग होती है तथा इसमें भी शहरवार अलग अलग होते हैं। एबीसी के ये आंकड़ें प्रबंधन तक होते हैं, आंकड़ों को सार्वजनिक करने का काम उनका नहीं है किन्तु अपनी श्रेष्ठता सिद्व करने के लिये अखबार वाले तत्काल एक पूरा पेज कौन किससे आगे, कौन किससे पीछे और वे किस मायने में श्रेष्ठ हैं बताने के लिये छाप देते हैं। साल में एक बार पूरा का पूरा पेज जो खबरों के लिये होता है, पाठकों के हिस्से में सेंधमारी कर स्वयं की वाहवाही में निकाल दिया जाता है।
    यह तो एक उदाहरण मात्र है। उत्सव के समय तो विज्ञापनों के बीच खबरों को तलाश करना पड़ता है। दीपावली के पांच दिनों के अखबारों का विश्लेशण करेंगे तो पाएंगे कि बीस प्रतिशत खबरें होती हैं और अस्सी प्रतिशत विज्ञापन किन्तु अखबार के मूल्य में कोई परिवर्तन नहीं होता है। कई बार का अनुभव यह रहा है कि विज्ञापनों के लिये वद्वि किये पन्ने की कीमत भी पाठकों से वसूल कर ली जाती है। इसे कहना चाहिए आम के आम और गुठलियों के दाम भी प्रबंधन ले लेता है। इसी तरह चुनाव के समय अखबारों में भी पाठकों के साथ अन्याय होता है तो राजनीतिक दलों में नियुक्तियां, आगमन, स्वागत आदि के पूरे पूरे पन्ने का विज्ञापन प्रकाशित कर खबरों को कम कर दिया जाता है। केन्द्र एवं राज्य सरकार की अधिसूचना प्रकाशन के समय भी अतिरिक्त पष्ठ नहीं जोड़े जाते हैं। एक तरफ तो विज्ञापन प्रकाशित कर पाठकों के हिस्से में सेंधमारी की जाती है तो दूसरी तरफ रविवार के परिशिष्ट की कीमत सामान्य दिनों से अतिरिक्त वसूली जाती है।
    पेड न्यूज का हल्ला मचाने वाले लोगों को इस बात का इल्म नहीं होगा, यह कहना गैरवाजिब है किन्तु पाठकों के हक में जो सेंधमारी हो रही है, उसके बारे में खामोश बने रहना ठीक नहीं है। पाठकों की हिस्सेदारी में सेंधमारी का एक और तरीका है पाठकों की राय के बिना नियमित स्तंभों को बदलना। इस बारे में कुछ लोगों से बात करने पर उनका यह कहना था कि यह प्रबंध का सर्वाधिकार है कि वह अखबार को किस तरह निकालता है अथवा में उसमें संशोधन करता है जब कुछ लेखक और पाठकों से बात की गई तो उनका कहना था कि अखबार प्रकाशन में लाभ का मामला प्रबंधन का हो सकता है किन्तु अखबार तो पाठक की पसंद और उसकी जरूरत के अनुरूप्‌ निकलना चाहिए। इस बारे में उनका कहना था कि हिन्दी अखबारों में अंग्रेजी की अनुदित सामग्री प्रकाशित की जा रही है जिससे हिन्दी के मूल विचारों से पाठकों का वास्ता खत्म हो रहा है।
