सोमवार, 19 मार्च 2012

Jal Divas

विश्व जल दिवस २२ मार्च के लिये
चिंता पानी के साथ खत्म होती परम्परा की भी

मनोज कुमार

प्यासे को पानी पिलाना भारतीय समाज की पुरातन परम्परा है। यह भारतीय समाज की संस्कृति है और रिवाज भी। भारतीय समाज में प्यासे को पानी पिलाना पुण्य का काम माना जाता है। इस पुण्य को कथित आधुनिकता की आड़ में अंधविश्वास समझ लेने के बजाय निपट देहाती बोली में इसे परम्परा कहना होगा। भय और लालच के बिना कोई काम नहीं किया जा सकता है। सो पानीदार समाज में पानी की यह परम्परा पुण्य के लोभ में हमेशा से समृद्ध रही, यह बात मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। भारत के देहात हो या शहर, गली गली में, हर दो सौ तीन सौ फर्लांग की दूरी पर लाल रंग के कपड़े में लिपटे मटके सहज हमे अपनी तरफ खींच लाते थे। इन मटकों में भरा होता था ठंडा पानी जो मुसाफिर का सफर आरामदेह बनाता था। प्याऊ की परम्परा का श्रीगणेश किया। शायद यही कारण कि हमारे पुरखों ने उत्सव के हर अवसर पर कहीं तालाब, तो कहीं कुंआ तो कहीं बावड़ियों का निर्माण कराया। अथाह जलस्रोत हमारी परम्परा के गवाह रहे हैं।

समय गुजरा और गुजरे जमाने की याद बनती जा रही है हमारी जल की पुरातन परम्परा। दुनिया के साथ भारत में भी जलसंकट शबाब पर है। यत्न किया जा रहा है पानी बचाने का और उसे बढ़ाने का। यह सच है कि भारत में भी जलसंकट बढ़ रहा है किन्तु भारतीय समाज का यह संकट पानी का कम और परम्परा के खत्म हो जाने का ज्यादा है। हमारे पुरखों ने पानी के लिये जो जतन किये थे, उसे हम बढ़ा तो नहीं पाये, बचा भी नहीं सके। परम्परा के खत्म हो जाने से जो संकट उपजता है, इसकी बानगी आज हमारे समाज में उपजा पानी का संकट है। हमारे समाज में मौजूद लाखों जलस्रोतों को हम जीवित रख लेते तो आज सिर पीटने की नौबत नहीं आती। आज हमारे पास मॉल है, ऊंची ऊंची इमारतें हैं और इन इमारतों के नीचे सिसकते हमारे जलस्रोत हैं। कदाचित कई बार ऐसा लगता है कि ये जलस्रोत अपनी अकाल मौत पर नहीं बल्कि वे हमारी मूर्खता पर विलाप कर रहे हैं। वे शायद हँसते भी होंगे कि हम कैसे बेअकल हैं। रहने को तो इमारतें तान ली लेकिन जीने के लिये बूंद भर पानी का इंतजाम नहीं रहने दिया।

यकिन मानिये कि हर दो सौ तीन सौ कदम की दूरी पर लाल रंग के कपड़े में लिपटे मटके हमें नजर नहीं आते हैं लेकिन उनका नहीं होना भी हमें परेशान करता है। परेशानी कदम कदम पर ठंडा पानी नहीं मिलने की तो है ही, बल्कि परेशानी इस बात की भी है कि हमें तो हमारे पूर्वजों ने खूब दिया था लेकिन हमने अपनी भावी पीढ़ी को कंगाल भविष्य दिया है। र्इंट और गारे की दीवारें तो दी लेकिन पानीदार समाज का गौरव उनसे छीन लिया। यह अनुभव करना बड़ा ही असहज लगता है कि जिस पानीदार समाज की स्त्रियां पनघट पर अपने घड़े में पानी उलचती हुई अपने सुख-दुख बतियाती थीं, आज वही स्त्रियां उनका गागर खाली न रह जाये, इस चिंता में दूसरी सखी से आगे निकल जाने को बेताब हैं। यह बेताबी कई दफा फकत बैर में बदल जाती है। बीते सालों में समाज के चेहरे से उतरते पानी ने पानी के लिये खून बहा दिया। किसी एक पनघट में यह फसाद होता तो इसे दुर्घटना मान लेते, यह फसाद तो कभी भी और कहीं भी देखने को मिल जाएगा। पानी के लिये यह पाप हम अपनी ही गलतियों के कारण भुगतने के लिये मजबूर हैं। पानी के लिये आम आदमी का पानी उतर रहा है और पानीदार समाज के सामने यक्ष प्रश्न है कि हम पानीदार कैसे बने रहें? सवाल कठिन है किन्तु मुश्किल नहीं। जिसे गंवा दिया, उसे पाना तो नामुमकिन है लेकिन कुछ नया गढ़ लेने की जुगत लगानी होगी। पानी के लिये धरती की छाती छीलने के बजाय पानी बचाने का इंतजाम करना होगा ताकि हम पानीदार बने रह सकें।

