सोमवार, 3 मई 2021

बेमानी है प्रेस फ्रीडम की बातें

मनोज कुमार


    तीन दशक पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने 3 मई को विश्व प्रेस फ्रीडम डे मनाने का ऐलान किया था. तब से लेकर आज तक हम इसे पत्थर की लकीर मानकर चल रहे हैं. इन तीन दशकों में क्या कुछ हुआ, इसकी मीमांसा हमने नहीं की. पूरी दुनिया में पत्रकार बेहाल हैं और प्रेस बंधक होता चला जा रहा है. खासतौर पर जब भारत की चर्चा करते हैं तो प्रेस फ्रीडम डे बेमानी और बेकार का ढकोसला लगता है. दशकवार जब भारत में पत्रकारिता पर नजर डालें तो स्थिति खराब नहीं बल्कि डरावना लगता है. लेकिन सलाम कीजिए हम पत्रकारों की साहस का कि इतनी बुरी स्थिति के बाद भी हम डटे हुए हैं. हम पत्रकार से मीडिया में नहीं बदल पाये इसलिए हमारे साहस को चुनौती तो मिल रही है लेकिन हमें खत्म करने की साजिश हमेशा से विफल होती रही है. इस एक दिन के उत्सवी आयोजन से केवल हम संतोष कर सकते हैं लेकिन फ्रीडम तो कब का खत्म हो चुका है बस समाज की पीड़ा खत्म करने का जज्बा ही हमें जिंदा रखे हुए है.
    भारत में पत्रकारिता के पतन की शुरूआत और उसकी स्वतंत्रता खत्म करने का सिलसिला साल 1975 में ही शुरू हो गया था. आपातकाल के दरम्यान जो कुछ घटा और जो कुछ हुआ, वह कई बार बताया जा चुका है. उसे दोहराने का अर्थ समय और स्पेस खराब करना है. लेकिन एक सच यह है कि पत्रकारिता इसके बाद से दो हिस्सों में बंटती चली गई. लोगों ने मिशन से बाहर आकर इसे प्रोफेशन मान लिया. अखबारों और पत्रिकाओं की संख्या मे इजाफा होना शुरू हो गया. कल तक जिनके लिए किसी स्कूल में शिक्षक बन जाना आसान था, उन्हें यह भी आसान लगा कि पत्रकार बन जाओ. ना शिक्षा की पूछ-परख और ना ही अनुभव का कोई लेखा-जोखा. मैं कुछ ऐसे पत्रकारों को जानता हंू जो शीर्ष संस्थाओं के प्रमुख हैं लेकिन जमीनी पत्रकारिता से उनका कोई वास्ता नहीं रहा. डिग्री हासिल की और सुविधाजनक ढंग से बड़े पदों पर आसीन हो गए. नयी पीढ़ी उन्हें प्रखर पत्रकार और आचार्य संबोधित करने लगे. मिश्री घुली बातों से वे चहेते बन गए और आज जिस बात का हम रोना रो रहे हैं, वह इन्हीं महानुभावों की वजह से उत्पन्न हुआ है. इसमें तथाकथित प्रखर पत्रकार और आचार्य बन चुके रसमलाई में लिपटे लोगों की गलती तो थोड़ी है. इससे बड़ी गलती उन दिग्गज लोगों की है जो जानते हुए भी उन्हें आगे बढ़ाने में लग रहे.
    बेहिसाब पत्रकारिता के शिक्षण संस्थान शुरू हो रहे हैं. यहां पढऩे वाले विद्यार्थियों को पत्रकारिता को छोडक़र शेष सारी विधायें सिखायी जाती हैं. डिग्री और बेहतर नौकरी के साथ सुविधाजनक जिंदगी की चाहत लिए पत्रकारिता के नौनिहाल सवाल करना भी नहीं जानते हैं. संवाद और अध्ययन से उनकी कोसों दूरी है. कभी किसी पर इनकी खबर का केवल इंट्रों देख लीजिए तो माथा पीट लेंगे. पू्रफ रीडिंग जैसी बुनियादी सबक कभी इन्हें सिखाया नहीं गया. जुम्मा-जुम्मा चार साल की पत्रकारिता और वरिष्ठ पत्रकार का खिताब. इन सालों में एक खबर ऐसी नहीं कि जो छाप छोड़ गई हो. हालांकि निराशाजनक स्थिति के बावजूद मैं कह सकता हूं कि कुछेक विद्यार्थी हैं जो पत्रकारिता करने आये थे और पत्रकारिता कर रहे हैं. पत्रकारिता शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन के दौरान उन्हें इस बात का भी ज्ञान नहीं दिया गया कि पत्रकारिता और मीडिया क्या है? आज पत्रकारिता दिवस है और सोशल मीडिया में निश्चित रूप से मीडिया को शुभकामनाएं दी जा रही होंगी. प्रेस की स्वतंत्रता के मायने यह नहीं है कि आपको लिखने की आजादी है. प्रेस स्वतंत्रता का अर्थ है आप सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता करें. पेजथ्री की पत्रकारिता से बाहर आकर एक बार विद्यार्थी, पराडकर, गांधी और तिलक को पढ़ें. मैं यह भी नहीं कहता कि आधुनिक संचार माध्यमों में वह सबकुछ संभव है जो पराधीन भारत की पत्रकारिता में था लेकिन जैसे सृृष्टि ने मां बनाया तो सदियां बदल जाने के बाद भी मां ही है, वैसे ही माध्यम बदल जाए, विकास हो जाए लेकिन पत्रकारिता की आत्मा जिंदा रहना चाहिए. पत्रकारिता हमारी अस्मिता है.
    जब हम प्रेस स्वतंत्रता की बात करते हैं तो इन दिनों कोरोना काल में जो कुछ घट रहा है, वह हमें आईना दिखाने के लिए बेहतर है. देशभर में पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों को अर्जियां दी जा रही हैं. फिर राजशाही की तरह सरकार हम पर एहसान कर कहती है कि फलां सरकार ने पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मान लिया है. समाज में शुचिता और सकरात्मकता का भाव उत्पन्न करने की जिम्मेदारी पत्रकारिता की. सरकार के प्रयासों को लोगों तक पहुंचाने की अपेक्षा पत्रकारिता से. लेकिन पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों से बात करना होगी. क्या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है कि वह हमारा ध्यान रखे? इस स्थिति के लिए भी हम दोषी हैं. रोहित सरदाना की मृत्यु हो जाती है तो हम खेमें में बंट जाते हैं. हम भूल जाते हैं कि वो भी एक पत्रकार था और हम सब भी. यह भी सच है कि जिस अखबार, पत्रिका या चैनल में काम करेेंगे, उसकी नीति के अनुरूप बोलना होगा. यह बंधन सबके लिए है. हमारी आपस की बैर और खेमेबाजी राजनीतिक दलों के लिए सुविधा पैदा करती है. आज सचमुच में प्रेस स्वतंत्र होता तो सरकारें आगे आकर फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए मजबूर होती लेकिन दुर्भाग्य से हम खेमेबाज पत्रकार हैं. इसलिए सब बातें बेमानी है.
    उम्मीद कीजिए और भरोसा रखिए कि देश के कोने कोने से कोराना के चलते जो पत्रकार जान गंवा रहे हैं, उनसे हम सीख लें. एक साथ खड़े हो जाएं. जिस दिन हम यह साहस कर पाएंगे हर प्रबंधन को आगे आकर वेतन आयोग की शर्ते मानना होगी और सरकारों को भी. लेकिन इसके लिए इंतजार करना होगा कि क्योंकि एक ऐसी अदृश्य शक्ति है जो हमें इसमें या उसमें बांट रही है.   

