सोमवार, 16 अप्रैल 2012

ये तेरा घर…ये मेरा घर…

मनोज कुमारहम बचपन में एक खेल खेला करते थे। कोई हमसे आगे न निकल जाये, इसके लिये हम कहते थे कि तु जितना बलवान है, मैं उससे दस गुना ज्यादा बलवान हूं। साथी संगी कहते कि हम तेरे से दस गुना ज्यादा बलवान हैं तो मैं कहता कि पहले ही कह दिया कि तुमसे दस गुना ज्यादा यानि जितना कहोगे उससे हमेशा यह ज्यादा ही रहेगा। बचपन के इस खेल को आज भोपाल में दुहराते हुए देखने का मौका मिला है। हमारा खेल बचपन का था जिसमें कोई स्वार्थ नहीं था लेकिन भोपाल में इन दिनों जो खेल खेला जा रहा है, वह अपने अपने स्वार्थाें के लिये है। दामुल वाले प्रकाश झा भोपाल में पहली दफा राजनीति की शूटिंग करने आये थे और इसके बाद आरक्षण बना डाला। राजनीति से आरक्षण बनाते समय तक न तो उन्हें भोपाल अपना लगा था और न ही उन्होंने कभी भोपाल को अपना घर कहने की बात की थी। इस बार जब अपनी वो एक नयी फिल्म की शूटिंग के लिये आये हैं और कुछ विवाद सामने आया तो उन्होंने कह दिया कि अब से भोपाल मेरा पहला घर। झा की तर्ज पर साथी कलाकारों ने भी भोपाल को अपना कह दिया। एकाध ने तो भोपाल से पुराना रिश्ता ही ढूंढ़ निकाला।

बचपन की यादें ताजा हो गर्इं। प्रकाश झा ने भोपाल को अपना घर क्या कह दिया, बयानों की बरसात लग गयी। अच्छा लगता है जब मेरे भोपाल को ये लोग अपना भोपाल कहते हैं। मुझे इस बात से ऐतराज नहीं है कि प्रकाश झा हों या कोई और जो भोपाल को अपना कहे। मुझे दर्द इस बात का है कि तीन-चार बरस पहले यहां फिल्म की शूटिंग करने आये तो उन्हें अपने भोपाली होने का अहसास हो गया। इसके पहले इतने बरसों तक वे कहां थे, भोपाल तो तब भी था। उसी शान और ठाठ के साथ। प्रकाश झा के आ जाने से भोपाल के तेवर और तासीर में बदलाव नहीं आया है और न किसी एक प्रकाश झा के आने से बदलेगा। प्रकाश झा के लिये आज भोपाल उनका पहला घर है, पूरा प्रदेश उनका नहीं है, यह बात भी उन्होंने साफ कर दी है। मेरे प्रदेश के भोले-भाले कलाकारों को शूटिंग के लिये बुलाना और उन्हें बैरंग लौटा देना हमारे प्रदेश की रवायत नहीं है। वो तो भला हो सह्दयी मुख्यमंत्री शिवराजसिंह का जिन्होंने कलाकारों का दर्द सुना और उन्हें सम्मान भोजन कराया। प्रकाश झा अपना मानते हो तो अपनों की तरह बर्ताव करना भी सीखो। सिर्फ यह कह देना ही पर्याप्त नहीं होगा कि अब भोपाल मेरा पहला घर है। भोपाल में फिल्म बनाओ, भोपालियों को रोजगार दो और खुद भी मालामाल हो जाओ, कोई ऐतराज नहीं करेगा लेकिन सिर्फ काम के लिये किसी को अपना बना लेने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। इससे उबर जाएंगे तो फिल्म से बड़ा केनवास जिंदगी का है। इसमें रंग भरने की जरूरत है। खुशी की, प्यार की और अपनेपन की।

विभाजन का दर्द और उसकी पीड़ा प्रकाश झा नहीं समझते होंगे लेकिन मैं महसूस करता हूं। कभी मेरा मध्यप्रदेश विशाल हिन्दी प्रदेश हुआ करता था। राजनीति बिसात में मात खाने के बाद मेरे प्रदेश के दो खाने हो गये। एक राज्य रह गया मध्यप्रदेश और दूसरे को नाम मिला छत्तीसगढ़। मैं छत्तीसगढ़ में पैदा हुआ हूं और लोगों की सलाह थी कि राज्य के विभाजन के बाद मुझे छत्तीसगढ़ चले जाना चाहिए। ये सलाहकार उन्हीं प्रकाश झा जैसे लोगों में से हैं जो अवसर की तलाश में रहते हैं। खैर, इन सलाहकारों को मेरा धन्यवाद लेकिन मैं भौगोलिक विभाजन को विभाजन नहीं मानता। मेरी जन्म भूमि छत्तीसगढ़ है। मैं उन्हें बारंबार प्रणाम करता हूं किन्तु विभाजन के पहले से मैं मध्यप्रदेश में हूं और कर्मभूमि मेरी मध्यप्रदेश है। मैं दोनों प्रदेश का बेटा हूं। दोनों ने मुझे नाम दिया, सम्मान दिया और समाज में स्थान। मेरे लिये छत्तीसगढ़ भी उतना ही अर्थवान है जितना कि मध्यप्रदेश। विभाजन के बाद मैं यह नहीं कहता कि मध्यप्रदेश अब मेरा पहला घर है बल्कि कहता हूं कि दोनों राज्य मेरे अपने हैं। मेरा तो मानना है कि मैं भारतीय हूं और भारत जन्मभूमि का हर स्थान मेरे लिये वही मायने रखता है जो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़। कहीं मुझ कर्म करने का अवसर मिले तो उसे अपना पहला घर कहने की भूल नहीं करता। प्रकाश झा बड़े फिल्मकार हैं। बड़ी सोच के साथ फिल्म बनाते हैं तो उन्हें कहना चाहिए कि मध्यप्रदेश उनके पसंदीदा राज्यों में एक है। पूरा हिन्दुस्तान उनका घर है। विशाल भारतभूमि पर किसी एक व्यक्ति का हक नहीं, बल्कि सभी भारतीयों का है। अलग अलग स्वार्थाें से पहले ही भारत के राज्यों में विभाजन रेखा खींच रही है और इस रेखा को बढ़ाने के बजाय समेटे जाने की जरूरत है। ये मेरा घर, ये तेरा घर कहने की मानसिकता से उबरना होगा तब ही हम विभाजन की दरार को पाट सकते हैं।

