रविवार, 28 नवंबर 2021

टंट्या मामा को सलामी देने आज भी ट्रेन के पहिये थम जाते हैं


मनोज कुमार
स्वाधीनता के सात दशक बाद भी किसी योद्धा को सलामी देने के लिए गुजरने वाले ट्रेन के पहिये कुछ समय के लिए थम जाए, यह जानकर मन रोमांचित हो जाता है। यह शायद उन लोगों के लिए एक पहेली के समान भी हो जिन्होंने किताबों में तो स्वाधीनता संग्राम का इतिहास पढ़ा है लेकिन इतिहास आज भी लिखा जा रहा है, यह अपने किस्म का अलग अनुभव है। लेकिन सच है कि अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने वाले जनजाति वीर योद्धा टंट्या मामा की वीरता को सलाम करने के लिए पातालपानी रेल्वे स्टेशन से गुजरने वाली हर रेलगाड़ी के पहिये कुछ समय के लिए आज भी थम जाता है। जनपदीय लोक नायकों का स्मरण तो हम समय-समय पर करते हैं लेकिन वीर योद्धा टंट्या मामा को प्रतिदिन स्मरण करने का यह सिलसिला कभी थमा नहीं, कभी रूका नहीं। अब जब हम आजादी के 75वां वर्ष का उत्सव मना रहे हैं तब ऐसे अनेक प्रसंग से हमारी नयी पीढ़ी को रूबरू कराने का स्वर्णिम अवसर है। मध्यप्रदेश ऐसे जाने-अनजाने सभी वीर योद्धाओं का स्मरण कर आजादी के 75वें वर्ष को यादगार बना रहा है।
स्वाधीनता का 75वां वर्ष पूरे राष्ट्र का उत्सव है। एक ऐसा उत्सव जो हर पल इस बात का स्मरण कराता है कि ये रणबांकुरे नहीं होते तो हम भी नहीं होते। गुलामों की तरह हम मरते-जीते रहते लेकिन दूरदर्शी लोकनायकों ने इस बात को समझ लिया था और स्वयं की परवाह किये बिना भारत माता को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। हमारा इतिहास ऐसे वीर ही नायकों की कथाओं से लिखा गया है। इतिहास का हर हर्फ हमें गर्व से भर देता है कि हम उस देश के वासी हैं जहां अपने देश के लिए मर-मिटने वालों का पूरा समाज है। ऐसे वीर नायकों का स्मरण करते हुए हम पाते हैं कि स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय समाज के वीर नायकों की भूमिका बड़ी है लेकिन जाने-अनजाने उन्हें समाज के समक्ष लाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। आजादी के इस 75वें वर्ष में देश ऐसे ही वीर नायकों का स्मरण कर रहा है। कोई भी वीर शहीद किसी भी क्षेत्र या राज्य का हो लेकिन उसकी पहचान एक भारतीय की रही है। बिरसा मुंंडा से लेकर टंट्या भील हों या गुंडाधूर। इन सारे वीर जवानों ने कुर्बानी दी तो भारत माता को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करने के लिए। यह सुखद प्रसंग है कि देश का ह्दय प्रदेश कहे जाने वाला मध्यप्रदेश ऐसे सभी चिंहित और गुमनाम जनजाति समाज के वीर योद्धाओं को प्रणाम कर उन्हें स्मरण कर रहा है। मध्यप्रदेश की कोशिश है कि नयी पीढ़ी ना केवल अपने स्वाधीनता के इतिहास को जाने बल्कि अनाम शहीदों के बारे में भी अपनी जानकारी पुख्ता करे। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि स्वतंत्रता सेनानियों को ब्रिटिश शासन द्वारा विद्रोही कहा गया है और उन्हें अपराधी भी साबित करने की कोशिश की गई है और इन्हीं गलत तथ्यों को सुधारने का समय आ गया है।
बिरसा मुंडा का जन्मोत्सव के बाद ट्ंटया भील जो समाज के लिए टंट्या मामा हैं, का स्मरण किया जा रहा है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान आजादी के इस 75वें वर्ष को जनजाति योद्धाओं को समर्पित करते हुए दिखते हैं। मध्यप्रदेश के लिए यह गौरव की बात है कि वह एक राष्ट्र की चर्चा कर रहा है। बिरसा मुंडा के स्मरण से जो यात्रा आरंभ हुई है, वह सिलसिला आगे बढ़ेगा। यह महज संयोग है कि महज 20 दिनों के अंतराल में देश के दो महान योद्धा का स्मरण करने का अवसर हमें मिला है। बिरसा मुंडा के बाद 4 दिसम्बर को जननायक टंट्या मामा के बलिदान दिवस पर हम सब स्मरण कर रहे हैं। यह उल्लेख करना भी गर्व का विषय है कि अविभाजित मध्यप्रदेश सहित सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में ऐसे वीर शहीदों की लम्बी सूची है जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम को स्वर्णिम बनाया।