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

मनुष्यता के देवदूत हैं श्रमिक साथी


मनोज कुमार

मेहतनकश की दुनिया को सलाम करता एक मई. वह एक मई जिसे हम श्रमिक दिवस के रूप में जानते हैं. वही श्रमिक साथी जिनके पास जीवन जीने लायक मजदूरी से मिला मेहताना होता है. घर पर कोई पक्की छत नहीं. धरती को बिछा लेते हैं और आसमां को ओढ़ लेते हैं. इनकी उम्मीदें भी कभी हिल्लोरे नहीं मारती है. मोटरकार से लेकर जहाज तक खड़ा कर देते हैं लेकिन इसमें सवार होने की इच्छा कभी नहीं होती है. ये श्रमिक रचनाकार हैं और इनसे समाज की धडक़न है. इन्हें अपना अधिकार भी पता है और दायित्व भी. अधिकार के लिए कभी अड़े नहीं लेकिन दायित्व से पीछे हटे नहीं. आज की तारीख से पहले अखबार में खबर छपी कि देश के प्लांट मे ऑक्सीजन निर्माण में जुटे श्रमिकों ने अपने खाना इसलिए छोड़ दिया कि उन्हें पहले काम पूरा करना है. यह जज्बा श्रमिकों में ही हो सकता है. श्रमिक श्रेष्ठ हैं तो इसलिए नहीं कि वे श्रमिक हैं बल्कि एक तरह से वे रचियता हैं. मांगना इनकी आदत में नहीं है. देना इनकी फितरत में शामिल है. आत्मस्वाभिमान से जीने वाले श्रमिक साथी अपना भोजन छोडक़र एक संदेश दिया है कि आओ, पहले जान बचायें. एक-एक जान की कीमत श्रमिक साथियों को पता है.
    इस हाहाकार समय में सब डरे हुए हैं. सहमे हुए हैं. अपना जीवन कैसे बचा लें, यह हर व्यक्ति की चिंता है. धडक़न बचाने के लिए तिजोरियों के ताले खोल दिए गए हैं. जमीन-जायदाद बेचकर जीवन बचाने की जद्दोजहद चल रही है. यह हालात किसी एक घर, एक परिवार, एक शहर या देश की नहीं बल्कि हर जगह है. जीवन बचाना इस समय सबसे बड़ी जरूरत है. इस बैरी बीमारी ने रिश्तों के मायने सिखा दिया है. लोभ-लालच से परे भी कोई जिंदगी होती है, यह भी हम सीखने लगे हैं. लेकिन एक बड़ी सच्चाई यह है कि इस कोरोना बीमारी के पहले भी और वर्तमान समय में और शायद दुनिया के रहने तक एक ऐसा वर्ग है जिसके जेहन में सिर्फ एक बात है कि मनुष्य बने रहना. वह है हमारे श्रमिक. ऐसा नहीं है कि कोरोना श्रमिकों से कोई दोस्ती निभा रहा है या उनकी जान बख्श रहा है. सरकारी आंकड़ों में उनकी गिनती नहीं के बराबर है. उनके पास तिजोरी नहीं है. बैंकों में खाते नहीं है और अस्पताल में इलाज के लिए कोई सोर्स और रसूख नहीं है. लेकिन उनके पास है उनका आत्मविश्वास. वे खोकर भी दुखी होना जाहिर नहीं करते हैं. उल्टे दुखी लोगों के आंसू पोंछने में वे सबसे आगे होते हैं. भोजन छोडक़र ऑक्सीजन बनाने में जुटे श्रमिकों की खबर इसकी बानगी है. ऐसी अनगिनत खबरें होंगी जो आपके आसपास से गुजर रही होगी लेकिन अखबारों की सुर्खियों में जगह नहीं पा रही हैं. एक ऑटो चालक इन्हीं में से एक है जो अपना नफा-नुकसान छोडक़र लोगों की सेवा में जुटा हुआ है. उन्होंने कभी कोई मांग नहीं की कि उन्हें कोरोना वारियर ऐलान किया जाए. अपने लिए ना जतन मांगा और न मांगा कुछ.  
    मनुष्यता के देवदूत हैं श्रमिक. खामोशी के साथ वे जीते हैं उन्हें अपनी ताकत भी पता है. लेकिन वे अपनी ताकत का उपयोग नहीं करते हैं. वे सहिष्णु हैं. उपकार करना उनकी ताकत है. अपने नेक कार्यों को लेकर इतराना उन्हें आता नहीं. उनकी जिंदगी में रंग नहीं है तो बदरंग भी नहीं है. सेवा का भीतर से जो सतरंगी दुनिया उन्हें हमेशा ऊर्जावान रखती है, वही उनकी दुनिया है. श्रमिक साथियों का हक देने की बात हमेशा होती रही लेकिन कागज से कभी बाहर नहीं आ पाया. वायदों और बातों में लिपटी चिकनी-चुपड़ी राजनीतिक ऐलान को वो बेहतर जानते हैं. वो जो कसी हुई मुठ्ठी चित्रों में जो आपको दिखती है, वही उनकी ताकत है. वो रच सकते हैं तो बिगाड़ भी सकते हैं. जब एक साथ खड़े हो जाएं तो सरकारें हिल जाती हैं. परिवर्तन की ऐसी बयार चलती है कि सत्ताधीशों के सामने कुचलने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता है. इतिहास इस बात का गवाह है. ऐसे अनगिनत किस्से आप पढ़ सकते हैं जब श्रमिक आंदोलन को कुचला गया.
    
