हिन्दी को लेकर हमारी चिंता लगातार दिख रही है लेकिन ज्यादतर चिंता मंच से है. व्यवहार में हम हिन्दी को पीछे रखते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो पाठशाला से लेकर विश्वविद्यालय तक की परीक्षाओं में हिन्दी के विकल्प के तौर पर अंग्रेजी के प्रश्रों को मान्यता नहीं दी जाती. इसके उलट हिन्दी की स्वीकार्यता वैश्विक मंच पर हो चुकी है, जिसे हम स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. कल तक श्यामपट्ट पर लिखी जाने वाली हिन्दी अब हमारी हथेलियों पर है और मोबाइल से लेकर कम्प्यूटर तक का की-बोर्ड हिन्दी से संचालित है. हिन्दी के इस नये वैश्विक स्वरूप की चर्चा करता शोध पत्रिका ‘समागम’ का नया अंक.
सोमवार, 20 सितंबर 2021
गुरुवार, 16 सितंबर 2021
कविता से डरे अंग्रेजों ने पिता-पुत्र को शहीद कर दिया
आजादी के अमृत महोत्सव में संदर्भ मध्यप्रदेश
सोमवार, 13 सितंबर 2021
श्यामपट्ट से की-बोर्ड तक हिन्दी
मनोज कुमार
हर साल की तरह बिसूरने के लिए 14 सितम्बर का दिन फिर आ गया और यह अंक जब आपके हाथों में होगा, दिन, सप्ताह, पखवाड़ा और महीना लोप हो चुका होगा. कदाचित हिन्दी डे से हिन्दी मंथ पर बहस चल रही होगी. हिन्दी को लेकर हमारा आग्रह-अनुराग होना चाहिए और यह हो भी रहा है लेकिन हिन्दी को लेकर हमें हीनता से बाहर आना होगा. कल तक जो हिन्दी मध्यम और निम्र मध्यम वर्ग की भाषा थी, आज वह गूगल की भाषा बनकर पूरी दुनिया की जरूरत बन गई है. एक समय था जब अंग्रेजी पत्रिकाओं को हिन्दी में अनुदित होकर पाठकों के मध्य आना विवशता थी कि क्योंकि अंग्रेजी से उनका जीवन गुजरता था लेकिन रोटी हिन्दी से ही मिलती थी. टेक्रालॉजी के विस्तार के साथ हिन्दी का साम्राज्य बढ़ता चला गया. कल तक भारतीय प्रकाशक हिन्दी को मजबूरी मान रहे थे तो आज वैश्विक समाज के लिए हिन्दी जरूरी है. ऐसे में हिन्दी को लेकर विलाप करने के बजाय हमें हिन्दी के प्रभाव पर चर्चा करना चाहिए. हिन्दी कभी रूढ़िवादी नहीं रही. बल्कि वह बहते निर्मल जल की तरह अपना रास्ता बनाती गई. भाषा का यह लचीलापन हिन्दी का सबसे सबल पक्ष है. उसके समक्ष यह बंधन कभी नहीं रहा कि वह किसी एक कालखंड में बंधी रहे. हिन्दी के ज्ञाता इस बात से सहमत होंगे कि हिन्दी हर कालखंड में स्वयं को परिवर्तित और स्वयं को समृद्ध बनाती गई. घूरे से गूगल तक के अपनी यात्रा में हिन्दी ने अंग्रेजी को बार-बार आईना दिखाया है. आज जब हम हिन्दी दिवस उत्सव मना रहे हैं तब हमें हिन्दी के गौरव पक्ष को नयी पीढ़ी के समक्ष रखना होगा.
