मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

भारत भवन : याद रह गयी तेरी कहानी


-मनोज कुमार

13 फरवरी 1982 का दिन और आज तैंतीस बरस बाद 13 फरवरी 2015 का दिन। यह तारीख बार बार और हर बार आयेगी लेकिन भारत भवन का वह गौरव कभी आयेगा, इस पर सवाल अनेक हैं। यह सवाल विमर्श मांगता है किन्तु  विमर्श की तमाम संभावनायें पीछे छूट गयी हैं। इतनी पीछे कि अब भारत भवन के गौरव को पाने के लिये शायद एक और भारत भवन की रचना की पृष्ठभूमि तैयार करने की जरूरत दिखती है। यह जरूरत पूरी करने की कोशिश हुई भी तो इसके बावजूद शर्तिया यह कह पाना मुश्किल सा है कि भारत भवन की विश्व-व्यापी कला-घर की पहचान लौट पायेगी। एक अंतर्राष्ट्रीय पहचान वाले इस कला घर की यह दुर्दशा स्वयं से हुई या इसके लिये बकायदा पटकथा लिखी गयी थी, इस पर कोई प्रामाणिक टिप्पणी करना तो मुश्किल सा है लेकिन आज भारत भवन हाशिये पर है, इस बात शीशे की तरह साफ है। तैंतीस बरस का यह कला घर अब एक मामूली आयोजन स्थल में बदल गया है। बिलकुल वैसे ही जैसे भोपाल के दूसरे आयोजन स्थल हैं। भारत भवन के आयोजन की फेहरिस्त लम्बी हो सकती है लेकिन गुणवत्ता पर अब चर्चा नहीं होती है क्योंकि आयोजन अब स्थानीय स्तर के हो रहे हैं। भारत भवन के मंच से संसार भर के कलासाधकों का जो समागम होता था, उस पर पूर्ण न सही, अल्पविराम तो लग चुका है। 
भोपाल का यह वही भारत भवन है जिस पर दिल्ली भी रश्क करता था। दिल्ली के दिल में भी हूक सी उठती थी कि हाय, यह भारत भवन हमारा क्यों न हुआ। भारत भवन की दुर्दशा को देखकर दिल्ली अब रोता भी होगा कि एक कला घर की कैसे असमय मौत हो सकती है किन्तु सच तो यही है। भारत भवन की साख दिन-ब-दिन गिरती गयी है। साख इतनी गिर गयी कि भारत भवन हाशिये पर चला गया। बीते वर्षों में भारत भवन को हाशिये पर ले जाने के लिये एक सुनियोजित एजेंडा तय किया गया। बिना किसी ध्वनि के भारत भवन के बरक्स नयी संस्थाओं की नींव रखी जाने लगी। इसे मध्यप्रदेश में संस्कृति के विस्तार का हिस्सा बताया गया किन्तु वास्तविकता यह थी कि इस तरह भारत भारत भवन को हाशिये पर ढकेलने की कोशिश को परिणाम तक पहुंचाया गया। भारत भवन के विभिन्न प्रकल्पों में एक रंगमंडल है जहां न केवल नाटकों का मंचन होता है बल्कि यह पूर्णरूपेण तथा पूर्णकालिक नाट्यशाला है। रंगमंडल को सक्रिय तथा समूद्ध बनाने के स्थान पर मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय की स्थापना कर दी गई। रंगमंडल और मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के कार्यों में बुनियादी रूप से कोई बड़ा अंतर नहीं दिखता है। सिवाय इसके कि मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय युवा रंगकर्मियों को डिग्री बांटने लगा। क्या इसका जिम्मा रंगमंडल को देकर उसे समृद्ध और जवाबदार बनाने की पहल नहीं हो सकती थी? हो सकती थी लेकिन सवाल यह है कि वह दृष्टि कहां से लायें जो दृष्टि भारत भवन की रचना करने वालों के पास थी। भारत भवन के दूसरे प्रकल्प भी इसी तरह दरकिनार कर दिये गये। अनेेक आयोजनों का दोहराव साफ देखा जा सकता है। 
भारत भवन कभी राज्य सरकार की प्राथमिकता में था लेकिन दो दशक से ज्यादा समय हो गया है जब सरकारों के लिये भारत भवन कोई बहुत मायने नहीं रखता है। राज्य का संस्कृति विभाग इसका जिम्मा सम्हाले हुये है। वह जो एजेंडा तय करता है, सरकार की मुहर लग जाती है। आयोजनों की औपचारिकता पूरी कर दी जाती है और फिर एक नये आयोजन की तैयारियां आरंभ हो जाती हैं। अब जब भारत भवन के हालात पर चर्चा कर रहे हैं तो यह जान लेना भी जरूरी हो जाता है कि अनदेखा किये जाने वाले इस कला-घर में आयोजन की जरूरत क्यों है तो इसका जवाब साफ है कि विभाग के पास एक बड़ा बजट होता है और बजट को खर्च करने के लिये आयोजन की जरूरत होती है। यदि यह न हो तो आयोजन की औपचारिकता पूरी करने की भी जरूरत नहीं रहेगी। जिस भारत भवन के मंच के लिये शौकिया रंगकर्मी लड़ते थे, अब उन्हें यह आसानी से मिलने लगा है। लडक़र मंच पाने के बाद जो नाट्य मंचन होता था या दूसरे आयोजन होते थे तो एक सुखद तपन का अहसास होता था। अब वह तपन, वह सुख नहीं मिलता है। सब कुछ एक प्रशासनिक ढंाचे में बंधा और सहेजा हुआ। कई बार तो अहसास होता है कि कलाकार भी बंधे-बंधाये से हैं। अखबारों में आयोजन को इसलिये भी स्थान मिल जाता है कि उनके पन्नों में कला संस्कृति के कव्हरेज के लिये स्पेस होता है। स्मरण रहे कि खबर और सूचना तक भारत भवन के आयोजनों का उल्लेख होता है, आयोजनों पर विमर्श नहीं। कला समीक्षकों और इसमें रूचि रखने वालों के मध्य जो चर्चा का एक दौर चला करता था, अब वह भी थमने सा लगा है।
