सोमवार, 5 अगस्त 2013

मीडिया का बाजारवाद

-मनोज कुमार

     मीडिया का बाजारवाद कहें अथवा बाजार का मीडिया, दोनों ही अर्थों में मीडिया और बाजार एक-दूसरे के पर्याय हैं। मीडिया का बाजार के बिना और बाजार का मीडिया के बिना गुजारा नहीं है। दरअसल, दोनों ही एक सायकल के दो पहिये के समान हैं जहां एक पहिया बाहर हुआ तो सायकल विकलांग होने के कगार पर खड़ी होगी। मीडिया का बाजारवाद बहुआयामी अर्थों वाला है। मीडिया से बाजार का संचालन होता है फिर वह मसला खबरों को बेचने और खरीदने का हो, लोगों की भावनाओं को खरीदने या बेचने का हो या समाज की जरूरत की वस्तुओं  की तरफ लोगों को आकर्षित करने का हो। 
ध्यान रहे कि यहां हम मीडिया के बाजारवाद की बात कर रहे हैं न कि पत्रकारिता की। पत्रकारिता का न तो कभी कोई बाजार रहा है और न ही उसका बाजारवाद से कभी कोई रिश्ता बन सकता है क्योंकि पत्रकारिता खरीदने अथवा बेचने की वस्तु नहीं बल्कि वह समाज को दिशा देने का कार्य करती रही है और अपने जिंदा रहने तक यह दायित्व निभाती रहेगी। पत्रकारिता का फलक इतना विस्तारित है कि उसे किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता है। समाज में उपजने वाली विसंगति के केन्द्र में पत्रकारिता है, लोगों की पीड़ा को आवाज देने का नाम पत्रकारिता है, जोर-जुल्म और समाज के ताने-बाने को क्षतिग्रस्त करने वालों के खिलाफ जो आवाज गूंजती है, वह पत्रकारिता है। पत्रकारिता का यह गौरवशाली स्वरूप अपने जन्मकाल से रहा है। पराधीन भारत में पत्रकारिता ने अपने दायित्वों का निर्वहन किया और आज स्वाधीन भारत में पत्रकारिता की ओज कायम है। समाज का विश्वास पत्रकारिता पर है तो इसलिये कि जब उसकी सुनवाई कहीं नहीं होती है तब पत्रकारिता उसकी आवाज बन जाती है। जिस सरकार और सरकारी दफ्तर में आम आदमी की आवाज अनसुनी कर दी जाती है, वहां पत्रकारिता आम आदमी की आवाज बन कर उसे न्याय दिलानेे के लिये तत्पर दिखायी देता है। यह पत्रकारिता की साख है और यही साख मीडिया से उसे अलग बनाता है।
लगभग तीन दशक के आसपास का समय हुआ होगा जब टेलीविजन अवतरित हुआ। पहले पहल तो इसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहकर पुकारा गया लेकिन यह नाम असरदायक नहीं  लगा और पत्रकारिता और टेलीविजन प्रसारण को मिलाकर एक नाम दिया गया मीडिया। कोई पक्के दावे के साथ नहीं कह सकता कि मीडिय नाम की यह चिडिय़ा किस देश से उडक़र भारत में आयी। मीडिया इतना सहज और सरल शब्द लगा कि यह तेजी से लोगों की जुबान पर चढ़ता गया और बिना किसी विरोध मीडिया शब्द ऐसा स्थापित हुआ कि पत्रकारिता नेपथ्य में चला गया और मीडिया का वर्चस्व स्थापित हो गया। 
मीडिया वास्तव में है क्या? मीडिया का शाब्दिक अर्थ हिन्दी में माध्यम होता है। माध्यम अर्थात किसी कार्य को अंजाम तक पहुंचाने का साधन। इस अर्थ में मीडिया का स्वरूप पत्रकारिता से कतई मेल नहीं खाता है क्योंकि पत्रकारिता, मीडिया की तरह साधन नहीं, साध्य है और साध्य एक निश्चित लक्ष्य एवं उद्देश्य की पूर्ति के लिये किया जाता है।
मीडिया शब्द का फौरीतौर पर देखें तो टेलीविजन प्रसारण के लिये प्रयुक्त होता है जहां समाचार है, विचार है, मनोरंजन है, बाजार है आदि-इत्यादि। हालांकि टेलीविजन की अपनी सीमा है किन्तु टेलीविजन प्रसारण जब मीडिया बन जाता है तो उसकी सारी सीमायें टूट जाती है और वह बाजार के मुंह में चला जाता है।  मीडिया इस समय बाजारवाद के शिकंजे में है। मर्यादा और सीमा बाजार के लिये कभी कोई मायने नहीं रखती हैं। शायद यही कारण है कि बाजार ने मीडिया को भी वस्तु मान लिया और खरीद-फरोख्त के स्तर पर पहुंच गया।  बाजार एक मगरमच्छ है और उसका मुंह इतना बड़ा है कि वह हर किसी को निगलने के लिये तैयार है।
पिछले दिनों कुछेक मामले समाज के सामने आये जिनमें मीडिया के खरीद-फरोख्त की सूचनायें शामिल है। मामला अदालत तक पहुंच गया और समाज के सामने सवालिया निशान छोड़ गया है। देने वाला कहता है कि मांगने वाला दोषी और मांगने वाला स्वयं को पाक-साफ बताता है। यह कोई प्रसंग नहीं है कि दोषी कौन? असल बात तो यह है कि लेन-देन की बात ही कहां से आयी? यदि मामला ऐसा है तो यह विचारणीय है कि बाजार ने कहा कि तुम बिको और दूसरे से कहा खरीदो। बाजार अपनी नीति और नियम से चल रहा था। सौदा बना नहीं और टूट गया और इस टूटन में नैतिकता को आड़े लिया गया।  बाजार इस मामले में भी जीत गया क्योंकि इस पूरे सौदे में जो दो शामिल थे, उनका जमकर प्रचार हुआ जिसे समाज बदनामी कहता है किन्तु बदनाम होकर भी नाम कमाने की प्रवृत्ति ने बाजार को विजयी बना दिया।
बाजार के पास नैतिक-अनैतिक शब्द के लिये कोई स्थान नहीं होता है। वह तो नफा और नुकसान पर टिका होता है और उसका झुकाव नफे की तरफ ही होता है क्योंकि व्यापार में नुकसान कोई नहीं उठाना चाहता। बाजार हर उस चीज को बेच देना चाहता है जो बिक रही हो। इस खरीद-बिकवाली में सामाजिक रिश्तों का ताना-बाना भले ही छिन्न-भिन्न हो जाये, इसकी परवाह बाजार नहीं करता है। इन दिनों मीडिया के बाजार में सर्वाधिक बिकने वाला मामला था बलात्कार का। देश की राजधानी नईदिल्ली में हुये वीभत्स बलात्कार के मामले के बाद तो जैसे बलात्कार की बाढ़ सी आ गयी। मीडिया रोज खोद-खोद कर मामले लाता रहा और इस बात का भी ध्यान नहीं रखा कि रोज-रोज की खबरों से किशोरवय के बच्चों के मानस पर क्या असर होगा। मीडिया की रेटिंग ने नैतिकता के सारे पैमाने को किनारे कर दिया। स्मरण रहे कि इसके पहले गड्ढे में गिरा प्रिंस भी मीडिया के लिये हॉटकेक की तरह था जिसे भुनाया गया। प्रिंस के बाद गड्ढे में गिरने वाला हर बच्चा कैमरे की कैद में था। यह और बात है कि मीडिया के प्रयासों से कितने बच्चों की जान बची या आज की तारीख में कितने बच्चों को गड्ढे में गिरने से बचाया जा सका है, इसकी कोई जानकारी नहीं है। हो सकता है कि अब कोई बच्चा गड्ढे में गिर नहीं रहा हो। 
