बुधवार, 16 जून 2021

मेरठ से पहले विद्रोह हरियाणा में हुआ- प्रो. पुनिया


महू (इंदौर). भारतीय स्वाधीनता संग्राम में हरियाणा का योगदान अप्रतिम रहा है. 1857 का पहला विद्रोह के लिए मेरठ का उल्लेख मिलता है जबकि मेरठ के पहले अंबाला में प्रथम विद्रोह हुआ था. इस विद्रोह में 50 अंग्रेजों को बंदी बना लिया गया था. यह बात प्रो. महासिंह पुनिया, निदेशक युवा एवं सांस्कृतिक प्रभाग कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय ने कही. प्रो. पुनिया आजादी के अमृत महोत्सव के तीसरे व्याख्यान में ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा के योगदान विषय पर बोल रहे थे.’ यह आयोजन डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, हेरिटेज सोसायटी पटना एवं युवा एवं सांस्कृतिक प्रभाग कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय हरियाणा के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था. प्रो. पुनिया ने कहा कि हरियाणा का गठन 1966 में हुआ है लेकिन भारतीय स्वाधीनता संग्राम के समय रियासतों में बसा हरियाणा का योगदान अमिट और अमूल्य है. उन्होंने 12 बड़ी लड़ाईयों का तथ्याों के साथ विवरण देकर बताया कि किस तरह अंग्रेजों को हरियाणा के लोगों ने परेशान कर दिया था. प्रो. पुनिया ने कहा कि इतिहास को पुन: लिखने की आवश्यकता है जिसका कार्य आरंभ कर दिया गया है. मधुबन में हरियाणा का पहला संग्रहालय बनाया गया है जहां 1857 के समय के दस्तावेज को रखा गया है. चार सौ करोड़ की लागत से शहीद स्मारक का निर्माण किया जा रहा है जहां स्वाधीनता संग्राम के विविध पहलुओं को संजोया जाएगा. कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में भी स्थापित संग्रहालय की जानकारी दी.
प्रो. पुनिया ने बताया कि अंग्रेजों की एक बड़ी परेशानी का कारण था कि हरियाणा हावी हो गया था तो दिल्ली की सत्ता पर खतरा हो सकता है. इसी डर में अंंग्रेजों ने बेरहमी से स्वाधीनता सेनानियों को दबाने की कोशिश की. आम आदमी में डर पैदा हो इसलिए पेड़ों पर, हवेलियों के दरवाजे पर सरेआम फांसी दी जाती थी. उन्होंने रोहणात का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस तरह हम जलियांवाला बाग का स्मरण करते हैं, उसी तरह रोहणात के एक कुएं में स्वाधीनता सेनानियों को मारकर भर दिया गया था. एक अन्य घटना कउल्लेख करते हुए प्रो. पुनिया ने बताया कि सडक़ पर सेनानियोंं को रोडरोलर से कुचल दिया गया. पूरी सडक़ खून से रंग गई थी. आज उस सडक़ को लाल सडक़ के नाम से जानते हैं.  
कार्यक्रम की शुरुआत हेरीटेज सोसाईटी के महानिदेशक डा. अनंताशुतोश द्विवेदी के स्वागत भाषण से हुई. डा द्विवेदी ने  भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन के गुमनाम योद्धाओं के नामों  को बताने तथा  वैसे समस्त जीवित नायकों के बारे  में जानकारी उपलब्ध कराने  का निवेदन देश-दुनिया से देख रहे दर्शकों से किये.
कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो. नीरू मिश्रा ने अमृत महोत्सव एवं विश्वविद्यालय के बारे में विस्तार से जानकारी दी. प्रो. मिश्र ने कहा कि राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन के मार्गदर्शन एवं कुलपति प्रो. आशा शुक्ला के अथक मेहनत से यह सब संभव हो पा रहा है. उन्होंने इस आयोजन के लिए हेरिटेज सोसायटी पटना एवं महानिदेशक श्री द्विवेदी के प्रति आभार व्यक्त किया. कार्यक्रम का संचालन श्री भरत भाटी ने किया. अकादमिक का संयोजन योगिक साइंस विभाग के शिक्षक श्री अजय दुबे ने किया. कार्यक्रम का संयोजन डीन प्रो. डीके वर्मा के मार्गदर्शन में हुआ और रजिस्ट्रार श्री अजय वर्मा एवं तथा  हेरीटेज सोसाईटी के समस्त  पदाधिकारियों एवं  शोधार्थियों  का  योगदान रहा. संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के नेक कंसलटेंट एवं मीडिया प्रमुख डॉ. सुरेन्द्र पाठक तथा मीडिया प्रभारी मनोज कुमार ने संगोष्ठी में उपस्थित रहे.

