शनिवार, 20 दिसंबर 2025

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण

 



























-मनोज कुमार 
 इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण. इस बात में अब कोई दो राय नहीं है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण हो चुका है. आने वाले समय में व्यवसायिकरण का यह चेहरा और विकृत और विकराल देखने को मिले तो समाज को हैरान नहीं होना चाहिये.  माध्यम अर्थात अंग्रेजी का शब्द मीडिया. मीडिया का सामान्य सा अर्थ है मीडियम अर्थात समाज और सरकार के बीच संवाद का सेतु किन्तु संवाद का यह सेतु वह चाहे इलेक्ट्रानिक हो या मुद्रित, दोनों का चेहरा कारोबारी हो गया है. इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने के पूर्व पत्रकारिता एवं माध्यम दोनों के स्वरूप एवं चरित्र पर गौर करना उचित होगा. पत्रकारिता एवं माध्यम अर्थात मीडिया दोनों की विषय-वस्तु अलग अलग है. दोनों की प्रवृति एवं प्रकृति एकदम अलग हैं. व्यवसायिकरण की चर्चा के पूर्व दोनों को समझना होगा. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण की बात करने के पूर्व मीडिया और पत्रकारिता के अन्र्तसंबंध एवं इन दोनों के बीच का अंतर समझना होगा. सबसे पहले मैं पत्रकारिता की प्रवृति एवं प्रकृति पर प्रकाश डालना चाहूंगा. 
सर्वप्रथम हम बात करेंंगे पत्रकारिता की. पत्रकारिता समाज का वटवृक्ष है तो मीडिया नये जमाने का संचार माध्यम. पत्रकारिता निरपेक्ष होकर, लाभ-हानि के गणित से परे रहकर, सामाजिक सरोकार की पैरोकार है. पत्रकारिता का चरित्र और कार्य व्यवहार, मीडिया से एकदम भिन्न है. पत्रकारिता दिल से होती है. समाज में जब अन्याय होता है, अराजकता की स्थिति बनती है और आम आदमी के हितों पर कुठाराघात होता है तो पत्रकारिता स्वयं में आंदोलित हो उठती है. स्मरण कीजिये पराधीन भारत के उस दौर को जब गोरे शासकोंं के नाक में पत्रकारिता ने दम कर रखा था. तिलक, महात्मा गांधी से लेकर गणेशशंकर विद्यार्थी, गोखले, माधवराव सप्रे, माखनलाल चतुर्वेदी जैसे दर्जनों लोगों ने अपनी लेखनी से अंग्रेज शासकों की नींद उड़ा दी थी. समय बदला, काल बदला लेकिन पत्रकारिता के तेवर नहीं बदले. देश के स्वाधीन होने के बाद भारत वर्ष के नवनिर्माण में पत्रकारिता ने अपना योगदान दिया. देश की पहली पंचवर्षीय योजनाओं के लागू होने के साथ ही भ्रष्टाचार का श्रीगणेश हुआ. पत्रकारिता अपनी ही सरकार को आईना दिखाने से नहीं चूकी. परिणाम यह हुआ कि भ्रष्टाचार तो हुआ लेकिन उसका ग्राफ रूक गया. यह मान लेना भी भूल होगी कि पत्रकारिता ने भ्रष्टाचार को, अनाचार को, अत्याचार को खत्म कर दिया है लेकिन पत्रकारिता की ही ताकत थी कि भ्रष्ट को भ्रष्टतम नहीं होने दिया. पत्रकारिता को दमन का शिकार भी होना पड़ा है. पराधीन भारत में अंग्रेज शासकों ने किया और स्वतंत्र भारत में हमारे अपनों ने ही. उन अपनों ने जिन्हें अपनी करतूतों के खुल जाने का भय था. पत्रकारिता की ही ताकत है कि 25 बरस से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी अरूण शौरी द्वारा उद्घाटित किया गया बोफोर्स का मामला आज भी जीवित है. विश्व की भीषणत औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड को भला कौन भूल सकता है. एक अनाम सा साप्ताहिक अखबार ने सचेत किया था. पत्रकारिता का यह चरित्र है. पत्रकारिता के इस चरित्र के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ संबोधित किया गया . 
पत्रकारिता का इतिहास हमें गर्व से भर देता है. पराधीन भारत से लेकर स्वाधीन भारत की पत्रकारिता की विश्वसनीयता इतनी पक्की है कि करीब ढाई सौ सालों के इतिहास में कोई अखबार अथवा पत्रिका गलत खबर छापने के कारण बंद नहीं हुई लेकिन पश्चिमी देशों में पत्रकारिता की जो दशा है, उसके चलते हाल ही में सौ साल से अधिक पुराने अखबार का प्रकाशन बंद कर दिया गया. भारत में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन रूका या बंद हुआ तो सिर्फ इसलिये कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी. वे व्यवसायिक नहीं बन पाये. पत्रकारिता एक चुनौती है. यह चुनौती आपको कस्बाई पत्रकारिता में देखने को मिल जाएगी. जहां एक दरोगा, एक पटवारी या एक मामूली सा धनवान व्यक्ति भी अपने खिलाफ कुछ पढऩा या सुनना नहीं जानता है. ऐसे में सच का साथ देना ही पत्रकारिता है.