यूं तो भारत भवन को आप विश्वस्तरीय कला घर का दर्जा देते हैं किन्तु भारत भवन मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग का एक हिस्सा है। एक ऐसा हिस्सा जिसने अपने निर्माण और स्थापना के साथ ही उपलब्धियों का शीर्ष पाया और समय के साथ फर्श पर भी आ गया है। भारत भवन का वह स्वर्णिमकाल भी था जब उसके आयोजनों को लेकर, आमंत्रित रचनाधर्मियों को लेकर बकायदा विरोध दर्ज होता था। इस तरह के विरोध से भारत भवन और निखर निखर जाता था। स्मरण करेंं संस्कृति सचिव के तौर पर अशोक वाजपेयी के उस बयान का जिसमें उन्होंने कहा था कि मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता है और इस बयान के साथ जहरीली गैस से बरबाद होते भोपाल में उन्होंने एशिया कविता सम्मेलन का आयोजन करा लिया था। वाजपेयी कितने सही थे या गलत, यह चर्चा का दूसरा विषय होगा लेकिन क्या इसके बाद किसी में हिम्मत थी कि वह इस बेबाकी के साथ आयोजन को अंजाम दे सकें। भारत भवन के उस स्वर्णिम काल का स्मरण करना सुखद लगता था जब भारत भवन को खड़ा करने में स्वामीनाथन और ब.व. कारंत जैसे लोगों का योगदान रहा। भारत के शीर्ष के रचनाधर्मियों का समागम निरंतर होता रहा। अपनी प्रतिबद्धताओं के लिये मशहूर लोग आते और बहस-मुबाहिसे का लम्बा दौर चलता। तब की सांस्कृतिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ के लिये भारत भवन का विवाद कव्हरस्टोरी बनता। भारत भवन बीते वर्षों में अपनी यह छाप खो चुका है।
योजनों का लम्बा दौर चला है और इस नये दौर में अंतर प्रादेशिक आयोजनों की नयी श्रृंखला भी आरंभ हुई है। पहले बिहार, अब राजस्थान और आने वाले दिनों में अन्य प्रदेशों की कला-संस्कृति का प्रदर्शन भारत भवन में हुआ और होगा। इस नये किस्म के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिये। किन्तु एक सवाल यह भी है कि क्या जिन प्रदेशों को हम मंच दे रहे हैं, उन प्रदेशों में भारत के ह्दयप्रदेश ‘मध्यप्रदेश’ को कहीं स्थान दिया गया। संस्कृति के पहरूओं ने इस दिशा में कोई कोशिश की या हम दूसरों के ही ढोल बजाते रहेंगे? संस्कृति विभाग के आला अफसर तो समय समय पर बदलते रहे किन्तु दूसरी और तीसरी पंक्ति में वर्षों से जमे लोगों के कारण भी भारत भवन का नुकसान हुआ। यह आरोप मिथ्या नहीं है बल्कि सच है कि एक बड़े आदिवासी भूभाग वाले मध्यप्रदेश में विविध कलाओं के कलाकारों को स्थाना भारत भवन के निर्माण से स्थापना के समय तक मिला था, अब वह भी गुम हैं। 
क ईंट गारा ढोने वाली भूरीबाई भारत भवन में ईंट जोडऩे आयी थी और उसकी कलारूचि ने ही उसे मध्यप्रदेश शासन का शीर्ष सम्मान दिलाया। इसके बाद इन कलाकारों के लिये भारत भवन में कितना स्थान बचा है, यह कहने की जरूरत नहीं। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय इन्हीं वर्गो के लिये स्थापित किया गया है। सवाल यह है कि इन कलाकारों को मुख्यधारा से अलग करने की कोशिश कोशिश ने आकार ले लिया है? यंू भी मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय राज्य के जनजातीय विभाग का है न कि संस्कृति विभाग का। हम इस विवाद में भी नहीं पडऩा चाहते अपितु हमारी चर्चा के केन्द्र में भारत भवन है और हम चाहते हैं कि इन कलाकारों को भारत भवन का मंच मिले। संस्कृति की मुख्यधारा में इनका हस्तक्षेप हो ताकि भारत भवन का गौरव वापस आ सके। लोग चमत्कृत हो सकें और कह सकें कि यह मेरा मध्यप्रदेश है, यह मेरा भोपाल है और यह मेरा कलाघर भारत भवन है। 