बुधवार, 9 जून 2021

ग्रामीण, किसान और आदिवासी समाज के उत्सर्ग का उल्लेख जरूरी- डॉ झा

 आजादी का अमृत महोत्सव संगोष्टी  

ग्रामीण, किसान और आदिवासी समाज के उत्सर्ग का उल्लेख जरूरी- डॉ झा
महू (इंदौर)। ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमृत महोत्सव के अवसर पर आजादी के नायकों का और सम्पूर्ण आजादी का स्मरण करना हम सबके लिए गौवर की बात है. हमारी आजादी क इतिहास उस आमजन, ग्रामीण और किसान के उत्सर्ग का स्मरण किए बिना पूरा नहीं हो सकता जिन्होंने देश की आजादी के लिये अपने प्राणों का न्योछावर कर दिया।’ यह बात केन्द्रीय विश्वद्यिालय साउथ बिहार में सेंटर फॉर हिस्टोरिकल एवं आर्कालॉजिकल विभाग के अध्यक्ष डॉ. सुधांशु कुमार झा ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नवीन परिप्रेक्ष्य : ग्रामीण बिहार प्रतिबिंब’ को संबोधित करते हुए कहा. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इतिहास लेखन के लिए हमें गांव की ओर जाना होगा जहां असंख्य अनाम शहीद हैं जिनके बारे में हम जानते भी नहीं हैं. दुनिया भर में भारत का स्वाधीनता आंदोलन अतुलनीय है. उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन अहिंसक था लेकिन अंग्रेजी शासक ने अहिंसा का जवाब हिंसा से दिया.  
डॉ बी आर अम्बेडकर यूर्निवसिटी ऑफ सोशल साइंस एवं हेरीटेज सोसायटी पटना के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित वेबीनार संगोष्ठी में डॉ. झा ने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ऐसी कई घटनाएं हैं जब अंग्रेजों ने निहत्थे अहिंसक आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाकर उन्हें शहीद कर दिया. ग्रामीण भारत की चर्चा करते हुए डॉ. झा ने कहा कि महात्मा गांधी का आंदोलन चम्पारण से शुरू होता है. गांधीजी का सविनय अवज्ञा आंदोलन बिहार से ही आरंभ होता है. उन्होंने इतिहास लेखन की चर्चा करते हुए इस बात की चिंता जाहिर की कि इतिहास लेखन में कई धाराओं ने कार्य किया लेकिन दुर्भाग्य से कुछ लोगों ने कुछेक नेताओं तक ही स्वाधीनता संग्राम को केन्द्रित कर दिया. उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम के लिए लडऩे वाले नेताओं के योगदान को ना तो कम किया जा सकता है और ना ही विस्मृत लेकिन नए भारत में इतिहास लेखन में ग्रामीण समाज के योगदान को रेखांकित किया जाना चाहिए.
डॉ झा ने अपनी चर्चा में स्वाधीनता संग्राम में मध्यप्रदेश के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश शहीद चंद्रशेखर की जन्मस्थली और कार्यस्थली रही है. उन्होंने गुंडादाई, बेया बाई, बिरजू गोंड जैसे शहीदों का उल्लेख करते हुए कहा कि घास काटते निहत्थे लोगों को अंग्रेजी पुलिस ने अपनी गोली का शिकार बना दिया. बैतूल जंगल सत्याग्रह का उल्लेख करते हुए डॉ. झा ने कहा गुंजन सिंह के नेतृत्व में जंगल सत्याग्रह में कौमा गोंड पुलिस गोली का शिकार होकर शहीद हो गए. ऐसे अनेक नाम है जिन्हें तलाश कर स्वाधीनता संग्राम के दस्तावेज का हिस्सा बनाना है. उन्होंने बिहार के मुंगेर का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां भी पुलिस ने निहत्थे 17 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया. जब सवाल उठा तो कहा गया कि चार हजार की भीड़ थाने पर हमला करने आयी थी जबकि सच्चाई यह है कि आज भी उस जगह पर चार हजार लोग इक_ा नहीं हो सकते हैं. उन्होंने अंत में कहा कि ग्रामीण भारत के योगदान को रेखांकित कर अमृत महोत्सव को गौरवशाली बनाया जा सकता है.
कार्यक्रम के आरंभ में अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर आशा शुक्ला ने कहा कि नई पीढ़ी को यह बताना होगा कि आजादी के लिए हमें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. आजादी ऐसे ही नहीं मिल गई है. नई पीढ़ी को हमारे शहीद पुरखों से परिचय कराना होगा और इसके लिए इतिहास लेखन की आवश्यकता है. उन्होंने आश्वस्त किया कि विश्वविद्यालय पुस्तकाकार में विद्वान लेखकों के विचारों का प्रकाशन करेगा. कार्यक्रम में अतिथियों का परिचय एवं आभार प्रदर्शन हेरिटेज सोसायटी, पटना के महानिदेशक अनंतआशुतोष द्विवेदी ने दिया और कार्यक्रम का संचालन ब्राउज के डॉ. अजय दुबे ने किया. विशेष सहयोग प्रोफेसर डीके वर्मा, डीन सोशल साइंस एवं रजिस्ट्रार श्री अजय वर्मा का रहा.

शनिवार, 5 जून 2021

पांच नहीं, मनुष्य अपने समाथ्र्य के अनुरूप अधिकाधिक पेड़ लगाये- शर्मा

 विश्व पर्यावरण दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी 

महू।  ‘पांच पेड़ लगाओ का संकल्प गलत है बल्कि प्रत्येक मनुष्य अपने सामथ्र्य के अनुरूप अधिकाधिक पौधा लगाये. प्रकृति ने मनुष्य को समाथ्र्य दिया है कि वह अपने कार्यों से प्रकृति का ऋण चुकाये.’ यह बात पद्यश्री से सम्मानित श्री महेश शर्मा पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि की आसंदी से बोल रहे थे. संगोष्ठी का विषय ‘प्री एंड पोस्ट कोविड-19 : इम्पेक्ट ऑफ एनवायरमेंटएंड बॉयोडॉयवर्सिटी’. संगोष्ठी का आयोजन डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू, स्कूल ऑफ सोशल साइंस, यूजीसी स्ट्राइड प्रोजेक्ट, नेशन एकेडमी ऑफ साइंस चेप्टर, भोपाल एवं सोसायटी ऑफ लाइफ साइंसेंस के संयुक्त तत्वावधान में  किया गया था. मुख्य अतिथि श्री शर्मा ने कहा कि जो रचा गया है, वह मनुष्य के पुरुषार्थ का परिणाम है और जो खराब हो रहा है, वह उसके भीतर का लालच है. उन्होंने मनुष्य एवं पशु की खासियत को स्पष्ट करते हुए कहा कि पशु उपभोग के लिए होता है लेकिन मनुष्य परामर्थ के लिए होता है. मनुष्य समस्या पैदा करता है, पशु नहीं.  उन्होंने कहा कि आप कहीं भी पेड़ लगायें, कहीं भी जलसंरक्षण करें, वह पूरे समाज के लिए उपयोगी होता है. उन्होंने आयोजन के लिए धन्यवाद करते हुए कहा कि आज का दिन परम्परा के हस्तांतरण करने का दिन है.    