पत्रकारिता की अपनी भाषा होती है. उसकी अपनी शैली है. पत्रकारिता की भाषा बेलौस नहीं होती है. वह संयमित होती है और सम्मानजनक भी. पत्रकारिता किसी को बेपर्दा भी करती है तो पूरे तथ्य और प्रमाण के साथ. वह सनसनी नहीं फैलाती है. पत्रकारिता का गुण यह भी है कि वह खबर का पीछा करती है. जिसे अंग्रेजी में फालोअप कहते हैं. वह आखिरी सिरे तक पहुंच कर सच को सामने लाने की कोशिश करती है ताकि समाज में शुचिता कायम रहे. पत्रकारिता का यह गुण उसकी विश्वसनीयता को बनाये रखता है. आगे पाठ, पीछे सपाट पत्रकारिता की शैली नहीं है. 
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की बात के बरक्स मैं वापस दोहराना चाहूंगा कि इसे एक ही नाम मिला है मीडिया. मीडिया में पत्रकारिता को भी शामिल किया गया है, बावजूद इसके मीडिया और पत्रकारिता का फर्क वैसा ही दिखता है जैसा कि इलहाबाद में गंगा और जमुना के संगम का.  मीडिया का कार्य-व्यवहार दिमाग से होता है. वह पहले लाभ-हानि का गणित लगा लेता है. वह अपने लाभ को पहले रखता है, फिर वह एक निश्चित सोच के साथ अपने कार्य को पूर्ण करता है. मीडिया अर्थात टेलीविजन के पर्दे पर वही दिखाया जाता है, जो मीडिया के पक्ष में लाभकारी होता है. संचार के इस विधा में दिल का नहीं, सौफीसद दिमाग का कब्जा होता है. पत्रकारिता और मीडिया के बीच यह बुनियाद अंतर दोनों को कई अर्थों में अलग करता है. मीडिया का बहुत सीधा वास्ता सामाजिक सरोकार से नहीं होता है. वह अपने लाभ के लिये लोगों की इमेज बिल्डिंग का काम करता है. जिन खबरों या घटनाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम स्थान देता है तो इसलिये कि उसकी टीआरपी बढ़ सके. 
मीडिया की उत्पत्ति लगभग तीन दशक के आसपास की है. मीडिया शब्द आया कहां से, यह अनसुलझा सा है.  इस बारे में विद्वानों की राय भी स्पष्ट नहीं है. कुछ लोगों का मत है कि जिस तरह पत्रकारिता से सम्पादक संस्था का लोप कर दिया गया, उसी समय मीडिया शब्द को चलन में लाया गया. सम्पादक संस्था की कमान प्रबंधकों के हाथों में आ गयी और मीडिया में सम्पादक संस्था के लिये कोई स्थान रखा ही नहीं गया था. इस तरह अर्मूत रूप से मीडिया शब्द की रचना की गयी और बेहद चालाकी के साथ इसे स्थापित कर दिया गया. मीडिया तो माध्यम है ही, पत्रकारिता को भी माध्यम बना दिया गया.
उपरोक्त संदर्भ के रूप में अब यह बात हमारे सामने स्पष्ट हो जाती है कि पत्रकारिता क्या है, उसकी प्रवृति और प्रकृति क्या है तथा मीडिया की प्रवृत्ति और प्रकृति क्या है. इन दोनों के बीच का अन्र्तसंबंध भी लगभग स्पष्ट हो गया है. सवाल यह है कि क्या दोनों माध्यम व्यवसायिक हो गये हैं, तो इस सवाल का सीधा-सादा जवाब हां में है. मुद्रित माध्यम से आशय पत्रकारिता से हो सकता है और आज की तारीख में पत्रकारिता को लेकर जो संशय और सवाल उठाये जा रहे हैं, सवाल उठ रहे हैं, वह पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की ओर संकेत करता है. कुछ आगे बढक़र कहें कि पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की बात को स्थापित करता है तो भी गलत नहीं होगा. पत्रकारिता के हिस्से में पेडन्यूज का जो धब्बा बार बार लगता रहा है, वह पत्रकारिता के व्यवसायिकरण का ही उदाहरण है. पेडन्यूज को लेकर चिंता चारों तरफ है तो इसलिये कि पत्रकारिता का मूल स्वरूप सामाजिक दायित्व, निरपेक्ष व्यवहार और सच का साथ देने की ताकत खत्म न हो जाये. यह बात हमें सुकून देती है कि पेडन्यूज का दाग तो लगा है लेकिन अभी रोशनी के कुछ सुराख ही बंद हुये हैं. पूरा केनवास अभी काला नहीं हुआ है. हालांकि जिस तेजी से पत्रकारिता का व्यवसायिकरण हो रहा है, वह भयावह है. पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं जहां पत्रकारिता के दिग्गज भ्रष्टाचारियों को बचाने में शामिल पाये गये. यह और बात है कि प्रमाण के अभाव