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

अपेक्षा और अनुभव


-मनोज कुमार
न दिनों मोबाइल पर आने वाले संदेश को गौर से पढ़ा जाये तो उनमें दर्शन का भाव होता है. गौर फरमायेंगे. एक संदेश आया कि आपकी सुबह अपेक्षा के साथ होती है और शाम एक नये अनुभव के साथ. बड़ा अच्छा लगा और इस दर्शन संदेश को सोचते हुये अखबार के पन्ने पलटने लगा तो वाकई यह संदेश मुझे व्यवहारिक लगा. मेरा मध्यप्रदेश देश के दूसरे राज्यों की तरह चुनावी बुखार से तप रहा है. दिसम्बर 13 में पहले विधानसभा चुनाव, फिर लोकसभा के चुनाव और इसके बाद स्थानीय निकाय एवं पंचायतों के चुनाव. इस चुनाव में किसकी जीत हुई, कौन जीतता है और इसके क्या परिणाम होंगे, इसकी जवाबदारी राजनीतिक प्रेक्षकों के भरोसे छोड़ देते हैं. एक पत्रकार की नजर से जब मैंने इन चुनाव को देखना शुरू किया तो दंग रह गया कि यह चुनाव परम्परागत नहीं हैं. समय के साथ सोच बदलती दिख रही है और उस वर्ग में बदलती दिख रही है जिनके हाथों में न केवल घर की कमान होती है बल्कि अब वे सत्ता की भागीदार भी होने चली हैं. मध्यप्रदेश में महिलाओं के लिये सीटें आरक्षित कर दी गई हैं, इस लिहाज से भी उनकी भागीदारी बढ़ती दिख रही है. यह शुभ संकेत है लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि उनकी सोच में निरंतर बदलाव आ रहा है. चुनाव के मैदान में उतरने वाली ये महिलायें सडक़, बिजली और पानी की बात नहीं करती हैं. इस बारे में उनका कहना है कि हमें मतदाता चुनता इसलिये ही है कि हम इन बुनियादी समस्याओं का रास्ता ढूंढ़ें और उन्हें राहत दें. इन महिलाओं की नजर में महिला शिक्षा, शौचालय, नशे के खिलाफ काम करना बड़ा मुद़दा बन गया है. इन मुद्दों को लेकर महिलायें न केवल सजग हैं बल्कि संजीदा भी. उनकी संजीदगी देखना है तो आपको पंचायतों में जाना होगा. उन छोटी जगहों पर जाना होगा जहां कि महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत लगभग न्यून है लेकिन उनकी जागरूकता देश की राजधानी में राज करने वाले किसी भी नेता से अधिक है.
स बारे में राजधानी भोपाल से लगे फंदा विकासखंड और ऐसे ही कुछ स्थानों में घूमने के बाद यह जानने का अवसर मिला. लगा कि दुनिया बदल रही है. हम इंटरनेट पर बैठकर भले ही ग्लोबल विलेज की कामना करें किन्तु भारत गांव की आत्मा है और इस सच को जानने का अवसर भी मिला. एक ऐसी ही महिला उम्मीदवार से जब पूछा गया कि उनके लिये चुनाव के मुद्दे क्या हैं तो तपाक से बोली पहले तो इन नशेडिय़ों को