कभी-कभी तो लगता है कि एक सुनियोजित ढंग से हिन्दी को पीछे रखने की साजिश की जा रही है. हिन्दी हमारी मातृभाषा है और मां को मां कहने के लिए सिखाने की जरूरत नहीं होती है तब हिन्दी को सीखने-सिखाने के लिए हम क्यों बेताब हैं? अंग्रेजी सीखने-सिखाने के लिए हमने जोर नहीं डाला लेकिन लोग उसके सम्मोहित हैं तो ऐसा व्यवहार हिन्दी के साथ क्यों नहीं होना चाहिए? कोविड महामारी के दौर में हिन्दी की प्रतिष्ठा में और भी श्रीवृद्धि हुई है. सुदूर गांव में बैठा बच्चा जो ठेठ हिन्दी का है, उसने भी अपनी पढ़ाई पूरी की और शहर में बैठा बच्चा भी. कल्पना कीजिए कि जब शालाओं के कपाट बंद थे और लोग घरों में कैद थे, तब भी जीवन चल रहा था. यह कैसे संभव हुआ? कौन सा जादू था जो बच्चों को शिक्षित भी कर रहा था और समाज को सूचित भी. यह इसलिए संभव हुआ कि हिन्दी हठी नहीं हुई बल्कि टेक्रालॉजी की संगी बन गई. यह दीगर बात है कि तकनीकी कारणों से व्यवधान हुआ लेकिन हिन्दी जीवन को सहज बनाने में सहायक रही, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. यह हिन्दी की ताकत है कि वह निराला और पंत को साथ लेकर चलती है तो परसाईं और दुष्यंत कुमार भी साथ होते हैं.
हिन्दी राजभाषा है, उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की हिमायत हम करते रहे हैं लेकिन यह संभव नहीं होते दिख रहा है तो यह हमारे कमजोर आत्मबल का प्रतीक है. सरकार किसी की भी रही हो लेकिन सबका आग्रह हिन्दी रहा है लेकिन वह केवल भाषणों में सीमित रहा. इसके पीछे क्या कारण है, इसे तलाश किया जाना चाहिए. हमारा आग्रह हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बने लेकिन हम स्वयं उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दे नहीं पा रहे हैं तब शिकायत कैसी? कोई भी शुभ कदम हमारे अपने द्वार से होना चाहिए तब दुनिया हल्दी-कुंकुम लिये खड़ी होगी. एक शिकायत जायज है कि हिन्दी के प्रकाशनों, खासकर दैनिक अखबारों के पन्नों पर जो बेहिसाब अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग होता है, उससे बचना चाहिए. कुछेक शब्द जो बोलचाल में हिन्दी मान लिये गए हैं, उनका उपयोग तो ठीक है लेकिन जानबूझकर अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग करना और यह कहना कि नयी पीढ़ी ऐसा ही समझती है तो आप स्वयं को धोखे में रख रहे हैं. हिन्दी, हिन्दुस्तानी भाषा है और इसकी मिठास और अपनापन भी इसी में है. यह गैरवाजिब बात होगी कि हम हिन्दी के उन कठिन शब्दों का उपयोग करें, जो आज की पीढ़ी की समझ से बाहर है. हिन्दी का गौरव हमेशा कायम रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए.