२१वीं सदी में जब सारा संसार पानी के लिये हायतौबा कर रहा है। पानी बचाने की गुहार लगा रहा है। विश्व जलदिवस के अवसर पर पानी को लेकर पूरा संसार चिंता करेगा। एक दिन की चिंता से पानी का सवाल हल नहीं होना है बल्कि यह चिंता हमारे चिंतन का सबब बने। आंकड़ों की बाजीगरी भी होगी और इसी बाजीगरी से कुछ बारोजगार हो जाएंगे लेकिन पानी का सवाल जस का तस खड़ा रहेगा। संकट से मुक्त होना है तो हमें पानीदार बनना होगा और पानीदार बनना है तो पानी बचाने की मुहिम न सही, जुगत तो लगानी होगी। परम्परा को नष्ट करने का जो पाप किया है और कर रहे हैं, उन्हें अपनी गलती माननी होगी। भावी पीढ़ी को बताना होगा कि हम उन्हें कैसे संकट भरा भविष्य देकर जा रहे हैं। उन्हें इस संकट से निजात पाने का टोटका भी बताना होगा कि आने वाले समय में इमारत नहीं, तालाब, कुंए और बावड़ी बनायें। जल के ये स्रोत जीवन भी देते हैं और जीने की जगह भी। आखिर में सवाल यह भी बड़ा नहीं है कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिये लड़ा जाएगा, इससे बड़ा सवाल है कि क्या हम बिना पानी के लड़ने के लायक रह जाएंगे? जिस दिन हम इस सवाल का जवाब ढूंढ़ लेंगे, हम अपने संकट से खुद को बरी भी कर लेंगे।



बुधवार, 14 मार्च 2012

Aaj-Kal

इस परम्परा पर रोक लगे

मनोज कुमार

उत्तराखंड में कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा पेश किया और राज्यपाल ने उनके दावे पर भरोसा कर उन्हें सरकार बनाने का अवसर दिया। यह पूरी प्रक्रिया वैधानिक है और इस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है सो नहीं हुयी। आपत्ति है तो इस बात की कि कांग्रेस ने बिना मुखिया तय किये ही सरकार बनाने का दावा कैसे ठोंक दिया। एक कांग्रेसी सांसद बहुगुणा को राज्य की कमान सौंप दी। बहुगुणा को कमान सौंपने पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है किन्तु आपत्ति इस बात को लेकर है कि वे पहले से सांसद थे और उनके मुख्यमंत्री बनाये जाने से दो उपचुनाव राज्य की जनता के मत्थे मढ़ दिया गया है। पहले वे कानूनी तौर पर छह माह के भीतर विधायक का चुनाव लड़ेंगे। इसके लिये भी कांग्रेस के निर्वाचित विधायक को इस्तीफा देना होगा। इस तरह दो उपचुनाव का खर्चा जनता के मत्थे कांग्रेस ने अपनी कलह मिटाने के लिये थोप दिया है। इस सबके बाद भी यह कोई नहीं कह सकता कि बहुगुणा की सरकार स्थिर होगी और जिन कांग्रेसियों को असंतोष है, वे समस्या नहीं खड़ी करेंगे।

नेतृत्व का संकट कांग्रेस के समक्ष हमेशा से रहा है और इस संकट का समाधान वह अपने तरीके से निकालती रही है जैसा कि उसने इस बार किया। हालांकि यह संकट अब दूसरे राजनीतिक दलों के समक्ष भी हैं और वे भी कांग्रेस के रास्ते पर चल रही हैं। मध्यप्रदेश में ऐसा प्रयोग अनेक बार हो चुका है। २००३ से २००८ के चुनाव के बीच राज्य में तीन मुख्यमंत्री बदले गये जिसमें पहली दफा उमा भारती मुख्यमंत्री बनी और उन्हें पद छोड़ना पड़ा तो राज्य के एक मंत्री बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बना दिया गया था किन्तु एक साल बाद जब गौर को कुर्सी छोड़नी पड़ी तो शिवराजसिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया गया। चौहान उस समय सांसद थे सो उत्तराखंड वाली कहानी दोहरायी गयी।