ठीक करूंगी और इसके बाद जिन बच्चियों के लिये स्कूल नहीं है, उसकी व्यवस्था करूंगी. मेरे लिये घर-घर में शौचालय बनाना भी एक बड़ा काम होगा क्योंकि हमारी बहनों की अस्मत खतरे में रहती है और हमें शर्म भी आती है. यह पूछे जाने पर पानी, बिजली और सडक़ आपके चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं है तो उनका सीधा सा जवाब था- जब काम नहीं करना हो और भुलावो में रखना हो तो बार बार इसे मुद्दा बनाओ. कोलार के पास सटे गांव में भी खड़ी आदिवासी महिला पंच प्रत्याशी सुखमनी के लिये भी पानी बिजली और सडक़ कोई मुद्दा नहीं था अपितु यह रोजमर्रा की जरूरत है और इसे पूरा करना  किसी भी पंचायत का काम है. इस बदलती सोच की थाह लेने के लिये जब हमने शहरी इलाकों में बात की तो लगा कि शहर आज भी पानी, बिजली और सडक़ की समस्याओं से ही दो-चार हो रहा है. बच्चियों के लिये शहरों में पर्याप्त स्कूल और कॉलेज हैं जबकि शहरी इलाकों में शौचालय की कोई दिक्कत नहीं है. नशे को भी ये शहरी महिला प्रत्याशी बहुत बड़ा विषय नहीं मानती हैं. 
स बदलती सोच और ठहरी सोच के फासले पर कोई दूसरी कक्षा तक पढ़ी बुधियारिन की बात चुभती हुई महसूस होती है. जब उनसे पूछा गया कि आप लोगों के लिये स्त्री शिक्षा, नशे के खिलाफ लामबंदी और शौचालय मुद्दा है तो शहरी महिला प्रत्याशियों के लिये ये बड़े मुद्दे क्यों नहीं हैं? सवाल सुनकर वह मुस्करायी और धीरे से कहा इसलिये तो परधानमंत्री जी स्मार्ट शहरों की बात कर रहे हैं. हम गांव वाले तो पहले से स्मार्ट हैं. इस अपढ़ सी महिला की बात सुनकर मैं भौंचक था. वह समाज में बदलाव के लिये अपनी सोच में तो बदलाव ला रही है बल्कि उसे दीन-दुनिया की भी खबर है और उसका यह दंश देता कमेंट कई तरफ सोचने के लिये मजबूर करता है. इस घटना से मुझे याद आ रहा है कि साक्षरता मिशन का एक दल बैतूल जिले के एक गांव में गया और उन्हें पढऩे के लिये प्रेरित करने लगा. इनमें से एक मजदूर से मासूमियत से पूछा कि उसे जितना गड्डा खोदने का काम दिया जाता है, वह पूरी ईमानदारी से करता है? सवाल के जवाब में ना तो था नहीं. अब उसका दूसरा सवाल था कि गड़बड़ी कौन करता है, वही पढ़े-लिखे लोग ना? इस सवाल का जवाब  हां और ना दोनों में नहीं था. जवाब था तो चुप रह जाना. हमारी चुप्पी को हमारी मजबूरी समझ कर वह मजदूर भी हमारी तरफ देख रहा था और हम सचमुच बेबस थे. 
मोबाइल पर आया संदेश ठीक कहता है कि हर दिन की समाप्ति एक अनुभव के साथ होती है. शायद आप भी मेरी बातों से सहमत होंगे. 