में या प्रभाव के बूूते पर वे अपने आसान पर जमे हुये हैं. अब पत्रकारिता की भाषा भी बेलौस होती जा रही है क्योंकि वह बाजार की भाषा बोलने लगी है. मुद्रित माध्यम का व्यवासायिक होने के पीछे उसका आधुनिक भी हो जाना है. महंगी मशीनें, महंगी छपाई, कागज और उत्पादन खर्च इतना है कि वह दो-पांच रूपये की कीमत से वसूला नहीं जा सकता है. इस तरह मुद्रित माध्यम पूर्णरूप से व्यवसायिकरण की ओर कदम बढ़ चुका है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम अपने जन्मकाल से व्ययवसायिक रहा है. पत्रकारिता अथवा मुद्रित माध्यम के विपरीत इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का चरित्र है. दूरदर्शन का जब जन्म हुआ था, तब इसे बुद्धु बक्सा कह कर इसे समाज ने तव्वजो नहीं दी थी किन्तु आकाशीय चैनलों के आगमन के साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का एकछत्र राज्य कायम हो गया. इस माध्यम ने एक वाक्य गढ़ा जो दिखता है, वो बिकता है और इसी सूत्रवाक्य के सहारे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पूरी तरह बाजार के कब्जे में आ गया. व्यवसायिकरण कुछ इस माध्यम की बुनियादी जरूरतें थी तो कुछ उसने स्वयं उत्पन्न कर लिया. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने मान लिया कि बाजार के मन के मुताबिक उसे चलना है और वह चलता गया. एक प्रिंस के गड्ढे में गिर जाने को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने इतना हाइप दिया कि लगा कि संसार में पहली दफा कोई बच्चा गड्ढे में गिरा है. इसके बाद ऐसी घटनाओं को दिखाने में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की रूचि कम होने लगी. उसे पता था कि दर्शक बहुत ज्यादा नहीं झेल पायेंगे. तथ्यपरक घटनाओं को दिखाने की कोशिश तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में होती है लेकिन अवसर पाकर इस माध्यम ने सनसनी फैलायी है. ऐसा एक बार नहीं, कई कई बार हुआ है. दिल्ली की एक शिक्षिका के मामले में तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को अदालत का सामना भी करना पड़ा है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की प्रवृति हमेशा से आगे पाठ, पीछे सपाट की रही है. वह खबरों के पीछे भागना नहीं जानता है अथवा नहीं चाहता है. वह हर घड़ी नयी खबर की तलाश में जुटा रहता है. खबरों को अथवा घटनाओं को बीच में छोड़ देना भी इस माध्यम की प्रवृति रही है. इस बात का एक बड़ा उदाहरण है ऑपरेशन चक्रव्यूह. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने उन सांसदों को बेनकाब करने का अभियान चलाया था जो कथित रूप से गैरकानूनी ढंग से धन प्राप्त करते हैं. इस ऑपरेशन में 11 सांसदों को घेरे में लिया गया था और अचानक से यह अभियान बंद कर दिया गया. इसके पीछे क्या कारण समझा या माना जाये, दर्शकों के पास जो संदेश गया, वह क्या यह नहीं था कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का व्यवसायिकरण हो चुका है और शायद इन्हीं कारणों से यह अभियान बीच में बंद कर दिया गया. करप्सन अंगेस्ट इंडिया आंदोलन में भी मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया गया था. जी-जिंदल विवाद किस बात की तरफ संकेत करते हैं?  इस तरह यह बात साफ है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का व्यवसायिकरण हो चुका है.
निष्र्कषत: हम यह मान लेना चाहिये कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम एवं मुद्रित माध्यम व्यवसायिकरण की तरफ अपना कदम बढ़ा चुके हैं. कुछ व्यवसायिक जरूरतों के कारण और कुछ कथित रूप से उत्पन्न जरूरतों के कारण. मुद्रित माध्यम को पेडन्यूज जैसे कलंक से स्वयं को बचाना होगा. यह राहत की बात है कि व्यवसायिकरण के इस दौर में मुद्रित माध्यम ने अपनी साख बचाकर रखी है. मुद्रित माध्यम पर लोगों का विश्वास अभी भी कायम है और बार बार टेलीविजन के पर्दे पर खबरें देखने और सुनने के बाद भी वह अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पलटने के बाद ही राहत पाता है. (औरगाबाद में हुए एक  दिवसीय सेमिनार में दिया गया भाषण) 