वो जब कहते हैं कि मेहनतकश जब भी अपना हिस्सा मांगेगे/इक गांव नहीं/ इक खेत नहीं/ पूरी की पूरी दुनिया मांगेगे. श्रमिक साथी हमेशा इस बात से मुतमइन हैं कि ‘हम होंगे कामयाब’. उनकी कामयाबी कभी छीनने में नहीं रही. वे एक टुकड़ा जमीन और एक टुकड़ा आसमा से खुश हैं. आज इस कोरोना काल में श्रमिक साथी अपनी किसम की अपने फितरत से मानवता की मिसाल कायम कर रहे हैं. दुख और अफसोस इस बात का है कि हम उनकी इस नेक-नीयती को सम्मान नहीं दे पाते हैं. खैर, उन्हें इस बात का रंज भी नहीं है. वे बुनियाद के पत्थर बने रहना चाहते हैं और उन्हें इसी का संतोष है. इस विकट समय में हर धडक़न को बचाने वाले योद्धा श्रमिक साथियों को सलाम.  
Taswir youtub se

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

‘सु’ अपने साथ ले गए और ‘नील’ हम हो गए

मनोज कुमार
रात हो रही थी और लगभग थक सा गया था लेकिन मन बार बार सोशल मीडिया पर अटका हुआ था. एक बार फिर हिम्मत कर फेसबुक ओपन किया तो पहली खबर सुनील के नहीं रहने की मिली. दयाशंकर मिश्र ने यह सूचना पोस्ट की थी. सहसा यकिन नहीं हुआ लेकिन दयाशंकर के पोस्ट पर अविश्वास करने का भी कोई कारण नहीं था. वे एक जिम्मेदार लेखक-पत्रकार हैं अत: मन मारकर खबर पर यकीन करना पड़ा. इसके बाद तो कई लोगों ने यह सूचना शेयर किया. इस खबर को पढक़र कर सुनील पर गुस्सा आया. कुछ पलों में उसने पराया कर दिया. हम लोगों के बीच में कोई व्यवसायिक रिश्ता नहीं था. लेकिन जो था, वह हम दोनों ही जानते थे. पांचेक साल पहले जब मेरे दिल की चीर-फाड़ की नौबत आयी थी तो सबसे पहले चिंता करने वालों में सुनील था. इसके बाद पिछले लॉकडाउन से लेकर अब तक अपनी बीमारी से दो-चार हो रहा हूं. इस बीच एक बार सुनील से मुलाकात हुई. वही चाय पीकर जाना लेकिन कश्मीर से कन्याकुमारी तक जो चाय का हाल है, सो चाय समय पर नहीं आयी. अगली बार साथ चाय पियेंगे के वायदे के साथ मैं चला आया. शारीरिक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर होने के बाद बहुत देर तक बैठा नहीं जा रहा था. हां, इस बीच इंस्टाग्राम में जो संवाद का सिलसिला शुरू किया था, उसे किताब की शक्ल में लाना फायनल हुआ था. सुनील मेरे उन चंद दोस्तों में है जिनसे लगातार बातचीत नहीं होती थी. मुझे कोई दिक्कत, खासतौर पर हेल्थ को लेकर तो उसे एक पंक्ति का फोन करना होता था और उसकी तरफ से भी यही था. कुछेक दोस्तों के साथ मेरा यह एक वायदा है. इतनी यारी के बाद सुनील बेवफा निकला. अरे, भले मानुष कम से कम एक फोन तो कर देता. उसकी तबियत खराब होने से लेकर बिछुडऩे तक की कोई खबर नहीं मिल पाना जीवन भर सालता रहेगा.
कोई 30 साल पुरानी बात होगी. मैं रायपुर से देशबन्धु में नौकरी करने भोपाल आया था. यहां जिन चंद लोगों से पहले पहल मुलाकात हुई, उसमें सुनील एक था. सुनील से पटरी बैठने का कारण भी था कि हम लोग सिनेमा और संस्कृति पर लिखते थे. हम लोग की प्राथमिक शाला भाऊ साहब खिरवडक़र होते थे. हम लोग मालवीय नगर स्थित आदिवासी लोक कला परिषद के कार्यालय में जाते थे. कभी डांट, कभी प्यार, कभी टिप्स और भाऊ साहब का मन हो गया तो गरम समोसे के साथ चाय. यहीं पर हम दोनों ने तीजन बाई पर लिखना शुरू किया. सुनील ने उन पर लेख लिखा तो मैं उनसे बातचीत को कागज पर उतारा. तब दिल्ली से प्रकाशित प्रमुख सांस्कृतिक पत्रिका ‘सारंगा स्वर’ में हम साथ साथ छपे. और भी ऐसे कई मौके आए. इस बीच सुनील सरकार के मुलाजिम हो गए. हाऊसिंग बोर्ड के तब के अध्यक्ष कनक तिवारी के साथ उनकी पटरी बैठी और गांधी 125वीं जयंती के लिए वे गंभीरता से कार्य करने लगे. तब मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री थे.
जिंदगी खरामा-खरामा चल रही थी. सुनील को थोड़ा स्थायित्व मिल गया था लेकिन मेरी नाव अब तक हिचकोले खा रही है. खैर, इस बीच सुनील संस्कृति विभाग में आ गए. यहां मेरा पुराना रिश्ता श्रीराम तिवारी से है. यह रिश्ता जब वे फिल्म विकास निगम के महाप्रबंधक होते थे, तब से बना. सुनील और मैं उनके करीब थे. एक तरह से गुरु के भाव के साथ औपचारिक ना सही, लेकिन गंडा बांध दिया था. भाऊ साहब के बाद औपचारिक गुरु के रूप में उनकी संगत में आ गए. सुनील संस्कृति में रहे और मुझे संविदा के तौर पर वन्या में लिया गया. पहले बच्चों की पत्रिका ‘समझ झरोखा’ का सम्पादक बनाया गया और साथ में फीचर सेवा ‘वन्या संदर्भ’ का जिम्मा मिला. अब तकरीबन रोज ही मिलना होता था. सुनील चाहते थे कि मुझे वहां स्थायित्व मिल जाए लेकिन ‘भाग ना बांचे कोई’ कहावत चरितार्थ हो गई. राजनीतिक रसूख के चलते एक अन्य को सम्पादक बना दिया गया. सुनील दुखी थे. लेकिन उसके हाथ में कुछ नहीं था. एक बार फिर मेरी वन्या में सामुदायिक रेडियो समन्वयक के रूप में हुई. सुनील ने कहा कि अब तो जम जाओगे. लेकिन फिर वही ‘भाग ना बांचे कोई’. तिवारी जी के रिटायरमेंट के साथ नए एमडी ने बिना किसी कारण बताये बाहर का रास्ता दिखा दिया.
इस सब उतार-चढ़ाव में सुनील लोगों से मेरी तारीफ किया करते थे. वे मेरे काम को लेकर हमेशा अनुरागी बने रहे. जब मेरी तबीयत डांवाडोल हो रही थी तब उन्होंने अपने ड्रायवर अनिल को हिदायत दे रखी थी कि जब इन्हें जाना हो, छोड़ देना और ले आना. सुनील को पता था कि मेरा पूरा जीवन पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर चलता है. वो हमेशा मुझे भैया का संबोधन देते रहे और मैं सीधे सुनील कहता था. हल्के से मुस्कराना और कहना सब ठीक होगा. सुनील को पता था कि समोसा मेरा प्रिय है तो जब कभी डायरेक्टरेट पहुंचा, मेरे लिए समोसा आ जाता था. एकाधिक बार से ज्यादा मिठाई भी होती थी. बिना किसी अवसर के. कल कंचन ने लिखा कि सुनील उसे गुडिय़ा कहते थे. सच लिखा है. हम दोनों के लिए कंचन हमेशा गुडिय़ा ही रही. आज सुनील चले गए हैं. लोग याद कर रहे हैं. भला-भला लिख रहे हैं लेकिन पंचतत्व में विलीन हो चुके सुनील को क्या पता कि हम उन्हें कितना याद कर रहे हैं. ‘सु’ अपने साथ ले गए और ‘नील’ हमें छोड़ गए. औरों के लिए सुनील लेखक, फिल्म के जानकार और जाने क्या क्या होंगे लेकिन हम दोनों उन दिनों के साथी हैं जब हम तय किया करते थे कि एक कूलर घर वालों के लिए होगा और हमारा काम तो पंखे से चल जाता है. फिर से कहूंगा सुनील भला कोई ऐसे जाता है? ‘सु’ अपने साथ ले गए और ‘नील’ हमें छोड़ गए.  