शनिवार, 10 जनवरी 2015

अनुभव का रिश्ता


मनोज कुमार
मूचा सामाजिक ताना-बाना रिश्तों से ही बना और गुंथा हुआ है. ऐसा लगता है कि समाज के जन्म के साथ ही रिश्ते टूटने को लेकर बिसूरने का सिलसिला शुरू हो गया होगा. यह बिसूरन समय गुजरने के साथ कुछ ज्यादा ही सुनने को मिल रहा है. मन में इन विचारों को लेकर जब अपने दोस्त से बात की तो वह भी रिश्तों के टूटन से दुखी नजर आया. औरों की तरह उसके पास भी यही जवाब था कि समय बुरा आ गया है. क्या करें, कुछ नहीं कर सकते हैं. यह मेरा दोस्त अजीज है और मैं उसका यह जवाब सुनकर स्तब्ध रह गया. सब यही कहेंगे तो अच्छा समय आयेगा कब? क्या राजनीति के अच्छे दिनों वाले झूठे राग से समय बदल जायेगा? शायद नहीं. दरअसल, हर अच्छे समय के लिये अच्छे प्रयासों की जरूरत होती है. अंग्रेजों की दासता से हम कभी मुक्त नहीं हो पाते लेकिन महात्मा गांधी ने शुद्ध मन से प्रयास किया और हम स्वाधीन हैं. गांधीजी और उनके साथ के लोग कहते कि क्या कर सकते हैं तो शायद आज भी हम पराधीन ही होते. बहरहाल, रिश्तों और समय की बदलने की बात को लेकर मैं नाउम्मीद नहीं हूं. थोड़े सोच और समझ के साथ दोनों को बदला जा सकता है. यह इसलिये भी संभव है कि आप अपनी जरूरतों के अनुरूप नई तकनीक का इस्तेमाल करना सीख सकते हैं तो रिश्तों को नया स्वरूप देने के लिये अपनी जरूरत क्यों नहीं बनाते.
रिश्तों में टूटन सबसे ज्यादा बुर्जुग लोगों के साथ देखने में आती है और इसका इलाज हमने वृद्धाश्रम के रूप में ढूंढ़ लिया है. वास्तव में रिश्ते दो तरह के माने गये हैं. पहला खून का रिश्ता और दूसरा दिल का रिश्ता. इससे आगे समझने की कोई कोशिश हुई ही नहीं. एक तीसरे किस्म के रिश्ते से रिश्तों को नये ढंग से परिभाषित किया जा सकेगा, इसे मैं अनुभव का रिश्ता कहता हूं. जो लोग अपनी उम्र जी चुके हैं और एक तरह से हमारे जीवन में उनकी कोई उपयोगिता नहीं है, क्या उनसे हम अनुभव का रिश्ता नहीं बना सकते हैं. ऐसे बुर्जुग जिन्होंने अपने जीवन में कई बड़े काम किये लेकिन रिटायरमेंट के साथ वे बेकार हो गये. हमने भी मान लिया कि रिटायरमेंट के बाद आदमी अनुपयोगी हो जाता है. शायद शारीरिक तौर पर वह पहले जैसा काम न कर सके किन्तु बुद्धि के स्तर पर तो आदमी सशक्त होता ही है. ऐसे लोगों को शिक्षा के क्षेत्र में उपयोग में लाया जा सकता है. कोई लेखा का काम जानता हो तो किसी की मैनेजमेंट स्कील बेहतर हो, कोई गणित में महारत हो तो किसी के पास विज्ञान की समझ हो, और तो और जीवन विज्ञान में भी उनका पक्का दखल हो सकता है. क्यों न हम अपने बच्चों को महंगे कोचिंग में भेजने के बजाय इन अनुभवी लोगों का उपयोग करें. 
म्र के इस पड़ाव में इन्हें धन नहीं, सम्मान की जरूरत होती है. और जब उनके अनुभवों को एक मंच मिलेगा तो ये लोग वृद्धाश्रम से मुक्त होकर बेकार के बजाय उपयोगी हो जायेंगे. कुछेक घरों में इन बुर्जुगों को इसी तरह का सम्मान मिल रहा है. अनुभवों का जो हम लाभ प्राप्त करेंगे, उससे समाज में अनुभव का एक नया रिश्ता बनेगा और समय भी बदल जायेगा. हम यूरोपियन संस्कृति से मुक्त होकर अपने बड़ों को सम्मान देने की पुरानी रीत को नये रूप में ढाल सकेंगे. एक बार आप अपने घर, परिवार, मोहल्ले में अनुभव का रिश्ता बनाने की शुरूआत कर देखिये तो सही, कैसे आप के घर की बगिया में कोई मुरझाया फूल नहीं बल्कि घना छायादार बरगद का पेड़ होगा जो न केवल आपको छांह देगा बल्कि मन को भी प्रसन्न रखेगा. 