एक बड़े वर्ग की चिंता पाठकों के पत्र कॉलम को लेकर भी जाहिर हुई। इस वर्ग का कहना यह था कि पाठकों के पत्र के माध्यम से न केवल विचारों का आदान प्रदान होता था बल्कि वह समस्याएं जिनका हल मुद्दत से नहीं होता था, उसके निदान में भी मदद मिलती थी। अब पाठकों के पत्र औपचारिक रूप से प्रकाशित किये जा रहे हैं। इस वर्ग की चिंता इस बात को लेकर भी थी कि इससे पाठकों की हिस्सेदारी खत्म हो रही है जो अखबारों की गंभीरता के लिये खतरनाक है।  पाठकों के हिस्से पर सेंधमारी के सवाल पर महिला पाठकों से चर्चा करने पर यह बात भी सामने आयी कि जो अखबार प्राथमिक शाला की भूमिका में थे, उनका लोप हो गया है बल्कि अपनी बिक्री बढ़ाने के लिये ईनाम बांटे जा रहे हैं। अखबारों से हम बाजार से सौदा कैसे करें सीखते थे किन्तु अखबारों की यह सामाजिक जवाबदारी भी कम होती जा रही है। बाजार में ठगने से कैसे बचें, लालच में खरीददारी नहीं करें जैसे नैतिक बातें सिखाने वाले अखबार स्वयं लालच देकर अखबार बेचने की कोशिश में जुटे हुए हैं।
    लगभग सभी पाठकों को इस बात की निराशा थी कि हर अखबार अपने आपको सर्वाधिक लोकप्रिय बताने पर जुटा है किन्तु सबका दावा पाठक संख्या पर है न कि बिक्री पर। अखबारों का स्लोगन होता है कि उनकी पाठक संख्या कितनी है। इस बारे में मीडिया पर अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों से हुई बातचीत में उनका कहना था कि अपने को श्रेश्ठ बताने का यह शॉर्टकट रास्ता है।  मैंनेजमेंट की टर्मानोलॉजी के मुताबिक एक परिवार पांच सदस्यों का माना जाता है और एक अखबार के पांच पाठक होते हैं। इसी तरह सार्वजनिक स्थलों पर अखबारों का पठन पाठन करने वालों की संख्या को अखबार चौगुनी करके देखता है और इस हिसाब से वह तुलना कर अपनी प्रसार संख्या के स्थान पर पाठकों की संख्या बता देता था।
    पाठकों के हिस्सेदारी में सेंधमारी के संदर्भ में अध्ययन के दौरान मुझे याद आया कि अपनी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में हम लोगों को सिखाया जाता था कि अखबार के पाठक नहीं बल्कि पाठकों की आंखों की संख्या से अखबार की रीडरशिप गिनी जाए अर्थात एक व्यक्ति की दो आंखें और पाठक पाठक यानि दस आंखें। हालांकि यह बातें हमें अखबार की सामाजिक एवं नैतिक जिम्मेदारी के मद्देनजर बताया जाता था कि हमारी एक गलती से किसी भी व्यक्ति की मानहानि किस स्तर पर और कैसे हो सकती है जिसकी भरपाई करना अखबार के लिये नामुमकिन होगा। तथ्यों की पड़ताल और संबंधित व्यक्ति का पक्ष सुन लेने के बाद खबर लिखना चाहिए। हालांकि तीस वर्श पुरानी पत्रकारिता की नैतिक बातें आज भी उतनी मूल्यवान हैं किन्तु व्यवहार से परे हो चली हैं। फिलवक्त चिंता इस बात की है कि पाठकों की हिस्सेदारी पर जो सेंधमारी हो रही है, उसे कैसे रोका जाए। यह चिंता मामूली नहीं है क्योंकि साबुन की टिकिया एक समय के बाद अपना अस्तित्व खो देती है किन्तु एक अखबार इतिहास बन जाता है और इतिहास में पाठकों के हिस्से की सेंधमारी हिस्सा न बन पाये, इसकी चिंता पाठक को, पत्रकार को और प्रबंधन को करना होगी।