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

#नवाचार का 70वाँ ‘विधान’



















प्रो. मनोज कुमार

मध्यप्रदेश की पहचान एक उत्सवी प्रदेश की रही है लेकिन वह नवाचार का प्रदेश भी रहा है. अनेक ऐसे मौके और प्रसंग आए हैं, जब मध्यप्रदेश का नवाचार देश के लिए आदर्श बना हुआ है. मध्यप्रदेश विधानसभा ने अपना 69वाँ स्थापना दिवस मनाकर अगले वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर आयोजित विशेष सत्र में यह देखने को मिला. मध्य प्रदेश विधानसभा में लगभग एक दशक बाद विशेष सत्र बुलाया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में विशेष सत्र आयोजित किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के गठन के समय और 1997 में आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर भी विशेष सत्र बुलाया गया था। विधानसभा अध्यक्ष के नवाचार पहल के अंतर्गत यह आयोजन किया गया. हालाँकि इसके पूर्व हर वर्ष प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण करने की परम्परा का श्रीगणेश भी किया गया।

इस अवसर पर मध्यप्रदेश की स्थापना के साथ ही पंडित रविशंकर शुक्ल से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व की समीक्षा की गई. इस उत्सवी बैठक मेें खुले मन से सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों के कार्यों की प्रशंसा करते हुए इस बात से परहेज करने के बजाय सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की चर्चा की गई. इसे आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सूत्र वाक्य ‘सबका साथ, सबका विकास’ की दृष्टि से भी निरपेक्ष होकर देख सकते हैं. मध्यप्रदेेश की यही विशेषता मध्यप्रदेश को अलग और उसे देश का ह्दयप्रदेश कहा जाता है. सामान्य दिनों में विधानसभा में जिस तरह सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष आमने-सामने होते हैं तो लगता है कि ये प्रतिद्वंदी हैं लेकिन वास्तविकता है कि दोनों ही सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष प्रदेश और जनता के हित में चर्चा करते हैं. एक सशक्त विपक्ष लालटेन की भाँति सरकार का पथ प्रदर्शक होता है लेकिन राजनीतिक सौम्यता हमारे अपने मध्यप्रदेश की धरोहर है और जो  विधानसभा में देखने को मिला.

सत्तर साल पहले मध्यप्रदेश विधानसभा का जब गठन हुआ था, तब प्रथम विधानसभा अध्यक्ष पंडित कुंजीलाल दुबे थे, जिन्होंने 1 नवंबर 1956 से 7 मार्च 1967 तक इस पद पर कार्य किया और मध्य प्रदेश के गठन के समय से लेकर शुरुआती तीन विधानसभाओं (1956-1957, 1957-1962, 1962-1967) के अध्यक्ष रहे। इनके पश्चात श्री काशीप्रसाद पाण्डे, श्री तेजलाल टेंभरे, श्री गुलशेर अहमद, श्री मुकुन्द सखाराम नेवालकर, श्री यज्ञदत्त शर्मा, श्री रामकिशोर शुक्ला, श्री राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, श्री बृजमोहन मिश्रा, श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी, श्री ईश्वरदास रोहाणी, डॉ. सीतासरन शर्मा, श्री नर्मदा प्रसाद प्रजापति (एन. पी.), श्री गिरीश गौतम विधानसभा अध्यक्ष की आसंदी पर बने रहे. सभी ने अपने गुरुत्तर दायित्व का निर्वहन कर विधानसभा की मान्य परम्पराओं का पालन किया. 

वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर अपने सौम्य स्वभाव के लिए परिचित हैं. अनेक बार राज्य में मंत्री एवं अन्य उच्च पदों पर रहने वाले श्री तोमर के स्वभाव में नवाचार है. विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनके नवाचार की स्वाभाविक अपेक्षा होती है और उन्होंने प्रदेश की अपेक्षा को पूर्ण करने की पहल की. विधानसभा अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने के तुरंत बाद श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि ‘मेरी कोशिश होगी कि मेरी निगाह और नजर हर सदस्य पर रहे। उसका जो हक है उसे मिल सके। इसके साथ ही उन्होंने नए सदस्यों को सीखने और अध्ययन करने की सलाह दी, वहीं पुराने सदस्यों को नसीहत देते हुए कहा कि वे ये न सोचें की वे सब कुछ सीख गए हैं। वे विद्यार्थी का भाव हमेशा रखें। उन्होंने कहा कि मेरे से पूर्व सभी अध्यक्षों ने अनेक मानदंड स्थापित किए हैं। परंपरा स्थापित की है। अपने-अपने कार्यकाल में अपने-अपने ढंग से सदन का गौरव बढ़े, इस बात का प्रयत्न किया गया है। अध्यक्ष के रूप में आप सब की निश्चित रूप से मुझसे भी ऐसी अपेक्षा है। मेरी ईमानदार कोशिश होगी कि मैं आपकी अपेक्षा के अनुसार अपने दायित्व का निर्वहन कर सकूं।’

विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की पहल पर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल की जयंती पर मध्यप्रदेश विधानसभा के सेंट्रल हॉल में पुष्पाजंलि का आयोजन के साथ विधानसभा में दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई। विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि अब हर वर्ष प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण किया जाएगा। पं. शुक्ल का जीवन हमें सेवा, समर्पण और विकास की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि 1 नवंबर 1956 को मध्यप्रदेश राज्य का गठन हुआ। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल जी के जीवन और संघर्ष से हम सभी प्रेरणा लेते हैं। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि हम सभी को उनके बताए मार्ग पर चलने की शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर यह नवाचार किया है।

करीब सात दशक के सफर में मध्यप्रदेश विधानसभा का लंबा अनुभव है. कई बार ऐतिहासिक अनुभवों से गुजरा तो कई बार खट्टे अनुभव भी हुए लेकिन मान्य परम्परा का हमेशा निर्वाह किया गया. 1956 में नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ तो छत्तीसगढ़ अविभाज्य अंग था तो इसी विधानसभा में साल 2000 में मध्यप्रदेश का विभाजन हुआ और छत्तीसगढ़ राज्य बनाने की सहमति प्रदान की. तत्कालीन उप-नेता प्रतिपक्ष राकेश चतुर्वेदी 13वीं विधानसभा सत्र के दरम्यान ही कांग्रेस छोडक़र भाजपा के साथ हो लिए थे. उस समय उन्हें कांग्रेस की ओर से सत्तापक्ष को घेरने की जवाबदारी थी क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव की ओर से चर्चा होनी थी. ऐसे कई प्रसंग है जिन्हें स्मरण किया जा सकता है.

विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर अपने कार्यकाल में नवाचार के लिए जाने जाएंगे. अभी तो विधानसभा में नवाचार का श्रीगणेश हुआ है. आगे भी अनेक प्रसंग पर चर्चा का अवसर मिलेगा. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एवं विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर की दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनकी कार्यशैली केवल मध्यप्रदेश के लिए नहीं अपितु समूचे देश के लिए नजीर बनेगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) फाइल फोटो




मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

समागम राष्ट्रीय संगोष्ठी, सम्मान, एवं पुस्तक विमोचन 2026

 समागम राष्ट्रीय संगोष्ठी  2026,  

सम्मान, एवं पुस्तक विमोचन

रिसर्च जर्नल समागम के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर जनवरी, 2026 को एक दिवसीय प्रतिष्ठापूर्ण आयोजन प्रस्तावित है। इस अवसर पर डिजीटल ऐरा में कम्युनिकेशन की चुनौती विषय पर संगोष्ठी के साथ समागम सम्मान भी प्रदान किया जाएगा।  

25 वर्षों से निरंतर प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय स्तर की रिसर्च जर्नल समागम को क्वांगटोंग विश्वविद्यालय, चीन द्वारा हिंदी जर्नल के लिए मान्यता प्रदान किया गया है।


संगोष्ठी का विषय

* डिजीटल ऐरा में कम्युनिकेशन की चुनौती

* भारतीय ज्ञान परंपरा में संवाद की महत्ता

* हिंदी, संवाद एवं संपर्क की भाषा

* डिजिटल मीडिया में हिंदी

* डिजिटल मीडिया और जनसंपर्क

* डिजिटल मीडिया और वाचिक परंपरा

* मुख्य विषय से संबंधित अन्य विषय


संगोष्ठी के रजिस्ट्रेशन हेतु लिंक का उपयोग करे । 

https://samagam.co.in/national-seminar-on-challenges-of-communication/


संगोष्ठी समूह में जुड़े :

https://chat.whatsapp.com/GiGeWZCzdlU20F6ZppL0v4

सोमवार, 8 दिसंबर 2025

ये आकाशवाणी का उज्जैन केन्द्र है...