रविवार, 28 दिसंबर 2014

मीडिया का मजा लेते फ़िल्मकार


मनोज कुमार
गांव-देहात में एक पुरानी कहावत है गरीब की लुगाई, गांव भर की भौजाई. शायद हमारे मीडिया का भी यही हाल हो चुका है. मीडिया गरीब की लुगाई भले ही न हो लेकिन गांव भर की भौजाई तो बन ही चुकी है और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. मीडिया का जितना उपयोग बल्कि इसे दुरूपयोग कहें तो ज्यादा बेहतर है, हमारे देश में सब लोग अपने अपने स्तर पर कर रहे हैं, वह एक मिसाल है. आमिर खान की लगभग अर्थहीन फिल्म पीके में जिस तरह मीडिया का उपयोग किया गया है, वह इसी बात की तरफ इशारा करती है. पीके के पहले एक और फिल्म आयी थी और उसके चर्चे भी खूब हुये. आप भूल रहे हैं? उस फिल्म के नाम का पहला अक्षर भी पी से था अर्थात पीपलीलाईव. दोनों फिल्मों का खासतौर पर उल्लेख करना जरूरी पड़ता है क्योंकि दोनों फिल्में एक पत्रकार होने के नाते मुझे जख्म देती हैं. यह बात और साथियों के साथ भी होगी लेकिन वे कह नहीं रहे हैं या कहना नहीं चाहते हैं. खैर, मैं अपनी बात कहता हूं. पीपली लाईव में मीडिया को इस तरह समाज के सामने प्रस्तुत किया गया था कि मानो मीडिया का सच्चाई से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा. इतनी अतिशयोक्ति के साथ फिल्म बनायी गयी थी कि मन खट्टा हो जाता है. बावजूद मीडिया का दिल देखिये, इस फिल्म को उसने सिर-आंखों बिठाया और उसे लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया. अब एक और फिल्म हमारे सामने है पीके. इसमें मीडिया का सकरात्मक चेहरा तो दिखाने की कोशिश नहीं की गई है लेकिन अनजाने में वह सकरात्मक हो गया है. मीडिया के कारण जनमानस बदलता है और एक संशय, एक गलतफहमी दूर होती है. वाह रे फिल्म निर्माताओं तुम्हारी तो जय हो. राजनीति में जिस तरह मीडिया का उपयोग किया जाता है, वह किसी से छिपा नहीं है. मन की खबरें छपी तो मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया बन जाता है और मन की न छपे तो मीडिया पर जिस तरह के आक्षेप लगाये जाते हैं, वह शर्मनाक है. खैर, इस समय बात फिल्म की कर रहा हूं.
वाल यह है कि जिस पीपलीलाईव में मीडिया टीआरपी बटोरने के लिये सबकुछ दांव पर लगा देता है वही मीडिया पीके में सच्चाई का साथ देने के लिये स्वयं को आगे करता है. यह उलटबांसी मुझ जैसे कम अनुभव वाले पत्रकार के समझ नहीं आया. पीपली लाईव और पीके बनाने वालों को याद भी नहीं होगा कि इसी देश में एक फिल्म बनी थी न्यू देहली टाइम्स. इस फिल्म को बनाने वाले आसमान से नहीं उतरे थे. इन्हीं में से कोई था और उसे पता था कि ग्लैमरस दिखने वाले मीडिया के भीतर कितना अंधियारा है. एक पत्रकार बड़ी मेहनत से खबर लाता है और अखबार मालिक-राजनेता के गठजोड़ से खबर रोक दी जाती है. खबर क्या मरती है, पत्रकार मर जाता है. न्यू देहली टाइम्स के पत्रकार की तरह तो नहीं लेकिन कुछ मिलते-जुलते हादसे का शिकार मैं भी अपनी पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में हुआ हूं. इस पीड़ा को बखूबी समझ सकता हूं. जब मेरे अखबार मालिक के दोस्त के खिलाफ लिखा तो वह हिस्सा ही छपने से रोक दिया गया. यह भी सच है कि तब वह पत्रकारिता का जमाना था और आज यह मीडिया का जमाना है लेकिन सच तो यही है कि आज भी स्थिति इससे अलग नहीं है. दोस्ती निभायी जा रही है, अपना नफा-नुकसान देखा जा रहा है, टीआरपी न गिरे, अखबार-पत्रिका का सेल न घटे और इस गुणा-भाग से आज भी मीडिया जख्मी है. 
पीपली लाईव बनाने वाले या पीके बनाकर करोड़ों कमाने वालों को भी अपनी ही पड़ी है. वे भी कौन सा समाज का भला कर रहे हैं, यह सवाल भी उठना चाहिये. पीपली लाईव के कलाकार आज किस स्थिति में है, किसी को खबर है? खबर हो भी क्यों? मीडिया तो गांव भर की भौजाई है. चाहे जैसे उसका इस्तेमाल करो. दुख तो इस बात का है कि मीडिया को भी अपने इस्तेमाल हो जाने का दुख नहीं है क्योंकि आखिरकार मीडिया समाज का चौथा स्तंभ है और वह अपनी जवाबदारी स्वार्थहीन होकर निभाता है. वह समाज की चिंता करता है और करता रहेगा. मीडिया के इस बड़ेपन, बड़े दिल को सलाम करता हूं और अपने आपको सौभाग्यशाली मानता हूं कि इस मीडिया का मैं हिस्सा हूं. भले ही कण भर. 