रविवार, 15 अप्रैल 2012

काटजू, निर्मल बाबा और मीडिया

मनोज कुमार
हम भारतीय कितने अंधविश्वासी हैं अथवा मूर्ख, इस पर फैसला करना थोड़ा मुश्किल काम है लेकिन असंभव नहीं। निर्मल बाबा की जो हकीकत बेपर्दा हुयी है, उसने यह बात तो प्रमाणित कर दी कि हम कितने अंधविश्वासी हैं लेकिन प्रेस कौंसिल के चेयरमेन काटजू के इस बयान की पुष्टि नहीं हो पाती है कि नब्बे फीसदी भारतीय मूर्ख हैं। अंधविश्वासी और मूर्ख के बीच फकत एक बारीक सी रेखा है। शायद इसलिये इस बात पर बहस हो सकती है कि जो लोग बाबाओं के चक्कर में रहते हैं उन्हें अंधविश्वासी कहें अथवा मूर्ख माना जाए। निर्मल बाबा का जो सच सामने आ रहा है, वह चौंकाने वाला नहीं बल्कि डराने वाला है। एक तरफ देश में लोग महंगाई के नीचे दबकर मरे जा रहे हैं। पाई पाई बचाने की जुगत लगा रहे हैं और दूसरी तरफ निर्मल बाबा जैसे लोगों को करोड़ों रुपये भी कम पड़ रहे हैं। यह अंधविश्वास हम भारतीयों की कमजोरी है और समय समय पर उग आने वाले ऐसे कथित बाबाओं के कारण काटजू जैसे विद्वान यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि नब्बे फीसदी भारतीय मूर्ख हैं। काटजू का बयान हमें जख्मी कर देता है। हमारी बुद्धिमता और हमारी पहचान का संकट खड़ा करता है। उनकी बातों को सौफीसदी सच न मानें तो भी इस बात से इंकार करना मुश्किल है कि हमारी भावनाओं से खिलवाड़ कर हमें मूर्ख बनाया जाता है। काटजू किन संदर्भाें में हम भारतीयों की तुलना करते हैं, यह तो वे ही जानें लेकिन हमारी भावनाओं के साथ जो खिलवाड़ किया जाता है, वह दुर्भाग्यजनक है। इस बात का हम पूरी ताकत के साथ इंकार करते हैं कि भारतीय मूर्ख हैं किन्तु इस बात से इंकार भी नहीं करते कि हम बेहद सरल और सीधे स्वभाव के हैं जिसे अपने अपने हितों में कभी बाबानुमा लोग तो कभी कोई और हमारा इस्तेमाल कर लेता है। शायद इन्हीं स्थितियों को भांप कर काटजू ने भारतीयों को मूर्ख की संज्ञा दी जो उनके ओहदे और ज्ञान के अनुकूल नहीं है।

जस्टिज काटजू आम आदमी नहीं हैं बल्कि वे नीति-नियंताओं में से एक हैं। भारतीयों को मूर्ख कहने का साहस उन्होंने कुछ सोच ही किया होगा लेकिन यही साहस वे रोज-ब-रोज टेलीविजन के पर्दे पर उगते बाबाओं को रोकने के लिये दिखाया होता तो कम से कम मूर्ख भारतीय उनके आभारी होते। मीडिया ने ऐसे बाबाओं के संवर्धन और संरक्षण का दरवाजा खोला है तो मीडिया ने ही ऐसे बाबाओं को बेनकाब करने की जवाबदारी उठाने की पहल भी की है। निर्मल बाब का जो रहस्योद्घाटन हुआ है, वह मीडिया के प्रयासों से ही हुआ है। हम इस बात के लिये मीडिया को बधाई दे सकते हैं लेकिन इस बात के लिये हम मीडिया को भी कटघरे में खड़ा करने की बात कहेंगे कि बिना जाने समझे, ऐसे बाबाओं को प्रमोट करने की उनकी मंशा क्या है। पेडन्यूज पर बवाल तो मच रहा है किन्तु इन प्रायोजित बाबाओं पर मीडिया, प्रेस कौंसिल और जागरूक संस्थायें कब संज्ञान लेंगी और एक कायदा कब बनेगा जब बाबाओं का प्रचार अनावश्यक और अकारण न हो सके। जिस दिन यह पहल हो जाएगी उस दिन भारतीय न तो अंधविश्वासी रहेंगे और मूर्ख।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