गुरुवार, 5 मई 2011

aaj-kal

हंगामा है क्यों बरपा....
मनोज कुमार

दिग्विजयसिंह एक चतुर राजनेता हैं और मीडिया के दोस्त भी। वे अक्सर बयान देते रहते हैं जिन्हें बेबाक बोल कहना उचित होगा। कुछ बातों पर से तो वे पलटते नहीं है किन्तु कुछ बातों को वे गप कर जाते हैं। राजनीतिक बयानों को लेकर उनके विरोधी तो पस्त रहते ही हैं, उनके अपने दल के लोग भी परेषान हो जाते हैं। उनका एक बयान हो तो बात करें, बहस करें किन्तु यहां तो उनके बयानों की फेहरिस्त है। इस समय में दिग्विजयसिंह ऐसे नेता हैं जो मीडिया में अपनी जगह पक्की कर लेते हैं। लोग भले ही उन्हें भला बुरा कहते रहें लेकिन वे एकाध पखवाड़े में ऐसा बयान दाग देते हैं कि सब उन्हींे के पीछे पड़ जाते हैं। ताजा मामला लादेन का है। पहले तो उन्होंने लादेन के अंतिम क्रियाकर्म करने को लेकर बयान दिया और जब लोग इस बात से नाराज हो गये तो लादेन को सम्मान के साथ जी लगाकर संबोधन दिया। पहले दिन जो लोग नाराज थे, दूसरे दिन उनके नथूने फूलने लगे। लोग पानी पी पीकर दिग्वजयसिंह को कोसते रहे और मुझे नहीं मालूम कि दिग्विजयसिंह पर इसका कोई फर्क पड़ा होगा।
दिग्विजयसिंह हमेषा बयानों की झड़ी लगा देते हैं। ऐसा भी नहीं है कि उनका हर बयान बेबुनियाद हो किन्तु यह भी सच है कि कई बार वे चर्चा में बने रहने के लिये बयान देते हैं। ताजा प्रकरण को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। लादेन के आखिरी संस्कार की बात गंभीर रही होगी किन्तु जब इस पर बवाल मचा तो षायद जानबूझकर लादेनजी कहकर संबोधित कर फिर चर्चा में आ गए।
एक सफल राजनेता की तरह उन्हें अखबार और टेलीविजन पर बने रहना आता है। कोई चैनल अपनी टीआरपी जांच रहा होगा तो जितनी टीआरपी उसे लादेन के मरने की खबर में मिली होगी तो कम से कम आधी तो दिग्विजयसिंह केे बयान की भी रही होगी। अखबारों की बिक्री में उनके बयान का सहयोग होगा। एक समय लालू प्रसाद यादव अपने बयानों से चर्चा में बने रहते थे। दिग्विजयसिंह और लालू दोनों ही षिक्षित हैं और समय की नब्ज पकड़ना जानते हैं। मीडिया को यह मान लेना चाहिए कि हवा का रूख मोड़ने की ताकत दिग्विजयंिसंह रखते हैं। एक तरफ लादेन को मारे जाने की खबर को जितनी जगह मीडिया दे रहा था, लगभग उतनी ही जगह मीडिया में दिग्विजयसिंह ने पा ली है। एकाधे बयान के बाद अरसे तक मीडिया में नेता गुम रहते हैं किन्तु दिग्विजयसिंह एक बयान के बाद उसके सर्पोटिंग में कई बयान देकर अरसे तक मीडिया में बने रहते हैं। सच कहा जाए तो मीडिया को अपनी तरफ मोड़ने की कला जो उनमें है, वह दूसरों को सीखने की है। ऐसा भी नहीं है कि दूसरे नेताओं ने उनके रास्ते पर चलने की कोषिष नहीं की है किन्तु वे सफल नहीं हुए। चलो, बाद का बाद देखेंगे। लादेन की मौत से बड़ी खबर दिग्विजयसिंह के बयान बन गई है।