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति प्रो. अखिलेश पांडे ने कहा सुखमय जीवन के लिए संस्कृति और प्रकृति में संतुलन आवश्यक है. संस्कृति और प्रकृति में असंतुलन से विनाश की स्थिति बनती है. उन्होंने भविष्य के खतरे के प्रति सचेत करते हुए कहा कि पर्यावरण में जो सुधार दिख रहा है, वह स्थायी नहीं है. बल्कि इसे स्थायी करने के लिए हमारी जीवनशैली में परिवर्तन लाना होगा. उन्होंने कोरोना महामारी एवं फंगस डिसीस पर विस्तार से अपनी बात रखी. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर यूसी श्रीवास्तव ने कहा कि कोरोना महामारी नई नहीं है. यह बार बार रूप बदल कर आता है. 1960 में अलग अलग नाम से आया था जिसे आज हम कोविड-19 के नाम से जान रहे हैं. उन्होंने कहा कि कोविड-19 की दूसरी लहर खतरनाक है. उन्होंने कहा कि लॉकडाउन से जो हमें जलवायु सुधार का लाभ दिख रहा है, वह शॉर्टटर्म है लेकिन भविष्य में यह नुकसानदेह होगा. उन्होंने कहा कि रिसर्च लैब बंद है तो रिसर्च वर्क नहीं हो पा रहा है. जमीनी कार्य थम गया है. उन्होंने कहा कि एक संतुलित समाज के लिए संतुलन की जरूरत होती है. उन्होंने पर्यावरण एवं जैव विविधता के संदर्भ में विस्तार से अपनी बात रखी.

    महर्षि दयानंद यूर्निवसिटी, रोहतक हरियाणा की प्राणीशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. विनीता शुक्ला ने कहा कि कोरोना काल में हम उन सब जीव जंतुओं को देख पा रहे हैं जो विलुप्ति के कगार पर थे. उन्होंने कहा कि ये अच्छा संकेत है लेकिन संरक्षण और संवर्धन के लिए कोरोना महामारी की समाप्ति के बाद सुनियोजित प्रयास करना होगा. उन्होंंने प्रेजेन्टशन के माध्यम से बताया. मेपकॉस्ट, भोपाल में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजीव सक्सेना ने धरातल से जुड़ी बातें कही. उनका जोर था सेटेलाइट माध्यमों का उपयोग कर जीवन को सरल बनाना. आर्गेनिक खेती पर जोर देते हुए डॉ. सक्सेना ने बताया कि ओबेदुल्लागंज में मेपकास्ट आर्गेनिक खेती कर रहा है और लोगों को प्रशिक्षण के उपरांत रोजगार भी उपलब्ध करा रहा है. उन्होंने गांवों से पलायन को एक बड़ी समस्या के रूप में चिहिंत करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ लेकर ग्रामीण स्तर पर संभावना बढ़ी है. कस्तूरी मृग का उदाहरण देते हुए डॉ. सक्सेना ने कहा कि मृग की नाभि में ही कस्तूरी होता है लेकिन वह ढूंढता है कि सुगंध कहां  से आ रहा है. समस्या का हल हमारे पास है, बस उसे क्रियान्वयन करने की जरूरत है.
    शासकीय महाविद्यालय सतना के प्रोफेसर शिवकेश प्रताप सिंह ने संगोष्ठी के प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के बाद उत्पन्न स्थिति के चलते लॉकडाउन से जो परिणाम आए हैं. अब कई देशों की मांग है कि वर्ष में एक निश्चित समय के लिए लॉकडाउन लगाया जाए ताकि जलवायु स्वस्थ हो सके. पर्यावरण एवं जैविक संरक्षण कानून की समीक्षा करने, संशोधन करने एवं सख्ती से लागू करने पर बल दिया गया. आत्मनिर्भर भारत की तर्ज पर नगरीय संस्थायें अनुदान देकर सोलर पेनल लगाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करें. उन्होंने वॉटर हार्वेस्टिंग कम्लसरी करने की बात भी बतायी. पौधा लगाकर औपचारिकता पूरी करने के स्थान पर उसके संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाए. घटते वनक्षेत्र को बढ़ाकर क्षतिपूर्ति की जाए. अपने अध्यक्षीय उद्बबोधन में कुलपति डॉ. आशा शुक्ला ने कहा कि हमारी परम्परा में जीव-जंतु एवं पेड़-पौधों से रिश्ता बनाने की पुरानी रीत है. नागपंचमी या तुलसी पूजन इसका एकाध उदाहरण है. उन्होंने कहा कि अग्रिहोत्र एवं वैदिक यज्ञ पर रिसर्च करने का प्रस्ताव है.
    कार्यक्रम के आरंभ में डीन प्रो. डीके वर्मा ने विश्वविद्यालय का परिचय दिया एवं विस्तार से बताया कि वर्ष 2020 से कोरोना के बाद से लगातार अध्ययन किया जा रहा है. उन्होंने कुलपति डॉ. आशा शुक्ला का धन्यवाद करते हुए कहा कि वेबीनार के माध्यम से विश्वविद्यालय में संवाद का सिलसिला जारी रख. प्रो. वर्मा ने बताया कि अब तक 100 संगोष्ठी हो चुकी है और 150 का कार्यक्रम तैयार है. कार्यक्रम का संचालन डॉ. मनमोहनप्रकाश श्रीवास्तव ने किया. संगोष्ठी को कामयाब बनाने में रजिस्ट्रार श्री अजय वर्मा एवं उनकी टीम का सक्रिय सहयोग रहा. 10 जून को नई शिक्षा नीति: कौशल विकास में शिक्षकों की भूमिका पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है.