दलित चेतना के प्रेरणास्रोत डॉ. भीमराव अम्बेडकर

मनोज कुमार
डॉ. अम्बेडर ने सामाजिक न्याय और सामाजिक विषमताओं के प्रति चेतना उद्वेलित कर एक दिषा देने की पहल सौ वर्ष से कुछ कम साल पहले ही कर दी थी। यह समय था जब भारत पराधीन था। वे यह मानते थे कि दलित समाज की स्वीकार्यता तब संभव होगी जब वह आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर स्वतंत्र होगा। इस सोच के साथ वे दलित समाज को सषक्त और सक्रिय बनाने में जुट गये। उनकी सक्रियता का ही परिणाम था कि भारतीय संविधान निर्मात्री सभा की प्रारूप समिति की अध्यक्षता करने का अवसर मिला और बाद में वे भारत के कानून मंत्री भी बनें। भारतीय संविधान का निर्माण करने वाले डॉ. अम्बेडकर आज न केवल दलित समाज के लिये बल्कि समूचे भारतीय समाज के प्रेरणास्रोत के रूप में याद किये जाते हैं।
डॉ. अम्बेडकर स्वयं उस वर्ग के थे, जो सामाजिक अन्याय, कुरूपताओं, विषमताओं और वंचनाओं के भुक्तभोगी थे, और इन्हीं विषमताओं ने उन्हें निरन्तर लड़ने और उन्हें दूर करने की शक्ति दी। अम्बेडकर जीवनभर सामाजिक समरसता की बात करते रहे। वे चाहते थे कि दलित वर्ग को समाज की मुख्यधारा में षामिल किया जाए और उन्हें भी वही अधिकार प्राप्त हों जो समाज की मुख्यधारा के लोगों को है। डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि दलितों को समाज में समानता का अधिकार तभी मिल सकता है जब वे षिक्षित होंगे। विकास के लिये वे षिक्षा को पहली सीढ़ी मानते थे। वे अपने जीवनकाल में दलित समाज में षिक्षा के प्रसार के लिये अनेक स्तरों पर प्रयास किया। दलित समाज को जागरूक बनाने के लिये उन्होंने एक अखबार का प्रकाषन-सम्पादन भी किया। 1923 मंे ’बहिष्कृत भारत’ नाम से अखबार का प्रकाषन आरंभ किया। इस अखबार के माध्यम से अपने विचारों को आम आदमी तक पहुंचाने का प्रयास किया। डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि किताबें मनुष्य को विचारवान बनाती हैं। उन्होंने दलित समाज से अवगत कराने के लिये कुछ किताबों का लेखन भी किया जिसमें दी अनटेचेनल्स, हू आर दे, हू आर दी शुद्रा, दस स्पोक अम्बेडकर, इमेनसिपेशन आफ दी अनटेचेनल्स प्रमुख हैं।

डॉ. अम्बेडकर ने दलितों की स्थिति को सुधारने के लिये दलित स्त्रियों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना। 20 मार्च, 1927 को महद में आयी स्त्रियों को अम्बेडकर का सम्बोधन था, ”कभी मत सोचो कि तुम अछूत हो, साफ-सुथरे रहो जिस तरह के कपड़े सवर्ण स्त्रियां पहनती हैं, तुम भी पहनो। यह देखो कि वे साफ है यदि तुम्हारे पति शराब पीते हैं तो उन्हें खाना मत दो। अपने बच्चों को स्कूल भेजो। शिक्षा जितनी जरूरी पुरूषों के लिये है उतनी ही स्त्रियों के लिये भी आवश्यक है। यदि तुम लिखना-पढ़ना जान जाओ, तो बहुत उन्नति होगी। जैसी तुम होगी, वैसे ही तुम्हारे बच्चे बनेंगे। अम्बेडकर के इन प्रयासों का असर दलित समाज पर हुआ और उनमें बदलाव देखा जाने लगा। डॉ. अम्बेडकर जाति व्यवस्था के घोर विरोधी थे। जाति व्यवस्था को तोड़ने के लिये उनका सुझाव था पुजारी एक जाति से नहीं होना चाहिये बल्कि इस पद को प्रजातांत्रिक बना दिया जाना चाहिये। उनका विश्वास था कि यह कदम जाति व्यवस्था को तोड़ देगा। वे इस बात पर भी जोर देते थे कि जाति प्रथा को नष्ट करने का एक ही मार्ग है अन्तर्जातीय विवाह न कि सहभोज। खून का मिलना ही अपनेपन की भावना ला सकता है।