 








प्रो. मनोज कुमार

ये आकाशवाणी का उज्जैन केन्द्र है... मैं डॉ. मोहन यादव बोल रहा हूँ.. यह उद्घोषणा सुनने में रूटीन सा लगता है लेकिन मध्यप्रदेश के लिए यह आवाज अहम है. जब देश भर में भारत सरकार आकाशवाणी केन्द्रों को समेट रही है तब उज्जैन में आकाशवाणी केन्द्र का आरंभ होना एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर गिना जाएगा. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन  यादव के अथक प्रयासों का सुपरिणाम है कि उज्जैन में आकाशवाणी केन्द्र को ना केवल मंजूरी मिली बल्कि अल्प समय में इसका प्रसारण शुरू हो गया. पूर्ववर्ती सरकारों से तुलना करें तो मध्यप्रदेश के कई आकाशवाणी केन्द्रों का आकार सीमित कर दिया गया है या बंद कर दिया गया है लेकिन इस पर कोई पहल नहीं की गई, तब मुख्यमंत्री डॉ. यादव की पहल ऐतिहासिक माना जाएगा. लगभग एक सप्ताह पश्चात जब डॉ. मोहन यादव के दो वर्ष के कार्यकाल की समीक्षा की जाएगी कि इन दो साल में प्रदेश की क्या उपलब्धि रही या क्या खोया तब ऐसे अनछुए कार्य उनके खाते में गिने जाएंगे. सामाजिक समरसता के साथ सामाजिक सद्भाव के साथ नवाचार के लिए मोहन सरकार ने स्वयं को रेखांकित किया है. कई मिथकों को तोड़ते हुए अनेक नए आयाम छूूने की कोशिश में डॉ. मोहन यादव आगे निकल गए हैं. 

13 दिसम्बर, 2023 को जब डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो राजनीतिक विश£ेषकों के साथ स्वयं डॉ. यादव चौंक गए थे. वे कहते हैं कि उन्होंने कभी भी ऐसी बड़ी जवाबदारी के लिए खुद को तैयार नहीं किया था और ना ही उनकी अपेक्षा थी लेकिन जो कुछ होता है, वह भाग्य में लिखा होता है और इसे मंजूर भी करना पड़ता है. इसके बाद वे कहते हैं कि इससे आगे इस जिम्मेदारी के भरोसे को जितना सबसे बड़ी चुनौती होती है. बेशक, जैसी कामयाबी की उम्मीद उनसे हो, वह पूरी ना हो पायी हो लेकिन किसी भी मोर्चे पर वे असफल नहीं दिखते हैं. अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की तरह उनके काम करने का तरीका और सोच अलग था. वे परम्परागत सोच से बाहर नवाचार पर जोर देते रहे. आज जब पूरी दुनिया एआई के नक्शे पर है, डिजीटली दुनिया हो चुकी है तो वे अपने मध्यप्रदेश को भी इसी के साथ चलाने की मंशा रखते हैं. उनके कार्यकाल का संभवत: पहला प्रयोग साइबर तहसील का था. देश में पहली बार यह प्रयोग किया गया और जो जिस तहसील में है, उसके कार्य वही निपटा दिए गए. राजधानी या मुख्यालय की गणेश परिक्रमा से मुक्त कर दिया गया. यही कार्य उन्होंने संपदा-2 में किया. जमीन-जायदाद के मामले घर बैठे निपटने लगे. रजिस्ट्री से नामांकन तक की प्रक्रिया सहजता से आम आदमी का होनेे लगा. कुछ तकनीकी दिक्कत शुरू में आती है, सो आयी लेकिन बाद के दिनों में सहजता से आम आदमी का काम होने लगा.

रघुकुलवंश की ‘प्राण जाए पर वचन ना जाए’ कि भाँति उन्होंने लाडली बहनों से किया गया वायदा पूरा किया. नियत तय तारीख पर उन्हें बढ़ी हुई स्वाभिमान राशि बहनों के खाते में 1500 रुपये ट्रांसफर कर उनका भरोसा जीत लिया. विपक्ष तो उन्हें कटघरे में कटघरे में खड़ा कर ही रहा था, अपने भी उनके खिलाफ हो चले थे लेकिन वे अपनी नियत योजनाओं को मूर्त रूप देने में लगे रहे. सबका साथ, सबका विकास के तर्ज पर उन्होंने दशकों से उदास रूठे सैकड़ों मजदूरों के जीवन में खुशी की दस्तक देने में वक्त नहीं गंवाया. हुकूमचंद कपड़ा मिल इंदौर के सैकड़ों मजदूर अपना अधिकार पाने के लिए परेशानहाल थे जिन्हें मोहन सरकार ने राहत दी. डॉ. मोहन के नेतृत्व वाली सरकार ने प्रदेश के सभी मिलों का परीक्षण किया जा रहा है ताकि मजदूर परिवारों को राहत मिल सके. यह भी शायद पहली-पहली बार हो रहा है क्योंकि उनके पूर्ववर्ती सरकारों ने ऐसा कुछ नहीं किया था. किसान, महिला, पिछड़ा, आदिवासी वर्गों के लिए नित नए कल्याणकारी योजनाओं का आगाज हो रहा है. यह अतिशयोक्ति नहीं है बल्कि हकीकतबयानी है जो बीते दो वर्ष में हुआ और हो रहा है.