बुधवार, 2 जून 2021

पूर्वाग्रह से ग्रसित इतिहास लेखन बड़ी चुनौती- प्रो. चतुर्वेदी

 ‘भारतीय इतिहास की समस्यायें : चौरी चौरा पुनरावलोकन’

महू (इंदौर). ऐतिहासिक पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर जिस तरह का इतिहास लेखन किया गया है, वह हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती है. इतिहास लेखन प्रामाणिक एवं पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए ताकि हम वास्तविक स्थिति को जान सकें. यह बात इतिहासकार एवं आईसीसीआर के सदस्य प्रोफेसर हिमांशु चतुर्वेदी ने कहा. प्रोफेसर चतुर्वेदी निर्माणाधीन सेंट्रल विस्टा के बारे में  बताते हैं कि 9 स्तंभों की एक गैलरी है जिसमें भारतीय इतिहास की प्रामाणिक एवं आम आदमी के समझ में आने वाली भाषा में उल्लेख किया गया है. प्रोफेसर चतुर्वेदी डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय महू एवं हेरिटेज सोसायटी पटना के संयुक्त तत्वावधान में आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में चौरी-चौरा कांड  ‘भारतीय इतिहास की समस्यायें : चौरी चौरा पुनरावलोकन’ पर बोल रहे थे. प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि इतिहास में यह बात स्थापित कर दी गई है कि चौरी चौरा घटना 5 फरवरी 1922 को हुई थी जबकि वास्तविकता यह है कि चौरी चौरा की घटना 4 फरवरी, 1922 को सायं 4 बजे हुई थी. उन्होंने बताया कि वे स्वयं 6 माह तक चौरी चौरा क्षेत्र में घूमकर जमीनी स्तर पर इस पूरे मामले की तहकीकात की है और वास्तविक स्थिति को जाना है. अनेक दस्तावेज और लोगों से चर्चा के बाद यह बात स्पष्ट हुई है कि अब तक इतिहास में जो कुछ बताया गया, वह भ्रमित करने वाला है.
इतिहासकार प्रो. चतुर्वेदी ने इतिहास की समस्यायें : चौरी चौरा पुनरावलोकन’ विषय को दो भागों में विभक्त कर विस्तार से समझाया. उन्होंने बताया कि अब तक हमने चौरी चौरा की घटना के बारे में जो पढ़ा और सुना है, उसके विपरीत भी बहुत सारी बातें हैं. सौ साल तक बाबा राघवदास का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है. यह वही बाबा राघवदास हैं जो चौरा चौरी घटना के समय जेल में बंद थे. रिहाइ के बाद उसी पुलिस स्टेशन के समक्ष सभा कर सवाल करते हैं और लोगों से चंदा इकट्टा कर 172 लोगों की फांसी की सजा के खिलाफ केस लडऩे के लिए पहले पंडित मोतीलाल नेहरू से और इसके बाद महामना मालवीय जी से मिलते हैं. मालवीय जी इस समय तक वकालत छोड़ चुके थे लेकिन बाबा राघवदास के अनुरोध पर केस लडऩे को तैयार होते हैं. इन 172 लोगों में केवल 29 लोगों को फांसीकी सजा हुई. इस तरह अनेक तथ्य हैं जिन्हें सामने लाने की जरूरत है. उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के इतिहास के विभिन्न पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला.
प्रोफेसर चतुर्वेदी सवाल करते हैं कि आखिर क्या कारण है कि अब तक ऐसी कोई सूची क्यों नहीं बनायी गई जिन्हें कालापानी और मांडले की सजा हुई? असल में ये वो लोग थे, जिनसे ब्रिटिश हुकूमत घबराती थी. प्रोफेसर चतुर्वेदी इतिहासकार आरसी मजूमदार का स्मरण करते हुए कहते हैं कि उन्होंने इतिहास में प्रामाणिक घटनाओंं और तथ्यों का उल्लेख किया था जिसे पूर्ववर्ती सरकार बदलना चाहती थी. इतिहासकार मजूमदार इसके लिए राजी नहीं हुए. उन्होंने कहा कि नेरेटिव किस तरह सेट किया जाता है और मीडिया ट्रायल की जो बात हम आज सुन रहे हैं, वह आज से सौ साल पहले भी होता था. इस संबंध में उन्होंने बताया कि अपने अध्ययन में 78 पत्र-पत्रिकाओं का संग्रह किया है, जो चौरा चारी घटना की निंदा कर रहे थे. वे इस बात के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का धन्यवाद करते हैं कि आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर इतिहास पुर्नलेखन का जो महती कार्य किया जा रहा है, उससे स्वाधीनता संग्राम को समझने में नई दिशा मिलेगी.
कार्यक्रम अध्यक्ष एवं कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने कहा कि मध्यप्रदेश के भाबरा वीर चंद्रशेखर की जन्म स्थली चंद्रशेखर आजाद नगर  में उनका पुण्य स्मरण करने के लिए विश्वविद्यालय की ओर से रैली का आयोजन किया था.कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने कहा कि आजादी का अमृत महोत्सव एक वैचारिक अनुष्ठान है. इसका आयोजन हम पूरे वर्ष कर दस्तावेजीकरण करेंगे. उन्होंने विषय-विशेषज्ञों से शोध आलेख भी भेजने का आग्रह किया. कार्यक्रम का संचालन हेरिटेज सोयायटी के महाननिदेशक श्री आनंदोतोश द्विवेदी ने किया एवं आभार प्रदर्शन किया. कार्यक्रम समन्वय विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार श्री अजय वर्मा एवं योगिक साइंस विभागा के शिक्षक श्री अजय दुबे ने किया. प्रो. डीके वर्मा का विशेष सहयोग रहा.  