भारतीय संविधान में 15,16 और 17 अनुच्छेद में उन्होंने दलित विद्यार्थियों के लिये कई सिफारिषें की थीं। 1930 की एक समिति ’स्टारेट समिति’ में देखा जा सकता है। जहाँ सदस्य के रूप में उन्होंने सुझाव दिया था, ’दलित छात्रों के वजीफो की संख्या बढ़ाई जाये, उनके छात्रावासों की व्यवस्था की जाये, उन्हें कारखानों, रेलो की कार्यशालाओं और अन्य ट्रेनिंग के लिये वजीफे दिये जाये, विदेश में इंजीनियरिंग पढ़ने के लिये वजीफा दिया जाये और सभी कार्यों की देखभाल के लिये एक अधिकारी नियुक्त किया जाये। यहीं पृष्ठभूमि आगे चल कर राज्य के सामाजिक अन्यायों को दूर करने के लिये एक हस्तक्षेप की भूमिका का आधार बने।

डॉ. अम्बेडकर ने दलित समाज के विकास के लिये जो पहल की है, आज उसका ही प्रभाव है कि केन्द्र और राज्य सरकारें दलित समाज के विकास के लिये आगे आकर कोषिषें कर रही हैं। हालांकि यह कोषिषें जरूरत के अनुरूप नहीं हैं। इसे विस्तार देने की जरूरत है। साथ ही राजनीति दलों की इस मानसिकता को भी बदलने की जरूरत है कि दलित समाज वोटबैंक है बल्कि इन्हें भी समाज की मुख्यधारा में षामिल कर संविधान के अनुरूप उन्नति का अवसर प्रदान किया जाए। दलित समाज में षिक्षा का विस्तार हो रहा है और यही षिक्षित दलित समाज स्वयं होकर अपना अधिकार लेगी, यह उम्मीद की जाना चाहिए। डॉ. अम्बेडकर का सपना यही था कि दलित, दलित न रहकर मुख्यधारा में मिल हो जाएं।

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

मीडिया की जवाबदारी इससे आगे भी हो


मीडिया की जवाबदारी इससे आगे भी हो

मनोज कुमार

फूड कानून के विरोध में मध्यप्रदेश में सभी किस्म के खाद्य सामग्री के विक्रेताओं ने तीन दिन विरोधस्वरूप अपनी दुकानें बंद रखीं। इन तीन दिनों में मामूली तनातनी के अलावा कहीं से कोई बड़े हादसे की खबर नहीं आना इस बात का संकेत था कि लोग समझ रहे थे कि इस कानून का अर्थ क्या है। किस तरह मल्टीनेशनल कम्पनियों को बढ़ावा देने और बाजार उनके अनुरूप उनके हवाले करने की साजिश की जा रही है। इस तीन दिनी हड़ताल में अनेक छोटे व्यापारियों के घर में चूल्हा भी नहीं जला लेकिन वे इसके बावजूद हड़ताल से टस से मस नहीं हुए। मीडिया ने खाद्य व्यापारियों के हड़ताल में जाने से पहले और जाने के बाद तक के तीन दिनों में पूरा कव्हरेज दिया। आम आदमी को होने वाली खान-पान की दिक्कतों से लेकर छोटे व्यवसायियों के घरों में चूल्हा नहीं जलने तक की खबर दी गई। इन सबके बावजूद मीडिया इस पूरे मामले में अपनी भूमिका का निर्वहन करने के बजाय खबरें छापने और दिखाने की खानापूर्ति करती रही।

इस मसले पर यह सवाल उठता है कि मीडिया की भूमिका ऐसे जनहित के मामलों में क्या होना चाहिए? मीडिया की जवाबदारी क्या है? क्या सिर्फ हड़ताल और बंद की खबर छापना ही मीडिया की जवाबदारी है अथवा इससे आगे बढ़कर आम आदमी को हड़ताल के विषय के बारे में सचेत करने की। हड़ताल और बंद की खबर तो एक नियमित प्रक्रिया है जिसके बारे में खबर छापना और प्रसारण करना होता है। मेरा मानना है कि पहले भी और अब भी मीडिया ने अपनी भूमिका और जवाबदारी को नहीं समझा, शायद इसलिये ही उसका पूरा फोकस केवल दैनंदिनी खबरों पर ही रह गया। अधिसंख्य आबादी को यह मालूम ही नहीं होगा कि इस नये खाद्य कानून का असर क्या होने वाला है और उन व्यापारियों को भी नहीं जिनका व्यवसाय सैकड़ा में है। सर्राफा व्यापारियों की लम्बी हड़ताल के बाद अब खाद्य व्यापारियों की हड़ताल से आम आदमी के मन में यह बात बैठती है कि अपनी मांगों को पूरी करने के लिये व्यापारी अनावश्यक आम आदमी के लिये परेशानी का सबब बने हुए हैं। अच्छा होता कि खाद्य व्यापारी हड़ताल पर क्यों जा रहे हैं, कौन सा नया खाद्य कानून है और इस कानून के लागू हो जाने पर व्यापारियों के साथ साथ आम आदमी पर क्या और कितना असर होगा, के बारे में समग्र स्टोरी और आलेख दी जाती जिससे लोगों को यह पता चल जाता कि हड़ताल अकारण नहीं है।