बुधवार, 8 सितंबर 2021
सरकारी नहीं, ‘असर-कारी’ होंगे सीएम राइज स्कूल
मनोज कुमार
राज्य के आखिरी छोर पर बसे किसी गांव के बच्चे के लिए किसी महंगे प्रायवेट स्कूल में पढऩे की लालसा एक अधूरे सपने की तरह है. दिल्ली दूर है कि तर्ज पर वह अपनी शिक्षा उस खंडहरनुमा भवन में पूरा करने के लिए मजबूर था जिसे सरकारी स्कूल कह कर बुलाया जाता था. बच्चों के इन सपनों की बुनियाद पर प्रायवेट स्कूलों का मकडज़ाल बुना गया और सुनियोजित ढंग से सरकारी स्कूलों के खिलाफ माहौल बनाया गया. शिक्षा की गुणवत्ता को ताक पर रखकर भौतिक सुविधाओं के मोहपाश में बांध कर ऊंची बड़ी इमारतों को पब्लिक स्कूल कहा गया. सरकारें भी आती-जाती रही लेकिन सरकारी स्कूल उनकी प्राथमिकता में नहीं रहा. परिवर्तन के इस दौर में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने राज्य में ऐसे स्कूलों की कल्पना की जो प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से कमतर ना हों. मुख्यमंत्री चौहान की इस सोच में प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से अलग अपने बच्चों के सपनों को जमीन पर उतारने के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है. इसी सोच और भरोसे की बांहें थामे मध्यप्रदेश के सुदूर गांवों से लेकर जनपदीय क्षेत्र में ‘सीएम राइज स्कूल’ की कल्पना साकार होने जा रही है. अनादिकाल से गुरुकुल भारतीय शिक्षा का आधार रहा है लेकिन समय के साथ परिवर्तन भी प्रकृति का नियम है. इन दिनों शिक्षा की गुणवत्ता पर चिंता करते हुए गुरुकुल शिक्षा पद्धति का हवाला दिया जाता है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में गुरुकुल नए संदर्भ और नयी दृष्टि के साथ आकार ले रहा है. सरकारी शब्द के साथ ही हमारी सोच बदल जाती है और हम निजी व्यवस्था पर भरोसा करते हैं. हमें लगता है कि सरकारी कभी असर-कारी नहीं होता है. इस धारणा को तोड़ते हुए मध्यप्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता के साथ नवाचार करने के लिए ‘सीएम राइज स्कूल’ सरकारी से ‘असरकारी’ होने की कल्पना के जल्द ही वास्तविकता की जमीन पर खड़ा होगा.
वर्तमान में राज्य के स्कूलों पर नजर डालें तो एक बात स्पष्ट होती है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने असंतोष को दूर करने के लिए स्कूलों की भीड़ लगा दी. किसी स्कूल में दो बच्चे तो किसी स्कूल में पांच और कहीं-कहीं तो महीनों से ताला डला है. कागज पर स्कूल चल रहे हैं लेकिन हकीकत में इन स्कूलों पर केवल बजट खर्च हो रहा है. ऐसे में एक बड़ी सोच के साथ शिवराजसिंह सरकार ने एक सर्वे करा कर यह तय किया कि फिलहाल एक लाख से ऊपर ऐसे स्कूलों को एकजाई कर ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू किया जाए. योजना के मुताबिक अभी 9200 ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू होंगे. 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में संचालित होने वाले इन स्कूलों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी और अंग्रेजी दोनों होगा. आवागमन की सुविधा के लिए सरकार बस और वैन की सुविधा भी दे रही है. बच्चों, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को अकल्पनीय सुविधायें इस स्कूल में होगी. मसलन स्वीमिंग पूल, बैंकिंग काउंटर, डिजिटल स्टूडियो, कैफेटेरिया, जिम, थिंकिंग एरिया होगी जो अभी तक प्रायवेट पब्लिक स्कूल में भी ठीक से नहीं है. प्री-नर्सरी से हायर सेकंडरी की कक्षा वाले ‘सीएम राइज स्कूल’ आने वाले 2023 तक पूरे राज्य में शुरू हो चुके होंगे.