मीडिया का सूत्र वाक्य रहा है कि जो दिखता है, वह बिकता है और वह सबकुछ बेचने पर आमादा है। सामान तो वह बेचने के उपक्रम में जुटा हुआ ही है, वह इमोशन का भी व्यापार करने से चूक नहीं रहा है। मीडिया के घेरे में जब अखबार भी आ जाये तो उसका चरित्र पूरा न सही, थोड़ा तो बदल ही जाता है। कहावत है ना गिरगिट को देखकर गिरगिट रंग बदल ही लेता है, सो अखबारों के बारे में इस मुद्दे पर बहुत अलग राय नहीं बनाया जाना चाहिये। मेरी पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में कस्बानुमा अखबार के पाठकों के बारे में हमें बताया जाता था कि हमारे अखबार के ग्राहक वो सारे लोग हैं जो मैट्रिक अथवा उसके समकक्ष है और यही कस्बाई अखबार जब राजधानी पहुंचा तो इसके मायने ही बदल गये। कल तक आम आदमी का अखबार नौकरशाहों और पूंजीपतियों का अखबार बन गया। यह दुर्भाग्यजनक ही नहीं बल्कि शर्मनाक भी कहें तो संकोच नहीं होना चाहिये।
मीडिया का बाजारवाद का फलक इतना बड़ा है कि वह किसी को नहीं बख्शता है। शर्त यही होती है कि टीआरपी बढऩे तक ही किसी विषय को वस्तु बनाया जाता है। एक टेलीविजन चैनल के हेड बताते हैं कि सुबह सुबह ही यह तय कर दिया जाता है कि आज किस खबर को खेलना है अर्थात उस दिन की सबसे ज्यादा बिकने वाली यानि टीआरपी देने वाली खबर को बार बार दिखाया जाना है। याद रहे कि एक चैनल ने चर्चित आरूषि हत्याकांड को लेकर एक स्पेशल स्टोरी प्लान किया और बता दिया कि आज यह स्पष्ट हो जाएगा कि आरूषि का हत्यारा कौन है? तकरीबन एक घंटे के इस कार्यक्रम में विज्ञापन तो बटोरा गया लेकिन दर्शकों को निराशा ही हाथ लगी। दरअसल, यह एक किस्म की सनसनी फैलाने का मामला है। लम्बे समय से लोग इंतजार में बैठे हैं कि आरूषि के हत्यारों का पता चले और ऐसे में जब एक टेलीविजन चैनल कहता है कि वह इस राज से परदा उठायेगा तो स्वाभाविक है कि दर्शकों की रूचि होगी। दर्शकों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ का यह तरीका बेहद घटिया है।
मीडिया की बातें करते हैं तो यह भी साफ हो जाता है कि मीडिया में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के साथ साथ मुद्रित माध्यम भी शामिल है। बाजारवाद का शिकार मुद्रित माध्यम भी है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है। जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये कुछ खेल-तमाशे करता है, वैसे ही अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने के लिये मुद्रित माध्यम कुछ भी करगुजरने को तैयार है। 
अखबार और पत्रिकाओं की कीमत को जमीन पर लाने से लेकर अखबार, पत्रिकाओं के साथ बाल्टी, साबुन और न जाने क्या क्या उपहार देने के लिये बेताब हैं। मुद्रित माध्यम के पास कंटेंट को समृद्ध करने का कोई प्रयास नहीं दिखता है बल्कि वह शार्टकट तरीके से अपनी प्रसार संख्या को आसमानी ऊंचाई तक पहुंचाना चाहता है। यह राज-रोग किसी एक को नहीं बल्कि लगभग हर प्रकाशन संस्थान को लग चुका है। आज खबरों के नाम पर पाठकों को सूचनायें मिल रही है और जो खबरें आ रही हैं, उसमें भी संदेह की कुछ लाइनें होती हैं। यक्ष प्रश्र तो यह है कि इसमें भेद करे कौन और पहचान कर ठीक करेगा कौन।
मीडिया और पत्रकारिता के बीच एक बड़ा बुनियादी फर्क यह भी है कि एक सीमा के बाद जाकर मीडिया की समाज के प्रति संवेदना खत्म हो जाती है। वह निर्मम होकर बाजार का अनुगामी बन जाता है और बाजार के दिशा-निर्देशों का पालन करने लगता है। उसके सामने बाजार का दिया लक्ष्य और जरूरत होती है और उसी के अनुरूप काम करता है। मीडिया के ठीक उलट पत्रकारिता की प्रवृत्ति है। वह मीडिया की तरह एक सीमा के बाद संवेदनहीन नहीं होता है बल्कि पत्रकारिता की धडक़न समाज की संवेदनाओं में ही बसती है। वह करीब से और बेहद करीब से समाज की भावनाओं  और संवेदनाओं को समझ कर उसकी भावनाओं को व्यक्त करता है। वह जानता है कि किस बात और तथ्य को रखने से समाज आलोकित होगा और किन बातों से सामाजिक संरचना छिन्न-भिन्न हो जाएगी। पत्रकारिता मीडिया की तरह गैरजवाबदार, गैरजिम्मेदार नही हो सका है, इसलिये बाजार उसके नियंत्रण में रहा है न कि पत्रकारिता बाजार के नियंत्रण में।
मीडिया के बाजारवाद का ही परिणाम है कि पिछले एक दशक से पेडन्यूज को लेकर समाज चिंता में है। अधिकाधिक धन बटोरने की प्रवृत्ति ने भ्रामक और झूठे विषय-वस्तु को स्थापित किया और आज बात मीडिया से लेकर पत्रकारिता की विश्वसनीयता को तार तार कर रहा है। पेडन्यूज के संदर्भ में इस बात को समझ लेना भी जरूरी है कि पेड न्यूज, पेडन्यूज न होकर पेड कटेंट होता है। 
कंटेंट से यहां आशय समाचार विश£ेषण एवं फीचर को लेकर है क्योंकि पेडन्यूज में वह गुंजाईश नहीं होती है जो कि कंटेंट एनालिसिस में होती है। मीडिया शब्द की तरह पेडन्यूज भी एक आसान और सरल शब्द है जिसे कहीं भी चलाया जा सकता है। पेडन्यूज के मामले में मीडिया के साथ साथ पत्रकारिता भी कटघरे में है। पेडन्यूज के मामले में मुद्रित माध्यम भी लांछित हुआ है। हालांकि पेडन्यूज की बीमारी आज की नहीं है, यह भी सच है क्योंकि किसी भी सरकार द्वारा अपनी इमेज बिल्डिंग के लिये न्यूज फीचर की सूरत में दिया जाने वाले तथ्य सौफीसद सरकारी होते हैं जिसकी पड़ताल किये बिना ज्यों का त्यों प्रकाशित कर दिया जाता है। यह भी सच है कि ऐसे न्यूज फीचर के साथ मुद्रित माध्यम इम्पेक्ट फीचर, स्पॉटलाइट जैसे उपशीर्षक का उपयोग करते हैं जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह न्यूज का हिस्सा नहीं है बल्कि प्रायोजित है। टेलीविजन के परदे पर यह अलग करना जरा मुश्किल सा काम होता है क्योंकि रोजमर्रा की खबरों के फ्रेम के आसपास विज्ञापनों का जमावड़ा होता है जिसे देखने के बाद यह कह पाना मुश्किल होता है कि परदे पर दिखाया जा रहा न्यूज प्रायोजित है अथवा विज्ञापन को न्यूज प्रायोजित कर रहा है। चुनाव ने दस्तक देना आरंभ कर दिया है और एक बार फिर पेडन्यूज का राक्षस अपना मुंह खोलेगा ताकि वह समूचे मीडिया को निगल जाये, गटक जाये क्योंकि मीडिया का बाजारवाद अपने चरम पर है।
मीडिया का बाजारवाद वास्तव में समाज के लिये घातक बनता जा रहा है। कभी दूरदर्शन से आरंभ हुआ टेलीविजन चैनलों की संख्या सौ से ऊपर जा पहुंची है और लगातार संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। अपराध और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है जिसका समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।  