‘इंडियन रॉबिन हुड’ के नाम से चर्चित टंट्या मामा की वीरता की कहानी का कालखंड है 1878 से लेकर 1889 का जब अंग्रेजों ने उन्हें एक अपराधी के रूप में प्रचारित किया। टंट्या को उन क्रांतिकारियों में से एक के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने 12 साल तक ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था। रिपोर्टों में कहा गया है कि वह ब्रिटिश सरकार के खजाने और उनके अनुयायियों की संपत्ति को गरीबों और जरूरतमंदों में बांटने के लिए लूटता था। इन आंदोलनों से बहुत पहले आदिवासी समुदायों और तांत्या भील जैसे क्रांतिकारी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया था। वह आदिवासियों और आम लोगों की भावनाओं के प्रतीक बन गए। लगभग एक सौ बीस साल पहले तांत्या भील जनता के एक महान नायक के रूप में उभरा और तब से भील जनजाति का एक गौरव बन चुका है। उन्होंने अदम्य साहस, असाधारण चपलता और आयोजन कौशल का प्रतीक बनाया। टंट्या भील का वास्तविक नाम तांतिया था, जिन्हे प्यार से टंट्या मामा के नाम से भी बुलाया जाता था। उल्लेखनीय है कि टंट्या भील की गिरफ्तारी की खबर न्यूयॉर्क टाइम्स के 10 नवंबर 1889 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। इस समाचार में उन्हें ‘भारत के रॉबिन हुड’ के रूप में वर्णित किया गया था।
इतिहासकारों के अनुसार खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बडदा में सन् 1842 के करीब भाऊसिंह के यहां टंट्या का जन्म हुआ था। कहते हैं कि टंट्या का मतलब झगड़ा या संघर्ष होता है और टंट्या के पिता ने उन्हें ये नाम दिया था, क्योंकि वे आदिवासी समाज पर हो रहे जुल्म का बदला लेने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। बचपन में ही तीर कमान, लाठी और गोफल चलाने में पारंगत हो चुके टंट्या ने जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही जमींदारी प्रथा के खिलाफ अंग्रेजों से लोहा लेना शुरु कर दिया था। इंडियन रॉबिनहुड टंट्या भील, जिन्होंने अंग्रजों के छक्के छुड़ा दिए थे। सन् 1870 से 1880 के दशक में तब के मध्य प्रांत और बंबई प्रेसीडेंसी में टंट्या भील ने 1700 गांवों में अंग्रेजों के खिलाफ समानांतर सरकार चलाई थी। तब महान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने टंट्या से प्रभावित होकर उन्हें छापामार शैली में हमला बोलने की गौरिल्ला युद्धकला सिखाई थी। इसके बाद टंट्या ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। जनश्रुति के अनुसार मान्यता थी कि मामा टंट्या के राज में कोई आदिवासी भूखा नहीं सो सकता। टंट्या से मुंह की खा रहे अंग्रेजों को टंट्या से लडऩे के लिए ब्रिटिश सेना की खास टुकड़ी भारत बुलानी पड़ी थी। हालांकि टंट्या को ब्रिटिश सेना ने धोखे से गिरफ्तार कर लिया था।
इतिहासकारों के अनुसार 11 अगस्त सन् 1889 को रक्षाबंधन के दिन जब टंट्या अपनी मुंहबोली बहन से मिलने पहुंचे थे तो उसके पति गणपतसिंह ने मुखबिरी कर उन्हें पकड़वा दिया था। जबलपुर में अंग्रेजी सेशन कोर्ट ने 19 अक्टूबर को टंट्या को फांसी की सजा सुना दी थी। उन्हें 4 दिसम्बर 1889 को फांसी दी गई। ब्रिटिश सरकार भील विद्रोह के टूटने से डरी हुई थी। आमतौर पर यह माना जाता है कि उसे फांसी के बाद इंदौर के पास खंडवा रेल मार्ग पर पातालपानी रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया गया था। जिस स्थान पर उनके लकड़ी के पुतले रखे गए थे, वह स्थान तांत्या मामा की समाधि मानी जाती है। आज भी सभी ट्रेन टंट्या मामा के सम्मान में ट्रेन को एक पल के लिए रोक देते हैं।
ऐसे वीर जवानों के लिए कृतज्ञ मध्यप्रदेश उनकी यादों को चिरस्थायी बनाने के लिए प्रयासरत है। इस सिलसिले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को घोषणा की है कि इंदौर में पातालपानी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर टंट्या भील के नाम पर रखा जाएगा। साथ ही इंदौर बस स्टैंड का नाम टंट्या मामा के नाम पर रखा जाएगा। यह पहल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि हर आयु वर्ग के लोगों को यह स्मरण आता रहे कि हमें आजादी दिलाने के लिए ऐसे महान योद्धाओं ने अपने जीवन का उत्र्सग किया। टंट्या मामा जैसे सभी वीर योद्धाओं को हम नमन करते हैं।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक हैं)