 

गुरुवार, 27 मई 2021

पत्रकारिता दिवस का मान बढ़ाया भोपाल-इंदौर ने

हिन्दी पत्रकारिता दिवस  का गौरव

मनोज कुमार
एक पत्रकार के लिए आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी होती है और जब किसी पत्रकार को अपनी यह पूंजी गंवानी पड़े या गिरवी रखना पड़े तो उसकी मन:स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है. फिर आप किसी भी पत्रकार के लिए कोई दिन-दिवस मनाते रहिए, सब बेमानी है. हर साल हिन्दी पत्रकारिता दिवस 30 मई को मनाते हैं. यह हमारे स्वाभिमान का दिवस है. हिन्दी की श्रेष्ठता का दिवस. अंग्रेजों को देश निकाला देने का हिन्दी पत्रकारिता का गौरव दिवस लेकिन साल-दर-साल हिन्दी पत्रकारिता क्षरित होता रहा, इसमें भी कोई दो राय नहीं है. हालांकि भारत के एक बड़े वर्ग की आवाज आजादी से लेकर अब तक हिन्दी पत्रकारिता रही है और शायद आगे भी हिन्दी पत्रकारिता का ओज बना रहेगा. हिन्दी पत्रकारिता का वैभव अमर रहे, यह हम सबकी कोशिश होती है और होना भी चाहिए लेकिन हिन्दी के पत्रकारों की दशा दयनीय होती जा रही है. इस पर चिंता की जानी चाहिए. यह शायद पहली पहली बार हो रहा होगा जब हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर भोपाल और इंदौर के पत्रकारों ने ऐसी पहल की कि हिन्दी के पत्रकारों का आत्मसम्मान भी कायम रहा और आर्थिक दिक्कतों से भी राहत महसूस हुआ. आजादी के बाद हिन्दी पत्रकारिता दिवस का गौरव कायम रखने में भोपाल और इंदौर के पत्रकारों ने जो कार्य किया, वह वंदनीय है, अभिनंदनीय है.
कोरोना ने सभी सामाजिक और आर्थिक ताना-बाना को छिन्न-भिन्न कर दिया है. एक साल में कोरोना के दो बार हमले ने जैसे जिंदगी को शून्य से शुरू करने के लिए मजबूर कर दिया है. दूसरे प्रोफेशन के लोगों के पास आर्थिक संबल था और वे कम से कम गिरे नहीं. तनाव और परेशानियां उनके हिस्से में भी रही लेकिन पत्रकारों को जिन मुसीबतों का सामना करना पड़ा या पड़ रहा है, वह अकथ कथा है. एक तरफ अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए जान दांव पर लगाना तो दूसरी तरफ परिवार की जरूरत को पूरी करने के लिए या खुद की जिंदगी दांव पर लग जाए तो आर्थिक संबल नहीं मिल पाने का संकट. सरकार और सत्ता के सामने गिड़गिड़ाना या झुकना मंजूर नहीं और जिन संस्थानों के लिए कार्य कर रहे हैं, वे इस तरफ से लगभग आंखें मींचे हुए हैं. आत्मसम्मान कायम रहे और संकट का समाधान भी मिले, यह एक चुनौतीपूर्ण टॉस्क था. विवेकानंद जी ने कहा है कि जीते जी खुद का बोझ खुद को उठाना पड़ेगा और मरने के बाद चार कंधे तो मिल जाएंगे. इसे आप समस्या है तो समाधान है कि नजर से भी देख सकते हैं.
तकरीबन आठ वर्ष पहले पत्रकारों के एक समूह ने इस बात पर विमर्श किया कि पत्रकारों के हेल्थ को लेकर आर्थिक सुरक्षा कैसे दी जाए. इस सोच के साथ ‘भोपाल हेल्थ केयर सोसायटी’ का जन्म हुआ. सदस्य पत्रकारों से एक हजार रुपये वार्षिक सदस्यता का प्रावधान रखा गया था जिसे बाद में घटाकर 5सौ रुपये कर दिया गया. भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार और संस्था के गार्जियन डॉ. सुरेश मेहरोत्रा लगातार बड़ी आर्थिक योगदान करते रहे हैं. सोसायटी के नियमानुसार किसी भी पत्रकार को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए अन्य पत्रकारों की सहमति जरूरी है. संभवत: देश में अपनी तरह की इस इकलौती संस्था ने दिवंगत पत्रकारों को बिना किसी बड़ी औपचारिकता के दो लाख की राशि उपलब्ध करायी है. अन्य स्थितियों पर निर्भर करते हुए 15 हजार से एक लाख तक की राशि का सहयोग सदस्यों को मिलता रहा है. इस कोरोना काल में तो सोसायटी ने आगे बढक़र पत्रकारों को आर्थिक सहायता दी.
भोपाल के पत्रकारों की पहल के बाद इंदौर के पत्रकारों ने कोरोना काल में पत्रकारों को आर्थिक मदद के साथ स्वास्थ्यगत सुविधा दिलाने के लिए प्रयास शुरू किया. आईएमयू (इंदौर मीडिया यूनाइटेड) नाम से संस्था बनाकर जरूरतमंद पत्रकारों को ना केवल आर्थिक सहायता दी गई. बल्कि कोरोना पीडि़त पत्रकारों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने में यथासंभव सहयोग किया गया. आईएमयू वाट्सअप गु्रप पर प्रतिदिन बुलेटिन जारी कर पत्रकारों की स्वास्थ्य की जानकारी प्रदान करता रहा. यह पहल अनोखी थी. आईएमयू की पहल से बड़ी संख्या में पत्रकारों को स्वास्थ्य लाभ ना केवल उन्हें मिला बल्कि उनके परिजनों को भी लाभ मिला. ऐसे संकटकाल में आईएमयू संकटमोचक बनकर पत्रकारों की जीवन रक्षक का दायित्व निभाता रहा.
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने चिंता कर पहले अधिमान्य पत्रकारों को कोरोनापीडि़त होने की दशा में राज्य शासन की ओर से सहूलियत देने का ऐलान किया था. बाद में इसका विस्तार कर गैर-अधिमान्य पत्रकारों को भी इस योजना में शामिल कर लिया गया. कहना ना होगा कि कोरोना काल में पत्रकारों के हितचिंतक के रूप में संचालक जनसम्पर्क श्री आशुतोषप्रतापसिंह उपस्थित रहे. पीडि़त पत्रकारों को अस्पताल में बेड दिलाने, दवा-इंजेक्शन से लेकर ऑक्सीजन और वेंटिलेटर के इंतजाम की भरसक कोशिश करते रहे. सबसे बड़ी बात यह रही कि अपनी व्यस्तता के बाद भी व्यक्तिगत रूप से पीडि़त पत्रकार और उनके परिजनों को फोन कर उनकी खैरियत पता करते रहे. अपने इस दायित्व में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि श्री आशुतोषप्रतापसिंह ने छोटे-बड़े पत्रकारों में भेद ना करते हुए सभी से बात की. जनसम्पर्क की छवि सुधारने और शासन से मीडिया के दोस्ताना रिश्ते को मजबूत करने में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान एवं संचालक जनसम्पर्क की विशेष भूमिका रही. किसी भी राज्य में इस तरह की पहल करने वाला भी शायद मध्यप्रदेश ही इकलौता राज्य है.
कोरोना ने रिश्तों का ताना-बाना तोड़ा तो नए और मजबूत रिश्तों का श्रीगणेश भी किया. हिन्दी पट्टी के पत्रकारों को पहली बार एक नए अनुभव से सामना हुआ. इसका श्रेय मध्यप्रदेश में भोपाल की ‘जर्नलिस्ट हेल्थ केयर सोसायटी’ और इंदौर की आईएमयू (इंदौर मीडिया यूनाइटेड) को जाता है. पत्रकार सामूहिक पहल करें तो सोसायटी उनकी मदद के लिए आगे आती है, यह बात भोपाल-इंदौर ने स्थापित कर दिया है. इस तरह की पहल देश के हर राज्य और शहर में किए जाने की आवश्यकता है ताकि पत्रकारिता पर आंच ना आए और पत्रकारों का आत्मस्वाभिमान कायम रहे. इस बार दिल से हिन्दी पत्रकारिता दिवस की जय बोलिये.(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका "समागं " के सम्पादक हैं )