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

ये प्यार का बंधन


मनोज कुमार
      आमतौर पर वाट्सअप आदि पर लगातार आने वाले संदेश मुझे परेशान करते हैं. प्रतिदिन बड़ी संख्या में आने वाले इन संदेशों का न तो कोई अर्थ होता है और न ही सार. लगभग समय की खराबी वाले इन संदेशों को लेकर मन कई बार खिन्न हो जाता है. इस खिन्नता के साथ मजबूरी यह भी होती है कि आने वाले संदेशों को देख लिया जाये, जाने कौन सी जरूरी सूचना छूट जाये. इसी बेमन के साथ वाट्सअप पर आने वाले संदेशों को देख रहा था कि अचानक एक संदेश पर नजर ठहर ही गयी. देश के किसी राज्य में दो परिवारों ने शादी समारोह को नया अर्थ दिया था. दुल्हन और दुल्हा पक्ष ने आने वाले मेहमानों से नवदंपत्ति ने अपनी पसंद के उपहार मांगे. पढऩे में आपको अलग रहा होगा, मुझे भी हैरानी हुई थी. पेशे से दुल्हा-दुल्हन डॉक्टर थे और इन्होंने मेहमानों से उपहार के रूप में सबसे रक्त दान की पेशकश रखी. शादी समारोह में शामिल हुये मेहमानों के हाथों में रखा सुंदर तोहफा तो उनके हाथों में ही रह गया और अनेक लोगों ने दुल्हा-दुल्हन की पेशकश मान कर अपना अपना रक्तदान किया. वाट्सअप सूचना के मुताबिक एक शादी समारोह में लगभग तीन सौ यूनिट ब्लड एकत्र किया गया. निश्चिचत रूप से यह अनोखा प्रयास था और इस प्रयास को सफलता न मिले, यह संभव ही नहीं था.
    इस संदेश को पढऩे के बाद आज वाट्सअप को शुक्रिया कहने का मन हो रहा है. न्यू मीडिया के इस माध्यम ने मुझे एक ऐसी घटना से परिचित कराया जिसका वायरल पूरी सोसायटी पर होना चाहिये. हमारी संस्कृति में शादी-ब्याह को एक प्यारा बंधन कहा गया है और जिस प्यारे बंधन की शुरूआत ऐसी पहल से होगी तो उनका जीवन मंगलमय होगा ही. यह सच है कि ऐसे मांगलिक अवसरों पर अपनी अपनी हैसियत से लोग उपहार लेकर पहुंचते हैं और अपनी शुभकामनायें देते हैं लेकिन यह भी सच है कि भौतिक जरूरतों को पूरा करने वाले ये उपहार कुछ समय बाद अपनी उपयोगिता खो देते हैं. शायद यह पहली बार किसी डाक्टर नवदम्पत्ति ने यह पहल की है कि उपहार के बदले रक्तदान हेतु समाज को प्रेरित किया जाये. लोगों को यह बात उचित लगी होगी तभी इतनी बड़ी संख्या में ब्लड डोनर सामने आये. तीन सौ यूनिट ब्लड से तीन सौ को नयी जिंदगी मिल पायेगी जो किसी भौतिक उपहार से कहीं ज्यादा कीमती है.
     इन दिनों इस प्यारे बंधन में अनेक किस्म की नवाचार की सूचना मिल रही है. मध्यप्रदेश में जैन समाज ने बारात के आने का समय तय कर दिया है. आमतौर पर जश्र मेंं डुबे युवा और अनेक बार परिवार के बुुर्जुग भी समय की पाबंदी भूल जाते हैं और इससे वधू पक्ष को अकारण अनेक किस्म की परेशानी का सामना करना पड़ता है. समय पर बारात लग जाने से सारे मांगलिक कार्य समय पर पूर्ण होते हैं और इसलिये समय की पाबंदी के जैन समाज का फैसला अनुकरणीय है. इन प्रयासों से समाज की रूढि़वादी सोच में न केवल बदलाव आयेगा बल्कि ऐसी शुरूआत होगी जो विवाहोत्सव की नयी रीत बनेगी. समय बदल चुका है तो समाज को भी बदलने की जरूरत है और इस बदलाव की शुरूआत एक डाक्टर दम्पत्ति ने की है तो यह युवावर्ग के लिये नजीर बने. जैन समाज के फैसले को भी इसी नजर से देखकर इसे सभी समाज पर लागू करने की जरूरत है. मेरा मानना है कि किसी भी नवदम्पत्ति ने यह प्रयास शुरू किया है तो इस प्रयास को श्रृंखला के रूप में आगे बढ़ाया जाना चाहिये. जैन समाज का निर्णय भी इसी का एक तार है. प्यार के इस बंधन को जीवन एवं समय बचाने का उपक्रम बनाया जाये तो इससे बड़ी सार्थकता और कुछ नहीं है.   