रविवार, 28 जुलाई 2013

भाव भरी भूमि

-मनोज कुमार
एक साल पुरानी बात है. तब  23 जुलाई को अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की पुण्यभूमि पर जाने का मुझे अवसर मिला था. यह दिन मेरे लिये किसी उत्सव से कम नहीं था. कभी इस पुण्यभूमि को भाबरा के नाम से पुकारा जाता था किन्तु अब इस नगर की पहचान अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के रूप में है. मध्यप्रदेश शासन के आदिमजाति कल्याण विभाग के सहयोग से राज्य के आदिवासी बाहुल्य जिलों में सामुदायिक रेडियो केन्द्रों की स्थापना की पहली कड़ी में यहां दो वर्ष पहले रेडियो वन्या की स्थापना हुई. 23 जुलाई को रेडियो वन्या के दूसरी सालगिरह पर मैं बतौर रेडियो के राज्य समन्वयक के नाते पहुंचा था. मैं पहली दफा इस पुण्य धरा पर आया था. इस धरा पर अपना पहला कदम रखते ही जैसे मेरे भीतर एक कंपन सी हुई. कुछ ऐसा मन में लगा जिसे अभिव्यक्त कर पाना मुश्किल सा लग रहा है. एक अपराध बोध भी मेरे मन को घर कर गया था. भोपाल से जिस वाहन से हम चंद्रशेखर आजाद नगर पहुंचे थे, उसी वाहन में बैठकर मैं और मेरे कुछ साथी आजाद की कुटिया की तरफ रवाना हुये. कुछ पल बाद ही मेरे मन में आया कि मैं कोई अनैतिक काम कर रहा हूं. उस वीर की भूमि पर मैं कार में सवार होकर उसी तरह चल रहा हूं जिस तरह कभी अंग्रेज चला करते थे. मन ग्लानि से भर गया और तत्काल अपनी भूल सुधार कर वाहन से नीचे उतर गया. वाहन से नीचे उतरते ही जैसेे मन हल्का हो गया. क्षणिक रूप से भूल तो सुधार लिया लेकिन एक टीस मन में शायद ताउम्र बनी रहेगी.

बहरहाल, मेेरे रेडियो स्टेशन पर कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद लगभग हजार विद्यार्थियों की बड़ी रैली अमर शहीद चंद्रशेखर की जयकारा करते हुये निकली तो मन खुश हो गया. परम्परा को आगे बढ़ाते देखना है तो आपको चंद्रशेखर नगर जरूर आना होगा. वीर शहीद की कुटिया को सरकार की तरफ से सुंदर बना दिया गया है. इस कुटिया में मध्यप्रदेश स्वराज संस्थान संचालनालय की ओर उनकी पुरानी तस्वीरों का सुंदर संयोजन किया गया है. इस कुटिया में प्रवेश करने से पूर्व ही एक अम्मां मिलेंगी जो बिना किसी स्वार्थ कुटिया की रखवाली करती हैं, जैसे वे अपने देश को अंग्रेजों से बचा रही हों. इस कुटिया के भीतर वीर शहीद चंद्रशेखर आजाद की आदमकद प्रतिमा है जिसे देखते ही लगता है कि वे बोल पड़ेंगे हम आजाद थे, आजाद रहेेंगे. सब-कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने से गुजरती हुई प्रतीत होता है. जब मैं प्रतिमा निहार रहा था तभी एक लगभग 30-35 बरस का युवा अपनी छोटी सी बिटिया को लेकर कुटिया में आया और बिना समय गंवाये नन्हीं बच्ची को गोद में उठाकर उसे इतना ऊपर उठाया कि बिटिया शहीद का तिलक कर सके. उसने यही नहीं किया बल्कि बिटिया को शहीद के पैरों पर ढोक लगाने के लिये प्रेरित किया. नन्हीं सी बच्ची को शहीद और भगवान में अंतर नहीं मालूम हो लेकिन एक पिता के नाते उस युवक की जिम्मेदारी देखकर मन भाव से भर गया. 

एकाएक मन में आया कि काश, भारत आज भी गांवों का देश होता तो अभाव भले ही उसे घेरे होते किन्तु भाव तो नहीं मरते. बिलकुल जैसा कि मैंने चंद्रशेखर आजाद की नगरी में देखा. विकास के दौड़ में हम अपना गौरवशाली अतीत को विस्मृत कर रहे हैं लेकिन यह छोटा सा कस्बानुमा आज भी उस गौरवशाली इतिहास को परम्परा के रूप में आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित कर रहा है. परम्परा के संवर्धन एवं संरक्षण की यह कोशिश ही सही मायने में भारत की तस्वीर है. मैं यह बात बड़े गौरव के साथ कह सकता हूं कि देश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में जितना बड़ा योगदान दिया और इनके शहीदों को जिस तरह समाज ने सहेजा है, वह बिराला ही उदाहरण है. यह वही चीज है जिसे हम भारत की अस्मिता कहते हैं, यह वही चीज है जिससे भारत की दुनिया में पहचान है और शायद यही कारण है कि तमाम तरह की विसंगितयां, विश्व वक्रदृष्टि के बावजूद भारत बल से बलवान बना हुआ है.
दुख इस बात है कि विकास की अंधी दौड़ से अब चंद्रशेखर आजाद नगर भी नहीं बचा है. मकान, दुकान पसरते जा रहे हैं. वीर शहीद के नाम पर राजनीति अब आम हो रही है. हालांकि इसे यह सोच कर उबरा जा सकता है कि विकास होगा तो यह लालच बढ़ेगा और लालच बढ़ेगा तो विसंगतियांं आम होंगी लेकिन यह बात भी दिल को सुकून देेने वाली हैं कि चंद्रशेखर आजाद की नगरी में 23 जुलाई का दिन हर वर्ष दीपावली से भी बड़े उत्सव की तरह मनाया जाता है. अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद को मेरा कोटिश: प्रणाम.

बुधवार, 17 जुलाई 2013

अनाम रिश्ते


मनोज कुमार
इस कठिन समय में समाज जिस भी संकट से गुजर रहा हो लेकिन उसने अपनी पर परा और सहयोग की भावना को विस्मृत नहीं किया है. स्थिति-परिस्थिति, चाहे जैसी हो लेकिन समाज का हर आदमी एक-दूसरे की मदद के लिये तैयार रहता है. समाज का यह जागरूकता ही भारतीय संस्कृति की संवाहक है. इस संस्कृति में जात-पात का कोई अर्थ नहीं होता है. यह सब विश£ेषण और बातें एक समय के बाद बेमानी हो जाती हैं. भारतीय समाज के सामने एक ही शब्द रह जाता है जिसे हम मानवता कहते हैं. मानवता का यह उदाहरण मैंने अपने पचास होते-होते अनेक बार देखा है. कुछ संकोच से कहूं तो कदाचित कुछ लोगों के लिये मददगार भी बना हूं लेकिन इतना बड़ा भी नहीं, उसे ताउम्र स्मरण किया जा सके. लेकिन अपने आसपास जब समाज के इस दानशीलता, सहयोग को देखता हूं तो मन सहज ही भाव से भर जाता है.

यहां एक ऐसी घटना आप लोगों के साथ शेयर करना चाहूंगा जिसका मैं विगत दस वर्षों से अधिक समय से गवाह हूं. मैं इस समय भोपाल में रहता हूं. इसी भोपाल शहर में शिवाजीनगर नाम का मोहल्ला है और इस मोहल्ले के बीच में एक मध्यम दर्जे का बाजार है. अमूनन जैसा बाजार होता है, वैसा ही. रोजमर्रा के जरूरतों का सामान यहां मिल जाया करता है लिहाजा दिन के किसी एक वक्त तो यहां से गुजरना ही होता है. जिन दिनों मैं यहां आया, वह बात लगभग दसेक साल पुरानी होगी. इस बाजार के आसपास एक तिपहया गाड़ी में मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर एक युवक बैठा रहता था. आने-जाने वालों को आवाज देना और आवाज नहीं देने पर उन्हें अपशब्द कहना.