मध्यप्रदेश शांति का टापू कहलाता है और इस पर एक बार फिर डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मुहर लग गई है. स्मरण रहे कि उज्जैन नगर विकास के लिए अनेक धर्मस्थलों को हटाया जाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था लेकिन डॉ. मोहन यादव की सूझबूझ और समरसता के प्रयासों से यह कार्य भी सरलता से पूर्ण हो गया. यह संभवत: देश का पहला मसला रहा होगा जब बिना किसी हो-हल्ला यह काम पूर्ण हो गया. सनातनी परम्परा को एक नया आयाम देने के लिए डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश के समस्त धर्मस्थलों को नवीन स्वरूप देने का प्रयास किया. इसी क्रम में मध्यप्रदेश में होने वाले प्रतिष्ठित सिंहस्थ के लिए लैंड पुलिंग एवं ममलेश्वर लोक निर्माण का प्रस्ताव सरकार ने किया था लेकिन विरोध के बाद सरकार ने पूरी सह्दयता के साथ दोनों ही प्रस्ताव को वापस कर लिया. सरकार को घेरने के इरादे से इसे बैकफुट पर जाना कहा गया लेकिन सत्यता है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन सरकार का यह फैसला बेकअप देना था. वे कोई भी फैसला जनमानस के समर्थन के बिना नहीं लेते हैं और लैंड पुलिंग तथा ममलेश्वर के मामले को इसी संदर्भ में देखा और समझा जाना चाहिए. वे सीधी बात पर यकीन करते हैं और ऑन द स्पॉट फैसला लेते हैं. इसलिए उनके लिए कहा गया-नो बकवास, सीधी बात. अपराधों के खिलाफ उनका रूख निर्मम प्रशासक का है तो आम आदमी के साथ संवेदनशील होना डॉ. मोहन यादव का गुण है. दो वर्ष का कार्यकाल बहुत छोटा होता है, खासतौर पर मध्यप्रदेश जैसे बड़े भौगोलिक प्रदेश के लिए लेकिन देखा जाए तो अनेक फैसलों ने अमलीजामा पहन लिया और आने वाले समय में परिणाम देखने को मिलेगा. डॉ. मोहन यादव के लिए विपक्ष तो परेशानी का सबब है ही, अपनों का साथ भी नहीं मिल पा रहा है. बावजूद इसके महाकाल के बेटे डॉ. मोहन यादव नित नयी कामयाबी गढ़ रहे हैं. उन्होंने दशकों से स्थापित इस मिथक को चटका दिया है जिसमें कहा जाता था कि उज्जैन का राजा महाकाल है और कोई राजा उज्जैन में नहीं रूक सकता है. इस मिथक को दोहराने वाले भूल गए थे कि डॉ. मोहन यादव राजा नहीं, शासक नहीं अपितु महाकाल के बेटे हैं और महाकाल का उन पर आशीष है. नवीन मध्यप्रदेश से प्रवीण मध्यप्रदेश की ओर डॉ. मोहन सरकार की सवारी चल पड़ी है. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबंद्ध हैं)

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

विज्ञापन की ‘लक्ष्मण रेखा’

    

    यह सच है कि दुनिया का पहला विज्ञापन वर्तमान मध्यप्रदेश के मंदसौर (तत्कालीन दशपुर) में पाया गया था, जो कि दशपुर अभिलेख है। यह गुप्त काल में 436-455 ईस्वी के आसपास संस्कृत में लिखा गया एक शिलालेख है। इस अभिलेख में रेशम बुनकरों के एक संघ के गुजरात से दशपुर आने और एक सूर्य मंदिर के निर्माण का वर्णन है, जिसे दुनिया के सबसे पुराने विज्ञापनों में से एक माना जाता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि देश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश के खातेे में दुनिया का पहला विज्ञापन करना भी है. समय के साथ विज्ञापन के तेवर और तासीर बदलता गया. हम यह मान सकते हैं कि विज्ञापन का मूल ध्येय समाज को सूचित करना होता है जैसा कि गुप्त काल में 436-455 निर्मित विज्ञापन के संदर्भ में भी उल्लेखित है कि इसका मुख्य उद्देश्य रेशम बुनकरों के संघ की उपलब्धि (एक सूर्य मंदिर का निर्माण) का प्रचार करना था। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि विज्ञापन का प्रथम गुण समाज को सूचित करना है. जिस गुप्तकाल के विज्ञापन की चर्चा हम कर रहे हैं और जिस काल में हम हैं, संचार साधनों की व्यापकता हो चुकी है. विज्ञापनों के इर्द-गिर्द हर पल-छिन कैद हो चुका है. आँख खुलने के साथ, बिस्तर में जाते तक विज्ञापन हमें बताता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है.