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

शोध पत्रिका ‘समागम’ का जनवरी अंक महात्मा गांधी पर केन्द्रित, प्रकाशन के 14वां वर्ष पूरे हुये


भोपाल।  शोध पत्रिका ‘समागम’ जनवरी 2015 में अपने प्रकाशन का 14 वर्ष पूरे करने जा रही है। वर्ष 2014 का अंक एक गांधी के महात्मा हो जाने विषय पर केन्द्रित है। भोपाल से मासिक कालखंड में प्रकाशित हो रही द्विभाषी शोध पत्रिका ‘समागम’ का केन्द्रीय विषय मीडिया एवं सिनेमा है किन्तु मानव जीवन का हर पहलू मीडिया एवं सिनेमा से प्रभावित है अत: इससे जुड़े अन्य विषयों के शोधपत्रों का प्रकाशन भी किया जाता है। शोध पत्रिका ‘समागम’ का हर अंक विशेषांक होता है। 14 वर्षों के प्रकाशन की निरंतर श्रृंखला में प्रतिवर्ष जनवरी एवं अक्टूबर में महात्मा गांधी पर अंक प्रकाशन होता रहा है। अब तक के विशेष अंकों में लता मंगेशकर, दलित पत्रकारिता, रेडियो पत्रकारिता, न्यू मीडिया, पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर के साथ ही पत्रकारिता के स्तंभ पराडक़र, माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे, भवानीप्रसाद मिश्र पर प्रकाशित किया गया है। राज्य विधानसभा चुनाव एवं आमचुनाव पर भी विशेष अंकों का संयोजन किया गया है। इस आशय की जानकारी शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक एवं वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार ने दी।
शोध पत्रिका ‘समागम’ का 15वें वर्ष का पहला अंक का विषय ‘मीडिया की सामाजिक जवाबदारी’ पर है। समाज के विभिन्न प्रकल्प यथा शिक्षा, अर्थ, राजनीति, ग्राम्य जीवन, साहित्य, संस्कृति, परम्परा, महिला एवं बच्चे के साथ ही बदलते परिवेश में मीडिया की भूमिका को चिंहित करते हुये तैयार किया जा रहा है। इसी तरह अप्रेल 2014 का अंक पत्रकार मार्क टुली पर केन्द्रित होगा। शोध पत्रिका ‘समागम’ विगत तीन वर्षों से लगातार वार्षिंकांक के रूप में वर्ष भर में प्रकाशित श्रेष्ठ शोध आलेखों की एक पुस्तक का प्रकाशन भी करता है। अब तक मीडिया एवं समाज, भारतीय सिनेमा के सौ साल तथा समाज, संचार एवं सिनेमा शीर्षक से क्रमश: पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है। इस वर्ष मीडिया समग्र शीर्षक से किताब का प्रकाशन किया जा रहा है। 
शोध पत्रिका ‘समागम’ व्यक्तिगत प्रयासों का मंच है।  इस पत्रिका को देश के श्रेष्ठ एवं प्रतिष्ठित विशेषज्ञों का निरंतर मार्गदर्शन प्राप्त होता है। मीडिया के विभिन्न मंचों से भी शोध पत्रिका को सहयोग मिलता रहा है। शोध पत्रिका ‘समागम’ श्रेष्ठ शोध आलेखों का प्रकाशन हेतु स्वागत करता है।
शोध आलेख भेजने हेतु सम्पर्क किया जा सकता है सम्पादक शोध पत्रिका ‘समागम’ 3, जूनियर एमआयजी, द्वितीय तल, अंकुर कॉलोनी, शिवाजीनगर, भोपाल-16 मो. 09300469918 ई-मेल है k.manojnews@gmail.com

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