इस विक्षिप्त मन के युवक का यह व्यवहार देखकर मुझे कुछ अटपटा सा लगता लेकिन मेरे से पहले जो लोग उसे जानते हैं, उनके लिये यह एकदम सहज था. कोई उसके व्यवहार को लेकर विचलित नहीं होता था. मौसम चाहे गर्मी का हो, ठंड हो या बारिश का, वह बाजार के इर्द-गिर्द ही रहता था. शायद आहिस्ता-आहिस्ता मैं भी उस युवक की आदत का अ यस्त होता जा रहा था. अब उसका व्यवहार मुझे किसी तरह की दिक्कत नहीं देता था. कुछ और लोगों की तरह मैं ाी उसे अनदेखा कर निकल जाया करता था. एक दिन कुछ फुर्सत में था. मैं उसकी दिनचर्या को समझने की कोशिश में लगा रहा. खैर, मैं अपनी कोशिश में उसकी दिनचर्या तो नहीं समझ सका लेकिन जो देखा और जाना, उसे देखकर मैं स्वयं को कोसने लगा कि आखिर मेरे मन मेे यह सहायता का भाव क्यों नहीं आया.

बहरहाल, मैं विस्मित था. आसपास के दुकानदार समय समय पर उसके खाने का इंतजाम कर जाते थे. चाय की तलब होने पर उसे चाय दे दी जाती थी. दिनचर्या के निपटारे के लिये लोग आते और उसकी मदद कर जाते. यह सिलसिला एक बार या एक दिन का नहीं था, बल्कि सालों से चल रहा था और शायद आने वाले सालों के लिये. समय आहिस्ता आहिस्ता रेंग रहा था और इसी समय के साथ युवक की उम्र पर भी असर दिखने लगा था. वह दस बरस पहले जैसा था, दस बरस बाद भी वह वैसा ही बना रहा और वही क्यों, समाज ने भी अपना व्यवहार नहीं बदला. जो मदद उसकी दस साल पहले की जा रही थी, मदद का वह सिलसिला ज्यों का त्यों बना हुआ है. यह घटना यूं तो बहुत मायने नहीं रखती है लेकिन इसके अर्थ कई हैं. एक ऐसी अर्थवान घटना जो हमारे समय में घट रही है, एक ऐसी सी ा देने वाली घटना जो कह रही है कि जात-पात से ऊपर उठकर मानवता का पाठ पढ़ो. रिश्तों की डोर में बंधो लेकिन अनाम रिश्ते में. एक एैसा रिश्ता जो मानव के साथ मानव का ही हो. 

रविवार, 30 जून 2013

इस आपदा में भी अपना-पराया

-मनोज कुमार

             मानव स्वभाव है कि विपदा कितनी भी छोटी या बड़ी हो, वह अपनों को सबसे पहले तलाश करता है. उत्तराखंड में जो विपदा टूटी है और इस विपदा में अनगिनत परिवारों के लोग एक-दूसरे से बिछड़ गये हैं. मां को बेटे की और पति को पत्नी की कोई खबर नहीं है. किसी का कोई तो किसी का कोई, गुम है अथवा गुमनाम. वह घर लौटेगा भी या नहीं, एक अनिश्चित सा माहौल है और ऐसे हालात में अपनों की तलाश पहली जरूरत और चिंता होती है और होनी भी चाहिये. एक परिवार या व्यक्ति अपने लोगों की चिंता करता है तो यह स्वाभाविक है किन्तु एक राज्य जब अपने नागरिकों की चिंता करता है तो यह अस्वाभाविक व्यवहार लगता है. उत्तराखंड में आया जलजला और उससे विनाश अकेले उत्तराखंड की पीड़ा और तकलीफ नहीं है बल्कि यह समूचे देश की पीड़ा और तकलीफ है और इसे राष्ट्रीय तकलीफ के रूप में देखना होगा.

              उत्तराखंड में टूटी विपदा के बाद देश के अलग अलग राज्यों ने अपने अपने स्तर पर सहायता के लिये पहुंच गये हैं. पहुंच रहे हैं और सहायता का अनवरत सिलसिला जारी है. इस बात की तारीफ होनी चाहिये कि राज्य सरकारों ने अपने अपने स्तर पर प्रयास किया और जिसका सकरात्मक परिणाम सामने आने लगा है किन्तु राज्य सरकारों का यह व्यवहार समझ से परे है कि सारे राज्य चिन्ह चिन्ह कर ही अपने लोगों को ही क्यों बचा रहे हैं? जिस राज्य की सरकार जहां खड़ी है और विपदा में फंसा आदमी गुहार कर रहा है तो क्या वहां भी उससे उसे अपने प्रदेश के होने की आइडेंटी देनी होगी तभी उसके प्राणों की रक्षा हो सकेगी? जो सूचनायें और खबरें आ रही है, उससे यही ध्वनि निकल रही है कि फलां राज्य ने अपने इतने लोगों को बचा लिया. एक भी खबर मेरे संज्ञान में नहीं है कि अमुक प्रदेश के सहायता दल ने विपदा में फंसे दूसरे राज्यों के लोगों को बचा लिया. यह कम विस्मयकारी नहीं है कि इस आपदा में भी राज्य सरकारें अपने अपने लोगों की चिन्हारी कर रही हैं. राज्यों के इस बचाव अभियान को लेकर यह तर्क दिया जा सकता है कि किसी भी राज्य की प्राथमिकता अपने प्रदेशवासियों की सुरक्षा का है तो इससे भी असहमत नहीं हुआ जा सकता है किन्तु सवाल यह है कि यह आपदा नैसर्गिक है और इस नैसर्गिक आपदा में कोई अपना-पराया कैसे हो सकता है? दुर्भाग्य से ऐसा होता दिख रहा है. हर राज्य आंकड़ें प्रस्तुत कर रहा है कि इतने लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है.

               उत्तराखंड में जो आपदा टूटी, उसके पीछे सिर पर खड़े चुनाव में लोगों की भावनाओं को अपने पक्ष में करने की बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. देश के पांच राज्यों में लगभग चार महीने बाद चुनाव होना है और कुछ नहीं बिगड़ा तो एक वर्ष बाद आमचुनाव होंगे. ऐसे में लोगों को अपने पक्ष में करने का यह अवसर दुर्लभ है और इसका लाभ लिये जाने में कोई बुराई नहीं है. यदि ऐसा नहीं होता तो कोई भी अपने ही लोगों की चिन्हारी करने के बजाय सबकी मदद के लिये आगे आते. अच्छा होगा कि मैं जो सोच रहा हूं, वह गलत निकले तो मन को राहत मिलेगी. क्योंकि जो कुछ हो रहा है और जो कुछ देखने को मिल रहा है, वह दुर्र्भाग्यपूर्ण है. एक तथ्य यह भी सामने आया है कि अब तक दुनिया का कोई भी देश भारत की मदद के लिये सामने नहीं आया है. उत्तराखंड की विपदा इतनी छोटी नहीं है कि वह संसार के देशों का ध्यान खींच न सके लेकिन अब तक ऐसी सूचना मेेरे देखने सुनने में नहीं आयी है. भारत के लोग इतने संबल और आत्मविश्वास से भरे हैं कि वे तकलीफों से दुखी तो जरूर होते हैं लेकिन फिर दुगुने उत्साह से स्वयं को खड़ा कर लेते हैं. उत्तराखंड की आपदा पहली बार नहीं है और न ही देश का यह पहला राज्य है इसलिये हम उम्मीद करते हैं कि लोग आपस की मदद से एक बार फिर उठ खड़े होंगे. 