सोमवार, 2 मई 2011

media

प्रेस दिवस पर खास
विकीलीक्स की पत्रकारिता के अर्थ
मनोज कुमार
विकीलीक्स की पत्रकारिता जनसरोकार की न होकर खोजी पत्रकारिता का आधुनिक चेहरा है बिलकुल वैसा ही जैसा कि कुछ साल पहले तहलका का था। विकीलीक्स और तहलका के होने का अर्थ अलग अलग है। तहलका खोजी पत्रकारिता का भारतीय संस्करण है और उसका रिष्ता खोजी होन के साथ साथ जन के सरोकार का भी था। उसके निषाने पर तंत्र और राजनेता, अफसर थे तो इसका अर्थ समाज को दिषा से देने से था किन्तु विकीलीक्स का होने का अर्थ कुछ और ही है। पहला तो यह कि विकीलीक्स हमारी भारतीय पत्रकारिता से बिलकुल अलग है। अचानक उदय हुए इस इंटरनेटिया पत्रकारिता ने कई देषों की नींद उड़ा देने के बाद भारतीय तंत्र को भी भेदने की कोषिष की है। कहना न होगा कि वह कई मायनों में कामयाब भी रहा है। विकीलीक्स की पत्रकारिता पर संदेह नहीं किया जा सकता है और न ही किया जाना चाहिए।
नये माध्यम की पत्रकारिता को मैं पत्रकारिय सरोकार से परे कुछ और खतरे तरफ देखने की कोषिष कर रहा हूं। विकीलीक्स तब चर्चा मंे आया जब उसने अमेरिका के तंत्र को भेदने की कोषिष की और कुछ रहस्य का खुलासा किया। जो खुलासा हुआ था उसमें भारत के साथ अमेरिका की दोमुंही नीति की बातें भी थीं। स्वाभाविक है कि इस खुलासे ने हर भारतीय मन को खुष किया। खुष होने लायक खुलासा था। यही विकीलीक्स भारत के तंत्र को भी भेदना षुरू किया। विकीलीक्स के खुलासे को लेकर भारतीय राजनीति दो भागों में बंट गयी है। जिनके खिलाफ मामला है, वे परेषान हैं और जिनके खिलाफ नहीं है, वे विकीलीक्स के पैरोकार बने हुए हैं। भारत जिस तेजी के साथ विष्व पटल पर छा गया है, उससे उसके विरोधियों की संख्या बढ़ रही है। भारत के पुराने दुष्मनों से तो पूरी दुनिया वाकिफ है। ऐसे में यह सवाल उपजना स्वाभाविक है कि कहीं कोई विकीलीक्स को औजार बनाकर हमारे तंत्र को नुकसान पहुंचाने की कोषिष तो नहीं कर रहा है। इस संदेह की पड़ताल करना चाहिए। 
ऐसे में यह अंदेषा सहज और स्वाभाविक है कि क्या विकीलीक्स का उद्देष्य महज पत्रकारिता है अथवा उनके साथ किसी और का हाथ है जो हमारी अस्मिता पर आंच लगते देखना चाहते हैं। यह बेहद दुखदायी है कि भारतीय मीडिया विकीलीक्स को हाथोंहाथ ले रही है। उसके खुलासे को खबर बनाकर छाप रही है। हमें यह याद रखना चाहिए कि खोजी पत्रकारिता में भारतीय पत्रकारिता ने हमेषा से अपना झंडा फहराया है किन्तु उसने कभी दूसरे देषों के तंत्र को न भेदने की कोषिष की है और न हस्तक्षेप की। याद रहे कि बोफोर्स घोटाला तकरीबन पच्चीस बरस बाद भी गूंज रहा है तो इसका श्रेय पत्रकार अरूण षौरी को जाता है। यह तो खोजी पत्रकारिता का एक नमूना है। यह एक ऐसा मामला था जिसका रिष्ता दूसरे देषों से भी था किन्तु भारत ने बोफोर्स को छोड़कर दूसरे मामलों में दखल नहीं दिया।
विकीलीक्स की पत्रकारिता को सपोर्ट करते हमारे लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि सबने मान लिया कि वो जो कुछ बता रहा है, लिख रहा है, सत्य है और इसके अलावा बाकि सत्य से परे है। आखिर हम विदेषियों से इतना मोहित क्यों रहते हैं। अब तक षिक्षा और फैषन की बात थी तो किसी तरह पचा लिया गया किन्तु अब जब पत्रकारिता की बात है तो कम से कम मुझे यह हजम नहीं होगा कि कोई विदेषी हमारी धरती पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराये। विकीलीक्स के संस्थापक असांजे का एक बयान आया है कि उनका मकसद किसी सरकार को अस्थिर करना नहीं है बल्कि वह लोगों को न्याय दिलाना चाहते हैं। मेरा मानना है कि भारतीय मीडिया के पास इतनी ताकत है किवह अपने देष और देषवासियों की हितों की रक्षा के लिये अपनी कलम पैनी कर सके। विकीलीक्स को यह समझ लेना चाहिए कि यह वही भारत है जिसकी पत्रकारिता ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिये मजबूर कर दिया था। आजाद हिन्दुस्तान में जो लोग करप्ट हैं, उन्हें ठीक करना भी भारतीय पत्रकारिता को आता है। स्टिंग ऑपरेषन को लेकर विमत होना एक दूसरा मुद्दा हो सकता है किन्तु पत्रकारिता के इस नये औजार ने गड़बड़ियों की नींद हराम कर दी थी। विकीलीक्स की पत्रकारिता और भारतीय पत्रकारिता में बहुत अंतर है। हम अपनी खूबी और कमजोरी को खूब पहचानते हैं किन्तु विकीलीक्स हमारे बारे में यह जान ले, कतई जरूरी नहीं। विकीलीक्स ने भारतीय जमीन पर अपनी पत्रकारिता के बीज डाल दिये हैं, यहां तक तो ठीक है किन्तु अब हमें सर्तक रहना होगा क्योंकि भारतीय पत्रकारिता हमेषा से अजेय रही है और बनी रहेगी।