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

यह समय परखने का नहीं, साथ चलने का है

मनोज कुमार

        कोरोना महामारी को लेकर आज जो भयावह स्थिति बनी हुई है, वह किसी के भी अनुमान को झुठला रही है. एक साल पहले कोरोना ने जो तांडव किया था, उससे हम सहम गए थे लेकिन बीच के कुछ समय कोरोना का प्रकोप कम रहने के बाद हम सब लगभग बेफिक्र हो गए. इसके बाद ‘मंगल टीका’ आने के बाद तो जैसे हम लापरवाह हो गए. हमने मान लिया कि टीका लग जाने के बाद हमें संजीवनी मिल गई है और अब कोरोना हम पर बेअसर होगा. पहले टीका लगवाने में आना-कानी और बाद में  टीका लग जाने के बाद मनमानी. यह इस समय का कड़ुवा सच है. सच तो यह भी है कि यह समय किसी को परखने का नहीं है बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम कर साथ चलने का है. लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं. हम व्याकुल हैं, परेशान हैं और हम उस पूरी व्यवस्था को परखने में लगे हुए हैं जिसके हम भी हिस्सेदार हैं. यह मान लेना चाहिए. सोशल मीडिया में व्यवस्था को कोसने का जो स्वांग हम रच रहे हैं, हकीकत में हम खुद को धोखा दे रहे हैं. हम यह जानते हैं कि जिस आक्रामक ढंग से कोरोना का आक्रमण हुआ है, उससे निपटने में सारी मशीनरी फेल हो जाती है. फिर हमें भी इसकी कमान दे दी जाए तो हम भी उसी फेलुअर की कतार में खड़े नजर आएंगे. एक वर्ष पहले जब कोरोना ने हमें निगलना शुरू किया था, तब हमारे भीतर का आध्यात्म जाग गया था. हम र्नििर्वकार हो चले थे. हमें लगने लगा था कि एक-दूसरे की मदद में ही जीवन का सार है लेकिन जैसे-जैसे कोरोना उतार पर आया, वही आपाधापी की जिंदगी शुरू हो गई. एक-दूसरे को पीछे छोडक़र आगे बढऩे की जद्दोजहद शुरू हो गई.
        आज जब हालात एक बार फिर बेकाबू हो चला है तब हमारे निशाने पर सरकार और सरकारी तंत्र है. यह स्वाभाविक भी है. दवा, ऑक्सीजन, बिस्तर की कमी बड़े संकट के रूप में हमारे सामने हैं. इसके अभाव में लोग मरने को मजबूर है तो सरकार पर गुस्सा आना गलत नहीं है. सरकार से समाज की अपेक्षा गलत नहीं है लेकिन क्या आलोचना से स्थिति बेहतर हो सकेगी? शायद नहीं. समय-समय पर तर्क और तथ्यों के साथ तंत्र की कमजोरी उजागर करना हमारी जवाबदारी है. ऐसा जब हम करते हैं तो सरकार की आलोचना नहीं होती बल्कि हम सरकार के साथ चलतेे हुए सचेत करते हैं. बिगडैल और बेकाबू तंत्र की कमजोरी सामने आते ही सरकार चौकस हो जाती है. शायद ऐसा करने से समाज में एक तरफ सकरात्मकता का भाव उत्पन्न होता है तो दूसरी तरफ हम एक जिम्मेदार समाज का निर्माण करते हैं. चुनाव में बेधडक़ जमा होती भीड़ के लिए हम सयापा करते रहे लेकिन अपने-अपने घरों से निकल कर कितने लोगों ने भीड़ को वहां जाने से रोका? भीड़ राजनीतिक दलों की ताकत होती है लेकिन इस भीड़ को नियंत्रण करने के लिए हमारी कोशिश क्या रही? कोरोना के आने से लेकर अब तक के बीच में जिस तरह सभा-संगत, प्रदर्शनी और मेले-ठेले सजते रहे, उनका कितनों ने विरोध किया? तब हम सबको लग रहा था कि कोरोना खत्म हो गया है. जीवन अब पटरी पर है और जीवन है तो जीवन में उत्सव भी होना चाहिए. आज हमारे सामने यक्ष प्रश्र यह है कि सरकार ने बीते साल भर में कोई इंतजाम क्यों नहीं किया? बात में दम तो है लेकिन हमने सरकार इस इंताजम को पुख्ता करने के लिए कभी याद दिलाया? आज कोरोना का यह भयावह चेहरा नहीं आता तो सबकुछ ठीक था लेकिन आज सब खराब है. बात खरी है लेकिन चुभेगी.
        लगातार ड्यूटी करते पुलिस वाले, नगर निगम के कर्मचारी, डॉक्टर, नर्स और इनके साथ जुड़े लोग पस्त हो चुके हैं लेकिन वे अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद हैं. इसके बाद भी छोटी सी चूक पर हम उनके साथ दो-दो हाथ करने के लिए खड़े हो जाते हैं. निश्चित रूप से काम करते करते कुछेक गलतियां हो सकती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि हम उनके इतने लम्बे समय से किए जा रहे सेवा कार्य को भुला दें. एक डॉक्टर आहत होकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर हो जाता है, यह बात जोर-शोर से उठती है और उठनी भी चाहिए लेकिन इसके बाद इन डॉक्टरों को और मेडिकल स्टॉफ को सुरक्षा मिले, इस पर हम कोई बातचीत नहीं करते हैं? पूरे प्रदेश में दो या तीन पुलिस की ज्यादती की आधा-अधूरा वीडियो वॉयरल होता है और हम मान लेते हैं कि पुलिस अत्याचार कर रही है. कभी इस बात की चिंता की कि पुलिस वाले कितने तकलीफों के बीच अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं. खासतौर पर छोटे पुलिस कर्मचारी. कोरोना के शुरूआती दौर में पुलिस के सहयोग और सेवा कार्य की अनेक खबरें आती रही लेकिन इस बार ये खबरें क्यों गायब है? क्या पुलिस ने सेवा कार्य बंद कर दिया है या जानबूझकर उन्हें अनदेखा किया जा रहा है. कोरोना किसी भी तरह से, कहीं से फैल सकता है लेकिन इस बात की परवाह किए बिना आपकी और हमारी चिंता में नगर निगम के कर्मचारी सेवा कार्य में जुटे हुए हैं. क्या इन सबकी सेवा भावना को आप अनदेखा कर सकते हैं. शायद नहीं.
        यह समय हमेशा नहीं रहने वाला है. लेकिन हमने समय रहते अपनी जिम्मेदारी नहीं समझा तो यह दुख हमेशा हमें सालता रहेगा. आप सिर्फ इतना करें कि आप और आपके नातेदार, दोस्तों और परिचय मेें आने वालों को अपने अपने घर पर रोक लें. सडक़ों पर भीड़ कम होगी तो तंत्र पर दबाब कम होगा और दबाव कम होगा तो परिणाम का प्रतिशत बड़ा होगा. क्यों ना हम सोशल मीडिया की ताकत का उपयोग कर लोगों को जागरूक बनाने में करें क्योंकि आलोचना से आपके मन को तसल्ली मिल सकती है लेकिन संकट मुंहबाये खड़ा रहेगा. यह संकट कब और किसके हिस्से में आएगा, कोई नहीं कह सकता. इससे अच्छा है कि संकट को हरने के लिए सोशल मीडिया संकटमोचक बने. कोरोना से बचने के छोटे उपाय मास्क पहनों, हाथ धोएं और आपस में दूरी बनाकर रखें. नमस्ते तो हमारी संस्कृति है. समय को आपकी हमारी जरूरत है. साथ चलिए क्योंकि कमियां गिनाने के लिए खूब वक्त  मिलेगा, पहले हम दुश्मन से दो-दो हाथ कर लें.     

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

                                                                         शोध पत्रिका ‘समागम’ का नया अंक राष्ट्र-कवि पंडित                                                                                  माखनलाल  चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ के                                                                              शताब्दी वर्ष पर


शनिवार, 3 अप्रैल 2021

दादा का ‘पुष्प’ और देश की ‘अभिलाषा’