राजनीतिक दल अपनी सुविधा के लिये कोई भी फैसला लेने को आतुर रहते हैं और वे यह बात भूल जाते हैं कि उनके इन फैसलों से आम आदमी पर कितना बोझ पड़ता है। वर्तमान कानून में इस बात का कोई इंतजाम नहीं है कि वे राजनीतिक दलों को इस तरह के फैसले लेने से रोक सकें लिहाजा अपनी सुविधा और सत्ता के लिये ऐसे फैसले बार बार लिये जाते रहे हैं। जब हम चुनाव कानून में सुधार की बात करते हैं तो हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए। यह एक गंभीर मामला है और इस पर सभी राजनीतिक दलों को संजीदा रहने की जरूरत है। इसी तरह पराजय के भय से अनेक बार एक प्रत्याशी द्वारा दो दो विधानसभा अथवा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना, अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर जाकर चुनाव लड़ना आदि-इत्यादि ऐसे मसले हैं जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

बुधवार, 7 मार्च 2012

Aaj-Kal

मंच वाले अमरसिंह आज नेपथ्य में

मनोज कुमार

उत्तरप्रदेष के चौंकाने वाले चुनाव परिणाम में सब लोग उलझ गये हैं। राहुल गांधी की असफलता और भाजपा की नाकामयाबी इस समय चर्चा में है। समाजवादी पार्टी की बात हो रही है तो अखिलेषसिंह की। मुलायमसिंह भी थोड़े से किनारे कर दिये गये से लगते हैं लेकिन समाजवादी पार्टी के वे संस्थापक हैं तो उन्हें अनदेखा करना उतना न तो सहज है और न ही संभव। इन सबके बीच कोई गुमनाम हुआ है तो एक षख्स जिसका नाम है अमरसिंह। अमरसिंह कभी समाजवादी पार्टी के पर्याय हुआ करते थे। सपा, मुलायम और अमरसिंह के बिना उत्तरप्रदेष की राजनीति का तानाबाना ही नहीं बुना जाता था लेकिन इस चुनाव में अमरसिंह का कोई वजूद नहीं रहा। यहां तक कि चुनाव विष्लेषण में भी उनका कभी उल्लेख तक नहीं किया गया। राजनीति में आयाराम गयाराम तो खूब होते हैं लेकिन गुमनामी की यह मिसाल होगी।

बहुत ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी में मुलामयमसिंह के बाद अमरसिंह सबसे बड़े दावेदार हुआ करते थे। कहना न होगा कि वे स्वयंभू मुलायमसिंह के उत्तराधिकारी के रूप में भी देखे जाते थे। मुलायम और अमरसिंह में तकरार हुई और अमरसिंह सपा से बाहर कर दिये गये। अमरसिंह को तब इस बात का आभाष भी नहीं रहा होगा कि उनका वजूद सपा से है, सपा का उनसे नहीं लेकिन वे इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। सच तो यही है कि समाजवादी पार्टी से बाहर होते ही वे मंच से नेपथ्य में चले गये। 2007 से 2012 के बीच के इन पांच साल में अमरंिसंह नामक का सपा का यह सिनेमाई चेहरा एकदम से विलुप्त हो गया। इस बार के उत्तरप्रदेश के चुनाव में अमरसिंह का नाम भी नहीं लिया गया। अमरसिंह के साथ इस बार उत्तरप्रदेश के चुनाव में फिल्मी सितारों का जमघट भी नहीं लगा। यह जमघट अमरसिंह लगाते थे। अमिताभ बच्चन उनके अनुज होते थे तो अनेक कलाकारों का उनसे व्यक्तिगत स्नेह था। अमरसिंह चुनाव परिदृश्य से इस तरह बाहर हो गये कि उनका कभी राजनीति से रिश्ता ही नहीं था। चुनाव में इस तरह बाहर हो जाना अमरसिंह को अखर रहा होगा।