गुरुवार, 4 नवंबर 2021

सहारा देकर जिम्मेदारी का बीज बोती सरकार

मनोज कुमार

एक मजदूर के बेटे ने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली.. एक चाय बेचने वाले ने अपने बेटे को आइएसएस बना दिया.. एक गरीब परिवार के बेटे ने संघर्ष कर कामयाबी हासिल की... ये खबरें बताती हैं कि हमारे समाज में प्रतिभाओं की कमी नहीं है.. वे अपने दम पर कामयाबी पा रहे हैं.. यह खबरें देश के कोने कोने से आती हैं.. दूसरे राज्यों की तरह मध्यप्रदेश भी यह खबरें सुन रहा था.. अब यहां आकर मध्यप्रदेश और दूसरे राज्यों में फकत इस बात का अंतर रह गया कि दूसरे युवाओं की कामयाबी की खबरें सुनते रह गए और मध्यप्रदेश सरकार ने आगे बढक़र ऐसे हीरों को गले से लगा लिया. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने इन प्रतिभावान युवाओं के कंधे पर हाथ रखा और कहा-बढ़ो और आगे बढ़ते रहो. मैं तुम्हारे साथ हूं. यकिन करना आसान नहीं है लेकिन मध्यप्रदेश में आप हैं तो इस पर यकिन ना करने का भी कोई कारण नहीं बचता है. 
एक बच्चा यूपीएससी की परीक्षा में पास हो जाता है. दिल्ली से उसका बुलावा साक्षात्कार के लिए आया है. परिवार की मदद से वह दिल्ली जाने का इंतजाम करने लगता है कि तभी सरकार की तरफ से उसे संदेशा मिलता है मध्यप्रदेश भवन में आपके रूकने के लिए इंतजाम सरकार की ओर से किया गया है. पहले तो उसे यकीन ही नहीं होता है कि क्या सच है? वह दो बार फोन करने वाले अफसर से सच जानना चाहता है. उसे भरोसा दिलाया जाता है कि वह स्वयं इस बात की तस्दीक कर ले. वह दिल्ली स्थित मध्यप्रदेश भवन पहुंचता है तो कोई गफलत की गुंजाईश ही नहीं रह जाती है. उसके एक सामने एक संकट का निदान हो गया तो एक और बात उसके मन में डूबती-उतरती रहती है. संकोच करते हुए वह सरकार के अधिकारी से पूछ लेता है कि मेरे पिताजी को अपने साथ ठहरा सकता हूं? मुस्कराते हुए अधिकारी कहते हैं- बिना शक, आप अपने पेरेंट को अपने साथ ही रख सकते हैं. सरकार का यह आदेश है. 
यह कपोल-कल्पित घटना नहीं है. यह एक सच्ची घटना है जो मेरे एक नजदीक के परिचित के साथ घटित हुई थी. चूंकि परिचित के सम्पर्क गहरे हैं तो वह कुछ प्रयास कर रहे थे कि दिल्ली में रूकने का ठिकाना मिल जाए लेकिन उन्हें भी यही सूचना मिली तो पहले पहल यकिन नहीं हुआ लेकिन बेटे ने जब कन्फर्म किया तो उनके लिए राहत की बात थी.सबसे बड़ी बात यह थी कि जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं और जिस जवाबदारी की अपेक्षा हम अपनी चुनी हुई भरोसे की सरकार से करते हैं, वह मध्यप्रदेश में पूरा होता दिख रहा है. यह तय है कि हम इसमें भी नुक्स निकाल सकते हैं और कह सकते हैं कि ये महज सरकार की वाहवाही करने की स्कीम है लेकिन कभी उन बच्चों से पूछिये जिन्होंने अपनी मेहनत से कामयाबी तो पा ली और अब उनके साथ सरकार खड़ी है तो उनका भरोसा कितना बढ़ा होगा.
भोपाल के मिंटो हॉल में यूपीएससी परीक्षा पास करने वालों से मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने संवाद किया तो यह एक महज औपचारिक कार्यक्रम लग रहा था. लेकिन जब मुख्यमंत्री ने इन युवाओं का साथ देने के लिए ऐलान किया तो यह भी पहली सूरत में औपचारिक ही लगा क्योंकि आजादी के सात दशक बाद ऐसा करिश्माई ऐलान की उम्मीद नहीं की जा सकती थी. लेकिन जो हुआ, वह सच था और जो हो रहा है वह लोकतांत्रिक सरकार की नयी परिभाषा गढ़ रहा है. हालांकि इस योजना का श्रेय उच्च शिक्षामंत्री डॉ. मोहन यादव के हिस्से में जाता है जो इस योजना के शिल्पकार रहे हैं. उन्होंने अपने लीडर शिवराजसिंह को इस बात के लिए सहमत किया और आज युवाओं की कामयाबी की खबरें पढऩे वाले राज्य, मध्यप्रदेश की इस अनोखी पहल से स्तब्ध हैं. हो सकता है कि पूर्व में जिस तरह से मध्यप्रदेश की योजनाओं को अन्य राज्यों ने अपनाया है, वैसा ही इस योजना के बारे में सक्रियता दिखायें. ऐसा होता है तो निश्चित रूप से युवाओं को ना केवल सहारा मिलेगा बल्कि जिम्मेदारी की भावना बलवती होगी.
इस बात को भी याद रखा जाना चाहिए कि यूपीएससी की परीक्षा पहले दफा नहीं हो रही है और ना ही पहली दफा युवा कामयाब हो रहे हैं. लेकिन इस बार एक खास बात यह भी हुई कि युवाओं का हौसलाअफजाई करने राज्य शासन ने कामयाब युवाओं पर केन्द्रित एक पुस्तक भी तैयार की. यह सुखद अनुभव भी उनके लिए पहली होगा. संभव है कि इसके पहले भी कुछ युवा परीक्षा तो पास कर चुके होंगे लेकिन तब कोई शिवराजसिंह नहीं था जो उनके हौसले बुलंद करता. जो लोग इसके पहले परीक्षा पास कर चुके होंगे और साक्षात्कार में रूक गए होंगे, वह अपनी योग्यता और प्रतिभा की कमी के कारण नहीं बल्कि आर्थिक तनाव और संसाधनों की कमी के कारण विफल हो गए होंगे. इस बार वे तनाव मुक्त हैं और मन में उल्लास है. शिवराजसिंह सरकार के इस प्रयास को इस नजर से भी देखा जाना चाहिए कि ये वही युवा हैं जो भविष्य में प्रदेश के प्रशासन की कमान सम्हालेंगे. कोई प्रशासनिक अधिकारी होगा तो कोई पुलिस का अफसर बनेगा तो किसी के जिम्मे जंगल महकमा आएगा. तब इन लोगों के भीतर अपनेपन का अहसास होगा. जिम्मेदारी होगी और नेक-नीयति के साथ अपने दायित्वों को पूर्ण कर सकेंगे. दरअसल, इन युवाओं को सहारा देने का अर्थ उस बीज का छिडक़ाव है जो आने वाले दिनों में फलदार पौधे के रूप में पूरे प्रदेश को हरा-भरा करेगा. अपने इन्हीं फैसलों की वजह से मध्यप्रदेश, देश के दिल में धडक़ता है क्योंकि देश की धडक़न का नाम है मध्यप्रदेश है. 

शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

मैं और मेरे से मुक्त, हमारा मध्यप्रदेश

 मध्यप्रदेश स्थापना दिवस पर विशेष

मनोज कुमार
एक बार फिर खुशियों ने दस्तक दी है. कामयाबी से भरे जश्र के साथ मध्यप्रदेश अपना स्थापना दिवस मनाने जा रहा है. मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस कई मायनों में इसलिए भी अर्थ पूर्ण हो जाता है कि अपने जन्म के साथ विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए कामयाबी के पथ पर आगे बढ़ता रहा है. आज ही के दिन 1 नवम्बर, 1956 को जब मध्यप्रदेश ने आकार लिया था तब स्वयं को स्थापित करने की एक बड़ी चुनौती उसके समक्ष थी. भौगोलिक रूप से छिन्न-भिन्न अवस्था में मध्यप्रदेश का निर्माण हुआ था लेकिन पंडित रविशंकर शुक्ल से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ऐसे शिल्पकार बने जिन्होंने ना केवल मध्यप्रदेश को दिशा दी बल्कि देश के विकसित प्रदेशों के समकक्ष खड़ा हो गया. एक बडौल प्रदेश से देश के ह्दय प्रदेश बन जाने वाला मध्यप्रदेश की यात्रा कभी कंटक भरी रही तो कभी दूसरों के लिए रोल मॉडल के तौर पर अपनी आमद दी है. आज सचमुच में खुशियों का दिन है क्योंकि हम सब की सरजमीं जिसकी वजह से हमारी पहचान है, उसका जन्म दिन मना रहे हैं.
मध्यप्रदेश को शांति का टापू कहा जाता है और यह सच भी है. आप देश के अपराध के रिकार्ड चेक करेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि आप सुरक्षित हैं. दरअसल इस प्रदेश की तासीर में ही सद्भाव कूट-कूट कर भरा है. मध्यप्रदेश को जांचना हो तो आपको दो खंडों में जांचना होगा. पहला अविभाजित मध्यप्रदेश और दूसरा विभाजित मध्यप्रदेश. 1956 से 2000 तक मध्यप्रदेश झाबुआ से बस्तर तक फैला हुआ था. देश के विशाल भू-भाग वाले प्रदेश की पहचान थी. तब मध्यप्रदेश का आर्थिक और राजनीतिक ढांचा एक अलग किस्म का था. मध्यप्रदेश का दूसरा खंड 2000 से 2021 का है जिसमेें वह अब झाबुआ से लेकर मंडला तक है. दो दशक पहले विभाजन के बाद भी दोनों राज्यों के बीच सामंजस्य बना रहा क्योंकि सच तो यह है कि भौगोलिक रूप से दो राज्य हो गए हैं लेकिन दिल से आज भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. छत्तीसगढ़ के अलग हो जाने के बाद मध्यप्रदेश का भौगोलिक क्षेत्रफल कम जरूर हुआ है लेकिन आज भी वह एक बड़े भू-भाग वाले प्रदेश के रूप में अपनी पहचान रखता है. छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य बनाये जाने के निर्णय पर मध्यप्रदेश ने कोई आपत्ति नहीं ली और छत्तीसगढ़ भी करीब साढ़े तीन दशक से पृथक राज्य बनाये जाने की मांग को शांतिपूर्ण ढंग से करता रहा. यह दोनों राज्यों की जमीन में जो शांति और सद्भाव का बीज है, वह उनके जन्म केे साथ रोपित है.
साल 2000 से जब हम मध्यप्रदेश में विकास की रफ्तार का लेखा-जोखा देखते हैं तो हम निराश नहीं होते हैं. कहा जाता था कि छत्तीसगढ़ अलग होने से मध्यप्रदेश को एक बड़े राजस्व का नुकसान होगा. यह बात ठीक हो सकती है तो यह बात भी है कि उस राजस्व का एक बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ के विकास पर भी खर्च करना होता था. खैर, शिवराजसिंह चौहान मध्यप्रदेश के ऐसे शिल्पकार के रूप में अपनी पहचान विकसित की है कि इतिहास उनके बिना अधूरा रहेगा. वर्ष 2003 में मध्यप्रदेश में पहली दफा भाजपा सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ आयी और 2005 से लेकर लगातार मध्यप्रदेश की सत्ता के सिरमौर रहे शिवराजसिंह ने मध्यप्रदेश को एक नई ऊंचाई दी. शिवराजसिंह सरकार के एजेंडे में किसान, आदिवासी, महिला और बुर्जुग सबसे पहले रहे हैं. तकरीबन 18 महीने की बीच में आयी कांग्रेस की सरकार से लोगों की उम्मीद टूट गई. 2018 के चुनाव में फकत सूत भर से भाजपा को पराजय का दंश झेलना पड़ा था लेकिन कांगे्रस सत्ता सम्हाल नहीं पायी. चौथी दफा शिवराजसिंह पुन: सत्ता में आये तो उनके समक्ष केवल चुनौती ही थी. सौ साल बाद पूरी दुनिया में कयामत बनकर टूटा कोरोना ने मध्यप्रदेश को भी