मनोज कुमार

भारत की आजादी के 75वें वर्ष का अमृत-महोत्सव आरंभ हो चुका है। एक वर्ष पश्चात जब हम आजादी का अमृत-पान कर रहे होंगे तब इस पूरी अवधि में स्वाधीनता संग्राम के उन नायकों को तलाश करना आवश्यक हो जाता है। यह संयोग है कि सम्पूर्ण स्वाधीनता संग्राम में अपनी कलम से अलग जगाने वाले पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कालजयी कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ अपने रचे जाने का शताब्दी वर्ष मना रही है। एक वर्ष बाद इस कविता के गौरवशाली सौ वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। हिन्दी साहित्य के पन्नों में अनेक कविताएं ऐसी हैं जिन्हें आप कालजयी रचना की श्रेणी में रखते हैं लेकिन पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ उन सबसे इतर है। यह इसलिए कि पहला तो इस कविता की रचना सामान्य परिस्थितियों में कवि की भावनाओं का लेखन ना होकर जेल की काल-कोठरी में हुआ था। दादा माखनलाल जी को यह काल-कोठरी स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय होने की सजा के तौर पर मिली थी। आजादी के दीवानों को भला कौन कैद रख सकता है, इस बात की गवाही उनकी कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ की अभिलाषा देती है। शरीर से वे जरूर अंग्रेजों के बंधक थे लेकिन मन में देश-प्रेम के भाव को भला अंग्रेजी शासक किस तरह कुचल देते, सो तमाम कोशिशों और अन्याय के बावजूद पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कलम ना रूकी और ना झुकी।
बीते सौ साल में कई पीढ़ियां गुजर गईं। स्वाधीनता भारत का अमृत- महोत्सव मनाने की तैयारी में हम जुट गए हैं और इस समय आते-आते तक परिस्थितियां बदल चुकी है। आज नौजवानों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाना पड़ता है। आज की पीढ़ी को बताना पड़ रहा है कि व्यक्ति से ऊपर परिवार, परिवार से ऊपर समाज, समाज से ऊपर राज्य और राज्य से ऊपर राष्ट्र होता है। ऐसे में शताब्दी मनाने जा रही कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ का बार-बार पाठ किया जाना आवश्यक प्रतीतत होता है। हालांकि इस सौ वर्ष की यात्रा में यदि कुछ नहीं बदला तो वह अमर कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ है। इस कविता को किसी भी आयु-वर्ग का व्यक्ति पढ़े तो उसके भीतर स्वयमेव राष्ट्र के प्रति भावना भर जाती है। एक पुष्प की अभिलाषा का संसार इतना व्यापक है कि वह ईश्वर के शीश पर बैठने की चाह नहीं है। इसके पहले की पंक्ति में दादा लिखते हैं कि पुष्प की यह अभिलाषा भी कभी नहीं रही कि वह सुरबाला के गहनों में गूंथा जाए, वह प्रेमी का हार बने या सम्राट के लिए उसका उपयोग हो। वह उस वीर, पराक्रमी और देश के लिए मर-मिटने वाले जवान के कदमों में बिछ जाने की मंशा जाहिर करती है ताकि उसका जीवन सार्थक हो सके। एक पुष्प की चाहत हर भारतीय की चाहत होनी चाहिए जो अपने राष्ट्र के लिए सर्वस्व स्वाहा कर दे। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी अपनी कविता के माध्यम से एक पुष्प को आधार बनाकर राष्ट्र भक्ति का जो मानक गढ़ते हैं, वह अप्रतिम है।
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की अनेक कविताएं हैं और हर कविता का अपनापन है। शिक्षा और संदेश से भरी इन कविताओं में जीवन है और जीवन सीख भी। स्वाधीनता सेनानी के तौर पर दादा का योगदान कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता है। वे विरल स्वाधीनता सेनानी रहे हैं जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से गोरे शासकों को परेशान कर रखा था। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी एक स्वाधीनता सेनानी होने के साथ साथ कवि और प्रखर पत्रकार थे। वे हमेशा से निर्भिक रहे और लेखन में कोई समझौता नहीं किया। जो उन्हें अनुचित लगता था, उसे वह इस तरह प्रस्तुत करते थे कि अन्यायी को भीतर तक पीड़ा होती है।
4 अप्रेल को पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का अवतरण दिवस है। बाकियों का तो जन्मदिवस होता है क्योंकि वे एक सामान्य मनुष्य की तरह जीते हैं लेकिन पंडित चतुर्वेदी का अवतरण दिवस इसलिए है कि वे युग-पुरुष की तरह आए और अपने जीवन का हरेक पल राष्ट्र को समर्पित कर दिया। यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है कि स्वाधीनता संग्राम के इस योद्धा का जन्म मध्यप्रदेश की धरा पर हुआ। अनेक कथाएं हैं जिनमें पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता का परचम फहरता है। पत्रकारिता को लेकर उनकी गहरी समझ थी। उस कालखंड में जब वर्तमान समय की तरह आधुनिक यंत्र नहीं थे। तब पंडितजी ने पत्रकारों के लिए बकायदा प्रशिक्षण की बात कही थी। पत्रकारिता के लिए विश्वविद्यालय स्थापित कर गुणी और राष्ट्र के प्रति अनुराग रखने वाले पत्रकारों को प्रशिक्षित करने की बात कही थी। आज हम जिस ले-आउट की चर्चा करते हैं और विभिन्न सॉफ्टवेयर के माध्यम से आकर्षक पेज-सज्जा करते हैं। तब पंडित जी ने पृष्ठ सज्जा के लिए पत्रकारों को प्रशिक्षित किए जाने की चर्चा की थी। पत्रकारिता की भाषा-शैली को लेकर वे बहुत सख्त हैं। उनका मानना था कि एक पत्रकार की भाषा में गुणवत्ता होना चाहिए। वाक्यों के गठन एवं समाचारों की प्रस्तुति को लेकर भी पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की अपनी दृष्टि थी।