यह पहली बार नहीं हो रहा है बल्कि ऐसे सामाजिक सरोकार के मुद्दे को मीडिया बेहद सतही ढंग से प्रस्तुत करता है। जनसरोकार के मामले में जब मीडिया की भूमिका की अपेक्षा की जाती है तो मीडिया की जवाबदारी बन जाती है कि वह विषय की समग्रता को समेटते हुए पूरी जानकारी का प्रकाशन/प्रसारण करे ताकि लोगों को पता चल सके कि आने वाले समय में उन पर क्या प्रभाव पड़ना है। सरकार की जवाबदारी और जिम्मेदारी के प्रति भी मीडिया सचेत करे ताकि संशय की स्थिति न बने। खाद्य काननू को लेकर यह भ्रम की स्थिति है कि वर्तमान केन्द्र सरकार ने यह कानून पास किया अथवा पूर्ववर्ती सरकारों ने। एक-दूसरे पर राजनीतिक दल आरोप लगा रहे हैं कि यह उनका पास किया कानून नहीं है। मीडिया इस बात की पड़ताल कर स्थिति को स्पष्ट करे। अभी राजनीतिक दल बचने-बचाने के फिराक में है किन्तु मीडिया जब सक्रिय हो जाएगी तो आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से उबर कर राजनीतिक दलों को जनहित में सामने आना होगा। मीडिया सिर्फ दैनंदिनी खबरें प्रकाशित/प्रसारित नहीं करे बल्कि विषय के सभी आयामों को लेकर समाज को सजग बनाये।

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

kamyabi


सुकून की खबर

मनोज कुमार

कहते हैं नदी अपना रास्ता खुद बना लेती है और यह काम कर दिखाया फूलबासन ने। छत्तीसगढ़ राज्य के राजनांदगांव जिले के एक अनाम से गांव की इस महिला की न तो कोई राजनैतिक रसूख है और न वह भारी थैली वाली। एक ठेठ देहाती औरत जो ब्याहे जाने के पहले भी फाकाकशी की जिंदगी बसर कर रही थी और ब्याहने के बाद भी। जैसे-तैसे सातवीं कक्षा तक अक्षर ज्ञान हासिल करने वाली फूलबासन को सरकार की स्वसहायता योजना ने राह दिखायी। जिला प्रशासन ने एक पहल की और फूलबासन ने इस पहल को अपने प्रयासों से हिमालय सा खड़ा कर दिया। दस लोगों का समूह बनाकर शासन की स्कीम से कदमताल करती हुई फूलबासन गांव की बहनों तक पहुंची तो देखते ही देखते एकला चलो अभियान कारवां में बदल गया था। इस कारवां में सौ-पचास नहीं बल्कि लाखों की तादात में बहनें शामिल थीं। इनके पास बचत किये हुए रुपयों की संख्या हजारों में नहीं बल्कि करोड़ों में थी। सूदखोरों को महिला शक्ति ने पानी पिला दिया और हर बहन के चेहरे पर मुस्कान आ गयी।  एक गांव का सफर अब छत्तीसगढ़ राज्य की पहचान बन गया था। 

११ बरस पहले छत्तीसगढ़ स्वतंत्र राज्य बना और फकत इन्हीं ग्यारह बरसों में फूलबासन भी आत्मनिर्भर हो गयी। आर्थिक रूप से स्वतंत्र। फूलबासन की सफलता की कहानी ऐसी गूंजी कि सम्मान और पुरस्कार से वह लद गयी। राज्य सरकार ने अपने प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया तो और भी जगहों से फूलबासन सम्मानित हुयी। आखिरकार फूलबासन की कामयाबी की कहानी केन्द्र तक पहुंच गयी। फूलबासन की कोशिशें इतनी बड़ी थी कि पद्य सम्मान का हकदार उसे माना गया। इस बरस जिन लोगों को पद्य सम्मान से नवाजा गया उनमें फूलबासन भी है। फूलबासन के पास हुनर है, वैभव है, नाम है लेकिन वह अपने पुराने ढर्रे पर जीती है। आज भी जिस चरवाहे के साथ उसके जीवन की डोर बंधी थी, उसी परम्परा को वह आगे बढ़ाती है। 

उसे इस बात की कोई फिकर नहीं है कि वह पद्यश्री से सम्मानित है। फूलबासन की यही विनम्रता पद्य सम्मान के गौरव की रक्षा करती है। सम्मान व्यक्ति को जिम्मेदार बनाता है और यह दर्शन फूलबासन भले ही न समझती हो लेकिन भावनाओं को समझती है। वह हमेशा से हर सम्मान और हर कामयाबी का श्रेय अपनी साथी बहनों को देती है। फूलबासन की मेहनत और लगन का सम्मान कर उस मिथक को भी धराशायी कर दिया गया जो यह मानकर चलते हैं कि पद्य सम्मान तो जुगाड़ से मिलते हैं। फूलबासन से कोई पूछे कि उसका जुगाड़ क्या था तो शायद उसके पास यही जवाब होगा मेहनत, मेहनत और मेहनत। मेहनत से मिली कामयाबी और कामयाबी से मिले पद्य सम्मान से न केवल छत्तीसगढ़ का अपितु समूचा देश स्वयं को गौरवांवित महसूस कर रहा है।       