सांसत में डाल दिया था. दवा-इलाज के साथ आर्थिक संकटों से जूझते मध्यप्रदेश को इस बात की आश्वति थी कि शिवराजसिंह चौहान सब सम्हाल लेंगे. अक्सर ऐसे संकट के दौर में शिवराजङ्क्षसंह गांधी के रास्ते पर चल पड़ते हैं. अपनी ही सरकार में वे सत्याग्रह करते हैं. यह पूरे देश के लिए एक नया अनुभव होता है. हालांकि इसके  माध्यम से वे जनता को संदेश देते हैं और उन्हें विश्वास में लेते हैं. पहला उनका सत्याग्रह मंदसौर में किसानों पर हुई गोलीबारी के लिए था तो दूसरी बार कोरोना के खिलाफ लोगों में आत्मविश्वास जगाने के लिए. दोनों ही दफा उनकी स्वयं की सरकार थी और वे स्वयं मुखिया. कहना ना होगा कि इसके परिणाम सुखद आये.
मध्यप्रदेश विभिन्न भाषा-भाषी और बहुविध संस्कृति का प्रदेश है. इसे देश का ह्दय प्रदेश के साथ लघु भारत भी कहा जाता है. मध्यप्रदेश की खासियत रही है कि यहां जो आता है, यहीं का होकर रह जाता है. कोई कट्टरता नहीं, कोई विद्वेश नहीं. मध्यप्रदेश से एक संदेश जाता है कि हम सब भारत के नागरिक हैं. अन्य प्रदेशों में मेरा और मैं का बोलबाला होता है जबकि मध्यप्रदेश हम की भावना के साथ सबको गले लगाकर चलता है. रोजगार से लेकर कारोबार तक और रोटी-बेटी के रिश्ते की जो गमक मध्यप्रदेश में सुनायी देती है, वह अपने आपमें बिलकुल अकेला है. मध्यप्रदेश इसलिए गौरव प्रदेश भी है. ऐसा नहीं है कि मध्यप्रदेश में संकट नहीं है. संकट है तो उसका समाधान भी हो जाता है. यह एक बड़ी चुनौती है कि सबको साधकर रखना लेकिन मध्यप्रदेश की तासीर में ही है कि मोहब्बत बांटते चलो. मध्यप्रदेश की सरजमीं से ऐसे सितारे हुए हैं जिन्होंने देश और पूरी दुनिया में अपना नाम किया है. एक नाम लता मंगेशकर का लिया जा सकता है. ऐसे हजारों नाम होंगे जिस पर मध्यप्रदेश को गर्व है. एक टीस, एक पीड़ा जरूर होती है जब कामयाब हो जाने के बाद मध्यप्रदेश को लोग भूल जाते हैं. लेकिन एक मां का दिल जितना बड़ा होता है, वैसा हीे मध्यप्रदेश का है. वह बेहद सहजता से माफ कर देता है और कोई शिकायत नहीं करता. देश और दुनिया के जिस कोने में मध्यप्रदेश से निकलकर कामयाबी के शिखर पर बैठे लोगों से इल्तजा है कि एक बार अपनी जमीं की, अपने मध्यप्रदेश की चिंता कर लें. मध्यप्रदेश तो अपने आप में खुश है. खुश क्यों ना हो क्योंकि उसकी किसी से तुलना नहीं है क्योंकि ये मध्यप्रदेश मैं और मेरा नहीं, हमारा मध्यप्रदेश है. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’, भोपाल के संपादक हैं) 

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2021

शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक

 

शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक                                       स्वाधीनता संग्राम और महात्मा गांधी पर केन्द्रीत है.                      गांधी की बड़ी यात्रा, आंदोलन एवं मध्यप्रदेश में                                          उनका हस्तक्षेप  केन्दि्रय विषय है.

रविवार, 3 अक्टूबर 2021

महेन्द्र का 'गगन' से बुलावा

मनोज कुमार

        सुबह सुबह फोन की घंटी घनघना उठी... मन में कुछ खयाल आया... स्वाभाविक था कि यह खयाल अच्छा तो होगा नहीं... कुछ अनमने मन से फोन उठाया तो उधर से संजय द्विवेदी की आवाज आयी... लगा कि रोज राम-राम करने फोन करते हैं, सो किया होगा लेकिन यह क्या.. अगले पल उसने पूछा कि  क्या आपको पता है.. महेन्द्र गगन नहीं रहे... एकाएक मुंह से निकल गया क्या बकवास कर रहे हो... दरअसल, मन ऐसी किसी खबर के लिए तैयार ही नहीं था.. फिर खुद को सम्हालते हुए कहा कि पता करता हूं, ऐसा होना तो नहीं चाहिए.. एक-दो दिन पहले ही मित्र शिवअनुराग पटेरिया के जाने की खबर से मन उबरा ही नहीं था कि यह दूसरा दुख.. भरे मन से अग्रज अरूण पटेल जी को फोन किया.. महेन्द्र भाई रिश्ते में उनके समधि थे.. उन्हें भी इस बात की कोई खबर नहीं थी.. वे चौंके और थोड़ी देर बाद उनका जवाब आया.. हां, मनोज जी, खबर सही है.. मुझे तकलीफ ना हो.. इसलिये मुझे नहीं बताया गया था...