उल्लेखनीय है कि प्रदेश के बच्चे पढ़ाई के मामले में सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के बच्चों से मुकाबला कर सकें, इसलिए सरकार प्रत्येक स्कूल पर 20 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करेगी. योजना के अनुरूप स्कूल चार स्तर (संकुल से नीचे, संकुल, ब्लॉक और जिला) पर तैयार होंगे। इन स्कूलों में बच्चों को ड्रेस कोड भी निजी स्कूलों जैसा रखने की योजना है.मध्यप्रदेश में अक्टूबर से अस्तित्व में आ रहे सीएम राइज स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को लिखित और मौखिक परीक्षा देनी होगी। इसमें पढ़ाने के प्रति उनकी रुचि, पढ़ाने का तरीका और विषय पर पकड़ देखी जाएगी। वर्तमान में सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों में से ही सीएम राइज स्कूलों के लिए शिक्षकों का चयन होगा, पर उन्हें लंबी चयन परीक्षा से गुजरना पड़ेगा. लिखित और मौखिक परीक्षा के अलावा जिस कक्षा के लिए उनका चयन होना है, उसमें पढ़ाकर भी दिखाना होगा ताकिसुनिश्चित किया जा सके कि योग्य शिक्षक का चयन हुआ है. उन्हें विधिवत नियुक्ति दी जाएगी. इन स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को परीक्षा देनी होगी और उन्हें नियमित शिक्षकों की तुलना में ज्यादा वेतन दिया जाएगा. शिक्षकों को स्कूल परिसर में ही मकान भी मिलेगा, ताकि उनके अप-डाउन में उलझने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो. सीएम राइज योजना के लिए चयनित स्कूलों में अक्टूबर से पढ़ाई का तरीका बदल जाएगा। जैसे ही ये स्कूल खुलेंगे, सरकारी स्कूलों की परंपरागत पढ़ाई से इतर नए तरीके से पढ़ाई कराई जाएगी.
स्कूल शिक्षा विभाग के मानक के अनुरूप निजी स्कूलों की तरह व्यवस्थित भवन और अन्य जरूरी सुविधाएं, हर विद्यार्थी के लिए परिवहन सुविधा, नर्सरी एवं केजी कक्षाएं, शिक्षकों एवं अन्य स्टाफ के सौ फीसद पद भरे जाएंगे, स्मार्ट क्लास एवं डिजिटल लर्निंग, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, व्यावसायिक शिक्षा के साथ नए भवनों में स्वीमिंग पूल, खेल सुविधाएं, संगीत कक्षाएं भी रहेंगी. सीएम राइस स्कूल योजना के प्रथम चरण में 259 स्कूल खोले जाएंगे. इनमें से 253 स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा और 96 स्कूल आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा खोले जाएंगे. सी.एम. राइज स्कूल की संरचना के अनुरूप जिला स्तर पर प्रत्येक जिले में एक अर्थात कुल 52 सी.एम. राइज स्कूल होंगे, जिसमें प्रति स्कूल 2000 से 3000 विद्यार्थी होंगे. विकास खंड स्तरीय 261 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 1500 से 2000 विद्यार्थी होंगे. इसी प्रकार संकुल स्तरीय 3200 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 100 से 1500 विद्यार्थी होंगे. ग्रामों के समूह स्तर पर 5687 सी.एम.राइस स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 800 से 1000 विद्यार्थी होंगे. कैबिनेट ने इस योजना के प्रथम चरण के लिए 6952 करोड़ की मंजूरी दे दी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के मानक के अनुरूप सीएम राइज स्कूल में कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाएगी. डिग्री के स्थान पर बच्चों को रोजगारपरक शिक्षा देेने पर जोर होगा. नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें भारतीयता से जोड़ा जाएगा. स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह के अनुसार इन स्कूलों का मुख्य उद्देश्य बच्चों को ज्ञान, कौशल और नागरिकता के संस्कार देना है। साथ ही, भारतीय संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा देना है। स्कूली शिक्षा में बहुविध गतिविधियों के सूर्योदय की उम्मीद के साथ सीएम राइज स्कूल जमीनी तौर पर जल्द ही काम करने लगेंगे.