गुरुवार, 29 मार्च 2012


आरक्षण की राजनीति का शिकार मत बनाओ
 -मनोज कुमार
      भोपाल इन दिनों सिनेमा से सम्मोहित है। सिनेमा एक ऐसा सम्मोहन है जिससे बंधा हुआ हर कोई चला आता है। भोपाल को फिल्मसिटी बनाने की बात राजनीतिक गलियारे में दो दशक से ज्यादा समय से चल रही है किन्तु अब तक बातें ही बातें होती रही। राज्य के संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के प्रयासों से बात अब निकल कर कागज पर आ गयी है और ज्यादा देर नहीं हुई तो हकीकत में फिल्म सिटी अस्तित्व में आ जाएगी। हाल फिलहाल फिल्म सिटी का मामला संस्कृति विभाग के जिम्मे है। फिल्मसिटी का बन जाना भोपाल के लिये अच्छा ही होगा। हुनरमंद लोगों से भोपाल बल्कि समूचा मध्यप्रदेश गौरवान्वित होता रहा है। फिल्मसिटी बन जाने से हुनरमंदों को काम भी मिलेगा और सम्मान भी। हालांकि यह सब बातें फिलवक्त कल्पना की है। फिलवक्त कल्पना की बातें इसलिये कि फिल्म अभी थियेटर पर चढ़ी नहीं है और टिकट की ब्लेक शुरू हो गई है। जी हां, जिन दो फिल्मों को देखकर हम शान से कहते हैं देखो वो मेरा भोपाल, उसी फिल्म के चंद सेकंड के दृश्य में लगभग एक्स्ट्रा की भूमिका में हमारे अपने मंजे हुए कलाकारों को देखकर भविष्य का अंदाजा हो जाता है। जिन कलाकारों को दबंग भूमिका में होना था उन्हें सपनों के सौदागरों ने लगभग एक्स्ट्रा की भूमिका में खड़ा कर दिया है। एक्स्ट्रा शब्द थोड़ा तल्ख है किन्तु सच भी यही है। मैं बात कर रहा हूं जनाब प्रकाश झा साहब की उन दो फिल्मों की जिन्हें देशभर में ख्याति मिली जिसमें पहली फिल्म राजनीति और दूसरी विवादों मंें घिरी फिल्म आरक्षण की। 
      दोनों ही फिल्मों का जादू भोपाल के वाशिंदों के सिर चढ़कर बोला। इस जादू से आम आदमी तो अभिभूत था ही बल्कि वे लोग भी अभिभूत थे जिन्हें फिल्म में एक्स्ट्रा की तरह भूमिका मिली। जिन छोटी और लगभग गुमनाम सी भूमिका निभाकर भोपाल के आले दर्जे के कलाकारों ने फिल्म में अपनी मौजूदगी का जो संतोष पाया, उसका सुख वही बता सकते हैं किन्तु मैं व्यक्तिगत तौर पर नहीं समझता कि जिस आलोक चटर्जी को एनएसडी में बेहतरीन अभिनय के लिये गोल्ड मेडल मिला हो, उन्हें गुमनाम सी भूमिका में होना चाहिए। आलोक जैसे पहले पंक्ति के अभिनेता को नामालूम सी भूमिका के लिये प्रकाश झा ने किन शर्तों पर तैयार किया, यह भी मैं नहीं जानता किन्तु यह जरूर जानता हूं कि प्रकाश झा ने एक आले दर्जे के कलाकार को नेपथ्य में खड़ा कर दिया। आलोक ही क्यों, बच्चों के चच्चा, मशहूर नाट्य निर्देशक और बेहतरीन कलाकार केजी त्रिवेदी भी आरक्षण में हाशिये पर खड़े दिखायी दिये। कुछ ऐसा ही हाल भोपाल के दूसरे आले दर्जे के कलाकारों के साथ हुआ है। पहले राजनीति में और इसके बाद आरक्षण में।
      यह तथ्य को भी याद रखना चाहिए कि प्रकाश झा और दूसरे सिनेमाई दिग्गज २०११ में फिल्म बनाने आ रहे हैं लेकिन रजतपट पर मध्यप्रदेश का दखल बीते कई दशकों से रहा है। लता मंगेशकर से लेकर किशोर कुमार और जया भादुड़ी से लेकर जॉनी वाकर रजत पट के सितारे हैं तो मध्यप्रदेश को इन पर गर्व है। ये तो महज बानगी है, फेहरिस्त तो इतनी लम्बी है कि नाम गिनाते गिनाते ही सूची लम्बी बन जाए। इन सभी लोगों ने रजत पट पर अपनी छाप छोड़ी है। अविभाजित मध्यप्रदेश और विभाजन के बाद बने छत्तीसगढ़ राज्य के प्रतिभा सम्पन्न कलाकारों ने रजतपट पर अपनी जगह बनायी है। बहुत समय नहीं गुजरा जब पीपली लाइव ने पूरे देश का ध्यान खींचा तो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कलाकारों के कारण। हमारे कलाकार केनवास में गढ़े नहीं गये हैं बल्कि उनका रिश्ता जमीन से है और एक जमीन का कलाकार जब मंच पर आता है या पर्दे पर तो वह अपनी अदायगी से सबको मोह लेता है। इन सभी लोगों को रजतपट पर सम्मानजनक स्थान मिला क्योंकि ये लोग मुंबई में चुनौतियों से जूझते हुए अपनी जगह बनायी। 