विज्ञापन का मनोविज्ञान यह भी कहता है कि एक ही उत्पाद को हर तरह से ऐसे प्रचारित करो कि उपभोक्ता उसे क्रय करने अथवा उपयोग करने के लिए विवश हो जाए. इसे अंग्रेजी में हैमरिंग भी कहते हैं अर्थात दिमाग में बार-बार जोर डालना. विज्ञापन तो कोई भी हो सकता है लेकिन विज्ञापन का निर्माण कैसे किया जाए? यहाँ विज्ञापन निर्माण कौशल की चुनौती होती है और इसमें सबसे जरूरी होता है कि विज्ञापन के लिए संवाद कैसे लिखें जाएं. इस संदर्भ में हाल ही में हमसे बिछुड़े पीयूष पांडे एक मानक गढ़ गए हैं. विज्ञापन लोगों के दिलों तक कैसे उतरे? पीयूष ने रोजमर्रा की जिंदगी से शब्द उठाये और उसे गढ़ा. जैसे चल मेरी लूना, क्या स्वाद है जिंदगी में, मिले सुर मेरा तुम्हारा, अबकी बार मोदी सरकार, दो बूंद जिंदगी की, एमपी गजब है, ठंडा मतलब कोका-कोला, बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज, हर घर कुछ कहता है। विज्ञापनों मेंं उल्लेखित ये शब्द वो हैं जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में उपयोग में आते हैं और जब ये शब्द विज्ञापन के रूप में रेडियो, टेलीविजन और अखबारों के पन्ने पर उतरे तो लगा कि हमारी बात हो रही है. मन को मथने वाले शब्द ही बेजान वस्तुओं को भी जानदार बना देते हैं. यह कमाल पीयूष पांडे ने किया और वे सबको याद आए. याद करना होगा कि ‘वाशिंग पावडर निरमा’ भी ऐसा ही विज्ञापन है जो दशकों से लोग गुनगुना रहे हैं. 

विज्ञापन के व्यवसायिक पक्ष के साथ उसके सामाजिक और नैतिक मूल्यों की बात करते हैं तो केनवास बड़ा हो जाता है. यूँ तो विज्ञापन का बेसिक कांसेप्ट उत्पाद का अधिकाधिक विक्रय करना होता है लेकिन सामाजिक और नैतिक मूल्य का भी ध्यान रखा जाना चाहिए. नयी पीढ़ी को स्मरण नहीं होगा कि कोई चार दशक पहले मॉडल मधु सप्रे ने नंगे बदन सांप लपेटकर विज्ञापन किया था जिसकी भत्र्सना हुई. ऐसे और भी कई विज्ञापन हैं जिसे समाज ने नकार दिया. यह भारतीय समाज है और यहाँ वाशिंग पावडर निरमा या हमारा बजाज जैसा संवाद ही सफल हो पाता है. हमारे घरों में चींटियों से बचाव के लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ का उपयोग किया जाता है. हम सबको पता है कि माँ सीता की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण ने जो रेखा बाँधी थी जिसे ‘लक्ष्मण रेखा’ कहा गया. इस पंक्ति को उत्पादक ने खूबसूरत ढंग से उपयोग किया और सालों से बिना विवाद ‘लक्ष्मण रेखा’ का विक्रय कर रहे हैं.     

    तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की टीम ने कुछ ऐसे राजनीतिक विज्ञापन जारी किए जिसे आम मतदाता समझ ही नहीं पाया लेकिन 2014 में अबकी बार मोदी सरकार या चाय पर चर्चा सफलता का पैमाना बनी. कम्पनियाँ बारीकी से उपभोक्ता के व्यवहार को जाँचती है. कहा जाता है कि टूथपेस्ट की बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनी ने पेस्ट का मुँह अपेक्षाकृत बड़ा कर दिया जिससे जो पेस्ट एक माह चलता था, उसकी खपत बढ़ गयी. अन्य उत्पादों में समय-समय पर यह तकनीक अपनाया जाता है. 

 बावजूद इसके यह भारतीय समाज है जो कितना भी आधुनिक हो जाए, वह अपनी जमीन नहीं छोड़ता है. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का यह अंक पीयूष पांडे को समर्पित है और उनके बहाने हम विज्ञापन के समाज का आकलन कर रहे हैं. विज्ञापन की दुनिया में जाने के लिए नयी पीढ़ी के पास बेशुमार अवसर है. और वह पीयूष पांडे के शब्द संयोजन को सीख ले तो आसमां और ऊँचा हो जाता है. विज्ञापन से सिर्फ उत्पाद नहीं बेचे जो बल्कि दिल का रिश्ता बनता है.

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...