गुरुवार, 6 मई 2021

आपदा में अवसर के खिलाफ संकट में समाधान की जरूरत

मनोज कुमार

    आपदा में अवसर तलाशने वालों के खिलाफ संकट में समाधान तलाशने की जरूरत है. स्वाधीनता के पहले कुछ सालों के बाद हमारे समाज को भ्रष्टाचार, घोटाले ने निगल लिया है. बार बार और हर बार हम सब इस बात को लेकर चिंता जाहिर करते रहे हैं लेकिन यह लाइलाज बना हुआ है. आज हम जिस चौतरफा संकट से घिरे हुए हैं, उस समय यह बीमारी कोरोना से भी घातक साबित हो रही है. खबरों में प्रतिदिन यह पढऩे को मिलता है कि कोरोना से बचाव करने वाले इंजेक्शन, दवा और ऑक्सीजन की कालाबाजारी हो रही है. अस्पताल मनमाना फीस वसूल रहे हैं. जान बचाने के लिए लोग अपने घर और सम्पत्ति बेचकर अस्पतालों का बिल चुका रहे हैं. हालात बद से बदतर हुआ जा रहा है. शिकायतों का अम्बार बढ़ा तो सरकार सक्रिय हुई और टेस्ट से लेकर एम्बुलेंस तक की दरें तय कर दी गई लेकिन अस्पताल प्रबंधन पर इसका कोई खास असर होता हुआ नहीं दिखा. कोरोना से रोगी बच जा भी जा रहा है तो जर्जर आर्थिक हालत उसे जीने नहीं दे रही है. यह आज की वास्तविक स्थिति है लेकिन क्या इसके लिए अकेले सरकार दोषी है या हमारा भी इसमें कोई दोष है? क्यों हम इस स्थिति से उबरने के लिए सरकार के साथ खड़े नहीं होते हैं? यह बात बहुत साफ है कि सरकार कोई और नहीं, हम हैं क्योंकि हमने उन्हें चुनकर सत्ता सौंपी है. हमारे सामने विकल्प है कि वे हमारे चयन पर खरे नहीं उतरते हैं तो अगली बार उन्हें बेदखल कर सकते हैं. खैर, यह बात तब होगी जब हम इस विकट स्थिति से उबर जाएंगे. अभी कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा करना जरूरी है.
    आपदा को अवसर बनाकर जो लोग धन बटोरने में जुटे हुए हैं, उनके खिलाफ खड़े होकर हम संकट में समाधान की पहल कर सकते हैं. इंजेक्शन, दवा और ऑक्सीजन की कालाबाजारी से इंकार करना मुश्किल है.लेकिन असल सवाल यह है कि आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? मेरी बात आपको आहत कर सकती है लेकिन सच यही है कि हम अपनी और अपनों की जान बचाने के लिए इस कालेधंधे को बढ़ावा देते हैं. आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि बाजार की कीमत क्या है और हम उसकी कीमत क्या चुका रहे हैं. फर्क पड़ता है उन बहुसंख्यक आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को जिनका हक मारा जा रहा है. जब हम स्वयं को शिक्षित और जागरूक होने का दावा करते हैं तो हमारा फर्ज बनता है कि हम इन कालाबाजारियों को ट्रेप करें और पुलिस के हाथों सौंप दें. हमारे भीतर तक डर इतना समा चुका है कि अच्छे खासे शिक्षित लोग भी कोरोना से बचाव की दवा और ऑक्सीजन जैसी जरूरी चीजों का बेवजह भंडारण कर रहे हैं. कालाबाजारियों और जमाखोर दोनों ही समाज के लिए नासूर बन चुके हैं. इन दोनों वृत्तियों के मनोरोगियों के खिलाफ हम और आप खड़े हो जाते हैं तो स्थिति स्वयमेव नियंत्रण में आ जाएगी. सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है और मनमाना वसूले गए बिलों की वापसी करायी गई है. यही नहीं सरकार का आग्रह है कि ऐसे अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करायी जाए. अब हमें सरकार के साथ खड़ा होकर उन सभी लोगों को बेनकाब करना है जो समाज के लिए नासूर बनते जा रहे हैं.