        महेन्द्र गगन के जाने का अर्थ था समाज के एक ऐसे गगन का रिक्तता से भर जाना जो पत्रकारिता, साहित्य और सेवा से परिपूर्ण हो.. महेन्द्र भाई मुझसे उम्र में कुछेक साल बड़े थे.. लेकिन वर्षों की मुलाकात में उम्र कभी बाधा नहीं बनी.. जब भी मिले, मोहब्बत से मिले. दरअसल, उनके और मेरे बीच का रिश्ता मेरी पत्रिका ‘समागम’ बनी रही. इस दुखद हादसे के शायद एकाध पखवाड़े पहले मैं, महेन्द्र भाई और पटेल साहब कुछ घंटे साथ रहे. तय भी हुआ था कि इसी दिन दोपहर को फिर मुलाकात होगी.. मेरी व्यवस्ता और थोड़ी अलाली के चलते कल मिल लेंगे के साथ मिलने की आस अधूरी रह गयी. खैर, जो लोग महेन्द्र भाई को जानते हैं, वे लोग यह भी जानते हैं कि एक संवेदनशील आदमी का जाना क्या होता है.. उनकी पहचान पहले पहल प्रिंटरी से थी तो उनके पाक्षिक अखबार पहले पहले से भी थी. वे एक अच्छे लेखक और कवि थे... जिस कोरोना के कू्रर हाथों से महेन्द्र भाई को हमसे अलग कर दिया, उसी कोरोना से उपजी स्थितियों पर उन्होंने कविता लिखी थी...

        रायपुर से भोपाल आने के बाद जिनकी सोहबत मुझे मिली, उनमें महेन्द्र भाई एक थे. वे ऐसे व्यक्ति थे जो सामने वाले का पूरा सम्मान करते थे. वे राग-द्वेष से विलग थे. हमेशा संजीदा रहने वाले महेन्द्र भाई हमेशा हल्के से मुस्करा देते थे. कभी चिंता में डूबे उनको देखा नहीं. हमेशा अपने काम में लगे रहते थे. आखिरी दफा जब हम मिले तो कोरोना से साथियों के देहांत से दुखी थे. मुझे क्या पता था कि महेन्द्र भाई भी इसी बीमारी के शिकार हो जाएंगे. उनके देहांत के पहले पटेल साहब से बात हुई थी. उन दिनों बिस्तर और ऑक्सीजन को लेकर मारामारी चल रही थी. अचानक तबियत बिगडऩे के कारण उन्हें एडमिट करना जरूरी हो गया था. आनन-फानन में पटेल साहब अपने संबंधों और संपर्कों से उन्हें एडमिट करा सके थे. दो-एक दिन बाद जब मैंने महेन्द्र भाई की तबियत का हाल पूछा तो पटेल साहब ने कहा कि अब ठीक हैं. जल्द ही घर वापस आ जाएंगे. यह वह दौर था जब हस्पताल से किसी के घर आने की खबर बहुत बड़ी बन चली थी. पटेल साहब से यह सुनकर मन को दिलासा दिलाया कि ईश्वर का शुक्र है. ईश्वर निर्मम हो चला था. शायद उसके पास भी अच्छे कवि और लेखक की कमी हो गई होगी. सो महेन्द्र भाई को वहां रचने-गढऩे के लिए बुला लिया..

       महेन्द्र भाई के लिए जब यह लिख रहा हंू तो सहज ही स्मरण हो आता है कि आज वे होते तो वे अपना 68वां जन्मदिन आने वाले माह अक्टूबर की 4 तारीख को मना रहे होते. लेकिन नियति को यह कहां मंजूर था. 4 अक्टूबर, 1953 को उज्जैन की भाटी दम्पत्ति के घर रौशन हुए महेन्द्र ने अपने कुल का नाम इतना ऊंचा किया कि आज उनके नहीं रहने पर आंखें नम हैं. एक खालीपन सा महसूस हो रहा है और हम चाहने वालों की चलती तो कैलेंडर के पन्ने से 21 अप्रेल की उस मनहूस तारीख को हमेशा हमेशा के लिए दफा कर देते. साल तो अपनी रफ्तार से गुजर जाएगा लेकिन कैलेंडर के पन्ने पर अप्रेल माह की 21 तारीख टीस देने के लिए हर साल हमारी आंखों के सामने होगी. परिवार में उनकी जीवनसंगिनी मीना भाभी किसको अपना दर्द बताये? बिसूरती मां को ढाढस देने के लिए बेटों की भूमिका में दामाद आनंद और पलाश साये की तरह उनके साथ हैं. बेटियां यामिनी और पूर्वा हकीकत से वाकिफ हैं. खुद के साथ मां को सम्हाल कर पिता की लाडली बेटियां अचानक सयानी हो गई हैं. महेन्द्र भाई के पीछे उनके दो छोटे भाई मोहन और पुष्कर उनकी छोड़ी विरासत साहित्य, संस्कृति और प्रेम को सम्हालेंगे.