सोमवार, 3 जून 2013

जनजातीय संग्रहालय मध्यप्रदेश की पहचान एवं शान



संस्कृति मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा से सुनील मिश्र की बातचीत

मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग ने प्रदेश में निवासरत जनजातियों की संस्कृति, उनके रहन-सहन पहनावे खेती-किसानी की पद्धति और उनके आध्यात्मिक लोक से नगरीय जीवन का परिचय कराने के उद्देश्य से की है। जनजातियों के जीवन से नगरीय सभ्यता को बहुत कुछ अभी सीखना बाकी है। हजारों वर्षों से जनजातियाँ थोड़े से संसाधनों में जीवन को रसपूर्ण जीती रही हैं। हमने अपने नगरीय जीवन में भौतिक संसाधनों को इतना अधिक एकत्र कर लिया है कि हमारे घरों में खुद के रहने के लिए जगह कम हो गई है। हमारे समाज में चारों ओर अजीब तरह की विद्रूपताएँ फैली हुई हैं। पूरा समाज एक तरह की गलाकाट प्रतियोगिता में संलिप्त है। इससे हमें यह तो समझना ही होगा कि संसाधनों का जीवन को रसपूर्ण बनाने में कोई विशेष योगदान नहीं है। हमारा सौभाग्य था कि हमें संस्कृति जैसा महकमा मिला। जनजातीय समुदायों और उनकी संस्कृति को नजदीक से देखने का अवसर मिला। मुझे ऐसा लगता है कि संग्रहालय जिन उद्देश्यों से बनाया गया है, आने वाले समय में उसकी सार्थकता नगरीय समाज में हमें देखने को मिलेगी।

शिल्प निर्माण के संसाधन
जनजातीय जीवन अपने परिवेश में उपलब्ध संसाधनों से ही अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करता है। मिट्टी, घास, बाँस, लकड़ी, रस्सी, लोहा, पुआल और इसी तरह की बहुत सी ऐसी सामग्रियाँ हैं, जिनसे वह अपने कला-कौशल को भी प्रदर्शित करता है। संग्रहालय में भी उन्हीं वस्तुओं का इस्तेमाल किया गया है जो क्षेत्रीयता में इन समुदायों द्वारा उपयोग की जाती हैं।

शिल्प संग्रहण से स्रोत
मध्यप्रदेश में निवासरत सभी जनजातीय समुदायों से उनके जीवन से जुड़े उपयोग के सभी सामान प्रदेश के सभी पचास जिलों से संग्रहीत किये गये हैं। जनजातीय अध्येताओं, विशेषज्ञों, सर्वेक्षणकर्ताओं की हमनें एक टीम गठित की जिसने प्रदेश के सभी जिलों में जाकर वहाँ से सामग्रियाँ संग्रहीत की हैं।
जनजातीय परम्पराएं
संग्रहालय में जनजातीय मौखिक परम्पराओं के बहुविध शिल्पों को मुख्यतयः प्रदर्शित किया जा रहा है। जनजातियों का पूरा जीवन ही एक न एक परम्परा से आबद्ध होता है। देशज ज्ञान पद्धतियाँ पारस्थितिक जीवन के सभी प्रश्नों और समाधानों से सम्पुष्ट होती हैं। अलग से किसी पद्धति या निर्देशन की आवश्यकता जनजातियों को नहीं होती। उनकी अपनी सामाजिक और आध्यात्मिक मान्यताएँ हैं, जिसके प्रति समाज का प्रत्येक व्यक्ति उत्तरदायी है। कोई भी व्यक्ति उन मान्यताओं को उल्लंघन नहीं कर सकता है। यह अलिखित आचरण किसी भी नैतिक समाज से कहीं अधिक कारगर है। संग्रहालय में प्रदर्शित अलग-अलग कला बिम्ब जनजातीय समृद्ध परम्परा का प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं।

अतिथि राज्य की दीर्घा
यह सही है कि संग्रहालय में एक दीर्घा अतिथि राज्यों के जनजातीय वैभव को प्रदर्शित करने के लिए बनाई गई है। पहली बार हम यहाँ अभी हाल ही में अलग हुए छत्तीसगढ़ राज्य के जनजातीय वैभव को प्रदर्शित कर रहे हैं। एक दीर्घा अतिथि राज्यों पर केन्द्रित करने के पीछे यह उद्देश्य है कि हम दो-चार वर्ष में इसमें अलग-अलग राज्यों की जनजातीय संस्कृति को प्रदर्शित करते रहेंगे। एक समय ऐसा हो सकेगा कि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में पूरे भारत के जनजातीय वैविध्य को इस तरह से हम संग्रहीत कर पायेंगे और उनके व्यवस्थित प्रदर्शन का प्रबंधन भी कर सकेंगे। वैसे भी राज्य राजनैतिक विभाजन के परिणाम हैं। सांस्कृतिक एकात्मकता का इससे कोई लेना-देना नहीं है। सांस्कृतिक रूप से सभी जनजातियों में एक स्तर पर समरूपता देखने को मिलती है। इस तथ्य को हम तभी प्रमाणिक बना सकते हैं जब एक ही स्थान पर हम उसके समरूप को देख सकें।

शिल्प निर्माण जनजातीय कलाकारों की भूमिका
मध्यप्रदेश में निवासरत 41 जनजातीय समूहों में से प्रमुख रूप से उन जनजातियों को आमंत्रित कर शिल्प रचने का दायित्व दिया गया था जिनसे सांस्कृतिक विविधता का आभास होता है। कोल, बैगा, भारिया, सहरिया, कोरकू, भील और गोण्ड जनजातियों तथा इनकी उपजातियों के अलग-अलग माध्यमों में काम करने वाले शिल्पी आमंत्रित किये गये। संग्रहालय में ही रहकर इन कलाकारों ने अपनी ही परम्पराओं को रचने का उद्यम किया है।

संग्रहालय स्थापना में मुख्यमंत्री का प्रोत्साहन
माननीय मुख्यमंत्री जी का यह स्पष्ट मानना रहा है कि विकास सिर्फ भौतिक समृद्धि ही नहीं है। जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं कि प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री ने सभी आयुवर्गों के लिए कोई न कोई एक योजना सफलतापूर्वक क्रियान्वित की है, जिसके परिणाम और सुफल से आप सभी परिचित हैं। इस बात पर अधिक कुछ कहने का यह मंच नहीं है। बावजूद इसके माननीय मुख्यमंत्री जी की उदारता का ही यह परिणाम है कि यह संग्रहालय स्थापित हुआ है। मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक समृद्धि को एक ही जगह पर देखने-समझने और अनुभूत करने वाले जिज्ञासु पर्यटकों, जनजातीय जीवन में उत्सुक अध्येताओं, विशेषज्ञों और शोधार्थियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में काम करेगा, ऐसी आशा है।