सन 1913 ई. में इन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ कर पूर्ण रूप से पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्र्र की सेवा में लग गए। लोकमान्य तिलक के उद्घोष ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ को ये बहुत ही कर्मठता से अपने राष्ट्र्रीय आन्दोलन में उतार लिए थे। चतुर्वेदी जी ने खंडवा से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘प्रभा’ का सम्पादन किया। राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी के द्वारा आहूत सन 1920 के असहयोग आंदोलन में महाकोशल अंचल से पहली गिरफ्तारी दादा माखनलाल की थी। इसी तरह 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी गिरफ्तारी देने का प्रथम सम्मान इन्हीं को मिला। इनका उपनाम एक भारतीय आत्मा है। राष्ट्रीयता माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य का कलेवर है तथा रहस्यात्मक प्रेम उसकी आत्मा है।
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के सम्पादन में ‘प्रभा’, ‘प्रताप’ और ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन होता था। बाद के समय में वे अपनी अंतिम धड़कन तक ‘कर्मवीर’ का सम्पादन करते रहे। 1927 में आयोजित हिन्दी सम्पादक सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि-‘यदि समाचार पत्र संसार की बड़ी ताकत है तो उसके सिर जोखिम भी कम नहीं। पर्वत के जो शिखर हिम से चमकते हैं और उनसे राष्ट्रीय रक्षा की महान दीवार बनती हैं, उसे ऊंची होना पड़ता है। जगत में समाचार पत्र यदि बड़प्पन पाए हुए हैं तो उनकी जिम्मेवारी भी भारी है। बिना जिम्मेवारी के बड़प्पन का मूल्य ही क्या और वह बड़प्पन तो मिट्टी के मोल का हो जाता है, जो अपनी जिम्मेवारी को संभाल नहीं सकता। समाचार पत्र तो अपने गैर जिम्मेदारी से स्वयं ही मिट्टी के मोल का हो जाता है, किंतु वह देश के अनेक महान अनर्थों का उत्पादक और पोषक भी हो जाता है।’
मध्यप्रदेश में उनकी पत्रकारिय अवदान को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए उनके नाम से माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। वर्तमान सरकार इस विश्वविद्यालय की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए हमेशा से प्रयासरत रही है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का अतिरिक्त स्नेह पत्रकारिता के इस स्कूल के साथ है। हालांकि बदलते समय में पत्रकारिता का यह विश्वविद्यालय पत्रकार पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के मानदंडों पर कितना खरा है, इस पर पृथक से विमर्श की आवश्यकता होगी।
बहरहाल, यह वक्त आजादी के अमृत-महोत्सव का है और दादा की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ का शताब्दी वर्ष है तो समाज का यह दायित्व बनता है कि वह नयी पीढ़ी को दादा के रचना-कर्म और राष्ट्र चेतना के उनके अवदान से अवगत कराये। दादा को किसी राज्य की सीमा से बांधने के बजाय पूरे राष्ट्र में कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ का शताब्दी वर्ष की अनुगूंज हो। कोशिश होना चाहिए कि पाठशालाओं और महाविद्यालयों के साथ अन्य सार्वजनिक स्थलों पर सांगीतिक प्रस्तुति कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ की हो। विभिन्न साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के आयोजनों में प्रमुखता से कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ का पाठ हो। यह इसलिए आवश्यक नहीं है कि हमें खानापूर्ति करना है बल्कि इसलिए जरूरी है कि कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ के माध्यम से राष्ट्र चेतना की कोशिश की जाए। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का स्मरण कर हम उन्हें नहीं, स्वयं का भला करेंगे क्योंकि वे तो समाज के मील के पत्थर हैं। उन्होंने राष्ट्र-भक्ति और भावना का एक संदेश हमारे लिए छोड़ गए हैं। उनके इस संदेश का पाठ भी करें और जीवन में उतारने की सच्चा प्रयास भी। यह हम सबके लिए, पूरे देश और समाज के लिए गौरव की बात है कि हमें समय मिला है कि हम ऐसे भारतीय आत्मा का स्मरण कर सकें।