व्यक्ति से बड़ा संगठन है, यह बात समय समय पर प्रमाणित होती रही है। सभी राजनीतिक दलों से अलग हुए या कर दिये गये लोगों का अनुभव यही रहा है। सपा से बाहर कर दिये गये अमरसिंह इसका ताजा उदाहरण हैं। एक समय कांग्रेस से बाहर हुए एनडी तिवारी, शरद पवार, संगमा को यह अनुभव हुआ था तो भाजपा में उमा भारती, कल्याण सिंह भी इसी अनुभव से गुजर चुके हैं। उमा भारती को एक अवसर मिल गया और पुरानी बातों को भुलाकर वे भाजपा में आ गयीं लेकिन जितने समय तक वे भाजपा से बाहर रहीं, उसकी तकलीफ वे ही बता सकती हैं। उत्तरप्रदेष मंे राजनीति के सिरमौर रहे कल्याणसिंह की हालत किसी से छिपी नहीं है। अपवादस्वरूप कांग्रेस से बाहर हुए षरद पवार एकमात्र ऐसे नेता निकले जिन्होंने स्वयं को स्थापित किया। कांग्रेस के बराबर तो वे कभी खड़े नहीं हो सकते थे किन्तु एक मराठा नेता के रूप में स्वयं को स्थापित कर दिखाया। आज उत्तरप्रदेष में अखिलेषसिंह की जयजयकार हो रही है। समाजवादी पार्टी की इस जीत का अर्थ तलाषा जा रहा है। एक कल्पना यह भी की जा सकती है कि आज अमरसिंह समाजवादी पार्टी में होते और उत्तरप्रदेष में समाजवादी पार्टी को यह जीत मिलती तो अमरसिंह किस तरह स्वयं को प्रचारित करते किन्तु समाजवादी पार्टी इस बात पर राहत महसूस कर सकती है कि अमरसिंह के नहीं रहने से उसे जो लाभ मिला, वह नहीं मिल पाता।

रविवार, 4 मार्च 2012

Aaj-Kal

पांच मार्च जन्मदिवस पर विशेष
सर्वधर्म-समभाव के मार्ग पर शिवराजसिंह चौहान

मध्यप्रदेश देश का ह्दय प्रदेश है। मध्यप्रदेश को लघु भारत भी कहा जाता है। यह कहावत नहीं बल्कि ऐतिहासिक सच्चाई है जो इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। मध्यप्रदेश की अपनी कोई निज बोली नहीं है, उसकी बोली देश की बोली है। वह बोली जो भारतवर्ष के हर राज्य में बोली जाती है। मध्यप्रदेश के झाबुआ से लेकर मंडला तक हर राज्य के वाशिन्दे रहते आये हैं। जिस प्रदेश में देश का दिल धड़कता हो, उस प्रदेश से समाज की उम्मीदें और भी बढ़ जाती हैं। यह उम्मीदें तब और भी सार्थक हो जाती हैं जब समाज में जात-पात और अलगावाद का बोलबाला हो। कदाचित कुछ हिस्से तो इसी बुनियाद पर स्वयं का अस्तित्व बनाये हुए हैं। कहीं कहीं यह अलगवाद, जातिवाद ही उनकी पहचान बन गयी है। मध्यप्रदेश इस बात पर गर्व कर सकता है कि उसका अपना प्रदेश इन सब पापों से मुक्त रहा है।

सर्वधर्म, समभाव इस प्रदेश की पहचान रही है। मध्यप्रदेश एक सम्पूर्ण भारतीय राज्य के रूप में व्यवहार करता है। मध्यप्रदेश का यह गौरव तब और बढ़ जाता है जब राज्य के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान राजनीति से परे हटकर शासन नीति को सर्वधर्म - समभाव के मार्ग पर चलकर नये रूप में परिभाषित करते हैं। शिवराजसिंह मुख्यमंत्री के नाते हर धर्म और सम्प्रदाय के लिये जो स्नेह और सम्मान का भाव प्रगट करते रहे हैं, वह निश्छल है। इस सम्मान में लोकप्रियता हासिल करने का भाव शून्य है बल्कि लोगों में यह विश्वास जगाने की उनकी कोशिश रही है कि सरकार सबकी है, सब सरकार के हैं। मध्यप्रदेश के लोगों को उनके अपने प्रदेश के प्रति भाव जगाने की
कोशिश ने उन्हें एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित किया है।