संग्रहालय के संदर्भ में जनजातीय कलाकारों का सोच
जनजातीय जीवन और उनके सौन्दर्यबोध को अभिव्यक्त करने के केन्द्र के रूप में संग्रहालय बनाये जाने का दायित्व जब हमारे विभाग को दिया गया, तब ही इसकी चुनौती का आभास हो गया था। भोपाल में जनजातियों का संग्रहालय बनाना वह भी तब जब एक ओर मानवीय उद्विकास को अभिव्यक्त करता मानव संग्रहालय और दूसरी ओर कला वैशिष्ट के केन्द्र के रूप में स्थापित भारत भवन स्थित हों। इन दोनों ही संस्थानों में जनजातियों के बहुविध शिल्प अपनी तरह से प्रदर्शित हैं। हमने राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों की एक कोर कमेटी बनाई, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञों को रखा गया, उनसे चर्चायें की गईं। शुरुआती दौर में ही हमने विशेषज्ञों के सामने यह चुनौती प्रस्तुत कर दी थी कि हमारे जनजातीय जीवन के प्रदर्शन में कोई स्थिरता न आये, जिससे प्रवहमान परम्परा को किसी तरह की क्षति हो। विशेषज्ञों ने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुये एक ऐसा केन्द्र सृजित किया है, जिसमें उनका परिवेश और उससे जुड़ी जीवन की चुनौतियाँ यथानुकूल प्रस्तुत करने की कोशिश की है।
प्रदेश भर से अलग-अलग समुदायों के जनजातीय कलाकारों को बुलाया गया, उन्हें बिना किसी भी प्रकार का निर्देश दिये हुये अपने ही जीवन और उपयोग की वस्तुओं को रचने का आग्रह किया गया और इन कलाकारों ने पूरी निष्ठा और सरलता के साथ उसे कर दिखाया। मेरे अनुभव में जनजातीय कलाकारों से बात करने पर यह आया कि वे विचार में कम व्यवहार में अधिक हैं। मुझे ऐसा लगा कि संस्कृति विभाग का यह उद्यम उन्हें भी पसन्द आया है।

संग्रहालय की गतिविधियां

प्रायः यह आम अवधारणा है कि संग्रहालयों में सभ्यताओं, स्मृतियों का अवशेष प्रदर्शित किया जाता है। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय लुप्तप्राय या मृतप्राय वस्तुओं के प्रदर्शन का केन्द्र न होकर जीवन के व्यवहार की सामग्रियों के प्रदर्शन का केन्द्र है। जीवन्तता ही इस संग्रहालय की अभिनवता है। इसी अनूठेपन को बचाने के लिए हमारी यह कोशिश होगी कि दीर्घाओं में प्रदर्शित प्रत्येक शिल्प दैनन्दिन व्यवहार में भी रहें। इसके लिए प्रत्येक दीर्घा में विषय के अनुकूल एक न एक परिवार हमेशा यहाँ विद्यमान रहेगा। अपने जीवन जीने की कला से नगरीयजनों को भी सम्पृक्त करेगा। यहाँ निर्मित घर या अन्य रूपाकार रोज लिपाई-छपाई-पुताई-रंगाई-धुलाई-पुछाई आदि की मांग करते हैं। यह सब भी प्रदर्शन का हिस्सा होगा।
जनजातियाँ आकार में छोटी तथा सीमित संख्या में वस्तुओं का उपयोग करती हैं। यह उनके जीवन और उनकी परम्परा का हिस्सा है। हमारे नगरीय जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब जबकि छोटे आकार के घरों में निवास करने को मजबूर हुआ है, उसे और जो हर तरह की बाजारू वस्तुओं से घिरा हुआ है, उसे भी आकार में छोटी वस्तुओं की जरूरत आन पड़ी है। ऐसे में जनजातीय तकनीक और समकालीन जरूरतों अनुसार बहुविध शिल्पों एवं वस्तुओं के रचने के केन्द्र के रूप में भी इस संग्रहालय को उपयोग होगा। वर्षभर अलग-अलग माध्यमों की कार्यशालाएँ यहाँ चलती रहेंगी। इस तरह का हम प्रयास कर रहे हैं।

निजी अनुभव
संग्रहालय का लोकार्पण 06 जून, 2013 को भारत के माननीय राष्ट्रपति महोदय कर रहे हैं। मध्यप्रदेश की जन आकांक्षा भी यही थी कि अपनी तरह के अकेले और अनूठे इस जनजातीय संग्रहालय के अवलोकन से मध्यप्रदेश की जनजातीय सांस्कृतिक समृद्धि के साक्षी माननीय राष्ट्रपति महोदय हों।
जैसा कि मैंने आपसे पहले भी निवेदन किया है कि इस संग्रहालय की स्थापना का सारा श्रेय मध्यप्रदेश की जनजातियों को ही है। संस्कृति मंत्री होने के नाते मैं बार-बार संग्रहालय को बनते हुये देखने के लिये गया हूँ। वहाँ काम कर रहे कलाकारों से बात भी हुई है। उनका उत्साह देखकर मुझे हमेशा ऐसा लगा कि यह संग्रहालय जैसे उनका घर हो और वे पूरी आत्मीयता और निष्ठा के साथ अपने काम को तल्लीनता से करते हुये दिखे।
जनजातीय समाज की रंग कल्पना और शिल्प सर्जना के क्षेत्र की व्यापकता पर
वैसे तो इस प्रश्न का उत्तर कलाकारों के पास है। मेरी भूमिका एक दर्शक से अधिक नहीं है। हाँ, यह जरूर है कि मुझे एक ही विभाग में दस वर्षों से काम का अवसर प्राप्त हुआ है। इन वर्षों में कर्मियों और कलाकारों से एक व्यक्तिगत पहचान निर्मित हुई है। जाहिर है इससे मुझे अधिक लाभ हुआ है। जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ हमारे आस-पास जिन चीजों की कमी होती है, उसे हम कृत्रिम रूप से पूरा करते हैं। जनजातीय रंग कल्पना के मूल में यही तथ्य काम करता हुआ दिखता है। जनजातीय कलाएँ प्रकृति के प्रति धन्यता को प्रकट करती हैं। सम्भवतः यही कारण है कि सर्जना का क्षेत्र बहुत विस्तीर्ण और व्यापक है। रचना भी इसी आयाम में देखी जानी चाहिये।

अध्येताओं, शोधार्थी, विद्यार्थियों और जनसामान्य के लिए
जनजातीय जीवन्तता की प्रवहमानता को हमने सिर्फ संग्रहालय से गुजारा है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि इस संग्रहालय का प्रत्येक रूपाकार जनजातियों ने स्वयं अपनी परम्परा और मान्यता के तहत स्थापित किया है। हमने इस संग्रहालय के माध्यम से समकालीन भाषा और स्थिति में प्रदर्शित भर किया है। वे लोग जो सम्पूर्ण मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को अनुभूत करना चाहते हैं, वे एक ही स्थान पर इसको देख और अपनी जिज्ञासाओं को शान्त कर सकेंगे। मेरा मानना है कि सही अर्थों में किसी सभ्यता को समझने के लिए उसका समकालीन भाष्य होना चाहिये। हमारी शैक्षणिक पद्धतियाँ हमें बहुविध जानकारियों के लिए समृद्ध बनाती हैं। संज्ञान की अनुभूति के लिए हमें परम्पराओं की सन्निधि में जाना ही पड़ता है। इन अर्थों में यह संग्रहालय उत्सुकों के काम का होगा, ऐसी आशा है।
जनजातीय आख्यानों, मिथकों, परम्पराओं के चुनाव के पीछे परिकल्पना
मैंने आपको पहले भी बताया है कि राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों की एक समिति हमने गठित की थी। इसके साथ ही वाचिक पक्षों पर गहन अध्ययन और सर्वेक्षण का काम करने वाले विशेषज्ञों को भी हमनें जोड़े रखा। हमारी विभागीय संस्था पहले से ही वाचिक साहित्य परम्पराओं पर काम कर रही थी। जनजातीय आख्यानों के संकलन और अनुवाद पहले से ही हमने प्रकाशित किये हुये हैं। वह सभी विभागीय अनुभव इस संग्रहालय की स्थापना में काम आया। दीर्घाओं के विषय निर्धारण से यह स्पष्ट हो गया था कि किस कथा का उपयोग कहाँ किया जाना है और यह भी कि कौन सी कथा रूप ग्रहण करने में समर्थ है। कथाओं के चयन में यह बारीक बात जरूर ध्यान में रही कि पारम्परिकता को किसी भी स्थिति में क्षति नहीं पहुँचनी चाहिये। कथाओं का शिल्पांकन होना एक तरह से परम्परा के विस्तार की तरह से देखा जाना चाहिये।