सोमवार, 14 सितंबर 2020

मनोज कुमार ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी के चलन पर ब्रेक लग गया है. आप हिन्दी के हिमायती हों और हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिन्दी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिन्दी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न करें लेकिन सच है कि नकली अंग्रेजियत में डूबे हिन्दी समाचार चैनलों ने हिन्दी को हाशिये पर ला खड़ा किया है. हिन्दी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ने दर्शकों को भरमा कर रख दिया है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारिता की राह से गुजरते हुए समाचार चैनल मीडिया में बदल गए हैं. संचार या जनसंचार शब्द का उपयोग अनुचित प्रतीत होता है तो विकल्प के तौर पर अंग्रेजी का मीठा सा शब्द मीडिया तलाश लिया गया है. अब मीडिया का हिन्दी भाव क्या होता है, इस पर चर्चा कभी लेकिन जब परिचय अंग्रेजी के मीडिया शब्द से होगा तो हिन्दीकी पूछ-परख कौन करेगा. हालांकि पत्रकारिता को नेपथ्य में ले जाने में अखबार और पत्रिकाओं की भी भूमिका कमतर नहीं है. चैनलों की नकल करते हुए अखबारों ने खबरों और परिशिष्ट के शीर्षक भी अंग्रेजी शब्दों से भर दिए हैं. शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है. प्रधानमंत्री लिखने से अखबारों में जगह की कमी हो जाती है तो पीएम से काम चलाया जा रहा है. मुख्यमंत्री सीएम हो गए और आयुक्त कमिश्रर. जिलाधीश के स्थान पर कलेक्टर लिखना सुहाता है तो संपादक के स्थान पर एडीटर शब्द सहज हो गया है. यानि समाचार चैनल से लेकर अखबार के पन्नों में भी हिन्दी को दरकिनार किया जा रहा है. हालांकि इस दौर का मीडिया गर्व से इस बात को लिखता जरूर है कि हिन्दी का श्रेष्ठ चैनल या हिन्दी का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार लेकिन हिन्दी को कितना स्थान है, यह उन्हें भी नहीं मालूम. हम हर साल 14 सितम्बर को इस बात को लेकर शोर मचाते रहें कि हिन्दी माथे की बिंदी है. हिन्दी से हमारा स्वाभिमान है. हिन्दी हमारी पहचान है लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता से मीडिया में बदलते परिदृश्य में हिन्दी हाशिये पर है. हिन्दी के चैनलों के पास हिन्दी के शब्दों का टोटा है. उनके पास सुप्रभात कमतर शब्द लगता है और गुडमार्निंग उनके लिए ज्यादा प्रभावी है. दस बड़ी खबरों के स्थान पर टॉप टेन न्यूज की सूची पर्दे पर दिखाना उन्हें ज्यादा रूचिकर लगता है. हिन्दी के नाम पर कुमार विश्वास की कविता का पाठ कराने वाले चैनलों को कभी निराला या पंत की कविताओं को सुनाने या पढ़ाने में रूचि नहीं होती है. सच तो यह है कि हिन्दी की पीठ पर सवार होकर अंग्रेजी की टोपी पहने टेलीविजन न्यूज चैनलों ने जो हिन्दी को हाशिये पर लाने की कोशिश शुरू की है, वह हिन्दी के लिए अहितकर ही नहीं बल्कि दुर्भाग्यजनक है. हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने वालों का दिल इस बात से दुखता है कि जिनकी पहुंच करोड़ों दर्शक और पाठक के बीच है, वही संचार माध्यम हिन्दी से दूर हैं. इन संचार माध्यमों की आत्मा हिन्दी के प्रति जाग गई तो हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने में कोई बड़ी बाधा नहीं होगी लेकिन यह संभव होता नहीं दिखता है. हम तो हिन्दी के दिवस, सप्ताह और अधिक से अधिक हिन्दी मास तक ही स्वयं को समेट कर रखना चाहते हैं. हिन्दी की श्रीवृद्धि के नाम पर यह पाखंड हम दशकों से करते चले आ रहे हैं और शायद यह क्रम ना टूटे. इसे हिन्दी के प्रति पाखंड परम्परा का नाम भी दे सकते हैं. कुछेक को यह नागवार गुजरेगा लेकिन सच से कब तक मुंह चुराएंगे. हिन्दी की यह दुर्दशा अंग्रेजी से प्रभावित हिन्दी समाचार चैनलों के आने के पहले से हो रही है. मेरी तरह आपने भी कभी महाविद्यालय की परीक्षा दी होगी. परीक्षा में प्रश्र पत्र आपके सामने शिक्षक ने रखे होंगे और उसमें प्रश्र पहले हिन्दी में और इसी हिन्दी का रूपांतरण अंग्रेजी में दिया होता है. अब असल बात यह है कि प्रश्र पत्र के निर्देश को पढ़ें जिसमें साफ साफ लिखा होता है कि हिन्दी में कोई त्रुटि हो तो अंग्रेजी के सवाल ही मान्य है. अर्थात हमें पहले समझा दिया गया है कि हिन्दी के चक्कर में मत