अपनी स्थापना के साढ़े पांच दशक से ज्यादा समय गुजर जाने के इस दौर में मध्यप्रदेश ने अनेक मुख्यमंत्री देखें हैं। सबकी अपनी रीति और नीति रही है। मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान इनसे परे नहीं है लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने अपनी एक बड़ी लकीर खींचने की कोशिश की है, जिसमें वे कामयाब दिखते हैं। एक किसान पुत्र होने के नाते सहजता उनमें जन्मजात है और राजनीतिज्ञ होने के नाते विनम्रता भी किन्तु एक कुशल शासक के रूप में उन्होंने मध्यप्रदेश की पहचान शांति का टापू को एक नया अर्थ दिया है। बरबस यह स्मरण करना थोड़ा मुश्किल होता है कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह के पहले मुख्यमंत्री के आंगन में ईद, गुरूनानक जयंती, क्रिसमस, गुड़ीपड़वा, मकर संक्राति के साथ ऐसे जलसे कभी हुए होंगे लेकिन कतारबद्ध नहीं। एक बाद एक इन आयोजनों ने हर वर्ग, हर धर्म और हर सम्प्रदाय के लोगों का विश्वास जीत लिया। सबने मुख्यमंत्री शिवराजिंसिंह की सफलता की कामना की। कोई त्योहार, कोई पर्व, कोई उत्सव ऐसा नहीं था जहां मुख्यमंत्री शिवराजसिंह स्वयं अपने परिवार के साथ मेहमानों के स्वागत में आतुर न हों।
मध्यप्रदेश को शांति का टापू कहा जाता है और लघु भारत के नजरिये इस प्रदेश की तासीर धर्मनिरपेक्ष होने की उम्मीद सहज ही है। मध्यप्रदेश में वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और शिवराजसिंह चौहान इस सरकार में मुख्यमंत्री। इस नाते उन पर एक खास विचारधारा के पोषक होने का आरोप उन पर लग सकता था लेकिन उन्होंने अपने आपको साफ बचा लिया।

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप मायने नहीं रखता है और इस मायने में शिवराजसिंह सरकार पर प्रतिपक्षी दलों ने अनेक आरोप दागे लेकिन इन आरोपों में उन पर किसी खास विचारधारा का आरोप नहीं लगा। इसका सबसे बड़ा कारण था कि शिवराजसिंह इस देश के सर्वमान्य राजनेता अटलविहारी वाजपेयी का अनुसरण करना। राष्ट्रीय राजनीति में जितना विशालकाय कद अटलजी का है और उन्हें सभी दल उतना ही सम्मान देता है लगभग यही तस्वीर शिवराजसिंह की बन रही है। उनके बारे में लोगों की धारणा बन गयी है कि वे सर्वधर्म-समभाव के रास्ते पर चलने वाले राजनेता हैं।

लगातार दूसरी दफा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन शिवराजसिंह के लिये यह अवसर केवल राजनीतिक नहीं था बल्कि जनसरोकार की प्रतिबद्धता के चलते उन्हें यह जिम्मेदारी मिली। राज्य की महिलाओं, किसानों, बच्चों, जनजातीय समाज के लिये उनकी चिंता किसी से छिपी नहीं है। मुख्यमंत्री निवास पर चौपाल बुलाकार लोगों से उनका हाल जानने की एक नयी परम्परा का श्रीगणेश कर शिवराजसिंह ने आम आदमी और मुख्यमंत्री आवास की दूरी खत्म करने की कोशिश की है तो लगातार सफर कर लोगों से मिलकर उनका हाल जानने के लिये पहुंचने के उनके कार्यक्रम को नाम दिया गया जनदर्शन। पांव पांव वाले भैया के रूप में अपनी पहचान बनाये रखने वाले मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान कभी स्वयं को मुख्यमंत्री के रूप में नहीं बल्कि समाज के सेवक के रूप में देखते हैं। उनकी यह निच्छलता, उनकी यह सहजता, उनकी यह सादगी भला किसे नहीं मोह लेगी राजनीति के इस युवा मुख्यमंत्री से लोगों की आस बढ़ रही है। वे  राजनीतिक के स्वार्थी रास्तों से खुद को परे रखे हुए हैं। उनके पैर लालच के रास्ते पर चलकर सत्ता के सिंहासन पर बैठने की कभी नहीं रही है। उनके मन की लालसा अपने मध्यप्रदेश को शिखर पर देखने की रही है और यही कारण है कि आओ बनाये अपना मध्यप्रदेश अथवा स्वर्णिम मध्यप्रदेश का उनका सपना सच होता दिख रहा है। जिस राज्य की सड़कों का मतलब गड्ढ़ा हुआ करता था, आज उसी मध्यप्रदेश की सड़कें मखमल सी हो गई हैं। सड़कों का बन जाना एक प्रक्रिया है और किसी भी सरकार का दायित्व लेकिन सड़कें समय पर बन जायें, उद्योग चल कर आये, युवाओं को रोजगार मिले, यह प्रक्रिया नहीं, संकल्प की बात है और इस संकल्प को साकार करते हुए आप देख सकते हैं मध्यप्रदेश में । राज्य के पूर्वजों-पुरखों का स्मरण कर उन्हें नमन करने की वे औपचारिकता पूरी नहीं करते हैं बल्कि उनके कार्यो को स्थायी पहचान देकर भावी पीढ़ी के लिये प्रेरणास्रोत के रूप में हमेशा हमेशा के लिये अमर कर देते हैं। । लाडली के रास्ते बिटिया के आंखों में मुस्कराहट देखने के लिये बेताब मुख्यमंत्री शिवराजसिंह उन राज्यों के लिये भी रोल मॉडल बन गये हैं जिन्होंने कभी बिटिया बचाने के लिये ऐसी प्रतिबद्धता देखी नहीं थी। शिवराजसिंह ने मुख्यमंत्री के रूप में और स्वयं शिवराजसिंह के रूप में मध्यप्रदेश को एक अलग पहचान और नाम दिया है। ऐसा यशस्वी जन्मदिन वे चिरकाल तक मनाते रहें, यह मंगल कामना पूरे प्रदेश की होगी, मध्यप्रदेश की होगी।