रघु ठाकुर उन्हें याद करते हुए अपनी आंखें भीगो लेते हैं तो लाजपत आहूजा उनके साथ बिताये पलों को याद करते हैं. हर गतिविधियों में साथ रहने वाले संतोष चौबे के लिए तो यह कभी ना भर पाने वाला नुकसान है तो साहित्य के साथी मुकेश वर्मा की आंखें भी सजल है. पटेल साहब के लिए यह दुख तो ऐसा है जैसे किसी ने अचानक उनकी आंखों के सामने अंधेरा कर दिया हो. यारों के यार भाई महेन्द्र की यादें ‘मिट्टी जो कम पड़ गई’ और ‘तुमने छुआ’ के पन्नों पर हमेशा हमेशा के लिए दर्ज है. यादें तो उन सम्मान पत्र पर भी हैं जो कभी उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक अववदान के लिए वागीश्वरी सम्मान, राजबहादुर पाठक स्मृति सम्मान, शब्दशिल्पी सम्मान, विनय दुबे स्मृति सम्मान के साथ रामेश्वर गुरु पुरस्कार हैं. महेन्द्र भाई जैसे कोई जाता है क्या? लेकिन क्या करें. सबकुछ हमारे हिसाब से तय नहीं होता है. शायद इसी को जीवन कहते हैं.

सोमवार, 20 सितंबर 2021

 

हिन्दी को लेकर हमारी चिंता लगातार दिख रही है लेकिन ज्यादतर चिंता  मंच से है. व्यवहार में हम हिन्दी को पीछे रखते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो पाठशाला से लेकर विश्वविद्यालय तक की परीक्षाओं में हिन्दी के विकल्प के तौर पर अंग्रेजी के प्रश्रों को मान्यता नहीं दी जाती. इसके उलट हिन्दी की स्वीकार्यता वैश्विक मंच पर हो चुकी है, जिसे हम स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. कल तक श्यामपट्ट पर लिखी जाने वाली हिन्दी अब हमारी हथेलियों पर है और मोबाइल से लेकर कम्प्यूटर तक का की-बोर्ड हिन्दी से संचालित है. हिन्दी के इस नये वैश्विक स्वरूप की चर्चा करता शोध पत्रिका ‘समागम’ का नया अंक.