पड़ो, अंग्रेजी ही सर्वमान्य है. हिन्दी पत्रकारिता में शिक्षा लेकर हाथों में डिग्री लेकर भटकते प्रतिभावान विद्यार्थियों को उचित स्थान क्यों नहीं मिल पाता है तो इसका जवाब है कि उन्हें अंग्रेजी नहीं पढ़ाया गया. बताया गया कि हिन्दी माध्यम में भी अवसर हैं. यदि ऐसा है तो प्रावीण्य सूची में आने वाले विद्यार्थियोंं का भविष्य अंधेरे में क्यों है? टेलीविजन चैनलों में उनका चयन इसलिए नहीं हो पाता है कि वे अंग्रेजी नहीं जानते हैं या उस तरह की अंग्रेजी नहीं जानते हैं जिसके बूते पर वे एलिट क्लास को ट्रीटमेंट दे सकें. ऐसे में हिन्दी के प्रति विमोह और अंग्रेजी के प्रति मोह स्वाभाविक हो जाता है. हालांकि हिन्दी के प्रति समर्पित लोगों को ‘एक दिन हमारा भी टाइम आएगा’ जैसे भाव से भरे लोग उम्मीद से हैं. हिन्दी के हितैषी भी इस बात का सुख का अनुभव करते हैं कि वे वर्ष में एक बार हिन्दी को लेकर बोलते हैं, लिखते हैं और हिन्दी की श्रीवृद्धि के लिए लिए विमर्श करते हैं. एक दिन, एक सप्ताह और एक माह के बाद हिन्दी आले में टांग दी जाती है. कुछ लोग हैं जो वर्ष भर क्या लगातार हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए प्राण-प्रण से जुटे हुए हैं. इन लोगों की गिनती अंगुली भर की है लेकिन हिन्दी को हाशिये पर डालने वालों की संख्या असंख्य है. इस पर सबसे पहले मीडिया कटघरे में आता है. यूरोप की नकल करते हुए हम भूल जाते हैं कि हिन्दीभाषी जनता ही इनके चैनल को टीआरपी दिलाती है. उनके होने से ही मीडिया का अस्तित्व है लेकिन करोड़ों लोगों की बोली-भाषा को दरकिनार कर उस अंग्रेजी को सिर पर कलगी की तरह बांधे फिरते हैं, जो उन्हें अपना अर्दली समझती है. यह भी सच है कि टेलीविजन चैनलों में काम करने वाले साथियों में अधिसंख्य मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि में शायद ही अंग्रेजियत हो लेकिन उन्हें टेलीविजन प्रबंधन भी लार्ड मैकाले की तरह अंग्रेजी बोलने और लिखने पर मजबूर करता है. मैकाले की समझ में यह बात आ गई थी कि भारत को बर्बाद करना है तो उसकी शिक्षा पद्धति को नष्ट करो और उनमें कुंठा भर दो. मैकाले यह करने में कामयाब रहा और मैकाले के रूप में आज लाखों मीडिया मैनेजर यही कर रहे हैं. जिस किसी को अंग्रेजी नहीं आती, वे हीनता के भाव से भरे हैं. अंग्रेजी उन पर लाद दिया गया है क्योंकि अंग्रेजी के बिना जीवन शून्य है. मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि आज से कोई 35 वर्ष पूर्व जब पत्रकारिता का सबक लेने गया वहां भी अंग्रेजी जानने वाले को हमसे ज्यादा सम्मान तब भी मिलता था और आज भी हम. हम हिन्दीपट्टी के लोग दरकिनार कर दिया करते थे. तब मीडिया उत्पन्न नहीं हुआ था. अखबार था तो पत्रकारिता थी. आज की तरह पेडन्यूज नहीं हुआ करता था बल्कि पीत पत्रकारिता की यदा-कदा चर्चा हुआ करती थी. लेकिन हमारे गुरु तो हिन्दुस्तानी भाषा में पगे-बढ़े थे और वे हमें आकर्षित करते थे. हमें लगता था कि जिस भाषा को समाज समझ सके, वही पत्रकारिता है. शायद आज भी हम पिछली पंक्ति में खड़े हैं तो हिन्दी के प्रति मोह के कारण है या कह सकते हैं कि अंग्रेजी को अंगीकार नहीं किया, इसलिए भी पीछे धकेल दिए गए. हालांकि सच यह भी है कि हम जो कर रहे हैं, वह आत्मसंतोष है. किसी एक अघढ़ समाजी का फोन आता है कि आप का फलां लेख पढऩे के बाद मैं आपको फोन करने से रोक नहीं पाया तो लगता है कि मैंने यहां आकर अंग्रेजी को परास्त कर दिया है. क्योंकि फोन करने वाला कोई टाई-सूट पहने नकली किस्म का बुद्धिजीवी नहीं बल्कि ठेठ भारतीय समाज का वह पुराने किस्म का कोई आदमी है जिसके पास दिमाग से अधिक दिल है. हिन्दी की श्रेष्ठता के लिए, हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने लिए दिमाग नहीं दिल चाहिए. दिल वाले आज भी पत्रकारिता कर रहे हैं और दिमाग वालों की जगह मीडिया में है. हिन्दी को श्रेष्ठ स्थान दिलाना चाहते हैं तो दिल से हिन्दी को गले लगाइए. हिन्दी दिवस और सप्ताह, मास तो औपचारिकता है. एक बार प्रण लीजिए कि हर सप्ताह हिन्दी में एक लेख लिखेंगे, हिन्दी में संवाद करेंगे. हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा. मीडिया का क्या है, वह तो बदल ही जाएगा.

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