रविवार, 19 फ़रवरी 2012

cinema ke 100 saal

सिनेमा सौ साल का

१९१३ में भारत की पहली फिल्म राजा हरिशचंद्र का निर्माण दादा साहेब फालके ने किया था। इस फिल्म के निर्माण एवं प्रदर्शन के साथ भारतीय सिनेमा का आरंभ माना जाता है। १९१२ में भारतीय सिनेमा अपने सौंवे वर्ष में प्रवेश कर चुका है। आने वाले फरवरी २०१३ में भारतीय सिनेमा सौ बरस पूरे कर १०१ वर्ष में प्रवेश कर जाएगा।

समागम भारतीय सिनेमा के सुनहरे दिनों को याद करते हुए अपने १२वें वर्ष के पहले अंक को भारतीय सिनेमा पर एकाग्र किया है। सिनेमा के विविध आयामों पर चर्चा/आलेख और शोधपत्रों का प्रकाशन कर रहे हैं। जैसा कि आपको मालूम ही है कि समागम मीडिया एवं सिनेमा की अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका है और सिनेमा पर वैसे भी हम नियमित सामग्री प्रकाशित करते हैं किन्तु फरवरी-२०१३ तक समागम में भारतीय सिनेमा के कुछ नये सिंगमेंट पर सामग्री प्रकाशित करने का प्रयास होगा।

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

Aaj-Kal

रंगमंडल की उदासी से मुस्कराया राज्य नाट्य विद्यालय

मनोज कुमार

तीस बरस पहले जब भोपाल में भारत भवन की स्थापना हुयी थी तो यह भारत भवन एक उम्मीद की बुनियाद थी। संस्कृति, कला और साहित्य के लिये। भारत भवन के बूते भोपाल ने पूरे विश्व में एक सांस्कृतिक नगर का गौरव पाया था। बाद के  वर्षाें में अपने अनेक उत्कृष्ट आयोजनों के साथ दुनिया के कला मंच पर भारत भवन की ख्याति बढ़ती गयी और उम्मीदें भी। आहिस्ता आहिस्ता समय गुजरता गया। इस गुजरते समय ने भारत भवन की पहचान को पुख्ता नहीं किया बल्कि ख्याति सीजने लगी। स्वार्थाें की यह सड़न और सीड़न ने भारत भवन को असमय असामयिक बना दिया। तीस बरस के इस सफर में उसकी खूबियां, उसकी कामयाबी और उसकी चमक विवादों में खो गयी। कल का कलागृह अब कलह गृह के रूप में पहचाना जाने लगा और बाद के वर्षाें में यही उसकी स्थायी पहचान बन गयी। इस तीस बरस की समीक्षा करेंगे तो पाएंगे कि जिस तरह संस्कृति और कला के साधकों ने इस पर अपनी धाक जमाने की कोशिश की तो राजनेताओं ने भी इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली तक अपनी आवाज की छाप छोड़ने के लिये जब भी जरूरत पड़ी, भारत भवन का इस्तेमाल किया गया। राजनीतिक गलियारों में भी भारत भवन को लेकर उत्पन्न हुआ रोमांच आहिस्ता आहिस्ता थम सा गया।