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

कविता से डरे अंग्रेजों ने पिता-पुत्र को शहीद कर दिया

आजादी के अमृत महोत्सव में संदर्भ मध्यप्रदेश


मनोज कुमार
हिन्दुस्तान में स्वाधीनता संग्राम का बिगुल बज चुका था. 1857 के विद्रोह की चिंगारी हर वर्ग और हर अंचल में सुलगने लगी थी. किसी को अपनी जान की फिक्र नहीं थी और जो फिक्र थी तो अपने वतन की. अंग्रेजी शासन हर स्तर पर विद्रोह को कुचलने के लिए बर्बर कार्यवाही कर रहा था. इतिहास के सुनहरे पन्नों पर जिन बलिदानियों के नाम अंकित हैं, उनमें राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह का नाम सबसे ऊपर है. पिता-पुत्र की कविता से भयभीत अंग्रेजों ने उन्हें तोप से उड़ा दिया था क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि यह विद्रोह का गीत है. पिता-पुत्र के बलिदान के साथ पूरा देश उनकी जयकारा करने लगा और देखते ही देखते अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत हो गई. आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर ऐसे वीर पुत्रों का स्मरण कर मध्यप्रदेश की माटी सदैव उनकी ऋणी रहेगी. स्वाधीनता संग्राम के इस महान प्रसंग के माध्यम से नयी पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास से परिचित कराया जाना है.
राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह, दोनों पिता-पुत्र अच्छे कवि होने के कारण अपनी ओजस्वी कविता के माध्यम से जनमानस में क्रांति का संदेश दिया करते थे. जबलपुर की 52वीं पलटन को मेरठ के सिपाहियों के विद्रोह की जानकारी मिल चुकी थी. जबलपुर में भी वहां की जनता ने गोंडवाना साम्राज्य (वर्तमान का जबलपुर मण्डला) राजा शंकर शाह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का प्रारंभ कर दिया था. कहा जाता है कि राजा शंकर शाह की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी, अंग्रेज सरकार उनको अपने पक्ष में रखने के लिए पेंशन भी दिया करती थी. राजा शंकर शाह चाहते तो क्रांतिकारियों एवं क्रांति का दमन करके अपनी पेंशन भी बढ़वा सकते थे और कुछ अन्य प्रकार के लाभ ले सकते थे.  किंतु उन्होंने अभाव में ही जीना पसंद किया. कुछ भी हो जाए, इस क्रांति का साथ देंगे, समर्पण नहीं करेंगे-संघर्ष करेंगे.
सन् 1857 में सितंबर अंग्रेजों पर आक्रमण की योजना बनी क्योंकि उस दिन अत्यधिक भीड़ भाड़ चहल-पहल रहेगी. अंग्रेज सरकार ने खुफिया रूप से अपने एक गुप्तचर को फकीर के रूप में भेजा था, जिससे राजा की योजना की जानकारी उन्हें प्राप्त हो चुकी थी. अंग्रेज सरकार की 52वीं रेजीमेंट के कमांडर क्लार्क के गुप्तचर उसको समय-समय पर सूचना देते थे. क्रांति के दिन से पहले ही 14 सितंबर, 1857 को आधी रात में क्लार्क ने राजमहल घेर लिया. राजा की तैयारी पूरी नहीं हो पाई राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह सहित तेरह अन्य लोगों को भी बंदी बना लिया गया. उन्हें जबलपुर रेलवे स्टेशन के पास अस्थाई जेल बनाकर कैद किया गया था, साथ ही पूरे महल में हथियार और क्रांति की सामग्री थी, उन्हें भी ढूंढा गया.
वह कहते हैं ना, युद्धों में कभी नहीं हारे, हम डरते हैं छल छंदों से, हर बार पराजय पायी है अपने घर के जयचंदों से. राजा के राज्य में भी एक जयचंद था. जिसका नाम गिरधारीलाल दास था. वह क्लार्क को राजा के साहित्य की कविताओं का अनुवाद करके अंग्रेजी में बताता था. कविता के आधार पर मुकदमा चलाया गया. ‘देश के इतिहास में पहली बार था, जिसमें किसी लेख, कविता या साहित्य के आधार पर मुकदमा चलाकर उसे मौत की सजा दी.’ उन्हें माफी मांगने को कहा गया, साथ ही साथ धर्म परिवर्तन करने को कहा गया और अंग्रेजों से सहयोग करने को कहा गया, प्रस्ताव को राजा ने नकार दिया. 03 दिन में मुकदमा चलाया गया, निर्णय भी हो गया. 17 सितंबर, 1857 को दोनों पिता-पुत्र को मौत की सजा सुनाते वक्त उनसे कहा था कि यदि वे माफी मांग लें तो सजा माफ कर दी जाएगी. परंतु आजादी के मस्तानों और दीवानों ने क्षमा नहीं मांगी और अपना सिर कटाना मंजूर किया.
18 सितंबर, 1857 को अपना प्रभाव बनाए रखने के लिये अंग्रेज सरकार ने राजा शंकर शाह, रघुनाथ शाह को जबलपुर उच्च न्यायालय के पास खुले आसमान के नीचे तोपों से बांध दिया गया. तोप से बांधते समय राजा और राजकुमार दोनों सीना तानकर निडर खड़े रहे. भारत माता के वीर सपूत ने भारत माता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी प्रजा को एक-एक छन्द सुनाने चाहा। पहला छन्द राजा शंकरशाह ने सुनाया -
मूँद मूख डण्डिन को चुगलों की चबाई खाई
खूब दौड़ दुष्टन को शत्रु संहारिका।
मार अंगरेज रेज कर देई मात चण्डी
बचे नाहिं बैरी बाल बच्चे संहारिका।
संकर की रक्षा कर दास प्रतिपाल कर
वीनती हमारी सुन अब मात पालिका।
खाई लेइ मलेच्छन को झेल नाहिं करो अब
भच्छन ततत्छन कर बैरिन कौ कालिका।।
यह पूरा होते ही दूसरा छन्द पुत्र ने और भी उच्च स्वर में सुनाया, जिससे जनता जोश से भर गई.
कालिका भवानी माय अरज हमारी सुन
डार मुण्डमाल गरे खड्ग कर धर ले।
सत्य के प्रकासन औ असुर बिनासन कौ
भारत समर माँहि चण्डिके संवर ले।
झुण्ड-झुण्ड बैरिन के रुण्ड मुण्ड झारि-झारि
सोनित की धारन ते खप्पर तू भर ले।
कहै रघुनाथ माँ फिरंगिन को काटि-काटि
किलिक-किलिक माँ कलेऊ खूब कर ले।।
अंग्रेजों का इस तरह सरेआम राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को तोप से बांधकर मृत्युदंड देने का उद्देश्य लोगों और राजाओं में अंग्रजों का डर पैदा करना था. परन्तु अंग्रेजों के इस कदम से क्रांति और ज्यादा भडक़ गई. दूसरे ही दिन से लोगों द्वारा बड़ी संख्या में उस स्थान की पूजा की जाने लगी. 52वीं रेजिमेंट के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और इनकी टुकड़ी पाटन की ओर कूच कर गई. विद्रोह की आग मंडला, दमोह, नरसिंहपुर, सिवनी और रामगढ़ तक फैल गई. जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति फैल गई. तोप से उड़ाते समय वहां उपस्थित एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है कि - ‘मैं अभी-अभी क्रांतिकारी राजा और उनके पुत्र को तोप से उड़ाए जाने का दृश्य देखकर वापस लौटा हूं. जब उन्हें तोप के मुंह पर बांधा जा रहा था तो उन्होंने प्रार्थना की -भगवान उनके बच्चों की रक्षा करें ताकि वे अंग्रेजों को खत्म कर सकें.’ (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का शंखनाद करने वाले गोंडवाना के अमर बलिदानी राजा शंकर शाह और उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता. आज इन महान शहीद पिता-पुत्र का स्मरण कर एक शहर क्या पूरा देश गौरव का अनुभव करता है और यह सीख देता है कि देश से बड़ा कोई नहीं. उन्हें शत-शत प्रणाम. (photo by google)

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...