जिज्ञासुओं के लिए प्रावधान
संग्रहालय में प्रदर्शित सभी प्रादर्शों के बारे में हिन्दी और अंग्रेजी में जानकारी पर्यटकों, दर्शकों के लिए उपलब्ध रहेगी। हमारी योजना आने वाले समय में ऑडियो-गाइड-टचस्क्रीन आदि आधुनिक तरीकों से जनपदीय-जनजातीय-हिन्दी-अंग्रेजी भाषाओं में दृश्य-श्रव्य माध्यम में उपलब्ध कराने की रहेगी। हम यह भी प्रयास करेंगे कि जनजातीय जीवन की दैनन्दिन गतिविधियों के वर्ष चक्र पर आधारित फिल्में निर्मित की जायें जिनका प्रदर्शन संग्रहालय में सुनिश्चित हो। जनजातीय जीवन में हो रहे परिवर्तन के आकलन में भी इस तरह के दस्तावेजीकरण बहुत महत्वपूर्ण होंगे।
संग्रहालय में प्रदर्शित सभी प्रादर्शों के बारे में चाक्षुष वर्णन तो होंगे ही, हमारी यह भी कोशिश होगी कि प्रदर्शित शिल्प के बहाने उसके आत्यंतिक अर्थ को अभिव्यक्त किया जाये। लक्ष्य स्पष्ट है कि जनजातीय चैतन्य को साक्षर लोगों के मध्य सम्मानजनक दर्जा प्राप्त हो।
जनजातीय समुदाय की कलाभिव्यक्ति के मानक अथवा समकालीनता 
जनजातियों की कलाभिव्यक्ति का आधार परम्परा है। रचनाधर्मिता तो समकालीन होगी, परम्परा की सन्निधि से कलाभिव्यक्ति से आशय है कि एक स्मृति का संसार रचना में काम करता है। चूंकि रचनाधर्मिता में स्मृति काम करती है, इसलिए प्रयोग के लिए जगह तो है किन्तु, परम्परा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा जनजातीय समुदाय से आने वाले किसी कलाकार के द्वारा किया जाता है, तो वह सामुदायिक रचना नहीं मानी जाती।

शहरी और आदिवासी समाजों से संवाद के संदर्भ में
हमने पहले भी इसके बारे में आपको बताया है कि इस संग्रहालय की स्थापना के मूल विचार ही नगरीय और जनजातीय समाजों के बीच निर्मित खांई को पाटने के उद्देश्य से किया गया है। मेरा मानना है कि जीवन के आत्यंतिक अनुभव के सार को भौतिक रूप से जीने वाला जनजातीय समाज सिर्फ जीवन की बात करने नगरीय समाज से किस रूप में कम समृद्ध है। इसको प्रायोगिक रूप से इस संग्रहालय के माध्यम से दिखाना और समझाना है। एक बार यह समझ यदि पैदा हो जाये कि कम से कम वस्तुओं में जीवन के आनन्द का अनुभव किया जा सकता है, तो शायद वस्तुओं की दौड़ में लगे नागर समाज को कुछ क्षण के लिए ही सही ठहराव की अनुभूति दिलाने में मदद करेगा।

आयोजनधर्मी छवि से अलग कार्य 
जीवन, नर्तन और मौन दोनों की ही मांग करता है। ठीक वैसा ही एक विभाग के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिये। प्रदर्शन और संस्कृतियों के दस्तावेजीकरण दोनों ही संस्कृति विभाग के दायित्व हैं। मुझे प्रसन्नता है कि विभाग इन दोनों ही आयामों में सक्रिय है। महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य दोनों ही क्षेत्रों में सम्पादित किये हैं। प्रसंगवश हम आपको बताना चाहेंगे कि हमारे विभाग ने उज्जैन, ग्वालियर और जबलपुर में बहुउद्देश्यीय सांस्कृतिक संकुल, ग्वालियर में राजा मानसिंह कला केन्द्र का निर्माण, भोपाल में राज्य नाट्य विद्यालय तथा सांची में बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना और तीर्थ एवं मेला प्राधिकरण का गठन अभी हाल ही में किया गया है। बहुआयामी कला, संस्कृति और परम्परा के अध्ययन, प्रदर्शन, संरक्षण और सम्मान की दिशा में विभाग ने कार्य किया है और निरंतरता में जारी भी है। इन प्रयासों से संस्कृति विभाग ने राज्य में एक बेहतर माहौल बनाया है। निश्चय ही इससे गौरव का अनुभव होता है।

संग्रहालय में प्रदर्शित प्रादर्शों की प्रतिकृतियों के विक्रय की योजना
जैसा कि देश और दुनिया के संग्रहालयों में सोवीनियर शॉप हैं। वैसा ही प्रावधान यहाँ भी हमने किया है। जनजातीय विभिन्न पारम्परिक शिल्पों के अलावा यह संग्रहालय शिल्पों के समकालीन उपयोग को लेकर कुछ प्रयोगधर्मी कार्य भी करेगा। इससे नगरीय समुदायों के उपयोग के लिए शिल्पों की एक ओर जहाँ निर्मिति और खपत होगी, वहीं जनजातियों के लिए रोजगार के स्थायी अवसर भी प्राप्त होंगे। जब तक सुनिश्चित बाजार का प्रबंधन नहीं हो, तब तक परम्परा के कलारूपों के संरक्षण की बात सार्थक नहीं होगी।

दृश्य श्रव्य रिकार्डिंग और अन्य तकनीकी पहलू
जीवन के बहुविध प्रवाह को इस संग्रहालय के माध्यम से प्रदर्शित किया जाना सुनिश्चित किया गया है। जाहिर है, इस लक्ष्य को पूरी तरह से रूपायित नहीं किया जा सकता। जीवन के बहुविध ऐसे पक्ष हैं, जिन्हें आधुनिक माध्यमों में दस्तावेजीकृत कर ही दूसरों के लिए प्रदर्शित किया जा सकता है। जनजातीय जीवन को समग्रता में देखने-समझने में जितना उपयोगी उनका रूपगत संसार है, उससे कहीं अधिक अभौतिक जीवन है, जिसे अभिव्यक्त करने के लिए दृश्य-श्रव्य माध्यमों के बगैर नहीं बताया जा सकता। हमने इसी लक्ष्य से संग्रहालय में एक आधुनिक ऑडियो-वीडियो स्टूडियो की स्थापना भी की है। आने वाले समय में हम प्रदेश की प्रमुख जनजातियों के पूरे वर्षचक्र में घटने वाली घटनाओं, स्थितियों का दस्तावेजीकरण करेंगे और उन्हें इस संग्रहालय के माध्यम से प्रदर्शित भी करेंगे।