      मध्यप्रदेश को हिन्दुस्तान का दिल कहा जाता है और इस प्रदेश का निर्माण देश के विभिन्न भूभागों को मिलाकर हुआ है। एक बड़े हिन्दी प्रदेश का गौरव प्राप्त इस प्रदेश की तकनीकी कठिनाई यह है कि यह अलग अलग बोली और भाषाओं का प्रदेश है और यहां बनने वाली हर फिल्म का स्वरूप प्रादेशिक न होकर आंचलिक होता है। मसलन बुंदेलखंडी, मालवी आदि इत्यादि। मध्यप्रदेश को प्रतिबिम्बित करने वाली फिल्म का निर्माण में बाधा है जबकि राजस्थान, बिहार, यूपी और अभी हाल में बने छत्तीसगढ़ भी इस तकनीकी दिक्कत से मुक्त है। यदि यह दिक्कत नही होती तो मध्यप्रदेश अन्य प्रदेशांे की तरह फिल्म निर्माण में झंडे गाड़ रहा होता। 
      बहरहाल, बात साफ है कि ये सिनेमा बनाने वाले भोपाल पर फिदा होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि पूरा हिसाब-किताब लगाकर आ रहे हैं। कास्ट कटिंग के इस दौर में भोपाल में फिल्म बनाना न केवल इनके लिये सस्ता सौदा है बल्कि रजतपट पर अपना चेहरा दिखाने की ख्वाहिश लिये जवान, प्रतिभावान कलाकार और तकनीकीशियन मुफ्त में अथवा मुफ्त के भाव मिल जाते हैं। अस्पताल, होटल, गाड़ी, मजदूर और लगभग इसी मुफ्त के भाव में स्थानीय अखबारों और पत्रिकाओं में पब्लिसिटी। यह बात तो तय है कि इतनी सुविधाएं इन सौदागरों को मुंबई में मयस्सर नहीं है और ऐसे में मध्यप्रदेश के दिल में फिल्मसिटी बनाये जाने का ख्वाब जग जाए तो सपनों के इन सौदागरों के तो पौबारह हो रहे हैं। भोपाल में फिल्मसिटी अभी प्रोसेस में है किन्तु पहली पंक्ति के कलाकारों को एक्स्ट्रा जैसी भूमिका में रखने की शुरूआत हो गई है। यह रस्मी शुरूआत नहीं है बल्कि यह एक परम्परा की नींव डालने की शुरूआत है। सवाल गंभीर है और इस पर अभी से बहस-मुबाहिसा होना चाहिए। जिन कलाकारों के अभिनय को देखकर हम मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, उन्हें इस तरह अभिनय करते देख मन रो उठता है। सिनेमाई सौदागरों की यह राजनीति और फिल्म में आरक्षण की इस परम्परा का यहीं अंत होना चाहिए। 
      याद कर लीजिए इसी षहर का एक आदमी इन्हीं सौदागरों से मुंहमांगी कीमत वसूलता है और उन्हें देना पड़ता है। इस शख्स का नाम है जयंत देशमुख। जयंत भारत भवन से चमकने वाला एक तारा है जिसने खुद को साबित करने के लिये मुंबई की ट्रेन पकड़ ली। रायपुर से भोपाल और भोपाल से मुंबई के बीच का सफर जयंत के लिये आसान नहीं रहा होगा। चुनौतियों से जूझते जयंत के पास प्रतिभा थी और स्वयं पर विश्वास। आखिरकार उसने जगह बना ली। संभव है कि जयंत को अब इन लोगों से नहीं बल्कि इन लोगों को जयंत से समय लेने के लिये टेलीफोन करना पड़ता होगा। राजीव वर्मा भी इसी शहर से हैं। आला दर्जे के अभिनेता हैं और भोपाल रंगमंच में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। भले ही वे अभिताभ बच्चन के नातेदार हांे लेकिन मुंबई में अपने लिये स्पेस बनाने में उन्हें भी संघर्ष करना पड़ा होगा। उन्होंने किसी भी फिल्म अथवा टेलीविजन सीरियल में गुमनाम किरदार की भूमिका नहीं निभायी। टीवी सीरियल चुनौती से अपना अभिनय शुरू करने वाले राजीव वर्मा ने राजश्री की फिल्मों में सम्मानजनक भूमिका निभायी है। उनका यह सिलसिला अब तक जारी है और बना रहेगा। 
      जयंत देशमुख एवं राजीव वर्मा की मिसाल इसलिये दी जा रही है कि रजतपट पर अपनी जगह बनाने के लिये चुनौतियों का सामना इन्हें करना पड़ा था और जो लोग इस सम्मोहनी दुनिया मंे आना चाहते हैं उन्हें भी इन चुनौतियों का सामना करना होगा। सिनेमा का सम्मोहन आपको खींचता है तो आपको संघर्ष के लिये स्वयं को तैयार करना होगा। इन सौदागरों को बताना होगा कि जिन्हें आप मुंबई से ढोकर लाते हैं, जिन्हें आप प्रतिभावान कहते हैं, हमारी प्रतिभा उन्हें कम नहीं है। एक बार हम पर दांव तो खेलकर देखिये जनाब। यह सब आसान नहीं है किन्तु शुरूआत तो करनी ही होगा। हमें अपनी कीमत खुद आंकनी होगी। हम तय करेंगे अपना मोल। फिल्म मुंबई मंे बने या भोपाल में, हम कलाकार फिल्म में आएंगे तो छा जाने के लिये। कुछ पल में गुम हो जाने के लिये नहीं। भीड़ में खो जाने के लिये नहीं। जिस तरह के अभिनय की जगह रंगमंच के हमारे पहले पंक्ति के कलाकारों को दी जा रही है, उसे न करना ही बेहतर होगा। ना करना भी हमारे इन उम्दा कलाकारों को सीखना होगा।  