रविवार, 1 मई 2011

pani...pani...re...

जल संरक्षण और मानवाधिकार
    -मनोज कुमार

    जल ही जीवन है और जीवन की धुरी दायित्व एवं अधिकारों पर टिकी हुई है। प्रकृति का नियम है जीवन है तो मृत्यु निश्चित है। निराशा है तो आशा भी है अर्थात सब कुछ नकरात्मक नहीं है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हम भारतीयों में अधिकार पाने की भावना प्रबल हुई है। इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता है किन्तु अधिकारों के साथ दायित्व के प्रति निराशा का भाव सवालिया निशान लगाता है। हम अपने अधिकारों के प्रति सर्तक और सजग हैं किन्तु दायित्व निभाने के समय हम इसकी अपेक्षा दूसरों से करते हैं। इन सब बातों का सीधा संबंध मानवाधिकारों से जुड़ा हुआ है। 
    इस समय मानव की बुनियादी जरूरतों में एक बड़ी जरूरत जल की है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जल पर हम अपना अधिकार जताने से कभी नहीं चूकते हैं किन्तु जल की बचत करने में हमारा रवैया लापरवाही का होता है जिससे हम दूसरे के अधिकारों का हनन करते हैं। जल हमारे लिये जितना जरूरी है उतना ही जरूरी इस पृथ्वी पर निवास करने वाले दूसरे मानव के लिये भी है। अनुभव यह बताता है कि हम अपनी जरूरत पूर्ति हो जाने के बाद दूसरों की जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं। एक मानव का दूसरे मानव के प्रति यह व्यवहार मानवाधिकार हनन की श्रेणी में आता है।
    ग्रीष्म ऋतु के आरंभ होने के साथ ही जल संकट अपने पांव पसारने लगता है। बहुत ज्यादा तो नहीं किन्तु बीते डेढ़ दशक से इस बात की चेतावनी दी जा रही है कि अब जो वि·ा युद्ध होगा वह पानी के लिये होगा। इस चेतावनी को गंभीरता के साथ लिया जाना चाहिए। वि·ा युद्ध की चेतावनी निर्मूल साबित हो, यह हमारी कामना और कोशिश होगी किन्तु जो हालात स्थानीय स्तर पर बन रहा है उसके चलते भविष्य संकट भरा दिखता है। पानी न मिलने के कारण आपसी विवाद और इस विवाद के चलते आत्मघाती रास्ते अपनाये जा रहे हैं। एक दूसरे पर सांघातिक वार और कई बार तो जान लेने की नौबत आ जाती है। हाल ही में भोपाल की अदालत ने एक ऐसा ही फैसला दिया है जिसमें बीते वर्ष पानी के विवाद को लेकर हत्या हुई थी जिसमें आरोपियों को आजन्म कारावास की सजा सुनायी गयी।
    यह घटनाएं कानून की नजर में अपराध हैं। आज नगर, जिला, प्रदेश के स्तर पर पानी को लेकर विवाद जारी हैं। इस संदर्भ में यह याद कर लेना चाहिए कि पानी के बंटवारे को लेकर हमारे ही देश के राज्यों के बीच तनातनी का माहौल बना हुआ है। एक देश के ही लोग पानी पर अपना अपना अधिकार जता रहे हैं। अलग अलग मंचों पर समस्या का हल तलाशने का प्रयास जारी है किन्तु यही समस्या आने वाले दिनों में विकराल होने से इंकार करना मुश्किल होगा। देश की सीमा से पार भी पानी के लिये विवाद की स्थिति बनी हुई है और यही विवाद एक दिन वि·ा युद्ध में बदल जाए तो चेतावनी का सच हम सहजता से देख सकते हैं। पानी के लिये स्थानीय विवाद अथवा प्रादेशिक तनाव या कि वि·ा युद्ध एक शिक्षित समाज के लिये कलंक है क्योंकि हमने शिक्षा तो ली किन्तु हमारी शिक्षा अक्षर ज्ञान तक सीमित रह गयी। शिक्षा का अर्थ जागृत होना होता है और जलसंकट को लेकर समूची दुनिया को जागृत होना होगा।