शनिवार, 4 सितंबर 2021
शिक्षा और दीक्षा
शिक्षा और दीक्षा
मनोज कुमार
आज हमारे पड़ोसी शर्माजी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया. शिक्षित अर्थात उसने बीई की डिग्री हासिल कर ली. बेटे के स्नातक हो जाने की खुशी उनके चेहरे पर टपक रही थी. यह अस्वाभाविक भी नहीं है. एक डिग्री हासिल करने के लिए कई किसम के जतन करने पड़ते हैं. अपनी जरूरतों और खुशी को आले में रखकर बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाता है. और बच्चा जब सफलतापूर्वक डिग्री हासिल कर ले तो गर्व से सीना तन जाता है. उनके जाने के बाद एक पुराना सवाल भी मेरे सामने आ खड़ा हुआ कि क्या डिग्री हासिल कर लेना ही शिक्षा है? क्या डिग्री के बूते एक ठीकठाक नौकरी हासिल कर लेना ही शिक्षा है? मन के किसी कोने से आवाज आयी ये हो सकता है लेकिन यह पूरा नहीं है. फिर मैं ये सोचने लगा कि बोलचाल में हम शिक्षा-दीक्षा की बात करते हैं तो ये शिक्षा-दीक्षा क्या है? शिक्षा के साथ दीक्षा शब्द महज औपचारिकता के लिए जुड़ा हुआ है या इसका कोई अर्थ और भी है. अब यह सवाल शर्माजी के बेटे की डिग्री से मेरे लिए बड़ा हो गया. मैं शिक्षा-दीक्षा के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए पहले स्वयं को तैयार करने लगा.
एक पत्रकार होने के नाते क्यों पहले मन में आता है. इस क्यों को आधार बनाकर जब शिक्षा-दीक्षा का अर्थ तलाशने लगा तो पहला शिक्षा-दीक्षा का संबंध विच्छेद किया. शिक्षा अर्थात अक्षर ज्ञान. वह सबकुछ जो लिखा हो उसे हम पढ़ सकें. एक शिक्षित मनुष्य के संदर्भ में हम यही समझते हैं. शिक्षा को एक तंत्र चलाता है इसलिए शिक्षा नि:शुल्क नहीं होती है. विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हासिल करने के लिए हमें उसका मूल्य चुकाना होता है. इस मूल्य को तंत्र ने शब्द दिया शिक्षण शुल्क. यानि आप शिक्षित हो रहे हैं, डिग्री हासिल कर रहे हैं और समाज में आपकी पहचान इस डिग्री के बाद अलहदा हो जाएगी. आप डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार और शिक्षा जैसे अनेक पदों से सुशोभित होते हैं. चूंकि आपकी शिक्षा मूल्य चुकाने के एवज में हुई है तो आपकी प्राथमिकता भी होगी कि आप चुकाये गए मूल्य की वापसी चाहें तो आप अपनी डिग्री के अनुरूप नौकरी की तलाश करेंगे. एक अच्छी नौकरी की प्राप्ति आपकी डिग्री को ना केवल सार्थक करेगी बल्कि वह दूसरों को प्रेरणा देगी कि आप भी शिक्षित हों. यहां एक बात मेरे समझ में यह आयी कि शिक्षित होने का अर्थ रोजगार पाना मात्र है.
अब दूसरा शब्द दीक्षा है. दीक्षा शब्द आपको उस काल का स्मरण कराता है जब डिग्री का कोई चलन नहीं था. शिक्षित होने की कोई शर्त या बाध्यता नहीं थी. दीक्षा के उपरांत नौकरी की कोई शर्त नहीं थी. दीक्षित करने वाले गुरु कहलाते थे. दीक्षा भी नि:शुल्क नहीं होती थी लेकिन दीक्षा का कोई बंधा हुआ शुल्क नहीं हुआ करता था. यह गुरु पर निर्भर करता था कि दीक्षित शिष्य से वह क्या मांगे अथवा नहीं मांगे या भविष्य में दीक्षित शिष्य के अपने कार्यों में निपुण होने के बाद वह पूरे जीवन में कभी भी, कुछ भी मांग सकता था. यह दीक्षा राशि से नहीं, भाव से बंधा हुआ था. दीक्षा का अर्थ विद्यार्थी को संस्कारित करना था. विद्यालय-विश्वविद्यालय के स्थान पर गुरुकुल हुआ करते थे और यहां राजा और रंक दोनों की संतान समान रूप से दीक्षित किये जाते थे. दीक्षा के उपरांत रोजगार तलाश करने के स्थान पर विद्यार्थियों को स्वरोजगार के संस्कार दिये जाते थे. जंगल से लकड़ी काटकर लाना, भोजन स्वयं पकाना, स्वच्छता रखना और ऐसे अनेक कार्य करना होता था. यह शिक्षा नहीं, संस्कार देना होता था. दीक्षा अवधि पूर्ण होने के पश्चात उनकी योग्यता के रूप में वे अपने पारम्परिक कार्य में कुशलतापूर्वक जुट जाते थे. अर्थात दीक्षा का अर्थ विद्यार्थियों में संस्कार के बीज बोना, उन्हें संवेदनशील और जागरूक बनाना, संवाद की कला सीखाना और अपने गुणों के साथ विनम्रता सीखाना.