बुधवार, 21 मार्च 2012

Aaj-Kal

सत्ता के आगे देश बौना

मनोज कुमार

भारत के इतिहास में पहली दफा यह हुआ होगा कि किसी रेलमंत्री को बजट पेश करने के साथ ही अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। दिनेश त्रिवेदी नाम का यह रेलमंत्री ममता बेनर्जी की सरपरस्ती वाले तृणमूल कांग्रेस से सांसद थे। इसके पहले ममता बेनर्जी स्वयं रेलमंत्री थीं। रेलमंत्री की हैसियत से उन्होंने रेलवे की हालत को सुधार करने के लिये कुछ किराया बढ़ाया था जबकि पूर्ववर्ती रेलमंत्री ममता बेनर्जी ने बीते आठ बरसों में एक टका भी रेलभाड़े में बढ़ोत्तरी नहीं की थी। त्रिवेदी का यह फैसला उन्हें नागवर गुजरा और उन्हें पद से हटने का फरमान जारी कर दिया। त्रिवेदी ने साफ कह दिया कि उनका फैसला देशहित में है। वे पार्टी और पद से ऊपर देश को मानते हैं और उनका फैसला इसी के मद्देनजर लिया गया है। ममता हठ के आगे त्रिवेदी को जाना पड़ा। यह ठीक है कि इस पूरे मामले में थोड़ा समय गुजर जाने के बाद धूल पड़ जाएगी और लोग यह भूल भी जाएंगे।

जिस दौर में नायक तो दूर नेता नहीं मिल रहे हैं, उस दौर में त्रिवेदी एक आशा की किरण बनकर उभरे थे। उनका कुर्सी चला जाना उतना महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि केन्द्र सरकार को त्रिवेदी जरूरी नहीं लगे बल्कि उन्हें लगा कि ममता बेनर्जी की हठ नहीं मानी गयी तो सरकार गिर जाएगी। सवाल उठता है कि सत्ता बढ़ी है अथवा देश और केन्द्र सरकार ने ममता बेनर्जी की हठ को मानकर यह जता दिया कि सत्ता के आगे देश बौना है। अपरोक्ष रूप से सरकार ने भी त्रिवेदी के फैसले को गलत माना, यह बात भी जाहिर हो जाती है। त्रिवेदी कहते रहे कि वे भारतीय रेल को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सच है कि हम जिस वैश्विक दुनिया में जी रहे हैं और जिस सुख-सुविधा की हम अपेक्षा कर रहे हैं, उसकी कीमत तो चुकानी होगी। त्रिवेदी ने रेल किराया बढ़ाकर कोई अपराध नहीं किया था क्योंकि केवल सियासी विरोध को छोड़कर आम आदमी ने बहुत आगे जाकर उनका विरोध नहीं किया तो फैसला सही था।

त्रिवेदी का मंत्रीपद जाना इस बात का भी संकेत है कि अब हम राजनीति में शुचिता की कामना करना छोड़ दें। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को भी त्रिवेदी के जाने का अफसोस है और शायद उन्होंने इसलिये ही कहा कि गठबंधन सरकार में फैसला करना मुश्किल होता है। दुर्भाग्य की बात है कि राजनेताओं के भ्रष्टाचार पर हल्ला मचाने वाला मीडिया भी इस मामले को लेकर बहुत कुछ ज्यादा बोला नहीं, लिखा नहीं, कहा नहीं। मीडिया को भी सच पता है और सच यह है कि सत्ता के आगे देश बौना होता जा रहा है। त्रिवेदी ने रेलमंत्री का पद त्यागकर नेपथ्य में भले ही चले गये हों लेकिन उन्होंने उन राजनेताओं के समक्ष एक लाइन खींच दी है जिन्हें आने वाले समय में उस पर चलना होगा। त्रिवेदी के इस जनप्रिय फैसले से एक आस यह भी जगी है। जब हम राजनीति में नायक न सही, कद्दावर नेता ढूंढ़ रहे हैं तब हमें निराश होने की जरूरत नहीं है कि आज भी भारतीय राजनीति में देश के लिये सोचने वाले त्रिवेदी जैसे न केवल कद्दावर राजनेता हैं बल्कि भारतीय राजनीति के नायक भी जिनके लिये पद नहीं, देश सर्वाेपरि है।

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