    जलसंकट को लेकर मानवाधिकार हनन की शिकायतें बढ़ रही हैं तो हमारी परम्परा भी संकट में है। अतिथि के घर आने पर सबसे पहले स्वागत जल पिलाकर ही किया जाता था किन्तु अब इसमें कमी दिखायी दे रही है। सेवाभावी संस्थाएं मुसाफिरों के लिये  एकाध किलोमीटर के भीतर कम से कम दो सार्वजनिक प्याऊ का निर्माण करती थी। दूर-दराज से काम की तलाश में आये लोगों-व्यापारियों को भीषण गर्मी में शीतल जल पाकर राहत का अहसास होता था। बीते एक दशक में यह परम्परा टूटती नजर आ रही है। आहिस्ता-आहिस्ता प्याऊ की संख्या में कमी होती जा रही है। प्याऊ की संख्या घटने के पीछे एकमात्र कारण जलसंकट है। पानी की कमी के चलते प्याऊ बंद होते जा रहे हैं। परम्परा के इस क्षरण ने पानी के व्यवसाय को बढ़ाया है। शुद्धता का दावा करती बोतल बंद पानी अब लोग मोल देकर चुका रहे हैं। पानी मानव की बुनियादी जरूरत है और इस पर उसका अधिकार है किन्तु पानी के लिये कीमत चुकाना मानवाधिकार हनन का एक पहलू है। परम्परा के क्षरण और परम्परा के कारोबार में बदलने की यह मानसिकता भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों का यह दायित्व बन जाता है कि वह परम्परा को जीवित रखने में सक्रियता दिखायें। जैसा की ठंड के मौसम में अलाव जलाने के लिये सरकार के पास एक अलग बजट होता है तो ग्रीष्मऋतु में बिना कीमत चुकाये हर आधे किलोमीटर की दूरी पर शासकीय प्याऊ संचालित किया जाकर मानवाधिकार को संरक्षित किया जाए।
    जल और मानवाधिकार को एक दूसरी नजर से भी देखने की जरूरत है। मुझे यहां इस बात का उल्लेख करते हुए प्रसन्नता होती है कि जब भोपाल की जीवनदायिनी बड़ा तालाब सूख गया था तब लगातार अथक प्रयास कर लोगों ने उसे पुनजीर्वित कर दिया। यह परम्परा भारतीय समाज की धरोहर है। अधिकारों के साथ दायित्व निभाने की यह कोशिश मानवाधिकार की रक्षा की दिशा में किये गये प्रयास के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए। मेरा मानना है कि राजधानी भोपाल में जब यह परम्परा को जीवित रखने का प्रयास हो सकता है तो इसकी आवाज दूर-दराज के गांव और कस्बो तक पहुंचाने की जरूरत है। हमारी पुरातन परम्परा रही है कि तालाबों और नदियों को जीवित करने के लिये हम श्रमदान करते हैं। आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवार धन लगाते हैं और बाकि समाज श्रमदान कर इस प्रयास को सार्थकता प्रदान करता है। परम्परा के साथ अधिकार और दायित्व को संबद्ध कर देखा जाए तो हम पाएंगे कि मानवाधिकार की रक्षा में हम कामयाब हो रहे हैं। बार बार और हर बार मानवाधिकार की रक्षा के लिये सरकार या तंत्र से गुहार करने के बजाय हमें स्वयं होकर पहल करनी होगी। जल की बचत करते हैं, जलरुाोतों का संरक्षण और संवर्धन में पहल करते हैं तो निश्चित रूप से हम मानवाधिकार की रक्षा में पहल करते हैं।

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