इस तरह हम शिक्षा और दीक्षा के भेद को जान लेते हैं. यह कहा जा सकता है कि हम नए जमाने में हैं और यहां शिक्षा का ही मूल्य है. निश्चित रूप से यह सच हो सकता है लेकिन एक सच यह है कि हम शिक्षित हो रहे हंै, डिग्रीधारी बन रहे हैं लेकिन संस्कार और संवेदनशीलता विलोपित हो रही है. हम शिक्षित हैं लेकिन जागरूक नहीं. हम डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदार नहीं. शिक्षक हैं लेकिन शिक्षा के प्रति हमारा अनुराग नहीं, पत्रकार हैं लेकिन निर्भिक नहीं. जिस भी कार्य का आप मूल्य चुकायेंगे, वह एक उत्पाद हो जाएगा. शिक्षा आज एक उत्पाद है जो दूसरे उत्पाद से आपको जोड़ता है कि आप नौकरी प्राप्त कर लें. दीक्षा विलोपित हो चुकी है. शिक्षा और दीक्षा का जो अंर्तसंबंध था, वह भी हाशिये पर है. शायद यही कारण है कि समाज में नैतिक मूल्यों का हस हो रहा है क्योंकि हम सब एक उत्पाद बन गए हैं. शिक्षा और दीक्षा के परस्पर संबंध के संदर्भ में यह बात भी आपको हैरान करेगी कि राजनीति विज्ञान का विषय है लेकिन वह भी शिक्षा का एक प्रकल्प है लेकिन राजनेता बनने के लिए शायद अब तक कोई स्कूल नहीं बन पाया है. राजनेता बनने के लिए शिक्षित नहीं, दीक्षित होना पड़ता है. यह एक अलग विषय है कि राजनेता कितना नैतिक या अनैतिक है लेकिन उसकी दीक्षा पक्की होती है और एक अल्पशिक्षित या अपढ़ भी देश सम्हालने की क्षमता रखता है क्योंकि वह दीक्षित है. विरासत में उसे राजनीति का ककहरा पढ़ाया गया है. वह हजारों-लाखों की भीड़ को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है और यह ककहरा किसी क्लास रूम में नहीं पढ़ाया जा सकता है. शिक्षक दिवस तो मनाते हैं हम लेकिन जिस दिन दीक्षा दिवस मनाएंगे, उस दिन इसकी सार्थकता सिद्ध हो पाएगी.
गुरुवार, 19 अगस्त 2021
‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इतिहास’ विषय के शिक्षकों की भूमिका पर राष्ट्रीय वेबीनार
‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इतिहास’ विषय के शिक्षकों की भूमिका पर राष्ट्रीय वेबीनार
मंगलवार, 10 अगस्त 2021
शोध पत्रिका "समागम " के नए अंक में
आजादी का अमृत पर्व अर्थात उन दिनों को गौरवपूर्वक याद करने का समय जिनके साहस और बलिदान से आज हम स्वतंत्र हैं लेकिन कुछ उन ऐतिहासिक घटनाओं को भी याद करना और नई पीढ़ी को बताने की जवाबदारी भी हमारी है. इतिहास के पन्नों से कुछ कहानियां शोध पत्रिका "समागम " के नए अंक में
गिरमिटया महात्मा गांधी
आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...
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-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
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समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीड...
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मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...