भारत भवन के बारे में चर्चा करें तो रंगमंडल एक बड़ा अध्याय होता है। लगभग पन्द्रह बरस पहले हमने भारत भवन के कलाकारों और उनसे जुड़े संस्कृति के लोगों से चर्चा में इस बात पर जोर दिया था कि रंगमंडल भारत भवन के परिसर से बाहर क्यों नहीं जाता है? तब छत्तीसगढ़ अलग नहीं हुआ था। इस बारे में तर्क कम और कुतर्क अधिक था। रंगमंडल की गतिविधियों का विकेन्द्रीकरण नहीं हो सका और जो जहां था, वहीं का रह गया। एन.एस.डी. की जो पहचान थी, उससे इतर भारत भवन के रंगमंडल के पहचान बनाने की कोई कोशिश नहीं हुई। कभी अपने प्रभावशाली प्रदर्शनों के लिये रंगमंडल की एक छाप थी, यह छाप भी धुंधलाता गया। रंगमंडल लगभग नेपथ्य में ही चला गया। आज भारत भवन के आंगन में लगातार नाटकों का प्रदर्शन हो रहा है किन्तु इसकी गुणवत्ता पर कोई चर्चा
नहीं होती है। नाटकों को दर्शकों का अभाव लगातार बना हुआ है। शुक्र इस बात का करना चाहिए कि एक सिलसिला तो कायम है।
कभी इस बात को गौर से न तो सोचा गया और न ही किया गया कि आखिर इस सांस्कृतिक विरासत का संवर्धन और संरक्षण कैसे किया जाए, इसका परिणाम यह हुआ कि भारत भवन को विस्तार देने के बजाय उसके बराबर में दूसरी संस्थाएं खड़ी की गई। विस्तार का यह चेहरा भी बुरा नहीं है लेकिन सुखकारक नहीं कहा जा सकता है। भारत भवन के बराबर में कोई और खड़ा हो तो गुरेज नहीं लेकिन एक विरासत को विस्तार देना ज्यादा सार्थक होता। इस स्थिति के लिये भारत भवन परिवार ही ज्यादा दोषी है। जिन लोगों ने भारत भवन में रहकर सीखा, समझा और कम से कम देश में अपना नाम किया, वे लोग भारत भवन से परे हो गये। अपनी एक नयी दुनिया गढ़ ली। अपने को आबाद कर गये और जहां से सीखा, नाम पाया, उसे अकेला छोड़ गये। भारत भवन एक बिÏल्डग है, बस्ती नहीं। बस्ती होती तो शोर होता। शोर उन लोगों के खिलाफ जिन लोगों ने एक पीढ़ी गढ़ने तक भी इंतजार नहीं किया। बाबा कारंत, स्वामीनाथन के देहांत के बाद भारत भवन की रौनक कम हुई है। यह प्रकृति का नियम है। एक दिन उन्हें हमसे बिछड़ना था तो प्रकृति ने यह नियम भी बनाया है कि परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये कुछ लोग शिक्षित होते हैं और वे उनकी परम्परा को आगे बढ़ाते हैं। भारत भवन इस मामले में दुर्भाग्यशाली रहा। बिलकुल उसी तरह जिस तरह देश के अनेक प्राचीन और ख्यातिनाम संस्कृति और शिक्षा के घर दुर्भाग्यशाली रहे हैं।

प्रकृति का एक और नियम है। यह नियम कहता है कि तू नहीं और सही, इसी की तर्ज पर राज्य नाट्य विद्यालय की स्थापना हो गयी। राज्य नाट्य विद्यालय की मुस्कराहट रंगमंडल की इस उदासी का ही परिणाम मानने में किसी को हिचक नहीं होना चाहिए। जो काम रंगमंडल अपने चमकते दिनों में कर सकता था, उसने नहीं किया और आज वही काम राज्य नाट्य विद्यालय कर रहा है। छत्तीसगढ़ अलग हो जाने के बाद मध्यप्रदेश के अंचलों में राज्य नाट्य विद्यालय के विद्यार्थी नये किस्म के प्रयोग कर रहे हैं। वे सीखने के बाद प्रदर्शन के लिये दिल्ली तक अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शन में पहुंच गये हैं। एक कल्पनाशील संस्कृति अधिकारी के बूते राज्य नाट्य विद्यालय की यह कामयाबी चमत्कारिक नहीं है बल्कि योजनाबद्ध तरीके से अपने उद्देश्य को अंजाम तक पहुंचाना है। इसे रंगमंडल की नाकामयाबी तो मान ही लेना चाहिए।

भारत भवन के इस तीस बरस के सफर में पहले दस साल बहुत खुशनुमा रहे। संस्कृति, साहित्य और कला का संगम को देखना अभूतपूर्व था। बाद के दस वर्ष में यह अहसास थोड़ा कम हुआ और बचे दस वर्षाें में भारत भवन लगभग अनदेखा किया गया। आयोजनों की खनक अब वैसी ऊर्जा उत्पन्न नहीं करती जैसा कि खजुराहो का नृत्य उत्सव आज भी करता है। अब भारत भवन के वर्षगांठ की प्रतीक्षा वैसी नहीं रहती जैसा कि मध्यप्रदेश आदिवासी लोककला परिषद के लोकरंग के आयोजन को लेकर आज भी है। भारत भवन के आंगन में होने वाले राज्य के प्रतिष्ठापूर्ण सम्मान समारोह भी अब बेसमय होने लगे हैं। एक सच यह भी है कि दस बीस बरस पहले भोपाल आने वाले लोगों की उत्कंठा भारत भवन देख लेने की होती थी, वह भी आहिस्ता आहिस्ता मरने लगी है। अब उम्मीद कर सकते हैं कि भारत भवन में एक सुबह होगी जो अपने गौरव को लौटाने के संकल्प के साथ होगी। एक आस फिर जागेगी जो कला और संस्कृति के लिये आम आदमी में भारत भवन की तरफ लौटने को विवश करेगी। बस एक उम्मीद ही है भारत भवन का फिर से भारत भवन बन जाने की।


शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

khari khari

कोलावरी डी अब गाना नहीं, लोरी है

मनोज कुमार

मां और बच्चे के बीच स्नेह का रिश्ता प्रगाढ़ करने वाले गीत को हम बचपन से लोरी के नाम पर सुनते आये हैं। रोता बच्चा, भूखा बच्चा, परदेस गये पिता की याद में बिसूरता बच्चा जब अपनी मां से मीठी लोरी सुनता है तो देखते ही देखते उसकी पलके झपकने लगती है और वह सो जाता है। इस मीठी लोरी गाने वाली मां को अपनी आवाज नहीं मांजनी होती है और ना ही उसे कोई रियाज करना होता है। स्नेह के साथ थपकी देती मां के बोल सो जा राजा, सो जा बिटिया रानी…और बस इसी के साथ बच्चे सपनों की दुनिया में डूबने उतरने लगते हैं अपनी मां की बाहें थामे।

लोरी एक पुरानी विधा है बच्चों को पालने की, उन्हें सीख देने की और इस विधा को फिल्मों में भी खूबसूरती से फिल्माया गया है। लल्ला लल्ला लोरी…दूध की कटोरी…या फिर मेरे घर आयी एक नन्हीं परी…आदि इत्यादि। अनेक ऐसे गीत लोरी बनकर भारतीय दर्शकों का न केवल मनोरंजन करते रहे हैं बल्कि घरों में काम आते रहे हैं। समय बदला, चीजें बदली, सोच बदली और बदल गयी दुनिया। मां भी आधुनिक हो गयी है। आज की मां ने खुद लोरी सुनकर निंदिया रानी की गोद में गयी होगी लेकिन अब वक्त की कमी है।

यह कह देना पूरी तरह से गलत होगा कि लोरी के दिन लद गये बल्कि यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि लोरी अब नये अवतार में है। कोलावरी डी के रूप में। अपने घर आंगन से लेकर ट्रेन के सफर में रोते बच्चे को मां कहती है बेटा चुप हो जा..तुझे कोलावरी डी सुनाती हूं। बच्चा धधकते और धकड़ते संगीत के शोर में लगभग चिल्लाते हुए, बोल भी अनजान और एक मध्यमवर्गीय परिवार के समझ से बाहर कोलावरी डी को सुन कर, शायद डर कर भी कहें तो गलत नहीं होगा…बच्चा आंखें मींच लेता है और आहिस्ता आहिस्ता नींद के आगोश में चला जाता है। इस लोरी को गाने की जरूरत भी नहीं है…मोबाइल चालू कर दीजिये, आइपॉड से भी सुना सकते हैं…

लोरी कोलावरी डी से बच्चा सो जाता है लेकिन भीतर ही भीतर सहम जाता है। कोलावरी डी उसे साहस नहीं देता है, लल्ला लल्ला लोरी…उसे साहस देता था…चंदा और चिड़िया की बातें बच्चों की दुनिया गढ़ती थीं…कोलावरी डी को सुनकर बच्चों के चेहरे पर सोते समय की मीठी मुस्कान नहीं दिखती है…चंदा और चिड़िया के टूटे-फूटे गीतों को सुनकर बच्चे के चेहरे पर एक शांत चमक आ जाती है। मैं अंग्रेजी कम जानता हूं..इस बात का धन्यवाद कर सकता हूं…वह इसलिये कि मुझे कोलावरी डी का हिन्दी अनुवाद नहीं मालूम लेकिन जिन लोगों को कोलावरी डी का हिन्दी अनुवाद मालूम है, उनसे एक आग्रह है, निवेदन है कि वे उसका अर्थ जान लें….यह किसी भी अर्थ में लोरी हो नहीं सकती..होना भी नहीं चाहिए..बच्चों को चांद और चिड़िया, परी और पंख की लोरी ही सुनने दें…उनके मन में विश्वास पलने दें…

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