    कोरोना का जो भयावह मंजर है, उससे हम थरथरा रहे हैं लेकिन इस भयावह मंजर में एक-एक सांस बचाने के लिए डॉक्टर और उनकी मेेडिकल टीम जुटी हुई है, उसका हमें धन्यवाद कहना चाहिए. निश्चित रूप से जिस दबाव में डॉक्टर और मेडिकल टीम काम कर रही है, उनके व्यवहार में कभी कुछ तल्खी आ सकती है. कभी वे अपनी ड्यूटी पर थोड़ी देर से आते हैं तो पेनिक होने के बजाय उनका सहयोग कीजिए. लेकिन जो मनमाना वसूली हो रही है, वह अस्पताल प्रबंधन की है. लेकिन आम लोगों में यह धारणा बन चुकी है कि डॉक्टर लूट रहे हैं. यह शिकायत भी दूर होना चाहिए. अस्पातल प्रबंधन के निर्देश और दबाव में डॉक्टर जरूरत ना होने के बाद भी ऐसी दवा लेने की सलाह दे रहे हैं, जिसकी जरूरत ही नहीं है. एक मित्र की सीटी रिपोर्ट एकदम क्लीयर और ऑक्सीजन लेवल 100 होने के बाद भी फेवीफ्लू दवा जिसका डोज पहले दिल 3200 एमजी और बाद के पांच दिन प्रतिदिन 1600 एमजी लेने की सलाह दी गई. यही नहीं, इलाज के लिए गए व्यक्ति का पुराना मेडिकल रिकार्ड भी नहीं पूछा जाता है. जिस व्यक्ति का मैं उल्लेख कर रहा हूं, वह पहले से लीवर के रोग से पीडि़त है और डॉक्टर द्वारा निर्देशित दवा लेन पर शर्तिया उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता. अकारण अस्पताल में भर्ती कराने का भी दबाव बनाया जाता है. एक पत्रकार मित्र को भी जब डॉक्टर ने एडमिट करने की बात कही तो उस मित्र ने पूछ लिया कि आपके अस्पताल के मुख्य द्वार पर ‘नो बेड अवेलेबल’ लिखा है तो आप मुझे कहां एडमिट करेंगे. डॉक्टर निरूत्तर. एक वरिष्ठ डॉक्टर ने कहा कि उन पर अस्पताल का दबाव रहता है, इसलिए ऐसी दवा लिखी जाती है. यह अपने आपमें दुर्भाग्यजनक है. मेरे एक मित्र को डॉक्टरों के समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने की शिकायत थी लेकिन उनके पास इस बात का जवाब नहीं था कि डॉक्टरों के लौटने का वक्त क्या है? डॉक्टर की आलोचना कर आप उनके मनोबल को तोडक़र अपना नुकसान कर रहे हैं.  सिक्के के दो पहलु होते हैं और हमें दोनों तरफ देखना होगा. डॉक्टर और मेडिकल स्टॉफ शिद्दत के साथ मानव सेवा में जुटे हुए हैं. इन सब को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए लेकिन जो संकट के समय भी धन संग्रहण में जुटे हैं, उन्हें  सरकार के संज्ञान में लाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है.
    एक-एक सांस के लिए लड़ते मरीजों और उनके परिजनों से लाखों का बिल वसूलने वाले अस्तपाल प्रबंधन के खातों की जांच इनकम टेक्स डिपार्टमेंट द्वारा की जानी चाहिए. नगद लेन-देन पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए तथा इस बात की भी जांच हो कि कोरोना बीमारी के पहले अस्पताल की आय और व्यय कितना था और वर्तमान में कितना है, तो स्थिति साफ हो जाएगी. यह किसी को परेशान करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि आम आदमी को राहत दिलाने की और सरकार के प्रयासों को मजबूती दिलाने में एक कदम हो सकता है. बिलिंग काउंटर के पास सीसीटीवी कैमरा लगाना अनिवार्य होना चाहिए ताकि समस्त किस्म के व्यवहार की रिकार्डिंग हो और उन पर नियंत्रण पाया जा सके. वक्त बहुत नाजुक है. सबको सबका सहयोग चाहिए. यह वक्त दोषारोपण का नहीं है बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम कर आगे बढक़र मुसीबत से निकलने का है. सरकार की कमियां बताने में गुरेज ना हो लेकिन निंदारस से बाहर आना होगा. 