संग्रहालय के प्रति निजी अनुभव
अनुभव, जिसे हम अपने पूर्वजों, समाज, परिवेश, भूगोल, रोजमर्रा की चुनौती, हास-परिहास से सीखते हैं। जाहिर है, यह सब भाषा में नहीं होता। इसका अधिकांश मौखिक है, जिसे हम देखते हुये सीखते हैं। यही आचरण हम अपने आने वाली पीढ़ी से भी करते हैं। संग्रहालय के संदर्भ में देशज ज्ञान से हमारा यही आशय है कि जनजातीय जीवन का अनुभूत ज्ञान यहाँ रूपायित और प्रदर्शित हो। साक्षर समाज भी अनुभूत ज्ञान से अपना तादात्म्य स्थापित करे।
हमारी ज्ञान परम्परा में एक आश्रम का प्रावधान ही वानप्रस्थ के रूप में किया गया है। इसके बाद के आश्रम को ज्ञान परम्परा ने संन्यास आश्रम के नाम से अभिहीत किया है। स्पष्ट है संन्यास के लिए वानप्रस्थी होना अनिवार्य है। यह सारा प्रबंधन लोक समाज ने किया था। जो वन में पहले से ही निवासरत है, उसे ज्ञान के लिये कहाँ जाना है, जनजातीय संग्रहालय को बनते हुये देखने से हमें ऐसा हमेशा महसूस हुआ है कि जनजातीय जीवन और उसमें सामग्रियों की सीमित उपस्थिति उनके वानप्रस्थी और संन्यस्थ होने का प्रमाण है।
प्रसंगवश एक बात और कहना चाहूँगा, वह भी संग्रहालय को बनते हुए देखने से ही अनुभूत हुई है। वह यह कि जनजातियों के कला-रूपाकारों में आवृत्तियाँ अनिवार्य रूप से विन्यस्त हैं। एक ही आकार, आकृति और रूप को बार-बार एक ही कृति में रचा हुआ हमें देखने को मिलता है। पुनरावृत्ति मन के स्वभाव के विपरीत का आचरण है। मन हमेशा नये की खोज में उत्सुक है। एक क्षण भी किये का दोहराव नहीं करना चाहता। धरती के सभी धर्मों की गहरी देशणाओं और आचरणों में यही तो अनुस्यूत है, जिससे मन की गति को ठहराव मिले। मुझे यह हमेशा लगता है कि ज्ञान का यदि व्यवहारिक रूप देखना है, तो जनजातियों की कलाओं में उसकी प्रमाणिकता को अनुभव किया जा सकता है।

भविष्य में संग्रहालय के विस्तार की योजना
मध्यप्रदेश में निवासरत जनजातियों के जीवन, मौखिक साहित्य, कला परम्परा और उनकी मान्यताओं के बहुविध शिल्प स्वरूपों के प्रदर्शन के साथ ही यह भी योजना है कि जनजातीय बोलियों और बोलियों से निर्मित संस्कृति और उसके साहित्य का व्यापक प्रचार-प्रसार और स्वीकार बने, इसके लिए सामुदायिक रेडियो और जनजातीय चैनल की स्थापना की जायेगी। 
यह संग्रहालय जनजातीय जीवन्तता को अभिव्यक्त करने का एक अन्तर्राष्ट्रीय मंच बने। स्मृति अवशेष को संग्रहीत कर प्रदर्शित करने की संग्रहालय की मर्यादा से परे यह संस्थान अपनी जगह बनाये। जनजातीय संस्कृति, उनके देशज ज्ञान और सौन्दर्यबोध का व्यापक प्रचार-प्रसार और नागरिकजनों में स्वीकार बने, यहीं आकांक्षा है।

बुधवार, 29 मई 2013

ऐसे भी थे पत्रकार


 manoj kumar
साथियों, हिन्दी पत्रकारिता दिवस के इस महान अवसर को स्मरण करते हुये आप सभी प्रतिबद्ध साथियों को मेरा नमस्कार, बधाई.  हिन्दी पत्रकारिता दिवस के ठीक दो दिन पहले मुझे एक अनुभव से गुजरने अवसर मिला. इस अनुभव को आपके साथ बांटने में मुझे आनंद का अनुभव होगा.

भोपाल में अपने जमाने की तेवर वाली पत्रकार श्रीमती प्रभा वेताल से लगभग सभी लोग परिचित होंगे. उनके समकालीन लोगों को तो वे स्मरण में होंगी ही. मैं जब रायपुर से भोपाल पत्रकारिता करने आया तो उनका नाम कई कई बार सुना. उनके बारे में जो सुना तो कुछ अच्छा नहीं लगा क्योंकि उनके बारे में बतायी गयी सारी बातें नकरात्मक थीं. मेरी आदत है कि जब तक मैं स्वयं अनुभव नहीं कर लूं, किसी के कहे पर यकिन नहीं करता. आज शायद यह आदत मेरे लिये लाभकारी रही. एक पुराने पत्रकार, जिनका प्रभाजी के साथ थोड़ा-बहुत उठना-बैठना था. बात ही बात में उनके बारे में कहने लगे-एक प्रभा भाभी थीं. कभी कोई गलत काम नहीं किया और न ही किसी प्रकार का कोई गलत लाभ लिया. इस संदर्भ में उन्होंने एक वाकया सुनाया. 

प्रभाजी की एक आंख में कोई बड़ी समस्या थी. मामला आंख के रिप्लेसमेंट तक का था. उन दिनों इसका खर्च भारी था. उन्होंने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह के समक्ष अपनी समस्या रखी. मुख्यमंत्री ने कहा कि वे पैसों की चिंता न करें, वे उनकी मदद करेंगे. इस पर प्रभाजी का जवाब था- मदद आपसे नहीं, जनसम्पर्क में पत्रकार निधि है, उससे दिलवा दीजिये. मुख्यमंत्री ने हामी भरी और मदद मंजूर हो गयी. इस बीच किसी महिला ने नेत्रदान करने की घोषणा की थी और उसकी मृत्यु हो गई. उसकी एक आंख प्रभाजी को मिल गयी. आंख बदलवाने से लेकर अन्य खर्च को मिलाकर कुल जमा दस हजार का खर्च आया. प्रभाजी ने बचे दस हजार रूपये उस महिला के परिवार वालों को दे दिये. कुछ उनके शुभचिंतकों ने ऐसा करने पर ऐतराज जताया तो प्रभाजी ने कहा कि मैं उस महिला की आंख से देख रही हूं तो उस परिवार को देखने की मेरी नैतिक जवाबदारी है. इसलिये बचे दस हजार पर तो उनका ही हक बनता है.

यह संस्मरण मुझे भीतर तक कंपकंपा गया. इतनी नैतिकता? यकिन नहीं होता लेकिन वाकया सुनाने वाला कोई हल्का आदमी नहीं था. उन्होंने बेहद निरपेक्ष भाव से उनके बारे में जब बताया तो मेरा मन प्रभाजी को लेकर श्रद्धा से भर गया. शायद तभी कहते हैं कि पहले की पत्रकारिता असरदार होती थी. संयोग है कि आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस है और इस अवसर पर प्रभाजी के बारे में यह संस्मरण आप लोगों के साथ बांटकर मैं खुद को बेहद आनंदित महसूस कर रहा हूं. मेरे नये साथियों को मुफ्त की सलाह यह है कि बिना परखे किसी के बारे में कोई राय न बनायें. सुनें और गुनें, तब उस पर कोई बात करें. 

प्रभाजी को मेरा सादर नमस्कार.

शनिवार, 25 मई 2013

अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह-2013 भोपाल में

           तृतीय अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह-2013 का उद्घाटन जनजातीय संग्रहालय भोपाल में आयोजित होगा। 10 जून से 13 जून तक आयोजित फिल्म समारोह में भारत सहित 33 देश हिस्सेदारी कर रहे हैं। इस फिल्म समारोह में 70 से अधिक फिल्मों का प्रदर्षन किया जाएगा। आदिम जाति कल्याण विभाग का प्रतिष्ठान वन्या का प्रतिष्ठा आयोजन तृतीय अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह-2013 में फिल्मों का प्रदर्शन जनजातीय संग्रहालय एवं राज्य संग्रहालय में किया जाएगा।

          उल्लेखनीय है कि वन्या द्वारा तीसरी दफा फिल्म समारोह का आयोजन किया जा रहा है। 10 जून को तृतीय अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह-2013 का उद्घाटन होगा और इसके बाद 13 जून 2013 तक फिल्मों का प्रदर्षन किया जाएगा। प्रबंध संचालक श्री तिवारी के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह के आयोजन का उद्देश्य संसार भर के जनजातीय समाज की जीवन शली, परम्परा, संस्कृति एवं संस्कार से लोगों का परिचय कराना है। वन्या ने प्रथम अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह का आयोजन इंदौर में किया था। इसके पष्चात द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह का आयोजन भोपाल में किया गया था। वन्या का गरिमामय तृतीय अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह का आयोजन किया जा रहा है।

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...