सोमवार, 3 मई 2021

बेमानी है प्रेस फ्रीडम की बातें

मनोज कुमार


    तीन दशक पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने 3 मई को विश्व प्रेस फ्रीडम डे मनाने का ऐलान किया था. तब से लेकर आज तक हम इसे पत्थर की लकीर मानकर चल रहे हैं. इन तीन दशकों में क्या कुछ हुआ, इसकी मीमांसा हमने नहीं की. पूरी दुनिया में पत्रकार बेहाल हैं और प्रेस बंधक होता चला जा रहा है. खासतौर पर जब भारत की चर्चा करते हैं तो प्रेस फ्रीडम डे बेमानी और बेकार का ढकोसला लगता है. दशकवार जब भारत में पत्रकारिता पर नजर डालें तो स्थिति खराब नहीं बल्कि डरावना लगता है. लेकिन सलाम कीजिए हम पत्रकारों की साहस का कि इतनी बुरी स्थिति के बाद भी हम डटे हुए हैं. हम पत्रकार से मीडिया में नहीं बदल पाये इसलिए हमारे साहस को चुनौती तो मिल रही है लेकिन हमें खत्म करने की साजिश हमेशा से विफल होती रही है. इस एक दिन के उत्सवी आयोजन से केवल हम संतोष कर सकते हैं लेकिन फ्रीडम तो कब का खत्म हो चुका है बस समाज की पीड़ा खत्म करने का जज्बा ही हमें जिंदा रखे हुए है.
    भारत में पत्रकारिता के पतन की शुरूआत और उसकी स्वतंत्रता खत्म करने का सिलसिला साल 1975 में ही शुरू हो गया था. आपातकाल के दरम्यान जो कुछ घटा और जो कुछ हुआ, वह कई बार बताया जा चुका है. उसे दोहराने का अर्थ समय और स्पेस खराब करना है. लेकिन एक सच यह है कि पत्रकारिता इसके बाद से दो हिस्सों में बंटती चली गई. लोगों ने मिशन से बाहर आकर इसे प्रोफेशन मान लिया. अखबारों और पत्रिकाओं की संख्या मे इजाफा होना शुरू हो गया. कल तक जिनके लिए किसी स्कूल में शिक्षक बन जाना आसान था, उन्हें यह भी आसान लगा कि पत्रकार बन जाओ. ना शिक्षा की पूछ-परख और ना ही अनुभव का कोई लेखा-जोखा. मैं कुछ ऐसे पत्रकारों को जानता हंू जो शीर्ष संस्थाओं के प्रमुख हैं लेकिन जमीनी पत्रकारिता से उनका कोई वास्ता नहीं रहा. डिग्री हासिल की और सुविधाजनक ढंग से बड़े पदों पर आसीन हो गए. नयी पीढ़ी उन्हें प्रखर पत्रकार और आचार्य संबोधित करने लगे. मिश्री घुली बातों से वे चहेते बन गए और आज जिस बात का हम रोना रो रहे हैं, वह इन्हीं महानुभावों की वजह से उत्पन्न हुआ है. इसमें तथाकथित प्रखर पत्रकार और आचार्य बन चुके रसमलाई में लिपटे लोगों की गलती तो थोड़ी है. इससे बड़ी गलती उन दिग्गज लोगों की है जो जानते हुए भी उन्हें आगे बढ़ाने में लग रहे.
    बेहिसाब पत्रकारिता के शिक्षण संस्थान शुरू हो रहे हैं. यहां पढऩे वाले विद्यार्थियों को पत्रकारिता को छोडक़र शेष सारी विधायें सिखायी जाती हैं. डिग्री और बेहतर नौकरी के साथ सुविधाजनक जिंदगी की चाहत लिए पत्रकारिता के नौनिहाल सवाल करना भी नहीं जानते हैं. संवाद और अध्ययन से उनकी कोसों दूरी है. कभी किसी पर इनकी खबर का केवल इंट्रों देख लीजिए तो माथा पीट लेंगे. पू्रफ रीडिंग जैसी बुनियादी सबक कभी इन्हें सिखाया नहीं गया. जुम्मा-जुम्मा चार साल की पत्रकारिता और वरिष्ठ पत्रकार का खिताब. इन सालों में एक खबर ऐसी नहीं कि जो छाप छोड़ गई हो. हालांकि निराशाजनक स्थिति के बावजूद मैं कह सकता हूं कि कुछेक विद्यार्थी हैं जो पत्रकारिता करने आये थे और पत्रकारिता कर रहे हैं. पत्रकारिता शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन के दौरान उन्हें इस बात का भी ज्ञान नहीं दिया गया कि पत्रकारिता और मीडिया क्या है? आज पत्रकारिता दिवस है और सोशल मीडिया में निश्चित रूप से मीडिया को शुभकामनाएं दी जा रही होंगी. प्रेस की स्वतंत्रता के मायने यह नहीं है कि आपको लिखने की आजादी है. प्रेस स्वतंत्रता का अर्थ है आप सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता करें. पेजथ्री की पत्रकारिता से बाहर आकर एक बार विद्यार्थी, पराडकर, गांधी और तिलक को पढ़ें. मैं यह भी नहीं कहता कि आधुनिक संचार माध्यमों में वह सबकुछ संभव है जो पराधीन भारत की पत्रकारिता में था लेकिन जैसे सृृष्टि ने मां बनाया तो सदियां बदल जाने के बाद भी मां ही है, वैसे ही माध्यम बदल जाए, विकास हो जाए लेकिन पत्रकारिता की आत्मा जिंदा रहना चाहिए. पत्रकारिता हमारी अस्मिता है.
    जब हम प्रेस स्वतंत्रता की बात करते हैं तो इन दिनों कोरोना काल में जो कुछ घट रहा है, वह हमें आईना दिखाने के लिए बेहतर है. देशभर में पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों को अर्जियां दी जा रही हैं. फिर राजशाही की तरह सरकार हम पर एहसान कर कहती है कि फलां सरकार ने पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मान लिया है. समाज में शुचिता और सकरात्मकता का भाव उत्पन्न करने की जिम्मेदारी पत्रकारिता की. सरकार के प्रयासों को लोगों तक पहुंचाने की अपेक्षा पत्रकारिता से. लेकिन पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों से बात करना होगी. क्या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है कि वह हमारा ध्यान रखे? इस स्थिति के लिए भी हम दोषी हैं. रोहित सरदाना की मृत्यु हो जाती है तो हम खेमें में बंट जाते हैं. हम भूल जाते हैं कि वो भी एक पत्रकार था और हम सब भी. यह भी सच है कि जिस अखबार, पत्रिका या चैनल में काम करेेंगे, उसकी नीति के अनुरूप बोलना होगा. यह बंधन सबके लिए है. हमारी आपस की बैर और खेमेबाजी राजनीतिक दलों के लिए सुविधा पैदा करती है. आज सचमुच में प्रेस स्वतंत्र होता तो सरकारें आगे आकर फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए मजबूर होती लेकिन दुर्भाग्य से हम खेमेबाज पत्रकार हैं. इसलिए सब बातें बेमानी है.
    उम्मीद कीजिए और भरोसा रखिए कि देश के कोने कोने से कोराना के चलते जो पत्रकार जान गंवा रहे हैं, उनसे हम सीख लें. एक साथ खड़े हो जाएं. जिस दिन हम यह साहस कर पाएंगे हर प्रबंधन को आगे आकर वेतन आयोग की शर्ते मानना होगी और सरकारों को भी. लेकिन इसके लिए इंतजार करना होगा कि क्योंकि एक ऐसी अदृश्य शक्ति है जो हमें इसमें या उसमें बांट रही है.   

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